कक्षा 12 भूगोल अध्याय 11 महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. फ़सल गहनता (कृषि गहनता) की परिभाषा दीजिए।

उत्तर: फ़सल गहनता यह बताती है कि एक कृषि वर्ष में निवल बोए गए क्षेत्र पर कितनी गहनता से (कितनी बार) फ़सलें ली जाती हैं; इसकी गणना (सकल बोया गया क्षेत्र ÷ निवल बोया गया क्षेत्र) × 100 से की जाती है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. निवल बोया क्षेत्र किसे कहते हैं?

उत्तर: वह भूमि जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं, निवल बोया गया क्षेत्र कहलाता है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. भारत में फ़सल ऋतुओं के नाम लिखिए।

उत्तर: भारत में तीन प्रमुख फ़सल ऋतुएँ हैं: खरीफ़ (जून-सितंबर), रबी (अक्टूबर-मार्च) तथा ज़ायद (अप्रैल-जून)।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. भारत की दो प्रमुख रेशेदार फ़सलों के नाम लिखिए।

उत्तर: कपास तथा जूट भारत की दो प्रमुख रेशेदार फ़सलें हैं।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. भारत में हरित क्रांति किस दशक में आई?

उत्तर: हरित क्रांति 1960 के दशक के मध्य में आई, जब गेहूँ (मैक्सिको) व चावल (फिलिपींस) की HYV किस्में उपलब्ध हुईं।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. साझा संपत्ति संसाधन (CPR) का एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: सामुदायिक वन, चरागाहें, ग्रामीण जलीय क्षेत्र (तालाब आदि) तथा अन्य सार्वजनिक स्थान साझा संपत्ति संसाधन के उदाहरण हैं।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. भारत की दो प्रमुख दालों के नाम लिखिए।

उत्तर: चना तथा अरहर (तुर) भारत की प्रमुख दालें हैं।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA) का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: कृषि को अधिक विशिष्ट, स्थायी, पारिश्रमिक तथा जलवायु के अनुकूल बनाना और उपयुक्त मिट्टी व नमी संरक्षण उपायों के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. बंजर भूमि तथा कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर: बंजर व व्यर्थ-भूमि वह भूमि है जो प्रचलित प्रौद्योगिकी की मदद से कृषि योग्य नहीं बनाई जा सकती (जैसे बंजर पहाड़ी भूभाग, मरुस्थल)। कृषि योग्य व्यर्थ भूमि वह भूमि है जो पिछले पाँच वर्षों से अधिक समय से परती है, परंतु भूमि उद्धार तकनीक द्वारा सुधार कर इसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. निवल बोया गया क्षेत्र तथा सकल बोया गया क्षेत्र में अंतर बताएँ।

उत्तर: निवल बोया गया क्षेत्र वह भौतिक क्षेत्रफल है जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं (एक बार गिना जाता है)। सकल बोया गया क्षेत्र में यदि उसी भूमि पर एक कृषि वर्ष में एक से अधिक बार फ़सल बोई जाए तो हर बार का क्षेत्रफल जोड़ा जाता है, इसलिए यह निवल बोए क्षेत्र से अधिक या बराबर होता है।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. रक्षित सिंचाई तथा उत्पादक सिंचाई में क्या अंतर है?

उत्तर: रक्षित सिंचाई का उद्देश्य आर्द्रता की कमी के कारण फ़सलों को नष्ट होने से बचाना है, अर्थात् वर्षा के अतिरिक्त जल की कमी को पूरा करना, ताकि अधिकतम क्षेत्र को पर्याप्त आर्द्रता मिले। उत्पादक सिंचाई का उद्देश्य फ़सलों को पर्याप्त पानी देकर अधिकतम उत्पादकता प्राप्त करना है, जिसमें जल निवेश की मात्रा रक्षित सिंचाई से अधिक होती है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. शुष्क कृषि तथा आर्द्र कृषि में क्या अंतर है?

उत्तर: शुष्क भूमि कृषि उन क्षेत्रों तक सीमित है जहाँ वार्षिक वर्षा 75 सेंटीमीटर से कम है; यहाँ रागी, बाजरा, मूँग, चना, ग्वार जैसी शुष्कता सहन करने वाली फ़सलें उगाई जाती हैं। आर्द्र भूमि कृषि में वर्षा पौधों की ज़रूरत से अधिक होती है, यहाँ चावल, जूट, गन्ना जैसी अधिक पानी चाहने वाली फ़सलें उगाई जाती हैं तथा बाढ़ व मृदा अपरदन का ख़तरा रहता है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. IADP तथा IAAP से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: 1950 के दशक के अंत तक कृषि उत्पादन स्थिर हो जाने की समस्या से उभरने के लिए गहन कृषि ज़िला कार्यक्रम (IADP) तथा गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) प्रारंभ किए गए, जिनका उद्देश्य चुने हुए ज़िलों/क्षेत्रों में गहन कृषि विकास को बढ़ावा देना था।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. भारत में जूट उत्पादन क्षेत्र विभाजन से कैसे प्रभावित हुआ?

उत्तर: देश विभाजन के दौरान भारत का विशाल जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में चला गया, जिससे भारत में जूट उत्पादन क्षेत्र सीमित हो गया। फिर भी आज भारत विश्व का लगभग 60 प्रतिशत जूट उत्पादन करता है, जिसमें पश्चिम बंगाल का हिस्सा लगभग तीन-चौथाई है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. गेहूँ तथा चावल की फ़सल ऋतु में क्या अंतर है?

उत्तर: गेहूँ एक शीतोष्ण कटिबंधीय फ़सल है जो रबी ऋतु (अक्टूबर-मार्च) में बोई जाती है। चावल एक उष्ण आर्द्र कटिबंधीय फ़सल है जो मुख्यतः खरीफ़ ऋतु (दक्षिण-पश्चिम मानसून) में बोया जाता है, यद्यपि दक्षिणी राज्यों व पश्चिम बंगाल में इसकी दो-तीन फ़सलें वर्षभर ली जाती हैं।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. भारत में गेहूँ की खेती के प्रमुख क्षेत्रों तथा उत्पादकता का वर्णन करें।

उत्तर: गेहूँ भारत का चावल के बाद दूसरा प्रमुख अनाज है; भारत विश्व के गेहूँ उत्पादन का लगभग 12.8 प्रतिशत उत्पन्न करता है (2017)। यह शीतोष्ण कटिबंधीय, रबी ऋतु की फ़सल है। इसका 85 प्रतिशत क्षेत्र उत्तर गंगा के मैदान, मालवा पठार तथा हिमालय पर्वतीय श्रेणी में 2700 मीटर ऊँचाई तक केंद्रित है। कुल बोए क्षेत्र के लगभग 14 प्रतिशत भाग पर गेहूँ बोया जाता है। प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान हैं। पंजाब व हरियाणा में उत्पादकता (4000 किग्रा/हेक्टेयर से अधिक) सबसे ऊँची है, जबकि उत्तर प्रदेश, राजस्थान व बिहार में मध्यम है। मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर में गेहूँ की कृषि वर्षा-आधारित है और उत्पादकता कम है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. हरित क्रांति के भारतीय कृषि पर पड़े प्रभावों की विवेचना करें।

उत्तर: 1960 के दशक के मध्य में गेहूँ (मैक्सिको) व चावल (फिलिपींस) की उच्च उत्पादकता किस्में (HYV) उपलब्ध हुईं। भारत ने पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश व गुजरात के सिंचित क्षेत्रों में रासायनिक खाद के साथ इन किस्मों को पैकेज प्रौद्योगिकी के रूप में अपनाया। इससे खाद्यान्नों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जिसे ‘हरित क्रांति’ कहा गया, और देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्म-निर्भर हुआ। इसने कृषि निवेश उद्योगों व छोटे पैमाने के उद्योगों के विकास को भी प्रोत्साहन दिया। परंतु प्रारंभ में यह केवल सिंचित भागों तक सीमित रहने के कारण 1970 के दशक तक कृषि विकास में प्रादेशिक असमानता बढ़ी; बाद में यह प्रौद्योगिकी मध्य व पूर्वी भारत में भी फैली।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. भारत में तिलहन की प्रमुख फ़सलों तथा उनके उत्पादक क्षेत्रों का वर्णन करें।

उत्तर: तिलहन कुल बोए क्षेत्र के लगभग 14 प्रतिशत भाग पर बोए जाते हैं। मूँगफली मुख्यतः शुष्क प्रदेशों की खरीफ़ फ़सल है (दक्षिण भारत में रबी में भी), भारत विश्व की 18.8 प्रतिशत मूँगफली उपजाता है (2018)। तोरिया व सरसों उपोष्णकटिबंधीय रबी फ़सलें हैं, जिनका लगभग एक-तिहाई उत्पादन राजस्थान से आता है। सोयाबीन मुख्यतः मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में (देश का 90 प्रतिशत) तथा सूरजमुखी राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व महाराष्ट्र में केंद्रित है। मालवा पठार, मराठवाड़ा, गुजरात, राजस्थान के शुष्क भाग तथा रायलसीमा क्षेत्र भारत के प्रमुख तिलहन उत्पादक क्षेत्र हैं।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. भूमि सुधारों की कमी भारतीय कृषि की एक समस्या क्यों मानी जाती है?

उत्तर: भूमि के असमान वितरण के कारण भारतीय किसान लंबे समय से शोषित रहे हैं। अंग्रेज़ी शासन के दौरान महालवाड़ी, रैयतवाड़ी तथा ज़मींदारी, इन तीन भूराजस्व प्रणालियों में से ज़मींदारी प्रथा किसानों के लिए सबसे अधिक शोषणकारी रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भूमि सुधारों को प्राथमिकता दी गई, परंतु कमज़ोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण ये सुधार पूर्णतः फलीभूत नहीं हुए, क्योंकि अधिकतर राज्य सरकारें शक्तिशाली ज़मींदारों के विरुद्ध कठोर राजनीतिक निर्णय लेने में टालमटोल करती रहीं। परिणामस्वरूप कृषि योग्य भूमि का असमान वितरण जारी रहा, जिससे कृषि विकास में बाधा उत्पन्न हुई।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. भारत में गन्ना, चाय व कॉफ़ी की कृषि दशाओं की तुलना करें।

उत्तर: गन्ना एक उष्ण कटिबंधीय फ़सल है, वर्षा पर निर्भर होने पर आर्द्र-उपार्द्र जलवायु में तथा भारत में मुख्यतः सिंचित दशाओं में उगाया जाता है (उत्तर प्रदेश ~40% उत्पादन)। चाय एक रोपण कृषि है, उष्ण आर्द्र व उपोष्ण आर्द्र कटिबंधीय जलवायु वाले तरंगित भागों में अच्छे अपवाह वाली मिट्टी में उगाई जाती है (असम प्रमुख, 1840 से)। कॉफ़ी भी उष्ण कटिबंधीय रोपण कृषि है, पश्चिमी घाट की उच्च भूमि (कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु) में उगाई जाती है। अंतर यह है कि गन्ना मैदानी खेतों की (मुख्यतः सिंचित) फ़सल है, जबकि चाय और कॉफ़ी रोपण फ़सलें हैं जो पहाड़ी ढलानों पर उगाई जाती हैं।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. भारत में कृषि योग्य भूमि के निम्नीकरण के कारण व परिणाम बताएँ।

उत्तर: सिंचाई और कृषि विकास की दोषपूर्ण नीतियों से भूमि निम्नीकरण होता है, जो विशेषकर सिंचित क्षेत्रों में भयावह है। कृषि भूमि का बड़ा भाग जलाक्रांतता, लवणता तथा मृदा क्षारता के कारण बंजर हो चुका है। कीटनाशक रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से मृदा परिच्छेदिका में ज़हरीले तत्वों का सांद्रण हो गया है और सिंचित क्षेत्रों की फ़सल-प्रणाली से दलहन (लेग्यूम) विस्थापित हो गई तथा बहु-फ़सलीकरण से परती भूमि में कमी आने से नाइट्रोजन-योगीकरण जैसी प्राकृतिक उर्वरता-पुनर्प्राप्ति प्रक्रिया अवरुद्ध हुई है। उष्ण कटिबंधीय आर्द्र व अर्ध-शुष्क वर्षा-निर्भर क्षेत्र भी जल व वायु अपरदन से प्रभावित हैं, जो प्रायः मानवकृत हैं।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. साझा संपत्ति संसाधन (CPR) ग्रामीण अर्थव्यवस्था में किस प्रकार सहायक हैं?

उत्तर: साझा संपत्ति संसाधन पशुओं के लिए चारा, घरेलू उपयोग हेतु ईंधन-लकड़ी तथा फल, रेशे, गिरी, औषधीय पौधे जैसे अन्य वन-उत्पाद उपलब्ध कराते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन छोटे कृषकों तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए इनका विशेष महत्व है क्योंकि इनकी आजीविका पशुपालन पर निर्भर है। महिलाओं के लिए भी इनका महत्व है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में चारा व ईंधन-लकड़ी एकत्रित करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की होती है; इन भूमियों में कमी से उन्हें दूर तक भटकना पड़ता है। सामुदायिक वन, चरागाहें, ग्रामीण जलीय क्षेत्र व सार्वजनिक स्थान इसके उदाहरण हैं, जिनका उपयोग परिवार से बड़ी इकाई करती है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. भारत में भू-उपयोग की नौ श्रेणियों का वर्णन करते हुए बताएँ कि इनमें से किनमें वृद्धि व किनमें कमी दर्ज हुई है।

उत्तर: भूराजस्व अभिलेखों में भू-उपयोग की नौ श्रेणियाँ हैं: (1) वनों के अधीन क्षेत्र, (2) बंजर व व्यर्थ-भूमि, (3) गैर कृषि-कार्यों में प्रयुक्त भूमि, (4) स्थायी चरागाह क्षेत्र, (5) विविध तरु-फ़सलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र, (6) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, (7) वर्तमान परती भूमि, (8) पुरातन परती भूमि, और (9) निवल बोया क्षेत्र। चित्र 3-1 (1950-51 से 2019-20) के अनुसार पाँच संवर्गों में वृद्धि हुई है, अर्थात् वन (17.0% से 23.4%), गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि (3.2% से 9.1%), स्थायी चरागाहें (2.3% से 3.4%), वर्तमान परती भूमि (3.7% से 4.5%) तथा निवल बोया क्षेत्र (41.7% से 45.6%)। जबकि चार संवर्गों में कमी दर्ज हुई है, अर्थात् बंजर व व्यर्थ-भूमि (13.4% से 5.4%), विविध तरु-फ़सलों के अंतर्गत क्षेत्र (6.9% से 1.0%), कृषि योग्य व्यर्थ भूमि (8.0% से 3.9%) तथा पुरातन परती भूमि (6.1% से 3.7%)। वन में वृद्धि सीमांकन के कारण है, वास्तविक आच्छादन में नहीं; गैर-कृषि भूमि में वृद्धि औद्योगीकरण व बस्तियों के विस्तार से हुई है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषि विकास की महत्वपूर्ण नीतियों का वर्णन करें।

उत्तर: स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय कृषि जीविकोपार्जी अर्थव्यवस्था जैसी थी; विभाजन में लगभग एक-तिहाई सिंचित भूमि पाकिस्तान चली गई। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने (i) व्यापारिक फ़सलों की जगह खाद्यान्नों को उगाने, (ii) कृषि गहनता बढ़ाने, तथा (iii) कृषि योग्य बंजर व परती भूमि को कृषि भूमि में बदलने की नीति अपनाई। प्रारंभ में उत्पादन बढ़ा, परंतु 1950 के दशक के अंत तक ठहर गया, जिससे गहन कृषि ज़िला कार्यक्रम (IADP) व गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) प्रारंभ किए गए। 1960 के दशक के मध्य के अकालों के बाद HYV बीजों पर आधारित हरित क्रांति आई, जिसने सिंचित क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की, यद्यपि इससे प्रादेशिक असमानता भी बढ़ी। 1980 के दशक में योजना आयोग ने वर्षा-क्षेत्रों की समस्याओं पर ध्यान दिया और 1988 में कृषि जलवायु नियोजन प्रारंभ किया, साथ ही डेयरी, मुर्गीपालन, बागवानी व मत्स्यपालन के विविधीकरण पर बल दिया। 1990 के दशक की उदारीकरण व उन्मुक्त बाज़ार नीति ने भी कृषि विकास को प्रभावित किया। हाल में सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA), परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) तथा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं का विस्तार से वर्णन करें।

उत्तर: भारतीय कृषि की समस्याएँ प्रादेशिक होते हुए भी कुछ सर्वव्यापी हैं: (1) अनियमित मानसून पर निर्भरता, अर्थात् केवल एक-तिहाई क्षेत्र सिंचित है, शेष वर्षा पर निर्भर है, जिससे सूखा व बाढ़ दोनों का ख़तरा रहता है; (2) निम्न उत्पादकता, अर्थात् भारत में प्रति हेक्टेयर पैदावार अमेरिका, रूस व जापान से बहुत कम है; (3) वित्तीय संसाधनों की बाध्यताएँ तथा ऋणग्रस्तता, अर्थात् सीमांत व छोटे किसान महाजनों से ऋण लेकर कर्ज़ के जाल में फँसते हैं; (4) भूमि सुधारों की कमी, अर्थात् ज़मींदारी जैसी शोषणकारी प्रणालियों का असर आज भी असमान भूमि-वितरण के रूप में बना हुआ है; (5) छोटे खेत व विखंडित जोत, अर्थात् सीमांत व छोटे किसानों की संख्या बहुत अधिक है, बढ़ते जनसंख्या दबाव से भूजोत का औसत आकार घट रहा है, भूजोत बिखरे हुए हैं और कुछ राज्यों में एक बार भी चकबंदी नहीं हुई, इसलिए छोटे व विखंडित भूजोत आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी हैं; (6) वाणिज्यीकरण का अभाव, अर्थात् अधिकतर किसान स्वयं उपभोग हेतु खेती करते हैं; (7) व्यापक अल्प रोज़गारी, अर्थात् असिंचित क्षेत्रों में 4 से 8 महीने की ऋत्विक बेरोज़गारी; तथा (8) कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण, अर्थात् जलाक्रांतता, लवणता व मृदा क्षारता से भूमि बंजर होना।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. भारत में खाद्यान्न फ़सलों (अनाज व दालों) का वर्गीकरण करते हुए प्रमुख फ़सलों, उनकी ऋतु व उत्पादक राज्यों का वर्णन करें।

उत्तर: खाद्यान्न फ़सलें देश के कुल बोए क्षेत्र के लगभग दो-तिहाई भाग पर उगाई जाती हैं, इन्हें अनाज (उत्तम: चावल-गेहूँ; मोटे: ज्वार-बाजरा-मक्का-रागी) तथा दालों में वर्गीकृत किया जाता है। चावल (खरीफ़, उष्ण आर्द्र) के प्रमुख उत्पादक पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश व पंजाब हैं, विश्व उत्पादन में इसका हिस्सा 22.07% है (रैंक 2)। गेहूँ (रबी, शीतोष्ण) के प्रमुख उत्पादक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा व राजस्थान हैं। ज्वार व बाजरा (मोटे अनाज, अर्ध-शुष्क क्षेत्र) में महाराष्ट्र (ज्वार) तथा महाराष्ट्र, गुजरात व राजस्थान (बाजरा) प्रमुख हैं। मक्का के प्रमुख उत्पादक कर्नाटक, मध्य प्रदेश व बिहार हैं, यह किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। दालों में चना (रबी, उपोष्ण, वर्षा-आधारित, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश प्रमुख) तथा अरहर/तुर (मध्य व दक्षिणी राज्यों के शुष्क भाग, महाराष्ट्र में एक-तिहाई उत्पादन) प्रमुख हैं; दालें कुल बोए क्षेत्र के लगभग 11% भाग पर उगाई जाती हैं और नाइट्रोजन-योगीकरण द्वारा मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती हैं।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
भूमि, इसके स्वामित्व के आधार पर मोटे तौर पर दो वर्गों में बाँटी जाती है: निजी भूसंपत्ति तथा साझा संपत्ति संसाधन (CPRs)। पहले वर्ग की भूमि पर व्यक्तियों का निजी स्वामित्व अथवा कुछ व्यक्तियों का सम्मिलित निजी स्वामित्व होता है। दूसरे वर्ग की भूमियाँ सामुदायिक उपयोग हेतु राज्यों के स्वामित्व में होती हैं। साझा संपत्ति संसाधन पशुओं के लिए चारा, घरेलू उपयोग हेतु ईंधन, लकड़ी तथा साथ ही अन्य वन उत्पाद जैसे फल, रेशे, गिरी, औषधीय पौधे आदि उपलब्ध कराती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन छोटे कृषकों तथा अन्य आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के व्यक्तियों तथा महिलाओं के लिए इन भूमियों का विशेष महत्व है, क्योंकि इनमें से अधिकतर पशुपालन से प्राप्त आजीविका पर निर्भर हैं।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार भूमि को स्वामित्व के आधार पर किन दो वर्गों में बाँटा जाता है?
उत्तर: निजी भूसंपत्ति तथा साझा संपत्ति संसाधन (CPRs)।

(ख) 1 अंक गद्यांश के अनुसार साझा संपत्ति संसाधन पशुओं के लिए क्या उपलब्ध कराते हैं?
उत्तर: पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराते हैं।

(ग) 2 अंक गद्यांश के अनुसार साझा संपत्ति संसाधनों का ग्रामीण भूमिहीन कृषकों तथा महिलाओं के लिए क्या विशेष महत्व है?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार भूमिहीन छोटे कृषकों तथा अन्य आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों की आजीविका पशुपालन पर निर्भर होने के कारण, तथा महिलाओं द्वारा चारा व ईंधन-लकड़ी एकत्रित करने के लिए, इन भूमियों का विशेष महत्व है।

केस स्टडी
भारतीय कृषि की समस्याएँ कृषि पारिस्थितिकी तथा विभिन्न प्रदेशों के ऐतिहासिक अनुभवों के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं। भारत में कृषि क्षेत्र का केवल एक-तिहाई भाग ही सिंचित है; शेष कृषि क्षेत्र में फ़सलों का उत्पादन प्रत्यक्ष रूप से वर्षा पर निर्भर है। भूमि के असमान वितरण के कारण भारतीय किसान लंबे समय से शोषित रहे हैं। अंग्रेज़ी शासन के दौरान तीन भूराजस्व प्रणालियों (महालवाड़ी, रैयतवाड़ी तथा ज़मींदारी) में से ज़मींदारी प्रथा किसानों के लिए सबसे अधिक शोषणकारी रही है।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार भारत में कृषि क्षेत्र का कितना भाग सिंचित है?
उत्तर: केवल एक-तिहाई भाग सिंचित है।

(ख) 1 अंक गद्यांश में उल्लिखित अंग्रेज़ी शासन की तीन भूराजस्व प्रणालियों के नाम लिखिए।
उत्तर: महालवाड़ी, रैयतवाड़ी तथा ज़मींदारी।

(ग) 2 अंक गद्यांश के अनुसार भारतीय किसानों के शोषण का क्या कारण रहा है, और इनमें से कौन-सी प्रणाली सबसे अधिक शोषणकारी रही?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार भूमि के असमान वितरण के कारण भारतीय किसान लंबे समय से शोषित रहे हैं; तीन भूराजस्व प्रणालियों में से ज़मींदारी प्रथा किसानों के लिए सबसे अधिक शोषणकारी रही है।