कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 7 संघवाद के नोट्स (Federalism Notes) हिंदी में

अध्याय का नक्शा : पूरा चैप्टर एक नज़र में
1 · संघवाद क्या है?USSR, वेस्टइंडीज़, नाइज़ीरिया के उदाहरण, मूल अवधारणाएँ
2 · भारतीय संविधान में संघवादअनुच्छेद 1, तीन सूचियाँ, अवशिष्ट शक्तियाँ
3 · सशक्त केंद्र सरकार वाला संघवादकेंद्र को शक्तिशाली बनाने वाले प्रावधान
4 · केंद्र-राज्य संबंधों के तीन चरणनेहरू युग, 1960 का दशक, गठबंधन युग
संघवाद
5 · स्वायत्तता की माँगेंशक्ति-बँटवारा, वित्तीय, प्रशासनिक, सांस्कृतिक-भाषाई
6 · राज्यपाल की भूमिका और राष्ट्रपति शासनअनुच्छेद 356, सरकारिया आयोग
7 · नए राज्यों की माँग और अंतर-राज्यीय विवादसीमा विवाद, नदी-जल विवाद
8 · विशेष प्रावधान, जम्मू-कश्मीर और निष्कर्षअनुच्छेद 370, 2019 पुनर्गठन
संघवादसंघ सूचीराज्य सूचीसमवर्ती सूचीअवशिष्ट शक्तियाँअनुच्छेद 356सरकारिया आयोगअनुच्छेद 370

1 संघवाद क्या है?

1947 और 2017 के भारत के राजनीतिक नक़्शों की तुलना करें तो पता चलता है कि राज्यों की सीमाएँ, नाम और संख्या, सभी समय के साथ बहुत बदले हैं। आज़ादी के समय अंग्रेजों द्वारा प्रशासनिक सुविधा के लिए बनाए गए प्रांत थे, फिर कई रजवाड़े नए भारतीय संघ में मिले। इसके बाद कई बार राज्यों का पुनर्गठन हुआ, कभी सीमाएँ बदलीं तो कभी नाम, जैसे मैसूर से कर्नाटक और मद्रास से तमिलनाडु। यह पूरा इतिहास ही भारत में संघवाद के काम करने की कहानी बताता है।

1.1 दुनिया के उदाहरण : संघवाद कब टूटता है

1989 के बाद USSR (सोवियत संघ) टूटकर कई स्वतंत्र देशों में बँट गया, इसकी एक बड़ी वजह अत्यधिक केंद्रीकरण और रूस का बाक़ी क्षेत्रों (जैसे उज़्बेकिस्तान) पर वर्चस्व था। चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया और पाकिस्तान को भी बँटवारे का सामना करना पड़ा, और कनाडा भी अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी भाषी क्षेत्रों के बीच बँटवारे के बेहद क़रीब पहुँच गया था। भारत, जो 1947 में एक पीड़ादायक विभाजन के बाद स्वतंत्र हुआ, सात दशकों से एक बना हुआ है, जबकि ऊपर बताए गए बाक़ी संघ या तो बिखर गए या कनाडा की तरह बिखरने के क़रीब पहुँच गए। इसलिए सिर्फ़ संघीय संविधान अपनाना काफ़ी नहीं, संघीय व्यवस्था की प्रकृति और उसका व्यावहारिक अभ्यास भी उतना ही अहम है।

वेस्टइंडीज़ में संघवाद

1958 में वेस्टइंडीज़ का संघ बना, जिसकी केंद्र सरकार कमज़ोर थी और हर इकाई की अर्थव्यवस्था स्वतंत्र थी। इन्हीं विशेषताओं और इकाइयों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण 1962 में यह संघ औपचारिक रूप से टूट गया। बाद में 1973 में चिगुआरामास संधि से स्वतंत्र द्वीपों ने साझा विधायिका, सर्वोच्च न्यायालय, मुद्रा और एक साझा बाज़ार (केरीबियन कम्युनिटी) जैसी संयुक्त संस्थाएँ बनाईं, यहाँ तक कि एक साझा कार्यपालिका भी है, जिसमें सदस्य देशों के शासनाध्यक्ष शामिल हैं। यानी ये इकाइयाँ न तो एक देश की तरह साथ रह सकीं, न अलग रह सकीं!

1.2 संघवाद की मूल अवधारणाएँ

भारत महाद्वीपीय आकार और अपार विविधताओं वाला देश है, 20 से ज़्यादा प्रमुख भाषाएँ और सैकड़ों छोटी भाषाएँ, कई प्रमुख धर्म, और कई लाख स्थानीय जनजातीय लोग। फिर भी हम एक साझा भूभाग, साझा इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम की साझी विरासत रखते हैं, इसीलिए भारत को “विविधता में एकता” वाला देश कहा जाता है।

संघवाद के कोई तय और कठोर नियम नहीं होते, यह हर देश में अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार अलग रूप लेता है (अमेरिकी संघवाद जर्मन या भारतीय संघवाद से अलग है), पर कुछ मूल विचार साझा हैं:

  • संघवाद एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था है जो दो तरह की राजनीतिक सत्ताओं, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय, दोनों को समाहित करती है, हर सरकार अपने क्षेत्र में स्वायत्त होती है; कुछ देशों में दोहरी नागरिकता होती है, भारत में सिर्फ़ एकल नागरिकता है
  • लोगों की भी दो पहचान और निष्ठाएँ होती हैं, वे क्षेत्र और राष्ट्र दोनों से जुड़े होते हैं (जैसे गुजराती या झारखंडी होने के साथ-साथ भारतीय भी)
  • इस दोहरी शासन-व्यवस्था का विवरण एक लिखित संविधान में होता है, जो सर्वोच्च होता है और दोनों सरकारों की शक्ति का स्रोत भी; रक्षा या मुद्रा जैसे राष्ट्रीय विषय संघ सरकार के पास, स्थानीय विषय राज्य सरकार के पास
  • केंद्र और राज्य के बीच टकराव रोकने के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका होती है, जो शक्ति-बँटवारे से जुड़े क़ानूनी विवाद सुलझाती है
परीक्षा संकेत

संघ का असली कामकाज राजनीति, संस्कृति, विचारधारा और इतिहास से तय होता है। विश्वास, सहयोग, आपसी सम्मान और संयम की संस्कृति संघ को सुचारु रूप से चलाती है। अगर कोई एक इकाई, राज्य, भाषाई समूह या विचारधारा पूरे संघ पर हावी हो जाए, तो यह गहरी नाराज़गी, यहाँ तक कि अलगाव की माँग या गृहयुद्ध तक को जन्म दे सकता है।

नाइज़ीरिया में संघवाद

1914 तक उत्तरी और दक्षिणी नाइज़ीरिया अलग-अलग ब्रिटिश उपनिवेश थे। 1950 के इबादान संवैधानिक सम्मेलन में नाइज़ीरियाई नेताओं ने संघीय संविधान बनाने का फ़ैसला किया। नाइज़ीरिया के तीन प्रमुख जातीय समूहों, योरूबा (पश्चिम), इबो (पूर्व) और हाउसा-फुलानी (उत्तर), ने अपने-अपने क्षेत्रों पर नियंत्रण रखा। दूसरे क्षेत्रों में प्रभाव फैलाने की कोशिशों से डर और टकराव पैदा हुए, जिससे सैन्य शासन आया। 1979 के सैन्य-नियंत्रित संविधान में किसी भी राज्य को अपनी अलग पुलिस रखने की अनुमति नहीं थी। 1999 में लोकतंत्र बहाल हुआ, पर धार्मिक मतभेद और तेल-संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर टकराव आज भी बना हुआ है, यह धार्मिक, जातीय और आर्थिक भिन्नताओं के आपस में जुड़ जाने का उदाहरण है।

2 भारतीय संविधान में संघवाद

आज़ादी से पहले ही हमारे नेताओं को यह एहसास था कि इतने बड़े देश को चलाने के लिए प्रांतों और केंद्र के बीच शक्तियों का बँटवारा ज़रूरी होगा। संविधान सभा ने विभाजन के बाद केंद्र और राज्यों के बीच एकता और सहयोग के सिद्धांतों पर आधारित सरकार बनाने का फ़ैसला किया, राज्यों को अलग शक्तियाँ भी दीं। विविधता को मान्यता देते हुए भी संविधान ने एकता पर ज़ोर दिया। दिलचस्प बात यह है कि भारत के संविधान के अंग्रेज़ी संस्करण में “फेडरेशन (federation)” शब्द का नहीं, बल्कि “यूनियन (union)” शब्द का इस्तेमाल हुआ है, हालाँकि हिंदी में “फेडरेशन” और “यूनियन”, दोनों के लिए ही “संघ” शब्द इस्तेमाल होता है।

रट लेंपरिभाषा 1

अनुच्छेद 1: “(1) भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ (यूनियन) होगा। (2) राज्य और उनके राज्यक्षेत्र वे होंगे जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं।”

संविधान ने दो तरह की सरकारें बनाई हैं, पूरे देश के लिए संघ (केंद्र) सरकार, और हर इकाई के लिए राज्य सरकार, दोनों को संवैधानिक दर्जा और अपना कार्यक्षेत्र प्राप्त है। किसी विवाद की स्थिति में न्यायपालिका संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर फ़ैसला करती है। ग़ौरतलब है कि आर्थिक और वित्तीय शक्तियाँ संविधान द्वारा केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित की गई हैं, राज्यों के पास बड़ी ज़िम्मेदारियाँ हैं पर बहुत सीमित राजस्व स्रोत।

2.1 तीन सूचियाँ और अवशिष्ट शक्तियाँ

संघ सूची राज्य सूची समवर्ती सूची
रक्षा, परमाणु ऊर्जा, विदेश मामले, युद्ध और शांति, बैंकिंग, रेलवे, डाक-तार, वायुमार्ग, बंदरगाह, विदेश व्यापार, मुद्रा कृषि, पुलिस, कारागार, स्थानीय शासन, लोक स्वास्थ्य, भूमि, शराब, व्यापार-वाणिज्य, पशुपालन, राज्य लोक सेवाएँ शिक्षा, कृषि-भूमि के अलावा संपत्ति का हस्तांतरण, वन, व्यापार संघ, मिलावट, दत्तक ग्रहण और उत्तराधिकार
केवल संघ विधायिका इन पर क़ानून बना सकती है। सामान्यतः राज्य विधायिका ही इन पर क़ानून बनाती है। संघ और राज्य, दोनों विधायिकाएँ इन पर क़ानून बना सकती हैं।
रट लेंपरिभाषा 2

अवशिष्ट शक्तियाँ उन सभी विषयों को कहते हैं जो किसी भी सूची में शामिल नहीं हैं (जैसे साइबर क़ानून)। इन पर क़ानून बनाने की शक्ति सिर्फ़ संघ विधायिका के पास है।

3 सशक्त केंद्र सरकार वाला संघवाद

यह आमतौर पर माना जाता है कि भारतीय संविधान ने एक सशक्त केंद्र सरकार बनाई है। संविधान निर्माता विविधताओं को समाहित करने वाला संघीय संविधान चाहते थे, पर साथ ही विघटन रोकने और सामाजिक-राजनीतिक बदलाव लाने के लिए एक सशक्त केंद्र भी चाहते थे। आज़ादी के समय 500 से ज़्यादा रजवाड़ों को एकीकृत करना और नए राज्य बनाना ज़रूरी था, साथ ही गरीबी, निरक्षरता और असमानता जैसी समस्याओं के लिए योजनाबद्ध और समन्वित केंद्रीय भूमिका भी चाहिए थी।

“मैं अपने सदन के सम्मानित मित्रों को बताना चाहता हूँ कि सभी संविधानों में शक्तियों का प्रवाह केंद्र की ओर रहा है …. बदलती हुई परिस्थितियों के कारण कोई भी राष्ट्र-राज्य, चाहे वे एकात्मक रहे हों या संघात्मक, पुलिस राज्य से लोक कल्याणकारी राज्य बन गए हैं और देश की आर्थिक खुशहाली का अंतिम उत्तरदायित्व केंद्र सरकार का हो गया है।”

टी- टी- कृष्णामाचारी, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड 11, पृष्ठ 955-956, 25 नवंबर 1949

3.1 सशक्त केंद्र बनाने वाले प्रावधान

  • किसी राज्य का अस्तित्व और उसकी सीमा तक संसद के हाथ में है, संसद किसी राज्य के क्षेत्र को अलग करके या दो-तीन राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है, सीमा या नाम भी बदल सकती है, बस संबंधित राज्य विधानसभा की राय ली जाती है
  • संविधान में बेहद शक्तिशाली आपातकालीन प्रावधान हैं, जो आपातकाल के दौरान हमारी संघीय व्यवस्था को अत्यधिक केंद्रीकृत बना सकते हैं, तब संसद राज्य सूची के विषयों पर भी क़ानून बना सकती है
  • सामान्य समय में भी केंद्र सरकार के पास मज़बूत वित्तीय शक्तियाँ हैं, राजस्व देने वाले ज़्यादातर स्रोत केंद्र के नियंत्रण में हैं, राज्य केंद्र के अनुदान और सहायता पर निर्भर रहते हैं; योजना आयोग (केंद्र द्वारा नियुक्त) राज्यों के संसाधन-प्रबंधन की निगरानी करता है, केंद्र की विवेकाधीन अनुदान-नीति को कई बार पक्षपातपूर्ण और विपक्ष-शासित राज्यों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण बताया गया है
  • राज्यपाल के पास राज्य सरकार को बर्खास्त करने और विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश करने की शक्ति है; राज्यपाल राज्य विधानसभा से पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए रोक भी सकते हैं, जिससे केंद्र को राज्य के क़ानून में देरी करने या उसे पूरी तरह वीटो करने का मौक़ा मिलता है
  • राज्य सभा की स्वीकृति से केंद्र सरकार राज्य सूची के विषयों पर भी क़ानून बना सकती है; संविधान स्पष्ट करता है कि केंद्र की कार्यपालिका शक्ति राज्यों की कार्यपालिका शक्ति से बड़ी है
रट लेंपरिभाषा 3

अनुच्छेद 257(1): “प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में कोई अड़चन न हो या उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निर्देश देने तक होगा जो भारत सरकार को इस प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हों।”

  • अखिल भारतीय सेवाएँ पूरे भारत में एक समान हैं, इनके अधिकारी राज्यों के प्रशासन में काम करते हैं, पर IAS अधिकारी जो ज़िलाधिकारी बनता है या IPS अधिकारी जो पुलिस आयुक्त बनता है, केंद्र सरकार के नियंत्रण में रहता है, राज्य न तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकते हैं, न उसे सेवा से हटा सकते हैं
  • अनुच्छेद 33 और 34 संसद को अधिकार देते हैं कि मार्शल लॉ के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए काम करने वाले संघ या राज्य के कर्मियों को संरक्षण दे सके; इन्हीं प्रावधानों के आधार पर सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) बना है, जिसने कई बार जनता और सशस्त्र बलों के बीच तनाव पैदा किया है

4 केंद्र-राज्य संबंधों के तीन चरण

संविधान सिर्फ़ एक ढाँचा है, इसमें जान असली राजनीतिक प्रक्रिया से आती है। इसलिए भारत में संघवाद बदलती राजनीतिक परिस्थितियों से काफ़ी प्रभावित रहा है।

1. 1950 का दशक-शुरुआती 1960 का दशकनेहरू के नेतृत्व में संघवाद की नींव पड़ी, केंद्र और राज्यों दोनों में कांग्रेस का दबदबा; नए राज्यों के गठन को छोड़कर रिश्ते सामान्य रहे, केंद्रीय अनुदान से राज्यों को उम्मीद थी
2. 1960 के दशक का मध्यकांग्रेस का दबदबा कम हुआ, कई राज्यों में विपक्षी दल सत्ता में आए, जिससे ज़्यादा शक्ति और स्वायत्तता की माँगें उठीं, राज्य केंद्र के हस्तक्षेप का विरोध करने लगे
3. 1990 के दशक सेकांग्रेस का दबदबा लगभग ख़त्म, केंद्र में गठबंधन राजनीति का दौर शुरू; राज्यों को ज़्यादा तवज्जो मिली, विविधता का सम्मान बढ़ा, यही दौर स्वायत्तता के मुद्दे को सबसे ज़्यादा राजनीतिक रूप से अहम बनाता है

5 स्वायत्तता की माँगें

कई राज्यों और दलों ने समय-समय पर केंद्र सरकार के मुक़ाबले ज़्यादा स्वायत्तता की माँग की है, पर ‘स्वायत्तता’ का मतलब हर राज्य और दल के लिए अलग है।

5.1 स्वायत्तता की चार तरह की माँगें

स्वायत्तता की माँगें
शक्ति-बँटवाराराज्यों को ज़्यादा और अहम शक्तियाँ; तमिलनाडु, पंजाब, प. बंगाल; DMK, अकाली दल, CPI-M
वित्तीय स्वायत्तताअपने राजस्व स्रोत और संसाधनों पर ज़्यादा नियंत्रण; 1977 प. बंगाल वाम मोर्चा दस्तावेज़
प्रशासनिक स्वायत्तताप्रशासनिक तंत्र पर केंद्र के नियंत्रण के प्रति नाराज़गी
सांस्कृतिक-भाषाई स्वायत्तताहिंदी थोपे जाने का विरोध (तमिलनाडु), पंजाबी भाषा-संस्कृति को बढ़ावा देने की माँग
हिंदी भाषा को लेकर विरोध

1960 के दशक में कुछ राज्यों में हिंदी थोपे जाने के विरुद्ध आंदोलन हुए। संविधान सभा में राष्ट्रभाषा पर चर्चा के दौरान 18 सितंबर 1949 को नेहरू को हिंदी भाषी प्रांतों से बाक़ी लोगों के प्रति ज़्यादा सहनशीलता दिखाने की अपील करनी पड़ी थी।

6 राज्यपाल की भूमिका और राष्ट्रपति शासन

राज्यपाल का पद हमेशा से केंद्र और राज्यों के बीच विवाद का विषय रहा है। राज्यपाल निर्वाचित पदाधिकारी नहीं है, अक्सर सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, सिविल सेवक या राजनेता होते हैं, और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं, इसलिए उनके फ़ैसलों को अक्सर केंद्र के हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है, ख़ासकर जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दल सत्ता में हों।

परीक्षा संकेत

केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त सरकारिया आयोग (1983 में गठित, 1988 में रिपोर्ट) ने सिफ़ारिश की थी कि राज्यपालों की नियुक्ति पूरी तरह दलगत भावना से मुक्त होनी चाहिए।

रट लेंपरिभाषा 4

अनुच्छेद 356 तब लागू होता है जब “ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई हो जिसमें राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता।” इसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार राज्य सरकार का कामकाज अपने हाथ में ले लेती है। राष्ट्रपति की घोषणा को संसद से अनुमोदन लेना ज़रूरी है, और राष्ट्रपति शासन अधिकतम तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।

कई बार बहुमत होते हुए भी राज्य सरकारें बर्खास्त की गईं (जैसे 1959 में केरल में), या बहुमत परखे बिना ही (1967 के बाद कई राज्यों में)। कुछ मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे, और अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति शासन लगाने के फ़ैसले की संवैधानिक वैधता की जाँच न्यायपालिका कर सकती है। 1967 तक अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल बहुत कम हुआ, पर 1967 के बाद कई राज्यों में ग़ैर-कांग्रेस सरकारें बनीं जबकि केंद्र में कांग्रेस थी, तब इस प्रावधान का इस्तेमाल बहुमत वाले दल या गठबंधन को सत्ता से रोकने के लिए भी हुआ, जैसे 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकारों को हटाया गया।

7 नए राज्यों की माँग और अंतर-राज्यीय विवाद

राष्ट्रीय आंदोलन ने पूरे भारत में एकता के साथ-साथ भाषा, क्षेत्र और संस्कृति के आधार पर अलग पहचान भी बनाई, और यह लोकतंत्र के लिए भी एक आंदोलन था, इसलिए तय हुआ कि राज्य जहाँ तक संभव हो सांस्कृतिक-भाषाई पहचान के आधार पर बनाए जाएँ। दिसंबर 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना, जिसने प्रमुख भाषाई समूहों के लिए भाषाई राज्य बनाने की सिफ़ारिश की। 1956 में पहला बड़ा पुनर्गठन हुआ।

1960गुजरात और महाराष्ट्र अलग बने
1966पंजाब और हरियाणा अलग हुए
पूर्वोत्तर पुनर्गठनमणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश बने
2000मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार बँटे: छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड बने
2014आंध्र प्रदेश से तेलंगाना अलग हुआ

विदर्भ (महाराष्ट्र) जैसे कुछ क्षेत्र आज भी अलग राज्य की माँग कर रहे हैं।

7.1 अंतर-राज्यीय विवाद : दो प्रमुख प्रकार

सीमा विवाद

  • महाराष्ट्र-कर्नाटक: बेलगाम शहर
  • मणिपुर-नागालैंड सीमा विवाद
  • पंजाब-हरियाणा: चंडीगढ़ (1985 राजीव गांधी समझौता आज तक लागू नहीं)

नदी-जल विवाद

  • तमिलनाडु-कर्नाटक: कावेरी जल विवाद (सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा)
  • गुजरात-मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र: नर्मदा जल-बँटवारा

न्यायपालिका क़ानूनी विवादों की मध्यस्थता करती है, पर असल में ये विवाद सिर्फ़ क़ानूनी नहीं, राजनीतिक भी होते हैं, इसलिए इन्हें बातचीत और आपसी समझ से ही सबसे बेहतर सुलझाया जा सकता है।

8 विशेष प्रावधान, जम्मू-कश्मीर और निष्कर्ष

राज्यों के आकार-जनसंख्या में अंतर के कारण राज्य सभा में असमान प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है, जिससे छोटे राज्यों को न्यूनतम प्रतिनिधित्व और बड़े राज्यों को ज़्यादा प्रतिनिधित्व मिलता है। इसी तरह ज़्यादातर विशेष प्रावधान पूर्वोत्तर राज्यों (असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम आदि) के लिए हैं, क्योंकि वहाँ बड़ी आदिवासी आबादी की अपनी अलग ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान है, हालाँकि इन प्रावधानों से अलगाव और उग्रवाद पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए। हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों और आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, सिक्किम, तेलंगाना जैसे कुछ अन्य राज्यों के लिए भी विशेष प्रावधान हैं।

भारत की नई संसद भवन, नई दिल्ली
चित्र 1 · संसद के पास ही राज्य का अस्तित्व, सीमा और नाम बदलने की शक्ति है, और आपातकाल में राज्य सूची पर भी क़ानून बनाने की शक्ति, यही भारतीय संघवाद में सशक्त केंद्र का आधार है। फ़ोटो: प्रेस सूचना ब्यूरो, संसदीय कार्य मंत्रालय / GODL-India.

8.1 जम्मू और कश्मीर : अनुच्छेद 370 का इतिहास

जम्मू-कश्मीर एक बड़ा रजवाड़ा था, जिसके पास भारत, पाकिस्तान या स्वतंत्र रहने का विकल्प था। अक्तूबर 1947 में पाकिस्तान की क़बायली घुसपैठ के बाद महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद माँगी और भारतीय संघ में विलय कर लिया। बाक़ी मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के विपरीत, जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष स्वायत्तता दी गई: संघ और समवर्ती सूची के विषयों पर क़ानून बनाने के लिए राज्य की सहमति ज़रूरी थी, केंद्र सरकार के पास सीमित शक्तियाँ थीं। राष्ट्रपति राज्य सरकार की सहमति से संघ सूची के कुछ हिस्से राज्य पर लागू कर सकते थे, ऐसे दो संवैधानिक आदेश जारी हुए भी।

जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान और झंडा था, पर संसद की संघ सूची पर क़ानून बनाने की शक्ति पूरी तरह स्वीकार की गई थी। बाक़ी अंतर यह थे कि आंतरिक अशांति के आधार पर आपातकाल राज्य की सहमति के बिना नहीं लगाया जा सकता था, केंद्र वित्तीय आपातकाल नहीं लगा सकता था, नीति-निर्देशक तत्व लागू नहीं होते थे, और संविधान संशोधन (अनुच्छेद 368) राज्य की सहमति से ही लागू होते थे।

परीक्षा संकेत

अनुच्छेद 370 के तहत मिला यह विशेष दर्जा अब अस्तित्व में नहीं है। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 से राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बाँट दिया गया, यह नई व्यवस्था 31 अक्तूबर 2019 से लागू है।

8.2 निष्कर्ष

आख़िरी दोहराव
  • संघवाद सिर्फ़ संविधान से नहीं, राजनीतिक अभ्यास से भी बनता है; संविधान के अंग्रेज़ी संस्करण में “यूनियन” शब्द है, “फेडरेशन” नहीं, पर हिंदी में दोनों के लिए “संघ” शब्द ही चलता है
  • तीन सूचियाँ (संघ, राज्य, समवर्ती) + अवशिष्त शक्तियाँ (सिर्फ़ संघ के पास)
  • सशक्त केंद्र के प्रावधान: राज्य पुनर्गठन की शक्ति, आपातकाल, वित्तीय नियंत्रण, राज्यपाल की शक्तियाँ, अखिल भारतीय सेवाओं पर केंद्र का नियंत्रण
  • केंद्र-राज्य संबंधों के तीन चरण: नेहरू युग (सामान्य), 1960 का दशक (तनाव बढ़ा), गठबंधन युग (परिपक्व संघवाद)
  • स्वायत्तता की चार माँगें: शक्ति-बँटवारा, वित्तीय, प्रशासनिक, सांस्कृतिक-भाषाई
  • अनुच्छेद 356 और राज्यपाल की भूमिका, सरकारिया आयोग (1983/1988) की सिफ़ारिश
  • नए राज्यों की सूची और तारीख़ें; सीमा-विवाद (बेलगाम, चंडीगढ़) और नदी-जल विवाद (कावेरी, नर्मदा)
  • जम्मू-कश्मीर का अनुच्छेद 370 अब इतिहास है, 2019 में लद्दाख और जम्मू-कश्मीर, दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बँटा
परीक्षा से पहले ख़ुद को जाँचें
  • क्या मुझे तीनों सूचियों के उदाहरण याद हैं?
  • क्या मैं सशक्त केंद्र के सातों प्रावधान गिना सकता हूँ?
  • क्या मुझे स्वायत्तता की चारों माँगें अलग-अलग उदाहरण सहित याद हैं?
  • क्या मुझे नए राज्यों की सही तारीख़ें याद हैं?
  • क्या मैं अनुच्छेद 370 का पूरा इतिहास और उसका अंत समझा सकता हूँ?
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