NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 10 «संविधान का राजनीतिक दर्शन» की प्रश्नावली के ग्यारहों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अंत में अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों (“कहाँ पहुँचे? क्या समझे?”, “खुद करें — खुद सीखें”, “कार्टून बूझें” और हाशिये के प्रश्न) के उत्तर भी दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 क़ानूनों के पीछे छिपे मूल्य
प्र. नीचे कुछ क़ानून दिए गए हैं। क्या इनका संबंध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अंतर्निहित मूल्य क्या है? कारण बताएँ।
(क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की संपत्ति में हिस्सा होगा।
(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री-कर का सीमांकन अलग-अलग होगा।
(ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
(घ) “बेगार” अथवा बंधुआ मज़दूरी नहीं कराई जा सकती।
उत्तर:
(क) यह क़ानून लैंगिक समानता के मूल्य से जुड़ा है, यह सुनिश्चित करता है कि परिवार की संपत्ति में पुत्र और पुत्री को बराबर हक़ मिले, पुरुष-महिला भेद न हो।
(ख) यह क़ानून सीधे किसी नैतिक मूल्य से नहीं, बल्कि प्रशासनिक/आर्थिक नीति से जुड़ा है, हालाँकि परोक्ष रूप से यह “सामाजिक न्याय” से भी जुड़ सकता है (जैसे ज़रूरी वस्तुओं पर कम कर, विलासिता की वस्तुओं पर ज़्यादा)।
(ग) यह क़ानून धर्मनिरपेक्षता के मूल्य से जुड़ा है, यह सुनिश्चित करता है कि सरकारी शिक्षा-संस्थान किसी एक धर्म को बढ़ावा न दें, ताकि सभी धर्मों के छात्रों के साथ बराबरी का बर्ताव हो।
(घ) यह क़ानून मानवीय गरिमा और व्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्य से जुड़ा है, यह सुनिश्चित करता है कि किसी को भी उसकी इच्छा के विरुद्ध मज़दूरी करने को मजबूर न किया जाए।
2 लोकतांत्रिक देश को संविधान की ज़रूरत क्यों
प्र. नीचे कुछ विकल्प दिए जा रहे हैं। बताएँ कि इनमें किसका इस्तेमाल निम्नलिखित कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता? लोकतांत्रिक देश को संविधान की ज़रूरत…
(क) सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए होती है।
(ख) अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है।
(ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।
(घ) यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि क्षणिक आवेग में दूरगामी लक्ष्यों से विचलित न हो जाएँ।
(ङ) शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है।
उत्तर: (ग) का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। संविधान की ज़रूरत औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता “अर्जित” करने के लिए नहीं होती, क्योंकि स्वतंत्रता संघर्ष और राजनीतिक प्रक्रिया से हासिल होती है, संविधान तो स्वतंत्रता मिलने के बाद उसे संस्थागत रूप देने का साधन है। (क), (ख), (घ) और (ङ) सभी संविधान की असली ज़रूरतों को सही ढंग से बताते हैं: सत्ता पर अंकुश, अल्पसंख्यक-सुरक्षा, दीर्घकालीन दृष्टि की रक्षा, और शांतिपूर्ण सामाजिक बदलाव।
3 संविधान सभा की बहसें : प्रासंगिक हैं या नहीं
प्र. संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं। (अ) इनमें से कौन-सा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन-सा कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं? (ब) इनमें से किस पक्ष का आप समर्थन करेंगे और क्यों?
(क) आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती है, वह इन बहसों की क़ानूनी भाषा नहीं समझ सकती।
(ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक़्त की चुनौतियों से अलग हैं, संविधान-निर्माताओं के विचारों को पढ़ना और नए ज़माने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वर्तमान में खींच लाना है।
(ग) संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है, संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्वपूर्ण हैं। एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तर्कों को न जानना संवैधानिक-व्यवहारों को नष्ट कर सकता है।
उत्तर:
(अ) कथन (ग) यह दलील देता है कि बहसें आज भी प्रासंगिक हैं। कथन (ख) यह तर्क देता है कि बहसें प्रासंगिक नहीं हैं (कथन क सीधे प्रासंगिकता की बात नहीं करता, यह सिर्फ़ यह कहता है कि आम जनता के लिए यह भाषा कठिन है, जो एक अलग मुद्दा है)।
(ब) मैं कथन (ग) से सहमत हूँ, क्योंकि जैसा अध्याय में बताया गया है, भारत में संविधान-निर्माताओं के समय की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियाँ इतनी अलग नहीं हुई हैं जितनी अमेरिका जैसे देशों में हुई हैं। हमारे मूल्यों, आदर्शों और अवधारणाओं के लिहाज़ से हम अब भी संविधान सभा की सोच और समय से अलग नहीं हो पाए, इसलिए इन बहसों को समझना आज भी हमारी वर्तमान चुनौतियों को समझने में मदद करता है। कथन (ग) में अध्याय का दूसरा कारण भी है: हो सकता है कि हमारे क़ानूनी और राजनीतिक व्यवहारों के पीछे की असली बात हम भूल गए हों, क्योंकि हमने उन्हें स्वाभाविक मान लिया। जब तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहे, तब तक यह भूलना हानिकारक नहीं होता, लेकिन जब इन व्यवहारों को चुनौती मिले या ख़तरा मंडराए, तब इनके पीछे के तर्क न जानना इन्हें नष्ट कर सकता है, इसलिए संविधान सभा की बहसों की ओर बार-बार लौटना ज़रूरी है।
4 भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अंतर
प्र. निम्नलिखित प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अंतर स्पष्ट करें:
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ (ख) अनुच्छेद 371 (ग) सकारात्मक कार्य-योजना (घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार
उत्तर:
(क) धर्मनिरपेक्षता: पश्चिमी धारणा का मतलब है पारस्परिक निषेध, यानी धर्म और राज्य एक-दूसरे के मामलों से पूरी तरह दूर रहें। भारतीय धारणा का मतलब है सिद्धांतगत दूरी, यानी राज्य ज़रूरत पड़ने पर धर्म के मामलों में हस्तक्षेप भी कर सकता है (जैसे छुआछूत हटाने के लिए) और दूर भी रह सकता है।
(ख) अनुच्छेद 371: पश्चिमी संघवाद (जैसे अमेरिका) में सभी इकाइयों की क़ानूनी हैसियत बराबर होती है, यानी समतोल संघवाद। भारत में अनुच्छेद 371 और 371ए जैसे प्रावधानों से कुछ इकाइयों (जैसे नगालैंड) को विशेष दर्जा दिया गया है, यानी असमतोल संघवाद।
(ग) सकारात्मक कार्य-योजना: पश्चिम में (जैसे अमेरिका में) यह सन् 1964 के नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद शुरू हुई (इसी आंदोलन के फलस्वरूप 1964 में वहाँ नागरिक अधिकार अधिनियम बना)। भारत में यह संविधान में शुरू से ही, यानी लगभग दो दशक पहले, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के रूप में शामिल थी।
(घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार: पश्चिम के कई स्थिर लोकतंत्रों में भी महिलाओं और मज़दूर वर्ग को वोट का अधिकार बहुत देर से मिला। भारत ने शुरुआत से ही, संविधान बनते वक़्त, बिना किसी भेदभाव के सबको वोट का अधिकार दिया।
5 भारत में अपनाया गया धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत
प्र. निम्नलिखित में धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा सिद्धांत भारत के संविधान में अपनाया गया है?
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(ख) राज्य का धर्म से नज़दीकी रिश्ता है।
(ग) राज्य धर्मों के बीच भेदभाव कर सकता है।
(घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।
(ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।
उत्तर: (घ) और (ङ) भारत में अपनाए गए सिद्धांत हैं। (घ) सही है, भारतीय संविधान सभी धार्मिक समुदायों को शिक्षा-संस्था चलाने जैसे अधिकार देता है। (ङ) सही है, राज्य को धर्म के मामलों में सीमित पर वास्तविक हस्तक्षेप की शक्ति है, जैसे छुआछूत जैसी कुरीतियाँ हटाने के लिए। (क) ग़लत है, भारत में राज्य का धर्म से पूरी तरह “कोई लेना-देना नहीं” वाला रुख़ नहीं अपनाया गया। (ख) ग़लत है, राज्य किसी एक धर्म के साथ “नज़दीकी रिश्ता” नहीं रखता, यह धर्मनिरपेक्षता के ही ख़िलाफ़ होगा। (ग) ग़लत है, राज्य धर्मों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता।
6 कथनों का सुमेलन
प्र. निम्नलिखित कथनों को सुमेलित करें:
(क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बर्ताव की आलोचना की आज़ादी।
(ख) संविधान-सभा में फ़ैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना।
(ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्व को स्वीकार करना।
(घ) अनुच्छेद 371
(ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपत्ति में असमान अधिकार।
विकल्प: आधारभूत महत्व की उपलब्धि, प्रक्रियागत उपलब्धि, लैंगिक-न्याय की उपेक्षा, उदारवादी व्यक्तिवाद, धर्म-विशेष की ज़रूरतों के प्रति ध्यान देना।
उत्तर:
(क) → उदारवादी व्यक्तिवाद। किसी भी प्रथा (यहाँ विधवाओं के प्रति बर्ताव) की खुलकर आलोचना करने की आज़ादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (उदारवादी व्यक्तिवाद) का उदाहरण है।
(ख) → प्रक्रियागत उपलब्धि। स्वार्थ की बजाय तर्कबुद्धि से फ़ैसला लेना, राजनीतिक विचार-विमर्श में विश्वास नाम की प्रक्रियागत उपलब्धि है।
(ग) → आधारभूत महत्व की उपलब्धि। व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्व को स्वीकार करना समूहगत अधिकार (सांस्कृतिक विशिष्टता की अभिव्यक्ति का अधिकार) है, यानी अध्याय में पहले बताई गई तीन केंद्रीय विशेषताओं में तीसरी और कुल पाँच आधारभूत महत्व की उपलब्धियों में से एक।
(घ) → धर्म-विशेष की ज़रूरतों के प्रति ध्यान देना। अनुच्छेद 371 असमतोल संघवाद के ज़रिए किसी ख़ास क्षेत्र की विशेष ज़रूरतों का ध्यान रखने का उदाहरण है। (पाठ्यपुस्तक में यह विकल्प “धर्म-विशेष” छपा है, पर अंग्रेज़ी संस्करण में यहाँ “किसी ख़ास क्षेत्र की ज़रूरतों के प्रति ध्यान देना” है, और अनुच्छेद 371 का संबंध क्षेत्र से ही है, इसलिए उत्तर में “क्षेत्र-विशेष” समझें।)
(ङ) → लैंगिक-न्याय की उपेक्षा। महिलाओं-बच्चों को संपत्ति में असमान अधिकार संविधान की लैंगिक-न्याय संबंधी सीमा को दर्शाता है।
7 “उधार का दस्तावेज़” वाली बहस
प्र. यह चर्चा एक कक्षा में चल रही थी। विभिन्न तर्कों को पढ़ें और बताएँ कि आप इनमें किससे सहमत हैं और क्यों?
जयेश: मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेज़ है।
सबा: क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा कुछ है ही नहीं? क्या मूल्यों और विचारों पर हम “भारतीय” या “पश्चिमी” जैसा लेबल चिपका सकते हैं? महिलाओं-पुरुषों की समानता का ही मामला लो, इसमें “पश्चिमी” कहने जैसा क्या है? और अगर ऐसा है भी तो क्या हम इसे महज़ पश्चिमी होने के कारण ख़ारिज कर दें?
जयेश: मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय-शासन व्यवस्था नहीं अपनाई?
नेहा: तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे तो हम सिर्फ़ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ थे। अब इस बात का, शासन की जो व्यवस्था हम चाहते थे उसको अपनाने से कोई लेना-देना नहीं, चाहे यह जहाँ से भी आई हो।
(अंग्रेज़ी संस्करण में नेहा की पंक्ति यह है कि हम अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इसलिए नहीं थे कि वे अंग्रेज़ थे, बल्कि उपनिवेशवाद के सिद्धांत के ख़िलाफ़ थे। दोनों पंक्तियों से यही निष्कर्ष निकलता है कि आज़ादी की लड़ाई किसी शासन-व्यवस्था को अपनाने के विरुद्ध नहीं थी।)
उत्तर: मैं सबा और नेहा के तर्कों से सहमत हूँ। सबा सही कहती हैं कि किसी मूल्य या विचार पर “भारतीय” या “पश्चिमी” का लेबल लगाना ही ग़लत है, अच्छे विचार (जैसे स्त्री-पुरुष समानता) सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज नहीं किए जा सकते कि वे कहीं और से आए। नेहा भी सही कहती हैं कि आज़ादी की लड़ाई अंग्रेज़ों के शासन (यानी बाहरी सत्ता द्वारा शासन) के ख़िलाफ़ थी, न कि किसी ख़ास प्रकार की शासन-व्यवस्था के ख़िलाफ़, इसलिए संसदीय व्यवस्था अपनाना “उधार” या “ग़ुलामी” का प्रतीक नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर लिया गया फ़ैसला था। जयेश की बात इसलिए कमज़ोर है क्योंकि वह सिर्फ़ किसी विचार की “उत्पत्ति” को देखता है, उसकी उपयोगिता या तर्कसंगतता को नहीं।
8 संविधान-निर्माण की अप्रतिनिधिक प्रक्रिया
प्र. ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर के कारण बताएँ।
उत्तर:
यह इसलिए कहा जाता है क्योंकि संविधान सभा का गठन उस समय हुआ जब सार्वभौम मताधिकार लागू नहीं था, और इसके ज़्यादातर सदस्य समाज के अगड़े तबकों से थे, यानी “आवाज़” के लिहाज़ से यह अप्रतिनिधिक थी। पर इससे संविधान पूरी तरह प्रतिनिध्यात्मक-हीन नहीं हो जाता, क्योंकि प्रतिनिधित्व का एक दूसरा पहलू भी है, “राय”। संविधान सभा की बहसों को पढ़ने से पता चलता है कि उसमें बहुत व्यापक दायरे के मुद्दे और राय उठाए गए, सदस्यों ने सिर्फ़ अपने व्यक्तिगत सरोकार नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न तबकों के हित भी उठाए। इसीलिए हर छोटे शहर में अंबेडकर की मूर्ति मिलना महज़ प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि दलितों की इस भावना का इज़हार है कि संविधान उनकी आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। इसलिए “आवाज़” के लिहाज़ से भले ही कमी हो, “राय” के लिहाज़ से संविधान काफ़ी हद तक प्रतिनिधिमूलक है।
9 लैंगिक-न्याय की सीमा
प्र. भारतीय संविधान की एक सीमा यह है कि इसमें लैंगिक-न्याय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। आप इस आरोप की पुष्टि में कौन-से प्रमाण देंगे? यदि आज आप संविधान लिख रहे होते, तो इस कमी को दूर करने के लिए किन प्रावधानों की सिफ़ारिश करते?
उत्तर:
प्रमाण: संविधान परिवार के भीतर की असमानताओं, जैसे संपत्ति में महिलाओं और बच्चों के असमान अधिकार, वैवाहिक क़ानूनों में लैंगिक भेदभाव, और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर ज़्यादा स्पष्ट प्रावधान नहीं करता। ये मामले काफ़ी हद तक व्यक्तिगत क़ानूनों (पर्सनल लॉ) पर छोड़ दिए गए, जिनमें अक्सर लैंगिक असमानता बनी रहती है।
सुझाव: अगर आज संविधान लिखा जा रहा होता, तो परिवार-संबंधी संपत्ति और विरासत में स्त्री-पुरुष को स्पष्ट रूप से बराबर अधिकार देने वाला एक समान प्रावधान, घरेलू हिंसा से सुरक्षा को मौलिक अधिकार का हिस्सा बनाना, और सभी धर्मों के व्यक्तिगत क़ानूनों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने वाला एक संवैधानिक निर्देश शामिल किया जा सकता था।
10 सामाजिक-आर्थिक अधिकार : मौलिक या नीति निर्देशक?
प्र. क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि “एक ग़रीब और विकासशील देश में कुछ एक बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों की केंद्रीय विशेषता के रूप में दर्ज करने के बजाय राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों वाले खंड में क्यों रख दिए गए, यह स्पष्ट नहीं है”? आपके जानते सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्व वाले खंड में रखने के क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर:
मैं आंशिक रूप से सहमत हूँ, यह वाक़ई एक वैध सवाल है। संभावित कारण ये हो सकते हैं: (1) उस समय भारत की आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर थी, तुरंत सभी सामाजिक-आर्थिक अधिकार (जैसे रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य की गारंटी) को मौलिक अधिकार बनाकर लागू करना व्यावहारिक रूप से असंभव होता। (2) मौलिक अधिकार अदालत में लागू करवाए जा सकते हैं, अगर ये अधिकार मौलिक बनते और राज्य इन्हें तुरंत पूरा न कर पाता, तो अदालतें बार-बार सरकार को असफल घोषित करतीं, जिससे संविधान की साख को नुक़सान होता। (3) नीति-निर्देशक तत्वों के रूप में रखकर, इन्हें एक दीर्घकालीन लक्ष्य के रूप में रखा गया, जिसे सरकारें धीरे-धीरे, संसाधनों के अनुसार पूरा कर सकें। फिर भी, यह तर्क पूरी तरह संतोषजनक नहीं है, क्योंकि शिक्षा जैसे कुछ अधिकार बाद में (86वें संशोधन से) मौलिक अधिकार बनाए भी गए, जो दिखाता है कि यह असंभव नहीं था।
11 संविधान दिवस
प्र. आपके विद्यालय ने 26 नवंबर को संविधान दिवस कैसे मनाया?
उत्तर: यह एक व्यक्तिगत/स्कूल-आधारित अनुभव पर आधारित प्रश्न है, जिसका उत्तर हर विद्यार्थी अपने स्कूल में हुई गतिविधियों (जैसे प्रस्तावना का सामूहिक वाचन, संविधान पर भाषण-प्रतियोगिता, निबंध लेखन, वाद-विवाद, या संविधान-निर्माताओं पर आधारित प्रदर्शनी) के आधार पर स्वयं लिखें।
12 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
अध्याय अपने “कहाँ पहुँचे? क्या समझे?” बॉक्स, “खुद करें — खुद सीखें”, “कार्टून बूझें” और हाशिये में भी प्रश्न पूछता है। इनके उत्तर उसी क्रम में दिए गए हैं जिसमें ये किताब में छपे हैं।
प्र. इसका मतलब यह माना जाए कि हर संविधान का एक दर्शन होता है या सिर्फ़ कुछ ही संविधानों में दर्शन होता है?
उत्तर: हर संविधान के पीछे कोई न कोई नैतिक दृष्टि होती है, क्योंकि कानूनों का संबंध मूल्यों से है: भेदभाव के ख़िलाफ़ कानून इसलिए है क्योंकि हम समानता को महत्त्व देते हैं। फ़र्क़ यह है कि कुछ संविधान अपना दर्शन साफ़-साफ़ कह देते हैं, जैसे जापान का 1947 का संविधान, जिसकी प्रस्तावना और अनुच्छेद 9 उसे शांति के आदर्श पर आधारित करते हैं, इसलिए वह “शांति संविधान” कहलाता है। दूसरे संविधानों में, जैसे भारत में, दर्शन को उनकी मुख्य अवधारणाओं और संविधान सभा की बहसों से समझना पड़ता है।
प्र. क्या हम यह कह सकते हैं कि संविधान सभा के सदस्य सामाजिक बदलाव के लिए आतुर थे? लेकिन, हम तो यह भी कहते हैं कि संविधान सभा में हर तरह के विचार रखे गए!
उत्तर: दोनों बातें साथ-साथ सच हो सकती हैं। सभा के रूप में, नेहरू के शब्दों में “राह पर चल पड़ा एक राष्ट्र”, संविधान सभा ने संविधान को परंपरागत ऊँच-नीच के बंधनों को तोड़ने और स्वतंत्रता, समता तथा न्याय के नये युग में प्रवेश के लिए बनाया। पर सदस्य इस पर एकमत नहीं थे कि बदलाव कितना और कितनी तेज़ी से हो; अलग-अलग विचार बहसों में रखे गए, और अंतिम पाठ में समझौते और सामंजस्य की भावना दिखती है। सामाजिक बदलाव की प्रतिबद्धता मोटी दिशा थी; विचारों की विविधता ने ब्योरे तय किए।
प्र. अध्याय दो और सात में दिए गए संविधान सभा की बहस के उद्धरणों को एक बार फिर पढ़ें। क्या आप मानते हैं कि इन अंशों में दिए गए तर्क आज के समय में प्रासंगिक हैं? क्यों?
उत्तर: अध्याय दो (अधिकार): सोमनाथ लाहिड़ी ने आलोचना की थी कि लगभग प्रत्येक अनुच्छेद के बाद एक उपबंध है जो अधिकारों को पूरी तरह से वापस ले लेता है, और माँग की थी कि जनता जो भी अधिकार चाहती है वह संविधान में मिले; सरदार हुकुम सिंह ने बहुसंख्यकों से कहा था कि वे अल्पसंख्यकों की जगह खड़े होकर उनकी भाषा, लिपि और नौकरियों से जुड़ी आशंकाओं को समझें। ये तर्क आज भी प्रासंगिक हैं: अधिकारों पर लगने वाले “उचित प्रतिबंधों” की सीमा और अल्पसंख्यकों की भाषा व अवसरों की सुरक्षा पर बहस आज भी चलती है। अध्याय सात (संघवाद): टी.टी. कृष्णामाचारी ने कहा था कि सभी संविधानों में शक्तियों का प्रवाह केंद्र की ओर रहा है, क्योंकि राज्य पुलिस राज्य से लोक कल्याणकारी राज्य बन गए हैं और देश की आर्थिक खुशहाली का अंतिम उत्तरदायित्व केंद्र सरकार का हो गया है। यह आज के केंद्र-राज्य संबंधों, संसाधनों और करों के बँटवारे तथा राज्यों की अधिक स्वायत्तता की माँग से जुड़ी बहसों के लिए प्रासंगिक है।
प्र. यह कठिन है। हमें सीधे-सीधे क्यों नहीं बता दिया जाता कि इस संविधान का दर्शन क्या है? यदि यह दर्शन ऐसे छुपा रहेगा तो आम नागरिक इसे कैसे समझेगा?
उत्तर: इसे एक शब्द में बताना कठिन है, क्योंकि हमारा संविधान किसी एक शीर्षक में अँटने से इनकार करता है: यह उदारवादी, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, संघवादी, सामुदायिक जीवन-मूल्यों का हामी, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों तथा ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील और एक सर्व सामान्य राष्ट्रीय पहचान बनाने को प्रतिबद्ध है। पर यह छुपा हुआ नहीं है: बहुत से लोग इसका सबसे अच्छा सार प्रस्तावना में पाते हैं; संक्षेप में यह स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिबद्ध है, और इस पर शांतिपूर्ण तथा लोकतांत्रिक तरीक़े से अमल होना है।
प्र. शंकर का कार्टून (26 जनवरी 1950): “इस खेल के मैदान में हर विचार को दौड़ लगाने की छूट है लेकिन ‘अंपायर’ लोकतंत्र है।” यह संविधान के दर्शन के बारे में क्या कहता है?
उत्तर: यह कार्टून, जिस दिन संविधान लागू हुआ उसी दिन (26 जनवरी 1950) का है, और नए गणराज्य को ऐसे खेल के मैदान की तरह दिखाता है जिसमें हर विचार और विचारधारा को आगे बढ़ने की छूट है। किसी एक विचार को ज़बरदस्ती जीतने नहीं दिया जाता; लोकतंत्र अंपायर है जो नियम लागू करता है और विवाद सुलझाता है। यह अध्याय की इस बात से मेल खाता है कि संविधान का दर्शन कई मूल्यों को एक साथ समेटता है, और इन सबके नीचे ज़ोर इस बात पर है कि इस दर्शन पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीक़े से अमल हो।
प्र. बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सा अधिकार वैयक्तिक स्वतंत्रता का अंश है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; धर्म की स्वतंत्रता; अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार; सार्वजनिक स्थलों पर बराबरी की पहुँच।
उत्तर:
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: हाँ, वैयक्तिक स्वतंत्रता का अंश।
धर्म की स्वतंत्रता: हाँ, वैयक्तिक स्वतंत्रता का अंश (अंतःकरण की स्वतंत्रता)।
अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार: नहीं, यह समुदाय-आधारित अधिकार है, यानी धार्मिक और भाषाई समुदायों का अपनी शिक्षा संस्थाएँ स्थापित करने और चलाने का अधिकार।
सार्वजनिक स्थलों पर बराबरी की पहुँच: नहीं, यह समानता और सामाजिक न्याय के अधिकार से जुड़ा है (जैसे छुआछूत के आधार पर भेदभाव ख़त्म करना), वैयक्तिक स्वतंत्रता से नहीं।
प्र. क्या हमें राजनीतिक-सिद्धांत का पाठ्यक्रम पढ़ाने की शुरुआत हो गई है?
उत्तर: नहीं, यह अभी भी भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार का ही अध्याय है। यह सवाल उस जगह आता है जहाँ अध्याय धर्मनिरपेक्षता की मुख्यधारा की पश्चिमी धारणा, यानी धर्म और राज्य के पारस्परिक निषेध, को समझाते हुए कहता है: “इसके बारे में आप राजनीतिक सिद्धांत में विस्तार से पढ़ेंगे।” पारस्परिक निषेध का अर्थ है कि “धर्म और राज्य दोनों एक-दूसरे के अंदरूनी मामले से दूर रहेंगे”: राज्य न धर्म की मदद करे, न उसे बाधा पहुँचाए। यह विचार यहाँ थोड़े में सिर्फ़ इसलिए दिया गया है ताकि भारतीय संविधान का फ़र्क़ समझ आए: भारत में धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ पारस्परिक निषेध नहीं, बल्कि राज्य की धर्म से सिद्धांतगत दूरी है, जिसमें ज़रूरत पड़ने पर राज्य धर्म के मामलों में हस्तक्षेप भी कर सकता है। धर्मनिरपेक्षता का विस्तृत अध्ययन कक्षा 11 की दूसरी किताब राजनीतिक सिद्धांत के धर्मनिरपेक्षता वाले अध्याय में होगा।
प्र. मैं यह जानना चाहती हूँ कि आखिरकार, धर्म के मामलों का राज्य नियमन कर सकता है या नहीं? इसके बिना, कोई धार्मिक सुधार नहीं हो सकता।
उत्तर: हाँ, कर सकता है, पर सीमा के भीतर। भारत में धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ पारस्परिक-निषेध नहीं, बल्कि राज्य की धर्म से सिद्धांतगत दूरी है: राज्य सभी धर्मों से दूरी रखता है ताकि वह हस्तक्षेप भी कर सके और अलग भी रह सके, इस आधार पर कि किस कदम से स्वतंत्रता, समता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलता है। छुआछूत जैसे धर्म से अनुमोदित रिवाजों की पैठ इतनी गहरी थी कि राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप के बिना उनके ख़ात्मे की उम्मीद नहीं थी, इसलिए राज्य को धर्म के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा; वह धार्मिक समुदायों की मदद भी कर सकता है, जैसे उनके शिक्षा-संस्थानों को धन देकर। इसी से संविधान के तहत धार्मिक सुधार संभव होता है।
प्र. सचमुच यह गर्व की बात है कि ‘एक व्यक्ति – एक वोट’ का सिद्धांत लगभग बगैर किसी ना-नुकर के मान लिया गया। क्या यह बात सच नहीं कि बहुत से देशों में मताधिकार के लिए महिलाओं को संघर्ष करना पड़ा?
उत्तर: हाँ। अध्याय बताता है कि जब भारत ने सार्वभौम मताधिकार अपनाया, तब स्थिर पश्चिमी लोकतंत्रों में भी महिलाओं और मज़दूर वर्ग को मताधिकार हाल ही में, लंबे संघर्ष के बाद मिला था। भारत में यह विचार राष्ट्रवाद के केंद्र में था: कंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया बिल (1895) और मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट (1928), जिसमें कहा गया कि 24 वर्ष की आयु के हर व्यक्ति (स्त्री हो या पुरुष) को मतदान का अधिकार होगा (हिंदी पाठ्यपुस्तक में 24 वर्ष छपा है; अंग्रेज़ी संस्करण में और ऐतिहासिक रूप से यह आयु 21 वर्ष है), दिखाते हैं कि शुरुआती दौर से ही सार्वभौम मताधिकार को राष्ट्र की इच्छा व्यक्त करने का सबसे महत्त्वपूर्ण और वैधानिक साधन माना गया।
प्र. संस्थाओं की बनावट में समझौते की बात तो समझ में आती है लेकिन परस्पर विरोधी सिद्धांतों को एक में कैसे समेटा जा सकता है?
उत्तर: एक मूल्य को आंशिक रूप से दूसरे मूल्य के लिए छोड़कर, न कि किसी मूल्य को निजी स्वार्थ के लिए त्यागकर। अध्याय के अनुसार, अगर बराबरी वालों के बीच खुले विचार-विमर्श में एक मूल्य को थोड़ा-सा दूसरे मूल्य के लिए छोड़ा जाए, तो ऐसे समझौते पर आपत्ति नहीं की जा सकती; हर ज़रूरी चीज़ का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा पा लेना नैतिक रूप से ग़लत नहीं है। उदाहरण: आरक्षण से वैयक्तिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय में संतुलन; व्यक्तियों की समानता और धार्मिक समुदायों के अधिकारों में संतुलन; मज़बूत केंद्र और कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों में संतुलन।
प्र. बिलकुल! क्या पहले अध्याय में हमने यही बात नहीं सीखी कि समाज के हर तबके के पास संविधान को मानने का कोई वैध कारण होना चाहिए?
उत्तर: हाँ। संविधान तभी चलता है जब समाज के हर तबके के पास उसे मानने का कारण हो। इसीलिए अध्याय, संविधान के “गैर-नुमाइंदगी” वाले आरोप पर, बताता है कि संविधान सभा में बहुत-से मुद्दे उठाए गए और सदस्यों ने समाज के विभिन्न तबकों के सरोकारों और हितों पर आधारित मसले भी उठाए, और यह भी कि हर शहर के नुक्कड़ पर हाथ में संविधान लिए अंबेडकर की प्रतिमा दलितों की इस भावना का इज़हार करती है कि संविधान में उनकी अनेक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हुई है।
प्र. कोई भी दस्तावेज़ पूर्ण नहीं हो सकता और कोई भी आदर्श पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सकता। लेकिन, क्या इसका मतलब यह हुआ कि हम कोई आदर्श अपनाएँ ही नहीं? भविष्य का कोई सपना पालें ही नहीं? क्या मैं सही कह रही हूँ?
उत्तर: हाँ। संविधान की सीमाएँ हैं: राष्ट्रीय एकता की केंद्रीकृत धारणा, परिवार के भीतर लैंगिक न्याय की अनदेखी, और कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्त्वों में रखना। पर अध्याय कहता है कि ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं कि संविधान के दर्शन को ख़तरे में डाल दें। आदर्श और साझा दृष्टि दिशा देते हैं, भले वे पूरी तरह प्राप्त न हों: तमाम झगड़ों के बावजूद हर कोई संविधान के दर्शन में विश्वास करता है, हम सब साथ रहना चाहते हैं और समता, स्वतंत्रता तथा बंधुता की भावना के आधार पर समृद्धि चाहते हैं; इस दर्शन को जीवंत रखना ही हमारी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि होगी।