NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 6 «न्यायपालिका» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों और गतिविधियों के उत्तर अंत में दिए गए हैं।
1 स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उपाय : बेमेल छाँटें
प्र. न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के विभिन्न तरीक़े कौन-कौन से हैं? निम्नलिखित में जो बेमेल हो उसे छाँटें।
(क) सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ली जाती है।
(ख) न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जाता।
(ग) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।
(घ) न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद की दख़ल नहीं है।
उत्तर: (ग) बेमेल है। यह कथन ग़लत है, सर्वोच्च न्यायालय के पास उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का तबादला करने की शक्ति है, इसलिए यह स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का उपाय नहीं, बल्कि एक तथ्यात्मक रूप से ग़लत कथन है। बाक़ी तीनों (क, ख, घ) न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के असली उपाय हैं।
2 स्वतंत्रता का मतलब जवाबदेही से मुक्ति नहीं
प्र. क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब यह है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है? अपना उत्तर अधिकतम 100 शब्दों में लिखें।
उत्तर: नहीं, न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब जवाबदेही का पूर्ण अभाव नहीं है। स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ़ यह है कि बाक़ी अंग (कार्यपालिका और विधायिका) न्यायपालिका के काम में बाधा न डालें या उसके फ़ैसलों में हस्तक्षेप न करें, और न्यायाधीश बिना डर या पक्षपात के काम कर सकें। न्यायपालिका ख़ुद देश के लोकतांत्रिक ढाँचे का ही हिस्सा है, इसलिए वह संविधान, लोकतांत्रिक परंपराओं और जनता के प्रति जवाबदेह है। इसके अलावा न्यायाधीशों को हटाने की एक (भले ही कठिन) संवैधानिक प्रक्रिया भी मौजूद है, जो दिखाती है कि स्वतंत्रता और जवाबदेही, दोनों एक साथ चलते हैं, स्वतंत्रता का मतलब मनमानी नहीं है।
3 न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के प्रावधान
प्र. न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संविधान में क्या-क्या प्रावधान हैं?
उत्तर:
1. नियुक्ति में विधायिका को शामिल नहीं किया जाता, ताकि दलगत राजनीति नियुक्तियों में हस्तक्षेप न करे।
2. न्यायाधीशों को तय कार्यकाल और कार्यकाल की सुरक्षा मिलती है, वे सेवानिवृत्ति की उम्र तक पद पर रहते हैं, सिर्फ़ असाधारण स्थितियों में हटाए जा सकते हैं।
3. न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते विधायिका की स्वीकृति के अधीन नहीं हैं, यानी वित्तीय स्वतंत्रता है।
4. न्यायाधीशों के काम और फ़ैसलों पर व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती, अदालत की अवमानना पर सज़ा देने की शक्ति इसकी रक्षा करती है, और संसद न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं कर सकती सिवाय हटाने की प्रक्रिया के दौरान।
4 समाचार पढ़कर पहचानें : दहानु किसान मामला
प्र. नीचे दी गई समाचार-रिपोर्ट पढ़ें और उनमें निम्नलिखित पहलुओं की पहचान करें:
(क) मामला किस बारे में है? (ख) इस मामले में लाभार्थी कौन है? (ग) इस मामले में फ़रियादी कौन है? (घ) सोचकर बताएँ कि कंपनी की तरफ़ से कौन-कौन से तर्क दिए जाएँगे? (ङ) किसानों की तरफ़ से कौन-से तर्क दिए जाएँगे?
(समाचार-रिपोर्ट, संक्षेप में: निजी कारपोरेट ब्यूरो, 24 मार्च 2005. सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस एनर्जी से मुंबई के बाहरी इलाके दहानु में चीकू उगाने वाले किसानों को 300 करोड़ रुपये देने को कहा है। चीकू उत्पादक किसानों ने रिलायंस के ताप-ऊर्जा संयंत्र से होने वाले प्रदूषण के विरुद्ध अदालत में अर्जी दी थी। मुंबई से 150 किलोमीटर दूर दहानु की अर्थव्यवस्था खेती और बागवानी के बूते आत्मनिर्भर थी और यह मछली-पालन तथा जंगलों के लिए प्रसिद्ध था। 1989 में संयंत्र चालू हुआ, अगले साल पहली बार फ़सल मारी गई, और अब “महाराष्ट्र के फलों के टोकरे” की 70 प्रतिशत फ़सल समाप्त हो चुकी है। किसानों और पर्यावरणविदों के अनुसार संयंत्र की राख भूमिगत जल में जाकर पूरे पारिस्थितिकी-तंत्र को प्रदूषित करती है। दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने प्रदूषण-नियंत्रण इकाई लगाने का आदेश दिया था और सर्वोच्च न्यायालय ने भी उसके पक्ष में फ़ैसला सुनाया था, फिर भी 2002 तक इकाई नहीं लगी; 2003 में रिलायंस ने संयंत्र हासिल किया, और इकाई अब भी न लगने पर प्राधिकरण ने उससे 300 करोड़ रुपये की बैंक-गारंटी माँगी।)
उत्तर:
मामला: यह मामला रिलायंस एनर्जी के तापीय बिजली संयंत्र से हुए पर्यावरण प्रदूषण के कारण दहानु क्षेत्र के चीकू किसानों को हुए आर्थिक नुक़सान के मुआवज़े के बारे में है।
लाभार्थी: दहानु क्षेत्र के चीकू उगाने वाले किसान।
फ़रियादी: चीकू उगाने वाले किसान, जिन्होंने प्रदूषण के ख़िलाफ़ याचिका दाख़िल की।
कंपनी के संभावित तर्क: संयंत्र से रोज़गार और बिजली उत्पादन में योगदान मिलता है; प्रदूषण-नियंत्रण उपाय लगाने में लगने वाले समय और लागत का हवाला; फ़सल-नुक़सान के लिए सिर्फ़ संयंत्र को ज़िम्मेदार ठहराने पर सवाल।
किसानों के संभावित तर्क: संयंत्र आने से पहले यह क्षेत्र आत्मनिर्भर कृषि और मछली-पालन अर्थव्यवस्था था; संयंत्र शुरू होने के अगले ही साल फ़सल की पहली विफलता हुई; राख से भूजल और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रदूषित हुआ; प्रदूषण-नियंत्रण संयंत्र लगाने के आदेश के बावजूद वर्षों तक कार्रवाई न होना।
5 समाचार पढ़कर पहचानें : दिल्ली सीएनजी मामला
प्र. नीचे दी गई समाचार रिपोर्ट पढ़कर बताएँ: विभिन्न स्तर की सरकारों की पहचान करें, सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पहचानें, इसमें न्यायपालिका और कार्यपालिका के काम के कौन-से पहलू दिखते हैं, और नीति-निर्माण, विधायन, कार्यान्वयन व व्याख्या से जुड़े कौन-से मुद्दे इसमें शामिल हैं।
(समाचार-रिपोर्ट, संक्षेप में: “सीएनजी मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार एक साथ”, द हिंदू, 23 सितंबर 2001. केंद्र और दिल्ली सरकार ने राजधानी के ग़ैर-सीएनजी व्यावसायिक वाहनों को हटाने के मामले में संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय जाने, एकल ईंधन प्रणाली की जगह दोहरी ईंधन प्रणाली की नीति माँगने, निजी वाहनों में सीएनजी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने, बसों को 0.05 प्रतिशत निम्न सल्फ़र डीज़ल से चलाने की अनुमति के लिए दबाव डालने, और अदालत से यह कहने का फ़ैसला किया कि यूरो-दो मानक पूरे करने वाले व्यावसायिक वाहनों को महानगर में चलने की अनुमति दी जाए। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री राम नाईक ने कहा कि लगभग 10,000 बसों को तय समय में सीएनजी पर बदलना संभव नहीं, और डॉ. आर.ए. मशेलकर की समिति “ऑटो ईंधन नीति” बना रही है, इसलिए समय-सीमा बढ़ाई जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने बसों के लिए केवल सीएनजी वाले नियम में ढील देने से इनकार किया था, पर कहा था कि उसने टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए सीएनजी पर कभी ज़ोर नहीं दिया।)
उत्तर:
विभिन्न स्तर की सरकारें: केंद्र सरकार (पेट्रोलियम मंत्रालय) और दिल्ली की राज्य सरकार, दोनों साथ मिलकर काम कर रही हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका: प्रदूषण-नियंत्रण के लिए पहले दिए गए सीएनजी के आदेश को लागू करवाना, और अब सरकारों की नई माँग (डीज़ल जैसे विकल्प) पर विचार करना, यानी अदालत ने अपने पहले के फ़ैसले की समीक्षा और उसमें छूट देने पर सुनवाई की।
न्यायपालिका और कार्यपालिका के मिले-जुले पहलू: अदालत का दिया आदेश (सीएनजी अनिवार्यता) और कार्यपालिका का उसे लागू करने में समय व संसाधन की कठिनाई बताना, दोनों साथ दिखते हैं, यह अदालत और सरकार के बीच लगातार होने वाले संवाद का उदाहरण है।
नीति, विधायन, कार्यान्वयन और व्याख्या के मुद्दे: ऑटो फ़्यूल नीति बनाने के लिए विशेषज्ञ समिति (मशेलकर समिति) गठित करना नीति-निर्माण है; बस बेड़े को सीएनजी में बदलने की समय-सीमा कार्यान्वयन का मुद्दा है; और अदालत का यह तय करना कि आदेश में किस हद तक छूट दी जा सकती है, व्याख्या का मुद्दा है।
6 इक्वाडोर से तुलना
प्र. निम्नलिखित कथन इक्वाडोर के बारे में है। इस उदाहरण और भारत की न्यायपालिका के बीच आप क्या समानता अथवा असमानता पाते हैं?
“सामान्य क़ानूनों की कोई संहिता अथवा पहले सुनाया गया कोई न्यायिक फ़ैसला मौजूद होता तो पत्रकार के अधिकारों को स्पष्ट करने में मदद मिलती। दुर्भाग्य से इक्वाडोर की अदालत इस रीति से काम नहीं करती। पिछले मामलों में उच्चतर अदालत के न्यायाधीशों ने जो फ़ैसले दिए हैं उन्हें कोई न्यायाधीश उदाहरण के रूप में मानने के लिए बाध्य नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत इक्वाडोर (अथवा दक्षिण अमेरिका में किसी और देश) में जिस न्यायाधीश के सामने अपील की गई है उसे अपना फ़ैसला और उसका क़ानूनी आधार लिखित रूप में नहीं देना होता। कोई न्यायाधीश आज एक मामले में कोई फ़ैसला सुनाकर कल उसी मामले में दूसरा फ़ैसला दे सकता है और इसमें उसे यह बताने की ज़रूरत नहीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।”
उत्तर:
अंतर: भारत की न्याय-व्यवस्था पूर्व-निर्णय के सिद्धांत पर आधारित है, निचली अदालतें ऊपर की अदालतों, ख़ासकर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। इससे भारत में क़ानूनी निश्चितता और पूर्वानुमेयता बनी रहती है, जो इक्वाडोर की व्यवस्था में अनुपस्थित बताई गई है।
समानता: भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय ख़ुद अपने पहले के फ़ैसलों पर पुनर्विचार कर सकता है (अनुच्छेद 137), यानी भारत में भी कुछ हद तक लचीलापन है, हालाँकि यह अपवाद है, नियम नहीं, जैसा इक्वाडोर में हर मामले में होता दिखाया गया है।
निष्कर्ष: भारत की व्यवस्था स्थिरता और लचीलेपन के बीच संतुलन बनाती है, जबकि इक्वाडोर के उदाहरण में स्थिरता की पूरी तरह कमी दिखती है।
7 क्षेत्राधिकार से मिलान करें
प्र. निम्न कथनों को सर्वोच्च न्यायालय के अलग-अलग क्षेत्राधिकार (मौलिक, अपीली, परामर्शदायी) से मिलाएँ:
(क) सरकार जानना चाहती थी कि क्या वह पाकिस्तान-अधिग्रहीत जम्मू-कश्मीर के निवासियों की नागरिकता के संबंध में क़ानून पारित कर सकती है।
(ख) कावेरी नदी के जल विवाद के समाधान के लिए तमिलनाडु सरकार अदालत की शरण लेना चाहती है।
(ग) बांध स्थल से हटाए जाने के विरुद्ध लोगों द्वारा की गई अपील को अदालत ने ठुकरा दिया।
उत्तर:
(क) परामर्शदायी क्षेत्राधिकार। सरकार किसी क़ानून-निर्माण से पहले सर्वोच्च न्यायालय से सलाह माँग रही है, यह परामर्शदायी क्षेत्राधिकार का उदाहरण है।
(ख) मौलिक क्षेत्राधिकार। यह दो राज्यों (तमिलनाडु और कर्नाटक) के बीच का विवाद है, जो सीधे सर्वोच्च न्यायालय में सुना जाता है।
(ग) अपीली क्षेत्राधिकार। यहाँ अदालत पहले से चल रहे एक मामले में की गई अपील पर फ़ैसला दे रही है।
8 जनहित याचिका ग़रीबों की मदद कैसे कर सकती है
प्र. जनहित याचिका किस तरह ग़रीबों की मदद कर सकती है?
उत्तर:
1. जनहित याचिका से पहले सिर्फ़ पीड़ित व्यक्ति ही अदालत जा सकता था, अब कोई और (वकील, सामाजिक संगठन, जागरूक नागरिक) भी उसकी ओर से याचिका दाख़िल कर सकता है।
2. ग़रीब और वंचित वर्ग, जैसे विचाराधीन क़ैदी या बंधुआ मज़दूर, अक्सर ख़ुद अदालत तक नहीं पहुँच पाते, जनहित याचिका ने उनके लिए यह रास्ता खोला।
3. हुसैनारा खातून और सुनील बत्रा जैसे मामलों ने दिखाया कि अख़बार की रिपोर्ट या क़ैदी की पर्ची से भी मुक़दमा शुरू हो सकता है।
4. इससे स्वच्छ पर्यावरण, सम्मानजनक जीवन जैसे अधिकार पूरे समाज, ख़ासकर कमज़ोर वर्गों के अधिकार माने जाने लगे।
9 न्यायिक सक्रियता से टकराव?
प्र. क्या आप मानते हैं कि न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव हो सकता है? क्यों?
उत्तर: हाँ, टकराव की संभावना है।
1. न्यायिक सक्रियता के तहत अदालत ने प्रदूषण घटाने, भ्रष्टाचार की जाँच शुरू करवाने या चुनाव सुधार जैसे मुद्दों पर सीधे निर्देश दिए हैं, जो पारंपरिक रूप से कार्यपालिका का काम माना जाता है।
2. इससे कार्यपालिका और न्यायपालिका के काम की सीमा धुँधली हो जाती है, कार्यपालिका को लग सकता है कि अदालत उसके अधिकार-क्षेत्र में दख़ल दे रही है।
3. दूसरी तरफ़, अगर कार्यपालिका अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभाती (जैसे प्रदूषण-नियंत्रण लागू न करना), तो अदालत के हस्तक्षेप को जनहित में ज़रूरी भी माना जा सकता है।
4. इसलिए संतुलन ज़रूरी है, हर अंग को दूसरे के अधिकार-क्षेत्र का सम्मान करना चाहिए, वरना लोकतांत्रिक ढाँचे में तनाव बढ़ सकता है।
10 न्यायिक सक्रियता और मौलिक अधिकारों का विस्तार
प्र. न्यायिक सक्रियता मौलिक अधिकारों की रक्षा से कैसे जुड़ी है? क्या इससे मौलिक अधिकारों का दायरा बढ़ा है?
उत्तर: हाँ, न्यायिक सक्रियता ने मौलिक अधिकारों के दायरे को काफ़ी बढ़ाया है।
1. जनहित याचिका के ज़रिए वे वर्ग भी अदालत तक पहुँचे जो पहले शोषण के अधिकार जैसे मुद्दों (बंधुआ मज़दूरी, बच्चों से ख़तरनाक काम) पर ख़ुद याचिका नहीं दाख़िल कर पाते थे।
2. अदालत ने जेल में बंद क़ैदियों की आँखें फोड़ने, खदानों में अमानवीय काम-हालात, बच्चों के यौन-शोषण जैसे मामलों पर भी विचार किया।
3. स्वच्छ हवा, प्रदूषण-मुक्त पानी और सम्मानजनक जीवन जैसे विषयों को भी अधिकारों का दर्जा मिला, इन्हें पूरे समाज के अधिकार के रूप में देखा गया।
4. इस तरह न्यायिक सक्रियता ने मौलिक अधिकारों को ग़रीब और वंचित वर्गों के लिए वास्तव में सार्थक बना दिया, सिर्फ़ काग़ज़ पर मौजूद अधिकार होने से कहीं आगे बढ़कर।
11 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
अध्याय के हाशिये में, «कहाँ पहुँचे? क्या समझे?» वाले बक्सों में, कार्टूनों के साथ, «आप एक न्यायाधीश हैं» वाले बक्से में और «खुद करें, खुद सीखें» वाली गतिविधियों में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं। ये प्रश्नावली का हिस्सा नहीं हैं, पर इनसे वही बातें परखी जाती हैं, इसलिए किताब के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।
प्र. अपनी कक्षा में निम्नलिखित विषयों पर वाद-विवाद का आयोजन करें। आपकी राय में निम्नलिखित में से कौन-कौन न्यायाधीशों के निर्णय को प्रभावित करते हैं? क्या आप इन्हें ठीक मानते हैं? संविधान; पहले लिए गए फ़ैसले; अन्य अदालतों की राय; जनमत; मीडिया; कानून की परंपराएँ; कानून; समय और कर्मचारियों की कमी; सार्वजनिक आलोचना का भय; कार्यपालिका द्वारा कार्रवाई का भय।
वाद-विवाद के बिंदु:
ठीक माने जाने वाले प्रभाव: संविधान, कानून, पहले लिए गए फ़ैसले और कानून की परंपराएँ। न्यायपालिका को झगड़े कानून के अनुसार हल करने होते हैं, और संविधान, कानून तथा ऊँची अदालतों के पहले के फ़ैसलों पर चलने से ही निर्णय निष्पक्ष और पहले से अनुमान लगाने लायक बनते हैं। अन्य अदालतों की राय भी न्यायाधीश का मार्गदर्शन कर सकती है, हालाँकि ऊँची अदालत उससे बँधी नहीं होती।
व्यावहारिक पर अवांछित प्रभाव: समय और कर्मचारियों की कमी। यह समस्या असली है (अध्याय भी कहता है कि जनहित याचिकाओं से न्यायालयों में काम का बोझ बढ़ा है), पर इसे ज़्यादा न्यायाधीश और कर्मचारी देकर दूर किया जाना चाहिए, स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
ठीक न माने जाने वाले प्रभाव: जनमत, मीडिया, सार्वजनिक आलोचना का भय और कार्यपालिका द्वारा कार्रवाई का भय। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ ही यह है कि न्यायाधीश बिना भय या भेदभाव के अपना काम कर सकें और दूसरे अंग उनके निर्णयों में हस्तक्षेप न करें। इसीलिए न्यायाधीशों का कार्यकाल सुरक्षित है, उनके वेतन-भत्ते के लिए विधायिका की स्वीकृति नहीं ली जाती, और अदालत की अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति उन्हें अनुचित आलोचना से बचाती है।
प्र. अध्याय दो में बताया गया मचल का मामला मुझे याद है। कहा जाता है कि इंसाफ में देरी करना इंसाफ से इन्कार करना है। किसी-न-किसी को इस सिलसिले में कुछ-न-कुछ करना ही चाहिए।
उत्तर. मचल लालुँग 23 वर्ष की उम्र में गिरफ़्तार हुआ और 54 वर्ष तक न्यायिक हिरासत में रहा, पर इस दौरान उसके मुकदमे की एक बार भी सुनवाई नहीं हुई। जुलाई 2005 में, 77 वर्ष की उम्र में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक टीम के दख़ल के बाद ही उसे छोड़ा गया। जिस मुकदमे की सुनवाई ही न हो, वही “इंसाफ में देरी, इंसाफ से इन्कार” है: जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार में निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार भी शामिल है। इसीलिए स्वतंत्र और सुलभ न्यायपालिका ज़रूरी है। जनहित याचिका के ज़रिए कोई भी जागरूक व्यक्ति ऐसे विचाराधीन क़ैदियों की ओर से अदालत जा सकता है जो ख़ुद नहीं जा सकते, जैसा 1979 के हुसैनारा खातून मामले में हुआ।
प्र. मेरा तो सिर चकरा रहा है और कुछ समझ में नहीं आ रहा। लोकतंत्र में आप प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक की आलोचना कर सकते हैं, न्यायाधीशों की क्यों नहीं? और फिर, यह अदालत की अवमानना क्या बला है? क्या मैं ये सवाल करूँ तो मुझे ‘अवमानना’ का दोषी माना जाएगा?
उत्तर: अदालत की अवमानना का मतलब है अदालत के आदेश की अवहेलना करना या अदालत पर ऐसा अनुचित हमला करना जिससे उसकी प्रतिष्ठा गिरे। संविधान के अनुसार न्यायाधीशों के कार्यों और निर्णयों की व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती, और जो अदालत की अवमानना का दोषी पाया जाए उसे दंडित करने की शक्ति न्यायपालिका के पास है, ताकि न्यायाधीश किसी मुक़दमे के ताक़तवर पक्ष की आलोचना के डर के बिना फ़ैसला कर सकें। पर इससे आपके सवाल पूछने पर कोई रोक नहीं है। सवाल पूछना, अदालतों के काम-काज पर चर्चा करना या किसी फ़ैसले का निष्पक्ष विश्लेषण करना अवमानना नहीं है। कानून न्यायाधीशों को केवल व्यक्तिगत और अनुचित हमलों से बचाता है।
प्र. मेरा ख्याल है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में मंत्रिपरिषद् की बात को ज़्यादा तरजीह दी जानी चाहिए या फिर यह मान लें कि न्यायपालिका अपनी नियुक्ति आप ही करने वाला निकाय है।
उत्तर: दोनों की भूमिका है। न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से करता है, और लंबे समय तक इसका अर्थ यही रहा कि वास्तविक शक्ति मंत्रिपरिषद् के पास है। 1982 से 1998 के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने इसे बदला: अब मुख्य न्यायाधीश अन्य चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सलाह से कुछ नाम प्रस्तावित करता है और इन्हीं में से राष्ट्रपति नियुक्तियाँ करता है। इस तरह न्यायपालिका को अपने सदस्य चुनने में बड़ा अधिकार मिला है, पर नियुक्ति फिर भी राष्ट्रपति ही करता है। अध्याय का निष्कर्ष है कि नियुक्तियों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय और मंत्रिपरिषद् दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मंत्रिपरिषद् को ज़्यादा तरजीह देने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमज़ोर होगी, इसलिए दोनों के बीच संतुलन ही ठीक है।
प्र. क्या आप को याद है कि यह विशेष बहुमत क्या है?
उत्तर: विशेष बहुमत में दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए: प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत मिले, और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन मिले। न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव को दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए। न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के विरुद्ध प्रस्ताव इसी कारण गिरा: उसे उपस्थित और मतदान करने वालों का दो-तिहाई बहुमत तो मिला, पर सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे का समर्थन नहीं मिल पाया।
प्र. (i) न्यायपालिका की स्वतंत्रता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
(ii) क्या आपकी राय में कार्यपालिका के पास न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति होनी चाहिए?
(iii) यदि आप से न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव करने का सुझाव देने को कहा जाय तो आप क्या सुझाव देंगे?
उत्तर:
(i) व्यक्तियों के बीच, समूहों के बीच और व्यक्ति या समूह तथा सरकार के बीच झगड़े होते ही हैं, और इन्हें विधि के शासन के सिद्धांत के अनुसार किसी स्वतंत्र संस्था को ही सुलझाना चाहिए। केवल स्वतंत्र न्यायपालिका ही विधि के शासन की रक्षा कर सकती है, व्यक्ति के अधिकारों को बचा सकती है, झगड़ों का निष्पक्ष निपटारा कर सकती है और यह सुनिश्चित कर सकती है कि लोकतंत्र की जगह किसी एक व्यक्ति या समूह की तानाशाही न ले ले। जो अदालत सरकार से डरती हो, वह सरकार के विरुद्ध फ़ैसला नहीं दे सकती।
(ii) अकेले कार्यपालिका के पास नहीं। अगर केवल कार्यपालिका न्यायाधीश नियुक्त करे तो वह अपने पक्ष में फ़ैसले देने वाले न्यायाधीश चुन सकती है, और चूँकि बहुत-से मुक़दमों में सरकार ख़ुद एक पक्ष होती है, इससे स्वतंत्रता कमज़ोर होगी। आज की व्यवस्था, जिसमें नियुक्ति राष्ट्रपति करता है पर वरिष्ठतम न्यायाधीशों के प्रस्ताव पर, यह शक्ति बाँटती है ताकि कोई एक पक्ष उस पर पूरा नियंत्रण न रख सके।
(iii) सुझाव: नियुक्ति योग्यता और ईमानदारी के स्पष्ट, सार्वजनिक मानदंडों पर हो; नाम प्रस्तावित करने की प्रक्रिया ज़्यादा पारदर्शी हो; वरिष्ठ न्यायाधीशों और सरकार, दोनों की राय दर्ज हो; और जैसा अध्याय भी कहता है, व्यक्ति के राजनीतिक विचार या निष्ठा कभी नियुक्ति का आधार न बनें।
प्र. क्या यह बात अपने आप में मज़ेदार नहीं लगती कि सलाह देना, सलाह देने वाले की मर्ज़ी पर और उसको मानना या न मानना, सलाह सुनने वाले की मर्ज़ी पर निर्भर है। मैं तो यही सोचकर चल रहा था कि अदालतें फ़ैसला सुनाती हैं जिन्हें सबको मानना होता है।
उत्तर: यह अजीब लगता है, पर सलाह और फ़ैसला अलग चीज़ें हैं। मौलिक और अपीली क्षेत्राधिकार में सर्वोच्च न्यायालय किसी असली विवाद का फ़ैसला करता है, और उसका फ़ैसला भारत की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होता है। परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार में अभी कोई विवाद नहीं होता: राष्ट्रपति केवल लोकहित या संविधान की व्याख्या से जुड़े किसी विषय पर न्यायालय की कानूनी राय माँगता है। इसलिए न तो न्यायालय सलाह देने के लिए बाध्य है और न राष्ट्रपति उसे मानने को। फिर भी इसकी दो उपयोगिताएँ हैं: सरकार किसी महत्त्वपूर्ण मसले पर कार्रवाई से पहले कानूनी राय जान सकती है जिससे बाद में कानूनी विवाद से बचा जा सकता है, और सलाह के अनुसार वह अपने प्रस्तावित निर्णय या विधेयक में समुचित संशोधन कर सकती है।
प्र. सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही फ़ैसले को बदलने की इजाज़त क्यों दी गई है? क्या ऐसा यह मानकर किया गया है कि अदालत से भी चूक हो सकती है? क्या यह संभव है कि फ़ैसले पर पुनर्विचार करने के लिए जो खंडपीठ बैठी है उसमें वह न्यायाधीश भी शामिल हो, जो फ़ैसला सुनाने वाली खंडपीठ में था?
उत्तर: हाँ, कुछ हद तक इसलिए कि अदालत से भी चूक हो सकती है, और कुछ इसलिए कि बदलते समय के साथ कानून का अर्थ भी आगे बढ़ना चाहिए। अनुच्छेद 137 सर्वोच्च न्यायालय को अपने द्वारा सुनाए गए निर्णय या दिए गए आदेश का पुनरावलोकन करने की शक्ति देता है, और अध्याय बताता है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं अपने निर्णयों से बाध्य नहीं है और कभी भी उसकी समीक्षा कर सकता है। पुनर्विचार याचिका अक्सर उन्हीं न्यायाधीशों के सामने सुनी जाती है जिन्होंने फ़ैसला दिया था, जबकि किसी पुराने फ़ैसले को पलटने वाला बाद का मुक़दमा आम तौर पर दूसरी और बड़ी खंडपीठ तय करती है। दोनों ही तरह से, पुनरावलोकन की शक्ति सबसे ऊँची अदालत को किसी ग़लती में फँसे रहने से बचाती है, क्योंकि उसके ऊपर कोई और अदालत नहीं है जो ग़लती सुधार सके।
प्र. निम्नलिखित दो सूचियों को सुमेलित करें।
सूची 1: (क) बिहार और भारत सरकार के मध्य विवाद की सुनवाई कौन करेगा? (ख) हरियाणा के जिला न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील कहाँ की जाएगी? (ग) एकीकृत न्यायपालिका (घ) किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करना
सूची 2: (1) उच्च न्यायालय (2) परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार (3) न्यायिक पुनर्निरीक्षण (4) मौलिक क्षेत्राधिकार (5) सर्वोच्च न्यायालय (6) एकल संविधान
उत्तर:
(क) बिहार और भारत सरकार के बीच विवाद: (5) सर्वोच्च न्यायालय, अपने (4) मौलिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत, क्योंकि संघ और राज्यों के बीच के विवाद केवल सर्वोच्च न्यायालय ही सुन सकता है।
(ख) हरियाणा के जिला न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील: (1) उच्च न्यायालय।
(ग) एकीकृत न्यायपालिका: (6) एकल संविधान, क्योंकि एक ही संविधान पूरे देश के लिए एक एकीकृत न्याय-व्यवस्था बनाता है, कुछ संघीय देशों की तरह राज्यों की अलग अदालतें नहीं।
(घ) किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करना: (3) न्यायिक पुनर्निरीक्षण।
(2) परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार किसी से नहीं मिलता।
प्र. क्या आप जानते हैं कि हाल के दिनों में न्यायपालिका ने ‘बंद’ और ‘हड़ताल’ को अपने फ़ैसले में अवैध करार दिया है।
उत्तर: यह कार्टून न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है। बंद या हड़ताल उन आम नागरिकों का आना-जाना, काम और व्यापार ज़बरदस्ती रोक देती है जिन्होंने उसमें शामिल होना स्वीकार नहीं किया, इसलिए अदालतों ने ज़बरन बंद को दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन माना है। ऐसे फ़ैसले दिखाते हैं कि अदालत सार्वजनिक जीवन के उन सवालों में भी उतर रही है जो पहले कार्यपालिका और राजनीतिक दलों पर छोड़े जाते थे, और इसी को अध्याय न्यायिक सक्रियता कहता है।
प्र. मैंने कुछ लोगों को कहते सुना है कि जनहित याचिका का असली मतलब होता है ‘निजी हित की याचिका’। ऐसा क्यों भला?
उत्तर: क्योंकि जनहित याचिका का दुरुपयोग हो सकता है। अब कोई भी व्यक्ति दूसरों की ओर से याचिका दायर कर सकता है, इसलिए कुछ याचिकाएँ जनता के लिए नहीं बल्कि प्रचार पाने, किसी व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी को लाभ पहुँचाने या कोई निजी या राजनीतिक हिसाब चुकाने के लिए दायर की जाती हैं, और उन्हें जनहित का नाम दिया जाता है। ऐसे मुक़दमे अदालतों का बोझ भी बढ़ाते हैं, जिसे अध्याय जनहित याचिकाओं की बढ़ती संख्या का नकारात्मक पहलू बताता है। इसीलिए अदालतें सुनवाई से पहले देखती हैं कि याचिका में सचमुच जनहित है या नहीं, और बेबुनियाद याचिकाएँ ख़ारिज कर सकती हैं।
प्र. जनहित याचिका के माध्यम से दायर कम-से-कम एक मुकदमे का ब्यौरा जुटाएँ और पता करें कि किस प्रकार उस मामले से जनता के हित की रक्षा हुई।
कैसे करें: कोई एक मुक़दमा चुनें और लिखें: याचिका किसने और किसकी ओर से दायर की, कौन-सा अधिकार जुड़ा था, अदालत ने क्या आदेश दिया, और बाद में क्या बदला। शुरुआत अध्याय में दिए गए मुक़दमों से कर सकते हैं: हुसैनारा खातून बनाम बिहार सरकार (1979), जो बिहार की जेलों में लंबे समय से बंद विचाराधीन क़ैदियों की ख़बरों से शुरू हुआ; सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980), जो तिहाड़ जेल के एक बंदी के न्यायाधीश कृष्णा अय्यर को भेजे पत्र से शुरू हुआ; या बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत सरकार (1984), जो बंधुआ मज़दूरी से जुड़ा था। अंत में बताएँ कि इस मुक़दमे ने उन लोगों की रक्षा कैसे की जो ख़ुद आसानी से अदालत तक नहीं पहुँच सकते थे।
प्र. मेरा खयाल है कि न्यायिक सक्रियता का रिश्ता कार्यपालिका और विधायिका को यह बताने से है कि उन्हें क्या करना चाहिए। यदि विधायिका और कार्यपालिका ने भी फ़ैसला सुनाना शुरू कर दिया तो फिर क्या होगा?
उत्तर: अगर विधायिका और कार्यपालिका फ़ैसले सुनाने लगें, तो वे अपने ही मामलों में न्यायाधीश बन जाएँगी, क्योंकि बहुत-से विवादों में सरकार ख़ुद एक पक्ष होती है, और तब न विधि का शासन सुरक्षित रहेगा, न नागरिकों के अधिकार। शक्तियों के बँटवारे का कारण यही है: लोकतांत्रिक शासन का आधार यह है कि सरकार का हर अंग एक-दूसरे की शक्तियों और क्षेत्राधिकार का सम्मान करे। अध्याय मानता है कि न्यायिक सक्रियता से अंगों के कार्यों के बीच का अंतर धुँधला हुआ है और उनके बीच संतुलन रखना मुश्किल हो गया है। इसलिए बात दोनों तरफ़ लागू होती है: न अदालतें कार्यपालिका का काम अपने हाथ में लें, न कार्यपालिका और विधायिका अदालत का।
प्र. नागरिकों का एक समूह जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय जाकर प्रार्थना करता है कि वह शहर की नगरपालिका के अधिकारियों को झुग्गी-झोपड़ियाँ हटाने और शहर को सुंदर बनाने का काम करने के आदेश दे, ताकि शहर में पूँजी निवेश करने वालों को आकर्षित किया जा सके। उनका तर्क है कि ऐसा करना जनहित में है। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों का पक्ष है कि ऐसा करने पर उनके ‘जीवन के अधिकार’ का हनन होगा। उनका तर्क है कि जनहित के लिए साफ-सुथरे शहर के अधिकार से ज़्यादा जीवन का अधिकार महत्त्वपूर्ण है। कल्पना करें कि आप एक न्यायाधीश हैं। आप एक निर्णय लिखें और तय करें कि इस ‘जनहित याचिका’ में जनहित का मुद्दा है या नहीं?
आदर्श निर्णय: न्यायालय मानता है कि साफ़-सुथरा और योजनाबद्ध शहर एक जायज़ सार्वजनिक लक्ष्य है। पर जनहित याचिका की व्यवस्था मुख्य रूप से उन लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनी है जो ख़ुद अपनी रक्षा आसानी से नहीं कर सकते, यानी ग़रीब और वंचित लोग। झुग्गी में रहने वाले ठीक वही लोग हैं जिनके लिए यह रास्ता खोला गया था, और हज़ारों लोगों का जीवन का अधिकार निवेशकों को आकर्षित करने से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण जनहित है। जो याचिका इन लोगों के आवास और रोज़ी-रोटी की कोई व्यवस्था किए बिना उन्हें हटाना चाहती है, वह जिस रूप में रखी गई है उस रूप में जनहित में नहीं है। इसलिए न्यायालय झुग्गियाँ हटाने का आदेश देने से इनकार करता है। वह नगरपालिका को निर्देश देता है कि इन बस्तियों में सफ़ाई और नागरिक सुविधाएँ सुधारी जाएँ, और भविष्य में कोई भी पुनर्वास निवासियों से परामर्श करके और उन्हें वैकल्पिक आवास देकर ही किया जाए।
प्र. (i) न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग कब करता है?
(ii) न्यायिक पुनरावलोकन और रिट में क्या फर्क है?
उत्तर:
(i) न्यायालय पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग तब करता है जब कोई कानून संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध हो: जब वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे, या संविधान में शक्ति-विभाजन की योजना के प्रतिकूल हो (जैसे केंद्र राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना दे)। यह शक्ति राज्यों की विधायिका द्वारा बनाए कानूनों पर भी लागू होती है।
(ii) रिट (जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण या परमादेश, सर्वोच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 32 और उच्च न्यायालयों के लिए अनुच्छेद 226) कार्यपालिका को किसी ख़ास तरह से काम करने या न करने का आदेश है, जिससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार बहाल हो। न्यायिक पुनरावलोकन में स्वयं कानून की जाँच होती है और असंवैधानिक पाए जाने पर वह सभी के लिए अप्रभावी घोषित हो जाता है।
प्र. अदालत हमें एक बार साफ-साफ क्यों नहीं बता देती कि आखिर संविधान के वे पहलू क्या हैं, जिन्हें ‘मूल ढाँचा’ कहा जाता है।
उत्तर: क्योंकि मूल ढाँचा मुक़दमा-दर-मुक़दमा तय होता है। केशवानंद भारती मुक़दमे (1973) में अदालत ने कहा कि संविधान का एक मूल ढाँचा है जिसका उल्लंघन कोई नहीं, संसद भी नहीं, कर सकता, और यह तय करने का अधिकार उसने अपने पास रखा कि कौन-से विषय मूल ढाँचे का हिस्सा हैं। अदालत अपने सामने आए विवाद का फ़ैसला करती है, पहले से कोई पूरी सूची नहीं बनाती; कोई तय सूची भविष्य के हर संविधान संशोधन का अनुमान भी नहीं लगा सकती। यह शक्ति अपने पास रखकर अदालत नई परिस्थितियों में भी संविधान के मूल की रक्षा कर पाती है, और इसी कारण यह मुद्दा न्यायपालिका और संसद के बीच तनाव का विषय बना रहता है।
प्र. न्यायपालिका और संसद के बीच टकराव के मुद्दे रहे हैं: न्यायाधीशों की नियुक्ति; न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते; संसद के द्वारा संविधान संशोधन का दायरा; संसद द्वारा न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप।
उत्तर: इनमें मुख्य मुद्दा संसद के द्वारा संविधान संशोधन का दायरा है: संपत्ति के अधिकार के विवाद से लेकर केशवानंद भारती मुक़दमे और मूल ढाँचे तक, टकराव का केंद्र यही रहा है। संसद द्वारा न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप भी एक मुद्दा है जिसका अध्याय उल्लेख करता है: संविधान के अनुसार न्यायाधीशों के आचरण पर संसद में चर्चा नहीं हो सकती, फिर भी संसद और विधान सभाओं में न्यायपालिका के आचरण पर अंगुली उठाई गई, और न्यायपालिका ने भी विधायिका को उसके काम के बारे में निर्देश दिए। वेतन और भत्ते मुख्य मुद्दा नहीं रहे, क्योंकि उनके लिए विधायिका की स्वीकृति नहीं ली जाती। न्यायाधीशों की नियुक्ति का विवाद मुख्य रूप से सर्वोच्च न्यायालय और कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद्) के बीच रहा है, संसद के साथ नहीं।
प्र. सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में न्यायपालिका किस तरह सक्रिय रहती है?
उत्तर: काफ़ी सक्रिय, पर सीमाओं के साथ। अध्याय बताता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हवाला मामले, नरसिंह राव मामले और पेट्रोल पंपों के अवैध आबंटन मामले में राजनेताओं और नौकरशाहों के विरुद्ध जाँच शुरू करने के लिए सी.बी.आई. को निर्देश दिए, और चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को अपनी संपत्ति, आय और शैक्षणिक योग्यता के बारे में शपथपत्र देने का निर्देश दिया। साथ ही निष्कर्ष में अध्याय मानता है कि आम आदमी को आश्चर्य होता है कि अनेक दोषी लोग कितनी आसानी से बरी हो जाते हैं और धनी तथा दबंगों के असर में गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं, और स्वयं न्यायपालिका भी इन बातों से चिंतित है। कार्टून यही दिखाता है: बाइज़्ज़त बरी होकर फिर कभी भ्रष्टाचार न करने की कसम खाने वाला आरोपी बताता है कि अदालत उतना ही कर सकती है जितना सबूत उसके सामने आए।