1 स्थानीय शासन क्यों?
लोकतंत्र में सिर्फ़ केंद्र और राज्य स्तर पर निर्वाचित सरकार होना काफ़ी नहीं है, स्थानीय स्तर पर भी स्थानीय मामलों की देखभाल के लिए एक निर्वाचित सरकार होना ज़रूरी है।
मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले की जमनिया तालाब ग्राम पंचायत की गीता राठौड़ 1995 में एक आरक्षित सीट से सरपंच चुनी गईं, और गाँव वालों ने उनके अच्छे काम के इनाम में 2000 में एक सामान्य (अनारक्षित) सीट से दोबारा चुना। एक गृहिणी से राजनीतिक रूप से दूरदर्शी नेता बनीं गीता ने अपनी पंचायत की सामूहिक शक्ति से तालाब को पक्का बनवाया, स्कूल भवन बनवाया, गाँव की सड़कें बनवाईं, घरेलू हिंसा और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, पर्यावरण-जागरूकता फैलाई, और वनरोपण व जल-प्रबंधन को बढ़ावा दिया। (पंचायत राज अपडेट, खंड 11, संख्या 3, फ़रवरी 2004)
तमिलनाडु के वेंगैवसल गाँव की एक सरपंच की कहानी भी उतनी ही उल्लेखनीय है। 1997 में तमिलनाडु सरकार ने 71 सरकारी कर्मचारियों को 2-2 हेक्टेयर ज़मीन आबंटित की, जो वेंगैवसल ग्राम पंचायत के दायरे में थी। कांचिपुरम ज़िले के कलेक्टर ने ऊपर के आदेश पर सरपंच को इस आबंटन का समर्थन करने वाला प्रस्ताव पारित करने को कहा। सरपंच और ग्राम पंचायत ने इनकार कर दिया, कलेक्टर ने ज़मीन के अधिग्रहण का आदेश दे दिया। ग्राम पंचायत ने मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दाख़िल की। एकल पीठ ने कलेक्टर के आदेश को सही ठहराया, पर पंचायत की अपील पर खंडपीठ ने एकल पीठ का फ़ैसला पलट दिया, यह कहते हुए कि सरकार का आदेश पंचायतों की शक्तियों का हनन ही नहीं, उनके संवैधानिक दर्जे का घोर उल्लंघन भी था।
ये दोनों कहानियाँ अकेली घटनाएँ नहीं, बल्कि 1993 में स्थानीय शासन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिलने के बाद पूरे भारत में हो रहे एक बड़े बदलाव की मिसाल हैं।
स्थानीय शासन गाँव और ज़िला स्तर की सरकार है, जो आम नागरिकों के सबसे क़रीब होती है और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और समस्याओं से सीधे जुड़ी होती है। इसका मानना है कि स्थानीय ज्ञान और स्थानीय हित लोकतांत्रिक फ़ैसले लेने और कुशल, जन-हितैषी प्रशासन, दोनों के लिए ज़रूरी हैं।
लोकतंत्र का मतलब है सार्थक भागीदारी और जवाबदेही, दोनों। मज़बूत स्थानीय सरकार इन दोनों को सुनिश्चित करती है, गीता राठौड़ की कहानी भागीदारी की मिसाल है, वेंगैवसल की कहानी जवाबदेही की। जो काम स्थानीय स्तर पर हो सकता है, वह स्थानीय लोगों और उनके प्रतिनिधियों के हाथ में ही होना चाहिए, इसलिए स्थानीय शासन को मज़बूत करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मज़बूत करने जैसा ही है।
2 भारत में स्थानीय शासन का विकास
भारत में शुरू से ही “सभाओं” (गाँव की बैठकों) के रूप में स्व-शासी ग्राम समुदाय मौजूद रहे हैं, समय के साथ ये पंचायतों (पाँच व्यक्तियों की सभा) का रूप ले गए, जो गाँव स्तर के मसले सुलझाती थीं।
- आधुनिक समय में निर्वाचित स्थानीय निकाय 1882 के बाद अस्तित्व में आए, तत्कालीन वायसराय लार्ड रिपन ने इसकी पहल की, इन्हें “लोकल बोर्ड” कहा गया
- धीमी प्रगति के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्थानीय निकायों को ज़्यादा असरदार बनाने की माँग की
- 1919 के भारत सरकार अधिनियम के बाद कई प्रांतों में ग्राम पंचायतें बनीं, यह सिलसिला 1935 के अधिनियम के बाद भी जारी रहा
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण की पुरज़ोर वकालत की, उनका मानना था कि ग्राम पंचायतों को मज़बूत करना ही असरदार विकेंद्रीकरण का ज़रिया है। हमारा राष्ट्रीय आंदोलन दिल्ली में बैठे गवर्नर जनरल के हाथों में जमा शक्तियों को लेकर चिंतित था, इसलिए हमारे नेताओं के लिए आज़ादी का मतलब था फ़ैसला लेने, कार्यपालिका और प्रशासनिक शक्तियों में विकेंद्रीकरण का आश्वासन।
“भारत की आज़ादी का मतलब होना चाहिए समूचे भारत की आज़ादी, आज़ादी की शुरुआत सबसे नीचे से होनी चाहिए। इस तरह हर गाँव एक गणराज्य होगा, इसका मतलब यह कि हर गाँव को आत्मनिर्भर और अपने मामलों को ख़ुद निपटाने में काबिल होना पड़ेगा। अनगिनत गाँवों से बने इस ढाँचे में आगे की ओर फैलते और ऊपर चढ़ते दायरे होंगे। जीवन एक पिरामिड की तरह होगा जिसमें शीर्ष आधार पर टिका होगा।”
महात्मा गांधी
2.1 संविधान में स्थानीय शासन को उचित महत्व न मिलने के दो कारण
संविधान बनते वक़्त स्थानीय शासन का विषय राज्यों को सौंप दिया गया, इसे नीति निर्देशक सिद्धांतों में भी रखा गया, जो अदालत में लागू करवाने योग्य नहीं, सिर्फ़ सलाह-मशविरे की प्रकृति के हैं। पंचायतों समेत स्थानीय शासन को संविधान में उचित महत्व न मिलने के दो कारण बताए जाते हैं:
- विभाजन की उथल-पुथल के कारण संविधान का झुकाव एक मज़बूत केंद्र की ओर हो गया, नेहरू ख़ुद अति-स्थानीयता को राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए ख़तरा मानते थे
- संविधान सभा में डॉ. बी. आर. अंबेडकर के नेतृत्व में एक मज़बूत आवाज़ थी, जिसका मानना था कि ग्रामीण भारत में जाति-पाँति और गुटबाज़ी का बोलबाला स्थानीय शासन के अच्छे उद्देश्य को ही मटियामेट कर देगा
फिर भी किसी भी सदस्य ने विकास योजनाओं में जन-भागीदारी के महत्व से इनकार नहीं किया, संविधान सभा के कई सदस्य ग्राम पंचायत को भारत के लोकतंत्र का आधार बनाना चाहते थे, पर गाँवों में गुटबाज़ी को लेकर उन्हें गहरी चिंता भी थी।
“लोकतंत्र के हक़ में गाँवों को स्व-शासन, यहाँ तक कि स्वायत्तता हासिल करने की कला में प्रशिक्षित किया जा सकता है, हमारे लिए ज़रूरी है कि हम गाँवों को सुधारने और वहाँ शासन के लोकतांत्रिक सिद्धांतों की जड़ जमाने में समर्थ हों।”
अनंतशयनम अयंगर, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड VII, पृष्ठ 428, 17 नवंबर 1948
3 स्वतंत्र भारत में स्थानीय शासन
स्थानीय शासन को 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियमों के बाद ज़बरदस्त बढ़ावा मिला, पर उससे पहले भी कुछ प्रयास हो चुके थे।
- 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसने स्थानीय विकास में जनता की भागीदारी को बढ़ावा दिया; इसी पृष्ठभूमि में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफ़ारिश की गई
- कुछ राज्यों (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र) ने सन् 1960 में निर्वाचित स्थानीय निकायों की व्यवस्था अपनाई, पर कई राज्यों में इन निकायों के पास पर्याप्त शक्तियाँ नहीं थीं, वे केंद्र-राज्य की वित्तीय सहायता पर निर्भर रहते थे
- कई राज्यों ने निर्वाचित स्थानीय निकाय बनाना ज़रूरी नहीं समझा, कहीं इन्हें भंग कर सरकारी अधिकारियों को सौंप दिया गया, कहीं अप्रत्यक्ष चुनाव होते रहे, कहीं चुनाव टलते रहे
- 1987 के बाद स्थानीय शासन संस्थाओं के कामकाज की गहन समीक्षा शुरू हुई, 1989 में पी. के. थुंगन समिति ने स्थानीय शासन निकायों को संवैधानिक मान्यता देने की सिफ़ारिश की, यानी नियमित चुनाव और उपयुक्त कार्य + धन का हस्तांतरण सुनिश्चित करने वाला संविधान संशोधन
4 73वाँ संशोधन : पंचायती राज संस्थाएँ
1989 में केंद्र सरकार ने दो संविधान संशोधन प्रस्तावित किए, ताकि स्थानीय सरकारों को मज़बूत किया जा सके और पूरे देश में उनकी संरचना व कामकाज में एकरूपता आए।
ब्राज़ील के संविधान में प्रांत, संघीय ज़िले तथा नगरपालिका परिषद् की व्यवस्था है, इनमें से हर एक को स्वतंत्र शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, इनका न्यायाधिकार भी अलग-अलग है। जिस तरह गणराज्य (Republic) राज्यों के कामकाज में हस्तक्षेप (संविधान में बताई गई स्थितियों के अतिरिक्त) नहीं कर सकता, ठीक उसी तरह राज्य भी नगरपालिका परिषद् के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। यह प्रावधान स्थानीय शासन की शक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है।
बाद में, 1992 में संसद ने 73वाँ और 74वाँ संशोधन पारित किया, दोनों 1993 में लागू हुए। स्थानीय शासन “राज्य का विषय” है, इसलिए राज्यों को अपने क़ानून संशोधित संविधान के अनुरूप बदलने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया।
4.1 त्रि-स्तरीय ढाँचा और ग्राम सभा
अब सभी प्रदेशों में पंचायती राज का ढाँचा त्रि-स्तरीय है। सबसे नीचे ग्राम पंचायत है, जिसके दायरे में एक अथवा एक से ज़्यादा गाँव होते हैं। मध्यवर्ती स्तर मंडल का है, जिसे खंड या तालुका भी कहा जाता है, और इस स्तर के निकाय को मंडल या तालुका पंचायत कहते हैं। सबसे ऊपर ज़िला पंचायत है, जिसके दायरे में ज़िले का पूरा ग्रामीण इलाक़ा आता है। जो प्रदेश आकार में छोटे हैं, वहाँ मध्यवर्ती स्तर को बनाने की ज़रूरत नहीं।

संशोधन ने ग्राम सभा का गठन भी अनिवार्य किया, जिसमें पंचायत क्षेत्र के सभी वयस्क मतदाता शामिल होते हैं, इसकी भूमिका और कार्य राज्य के क़ानून से तय होते हैं।
- पंचायती राज के तीनों स्तर सीधे जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं, हर पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष है; समय से पहले भंग होने पर 6 महीने के भीतर नए चुनाव अनिवार्य हैं (73वें संशोधन से पहले कई राज्यों में ज़िला निकायों के अप्रत्यक्ष चुनाव होते थे, और भंग होने पर तुरंत चुनाव का कोई प्रावधान नहीं था)
- सभी पंचायती राज संस्थाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं; अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए भी उनकी आबादी के अनुपात में तीनों स्तर पर आरक्षण है; राज्य चाहें तो अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए भी आरक्षण दे सकते हैं
महिलाओं का आरक्षण सिर्फ़ साधारण सदस्यों तक सीमित नहीं, बल्कि तीनों स्तर के अध्यक्ष पदों पर भी लागू होता है। इससे भी ज़्यादा दिलचस्प बात यह है कि महिलाओं का एक-तिहाई आरक्षण सिर्फ़ सामान्य सीटों में नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी लागू होता है। इसका मतलब है कि कोई सीट एक साथ महिला और अनुसूचित जाति/जनजाति, दोनों के लिए आरक्षित हो सकती है, यानी वहाँ सरपंच दलित महिला या आदिवासी महिला ही होगी।
4.3 विषयों का हस्तांतरण और अनुच्छेद 243(छ)
पहले राज्य सूची में रहे 29 विषयों को पहचानकर संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध किया गया है, इन्हें पंचायती राज संस्थाओं को हस्तांतरित किया जाना है। इनका असली हस्तांतरण राज्य के क़ानून पर निर्भर करता है, हर राज्य ख़ुद तय करता है कि इनमें से कितने विषय स्थानीय निकायों को सौंपे जाएँ।
अनुच्छेद 243(छ): “पंचायतों की शक्ति, प्राधिकार और उत्तरदायित्व, किसी प्रदेश की विधायिका क़ानून बनाकर, ग्यारहवीं अनुसूची में दर्ज मामलों में, पंचायतों को ऐसी शक्ति और प्राधिकार प्रदान कर सकती है।”
ग्यारहवीं अनुसूची के कुछ विषय: कृषि, लघु सिंचाई/जल प्रबंधन/जल संचय विकास, लघु उद्योग (खाद्य-प्रसंस्करण सहित), ग्रामीण आवास, पेयजल, सड़क-पुलिया, ग्रामीण विद्युतीकरण, ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम, शिक्षा (प्राथमिक-माध्यमिक), तकनीकी-व्यावसायिक शिक्षा, वयस्क और अनौपचारिक शिक्षा, पुस्तकालय, सांस्कृतिक गतिविधि, बाज़ार-मेला, स्वास्थ्य-स्वच्छता (अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, डिस्पेंसरी), परिवार नियोजन, महिला-बाल विकास, सामाजिक कल्याण, कमज़ोर तबकों (ख़ासकर अनुसूचित जाति-जनजाति) का कल्याण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
73वें संशोधन के प्रावधान भारत के कई राज्यों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर लागू नहीं होते थे। 1996 में एक अलग अधिनियम बनाकर पंचायत व्यवस्था के प्रावधानों को इन क्षेत्रों तक बढ़ाया गया। कई आदिवासी समुदायों की जंगल और जल-स्रोतों जैसे साझा संसाधनों की देखभाल की अपनी परंपराएँ हैं, इसलिए यह अधिनियम इन समुदायों के अपने तरीक़े से संसाधन-प्रबंधन के अधिकार की रक्षा करता है। इसके लिए इन क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को ज़्यादा अधिकार दिए गए हैं, और निर्वाचित ग्राम पंचायतों को कई मामलों में ग्राम सभा की सहमति लेनी पड़ती है। इस अधिनियम के पीछे मूल विचार स्व-शासन की स्थानीय परंपरा को बचाना और आधुनिक ढंग से निर्वाचित निकायों से ऐसे समुदायों को परिचित कराना है, यह विचार विविधता और विकेंद्रीकरण की भावना से मेल खाता है।
- राज्य सरकार को एक राज्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करना ज़रूरी है, जो पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कराता है, यह पद भारत के चुनाव आयुक्त जितना ही स्वायत्त है, पर यह अधिकारी भारत के चुनाव आयोग के नियंत्रण में नहीं है और उससे जुड़ा भी नहीं है (पहले यह काम राज्य प्रशासन के अधीन होता था)
- राज्य सरकार को हर पाँच वर्ष में एक राज्य वित्त आयोग भी नियुक्त करना होता है, जो स्थानीय सरकारों की वित्तीय स्थिति जाँचता है, और राज्य-स्थानीय तथा ग्रामीण-शहरी स्थानीय सरकारों के बीच राजस्व-बँटवारे की समीक्षा करता है, ताकि धन का आवंटन राजनीतिक मसला न बने
5 74वाँ संशोधन : नगरपालिकाएँ
74वाँ संशोधन शहरी स्थानीय निकायों यानी नगरपालिकाओं से जुड़ा है। जनगणना के अनुसार किसी क्षेत्र को शहरी तभी माना जाता है जब: (i) न्यूनतम जनसंख्या 5,000 हो, (ii) कम से कम 75 प्रतिशत पुरुष कामकाजी आबादी ग़ैर-कृषि कार्यों में लगी हो, और (iii) जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी हो। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की लगभग 31 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है।
74वाँ संशोधन काफ़ी हद तक 73वें संशोधन जैसा ही है, बस यह शहरी क्षेत्रों पर लागू होता है, सीधे चुनाव, आरक्षण, विषयों का हस्तांतरण, राज्य चुनाव आयुक्त और राज्य वित्त आयोग, सभी प्रावधान नगरपालिकाओं पर भी लागू होते हैं। संविधान ने राज्य सरकार से शहरी स्थानीय निकायों को जो काम हस्तांतरित करने को कहा है, वे बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध हैं।
6 कार्यान्वयन के आँकड़े
सभी राज्यों ने अब 73वें संशोधन के प्रावधानों को लागू करने के लिए क़ानून बना दिए हैं। इन संशोधनों के लागू होने के पहले दस वर्षों (1994-2004) में ज़्यादातर राज्यों में स्थानीय निकायों के कम से कम दो चुनाव हो चुके थे, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में तो तीन बार चुनाव हो चुके थे।
| ग्रामीण भारत | शहरी भारत |
|---|---|
| 600+ ज़िला पंचायतें | 100+ नगर निगम |
| लगभग 6,000 मंडल/मध्यवर्ती पंचायतें | 1,400 नगर पालिकाएँ |
| 2,40,000 ग्राम पंचायतें | 2,000+ नगर पंचायतें |
राज्य विधानसभाओं और संसद को मिलाकर कुल 5,000 से कम निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, स्थानीय निकायों ने निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या को कहीं ज़्यादा बढ़ा दिया है। 73वें और 74वें संशोधन ने देश भर की पंचायती राज संस्थाओं और नगरपालिका की संस्थाओं की बनावट को एक-सा किया है, इन स्थानीय संस्थाओं की मौजूदगी ही अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, इससे शासन में जनता की भागीदारी के लिए मंच और माहौल तैयार होता है। पर लोग सिर्फ़ औपचारिक क़ानून नहीं चाहते, वे चाहते हैं कि इन क़ानूनों को पूरी ईमानदारी से लागू किया जाए, पाठ्यपुस्तक में दिखाए गए झंडे का नारा यही अपेक्षा जताता है: ‘हमारे गाँव में हमारा राज’।
महिलाओं के आरक्षण ने भी स्थानीय निकायों में महिलाओं की सार्थक मौजूदगी सुनिश्चित की है: ज़िला पंचायतों में कम से कम 200 महिला अध्यक्ष, मंडल/तालुका पंचायतों में 2,000 महिला अध्यक्ष, ग्राम पंचायतों में 80,000 से ज़्यादा महिला सरपंच, नगर निगमों में 30 महिला महापौर, नगर पालिकाओं में 500 से ज़्यादा महिला अध्यक्ष, और लगभग 650 नगर पंचायतें महिलाओं के नेतृत्व में हैं।
संसाधनों पर अपने नियंत्रण की दावेदारी करके महिलाओं ने ज़्यादा शक्ति और आत्मविश्वास अर्जित किया है। इन संस्थाओं में महिलाओं की मौजूदगी के कारण बहुत-सी स्त्रियों की राजनीति के काम-धंधे की समझ पैनी हुई है, और अनेक मामलों में स्थानीय निकायों के विचार-विमर्श में महिलाओं की मौजूदगी नया परिप्रेक्ष्य जोड़ती है और चर्चा ज़्यादा संवेदनशील होती है। पर अनेक मामलों में महिलाएँ अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में असफल भी रहीं, या महिला को पद पर बैठाकर परिवार का पुरुष उसके बहाने फ़ैसले लेता रहा, हालाँकि ऐसी घटनाओं में तेज़ी से कमी आ रही है।

7 सीमाएँ और चुनौतियाँ
भारत की आबादी में 16.2 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 8.2 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति है, स्थानीय शासन के शहरी और ग्रामीण, दोनों तरह के निकायों में मिलाकर लगभग 6.6 लाख निर्वाचित सदस्य इन्हीं दो समुदायों से हैं, इससे स्थानीय निकायों की सामाजिक बनावट में बड़ा बदलाव आया है। कभी-कभी इससे तनाव भी पैदा होता है, जो समूह पहले गाँव पर हावी थे वे अपनी शक्ति आसानी से नहीं छोड़ना चाहते, पर यह तनाव हमेशा बुरा नहीं होता, जब भी लोकतंत्र को उन तक शक्ति पहुँचाने की कोशिश होती है जिनके पास पहले शक्ति नहीं थी, तो कुछ टकराव स्वाभाविक है।
29 विषय सौंपे जाने के बावजूद, स्थानीय सरकारों को व्यवहार में सीमित स्वायत्तता ही मिली है, कई राज्यों ने ज़्यादातर विषय स्थानीय निकायों को हस्तांतरित नहीं किए, इससे स्थानीय निकाय असरदार ढंग से काम नहीं कर पाते, और इतने सारे प्रतिनिधि चुनने की पूरी कवायद कुछ हद तक प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है। कुछ लोग स्थानीय निकायों के निर्माण की यह कहकर आलोचना भी करते हैं कि इससे प्रादेशिक और केंद्रीय स्तर पर जिस तरह से फ़ैसले लिए जाते हैं, उसमें कोई बदलाव नहीं आता: स्थानीय स्तर की जनता के पास लोक कल्याण के कार्यक्रमों अथवा संसाधनों के आबंटन के बारे में विकल्प चुनने की ज़्यादा शक्ति नहीं होती।
लातिन अमेरिका में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की सबसे सफल मिसालों में बोलिविया गिना जाता है। 1994 के जन-भागीदारी क़ानून ने स्थानीय स्तर पर शक्ति का विकेंद्रीकरण किया, महापौरों (presidente municipal) के प्रत्यक्ष चुनाव, देश को नगरपालिकाओं में बाँटना, और नई नगरपालिकाओं को स्वतः वित्तीय हस्तांतरण जैसी व्यवस्थाएँ बनाईं। बोलिविया 314 नगरपालिका सरकारों में बँटा है, हर नगरपालिका की अगुआई जनता द्वारा निर्वाचित महापौर करते हैं, जिनके साथ एक नगरपालिका परिषद् होती है, और हर पाँच साल में देशभर में स्थानीय चुनाव होते हैं। बोलिविया की स्थानीय सरकार को स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएँ बहाल करने तथा इस आधारभूत ढाँचे के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। बोलिविया में देशभर के राजस्व-संग्रह का 20 प्रतिशत प्रति-व्यक्ति आधार पर नगरपालिकाओं में बाँटा जाता है। नगरपालिका को मोटर-वाहन, शहरी संपदा तथा बड़ी कृषि संपदा पर कर लगाने का अधिकार है, फिर भी इनके बजट का अधिकांश हिस्सा वित्तीय हस्तांतरण से ही आता है।
स्थानीय निकायों के पास अपना धन बहुत कम है, केंद्र-राज्य के अनुदान पर निर्भरता ने उनकी काम करने की क्षमता को काफ़ी कमज़ोर किया है। शहरी स्थानीय निकायों का कुल राजस्व उगाही में सिर्फ़ 0.24 प्रतिशत का योगदान है, जबकि सरकारी ख़र्च का 4 प्रतिशत इन निकायों द्वारा व्यय होता है, यानी वे कमाते बहुत कम हैं, ख़र्च कहीं ज़्यादा करते हैं, इसीलिए अनुदान देने वालों पर उनकी निर्भरता बनी रहती है। (हिंदी पाठ्यपुस्तक में यहाँ ‘शहरी’ छपा है; अंग्रेज़ी संस्करण में ‘ग्रामीण’।)
8 निष्कर्ष
अब तक के अनुभव से यही संकेत मिलते हैं कि स्थानीय शासन के निकाय एक एजेंसी की भूमिका निभाते हुए केंद्र और राज्य सरकार के विकास-कार्यक्रमों को लागू करना जारी रखेंगे। स्थानीय शासन को ज़्यादा शक्ति देने का मतलब है कि हम सत्ता के वास्तविक विकेंद्रीकरण के लिए तैयार रहें। आख़िरकार, लोकतंत्र का मतलब होता है कि सत्ता की भागीदार जनता होगी: गाँव और शहर के लोगों को यह फ़ैसला लेने का अधिकार होना चाहिए कि किस नीति और कार्यक्रम को उन्हें अपनाना है और किसे नहीं। स्थानीय शासन के संबंध में जो कानून बने हैं, वे लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा कानूनी प्रावधानों में नहीं बल्कि इन प्रावधानों को अमली जामा पहनाने में होती है।
- गीता राठौड़ (मध्य प्रदेश, 1995/2000) और वेंगैवसल (तमिलनाडु, 1997), दोनों कहानियाँ 1993 के बाद के बदलाव की मिसाल हैं
- लार्ड रिपन (1882), 1919/1935 के अधिनियम, गांधी का विकेंद्रीकरण विचार, नेहरू-अंबेडकर की अलग-अलग चिंताएँ
- 1952 सामुदायिक विकास कार्यक्रम, 1989 पी. के. थुंगन समिति
- 73वाँ (ग्रामीण/पंचायती राज) और 74वाँ (शहरी/नगरपालिका) संशोधन, 1992 में पारित, 1993 में लागू
- त्रि-स्तरीय ढाँचा, 5 वर्ष कार्यकाल, महिला और अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण (अनुसूचित जाति/जनजाति की सीटों के भीतर भी महिला आरक्षण), 29 विषय + ग्यारहवीं अनुसूची, पेसा 1996
- राज्य चुनाव आयुक्त (भारत के चुनाव आयोग से स्वतंत्र) और राज्य वित्त आयोग (हर 5 वर्ष)
- सीमित स्वायत्तता: 0.24% राजस्व बनाम 4% ख़र्च; बोलिविया का सफल उदाहरण
- क़ानून बनाम व्यवहार: असली लोकतंत्र क़ानून में नहीं, उसके अमल में है
- ब्राज़ील का उदाहरण: राज्य और नगरपालिका परिषद् के बीच पारस्परिक अहस्तक्षेप, ठीक वैसे ही जैसे गणराज्य राज्यों के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करता
- क्या मुझे दोनों कहानियाँ (गीता राठौड़ और वेंगैवसल) नाम-तारीख़ सहित याद हैं, और वेंगैवसल में कौन-सी अदालती पीठ किसके पक्ष में गई?
- क्या मैं नेहरू और अंबेडकर की अलग-अलग चिंताएँ स्पष्ट रूप से बता सकता हूँ?
- क्या मुझे 73वें और 74वें संशोधन में फ़र्क़ याद है, और कौन-सी अनुसूची किससे जुड़ी है?
- क्या मुझे महिला-आरक्षण का “आरक्षण के भीतर आरक्षण” वाला नियम याद है?
- क्या मुझे 0.24% राजस्व-योगदान बनाम 4% ख़र्च वाला आँकड़ा याद है?