NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 9 «संविधान, एक जीवंत दस्तावेज़» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अंत में अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों (तीनों “कहाँ पहुँचे? क्या समझे?” बॉक्स, “खुद करें — खुद सीखें” और हाशिये के प्रश्न) के उत्तर भी दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 संशोधन क्यों ज़रूरी है : सही वाक्य चुनें
प्र. निम्नलिखित में से कौन-सा वाक्य सही है? संविधान में समय-समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है क्योंकि…
(क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।
(ख) किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज़ कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता है।
(ग) हर पीढ़ी के पास अपनी पसंद का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए।
(घ) संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिंबित होना चाहिए।
उत्तर: (क) सही है। संविधान में संशोधन इसलिए ज़रूरी होता है क्योंकि समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, और संविधान को इन नई परिस्थितियों के अनुरूप ढलना पड़ता है। (ख) ग़लत है, क्योंकि संविधान का मूल ढाँचा और उसकी भावना अप्रासंगिक नहीं होती, सिर्फ़ कुछ प्रावधानों में बदलाव की ज़रूरत पड़ती है। (ग) ग़लत है, संविधान हर पीढ़ी की पसंद बदलने पर दुबारा नहीं लिखा जाता, बल्कि मौजूदा संविधान में ज़रूरी संशोधन किए जाते हैं। (घ) ग़लत है, संविधान किसी एक मौजूदा सरकार के राजनीतिक दर्शन का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि एक स्थायी ढाँचा है जो अलग-अलग विचारधारा वाली सरकारों के लिए भी काम करता है।
2 सही/ग़लत पहचानें
प्र. निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही/ग़लत का निशान लगाएँ।
(क) राष्ट्रपति किसी संशोधन विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।
(ख) संविधान में संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास ही होता है।
(ग) न्यायपालिका संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती परंतु उसे संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। व्याख्या के द्वारा वह संविधान को काफ़ी हद तक बदल सकती है।
(घ) संसद संविधान के किसी भी खंड में संशोधन कर सकती है।
उत्तर:
(क) सही। संशोधन विधेयक के मामले में राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की शक्ति नहीं है।
(ख) सही। संशोधन के प्रश्न पर अंतिम राय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों की ही होती है, यही संसदीय संप्रभुता का सिद्धांत है।
(ग) सही। न्यायपालिका औपचारिक रूप से संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती, पर मूल संरचना के सिद्धांत जैसी अपनी व्याख्याओं के ज़रिए उसने संविधान को व्यावहारिक रूप से काफ़ी हद तक बदला है।
(घ) ग़लत। संसद संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन नहीं कर सकती, वह मूल संरचना का उल्लंघन करने वाला कोई संशोधन नहीं कर सकती।
3 संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाने वाले
प्र. निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं? इस प्रक्रिया में ये कैसे शामिल होते हैं?
(क) मतदाता (ख) भारत का राष्ट्रपति (ग) राज्य की विधान सभाएँ (घ) संसद (ङ) राज्यपाल (च) न्यायपालिका
उत्तर:
(घ) संसद की भूमिका सबसे केंद्रीय है, सभी संशोधन सिर्फ़ संसद में ही शुरू होते हैं, और विशेष बहुमत से पारित होते हैं।
(ग) राज्य विधानसभाएँ संघीय ढाँचे या प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रावधानों में संशोधन के लिए भूमिका निभाती हैं, आधी राज्य विधानसभाओं का साधारण बहुमत से अनुमोदन ज़रूरी होता है।
(ख) राष्ट्रपति संशोधन विधेयक पर अनुमोदन देते हैं, पर उसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते, इसलिए उनकी भूमिका सीमित है।
(च) न्यायपालिका संशोधन का औपचारिक प्रस्ताव नहीं ला सकती, पर मूल संरचना के सिद्धांत के ज़रिए वह तय करती है कि कोई संशोधन वैध है या नहीं।
(क) मतदाता और (ङ) राज्यपाल की कोई सीधी भूमिका नहीं है, भारतीय संशोधन प्रक्रिया में मतदाताओं के लिए जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है, और राज्यपाल का संशोधन प्रक्रिया से सीधा कोई संवैधानिक संबंध नहीं है।
4 42वाँ संशोधन : विवाद के कारण
प्र. इस अध्याय में आपने पढ़ा कि संविधान का 42वाँ संशोधन अब तक का सबसे विवादास्पद संशोधन रहा है। इस विवाद के क्या कारण थे?
(क) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था, आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
(ख) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था।
(ग) इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था।
(घ) संशोधन के कुछ उपबंध विवादास्पद थे।
उत्तर: (क) और (घ) सही कारण हैं, (ख) और (ग) सही कारण नहीं हैं।
(क) सही है, 42वाँ संशोधन जून 1975 में लगे आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुआ, और आपातकाल की घोषणा ख़ुद विवादास्पद थी।
(घ) सही है, इस संशोधन ने लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया, न्यायपालिका की समीक्षा शक्तियों पर पाबंदी लगाई, और प्रस्तावना जैसे मूल भागों में बदलाव किया, ये उपबंध ख़ुद विवादास्पद थे।
(ख) ग़लत कारण है, 42वाँ संशोधन भी बाक़ी संशोधनों की तरह विशेष बहुमत से ही पारित हुआ था, इसका विवाद विशेष बहुमत की कमी से नहीं जुड़ा।
(ग) ग़लत कारण है। 42वें संशोधन ने सातवीं अनुसूची में भी बदलाव किया था, और सातवीं अनुसूची से जुड़े संशोधन उसी श्रेणी में आते हैं जिनके लिए आधे राज्यों की विधानपालिकाओं का अनुमोदन भी ज़रूरी होता है, इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि यहाँ अनुमोदन का कोई सवाल ही नहीं था। यह संशोधन संविधान में बताई गई प्रक्रिया का पालन करते हुए ही पारित हुआ। असल बात यह है कि इस संशोधन का विवाद प्रक्रिया को लेकर था ही नहीं: विवाद आपातकाल की उस पृष्ठभूमि को लेकर था जिसमें यह किया गया, और इसके उपबंधों की विषय-वस्तु को लेकर था।
5 विधायिका-न्यायपालिका टकराव की ग़लत व्याख्या
प्र. निम्नलिखित वाक्यों में कौन-सा वाक्य विभिन्न संशोधनों के संबंध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता?
(क) संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है।
(ख) खंडन-मंडन/बहस और मतभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं।
(ग) कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षाकृत ज़्यादा महत्त्व दिया गया है, कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्याख्या की गई है।
(घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।
(ङ) न्यायपालिका केवल किसी क़ानून की संवैधानिकता के बारे में फ़ैसला दे सकती है, वह ऐसे क़ानूनों की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।
उत्तर: (घ) सही व्याख्या नहीं करता। “नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती” एक अतिवादी कथन है, यह विधायिका की भूमिका को पूरी तरह ख़ारिज करता है, जबकि असली संबंध यह है कि विधायिका और न्यायपालिका दोनों मिलकर, संतुलन बनाकर, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। (क), (ख), (ग) और (ङ) सभी टकराव की सही व्याख्या करते हैं: संविधान की कई व्याख्याएँ संभव हैं, बहस-मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, कुछ प्रावधानों को विशेष बहुमत की ज़्यादा सुरक्षा मिली है, और न्यायपालिका सिर्फ़ संवैधानिकता तय करती है, राजनीतिक वांछनीयता पर फ़ैसला नहीं देती।
6 मूल संरचना का सिद्धांत : सही/ग़लत वाक्य
प्र. बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत के बारे में सही वाक्य को चिन्हित करें। ग़लत वाक्य को सही करें।
(क) संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है।
(ख) बुनियादी ढाँचे को छोड़कर विधायिका संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है।
(ग) न्यायपालिका ने संविधान के उन पहलुओं को स्पष्ट कर दिया है जिन्हें बुनियादी ढाँचे के अंतर्गत या उसके बाहर रखा जा सकता है।
(घ) यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया है।
(ङ) इस सिद्धांत से न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं, सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।
उत्तर:
(ख), (घ) और (ङ) सही हैं। विधायिका बुनियादी ढाँचे को छोड़कर संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है (ख); यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रतिपादित हुआ (घ); इससे न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं और सरकार-राजनीतिक दलों ने इसे स्वीकार कर लिया है (ङ)।
(क) ग़लत है, सही रूप: संविधान में बुनियादी मान्यताओं का कोई स्पष्ट खुलासा (उल्लेख) नहीं किया गया है, मूल संरचना का सिद्धांत संविधान के पाठ में कहीं नहीं लिखा, यह पूरी तरह न्यायिक व्याख्या से जन्मा है।
(ग) ग़लत है, सही रूप: न्यायपालिका ने अलग-अलग मामलों में समय-समय पर बुनियादी ढाँचे के कुछ तत्व स्पष्ट किए हैं, पर उसने कोई निश्चित, पूरी और अंतिम सूची तैयार नहीं की है कि क्या-क्या बुनियादी ढाँचे में शामिल है और क्या नहीं।
7 2000-2003 के संशोधनों से निष्कर्ष
प्र. सन् 2000-2003 के बीच संविधान में अनेक संशोधन किए गए। इस जानकारी के आधार पर आप निम्नलिखित में से कौन-सा निष्कर्ष निकालेंगे?
(क) इस काल के दौरान किए गए संशोधनों में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
(ख) इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था।
(ग) कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था।
(घ) इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं रह गया था।
(ङ) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।
उत्तर: (ङ) सबसे सही निष्कर्ष है। 2001-2003 का दौर गठबंधन राजनीति और भाजपा-विरोधी दलों के बीच कटु प्रतिद्वंद्विता का दौर था, फिर भी इस दौरान दस संशोधन हुए, इसलिए यह मानना उचित है कि ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे और अलग-अलग दलों के बीच इन विषयों पर पहले से सहमति बन चुकी थी।
(ख) ग़लत है, यह दौर गठबंधन राजनीति का था, किसी एक दल के पास विशेष बहुमत नहीं था, फिर भी संशोधन हुए, यही दिखाता है कि संशोधन सिर्फ़ किसी एक दल के बहुमत पर निर्भर नहीं करते।
(घ) ग़लत है, इस दौर में दलों के बीच वास्तविक और कड़वे मतभेद थे (जैसे भाजपा-विरोधी दलों की तीखी प्रतिद्वंद्विता), फिर भी कुछ विषयों पर सहमति बन पाई।
(क) और (ग) के बारे में किताब में सीधा प्रमाण नहीं दिया गया, इसलिए ये अटकल भर हैं।
8 विशेष बहुमत की ज़रूरत क्यों
प्र. संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता क्यों पड़ती है? व्याख्या करें।
उत्तर:
1. संविधान सामान्य क़ानून से ऊँचा दर्जा रखता है, इसलिए इसे सामान्य क़ानून जितनी आसानी से नहीं बदला जा सकता, अन्यथा यह अपनी स्थिरता और गरिमा खो देगा।
2. विशेष बहुमत की शर्त (कुल सदस्यों का आधा + मतदान करने वालों का दो-तिहाई) यह सुनिश्चित करती है कि संशोधन के पीछे सिर्फ़ सत्ताधारी दल का समर्थन नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति हो।
3. इससे सत्ताधारी दल कमज़ोर बहुमत के बावजूद मनमाने ढंग से संविधान नहीं बदल सकता, उसे कम से कम कुछ विपक्षी दलों को भी साथ लेना पड़ता है।
4. यह प्रक्रिया संसदीय संप्रभुता को भी बनाए रखती है, यानी अंतिम फ़ैसला जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में ही रहता है, पर इतनी सावधानी से कि यह फ़ैसला मनमाना न हो।
9 भिन्न व्याख्याओं से जन्मे संशोधन
प्र. भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं का परिणाम रहे हैं। उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
1. जब संसद और न्यायपालिका के बीच संविधान की व्याख्या को लेकर टकराव होता है, तो संसद अपनी व्याख्या को प्रामाणिक बनाने के लिए संशोधन का सहारा लेती है, यह ख़ासकर 1970-1975 के दौर में हुआ।
2. तीन प्रमुख उदाहरण: मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच के रिश्ते को लेकर मतभेद, निजी संपत्ति के अधिकार के दायरे को लेकर मतभेद, और संसद की संविधान-संशोधन शक्ति की सीमा को लेकर मतभेद।
3. सबसे बड़ा उदाहरण केशवानंद भारती मामला (1973) है, जहाँ न्यायपालिका ने मूल संरचना का सिद्धांत देकर संसद की संशोधन-शक्ति की सीमा तय की, इसके जवाब में 42वें संशोधन (1976) ने संसदीय सर्वोच्चता स्थापित करने की कोशिश की।
4. मिनर्वा मिल मामले (1980) में न्यायपालिका ने अपना पुराना रुख़ दोहराया, यह दिखाता है कि यह टकराव सिर्फ़ एक बार का नहीं, बल्कि बार-बार होने वाला संवाद था, जिसने अंततः संविधान की व्याख्या को आकार दिया।
10 क्या न्यायपालिका को संशोधन की वैधता तय करनी चाहिए?
प्र. अगर संशोधन की शक्ति जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है तो न्यायपालिका को संशोधन की वैधता पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। क्या आप इस बात से सहमत हैं? 100 शब्दों में व्याख्या करें।
उत्तर:
मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ। यह सच है कि संशोधन की शक्ति निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास है, और यही संसदीय संप्रभुता का आधार भी है। लेकिन संविधान सिर्फ़ बहुमत की इच्छा का दस्तावेज़ नहीं, यह मौलिक अधिकारों और लोकतंत्र की बुनियादी शर्तों की भी रक्षा करता है। अगर न्यायपालिका के पास संशोधन की वैधता जाँचने का अधिकार न हो, तो कोई भी सत्ताधारी दल अपने बहुमत के बल पर संविधान की मूल भावना को ही बदल सकता है, जैसा 42वें संशोधन के समय होते-होते रह गया। मूल संरचना का सिद्धांत इसी ख़तरे से बचाव करता है: संसद संशोधन कर सकती है, पर मूल संरचना का उल्लंघन नहीं। यह संतुलन ही लोकतंत्र को सत्ता के मनमाने दुरुपयोग से सुरक्षित रखता है।
11 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
अध्याय अपने तीन “कहाँ पहुँचे? क्या समझे?” बॉक्सों, “खुद करें — खुद सीखें”, पाठ और हाशिये में भी प्रश्न पूछता है। इनके उत्तर उसी क्रम में दिए गए हैं जिसमें ये किताब में छपे हैं।
प्र. अमेरिका का संविधान 200 वर्ष पहले अस्तित्व में आया था। तब से लेकर आज तक उसमें केवल 27 संशोधन किए गए हैं। है न दिलचस्प बात!
उत्तर: हाँ, पर तुलना सावधानी से करनी चाहिए। अमेरिका का संविधान छोटा है और उसमें संशोधन करना बहुत कठिन है, इसलिए वहाँ बहुत-से बदलाव औपचारिक संशोधन के बजाय व्याख्या के ज़रिए आए। भारतीय संविधान कहीं अधिक विस्तृत है, और इसके कई संशोधन तकनीकी हैं (जैसे हर दस वर्ष बाद आरक्षित सीटों की अवधि बढ़ाना) या दलों की आम सहमति से हुए हैं। इसलिए केवल संशोधनों की संख्या से यह तय नहीं होता कि संविधान कमज़ोर है या मज़बूत; असली बात बदलावों की विषय-वस्तु है।
प्र. कक्षा के अनेक छात्रों को उपरोक्त खंड स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आया। छात्रों ने निम्नलिखित बातें कही। इस बारे में आपकी राय क्या है?
(i) संविधान किसी भी अन्य कानून की तरह ही होता है। उससे हमें सरकार के कामकाज के पीछे काम करने वाले नियमों और कानूनों के विषय में जानकारी मिलती है।
(ii) संविधान जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होता है। अतः संविधान में एक ऐसा उपबंध किया जाना चाहिए ताकि उसे 10 या 15 वर्षों के बाद बदला जा सके।
(iii) संविधान किसी देश के दर्शन को बयान करता है। उसे कभी नहीं बदला जा सकता।
(iv) संविधान एक पावन दस्तावेज़ होता है इसलिए इसे बदलने की बात करना लोकतंत्र का विरोध करना है।
उत्तर:
(i) सही नहीं। संविधान निर्माताओं ने संविधान को सामान्य कानून से ऊँचा दर्जा दिया; यह समाज को लोकतांत्रिक ढंग से चलाने का ढाँचा है और समाज की इच्छाओं-आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है, इसे सामान्य कानून की तरह नहीं बदला जा सकता।
(ii) सही नहीं। संविधान जनता की इच्छा व्यक्त करता है, पर उसमें ज़रूरत पड़ने पर संशोधन होता है, तय अंतराल पर उसे नए सिरे से नहीं लिखा जाता; उसमें समकालीन तत्त्वों के साथ स्थायी महत्त्व के तत्त्व भी होते हैं।
(iii) आंशिक रूप से सही। संविधान देश के दर्शन को व्यक्त करता है, पर वह अपरिवर्तनीय नहीं है: उसमें 106 संशोधन हो चुके हैं। केवल उसकी बुनियादी संरचना में संशोधन नहीं हो सकता।
(iv) सही नहीं। हमारा संविधान दोनों बातों का मेल है: उसे पवित्र दस्तावेज़ भी माना गया और इतना लचीला भी बनाया गया कि समय की आवश्यकता के अनुरूप बदलाव हो सकें। निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा विशेष बहुमत से संशोधन करना स्वयं एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।
प्र. मुझे यह बात समझ नहीं आती कि कोई संविधान लचीला या कठोर कैसे होता है? क्या संविधान की कठोरता या उसका लचीलापन उस काल की राजनीति से तय नहीं होता?
उत्तर: जिस संविधान में आसानी से बदलाव हो सके उसे लचीला और जिसमें बदलाव बहुत कठिन हो उसे कठोर कहा जाता है। भारत में यह संविधान में लिखी प्रक्रिया से तय होता है: कुछ अनुच्छेद संसद साधारण कानून से बदल सकती है (लचीला), ज़्यादातर के लिए अनुच्छेद 368 के तहत विशेष बहुमत चाहिए, और कुछ के लिए आधे राज्यों का अनुमोदन भी (कठोर)। राजनीति यह ज़रूर प्रभावित करती है कि संशोधन कितनी बार हों, जैसा 1974-76 और 2001-03 में दिखा, पर कठोरता या लचीलेपन की मात्रा प्रक्रिया से तय होती है, किसी काल की राजनीति से नहीं।
प्र. अगर कुछ राज्य संविधान में संशोधन चाहते हैं तो क्या उनकी बात सुनी जाएगी? क्या ये राज्य अपनी तरफ़ से संशोधन का प्रस्ताव ला सकते हैं? मुझे लगता है कि यह राज्यों की तुलना में केंद्र को ज़्यादा शक्तियाँ देने का ही एक और उदाहरण है।
उत्तर: राज्य संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकते: संविधान संशोधन की प्रक्रिया संसद से ही शुरू होती है। पर इससे राज्यों की भूमिका ख़त्म नहीं होती। जो संशोधन राज्यों और केंद्र के बीच शक्तियों के बँटवारे या प्रतिनिधित्व से जुड़े हैं, उनके लागू होने से पहले आधे राज्यों की विधानपालिकाओं को उन्हें पारित करना होता है। इस तरह प्रक्रिया राज्यों को भागीदारी देती है और संघवाद की रक्षा करती है, भले ही प्रस्ताव लाने का अधिकार संसद के पास है।
प्र. कल्पना करें कि लोकसभा के 400 सदस्यों ने किसी विधेयक पर होने वाले मतदान में भाग लिया है। इस विधेयक को पारित करने के लिए कितने सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होगी?
उत्तर: कम से कम 273 सदस्यों का। संशोधन विधेयक को दो शर्तें एक साथ पूरी करनी होती हैं: (1) पक्ष में मत देने वाले सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम आधे हों: 545 का आधा, पूर्णांक में 273; (2) वे मतदान में भाग लेने वालों के दो तिहाई भी हों: 400 का दो तिहाई लगभग 267। दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए, इसलिए बड़ी संख्या, यानी 273, आवश्यक है।
प्र. विशेष बहुमत के इस झंझट से मैं उकता गया हूँ। इसके लिए हमेशा ही बड़ा भारी जोड़-घटाव करना पड़ता है। भई यह राजनीति है या गणित?
उत्तर: यह राजनीति है, जिसमें गणित को एक सुरक्षा-कवच की तरह इस्तेमाल किया गया है। विशेष बहुमत यह सुनिश्चित करता है कि संशोधन के पीछे राजनीतिक दलों और सांसदों की व्यापक भागीदारी हो: कम बहुमत वाला सत्तारूढ़ दल बजट या सामान्य विधेयक पारित करा सकता है, पर संविधान संशोधन के लिए उसे कुछ विपक्षी दलों को विश्वास में लेना पड़ता है। डॉ. अंबेडकर के अनुसार, जो असंतुष्ट लोग दो तिहाई बहुमत भी प्राप्त नहीं कर सकते, उनके असंतोष में जन साधारण उनका साथ दे रहा है, ऐसा नहीं समझा जा सकता।
प्र. भारतीय संविधान में निम्नलिखित संशोधन करने के लिए कौन-कौन-सी शर्तें पूरी की जानी चाहिए? उचित स्थान पर सही का निशान लगाएँ (विशेष बहुमत / राज्यों द्वारा अनुमोदन): नागरिकता संबंधी अनुच्छेद; धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार; केंद्र सूची में परिवर्तन; राज्य की सीमाओं में बदलाव; चुनाव आयोग से संबंधित उपबंध।
उत्तर:
नागरिकता संबंधी अनुच्छेद: विशेष बहुमत (राज्यों का अनुमोदन नहीं)।
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार: विशेष बहुमत (राज्यों का अनुमोदन नहीं)।
केंद्र सूची में परिवर्तन: विशेष बहुमत और राज्यों द्वारा अनुमोदन, क्योंकि यह केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के बँटवारे से जुड़ा है।
राज्य की सीमाओं में बदलाव: दोनों में से कोई नहीं; अनुच्छेद 3 के तहत संसद यह “विधि द्वारा”, यानी सामान्य कानून की तरह साधारण बहुमत से कर सकती है।
चुनाव आयोग से संबंधित उपबंध: विशेष बहुमत (राज्यों का अनुमोदन नहीं)।
प्र. हमारे संविधान में इतनी बार संशोधन क्यों किए गए? क्या हमारे समाज या हमारे संविधान में कुछ समस्या है?
उत्तर: नहीं। अध्याय बताता है कि संशोधन तीन श्रेणियों में आते हैं: (1) तकनीकी या प्रशासनिक संशोधन, जैसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 वर्ष करना (15वाँ संशोधन) या हर दस वर्ष बाद आरक्षित सीटों की अवधि बढ़ाना; (2) न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं से उपजे संशोधन, अधिकतर 1970-75 में; (3) राजनीतिक आम सहमति से हुए संशोधन, जैसे दल बदल विरोधी कानून (52वाँ), मताधिकार की आयु 21 से 18 वर्ष (61वाँ), और 73वाँ-74वाँ संशोधन। पहले दशक को छोड़कर हर दशक में, सत्ता में कोई भी दल रहा हो, संशोधन होते रहे, जिससे पता चलता है कि वे समय की ज़रूरतों के अनुसार किए गए।
प्र. मुझे बात अब भी समझ नहीं आ रही है। लिखित संविधान में अलग-अलग व्याख्याओं की क्या ज़रूरत है? क्या लोग संविधान में अपनी इच्छाओं को मूर्त होते देखना चाहते हैं?
उत्तर: लिखित पाठ को भी नई परिस्थितियों पर लागू करना पड़ता है, और “निजी संपत्ति का अधिकार” या “संशोधन का अधिकार” जैसे शब्दों के एक से अधिक अर्थ निकल सकते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में यह स्वाभाविक है कि अलग-अलग संस्थाएँ संविधान की, और विशेषकर अपनी शक्तियों के दायरे की, अलग-अलग व्याख्या करें। 1970-75 में संसद और न्यायपालिका के बीच मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक सिद्धांतों के संबंध, निजी संपत्ति के अधिकार के दायरे और संशोधन के अधिकार की सीमा पर मतभेद हुए; तब संसद ने अपनी व्याख्या को मान्य बनाने के लिए संशोधन किए। व्याख्या पाठ और उसकी मूल भावना का तर्कसंगत अर्थ निकालना है, मनचाहा अर्थ थोपना नहीं।
प्र. अच्छा! तो, सारा मामला राजनीति से जुड़ा है। क्या मैं यही बात नहीं कह रही थी कि संविधान और संशोधन के मसले कानून के बजाय राजनीति से ज़्यादा संबंधित हैं?
उत्तर: आंशिक रूप से सही। विवादास्पद 38वाँ, 39वाँ और 42वाँ संशोधन जून 1975 में घोषित आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए, जब विरोधी दलों के बहुत से सांसद जेल में थे, और 1977 के चुनाव के बाद नई सरकार ने 43वें, 44वें संशोधन से उनके अधिकांश परिवर्तन निरस्त कर दिए; यह साफ़ तौर पर राजनीति से जुड़ा है। पर कानून की भी भूमिका रही: संशोधनों को अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया माननी पड़ी, और न्यायपालिका ने तय किया कि कोई संशोधन बुनियादी संरचना का उल्लंघन नहीं कर सकता। राजनीति और कानून साथ-साथ काम करते हैं।
प्र. शिक्षा के अधिकार (RTE) और वस्तु एवं सेवा कर (GST) संबंधी संशोधनों को देखें। आप इनके महत्त्व के बारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर: शिक्षा का अधिकार: 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) ने अनुच्छेद 21क जोड़ा, जिससे 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मौलिक अधिकार बन गई; इसने माता-पिता का एक संबंधित मूल कर्तव्य भी जोड़ा। महत्त्व: शिक्षा ऐसा अधिकार बन गई जिसका नागरिक दावा कर सकते हैं, यह अवसर की समानता की ओर कदम है। वस्तु एवं सेवा कर: 101वें संविधान संशोधन अधिनियम (2016) ने केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष करों की जगह एक वस्तु एवं सेवा कर का रास्ता खोला और केंद्र तथा राज्यों की GST परिषद बनाई। महत्त्व: पूरे देश का एक बाज़ार, और सहकारी संघवाद का नया रूप, क्योंकि इसके लिए राज्यों का अनुमोदन ज़रूरी था।
प्र. अच्छा! तो आखिरी फ़ैसला न्यायपालिका के हाथ में होता है। क्या इसे भी न्यायिक सक्रियता कहा जा सकता है?
उत्तर: एक अर्थ में हाँ: संविधान में बुनियादी संरचना की अवधारणा का कोई उल्लेख नहीं मिलता; यह केशवानंद भारती मामले (1973) में न्यायिक व्याख्या से जन्मी, और इससे यह तय करने का अंतिम अधिकार न्यायपालिका को मिला कि कोई संशोधन बुनियादी संरचना का उल्लंघन करता है या नहीं। पर न्यायालय ने यह संविधान की मूल भावना की रक्षा के लिए किया, संसद की जगह लेने के लिए नहीं: इस सीमा के भीतर संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, और सभी संस्थाओं ने इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।
प्र. यह बात पूरी तरह गलत है। पहले तो आप कहते हैं कि संशोधन के लिए सहमति जरूरी है। लेकिन हम देखते हैं कि न्यायाधीश संविधान के समूचे अर्थ को ही बदल डालते हैं।
उत्तर: आलोचना में कुछ दम है: आरक्षण की आधी सीटों की सीमा, क्रीमी लेयर, और शिक्षा, जीवन, स्वतंत्रता तथा अल्पसंख्यक संस्थाओं के अधिकारों से जुड़े फ़ैसलों ने बिना औपचारिक संशोधन के संविधान में अनौपचारिक संशोधन किए हैं। पर ऐसे फ़ैसले संविधान के भीतर रहकर दिए जाते हैं और अन्य संस्थाएँ उन्हें स्वीकार करती हैं; न्यायपालिका उपबंधों की व्याख्या करती है, अपनी ओर से नए उपबंध नहीं लिखती। औपचारिक संशोधन और न्यायिक व्याख्या का यही मेल संविधान को जीवंत दस्तावेज़ बनाता है।
प्र. बताएँ कि निम्नलिखित वाक्य सही हैं या गलत?
(i) बुनियादी ढाँचे को लेकर दिए गए फ़ैसले के बाद, संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार नहीं रह गया है।
(ii) सर्वोच्च न्यायालय ने हमारे संविधान के बुनियादी तत्वों की एक सूची तैयार की है। इस सूची को बदला नहीं जा सकता।
(iii) न्यायालय को इस बात का फ़ैसला करने का अधिकार है कि किसी संशोधन से बुनियादी संरचना का उल्लंघन होता है या नहीं।
(iv) केशवानंद भारती मामले के बाद यह तय हो चुका है कि संसद संविधान में किस सीमा तक संशोधन कर सकती है। (किताब में ये कथन (क), (ख), (ग), (ग) के रूप में छपे हैं।)
उत्तर:
(i) गलत। इस फ़ैसले के बाद भी संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, बस कोई संशोधन बुनियादी संरचना का उल्लंघन नहीं कर सकता।
(ii) गलत। कोई तय सूची नहीं है; 1973 के बाद न्यायालयों ने कई मामलों में बुनियादी संरचना के तत्वों को निर्धारित करने का प्रयास किया है।
(iii) सही। किसी संशोधन से बुनियादी संरचना का उल्लंघन होता है या नहीं, इसका अंतिम फ़ैसला न्यायपालिका करती है।
(iv) सही। इस फ़ैसले ने संसद की संशोधन शक्ति की सीमा तय कर दी: कोई संशोधन बुनियादी संरचना का उल्लंघन नहीं कर सकता।
प्र. हाँ मैं समझ गई! यह कुछ सी-सॉ झूले की तरह है। क्या इसे रस्साकशी कहना ज़्यादा उचित होगा?
उत्तर: इसे ऐसा सी-सॉ कहना बेहतर है जिसका संतुलन बना रहना चाहिए। संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए उसे वरीयता प्राप्त है, पर उसकी सर्वोच्चता संविधान के ढाँचे के अंतर्गत ही है, क्योंकि संविधान ने सरकार के अन्य घटकों को भी शक्तियाँ दी हैं। प्रजातंत्र का अर्थ केवल वोट और जन प्रतिनिधि नहीं, बल्कि संस्थाओं के माध्यम से काम करना और मनमानी शक्ति पर अंकुश भी है; सभी संस्थाओं को जनता के प्रति उत्तरदायी रहकर एक-दूसरे के साथ मिलकर चलना चाहिए। यह रस्साकशी तभी बनती है जब कोई एक पक्ष हावी होना चाहे, जैसा 1970 के दशक के टकराव में हुआ।
प्र. बिल्कुल ठीक! अगर अधिकार न हों और चुनाव न कराए जाएँ तो संविधान का कोई खास मतलब नहीं रह जाता और अगर जनता खुशहाल न हो तो अधिकार और चुनाव बेमानी हो जाते हैं। क्या संविधान की मूल भावना का अर्थ यही है?
उत्तर: हाँ। केशवानंद मामले में न्यायालय ने संविधान के शब्दों के बजाय उसकी मूल भावना पर ध्यान दिया: बुनियादी संरचना वह है जिसके बिना संविधान की कल्पना ही नहीं की जा सकती, जैसे अधिकार और चुनाव। मूल भावना में वह साझा आदर्श भी शामिल है जो संविधान बनाते समय सामने था: व्यक्ति की गरिमा और आज़ादी, सामाजिक-आर्थिक समानता, जनता की खुशहाली और राष्ट्रीय एकता। अधिकार, चुनाव और खुशहाली, तीनों मिलकर यह भावना बनाते हैं।
प्र. हमें यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि कई बार राजनीतिज्ञ अपरिपक्वता का व्यवहार करते हैं। क्या ऐसे मामलों का जिक्र करना जरूरी है?
उत्तर: ऐसे उदाहरण रहे हैं, और अध्याय स्वयं कुछ का ज़िक्र करता है: आपातकाल के दौरान, जब विरोधी दलों के बहुत से सांसद जेल में थे, किए गए 38वें, 39वें और 42वें संशोधन, और केशवानंद फ़ैसले पर पुनर्विचार कराने के प्रयास। हर चूक गिनाना ज़रूरी नहीं; मुख्य बात यह है कि इनके बावजूद राजनीतिक दलों और नेताओं ने कुल मिलाकर परिपक्वता दिखाई: बुनियादी संरचना को स्वीकार किया, 43वें और 44वें संशोधन से संवैधानिक संतुलन लौटाया, और बाद के कई संशोधनों पर आम सहमति बनाई।