1 संविधान के दर्शन का क्या आशय है?
कुछ लोग मानते हैं कि संविधान सिर्फ़ क़ानूनों से बनता है, और क़ानून तथा मूल्य-नैतिकता बिल्कुल अलग चीज़ें हैं, इसलिए संविधान के प्रति सिर्फ़ क़ानूनी नज़रिया अपनाया जा सकता है, राजनीतिक दर्शन का नहीं। यह सच है कि हर क़ानून में नैतिक तत्व नहीं होता, पर बहुत-से क़ानूनों का हमारे मूल्यों से गहरा संबंध होता है, जैसे भाषा या धर्म के आधार पर भेदभाव रोकने वाला क़ानून समानता के मूल्य से जुड़ा है। इसलिए क़ानून और नैतिक मूल्यों के बीच गहरा संबंध है, और संविधान को एक ऐसे दस्तावेज़ के रूप में देखना ज़रूरी है जिसके पीछे एक नैतिक दृष्टि काम कर रही है।
1. संविधान में इस्तेमाल हुए “अधिकार”, “नागरिकता”, “अल्पसंख्यक” या “लोकतंत्र” जैसे पदों के संभावित अर्थ समझना।
2. संविधान की बुनियादी अवधारणाओं की अपनी व्याख्या से मेल खाती एक साफ़ तस्वीर बनाना।
3. भारतीय संविधान को संविधान सभा की बहसों के साथ जोड़कर पढ़ना, ताकि सैद्धांतिक रूप से बताया जा सके कि इसके आदर्श कहाँ तक और क्यों सही हैं।
1947 के जापानी संविधान को बोलचाल में “शांति संविधान” कहा जाता है। इसकी प्रस्तावना में कहा गया है: “हम, जापान के लोग हमेशा के लिए शांति की कामना करते हैं और हम लोग मानवीय रिश्तों का नियंत्रण करने वाले उच्च आदर्शों के प्रति सचेत हैं।” जापान के संविधान के अनुच्छेद 9 में कहा गया है: “(1) न्याय और सुसंगत व्यवस्था पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय शांति की ईमानदारी से कामना करते हुए जापान के लोग राष्ट्र के संप्रभु अधिकार के रूप में प्रतिष्ठित युद्ध और अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए धमकी अथवा बल प्रयोग से सदा-सर्वदा के लिए दूर रहेंगे। (2) उपर्युक्त अनुच्छेद के लक्ष्यों को पूरा करने की बात ध्यान में रखते हुए ज़मीनी-सेना, नौ-सेना और वायुसेना तथा युद्ध के अन्य साजो-सामान कभी भी नहीं रखे जाएँगे।” इससे पता चलता है कि संविधान बनने के समय की परिस्थितियाँ किस तरह संविधान-निर्माताओं की सोच पर छाई रहती हैं।
2 संविधान : लोकतांत्रिक बदलाव का साधन
संविधान अपनाने का एक बड़ा कारण है सत्ता को निरंकुश होने से रोकना, क्योंकि आधुनिक राज्य बल-प्रयोग और दंड-शक्ति पर एकाधिकार रखते हैं, और यह शक्ति ग़लत हाथों में पड़ने पर हमारे ही ख़िलाफ़ जा सकती है। संविधान ये बुनियादी नियम देकर राज्य को निरंकुश बनने से रोकता है, और गहरे सामाजिक बदलाव के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक साधन भी देता है। एक औपनिवेशिक ग़ुलामी झेल चुकी जनता के लिए संविधान राजनीतिक आत्मनिर्णय का पहला वास्तविक अनुभव भी है।
पहला, संविधान सभा की माँग पूर्ण आत्मनिर्णय की सामूहिक माँग का ही प्रतिरूप थी, क्योंकि सिर्फ़ भारतीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से बनी संविधान सभा को ही बग़ैर बाहरी हस्तक्षेप के भारतीय संविधान बनाने का अधिकार था। दूसरा, संविधान सभा सिर्फ़ जन-प्रतिनिधियों या योग्य वकीलों का जमावड़ा भर नहीं, बल्कि “राह पर चल पड़ा एक राष्ट्र है जो अपने अतीत के राजनीतिक और सामाजिक ढाँचे के खोल से निकलकर अपने बनाए नए आवरण को पहनने की तैयारी कर रहा है।”
इस नज़रिये में संवैधानिक लोकतंत्र के सिद्धांत को पूरी तरह बदल देने की क्षमता है: संविधान सिर्फ़ सत्तासीन लोगों की शक्ति पर अंकुश नहीं लगाता, बल्कि परंपरागत रूप से सत्ता से दूर रहे लोगों का सशक्तिकरण भी करता है, उन्हें अपना हक़ सामुदायिक रूप में हासिल करने की ताक़त देता है।
2.1 संविधान सभा की ओर मुड़कर क्यों देखें?
अमेरिका का संविधान 18वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखा गया, उस युग के मूल्यों को 21वीं सदी में लागू करना बेतुका होगा। पर भारत में स्थिति अलग है: संविधान-निर्माताओं के समय की स्थिति और आज की स्थिति में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया, मूल्यों-आदर्शों के लिहाज़ से हम संविधान सभा की सोच और समय से अलग नहीं हो पाए। इसलिए हमारे संविधान का इतिहास अब भी हमारे वर्तमान का इतिहास है।
3 हमारे संविधान का राजनीतिक दर्शन क्या है?
इस दर्शन को एक शब्द में बताना कठिन है, हमारा संविधान किसी एक शीर्षक में अँटने से इनकार करता है, क्योंकि यह उदारवादी, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, संघवादी, सामुदायिक जीवन-मूल्यों का हामी, धार्मिक-भाषाई अल्पसंख्यकों और ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील, और एक सर्वसामान्य राष्ट्रीय पहचान बनाने को प्रतिबद्ध संविधान है। संक्षेप में यह स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय तथा किसी न किसी क़िस्म की राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिबद्ध है, और इस दर्शन पर शांतिपूर्ण तथा लोकतांत्रिक तरीक़े से अमल पर ज़ोर देता है।
4 व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय
संविधान की व्यक्ति-स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि क़रीब एक सदी तक चली बौद्धिक-राजनीतिक गतिविधि से आई। 19वीं सदी की शुरुआत में ही राममोहन राय ने अंग्रेज़ी सरकार द्वारा प्रेस की आज़ादी पर लगाई जा रही रोक का विरोध किया, उनका तर्क था कि व्यक्ति की ज़रूरतों का ख़याल रखने वाले राज्य को प्रकाशन की असीमित आज़ादी देनी चाहिए। इसी तरह कुख्यात रौलेट एक्ट ने मनमानी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ आज़ादी छीनने की कोशिश की, जिसके ख़िलाफ़ राष्ट्रीय आंदोलन ने ज़ोरदार लड़ाई लड़ी। संविधान अंगीकार करने से 40 साल पहले तक भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हर प्रस्ताव-योजना-विधेयक-रिपोर्ट में व्यक्ति की स्वतंत्रता को एक ग़ैर-समझौता योग्य मूल्य माना जाता था।
निम्नलिखित में से कौन-सा अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है, यह ख़ुद तय करने की कोशिश करें: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक-शैक्षिक अधिकार, सार्वजनिक स्थलों पर बराबरी की पहुँच। (संकेत: कुछ अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं, कुछ सामुदायिक/सामाजिक न्याय के दायरे में।)
भारतीय संविधान का उदारवाद पश्चिमी शास्त्रीय उदारवाद से दो मायनों में अलग है, पहला यह कि यह हमेशा सामाजिक न्याय से जुड़ा रहा है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण है अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण, क्योंकि संविधान-निर्माताओं का मानना था कि सिर्फ़ समानता का अधिकार देना इन वर्गों के साथ सदियों से हो रहे अन्याय को दूर करने के लिए काफ़ी नहीं, इसलिए विधायिका में सीटों के आरक्षण और सरकारी नौकरियों में आरक्षण जैसे विशेष उपाय किए गए।
पहली धारा की शुरुआत राममोहन राय से होती है, उन्होंने व्यक्ति के अधिकारों, ख़ासकर महिलाओं के अधिकार पर ज़ोर दिया। दूसरी धारा में स्वामी विवेकानंद, के. सी. सेन और जस्टिस रानाडे जैसे चिंतक शामिल हैं, इन्होंने पुरातनी हिंदू धर्म के दायरे में सामाजिक न्याय का जज़्बा जगाया, विवेकानंद के लिए हिंदू समाज की ऐसी पुनर्रचना उदारवादी सिद्धांतों के बग़ैर संभव न होती। (के. एम. पणिक्कर, इन डिफ़ेंस ऑव लिबरलिज़्म, बॉम्बे, एशिया पब्लिशिंग हाउस, 1962)
5 विविधता, अल्पसंख्यक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता
भारतीय संविधान समुदायों के बीच बराबरी को बढ़ावा देता है, जो आसान नहीं था: समुदाय अक्सर ऊँच-नीच के रिश्ते में होते हैं (जैसे जाति), और जब बराबर मानते भी हैं तो प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं (जैसे धार्मिक समुदाय)। समुदायों को मान्यता ही न देना आसान होता (जैसा ज़्यादातर पश्चिमी उदारवादी संविधानों में हुआ), पर भारत में यह कारगर या वांछनीय नहीं होता, क्योंकि भारत में अनेक सांस्कृतिक-भाषाई-धार्मिक समुदाय हैं और किसी एक का दूसरे पर प्रभुत्व न हो, यह सुनिश्चित करना ज़रूरी था। इसीलिए संविधान ने समुदाय-आधारित अधिकार दिए, जैसे धार्मिक समुदायों का अपनी शिक्षा-संस्था स्थापित करने और चलाने का अधिकार (जिसे सरकारी धन भी मिल सकता है), यह दिखाता है कि भारतीय संविधान धर्म को सिर्फ़ “निजी” मामला नहीं मानता।
5.1 धर्मनिरपेक्षता : सिद्धांतगत दूरी, पारस्परिक निषेध नहीं
धर्मनिरपेक्ष राज्य आमतौर पर धर्म को निजी मामला मानते हैं, और उसे सार्वजनिक/आधिकारिक मान्यता नहीं देते। तो क्या भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष नहीं है? नहीं, शुरुआत में “धर्मनिरपेक्ष” शब्द का ज़िक्र न होने के बावजूद भारतीय संविधान हमेशा धर्मनिरपेक्ष रहा है। पश्चिमी धारणा में धर्मनिरपेक्षता का मतलब है “पारस्परिक निषेध”, यानी धर्म और राज्य दोनों एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों से दूर रहें, ताकि व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा हो सके।
1. धार्मिक समूहों के अधिकार: व्यक्तियों के बीच बराबरी जितनी ही ज़रूरी समुदायों के बीच बराबरी भी है, क्योंकि व्यक्ति की स्वतंत्रता और आत्म-सम्मान सीधे उसके समुदाय की हैसियत पर निर्भर करता है, इसलिए भारतीय संविधान सभी धार्मिक समुदायों को शिक्षा-संस्था चलाने का अधिकार देता है, यहाँ धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब व्यक्ति और समुदाय दोनों की स्वतंत्रता है।
2. राज्य के हस्तक्षेप का अधिकार: भारत में अलगाव का मतलब पारस्परिक निषेध नहीं हो सकता, क्योंकि छुआछूत जैसे धर्म-स्वीकृत रिवाज इतने गहरे जड़ जमाए थे कि राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप के बिना इनका ख़ात्मा संभव न था। राज्य धार्मिक समुदायों की मदद भी कर सकता है (जैसे उनके शिक्षा-संस्थानों को धन देकर) और बाधा भी पहुँचा सकता है, यह इस पर निर्भर है कि किससे स्वतंत्रता-समता-सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलता है।
इसलिए भारत में धर्म और राज्य के अलगाव का मतलब है “सिद्धांतगत दूरी” (principled distance), पारस्परिक निषेध नहीं, यह एक जटिल विचार है जो राज्य को सभी धर्मों से दूरी रखने की छूट देता है, ताकि वह ज़रूरत के हिसाब से हस्तक्षेप कर सके या हस्तक्षेप से बचा रह सके।
6 सार्वभौम मताधिकार, संघवाद और राष्ट्रीय पहचान
सार्वभौम मताधिकार के प्रति प्रतिबद्धता ख़ुद में कम बड़ी उपलब्धि नहीं, ख़ासकर तब जब भारत में परंपरागत ऊँच-नीच को लगभग असंभव-सा मिटाना माना जाता था, और पश्चिम के स्थिर लोकतंत्रों में भी महिलाओं-मज़दूर वर्ग को वोट का अधिकार बहुत देर से मिला। “कंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया बिल” (1895), भारत के लिए संविधान बनाने की पहली ग़ैर-सरकारी कोशिश थी, जिसमें हर नागरिक को देश के मामलों में भाग लेने और सरकारी पद पाने का हक़ घोषित किया गया। मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट (1928) ने भी इसी नागरिकता-धारणा की पुष्टि करते हुए कहा कि 24 वर्ष की आयु के हर व्यक्ति (स्त्री हो या पुरुष) को लोकसभा के लिए मतदान का अधिकार होगा।
“सभा ने आम आदमी और लोकतांत्रिक नियमों की पूरी सफलता पर भरपूर भरोसा करते हुए तथा इस विश्वास के साथ वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाया है कि वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक शासन की यह शुरुआत, सबका भला करेगी।”
अलादि कृष्णस्वामी अय्यर, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड XI, पृष्ठ 835, 23 नवंबर 1949

6.1 संघवाद : असमतोल संघवाद
पूर्वोत्तर से जुड़े अनुच्छेद 371 को शामिल करके भारतीय संविधान ने “असमतोल संघवाद” की महत्वपूर्ण अवधारणा अपनाई। संविधान का झुकाव एक मज़बूत केंद्र सरकार की तरफ़ है, फिर भी भारतीय संघ की विभिन्न इकाइयों की क़ानूनी हैसियत में महत्वपूर्ण अंतर हैं, अमेरिकी संघवाद की समतोल बनावट के विपरीत। अनुच्छेद 371ए के तहत पूर्वोत्तर राज्य नगालैंड को विशेष दर्जा दिया गया, यह अनुच्छेद नगालैंड में पहले से लागू नियमों को मान्यता देता है और आप्रवास पर रोक लगाकर स्थानीय पहचान की रक्षा भी करता है। संविधान के अनुसार इस अंतर में कोई बुराई नहीं है। आज भारत एक बहु-भाषिक संघ है, हर बड़े भाषाई समूह को राजनीतिक मान्यता और बराबरी का दर्जा हासिल है, इस तरह भारत के लोकतांत्रिक-भाषाई संघवाद ने एकता और सांस्कृतिक पहचान के दावों को साथ जोड़ने में सफलता पाई है।
6.2 राष्ट्रीय पहचान : पृथक निर्वाचन-मंडल की अस्वीकृति
संविधान एक साझा राष्ट्रीय पहचान पर लगातार ज़ोर देता है, जो भाषा-धर्म आधारित अलग-अलग पहचानों से टकराती नहीं, संविधान इन दोनों में संतुलन बनाने की कोशिश करता है। फिर भी, कुछ ख़ास परिस्थितियों में राष्ट्रीय पहचान को वरीयता दी गई, जैसा धर्म के आधार पर पृथक निर्वाचन-मंडल की बहस में साफ़ हुआ, जिसे संविधान ने नकार दिया। यह अस्वीकृति इसलिए नहीं थी कि इससे धार्मिक समुदायों में भेद पैदा होता या राष्ट्रीय एकता को ख़तरा होता, बल्कि इसलिए थी कि इससे “राष्ट्रीय-जीवन की सहजता” को नुक़सान पहुँचता। हमारा संविधान थोपी हुई एकता की बजाय सच्ची भाईचारे की भावना विकसित करना चाहता था, जो डॉ. अंबेडकर को बेहद प्रिय लक्ष्य था।
“लेकिन आगे चलकर यह भूलना सबके हित में होगा कि इस देश में अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक जैसी कोई चीज़ है। भारत में सिर्फ़ एक समुदाय है…”
सरदार पटेल, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड VIII, पृष्ठ 272, 25 मई 1949
ऊपर बताई गई विशेषताएँ “आधारभूत महत्व की उपलब्धियाँ” हैं, इनके अलावा दो प्रक्रियागत उपलब्धियाँ भी हैं: (1) राजनीतिक विचार-विमर्श में विश्वास: संविधान सभा की बहसों से पता चलता है कि निर्माता ज़्यादा से ज़्यादा समावेशी होना चाहते थे, और असहमति-मतभेद को एक सकारात्मक मूल्य मानते थे। (2) समझौते और समायोजन की भावना: हर समझौता बुरा नहीं होता, अगर किसी मूल्य का थोड़ा हिस्सा बराबरी वालों के बीच खुली प्रक्रिया में दूसरे मूल्य के बदले दिया जाए, तो यह आपत्तिजनक नहीं, संविधान सभा ज़्यादातर अहम मुद्दों पर बहुमत की बजाय सर्वानुमति से फ़ैसला लेने पर अडिग थी।
7 आलोचनाएँ
“हम वीणा या सितार का संगीत सुनना चाहते थे लेकिन यहाँ तो अंग्रेज़ी बैंड बज रहा है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमारे संविधान निर्माता इसी रूप में शिक्षित हुए थे। यह ठीक वैसा ही संविधान है जैसा महात्मा गांधी नहीं चाहते थे और जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न था।”
के. हनुमन्थैया, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड XI, पृष्ठ 616-617, 17 नवंबर 1949
8 सीमाएँ और निष्कर्ष
ये सीमाएँ संविधान के दर्शन को ख़तरे में डालने जितनी गंभीर नहीं हैं।
संविधान को एक जीवंत दस्तावेज़ कहा जाता है, यानी यह किसी जीवित प्राणी की तरह बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलता और अनुभव से सीखता है; इस अध्याय में गिनाई गई केंद्रीय विशेषताएँ ही उसे यह दर्जा देती हैं। बहुत से लोगों के अनुसार इस दर्शन का सबसे अच्छा सार-संक्षेप संविधान की प्रस्तावना में मिलता है, जो एक विनम्र दावा करती है: यह संविधान महान व्यक्तियों के समूह द्वारा नहीं, बल्कि “हम भारत के लोग” द्वारा रचा और अंगीकृत हुआ। पचास से ज़्यादा साल बाद भी, अनेक मतभेदों के बावजूद, हर राजनेता और आम नागरिक अब भी उसी साझा दृष्टि में विश्वास रखता है: समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आधार पर साथ रहना और साथ समृद्ध होना। सन् 1950 में संविधान बनाना एक बड़ी उपलब्धि थी, आज इसके दार्शनिक दृष्टिकोण को जीवंत बनाए रखना हमारी बड़ी उपलब्धि होगी।
- राजनीतिक दर्शन के नज़रिये की तीन बातें: अवधारणाओं की व्याख्या, सुसंगत दृष्टि, CAD से जोड़कर पढ़ना
- पाँच केंद्रीय विशेषताएँ (यही संविधान की आधारभूत महत्व की उपलब्धियाँ हैं): उदारवादी व्यक्तिवाद (व्यक्ति की स्वतंत्रता), सामाजिक न्याय, समूहगत अधिकार (सांस्कृतिक विशिष्टता की अभिव्यक्ति का अधिकार), सार्वभौम मताधिकार, संघवाद
- दो प्रक्रियागत उपलब्धियाँ: राजनीतिक विचार-विमर्श में विश्वास, समझौते-समायोजन की भावना
- तीन आलोचनाएँ (अस्त-व्यस्त, अप्रतिनिधिक, विदेशी) बनाम तीन सीमाएँ (केंद्रीकृत एकता, लैंगिक-न्याय, सामाजिक-आर्थिक अधिकार), दो अलग समूह
- प्रस्तावना ही संविधान के दर्शन का सबसे अच्छा सार-संक्षेप है : “हम भारत के लोग”
- क्या मुझे “आवाज़” और “राय” वाला फ़र्क़ स्पष्ट रूप से याद है?
- क्या मुझे “सिद्धांतगत दूरी” और “पारस्परिक निषेध” के बीच का अंतर याद है?
- क्या मुझे पाँच केंद्रीय विशेषताएँ अलग-अलग गिना सकता हूँ?
- क्या मुझे तीन आलोचनाएँ और तीन सीमाएँ, दोनों अलग-अलग याद हैं?
- क्या मुझे पृथक निर्वाचन-मंडल अस्वीकार करने की असली वजह याद है?