NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 9 «संविधान, एक जीवंत दस्तावेज़» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 संशोधन क्यों ज़रूरी है : सही वाक्य चुनें
प्र. निम्नलिखित में से कौन-सा वाक्य सही है? संविधान में समय-समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है क्योंकि…
(क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।
(ख) किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज़ कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता है।
(ग) हर पीढ़ी के पास अपनी पसंद का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए।
(घ) संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिंबित होना चाहिए।
उत्तर: (क) सही है। संविधान में संशोधन इसलिए ज़रूरी होता है क्योंकि समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, और संविधान को इन नई परिस्थितियों के अनुरूप ढलना पड़ता है। (ख) ग़लत है, क्योंकि संविधान का मूल ढाँचा और उसकी भावना अप्रासंगिक नहीं होती, सिर्फ़ कुछ प्रावधानों में बदलाव की ज़रूरत पड़ती है। (ग) ग़लत है, संविधान हर पीढ़ी की पसंद बदलने पर दुबारा नहीं लिखा जाता, बल्कि मौजूदा संविधान में ज़रूरी संशोधन किए जाते हैं। (घ) ग़लत है, संविधान किसी एक मौजूदा सरकार के राजनीतिक दर्शन का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि एक स्थायी ढाँचा है जो अलग-अलग विचारधारा वाली सरकारों के लिए भी काम करता है।
2 सही/ग़लत पहचानें
प्र. निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही/ग़लत का निशान लगाएँ।
(क) राष्ट्रपति किसी संशोधन विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।
(ख) संविधान में संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास ही होता है।
(ग) न्यायपालिका संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती परंतु उसे संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। व्याख्या के द्वारा वह संविधान को काफ़ी हद तक बदल सकती है।
(घ) संसद संविधान के किसी भी खंड में संशोधन कर सकती है।
उत्तर:
(क) सही। संशोधन विधेयक के मामले में राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की शक्ति नहीं है।
(ख) सही। संशोधन के प्रश्न पर अंतिम राय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों की ही होती है, यही संसदीय संप्रभुता का सिद्धांत है।
(ग) सही। न्यायपालिका औपचारिक रूप से संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती, पर मूल संरचना के सिद्धांत जैसी अपनी व्याख्याओं के ज़रिए उसने संविधान को व्यावहारिक रूप से काफ़ी हद तक बदला है।
(घ) ग़लत। संसद संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन नहीं कर सकती, वह मूल संरचना का उल्लंघन करने वाला कोई संशोधन नहीं कर सकती।
3 संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाने वाले
प्र. निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं? इस प्रक्रिया में ये कैसे शामिल होते हैं?
(क) मतदाता (ख) भारत का राष्ट्रपति (ग) राज्य की विधान सभाएँ (घ) संसद (ङ) राज्यपाल (च) न्यायपालिका
उत्तर:
(घ) संसद की भूमिका सबसे केंद्रीय है, सभी संशोधन सिर्फ़ संसद में ही शुरू होते हैं, और विशेष बहुमत से पारित होते हैं।
(ग) राज्य विधानसभाएँ संघीय ढाँचे या प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रावधानों में संशोधन के लिए भूमिका निभाती हैं, आधी राज्य विधानसभाओं का साधारण बहुमत से अनुमोदन ज़रूरी होता है।
(ख) राष्ट्रपति संशोधन विधेयक पर अनुमोदन देते हैं, पर उसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते, इसलिए उनकी भूमिका सीमित है।
(च) न्यायपालिका संशोधन का औपचारिक प्रस्ताव नहीं ला सकती, पर मूल संरचना के सिद्धांत के ज़रिए वह तय करती है कि कोई संशोधन वैध है या नहीं।
(क) मतदाता और (ङ) राज्यपाल की कोई सीधी भूमिका नहीं है, भारतीय संशोधन प्रक्रिया में मतदाताओं के लिए जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है, और राज्यपाल का संशोधन प्रक्रिया से सीधा कोई संवैधानिक संबंध नहीं है।
4 42वाँ संशोधन : विवाद के कारण
प्र. इस अध्याय में आपने पढ़ा कि संविधान का 42वाँ संशोधन अब तक का सबसे विवादास्पद संशोधन रहा है। इस विवाद के क्या कारण थे?
(क) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था, आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
(ख) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था।
(ग) इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था।
(घ) संशोधन के कुछ उपबंध विवादास्पद थे।
उत्तर: (क) और (घ) सही कारण हैं, (ख) और (ग) सही कारण नहीं हैं।
(क) सही है, 42वाँ संशोधन जून 1975 में लगे आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुआ, और आपातकाल की घोषणा ख़ुद विवादास्पद थी।
(घ) सही है, इस संशोधन ने लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया, न्यायपालिका की समीक्षा शक्तियों पर पाबंदी लगाई, और प्रस्तावना जैसे मूल भागों में बदलाव किया, ये उपबंध ख़ुद विवादास्पद थे।
(ख) ग़लत कारण है, 42वाँ संशोधन भी बाक़ी संशोधनों की तरह विशेष बहुमत से ही पारित हुआ था, इसका विवाद विशेष बहुमत की कमी से नहीं जुड़ा।
(ग) ग़लत कारण है। 42वें संशोधन ने सातवीं अनुसूची में भी बदलाव किया था, और सातवीं अनुसूची से जुड़े संशोधन उसी श्रेणी में आते हैं जिनके लिए आधे राज्यों की विधानपालिकाओं का अनुमोदन भी ज़रूरी होता है, इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि यहाँ अनुमोदन का कोई सवाल ही नहीं था। यह संशोधन संविधान में बताई गई प्रक्रिया का पालन करते हुए ही पारित हुआ। असल बात यह है कि इस संशोधन का विवाद प्रक्रिया को लेकर था ही नहीं: विवाद आपातकाल की उस पृष्ठभूमि को लेकर था जिसमें यह किया गया, और इसके उपबंधों की विषय-वस्तु को लेकर था।
5 विधायिका-न्यायपालिका टकराव की ग़लत व्याख्या
प्र. निम्नलिखित वाक्यों में कौन-सा वाक्य विभिन्न संशोधनों के संबंध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता?
(क) संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है।
(ख) खंडन-मंडन/बहस और मतभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं।
(ग) कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षाकृत ज़्यादा महत्त्व दिया गया है, कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्याख्या की गई है।
(घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।
(ङ) न्यायपालिका केवल किसी क़ानून की संवैधानिकता के बारे में फ़ैसला दे सकती है, वह ऐसे क़ानूनों की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।
उत्तर: (घ) सही व्याख्या नहीं करता। “नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती” एक अतिवादी कथन है, यह विधायिका की भूमिका को पूरी तरह ख़ारिज करता है, जबकि असली संबंध यह है कि विधायिका और न्यायपालिका दोनों मिलकर, संतुलन बनाकर, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। (क), (ख), (ग) और (ङ) सभी टकराव की सही व्याख्या करते हैं: संविधान की कई व्याख्याएँ संभव हैं, बहस-मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, कुछ प्रावधानों को विशेष बहुमत की ज़्यादा सुरक्षा मिली है, और न्यायपालिका सिर्फ़ संवैधानिकता तय करती है, राजनीतिक वांछनीयता पर फ़ैसला नहीं देती।
6 मूल संरचना का सिद्धांत : सही/ग़लत वाक्य
प्र. बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत के बारे में सही वाक्य को चिन्हित करें। ग़लत वाक्य को सही करें।
(क) संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है।
(ख) बुनियादी ढाँचे को छोड़कर विधायिका संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है।
(ग) न्यायपालिका ने संविधान के उन पहलुओं को स्पष्ट कर दिया है जिन्हें बुनियादी ढाँचे के अंतर्गत या उसके बाहर रखा जा सकता है।
(घ) यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया है।
(ङ) इस सिद्धांत से न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं, सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।
उत्तर:
(ख), (घ) और (ङ) सही हैं। विधायिका बुनियादी ढाँचे को छोड़कर संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है (ख); यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रतिपादित हुआ (घ); इससे न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं और सरकार-राजनीतिक दलों ने इसे स्वीकार कर लिया है (ङ)।
(क) ग़लत है, सही रूप: संविधान में बुनियादी मान्यताओं का कोई स्पष्ट खुलासा (उल्लेख) नहीं किया गया है, मूल संरचना का सिद्धांत संविधान के पाठ में कहीं नहीं लिखा, यह पूरी तरह न्यायिक व्याख्या से जन्मा है।
(ग) ग़लत है, सही रूप: न्यायपालिका ने अलग-अलग मामलों में समय-समय पर बुनियादी ढाँचे के कुछ तत्व स्पष्ट किए हैं, पर उसने कोई निश्चित, पूरी और अंतिम सूची तैयार नहीं की है कि क्या-क्या बुनियादी ढाँचे में शामिल है और क्या नहीं।
7 2000-2003 के संशोधनों से निष्कर्ष
प्र. सन् 2000-2003 के बीच संविधान में अनेक संशोधन किए गए। इस जानकारी के आधार पर आप निम्नलिखित में से कौन-सा निष्कर्ष निकालेंगे?
(क) इस काल के दौरान किए गए संशोधनों में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
(ख) इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था।
(ग) कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था।
(घ) इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं रह गया था।
(ङ) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।
उत्तर: (ङ) सबसे सही निष्कर्ष है। 2001-2003 का दौर गठबंधन राजनीति और भाजपा-विरोधी दलों के बीच कटु प्रतिद्वंद्विता का दौर था, फिर भी इस दौरान दस संशोधन हुए, इसलिए यह मानना उचित है कि ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे और अलग-अलग दलों के बीच इन विषयों पर पहले से सहमति बन चुकी थी।
(ख) ग़लत है, यह दौर गठबंधन राजनीति का था, किसी एक दल के पास विशेष बहुमत नहीं था, फिर भी संशोधन हुए, यही दिखाता है कि संशोधन सिर्फ़ किसी एक दल के बहुमत पर निर्भर नहीं करते।
(घ) ग़लत है, इस दौर में दलों के बीच वास्तविक और कड़वे मतभेद थे (जैसे भाजपा-विरोधी दलों की तीखी प्रतिद्वंद्विता), फिर भी कुछ विषयों पर सहमति बन पाई।
(क) और (ग) के बारे में किताब में सीधा प्रमाण नहीं दिया गया, इसलिए ये अटकल भर हैं।
8 विशेष बहुमत की ज़रूरत क्यों
प्र. संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता क्यों पड़ती है? व्याख्या करें।
उत्तर:
1. संविधान सामान्य क़ानून से ऊँचा दर्जा रखता है, इसलिए इसे सामान्य क़ानून जितनी आसानी से नहीं बदला जा सकता, अन्यथा यह अपनी स्थिरता और गरिमा खो देगा।
2. विशेष बहुमत की शर्त (कुल सदस्यों का आधा + मतदान करने वालों का दो-तिहाई) यह सुनिश्चित करती है कि संशोधन के पीछे सिर्फ़ सत्ताधारी दल का समर्थन नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति हो।
3. इससे सत्ताधारी दल कमज़ोर बहुमत के बावजूद मनमाने ढंग से संविधान नहीं बदल सकता, उसे कम से कम कुछ विपक्षी दलों को भी साथ लेना पड़ता है।
4. यह प्रक्रिया संसदीय सर्वोच्चता को भी बनाए रखती है, यानी अंतिम फ़ैसला जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में ही रहता है, पर इतनी सावधानी से कि यह फ़ैसला मनमाना न हो।
9 भिन्न व्याख्याओं से जन्मे संशोधन
प्र. भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं का परिणाम रहे हैं। उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
1. जब संसद और न्यायपालिका के बीच संविधान की व्याख्या को लेकर टकराव होता है, तो संसद अपनी व्याख्या को प्रामाणिक बनाने के लिए संशोधन का सहारा लेती है, यह ख़ासकर 1970-1975 के दौर में हुआ।
2. तीन प्रमुख उदाहरण: मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच के रिश्ते को लेकर मतभेद, निजी संपत्ति के अधिकार के दायरे को लेकर मतभेद, और संसद की संविधान-संशोधन शक्ति की सीमा को लेकर मतभेद।
3. सबसे बड़ा उदाहरण केशवानंद भारती मामला (1973) है, जहाँ न्यायपालिका ने मूल संरचना का सिद्धांत देकर संसद की संशोधन-शक्ति की सीमा तय की, इसके जवाब में 42वें संशोधन (1976) ने संसदीय सर्वोच्चता स्थापित करने की कोशिश की।
4. मिनर्वा मिल मामले (1980) में न्यायपालिका ने अपना पुराना रुख़ दोहराया, यह दिखाता है कि यह टकराव सिर्फ़ एक बार का नहीं, बल्कि बार-बार होने वाला संवाद था, जिसने अंततः संविधान की व्याख्या को आकार दिया।
10 क्या न्यायपालिका को संशोधन की वैधता तय करनी चाहिए?
प्र. अगर संशोधन की शक्ति जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है तो न्यायपालिका को संशोधन की वैधता पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। क्या आप इस बात से सहमत हैं? 100 शब्दों में व्याख्या करें।
उत्तर:
मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ। यह सच है कि संशोधन की शक्ति निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास है, और यही संसदीय संप्रभुता का आधार भी है। लेकिन संविधान सिर्फ़ बहुमत की इच्छा का दस्तावेज़ नहीं, यह मौलिक अधिकारों और लोकतंत्र की बुनियादी शर्तों की भी रक्षा करता है। अगर न्यायपालिका के पास संशोधन की वैधता जाँचने का अधिकार न हो, तो कोई भी सत्ताधारी दल अपने बहुमत के बल पर संविधान की मूल भावना को ही बदल सकता है, जैसा 42वें संशोधन के समय होते-होते रह गया। मूल संरचना का सिद्धांत इसी ख़तरे से बचाव करता है: संसद संशोधन कर सकती है, पर मूल संरचना का उल्लंघन नहीं। यह संतुलन ही लोकतंत्र को सत्ता के मनमाने दुरुपयोग से सुरक्षित रखता है।