कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 6 न्यायपालिका महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. विधि का शासन क्या है?

उत्तर: यह सिद्धांत कि सभी व्यक्ति, चाहे अमीर हों या ग़रीब, पुरुष हों या महिला, अगड़ी जाति के हों या पिछड़ी जाति के, एक ही क़ानून के अधीन हैं।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का एक अर्थ बताइए।

उत्तर: बाक़ी अंगों (कार्यपालिका और विधायिका) को न्यायपालिका के फ़ैसलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. न्यायिक पुनरावलोकन क्या है?

उत्तर: सर्वोच्च न्यायालय (या उच्च न्यायालय) की वह शक्ति जिससे वह किसी क़ानून को संविधान के विरुद्ध पाए जाने पर असंवैधानिक घोषित कर सकता है।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. मौलिक क्षेत्राधिकार का एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: केंद्र और किसी राज्य के बीच, या दो राज्यों के बीच विवाद, जो सीधे सर्वोच्च न्यायालय में सुना जाता है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. जनहित याचिका (PIL) क्या है?

उत्तर: एक याचिका जो किसी पीड़ित व्यक्ति की ओर से किसी और (वकील, सामाजिक संगठन आदि) द्वारा दाख़िल की जाती है, ख़ासकर उन लोगों के लिए जो ख़ुद अदालत तक नहीं पहुँच सकते।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. केशवानंद भारती मामला किस वर्ष का है?

उत्तर: 1973

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. न्यायाधीश को हटाने का इकलौता आधार क्या है?

उत्तर: सिद्ध कदाचार या अक्षमता।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 में क्या अंतर है?

उत्तर: अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय को और अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकार बहाल करने के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के दो उपाय बताइए।

उत्तर: 1. न्यायाधीशों की नियुक्ति में विधायिका को शामिल नहीं किया जाता, ताकि दलगत राजनीति असर न डाले।
2. न्यायाधीशों को तय कार्यकाल और कार्यकाल की सुरक्षा मिलती है, सिर्फ़ असाधारण स्थितियों में ही हटाए जा सकते हैं।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की परंपरा दो बार कब और कैसे टूटी?

उत्तर: 1973 में ए- एन- रे को तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को पीछे छोड़कर मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया, और 1975 में एम- एच- बेग को एच- आर- खन्ना को पीछे छोड़कर नियुक्त किया गया।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. वी- रामास्वामी मामले में हटाने का प्रस्ताव विफल क्यों रहा?

उत्तर: प्रस्ताव को उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत तो मिल गया, पर कांग्रेस पार्टी ने मतदान से दूरी बना ली, जिससे प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे का समर्थन नहीं मिल सका।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. सर्वोच्च न्यायालय के पिरामिड ढाँचे को संक्षेप में समझाइए।

उत्तर: सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय है, जिसके फ़ैसले सभी अदालतों पर बाध्यकारी हैं। उसके नीचे उच्च न्यायालय हैं, और सबसे नीचे ज़िला व अधीनस्थ अदालतें, जो ऊपर की अदालतों की सीधी निगरानी में काम करती हैं।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. किन्हीं दो रिट के नाम और उनका संक्षिप्त अर्थ बताइए।

उत्तर: 1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): किसी व्यक्ति को अवैध रूप से बंदी बनाए जाने पर अदालत के सामने पेश करने का आदेश।
2. परमादेश (Mandamus): किसी सरकारी अधिकारी को अपना कर्तव्य निभाने का आदेश।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. हुसैनारा खातून बनाम बिहार सरकार मामला संक्षेप में बताइए।

उत्तर: 1979 में समाचारों में बिहार की जेलों में बंद विचाराधीन क़ैदियों की ख़बर छपी, जो अपनी संभावित सज़ा से भी ज़्यादा समय जेल में काट चुके थे। इस ख़बर से प्रेरित होकर एक वकील ने याचिका दाख़िल की, जो शुरुआती जनहित याचिकाओं में से एक बनी।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. न्यायिक सक्रियता का एक सकारात्मक और एक नकारात्मक असर बताइए।

उत्तर: सकारात्मक: इसने व्यक्तियों के साथ-साथ समूहों को भी अदालत तक पहुँच दी।
नकारात्मक: इससे अदालतों पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति के अधिकार के बारे में क्या कहा?

उत्तर: अदालत ने कहा कि संपत्ति का अधिकार संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे उचित रूप से सीमित किया जा सकता है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. न्यायपालिका की स्वतंत्रता के तीन अर्थ समझाइए।

उत्तर: 1. कार्यपालिका और विधायिका जैसे बाक़ी अंग न्यायपालिका के काम में इस तरह बाधा न डालें कि वह न्याय ही न कर पाए।
2. बाक़ी अंग न्यायपालिका के फ़ैसलों में हस्तक्षेप न करें।
3. न्यायाधीश बिना किसी डर या पक्षपात के अपना काम कर सकें। साथ ही, स्वतंत्रता का मतलब मनमानी या जवाबदेही का अभाव नहीं है, न्यायपालिका संविधान, लोकतांत्रिक परंपराओं और जनता के प्रति जवाबदेह है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के रुख़ में समय के साथ क्या बदलाव आया?

उत्तर: 1. शुरू में मुख्य न्यायाधीश से सिर्फ़ ‘परामर्श’ लिया जाता था, अंतिम फ़ैसला मंत्रिपरिषद् के पास ही रहता था।
2. 1982 से 1998 के बीच यह मामला बार-बार सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया।
3. पहले अदालत ने माना कि मुख्य न्यायाधीश की भूमिका सिर्फ़ सलाहकारी है।
4. फिर अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश की सलाह माननी ही होगी।
5. आख़िरकार अदालत ने एक नई प्रक्रिया सुझाई, जिसमें मुख्य न्यायाधीश चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सलाह से नाम प्रस्तावित करेंगे, इस तरह वरिष्ठ न्यायाधीशों के समूह की राय सबसे ज़्यादा मायने रखने लगी।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. वी- रामास्वामी मामले का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: 1. 1991 में पहली बार किसी सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव 108 सांसदों ने रखा।
2. न्यायमूर्ति वी- रामास्वामी पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए धन का दुरुपयोग करने का आरोप था।
3. 1992 में एक जाँच आयोग ने उन्हें पद के जान-बूझकर और घोर दुरुपयोग तथा नैतिक पतन का दोषी पाया।
4. इतने कठोर आरोपों के बावजूद, प्रस्ताव को उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत तो मिला, पर कांग्रेस पार्टी ने मतदान से दूरी बना ली, जिससे प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे का समर्थन नहीं मिल सका, और रामास्वामी हटाए नहीं जा सके।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. सर्वोच्च न्यायालय के चार प्रकार के क्षेत्राधिकार समझाइए।

उत्तर: 1. मौलिक क्षेत्राधिकार: संघ-राज्य और राज्यों के आपसी विवाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय में सुने जाते हैं।
2. रिट क्षेत्राधिकार: मौलिक अधिकार हनन होने पर व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है, अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसी रिट जारी कर सकती है।
3. अपीली क्षेत्राधिकार: निचली अदालतों के फ़ैसलों पर सर्वोच्च न्यायालय पुनर्विचार कर सकता है।
4. परामर्शदायी क्षेत्राधिकार: राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्व के मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह ले सकता है, पर न अदालत सलाह देने को बाध्य है, न राष्ट्रपति उसे मानने को।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. जनहित याचिका (PIL) की शुरुआत कैसे हुई, दो शुरुआती उदाहरण देकर बताइए।

उत्तर: 1. सामान्यतः कोई व्यक्ति तभी अदालत जा सकता था जब उसे ख़ुद नुक़सान पहुँचा हो, यह धारणा 1979 के आसपास बदली।
2. हुसैनारा खातून बनाम बिहार सरकार (1979): बिहार की जेलों में बंद विचाराधीन क़ैदियों की ख़बर से प्रेरित होकर एक वकील ने याचिका दाख़िल की।
3. सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980): तिहाड़ जेल के एक क़ैदी ने न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर को यातना के बारे में एक पर्ची भिजवाई, जिसे याचिका में बदला गया।
4. इन मामलों ने जनहित याचिका को शुरुआती पहचान दी, और बाद में सामाजिक संगठनों व वकीलों को ज़रूरतमंदों की ओर से याचिका दाख़िल करने की अनुमति मिली।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. न्यायिक सक्रियता के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पहलू बताइए।

उत्तर: सकारात्मक: 1. इसने व्यक्तियों के साथ-साथ समूहों को भी अदालत तक पहुँच दी। 2. इससे कार्यपालिका की जवाबदेही बढ़ी। 3. चुनाव लड़ने वालों को संपत्ति-आय-शिक्षा का शपथ-पत्र देना अनिवार्य हुआ, जिससे चुनाव ज़्यादा निष्पक्ष बने।
नकारात्मक: 1. अदालतों पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया। 2. कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच की सीमा धुँधली हुई। 3. प्रदूषण, भ्रष्टाचार-जाँच या चुनाव-सुधार जैसे मामलों में अदालत का दख़ल, जो असल में कार्यपालिका/विधायिका का काम माना जाता है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. केशवानंद भारती मामले (1973) की तीन मुख्य बातें बताइए।

उत्तर: 1. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान का एक मूल ढाँचा है, जिसे संसद संशोधन के ज़रिए भी नहीं बदल सकती।
2. अदालत ने यह भी कहा कि संपत्ति का अधिकार (जो विवाद का मुद्दा था) मूल ढाँचे का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे उचित रूप से सीमित किया जा सकता है।
3. अदालत ने यह तय करने का अधिकार भी अपने पास रखा कि संविधान की कौन-सी बातें मूल ढाँचे का हिस्सा हैं।
4. यह मामला दिखाता है कि न्यायपालिका संविधान की व्याख्या करने की अपनी शक्ति का कैसे इस्तेमाल करती है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में किए गए प्रावधानों को विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 1. नियुक्ति में विधायिका शामिल नहीं: इससे यह सुनिश्चित हुआ कि दलगत राजनीति नियुक्तियों में हस्तक्षेप न करे; न्यायाधीश बनने के लिए वकील का अनुभव और/या क़ानून की गहरी समझ ज़रूरी है, राजनीतिक विचार नहीं।
2. तय कार्यकाल और कार्यकाल की सुरक्षा: न्यायाधीश सेवानिवृत्ति की उम्र तक पद पर रहते हैं, सिर्फ़ असाधारण स्थितियों में ही हटाए जा सकते हैं, इससे वे बिना डर काम कर पाते हैं।
3. वित्तीय स्वतंत्रता: न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते विधायिका की स्वीकृति के अधीन नहीं हैं।
4. आलोचना से सुरक्षा: न्यायाधीशों के काम पर व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती, अवमानना पर सज़ा देने की शक्ति इसकी रक्षा करती है, और संसद न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं कर सकती सिवाय हटाने की प्रक्रिया के दौरान।
5. साथ ही, न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया बेहद कठिन बनाई गई है, विशेष बहुमत और सिद्ध कदाचार/अक्षमता की शर्त इसे मुश्किल बनाती है, जैसा वी- रामास्वामी मामले में देखा गया।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. वी- रामास्वामी मामले का पूरा विवरण देते हुए यह समझाइए कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बारे में क्या दिखाता है।

उत्तर: 1. 1991 में पहली बार किसी सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव 108 सांसदों ने रखा।
2. न्यायमूर्ति वी- रामास्वामी पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए धन का दुरुपयोग करने का आरोप था।
3. 1992 में एक जाँच आयोग ने उन्हें पद के जान-बूझकर और घोर दुरुपयोग तथा नैतिक पतन का दोषी पाया।
4. इतने कठोर आरोपों के बावजूद, प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत तो मिला, पर कांग्रेस पार्टी के मतदान से दूर रहने से यह सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे का समर्थन नहीं जुटा सका, और रामास्वामी हटाए नहीं जा सके।
5. यह मामला दिखाता है कि न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया कितनी कठिन बनाई गई है, इतने कठोर सबूतों के बावजूद भी हटाना संभव नहीं हुआ।
6. यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता की मज़बूती और उसकी संभावित क़ीमत, दोनों को उजागर करता है, स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई कठोर प्रक्रिया कभी-कभी जवाबदेही को भी कठिन बना देती है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. जनहित याचिका और न्यायिक सक्रियता का भारतीय राजनीतिक व्यवस्था पर पड़ा असर विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 1. जनहित याचिका (PIL) ने अदालत जाने की शर्त बदल दी, अब पीड़ित व्यक्ति के अलावा कोई और भी उसकी ओर से याचिका दाख़िल कर सकता है, यह धारणा 1979 के आसपास आई।
2. हुसैनारा खातून (1979) और सुनील बत्रा (1980) जैसे शुरुआती मामलों ने विचाराधीन क़ैदियों और यातना जैसे मुद्दों को अदालत तक पहुँचाया।
3. सकारात्मक असर: इससे व्यक्तियों के साथ-साथ समूहों को भी अदालत तक पहुँच मिली, कार्यपालिका की जवाबदेही बढ़ी, और चुनाव लड़ने वालों को संपत्ति-आय-शिक्षा का शपथ-पत्र देना अनिवार्य होने से चुनाव निष्पक्ष बने।
4. नकारात्मक असर: अदालतों पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया, और कार्यपालिका-विधायिका-न्यायपालिका के बीच की सीमा धुँधली हुई, क्योंकि प्रदूषण, भ्रष्टाचार-जाँच और चुनाव-सुधार जैसे मामले असल में कार्यपालिका/विधायिका के काम माने जाते हैं।
5. दुनिया के कई देश अब जनहित याचिका अपना रहे हैं, दक्षिण अफ़्रीका ने तो इसे अपने संविधान के अधिकार-पत्र में ही शामिल कर लिया है।
6. कुल मिलाकर, जनहित याचिका ने न्यायपालिका को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में कहीं ज़्यादा शक्तिशाली बना दिया है, पर इसने सरकार के तीनों अंगों के बीच संतुलन को भी नाज़ुक बनाया है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. केशवानंद भारती मामले (1973) की पृष्ठभूमि, फ़ैसला और उसका न्यायपालिका-संसद संबंधों पर असर विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 1. संविधान लागू होते ही संपत्ति के अधिकार को लेकर संसद और न्यायपालिका के बीच टकराव शुरू हो गया था, संसद भूमि-सुधार के लिए संपत्ति के अधिकार पर पाबंदी लगाना चाहती थी।
2. अदालत ने कहा कि संसद इस तरह मौलिक अधिकार सीमित नहीं कर सकती, संसद ने फिर संविधान संशोधन की कोशिश की, पर अदालत ने कहा कि संशोधन से भी मौलिक अधिकार कम नहीं किया जा सकता।
3. 1967-1973 के बीच यह टकराव और गंभीर हुआ, भूमि-सुधार, निवारक निरोध और आरक्षण जैसे मुद्दे इसके केंद्र में रहे।
4. 1973 में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान का एक मूल ढाँचा है, जिसे संसद संशोधन के ज़रिए भी नहीं बदल सकती।
5. अदालत ने यह भी कहा कि संपत्ति का अधिकार मूल ढाँचे का हिस्सा नहीं है, इसलिए उसे सीमित किया जा सकता है, और यह तय करने का अधिकार भी अदालत ने अपने पास रखा कि क्या मूल ढाँचे का हिस्सा है।
6. 1979 में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया, जिससे इस टकराव की प्रकृति बदल गई, और मूल ढाँचा सिद्धांत आज भी संसद की संशोधन-शक्ति पर सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमा बना हुआ है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
बिहार के किसी शहर के नागरिकों के एक समूह ने जनहित याचिका के ज़रिए अदालत से यह आदेश माँगा है कि नगर निगम शहर की झुग्गियाँ हटाकर शहर को सुंदर बनाए, ताकि निवेशकों को आकर्षित किया जा सके। वे कहते हैं कि यह ‘जनहित’ में है। झुग्गी बस्तियों के निवासियों का कहना है कि इससे उनके जीवन के अधिकार का हनन होगा। उनका तर्क है कि जीवन का अधिकार, स्वच्छ शहर के अधिकार से ज़्यादा ‘जनहित’ के केंद्र में है। कल्पना कीजिए कि आप न्यायाधीश हैं।

(क) 1 अंक इस मामले में याचिका किस अनुच्छेद के तहत दाख़िल की जा सकती है?
उत्तर: मौलिक अधिकार हनन की आशंका होने पर याचिका अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) या अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) के तहत दाख़िल की जा सकती है।

(ख) 2 अंक दोनों पक्षों (नागरिक समूह और झुग्गी निवासियों) के तर्कों में जनहित की क्या अलग-अलग परिभाषा है?
उत्तर: नागरिक समूह के लिए ‘जनहित’ का मतलब है शहर की सुंदरता और निवेश आकर्षित करना, यानी बड़े पैमाने पर आर्थिक फ़ायदा। झुग्गी निवासियों के लिए ‘जनहित’ का मतलब है उनका जीवन का अधिकार बचाना, यानी सबसे कमज़ोर वर्ग की बुनियादी ज़रूरतों की रक्षा।

(ग) 3 अंक आप बतौर न्यायाधीश इस मामले में क्या फ़ैसला देंगे, और क्यों?
उत्तर: जीवन के अधिकार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति भगवती के बंधुआ मुक्ति मोर्चा मामले में कहे गए शब्दों के अनुसार, ग़रीबों की समस्याएँ बाक़ी मामलों से गुणात्मक रूप से अलग होती हैं और उन्हें एक अलग तरह के न्यायिक दृष्टिकोण की ज़रूरत होती है। झुग्गियाँ हटाने से पहले निवासियों के लिए उचित पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए, बिना पुनर्वास के हटाना जीवन के मौलिक अधिकार का सीधा हनन होगा। शहर को सुंदर बनाने का लक्ष्य ग़लत नहीं है, पर उसे किसी वर्ग के बुनियादी अधिकारों की क़ीमत पर हासिल नहीं किया जा सकता।

केस स्टडी
1991 में पहली बार किसी सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव 108 सांसदों ने रखा। न्यायमूर्ति वी- रामास्वामी पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए धन का दुरुपयोग करने का आरोप था। 1992 में एक जाँच आयोग ने उन्हें पद के जान-बूझकर और घोर दुरुपयोग तथा नैतिक पतन का दोषी पाया। इतने कठोर आरोपों के बावजूद, प्रस्ताव को उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत तो मिला, पर कांग्रेस पार्टी ने मतदान से दूरी बना ली, जिससे प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे का समर्थन नहीं मिल सका।

(क) 1 अंक जाँच आयोग ने न्यायमूर्ति रामास्वामी को किस बात का दोषी पाया?
उत्तर: पद के जान-बूझकर और घोर दुरुपयोग तथा नैतिक पतन का, सार्वजनिक धन का निजी इस्तेमाल करने के लिए।

(ख) 2 अंक प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत मिलने के बावजूद वह पारित क्यों नहीं हो सका?
उत्तर: संविधान के अनुसार हटाने का प्रस्ताव सिर्फ़ उपस्थित और मतदान करने वालों के दो-तिहाई बहुमत से नहीं, बल्कि सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे के समर्थन से भी पारित होना ज़रूरी है। कांग्रेस पार्टी के मतदान से दूर रहने के कारण यह दूसरी शर्त पूरी नहीं हो सकी।

(ग) 3 अंक यह मामला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच के तनाव के बारे में क्या बताता है?
उत्तर: यह दिखाता है कि न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया जान-बूझकर बेहद कठिन बनाई गई है, ताकि राजनीतिक दबाव में या मामूली कारणों से किसी न्यायाधीश को न हटाया जा सके, यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। पर यही कठोर प्रक्रिया कभी-कभी वास्तविक दुराचार के बावजूद जवाबदेही तय करना भी मुश्किल बना देती है, जैसा इस मामले में हुआ। यह संतुलन इसलिए ज़रूरी है ताकि स्वतंत्रता की आड़ में मनमानी न हो, पर साथ ही राजनीतिक कारणों से किसी ईमानदार न्यायाधीश को हटाना भी आसान न हो जाए।