NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 7 «संघवाद» की प्रश्नावली के ग्यारहों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 संघवाद की कार्य-प्रणाली पहचानें
प्र. नीचे कुछ घटनाओं की सूची दी गई है। इनमें से किसको आप संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में चिह्नित करेंगे और क्यों?
(क) दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल को छठी अनुसूची का दर्जा और त्रिपक्षीय समझौता।
(ख) वर्षा प्रभावित प्रदेशों के लिए केंद्र की कार्य-योजना माँग।
(ग) दिल्ली नगर निगम के नए आयुक्त की नियुक्ति।
(घ) मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा।
(ङ) अरुणाचल प्रदेश को केंद्र से ग्रामीण जलापूर्ति योजना का धन।
(च) मुंबई में ग़ैर-मराठी छात्रों के विरुद्ध शिवसैनिकों की धमकी।
(छ) नागालैंड की DAN सरकार को भंग करने की माँग।
(ज) बिहार सरकार की नक्सलियों से हथियार छोड़ने की अपील।
उत्तर:
(क), (ग), (घ) और (ङ) संघवाद की कार्य-प्रणाली के अच्छे उदाहरण हैं। (क) में केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय के बीच त्रिपक्षीय समझौता और छठी अनुसूची के तहत स्वायत्तता देना, केंद्र-राज्य सहयोग का उदाहरण है। (ग) में अखिल भारतीय सेवा (IAS) के अधिकारी का तबादला, केंद्र के अखिल भारतीय सेवाओं पर नियंत्रण को दिखाता है। (घ) में राज्य सभा द्वारा किसी संस्था को केंद्रीय दर्जा देना विधायी प्रक्रिया का उदाहरण है। (ङ) में केंद्र से राज्य को वित्तीय सहायता, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों का उदाहरण है।
(ख), (छ) और (ज) संघवाद की कार्य-प्रणाली से जुड़ी हैं, पर सीधे उदाहरण नहीं। (ख) आम प्रशासनिक सहायता है, (छ) राज्यपाल से जुड़ी राजनीतिक माँग है, (ज) राज्य सरकार की अपनी क़ानून-व्यवस्था की कार्रवाई है।
(च) संघवाद का उदाहरण नहीं है, यह भाषाई-क्षेत्रीय तनाव और क़ानून-व्यवस्था की समस्या है, केंद्र-राज्य संबंधों से सीधा जुड़ा नहीं।
2 कौन-सा कथन सही है
प्र. बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही होगा और क्यों?
(क) संघवाद से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग मेल-जोल से रहेंगे, बिना इस डर के कि एक की संस्कृति दूसरे पर लाद दी जाएगी।
(ख) अलग-अलग तरह के संसाधनों वाले दो क्षेत्रों के बीच आर्थिक लेनदेन में संघीय प्रणाली बाधा पहुँचाएगी।
(ग) संघीय प्रणाली सुनिश्चित करती है कि केंद्र में सत्तासीन लोगों की शक्तियाँ सीमित रहें।
उत्तर:
(क) और (ग) सही हैं, (ख) ग़लत है।
(क) सही है, संघवाद हर क्षेत्र को अपनी संस्कृति और पहचान बनाए रखने की गुंजाइश देता है, इसलिए दूसरों की संस्कृति थोपे जाने का डर कम होता है, जिससे मेल-जोल बढ़ता है।
(ग) सही है, शक्तियों का केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक बँटवारा केंद्र की शक्ति को स्वाभाविक रूप से सीमित करता है।
(ख) ग़लत है, संघीय प्रणाली का मतलब आर्थिक बाधा नहीं, बल्कि साझा बाज़ार और सहयोग की व्यवस्था है, इससे उलट, यह अलग-अलग संसाधनों वाले क्षेत्रों के बीच व्यापार को सुगम भी बना सकती है।
3 बेल्ज़यिम के संविधान से तुलना
प्र. बेल्ज़यिम के संविधान के कुछ प्रारंभिक अनुच्छेदों के आधार पर बताएँ कि बेल्ज़यिम में संघवाद को किस रूप में साकार किया गया है। भारत के संविधान के लिए ऐसा ही अनुच्छेद लिखने का प्रयास करें।
उत्तर:
बेल्ज़यिम का संघवाद भाषाई और सामुदायिक पहचान पर आधारित है, वहाँ समुदाय (फ़्रेंच, फ़्लेमिश, जर्मन), क्षेत्र (वैलून, फ़्लेमिश, ब्रुसेल्स) और भाषाई क्षेत्र, तीनों अलग-अलग तरह से देश को बाँटते हैं, यानी एक ही देश में पहचान की कई परतें एक साथ काम करती हैं।
भारत के लिए इसी शैली में एक संभावित अनुच्छेद: “भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों से बना एक संघ होगा। भारत में अट्ठाईस राज्य और आठ केंद्र-शासित प्रदेश हैं, प्रत्येक राज्य की अपनी विधानसभा और सरकार होगी, जबकि केंद्र-शासित प्रदेशों का प्रशासन केंद्र सरकार द्वारा निर्देशित होगा।”
4 संघवाद पर अपने सुझाव
प्र. कल्पना करें कि आपको संघवाद के प्रावधान लिखने हैं। लगभग 300 शब्दों का एक लेख लिखें जिसमें आपके सुझाव हों: (क) केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा, (ख) वित्त-संसाधनों का वितरण, (ग) राज्यपालों की नियुक्ति।
उत्तर:
(क) शक्तियों का बँटवारा: मौजूदा तीन-सूची व्यवस्था (संघ, राज्य, समवर्ती) उचित है, पर समवर्ती सूची के विषयों पर राज्यों से पहले सलाह-मशविरा अनिवार्य किया जा सकता है, ताकि केंद्र का दख़ल एकतरफ़ा न लगे।
(ख) वित्त-संसाधनों का वितरण: राज्यों को अपने राजस्व स्रोत बढ़ाने की छूट दी जानी चाहिए, और केंद्रीय अनुदान का बँटवारा एक स्वतंत्र, पारदर्शी सूत्र (जैसे वित्त आयोग की सिफ़ारिशों) पर आधारित हो, केंद्र के विवेक पर कम निर्भर।
(ग) राज्यपालों की नियुक्ति: राज्यपाल की नियुक्ति एक स्वतंत्र, बहुदलीय समिति की सिफ़ारिश से हो, न कि सिर्फ़ केंद्र सरकार के विवेक से, जैसा सरकारिया आयोग ने भी सुझाया था, ताकि नियुक्ति दलगत भावना से मुक्त रहे।
इन तीनों सुझावों का मक़सद केंद्र-राज्य विश्वास बढ़ाना और सहयोगात्मक संघवाद को मज़बूत करना है, बिना केंद्र की ज़रूरी समन्वय-भूमिका को कमज़ोर किए।
5 राज्य के गठन का आधार
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा प्रांत के गठन का आधार होना चाहिए, और क्यों?
(क) सामान्य भाषा (ख) सामान्य आर्थिक हित (ग) सामान्य क्षेत्र (घ) प्रशासनिक सुविधा
उत्तर: (क) सामान्य भाषा सबसे उपयुक्त आधार है, भारत में राज्यों का गठन मुख्यतः भाषाई पहचान के आधार पर हुआ है (जैसे राज्य पुनर्गठन आयोग, 1953-56), इससे लोगों को अपनी भाषा-संस्कृति में शासन चलाने का अवसर मिलता है। हालाँकि सामान्य क्षेत्र (ग) और प्रशासनिक सुविधा (घ) भी सहायक कारक हो सकते हैं (जैसे 2000 में छत्तीसगढ़-उत्तराखंड-झारखंड का गठन प्रशासनिक सुविधा के लिए भी हुआ), पर भाषा राज्य-गठन का सबसे मूलभूत और ऐतिहासिक रूप से प्रमुख आधार रही है। सामान्य आर्थिक हित (ख) अकेले राज्य बनाने का उचित आधार नहीं, क्योंकि आर्थिक हित समय के साथ बदलते रहते हैं।
6 उत्तर भारत के हिंदी-भाषी राज्य
प्र. उत्तर भारत के प्रदेशों, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार, के अधिकांश लोग हिंदी बोलते हैं। यदि इन सभी प्रांतों को मिलाकर एक प्रदेश बना दिया जाए तो क्या यह संघवाद के विचार से संगत होगा? तर्क दीजिए।
उत्तर: नहीं, यह संघवाद के विचार से मेल नहीं खाएगा।
1. भाषा एक जैसी होने के बावजूद इन चारों राज्यों की अपनी अलग क्षेत्रीय पहचान, इतिहास, संस्कृति और प्रशासनिक ज़रूरतें हैं।
2. इतना बड़ा एक राज्य बनाना प्रशासनिक रूप से बेहद अव्यावहारिक होगा, स्थानीय स्तर पर शासन की पहुँच कमज़ोर पड़ेगी।
3. संघवाद सिर्फ़ भाषा पर आधारित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्वायत्तता और विविधता के सम्मान पर भी आधारित है, चारों राज्यों को मिलाना एक तरह की जबरन एकरूपता होगी, जो संघवाद की भावना के विपरीत है।
4. इसलिए, भाषा एक समान होने पर भी अलग-अलग राज्यों का बना रहना संघवाद के लिए बेहतर है।
7 केंद्र को अधिक शक्ति देने वाली चार विशेषताएँ
प्र. भारतीय संविधान की ऐसी चार विशेषताओं का उल्लेख करें जिसमें राज्य सरकार की अपेक्षा केंद्र सरकार को ज़्यादा शक्ति प्रदान की गई है।
उत्तर:
1. संसद के पास किसी राज्य का अस्तित्व, सीमा और नाम बदलने की शक्ति है।
2. आपातकालीन प्रावधानों के तहत संसद राज्य सूची के विषयों पर भी क़ानून बना सकती है।
3. केंद्र के पास ज़्यादातर राजस्व स्रोत हैं, राज्य केंद्रीय अनुदान पर निर्भर रहते हैं।
4. राज्यपाल राज्य सरकार को बर्खास्त करने की सिफ़ारिश कर सकते हैं और राज्य के विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए रोक सकते हैं।
8 राज्यपाल की भूमिका से नाराज़गी
प्र. बहुत-से राज्य राज्यपाल की भूमिका को लेकर नाख़ुश क्यों हैं?
उत्तर:
1. राज्यपाल निर्वाचित पदाधिकारी नहीं है, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होता है, इसलिए उसके फ़ैसलों को अक्सर केंद्र के हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है।
2. जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दल सत्ता में हों, तो राज्यपाल की भूमिका और भी विवादास्पद हो जाती है।
3. राज्यपाल राज्य सरकार को बर्खास्त करने और विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश कर सकते हैं, और राज्य के विधेयकों को रोक भी सकते हैं, जिससे कई बार राजनीतिक कारणों से इसका दुरुपयोग हुआ है (जैसे 1959 केरल, या 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर)।
4. यही कारण है कि सरकारिया आयोग ने राज्यपाल की नियुक्ति को दलगत भावना से मुक्त करने की सिफ़ारिश की थी।
9 राष्ट्रपति शासन के लिए उपयुक्त स्थिति
प्र. बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सी स्थिति राष्ट्रपति शासन लगाने के लिहाज़ से उचित है, और कौन-सी नहीं, कारण सहित:
(क) मुख्य विपक्षी दल के दो विधायकों की हत्या और विपक्ष द्वारा सरकार भंग करने की माँग।
(ख) फिरौती के लिए बच्चों का अपहरण और महिलाओं के विरुद्ध अपराध बढ़ना।
(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है, भय है कि एक दल दूसरे दल के कुछ विधायकों से धन देकर अपने पक्ष में उनका समर्थन हासिल कर लेगा।
(घ) केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं।
(ङ) सांप्रदायिक दंगे में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं।
(च) दो राज्यों के जल-विवाद में एक राज्य का सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार।
उत्तर:
(क) उचित नहीं। यह क़ानून-व्यवस्था की समस्या है, राज्य सरकार को इसे सँभालने का मौक़ा मिलना चाहिए, विपक्ष की माँग मात्र से सरकार भंग करना उचित नहीं।
(ख) उचित नहीं। अपराध बढ़ना राज्य पुलिस-प्रशासन की ज़िम्मेदारी है, इसे सुधारने का समय दिया जाना चाहिए, यह संवैधानिक तंत्र की विफलता नहीं है।
(ग) उचित नहीं, पर सतर्कता ज़रूरी। स्पष्ट बहुमत न मिलना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है, राष्ट्रपति शासन की जगह गठबंधन बनाने का पर्याप्त समय और मौक़ा दिया जाना चाहिए।
(घ) उचित नहीं। केंद्र और राज्य में अलग-अलग दल होना या उनका विरोधी होना, अपने-आप में संवैधानिक टूटन नहीं है, यह तो संघीय लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है।
(ङ) उचित हो सकता है, स्थिति की गंभीरता पर निर्भर। अगर राज्य सरकार क़ानून-व्यवस्था बहाल करने में पूरी तरह विफल रही हो और यह साबित हो कि शासन संविधान के अनुसार नहीं चल पा रहा, तभी यह विचारणीय है, सिर्फ़ दंगे होना ही काफ़ी आधार नहीं।
(च) उचित नहीं। यह मुख्यतः न्यायिक अवमानना का मामला है, इसे न्यायपालिका के ज़रिए ही सुलझाया जाना चाहिए, राष्ट्रपति शासन का यह उचित आधार नहीं है।
10 स्वायत्तता की माँगें
प्र. ज़्यादा स्वायत्तता की चाह में राज्यों ने क्या माँगें उठाई हैं?
उत्तर:
1. शक्ति-बँटवारे की माँग: तमिलनाडु, पंजाब, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने राज्यों को ज़्यादा और अहम शक्तियाँ देने की माँग की।
2. वित्तीय स्वायत्तता: स्वतंत्र राजस्व स्रोत और संसाधनों पर ज़्यादा नियंत्रण, जैसा 1977 में पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने माँगा।
3. प्रशासनिक स्वायत्तता: प्रशासनिक तंत्र पर केंद्र के नियंत्रण के विरुद्ध नाराज़गी।
4. सांस्कृतिक-भाषाई स्वायत्तता: हिंदी थोपे जाने का विरोध (तमिलनाडु), पंजाबी भाषा-संस्कृति को बढ़ावा देने की माँग (पंजाब)।
11 विशेष प्रावधान : ज़रूरी या नाराज़गी की वजह?
प्र. क्या कुछ राज्यों को विशेष प्रावधानों से शासित होना चाहिए? क्या इससे बाक़ी राज्यों में नाराज़गी पैदा होती है? क्या इससे देश के विभिन्न क्षेत्रों में ज़्यादा एकता बनाने में मदद मिलती है?
उत्तर:
क्या विशेष प्रावधान ज़रूरी हैं: हाँ, पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम की बड़ी आदिवासी आबादी और उनकी अलग ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान को देखते हुए, एकसमान क़ानून लागू करना उनकी विशिष्ट परिस्थितियों की अनदेखी करेगा।
क्या इससे नाराज़गी पैदा होती है: कभी-कभी हाँ, जिन राज्यों को ये विशेष प्रावधान नहीं मिलते, वे इसे भेदभाव के रूप में देख सकते हैं, ख़ासकर अगर विशेष प्रावधानों का आधार स्पष्ट न हो।
क्या इससे एकता मज़बूत होती है: दीर्घकाल में हाँ, क्योंकि यह विविधता को स्वीकार करते हुए हर क्षेत्र को यह भरोसा देता है कि उसकी विशिष्ट पहचान और ज़रूरतों का सम्मान होगा, हालाँकि किताब ख़ुद नोट करती है कि ये प्रावधान पूर्वोत्तर में अलगाव और उग्रवाद को पूरी तरह ख़त्म नहीं कर पाए, इसलिए विशेष प्रावधान अकेले काफ़ी नहीं, इन्हें बेहतर प्रशासन और विश्वास-निर्माण के साथ जोड़ना ज़रूरी है।