1 क्या संविधान अपरिवर्तनीय होते हैं?
दुनिया के कई देश परिस्थितियों में बदलाव, समाज में विचारों के बदलाव, या राजनीतिक उथल-पुथल के चलते अपना संविधान दोबारा लिखते रहे हैं। पर भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से लागू हुआ, और 69 वर्ष से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी वही संविधान लगातार काम कर रहा है।
सोवियत संघ: 74 वर्षों (1918, 1924, 1936 और 1977) में चार संविधान बदले, 1991 में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन ख़त्म हुआ और सोवियत गणराज्य बिखर गया, नए रूसी गणराज्य ने 1993 में नया संविधान अपनाया।
फ्रांस: दो सौ वर्षों में कई संविधान अपनाए, क्रांति के बाद 1793 का संविधान पहला फ्रांसीसी गणतंत्र कहलाया, 1848 में दूसरा, 1875 में नए संविधान के साथ तीसरा, 1946 में चौथा, और 1958 में पाँचवाँ फ्रांसीसी गणतंत्र स्थापित हुआ।
अमेरिका: इसका संविधान 200 वर्ष से ज़्यादा पुराना है, पर अब तक इसमें सिर्फ़ 27 संशोधन हुए हैं।
तो क्या हमारा संविधान इतना अच्छा है कि उसमें बदलाव की ज़रूरत ही नहीं, या हमारे संविधान-निर्माता इतने दूरदर्शी थे कि उन्होंने भविष्य के सारे बदलाव पहले ही भाँप लिए थे? एक हद तक दोनों बातें सही हैं, पर कोई भी संविधान हर परिस्थिति का समाधान पहले से नहीं दे सकता, कोई दस्तावेज़ ऐसा नहीं होता जिसे कभी बदलने की ज़रूरत ही न पड़े।
पहला, हमारा संविधान समय की ज़रूरत के अनुसार संशोधन की आवश्यकता को स्वीकार करके चलता है। दूसरा, संविधान के व्यावहारिक कामकाज में व्याख्या की पर्याप्त गुंजाइश रही है, अदालती फ़ैसलों और राजनीतिक व्यवहार दोनों ने संविधान को लागू करने में परिपक्वता और लचीलापन दिखाया है। इन्हीं वजहों से हमारा संविधान क़ानूनों की एक बंद और जड़ किताब न बनकर एक जीवंत दस्तावेज़ के रूप में विकसित हो सका।
2 संविधान: लचीला भी, कठोर भी
संविधान की दोहरी भूमिका होती है: वह उस समय की समस्याओं का हल भी देता है जब उसे लिखा जा रहा है, और भविष्य के लिए भी एक ढाँचा प्रदान करता है। संविधान न मनुष्यों द्वारा बनाई गई कोई जड़ चीज़ है, वह समाज की इच्छाओं-आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है, पर साथ ही समाज को लोकतांत्रिक ढंग से चलाने का एक ढाँचा भी है।
इस दोहरी भूमिका से एक मुश्किल सवाल उठता है: क्या संविधान इतना पवित्र दस्तावेज़ है कि उसमें कोई बदलाव किया ही नहीं जा सकता, या यह इतना आम मसला है कि उसमें सामान्य क़ानून की तरह जब चाहे बदलाव हो सकता है? भारतीय संविधान निर्माताओं ने दोनों के बीच संतुलन बनाया: उन्होंने संविधान को सामान्य क़ानून से ऊँचा दर्जा दिया ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसका सम्मान करें, पर साथ ही यह भी स्वीकार किया कि भविष्य में इसमें संशोधन की ज़रूरत पड़ सकती है। दूसरे शब्दों में, हमारा संविधान न जड़ और अपरिवर्तनीय है, न ही यह किसी भी मुद्दे पर अंतिम शब्द है।
कक्षा में कुछ छात्रों ने ये बातें कहीं थीं, इन पर अपनी राय ज़रूर सोचें: “संविधान किसी भी अन्य क़ानून जैसा ही है”, “संविधान में हर 10-15 साल बाद बदलने का प्रावधान होना चाहिए”, “संविधान देश के दर्शन का बयान है, इसे कभी नहीं बदला जा सकता”, “संविधान पावन दस्तावेज़ है, इसे बदलने की बात लोकतंत्र-विरोधी है”। हर कथन आधा सच है: संविधान बदल तो सकता है, पर सामान्य क़ानून जितनी आसानी से नहीं, और यही “लचीला भी, कठोर भी” होने का मतलब है।
3 संविधान में संशोधन के तीन तरीक़े
“संसद अपनी संवैधानिक शक्ति के द्वारा और इस अनुच्छेद में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार संविधान में नए उपबंध कर सकती है, पहले से विद्यमान उपबंधों को बदल या हटा सकती है।”
संविधान को लचीला (परिवर्तनों के प्रति खुला) और कठोर (अनावश्यक परिवर्तनों के प्रति सख़्त) दोनों बनाने के इरादे से इसमें संशोधन के तीन अलग-अलग तरीक़े रखे गए हैं।

ध्यान देने की बात: सभी संशोधन सिर्फ़ संसद में ही शुरू होते हैं, इसके लिए किसी बाहरी एजेंसी (जैसे संविधान आयोग) की ज़रूरत नहीं होती, संशोधन की पुष्टि के लिए कोई जनमत संग्रह भी नहीं होता, और राष्ट्रपति संशोधन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते (आम विधेयकों के विपरीत)। इससे पता चलता है कि संशोधन का आधार निर्वाचित प्रतिनिधियों की संप्रभुता (संसदीय संप्रभुता) है।
4 विशेष बहुमत और राज्यों द्वारा अनुमोदन
सामान्यतः किसी विधेयक को पारित करने के लिए उपस्थित-मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत की ज़रूरत होती है (जैसे 247 सदस्य उपस्थित हों तो 124 से पारित)। पर संशोधन विधेयक के लिए दो अलग शर्तें एक साथ पूरी करनी होती हैं: (1) संशोधन के पक्ष में मतदान करने वाले सदस्य सदन की कुल सदस्य-संख्या के कम से कम आधे हों, और (2) वे मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई भी हों। दोनों सदनों में यह अलग-अलग पारित करना होता है, संयुक्त सत्र का कोई प्रावधान नहीं है।
लोकसभा में 545 सदस्य हैं, इसलिए किसी भी संशोधन को कम से कम 273 सदस्यों का समर्थन चाहिए, भले ही मतदान के समय सिर्फ़ 300 सदस्य मौजूद हों। अगर मतदान में 400 सदस्यों ने भाग लिया हो, तो भी कम से कम 273 का समर्थन ज़रूरी रहेगा, क्योंकि “कुल सदस्य-संख्या के आधे” की शर्त (272.5, यानी 273) “मतदान करने वालों के दो-तिहाई” (400 का दो-तिहाई ≈ 267) से बड़ी है। दोनों शर्तों में जो संख्या बड़ी हो, वही लागू होती है।
विशेष बहुमत का सिद्धांत: अमेरिका में दो-तिहाई बहुमत, दक्षिण अफ़्रीका और रूस में कुछ संशोधनों के लिए तीन-चौथाई बहुमत ज़रूरी है।
जनता की भागीदारी का सिद्धांत: स्विट्ज़रलैंड में जनता ख़ुद संशोधन की शुरुआत भी कर सकती है, रूस और इटली में जनता संशोधन का प्रस्ताव या अनुमोदन कर सकती है।
“जो लोग इस संविधान से असंतुष्ट हैं, उन्हें केवल दो तिहाई बहुमत प्राप्त करना है और यदि वे (इतना) भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं तो यह नहीं समझा जा सकता है कि जन साधारण उनके असंतोष में उनका साथ दे रहा है।”
डॉ. अंबेडकर, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड XI, पृष्ठ 976, 25 नवंबर 1949
यहाँ ग़ौर करने की बात है कि अंबेडकर सिर्फ़ संसदीय बहुमत की बात नहीं कर रहे, वे “जनसाधारण की सहभागिता” का ज़िक्र करते हैं, यानी बहुमत की धारणा के पीछे जनमत की भावना भी काम करती है।
4.1 राज्यों द्वारा अनुमोदन
राज्यों और केंद्र सरकार के बीच शक्तियों के बँटवारे या जन-प्रतिनिधित्व से जुड़े अनुच्छेदों में सिर्फ़ विशेष बहुमत काफ़ी नहीं, राज्यों की सहमति भी ज़रूरी है: आधी राज्य विधायिकाओं को साधारण बहुमत से संशोधन विधेयक पारित करना होता है। यह संघीय ढाँचे का सम्मान करता है और राज्यों को संशोधन प्रक्रिया में भागीदारी देता है, फिर भी इसे पूरी तरह कठोर नहीं बनाया गया, सिर्फ़ आधे राज्यों की सहमति और साधारण बहुमत ही काफ़ी है।
5 इतने संशोधन क्यों?
26 जनवरी 2024 को हमारे संविधान को लागू हुए 74 वर्ष हो गए, इस दौरान इसमें 106 संशोधन हो चुके हैं। संशोधन प्रक्रिया की कठोरता को देखते हुए यह संख्या काफ़ी बड़ी लगती है।
| अवधि | संशोधन | राजनीतिक संदर्भ |
|---|---|---|
| 1974-1976 (3 वर्ष) | 10 संशोधन | कांग्रेस का दबदबा, लोकसभा में 352 सीटें |
| 2001-2003 (3 वर्ष) | 10 संशोधन | गठबंधन की राजनीति, भाजपा-विरोधी दलों में कटु प्रतिद्वंद्विता |
ये दोनों दौर राजनीतिक रूप से बिल्कुल अलग थे, फिर भी दोनों में समान रफ़्तार से संशोधन हुए, यानी संशोधनों की संख्या सिर्फ़ सत्ताधारी दल के बहुमत की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती। संविधान के पहले दशक को छोड़कर हर दशक में संशोधनों की एक धारा-सी बहती रही है, यानी सत्ताधारी दल चाहे जो भी हो, समय-समय पर संशोधन की ज़रूरत महसूस होती रही।
6 संशोधनों के प्रकार और विवादास्पद संशोधन
अब तक हुए संशोधनों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
जून 1975 में लगे आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए ये तीन संशोधन सबसे विवादास्पद माने जाते हैं। 42वाँ संशोधन ख़ासतौर पर बड़े स्तर पर हुआ: केशवानंद के फ़ैसले को चुनौती देने की कोशिश, लोकसभा का कार्यकाल 5 से 6 वर्ष करना, संविधान में मूल कर्तव्य जोड़ना, न्यायपालिका की समीक्षा-शक्तियों पर पाबंदी, और प्रस्तावना + सातवीं अनुसूची + 53 अनुच्छेदों में बदलाव। यह विधेयक पारित होते समय विपक्ष के कई सांसद जेल में थे। 1977 के चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद नई सरकार ने 43वें और 44वें संशोधन से 38वें-39वें-42वें के ज़्यादातर बदलाव रद्द कर संवैधानिक संतुलन बहाल किया।
7 मूल संरचना का सिद्धांत
भारतीय संविधान के विकास को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली चीज़ है मूल संरचना का सिद्धांत, जो न्यायपालिका ने केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रतिपादित किया।
1. संसद की संविधान-संशोधन शक्ति की सीमा तय की: कोई भी संशोधन मूल संरचना का उल्लंघन नहीं कर सकता।
2. संसद को इस सीमा के भीतर संविधान के किसी भी या सभी हिस्सों में संशोधन की अनुमति दी।
3. न्यायपालिका को यह तय करने का अंतिम अधिकार दिया कि कोई संशोधन मूल संरचना का उल्लंघन करता है या नहीं, और मूल संरचना क्या है।

दिलचस्प बात यह है कि मूल संरचना का सिद्धांत ख़ुद एक जीवंत संविधान का उदाहरण है, संविधान के मूल पाठ में इस सिद्धांत का कहीं ज़िक्र नहीं मिलता, यह पूरी तरह न्यायिक व्याख्या से जन्मा है, यानी न्यायपालिका ने बिना औपचारिक संशोधन के ही संविधान को व्यावहारिक रूप से संशोधित कर दिया।
1990 के दशक के अंत में पूरे संविधान की समीक्षा की कोशिश हुई। सन् 2000 में भारत सरकार ने सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वेंकटचलैया की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त किया, विपक्षी दलों और कई संगठनों ने इसका बहिष्कार किया। आयोग ने मूल संरचना के सिद्धांत को बरक़रार रखते हुए ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया जो इसे ख़तरे में डाले, यह दिखाता है कि इस सिद्धांत को कितनी मान्यता मिल चुकी है।
न्यायिक व्याख्या के और उदाहरण: नौकरियों-शिक्षा में आरक्षण 50 प्रतिशत सीटों से ज़्यादा नहीं हो सकता (अब स्वीकृत सिद्धांत); OBC आरक्षण में “क्रीमी लेयर” की अवधारणा, जिसके तहत इस वर्ग के लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता; और शिक्षा, जीवन-स्वतंत्रता, और अल्पसंख्यक शिक्षण-संस्थाओं के अधिकार जैसे प्रावधानों की व्याख्या से न्यायपालिका ने अनौपचारिक संशोधन में योगदान दिया।
8 निष्कर्ष: जीवंत दस्तावेज़ और लोकतंत्र
1950 से बार-बार उठने वाला सबसे गंभीर सवाल रहा है: संसद की सर्वोच्चता। संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए उसे कार्यपालिका-न्यायपालिका पर वरीयता मिलनी चाहिए, पर संविधान ने सरकार के अन्य अंगों को भी शक्तियाँ दी हैं, इसलिए संसद की सर्वोच्चता इसी ढाँचे के भीतर काम करती है।
संसद का मानना था कि उसके पास ग़रीब-पिछड़े-असहाय लोगों के हित में क़ानून बनाने (संशोधन करने) की शक्ति है। न्यायपालिका ने ज़ोर दिया कि यह सब संवैधानिक ढाँचे के भीतर ही होना चाहिए, क्योंकि क़ानून की सीमा से बाहर जाने की छूट मिलते ही सत्ताधारी उसका दुरुपयोग भी कर सकते हैं। केशवानंद मामले में न्यायपालिका ने संविधान की भाषा (अक्षर) की बजाय उसकी भावना (आत्मा) पर फ़ैसला दिया, यानी मूल संरचना, जो संविधान के पाठ में कहीं नहीं लिखी, न्यायपालिका की अपनी खोज है।
राजनीतिक नेतृत्व की परिपक्वता: 1967-1973 के तीखे विवाद के बाद केशवानंद के फ़ैसले को पलटवाने की कोशिशें नाकाम रहने पर 42वें संशोधन से संसदीय सर्वोच्चता जताई गई, पर मिनर्वा मिल मामले (1980) में अदालत ने अपना पुराना रुख़ दोहराया। चार दशक बाद भी राजनीतिक दलों, नेताओं, सरकार और संसद ने मूल संरचना के अटल विचार को स्वीकार कर लिया है, यहाँ तक कि संविधान-समीक्षा की बात चलने पर भी यह सीमा पार नहीं हुई।
संविधान बनते समय नेहरू ने स्वतंत्रता के अवसर पर दिए अपने प्रसिद्ध भाषण में इस साझे सपने को “भाग्य के साथ करार” (tryst with destiny) बताया था, और वह सपना आज भी क़ायम है: व्यक्ति की गरिमा-आज़ादी, सामाजिक-आर्थिक समानता, सबकी ख़ुशहाली, और राष्ट्रीय एकता पर आधारित एकता।
“यह संविधान जिन आदर्शों पर आधारित है उनका भारत की आत्मा से कोई संबंध नहीं है। यह संविधान यहाँ की परिस्थितियों में कार्य नहीं कर पाएगा और लागू होने के कुछ समय बाद ही ठप्प हो जाएगा।”
लक्ष्मीनारायण साहू, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड XI, पृष्ठ 613, 17 नवंबर 1949
संविधान सभा में यह असहमति की आवाज़ भी मौजूद थी, फिर भी संविधान आधी सदी से ज़्यादा गुज़रने के बाद भी सम्मान और अधिकार का विषय बना हुआ है।
- भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत, 26 जनवरी 1950 को लागू; 69+ वर्ष से एक ही संविधान लागू
- संशोधन के तीन तरीक़े: सामान्य बहुमत (अनुच्छेद 2, 3), विशेष बहुमत (अनुच्छेद 368), विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुमोदन
- विशेष बहुमत की दो शर्तें: कुल सदस्य-संख्या का आधा, और मतदान करने वालों का दो-तिहाई
- 26 जनवरी 2024 तक 74 वर्ष, 106 संशोधन; 1974-76 और 2001-03 दोनों में 10-10 संशोधन, अलग-अलग राजनीतिक संदर्भ में
- 38वाँ, 39वाँ, 42वाँ सबसे विवादास्पद (आपातकाल-दौर); 43वें-44वें ने इन्हें काफ़ी हद तक पलटा
- मूल संरचना का सिद्धांत: केशवानंद भारती (1973), मिनर्वा मिल (1980) से पुष्ट; संविधान के पाठ में कहीं नहीं लिखा, न्यायपालिका की अपनी खोज
- अक्षर बनाम भावना: संविधान की सफलता राजनीतिक परिपक्वता और समझौते में है, कठोर पदों पर अड़े रहने में नहीं
- क्या मुझे संशोधन के तीनों तरीक़े और उनसे जुड़े अनुच्छेद याद हैं?
- क्या मुझे विशेष बहुमत की दोनों शर्तें (आधा + दो-तिहाई) साफ़ याद हैं?
- क्या मुझे 38वें-39वें-42वें और 43वें-44वें संशोधन के बीच फ़र्क़ याद है?
- क्या मुझे मूल संरचना के सिद्धांत के तीनों योगदान अलग-अलग बता सकता हूँ?
- क्या मुझे केशवानंद भारती (1973) और मिनर्वा मिल (1980) के बीच का फ़र्क़ याद है?