परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: भू-उपयोग की नौ श्रेणियाँ, साझा संपत्ति संसाधन, फ़सल गहनता व फ़सल ऋतुएँ, प्रमुख फ़सलों की एक-नज़र तालिका, कृषि विकास का कालक्रम, तथा भारतीय कृषि की आठ समस्याएँ। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 पाँच परिभाषाएँ जो याद रखनी हैं
निवल बोया क्षेत्र वह भूमि है जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं। सकल बोया गया क्षेत्र में एक कृषि वर्ष में उसी भूमि पर हुई हर बुवाई का क्षेत्रफल जोड़ा जाता है।
फ़सल गहनता (कृषि गहनता) = (सकल बोया गया क्षेत्र ÷ निवल बोया गया क्षेत्र) × 100। भूमि-कमी व श्रम-अधिकता वाले भारत जैसे देश में इसे बढ़ाना बेरोज़गारी घटाने के लिए भी ज़रूरी है।
साझा संपत्ति संसाधन (CPR): सामुदायिक वन, चरागाह, ग्रामीण जलीय क्षेत्र तथा अन्य सार्वजनिक स्थान, जिन पर परिवार से बड़ी इकाई का प्रयोग व प्रबंधन-दायित्व होता है। ग्राम पंचायत की स्थायी चरागाह भूमि इसका उदाहरण है।
कृषि योग्य व्यर्थ भूमि: पिछले 5 वर्ष या अधिक से परती भूमि (सुधार कर कृषि योग्य बनाई जा सकती है)। पुरातन परती भूमि: 1-5 वर्ष तक परती। वर्तमान परती भूमि: 1 कृषि वर्ष या उससे कम समय तक परती।
रक्षित सिंचाई का उद्देश्य आर्द्रता की कमी से फ़सलों को बचाना है (कम जल-निवेश)। उत्पादक सिंचाई का उद्देश्य अधिकतम उत्पादकता हेतु पर्याप्त पानी देना है (अधिक जल-निवेश)।
2 भू-उपयोग की नौ श्रेणियाँ, एक तालिका में
| # | संवर्ग | 1950-51 → 2019-20 में बदलाव |
|---|---|---|
| 1 | वनों के अधीन क्षेत्र | 17.0% → 23.4% (वृद्धि, सीमांकन के कारण) |
| 2 | बंजर व व्यर्थ-भूमि | 13.4% → 5.4% (कमी) |
| 3 | गैर कृषि-कार्यों में प्रयुक्त भूमि | 3.2% → 9.1% (सर्वाधिक वृद्धि दर) |
| 4 | स्थायी चरागाह क्षेत्र | 2.3% → 3.4% (वृद्धि) |
| 5 | विविध तरु-फ़सलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र | 6.9% → 1.0% (कमी) |
| 6 | कृषि योग्य व्यर्थ भूमि | 8.0% → 3.9% (कमी) |
| 7 | वर्तमान परती भूमि | 3.7% → 4.5% (वृद्धि) |
| 8 | पुरातन परती भूमि | 6.1% → 3.7% (कमी) |
| 9 | निवल बोया क्षेत्र | 41.7% → 45.6% (वृद्धि) |
पाँच संवर्गों में वृद्धि, चार में कमी: यह गिनती और “गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि” की सबसे तेज़ वृद्धि दर याद रखें। समस्त कृषि योग्य भूमि (तालिका 3-1) = निवल बोया क्षेत्र + सभी परती भूमि + कृषि योग्य व्यर्थ भूमि = 2019-20 में 57.7% (1950-51 में 59.5% थी)।
3 फ़सल ऋतुएँ, एक तालिका में (तालिका 3-2)
| ऋतु | अवधि | उत्तर भारत की प्रमुख फ़सलें | दक्षिण भारत की प्रमुख फ़सलें |
|---|---|---|---|
| खरीफ़ | जून-सितंबर | चावल, कपास, बाजरा, मक्का, ज्वार, अरहर (तुर) | चावल, मक्का, रागी, ज्वार, मूँगफली |
| रबी | अक्टूबर-मार्च | गेहूँ, चना, तोरई, सरसों, जौ | चावल, मक्का, रागी, मूँगफली |
| ज़ायद | अप्रैल-जून | वनस्पति, सब्ज़ियाँ, फल, चारा फ़सलें | चावल, सब्ज़ियाँ, चारा फ़सलें |
दक्षिण भारत में तापमान वर्षभर ऊँचा रहने से यह मौसमी भेद नहीं पाया जाता; पर्याप्त सिंचाई हो तो वहाँ एक ही फ़सल एक कृषि वर्ष में तीन बार भी उगाई जा सकती है (जैसे पश्चिम बंगाल में चावल की औस, अमन व बोरो नामक तीन फ़सलें)।
4 प्रमुख फ़सलें, एक नज़र में
| फ़सल | ऋतु/प्रकार | विश्व हिस्सा / स्थान, या बोए क्षेत्र का % | प्रमुख उत्पादक राज्य |
|---|---|---|---|
| चावल | खरीफ़, उष्ण आर्द्र | 22.07%, दूसरा (चीन बाद) | प. बंगाल, उ.प्र., पंजाब |
| गेहूँ | रबी, शीतोष्ण | 12.8% | उ.प्र., म.प्र., पंजाब, हरियाणा, राजस्थान |
| ज्वार | खरीफ़+रबी, अर्ध-शुष्क | कुल बोए क्षेत्र का 5.3% | महाराष्ट्र (आधे से अधिक) |
| बाजरा | खरीफ़, गर्म-शुष्क | कुल बोए क्षेत्र का 5.2% | राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र., हरियाणा |
| मक्का | खाद्य व चारा फ़सल | कुल बोए क्षेत्र का 3.6% | कर्नाटक, म.प्र., बिहार, आंध्र प्रदेश |
| चना | रबी, वर्षा-आधारित | कुल बोए क्षेत्र का 2.8% | म.प्र., उ.प्र., महाराष्ट्र, राजस्थान |
| अरहर (तुर) | खरीफ़, सीमांत भूमि, वर्षा-आधारित | कुल बोए क्षेत्र का ~2% | महाराष्ट्र (एक-तिहाई) |
| मूँगफली | खरीफ़ (दक्षिण में रबी भी) | 18.8% | गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु |
| तोरिया व सरसों | रबी, उपोष्ण | कुल बोए क्षेत्र का 2.5% | राजस्थान (एक-तिहाई), हरियाणा, म.प्र. |
| कपास | खरीफ़, उष्ण, अर्ध-शुष्क | 4.7% क्षेत्र, दूसरा (चीन बाद) | पंजाब-हरियाणा-राजस्थान, गुजरात-महाराष्ट्र, तेलंगाना-कर्नाटक-तमिलनाडु |
| जूट | व्यापारिक फ़सल | ~60% विश्व उत्पादन | प. बंगाल (तीन-चौथाई), बिहार, असम |
| गन्ना | उष्ण, सिंचित | 19.7% विश्व, दूसरा (ब्राज़ील बाद) | उ.प्र. (40%), महाराष्ट्र, कर्नाटक |
| चाय | रोपण कृषि, 1840 से | 21.22% विश्व, अग्रणी उत्पादक | असम (53.2% क्षेत्र), प. बंगाल, तमिलनाडु |
| कॉफ़ी | रोपण कृषि, उष्ण | 3.17% विश्व, आठवाँ स्थान | कर्नाटक (दो-तिहाई से अधिक) |
पैदावार (पुस्तक): चावल पंजाब, तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, प. बंगाल, केरल में अधिक, म.प्र., छत्तीसगढ़, ओडिशा के वर्षा-आधारित क्षेत्रों में बहुत कम · गेहूँ पंजाब-हरियाणा में 4000 किग्रा/हेक्टेयर, उ.प्र., राजस्थान, बिहार में मध्यम, म.प्र., हि.प्र., जम्मू-कश्मीर में कम (85% क्षेत्र: गंगा मैदान, मालवा पठार, हिमालय में 2700 मी तक) · मोटे अनाज कुल बोए क्षेत्र का 16.5% · कपास उत्तर-पश्चिम के सिंचित भागों में अधिक, महाराष्ट्र के वर्षा-निर्भर क्षेत्रों में कम · गन्ना महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र में अधिक, उत्तरी भारत में कम।
मानचित्र-कार्य (CBSE 2026-27): भारत के रेखा-मानचित्र पर अग्रणी उत्पादक राज्य
| फ़सल | छायांकित करें / नाम लिखें |
|---|---|
| चावल | पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब |
| गेहूँ | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान |
| कपास | गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा |
| जूट | पश्चिम बंगाल, बिहार, असम |
| गन्ना | उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश |
| चाय | असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु |
| कॉफ़ी | कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु |
5 कृषि विकास का कालक्रम
| समय | घटना/नीति |
|---|---|
| विभाजन (1947) | लगभग एक-तिहाई सिंचित भूमि पाकिस्तान में चली गई |
| स्वतंत्रता के बाद | व्यापारिक फ़सलों की जगह खाद्यान्न, कृषि गहनता में वृद्धि, बंजर/परती भूमि को कृषि भूमि में बदलना |
| 1950 के दशक का अंत | कृषि उत्पादन स्थिर होने पर गहन कृषि ज़िला कार्यक्रम (IADP) व गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) शुरू |
| 1960 के दशक का मध्य | दो लगातार अकाल; गेहूँ (मैक्सिको) व चावल (फिलिपींस) की HYV किस्मों से हरित क्रांति |
| 1980 का दशक | योजना आयोग का वर्षा-क्षेत्रों की कृषि समस्याओं पर ध्यान |
| 1988 | प्रादेशिक संतुलन हेतु कृषि जलवायु नियोजन प्रारंभ |
| 1990 का दशक | उदारीकरण व उन्मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था नीति |
| हाल में | सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA), परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) व राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) से जैविक खेती को बढ़ावा |
भारत का किसान पोर्टल: किसानों के लिए एक मंच, जो बीमा, कृषि भंडारण, फ़सलों, विस्तार गतिविधियों, बीजों, कीटनाशकों, कृषि मशीनरी, उर्वरकों, बाज़ार मूल्य तथा कल्याणकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी एक इंटरेक्टिव मानचित्र में उपलब्ध कराता है।
6 भारतीय कृषि की आठ समस्याएँ
- अनियमित मानसून पर निर्भरता: केवल एक-तिहाई कृषि क्षेत्र सिंचित; शेष वर्षा पर निर्भर, सूखा व बाढ़ दोनों का ख़तरा (2006, 2017 महाराष्ट्र-गुजरात-राजस्थान में आकस्मिक बाढ़)
- निम्न उत्पादकता: चावल, गेहूँ, कपास, तिलहन की प्रति हेक्टेयर पैदावार अमेरिका, रूस व जापान से बहुत कम
- वित्तीय संसाधनों की बाध्यताएँ तथा ऋणग्रस्तता: सीमांत व छोटे किसान महाजनों से ऋण लेकर कर्ज़ के जाल में फँसते हैं
- भूमि सुधारों की कमी: अंग्रेज़ी शासन की महालवाड़ी, रैयतवाड़ी व ज़मींदारी प्रणालियों में ज़मींदारी सबसे शोषणकारी थी; स्वतंत्रता बाद के सुधार कमज़ोर राजनीतिक इच्छाशक्ति से अधूरे रहे
- छोटे खेत व विखंडित जोत: सीमांत व छोटे किसानों की संख्या अधिक, जनसंख्या दबाव से औसत भूजोत का आकार घट रहा है; कुछ राज्यों में चकबंदी या तो कभी हुई ही नहीं, या दोबारा विखंडन के कारण पुनःचकबंदी की ज़रूरत है
- वाणिज्यीकरण का अभाव: अधिकतर छोटे व सीमांत किसान केवल स्वयं के उपभोग हेतु खाद्यान्न उगाते हैं
- व्यापक अल्प रोज़गारी: असिंचित क्षेत्रों में 4 से 8 महीने की ऋत्विक (मौसमी) बेरोज़गारी
- कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण: जलाक्रांतता, लवणता, मृदा क्षारता व कीटनाशकों के अति-प्रयोग से भूमि बंजर होना; बहु-फ़सलीकरण से नाइट्रोजन-योगीकरण जैसी प्राकृतिक उर्वरता-पुनर्प्राप्ति अवरुद्ध
7 कृषि के प्रकार, एक तालिका में
| आधार | प्रकार | विशेषता |
|---|---|---|
| आर्द्रता का स्रोत | सिंचित कृषि | रक्षित सिंचाई (आर्द्रता-कमी की भरपाई) व उत्पादक सिंचाई (अधिकतम उत्पादकता हेतु अधिक जल) |
| वर्षा-निर्भर (बारानी) कृषि | शुष्क भूमि कृषि (75 सेमी से कम वर्षा) व आर्द्र भूमि कृषि (आवश्यकता से अधिक वर्षा) |
साझा संपत्ति संसाधन (CPR) और भारतीय कृषि की आठ समस्याएँ लघु और दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों के लिए ज़रूर तैयार करें। हरित क्रांति की तीन बातें ज़रूर याद रखें: कौन-सी दो फ़सलों में HYV आईं, किन देशों से आईं, और कौन-से पाँच राज्यों में सबसे पहले अपनाई गईं (पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात)।