NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 7 «संघवाद» की प्रश्नावली के ग्यारहों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों और गतिविधियों के उत्तर अंत में दिए गए हैं।
1 संघवाद की कार्य-प्रणाली पहचानें
प्र. नीचे कुछ घटनाओं की सूची दी गई है। इनमें से किसको आप संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में चिह्नित करेंगे और क्यों?
(क) केंद्र सरकार ने मंगलवार को जीएनएलएफ के नेतृत्व वाले दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल को छठी अनुसूची में वर्णित दर्जा देने की घोषणा की। इससे पश्चिम बंगाल के इस पर्वतीय जिले के शासकीय निकाय को ज़्यादा स्वायत्तता प्राप्त होगी। दो दिन के गहन विचार-विमर्श के बाद नई दिल्ली में केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
(ख) वर्षा प्रभावित प्रदेशों के लिए सरकार कार्य-योजना लाएगी। केंद्र सरकार ने वर्षा प्रभावित प्रदेशों से पुनर्निर्माण की विस्तृत योजना भेजने को कहा है ताकि वह अतिरिक्त राहत प्रदान करने की उनकी माँग पर फौरन कार्रवाई कर सके।
(ग) दिल्ली के लिए नए आयुक्त। देश की राजधानी दिल्ली में नए नगरपालिका आयुक्त को बहाल किया जाएगा। इस बात की पुष्टि करते हुए एमसीडी के वर्तमान आयुक्त राकेश मेहता ने कहा कि उन्हें अपने तबादले के आदेश मिल गए हैं और संभावना है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अशोक कुमार उनकी जगह संभालेंगे। अशोक कुमार अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव की हैसियत से काम कर रहे हैं। 1975 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री मेहता पिछले साढ़े तीन साल से आयुक्त की हैसियत से काम कर रहे हैं।
(घ) मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा। राज्यसभा ने बुधवार को मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान करने वाला विधेयक पारित किया। मानव संसाधन विकास मंत्री ने वायदा किया है कि अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में भी ऐसी संस्थाओं का निर्माण होगा।
(ङ) केंद्र ने धन दिया। केंद्र सरकार ने अपनी ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश को 553 लाख रुपए दिए हैं। इस धन की पहली किश्त के रूप में अरुणाचल प्रदेश को 466 लाख रुपए दिए गए हैं।
(च) हम बिहारियों को बताएँगे कि मुंबई में कैसे रहना है। करीब 100 शिवसैनिकों ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल में उठा-पटक करके रोजमर्रा के कामधंधे में बाधा पहुँचाई, नारे लगाए और धमकी दी कि गैर-मराठियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की गई तो इस मामले को वे स्वयं ही निपटाएँगे।
(छ) सरकार को भंग करने की माँग। काँग्रेस विधायक दल ने प्रदेश के राज्यपाल को हाल में सौंपे एक ज्ञापन में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नगालैंड (डीएएन) की सरकार को तथाकथित वित्तीय अनियमितता और सार्वजनिक धन के गबन के आरोप में भंग करने की माँग की है।
(ज) एनडीए सरकार ने नक्सलियों से हथियार रखने को कहा। विपक्षी दल राजद और उसके सहयोगी काँग्रेस तथा सीपीआई (एम) के वॉक आउट के बीच बिहार सरकार ने आज नक्सलियों से अपील की कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें। बिहार को विकास के नए युग में ले जाने के लिए बेरोजगारी को जड़ से खत्म करने के अपने वादे को भी सरकार ने दोहराया।
उत्तर:
(क), (ख), (घ), (ङ) और (छ) संघवाद की कार्य-प्रणाली के उदाहरण हैं।
(क) केंद्र, प्रदेश और क्षेत्रीय संगठन के बीच त्रिपक्षीय समझौता और छठी अनुसूची का दर्जा दिखाता है कि केंद्र और प्रदेश मिलकर एक क्षेत्र की स्वायत्तता की माँग पूरी कर रहे हैं।
(ख) केंद्र का वर्षा प्रभावित प्रदेशों से योजना माँगना, ताकि वह अतिरिक्त राहत दे सके, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों का हिस्सा है: प्रदेश केंद्रीय सहायता पर निर्भर रहते हैं।
(घ) राज्यसभा द्वारा प्रदेश के विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने वाला विधेयक पारित करना, प्रदेश के एक विषय पर संघ की विधायी कार्रवाई है, जिसमें राज्यों का सदन भागीदार है।
(ङ) केंद्र का ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश को धन देना, प्रदेश को केंद्रीय वित्तीय सहायता है, जो केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों की बुनियादी विशेषता है।
(छ) राज्यपाल से प्रदेश की सरकार को भंग करने की माँग, राज्यपाल के इस अधिकार से जुड़ी है कि वह राज्य सरकार को बर्खास्त करने की अनुशंसा कर सकते हैं, और राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) से, जो संविधान के सर्वाधिक विवादास्पद प्रावधानों में से एक है।
(ग) पर दोनों मत संभव हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का तबादला उस एकीकृत अखिल भारतीय सेवा को दिखाता है जिस पर केंद्र का नियंत्रण है, इसलिए इसे संघवाद की कार्य-प्रणाली माना जा सकता है; पर मुख्य रूप से यह राजधानी में एक सामान्य प्रशासनिक तबादला है।
(च) और (ज) संघवाद के उदाहरण नहीं हैं। (च) भाषाई-क्षेत्रीय तनाव और क़ानून-व्यवस्था की समस्या है, और (ज) प्रदेश सरकार की क़ानून-व्यवस्था से जुड़ी अपनी अपील है; दोनों में केंद्र और प्रदेशों के आपसी संबंध की बात नहीं है।
2 कौन-सा कथन सही है
प्र. बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही होगा और क्यों?
(क) संघवाद से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग मेल-जोल से रहेंगे और उन्हें इस बात का भय नहीं रहेगा कि एक की संस्कृति दूसरे पर लाद दी जाएगी।
(ख) अलग-अलग किस्म के संसाधनों वाले दो क्षेत्रों के बीच आर्थिक लेनदेन को संघीय प्रणाली से बाधा पहुँचेगी।
(ग) संघीय प्रणाली इस बात को सुनिश्चित करती है कि जो केंद्र में सत्तासीन हैं उनकी शक्तियाँ सीमित रहें।
उत्तर:
(क) और (ग) सही हैं, (ख) ग़लत है।
(क) सही है, संघवाद हर क्षेत्र को अपनी संस्कृति और पहचान बनाए रखने की गुंजाइश देता है, इसलिए दूसरों की संस्कृति थोपे जाने का डर कम होता है, जिससे मेल-जोल बढ़ता है।
(ग) सही है, शक्तियों का केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक बँटवारा केंद्र की शक्ति को स्वाभाविक रूप से सीमित करता है।
(ख) ग़लत है, संघीय प्रणाली का मतलब आर्थिक बाधा नहीं, बल्कि साझा बाज़ार और सहयोग की व्यवस्था है, इससे उलट, यह अलग-अलग संसाधनों वाले क्षेत्रों के बीच व्यापार को सुगम भी बना सकती है।
3 बेल्जियम के संविधान से तुलना
प्र. बेल्जियम के संविधान के कुछ प्रारंभिक अनुच्छेद नीचे लिखे गए हैं। इसके आधार पर बताएँ कि बेल्जियम में संघवाद को किस रूप में साकार किया गया है। भारत के संविधान के लिए ऐसा ही अनुच्छेद लिखने का प्रयास करके देखें।
शीर्षक-1: संघीय बेल्जियम, इसके घटक और इसका क्षेत्र
अनुच्छेद-1: बेल्जियम एक संघीय राज्य है, जो समुदायों और क्षेत्रों से बना है।
अनुच्छेद-2: बेल्जियम तीन समुदायों से बना है: फ्रेंच समुदाय, फ़्लेमिश समुदाय और जर्मन समुदाय।
अनुच्छेद-3: बेल्जियम तीन क्षेत्रों को मिलाकर बना है: वैलून क्षेत्र, फ़्लेमिश क्षेत्र और ब्रूसेल्स क्षेत्र।
अनुच्छेद-4: बेल्जियम में 4 भाषाई क्षेत्र हैं: फ्रेंच-भाषी क्षेत्र, डच-भाषी क्षेत्र, ब्रूसेल्स की राजधानी का द्विभाषी क्षेत्र तथा जर्मन भाषी क्षेत्र। राज्य का प्रत्येक ‘कम्यून’ इन भाषाई क्षेत्रों में से किसी एक का हिस्सा है।
अनुच्छेद-5: वैलून क्षेत्र के अंतर्गत आनेवाले प्रांत हैं: वैलून ब्राबैंट, हेनॉल्ट, लेग, लक्जमबर्ग और नामूर। फ़्लेमिश क्षेत्र के अंतर्गत शामिल प्रांत हैं: एंटीवर्प, फ़्लेमिश ब्राबैंट, वेस्ट फ़्लैंडर्स, ईस्ट फ़्लैंडर्स और लिंबर्ग।
उत्तर:
बेल्जियम का संघवाद भाषाई और सामुदायिक पहचान पर आधारित है, वहाँ समुदाय (फ़्रेंच, फ़्लेमिश, जर्मन), क्षेत्र (वैलून, फ़्लेमिश, ब्रुसेल्स) और भाषाई क्षेत्र, तीनों अलग-अलग तरह से देश को बाँटते हैं, यानी एक ही देश में पहचान की कई परतें एक साथ काम करती हैं।
भारत के लिए इसी शैली में एक संभावित अनुच्छेद: “भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों से बना एक संघ होगा। भारत में अट्ठाईस राज्य और आठ केंद्र-शासित प्रदेश हैं, प्रत्येक राज्य की अपनी विधानसभा और सरकार होगी, जबकि केंद्र-शासित प्रदेशों का प्रशासन केंद्र सरकार द्वारा निर्देशित होगा।”
4 संघवाद पर अपने सुझाव
प्र. कल्पना करें कि आपको संघवाद के संबंध में प्रावधान लिखने हैं। लगभग 300 शब्दों का एक लेख लिखें जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर आपके सुझाव हों: (क) केंद्र और प्रदेशों के बीच शक्तियों का बँटवारा, (ख) वित्त-संसाधनों का वितरण, (ग) राज्यपालों की नियुक्ति।
उत्तर:
(क) शक्तियों का बँटवारा: मौजूदा तीन-सूची व्यवस्था (संघ, राज्य, समवर्ती) उचित है, पर समवर्ती सूची के विषयों पर राज्यों से पहले सलाह-मशविरा अनिवार्य किया जा सकता है, ताकि केंद्र का दख़ल एकतरफ़ा न लगे।
(ख) वित्त-संसाधनों का वितरण: राज्यों को अपने राजस्व स्रोत बढ़ाने की छूट दी जानी चाहिए, और केंद्रीय अनुदान का बँटवारा एक स्वतंत्र, पारदर्शी सूत्र (जैसे वित्त आयोग की सिफ़ारिशों) पर आधारित हो, केंद्र के विवेक पर कम निर्भर।
(ग) राज्यपालों की नियुक्ति: मेरा सुझाव है कि राज्यपाल की नियुक्ति एक स्वतंत्र समिति की सिफ़ारिश से हो, न कि सिर्फ़ केंद्र सरकार के विवेक से। यह सरकारिया आयोग की उस सिफ़ारिश की भावना के अनुरूप होगा कि राज्यपालों की नियुक्ति अनिवार्यतया निष्पक्ष होकर की जानी चाहिए, ताकि नियुक्ति दलगत भावना से मुक्त रहे।
इन तीनों सुझावों का मक़सद केंद्र-राज्य विश्वास बढ़ाना और सहयोगात्मक संघवाद को मज़बूत करना है, बिना केंद्र की ज़रूरी समन्वय-भूमिका को कमज़ोर किए।
5 राज्य के गठन का आधार
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा प्रांत के गठन का आधार होना चाहिए, और क्यों?
(क) सामान्य भाषा (ख) सामान्य आर्थिक हित (ग) सामान्य क्षेत्र (घ) प्रशासनिक सुविधा
उत्तर: (क) सामान्य भाषा सबसे उपयुक्त आधार है, भारत में राज्यों का गठन मुख्यतः भाषाई पहचान के आधार पर हुआ है (जैसे राज्य पुनर्गठन आयोग, 1953-56), इससे लोगों को अपनी भाषा-संस्कृति में शासन चलाने का अवसर मिलता है। हालाँकि सामान्य क्षेत्र (ग) और प्रशासनिक सुविधा (घ) भी सहायक कारक हो सकते हैं (जैसे 2000 में छत्तीसगढ़-उत्तराखंड-झारखंड का गठन प्रशासनिक सुविधा के लिए भी हुआ), पर भाषा राज्य-गठन का सबसे मूलभूत और ऐतिहासिक रूप से प्रमुख आधार रही है। सामान्य आर्थिक हित (ख) अकेले राज्य बनाने का उचित आधार नहीं, क्योंकि आर्थिक हित समय के साथ बदलते रहते हैं।
6 उत्तर भारत के हिंदी-भाषी राज्य
प्र. उत्तर भारत के प्रदेशों, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार, के अधिकांश लोग हिंदी बोलते हैं। यदि इन सभी प्रांतों को मिलाकर एक प्रदेश बना दिया जाय तो क्या ऐसा करना संघवाद के विचार से संगत होगा? तर्क दीजिए।
उत्तर: नहीं, यह संघवाद के विचार से मेल नहीं खाएगा।
1. भाषा एक जैसी होने के बावजूद इन चारों राज्यों की अपनी अलग क्षेत्रीय पहचान, इतिहास, संस्कृति और प्रशासनिक ज़रूरतें हैं।
2. इतना बड़ा एक राज्य बनाना प्रशासनिक रूप से बेहद अव्यावहारिक होगा, स्थानीय स्तर पर शासन की पहुँच कमज़ोर पड़ेगी।
3. संघवाद सिर्फ़ भाषा पर आधारित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्वायत्तता और विविधता के सम्मान पर भी आधारित है, चारों राज्यों को मिलाना एक तरह की जबरन एकरूपता होगी, जो संघवाद की भावना के विपरीत है।
4. इसलिए, भाषा एक समान होने पर भी अलग-अलग राज्यों का बना रहना संघवाद के लिए बेहतर है।
7 केंद्र को अधिक शक्ति देने वाली चार विशेषताएँ
प्र. भारतीय संविधान की ऐसी चार विशेषताओं का उल्लेख करें जिसमें प्रादेशिक सरकार की अपेक्षा केंद्रीय सरकार को ज़्यादा शक्ति प्रदान की गई है।
उत्तर:
1. संसद के पास किसी राज्य का अस्तित्व, सीमा और नाम बदलने की शक्ति है।
2. आपातकालीन प्रावधानों के तहत संसद राज्य सूची के विषयों पर भी क़ानून बना सकती है।
3. केंद्र के पास ज़्यादातर राजस्व स्रोत हैं, राज्य केंद्रीय अनुदान पर निर्भर रहते हैं।
4. राज्यपाल राज्य सरकार को बर्खास्त करने की सिफ़ारिश कर सकते हैं और राज्य के विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित कर सकते हैं।
8 राज्यपाल की भूमिका से नाराज़गी
प्र. बहुत-से प्रदेश राज्यपाल की भूमिका को लेकर नाखुश क्यों हैं?
उत्तर:
1. राज्यपाल निर्वाचित पदाधिकारी नहीं है, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होता है, इसलिए उसके फ़ैसलों को अक्सर केंद्र के हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है।
2. जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दल सत्ता में हों, तो राज्यपाल की भूमिका और भी विवादास्पद हो जाती है।
3. राज्यपाल राज्य सरकार को बर्खास्त करने और विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश कर सकते हैं, और राज्य के विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित भी कर सकते हैं, जिससे कई बार राजनीतिक कारणों से इसका दुरुपयोग हुआ है (जैसे 1959 केरल, या 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर)।
4. यही कारण है कि सरकारिया आयोग ने राज्यपाल की नियुक्ति को दलगत भावना से मुक्त करने की सिफ़ारिश की थी।
9 राष्ट्रपति शासन के लिए उपयुक्त स्थिति
प्र. यदि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुकूल नहीं चल रहा, तो ऐसे प्रदेश में राष्ट्रपति-शासन लगाया जा सकता है। बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सी स्थिति किसी देश में राष्ट्रपति-शासन लगाने के लिहाज से संगत है और कौन-सी नहीं। संक्षेप में कारण भी दें।
(क) राज्य की विधान सभा के मुख्य विपक्षी दल के दो सदस्यों को अपराधियों ने मार दिया है और विपक्षी दल प्रदेश की सरकार को भंग करने की माँग कर रहा है।
(ख) फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों के अपहरण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफ़ा हो रहा है।
(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है। भय है कि एक दल दूसरे दल के कुछ विधायकों से धन देकर अपने पक्ष में उनका समर्थन हासिल कर लेगा।
(घ) केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं।
(ङ) सांप्रदायिक दंगे में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं।
(च) दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया है।
उत्तर:
(क) उचित नहीं। यह क़ानून-व्यवस्था की समस्या है, राज्य सरकार को इसे सँभालने का मौक़ा मिलना चाहिए, विपक्ष की माँग मात्र से सरकार भंग करना उचित नहीं।
(ख) उचित नहीं। अपराध बढ़ना राज्य पुलिस-प्रशासन की ज़िम्मेदारी है, इसे सुधारने का समय दिया जाना चाहिए, यह संवैधानिक तंत्र की विफलता नहीं है।
(ग) उचित नहीं, पर सतर्कता ज़रूरी। स्पष्ट बहुमत न मिलना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है, राष्ट्रपति शासन की जगह गठबंधन बनाने का पर्याप्त समय और मौक़ा दिया जाना चाहिए।
(घ) उचित नहीं। केंद्र और राज्य में अलग-अलग दल होना या उनका विरोधी होना, अपने-आप में संवैधानिक टूटन नहीं है, यह तो संघीय लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है।
(ङ) उचित हो सकता है, स्थिति की गंभीरता पर निर्भर। अगर राज्य सरकार क़ानून-व्यवस्था बहाल करने में पूरी तरह विफल रही हो और यह साबित हो कि शासन संविधान के अनुसार नहीं चल पा रहा, तभी यह विचारणीय है, सिर्फ़ दंगे होना ही काफ़ी आधार नहीं।
(च) उचित है, यदि प्रदेश आदेश न मानने पर अड़ा रहे। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश न मानने वाली प्रदेश सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुकूल शासन नहीं चला रही, और यही राष्ट्रपति-शासन की शर्त है। फिर भी इसे अंतिम उपाय के रूप में ही, प्रदेश को आदेश मानने का मौक़ा देने के बाद, लगाया जाना चाहिए, और इसकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
10 स्वायत्तता की माँगें
प्र. ज़्यादा स्वायत्तता की चाह में प्रदेशों ने क्या माँगें उठाई हैं?
उत्तर:
1. शक्ति-बँटवारे की माँग: तमिलनाडु, पंजाब, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने राज्यों को ज़्यादा और अहम शक्तियाँ देने की माँग की।
2. वित्तीय स्वायत्तता: स्वतंत्र राजस्व स्रोत और संसाधनों पर ज़्यादा नियंत्रण, जैसा 1977 में पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने माँगा।
3. प्रशासनिक स्वायत्तता: प्रशासनिक तंत्र पर केंद्र के नियंत्रण के विरुद्ध नाराज़गी।
4. सांस्कृतिक-भाषाई स्वायत्तता: हिंदी थोपे जाने का विरोध (तमिलनाडु), पंजाबी भाषा-संस्कृति को बढ़ावा देने की माँग (पंजाब)।
11 विशेष प्रावधान : ज़रूरी या नाराज़गी की वजह?
प्र. क्या कुछ प्रदेशों में शासन के लिए विशेष प्रावधान होने चाहिए? क्या इससे दूसरे प्रदेशों में नाराज़गी पैदा होती है? क्या इन विशेष प्रावधानों के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच एकता मजबूत करने में मदद मिलती है?
उत्तर:
क्या विशेष प्रावधान ज़रूरी हैं: हाँ, पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम की बड़ी आदिवासी आबादी और उनकी अलग ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान को देखते हुए, एकसमान क़ानून लागू करना उनकी विशिष्ट परिस्थितियों की अनदेखी करेगा।
क्या इससे नाराज़गी पैदा होती है: कभी-कभी हाँ, जिन राज्यों को ये विशेष प्रावधान नहीं मिलते, वे इसे भेदभाव के रूप में देख सकते हैं, ख़ासकर अगर विशेष प्रावधानों का आधार स्पष्ट न हो।
क्या इससे एकता मज़बूत होती है: दीर्घकाल में हाँ, क्योंकि यह विविधता को स्वीकार करते हुए हर क्षेत्र को यह भरोसा देता है कि उसकी विशिष्ट पहचान और ज़रूरतों का सम्मान होगा, हालाँकि किताब ख़ुद नोट करती है कि ये प्रावधान पूर्वोत्तर के कुछ भागों में अलगाववाद और सशस्त्र विद्रोह को रोकने में सफल नहीं हो सके हैं, इसलिए विशेष प्रावधान अकेले काफ़ी नहीं, इन्हें बेहतर प्रशासन और विश्वास-निर्माण के साथ जोड़ना ज़रूरी है।
12 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
अध्याय के हाशिये में, «कहाँ पहुँचे? क्या समझे?» वाले बक्सों में और «खुद करें, खुद सीखें» वाली दो गतिविधियों में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं। ये प्रश्नावली का हिस्सा नहीं हैं, पर इनसे वही बातें परखी जाती हैं, इसलिए किताब के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।
प्र. (i) एक संघीय व्यवस्था में केंद्रीय सरकार की शक्तियाँ कौन तय करता है?
(ii) संघात्मक व्यवस्था में केंद्र सरकार और राज्यों में टकराव का समाधान कैसे होता है?
उत्तर:
(i) संविधान। संघीय व्यवस्था में दोनों स्तर की सरकारों के बीच शक्तियों का बँटवारा एक लिखित संविधान में किया जाता है, जो सर्वोच्च माना जाता है और दोनों सरकारों की शक्ति का स्रोत होता है। कोई भी सरकार अकेले उसे नहीं बदल सकती।
(ii) शक्तियों के बँटवारे से जुड़े कानूनी विवाद एक स्वतंत्र न्यायपालिका सुलझाती है, जिसके पास केंद्र और राज्यों के बीच विवाद सुलझाने की शक्ति होती है। ज़्यादा शक्ति या स्वायत्तता की माँगें राजनीतिक होती हैं, इसलिए उन्हें बातचीत से सुलझाया जाता है।
प्र. मुझे लगता है कि प्रदेशों के पास बहुत कम धन रहता होगा। वे अपना काम कैसे चलाते होंगे? यह तो बिल्कुल उन परिवारों जैसा मामला है जहाँ रुपए-पैसे तो पति के हाथ में रहते हैं और घर पत्नी को चलाना पड़ता है।
उत्तर: यह तुलना अध्याय की बात के काफ़ी क़रीब है। संविधान ने आर्थिक और वित्तीय शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के हाथ में सौंपी हैं: आय पैदा करने वाले ज़्यादातर साधन केंद्र के नियंत्रण में हैं, जबकि राज्यों के उत्तरदायित्व बहुत अधिक हैं पर आय के साधन कम। इसलिए राज्य अपने सीमित करों के अलावा मुख्य रूप से केंद्र से मिलने वाले अनुदान और वित्तीय सहायता से काम चलाते हैं। यही कारण है कि राज्य वित्तीय स्वायत्तता, यानी आय के स्वतंत्र साधन और संसाधनों पर ज़्यादा नियंत्रण, माँगते हैं, जैसे 1977 में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने के लिए एक दस्तावेज़ प्रकाशित किया था।
प्र. (i) क्या आप समझते हैं कि अवशिष्ट शक्तियों का अलग से उल्लेख करना ज़रूरी है? क्यों?
(ii) बहुत-से राज्य शक्ति विभाजन से असंतुष्ट क्यों रहते हैं?
उत्तर:
(i) हाँ। कोई भी सूची भविष्य के हर विषय का अनुमान नहीं लगा सकती। अवशिष्ट शक्तियों में वे सभी विषय आते हैं जिनका तीनों सूचियों में उल्लेख नहीं है (जैसे साइबर कानून), और यह अलग से तय कर देने से कि इन पर केवल संसद कानून बनाएगी, हर नया विषय आने पर केंद्र और राज्यों के बीच विवाद नहीं होता।
(ii) क्योंकि बँटवारा केंद्र के पक्ष में झुका है: आर्थिक और वित्तीय शक्तियाँ केंद्र के पास हैं, इसलिए राज्यों के उत्तरदायित्व ज़्यादा और आय कम है और वे केंद्रीय अनुदान पर निर्भर रहते हैं; कुछ स्थितियों में केंद्र राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकता है; राज्यपाल राज्य के विधेयक राष्ट्रपति के पास भेज सकता है; और राज्यों में काम करने वाले अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी केंद्र के नियंत्रण में रहते हैं।
प्र. अरे! लगता तो यह है कि केंद्र सरकार के पास ही सारी शक्तियाँ हैं। क्या राज्य इसकी शिकायत नहीं करते?
उत्तर: हाँ, करते हैं। शक्तिशाली केंद्र बनाने वाले प्रावधानों (राज्यों के अस्तित्व और सीमाओं पर संसद की शक्ति, आपातकालीन प्रावधान, आय पर केंद्र का नियंत्रण, राज्यपाल की शक्तियाँ, अनुच्छेद 257 और अखिल भारतीय सेवाएँ) के कारण राज्य और दल समय-समय पर ज़्यादा स्वायत्तता की माँग करते रहे हैं। तमिलनाडु, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों तथा द्रमुक, अकाली दल और माकपा जैसे दलों ने राज्यों को ज़्यादा शक्तियाँ देने की माँग की है, और 1977 में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने के लिए एक दस्तावेज़ प्रकाशित किया था। राज्यपाल की भूमिका और अनुच्छेद 356 का प्रयोग भी शिकायत के बड़े कारण रहे हैं।
प्र. (i) इस दृष्टिकोण के पक्ष में दो तर्क दें कि हमारा संविधान एकात्मकता की ओर झुका हुआ है?
(ii) क्या आप मानते हैं कि (1) शक्तिशाली केंद्र राज्यों को कमज़ोर करता है? (2) शक्तिशाली राज्यों से केंद्र कमज़ोर होता है?
उत्तर:
(i) इनमें से कोई दो: संसद नया राज्य बना सकती है या किसी राज्य की सीमा या नाम बदल सकती है; आपातकालीन प्रावधान संघीय व्यवस्था को अत्यंत केंद्रीकृत बना सकते हैं; आय के साधन केंद्र के पास हैं और राज्य केंद्रीय अनुदान पर निर्भर हैं; राज्यपाल राज्य के विधेयक राष्ट्रपति के पास भेज सकता है और राज्य सरकार को बर्खास्त करने की सिफ़ारिश कर सकता है; संघ की कार्यपालिका शक्ति राज्यों की कार्यपालिका शक्ति से ऊपर है (अनुच्छेद 257); राज्यों में काम करने वाले अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी केंद्र के नियंत्रण में रहते हैं।
(ii) दोनों में ज़रूरी नहीं। संविधान निर्माताओं ने विघटन रोकने और विकास के लिए शक्तिशाली केंद्र चाहा था, पर अध्याय दिखाता है कि संघवाद सहयोग, आपसी विश्वास और संयम से सबसे अच्छा चलता है। हावी होने वाला केंद्र नाराज़गी पैदा करके राज्यों को कमज़ोर कर सकता है, और बहुत दूर खिंचते राज्य राष्ट्रीय एकता को कमज़ोर कर सकते हैं। 1990 के दशक से राज्यों की बढ़ी हुई भूमिका के साथ संघवाद ज़्यादा परिपक्व हुआ है, देश कमज़ोर नहीं हुआ, जिससे पता चलता है कि सहमति से शक्ति बाँटी जाए तो शक्तिशाली राज्य और शक्तिशाली केंद्र साथ-साथ रह सकते हैं।
प्र. भारत के राज्यों की सूची बनाएँ और पता करें कि प्रत्येक राज्य का गठन किस वर्ष किया गया।
कैसे करें: सभी राज्यों की सूची बनाएँ और किसी विश्वसनीय स्रोत, जैसे सरकारी वेबसाइट, से हर राज्य के गठन का वर्ष लिखें। अध्याय ख़ुद कई तारीख़ें देता है: 1956 में राज्यों का पहला पुनर्गठन; 1960 में गुजरात और महाराष्ट्र; 1966 में पंजाब और हरियाणा का अलग होना; पूर्वोत्तर का पुनर्गठन, जिससे मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम और अरुणाचल प्रदेश बने; 2000 में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड; और 2014 में तेलंगाना। सूची को वर्ष के क्रम में लगाएँ, तो दिखेगा कि भारत का नक्शा लगातार कैसे बदलता रहा है।
प्र. संघवाद का मतलब झगड़ा है क्या? पहले हमने केंद्र और राज्य के झगड़े के बारे में बात की और अब राज्यों के आपसी झगड़ों की बात चल रही है। क्या हम साथ-साथ शांतिपूर्वक नहीं रह सकते?
उत्तर: रह सकते हैं, और ज़्यादातर रहते भी हैं। भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश में झगड़े स्वाभाविक हैं, पर संघवाद उन्हें पैदा नहीं करता, उन्हें सँभालने का तरीका है। कानूनी विवाद न्यायपालिका के पास जाते हैं, जबकि सीमा और नदी-जल जैसे राजनीतिक विवाद बातचीत और आपसी समझ से सबसे अच्छी तरह सुलझते हैं। किताब के हाशिये की टिप्पणी भी यही कहती है कि राज्यपाल, भाषा, सीमा और पानी को लेकर झगड़े हैं, तब भी हम किसी तरह साथ-साथ रहते हैं। अध्याय का निष्कर्ष बताता है कि इसके लिए आपसी विश्वास, सहनशीलता और सहयोग की भावना वाली संस्कृति चाहिए।
प्र. दो राज्यों के बीच किसी एक नदी जल विवाद के बारे में सूचनाएँ एकत्र करें।
कैसे करें: कोई एक विवाद चुनें, जैसे तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी जल विवाद, या गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच नर्मदा के पानी के बँटवारे का विवाद, दोनों का अध्याय में उल्लेख है। लिखें: कौन-से राज्य शामिल हैं, हर राज्य के लिए पानी क्यों ज़रूरी है (पीने का पानी और खेती), नदी-जल न्यायाधिकरण ने क्या फ़ैसला दिया, क्या विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा (कावेरी विवाद पहुँचा), और क्या वह सुलझा। अंत में बताएँ कि अध्याय ऐसे विवादों को सीमा विवादों से भी ज़्यादा गंभीर क्यों मानता है।
प्र. (i) राज्य और अधिक स्वायत्तता की माँग क्यों करते हैं?
(ii) स्वायत्तता और अलगाववाद में क्या फर्क है?
उत्तर:
(i) जब किसी राज्य की अलग पहचान मान ली जाती है, तो उसका अपने शासन में बड़ी भूमिका चाहना स्वाभाविक है। राज्य चाहते हैं: शक्ति-विभाजन उनके पक्ष में बदला जाए; वित्तीय स्वायत्तता, यानी आय के स्वतंत्र साधन और संसाधनों पर ज़्यादा नियंत्रण; प्रशासनिक स्वायत्तता, क्योंकि वे प्रशासनिक तंत्र पर केंद्र के नियंत्रण से नाराज़ रहते हैं; और अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा, जैसे हिंदी के वर्चस्व का विरोध।
(ii) स्वायत्तता का अर्थ है भारतीय संघ के भीतर रहते हुए राज्य के लिए ज़्यादा शक्ति और स्वतंत्रता, और ऐसी माँगें बातचीत से सुलझाई जाती हैं। अलगाववाद का अर्थ है देश से अलग होकर नया देश बनाना। स्वायत्तता संघ को स्वीकार करके उसके भीतर शक्ति का बेहतर हिस्सा माँगती है; अलगाववाद संघ को ही अस्वीकार करता है।