NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 10 «संविधान का राजनीतिक दर्शन» की प्रश्नावली के ग्यारहों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 क़ानूनों के पीछे छिपे मूल्य
प्र. नीचे कुछ क़ानून दिए गए हैं। क्या इनका संबंध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अंतर्निहित मूल्य क्या है? कारण बताएँ।
(क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की संपत्ति में हिस्सा होगा।
(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री-कर का दर अलग-अलग होगा।
(ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
(घ) “बेगार” अथवा बंधुआ मज़दूरी नहीं कराई जा सकती।
उत्तर:
(क) यह क़ानून लैंगिक समानता के मूल्य से जुड़ा है, यह सुनिश्चित करता है कि परिवार की संपत्ति में पुत्र और पुत्री को बराबर हक़ मिले, पुरुष-महिला भेद न हो।
(ख) यह क़ानून सीधे किसी नैतिक मूल्य से नहीं, बल्कि प्रशासनिक/आर्थिक नीति से जुड़ा है, हालाँकि परोक्ष रूप से यह “सामाजिक न्याय” से भी जुड़ सकता है (जैसे ज़रूरी वस्तुओं पर कम कर, विलासिता की वस्तुओं पर ज़्यादा)।
(ग) यह क़ानून धर्मनिरपेक्षता के मूल्य से जुड़ा है, यह सुनिश्चित करता है कि सरकारी शिक्षा-संस्थान किसी एक धर्म को बढ़ावा न दें, ताकि सभी धर्मों के छात्रों के साथ बराबरी का बर्ताव हो।
(घ) यह क़ानून मानवीय गरिमा और व्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्य से जुड़ा है, यह सुनिश्चित करता है कि किसी को भी उसकी इच्छा के विरुद्ध मज़दूरी करने को मजबूर न किया जाए।
2 लोकतांत्रिक देश को संविधान की ज़रूरत क्यों
प्र. नीचे कुछ विकल्प दिए जा रहे हैं। बताएँ कि इनमें किसका इस्तेमाल निम्नलिखित कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता? लोकतांत्रिक देश को संविधान की ज़रूरत…
(क) सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए होती है।
(ख) अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है।
(ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।
(घ) यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि क्षणिक आवेग में दूरगामी लक्ष्यों से विचलित न हो जाएँ।
(ङ) शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है।
उत्तर: (ग) का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। संविधान की ज़रूरत औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता “अर्जित” करने के लिए नहीं होती, क्योंकि स्वतंत्रता संघर्ष और राजनीतिक प्रक्रिया से हासिल होती है, संविधान तो स्वतंत्रता मिलने के बाद उसे संस्थागत रूप देने का साधन है। (क), (ख), (घ) और (ङ) सभी संविधान की असली ज़रूरतों को सही ढंग से बताते हैं: सत्ता पर अंकुश, अल्पसंख्यक-सुरक्षा, दीर्घकालीन दृष्टि की रक्षा, और शांतिपूर्ण सामाजिक बदलाव।
3 संविधान सभा की बहसें : प्रासंगिक हैं या नहीं
प्र. संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं। (अ) इनमें से कौन-सा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन-सा कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं? (ब) इनमें से किस पक्ष का आप समर्थन करेंगे और क्यों?
(क) आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती है, वह इन बहसों की क़ानूनी भाषा नहीं समझ सकती।
(ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक़्त की चुनौतियों से अलग हैं, संविधान-निर्माताओं के विचारों को पढ़ना और नए ज़माने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वर्तमान में खींच लाना है।
(ग) संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है, संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्वपूर्ण हैं।
उत्तर:
(अ) कथन (ग) यह दलील देता है कि बहसें आज भी प्रासंगिक हैं। कथन (ख) यह तर्क देता है कि बहसें प्रासंगिक नहीं हैं (कथन क सीधे प्रासंगिकता की बात नहीं करता, यह सिर्फ़ यह कहता है कि आम जनता के लिए यह भाषा कठिन है, जो एक अलग मुद्दा है)।
(ब) मैं कथन (ग) से सहमत हूँ, क्योंकि जैसा अध्याय में बताया गया है, भारत में संविधान-निर्माताओं के समय की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियाँ इतनी अलग नहीं हुई हैं जितनी अमेरिका जैसे देशों में हुई हैं। हमारे मूल्यों, आदर्शों और अवधारणाओं के लिहाज़ से हम अब भी संविधान सभा की सोच और समय से अलग नहीं हो पाए, इसलिए इन बहसों को समझना आज भी हमारी वर्तमान चुनौतियों को समझने में मदद करता है।
4 भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अंतर
प्र. निम्नलिखित प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अंतर स्पष्ट करें:
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ (ख) अनुच्छेद 371 (ग) सकारात्मक कार्य-योजना (घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार
उत्तर:
(क) धर्मनिरपेक्षता: पश्चिमी धारणा का मतलब है पारस्परिक निषेध, यानी धर्म और राज्य एक-दूसरे के मामलों से पूरी तरह दूर रहें। भारतीय धारणा का मतलब है सिद्धांतगत दूरी, यानी राज्य ज़रूरत पड़ने पर धर्म के मामलों में हस्तक्षेप भी कर सकता है (जैसे छुआछूत हटाने के लिए) और दूर भी रह सकता है।
(ख) अनुच्छेद 371: पश्चिमी संघवाद (जैसे अमेरिका) में सभी इकाइयों की क़ानूनी हैसियत बराबर होती है, यानी समतोल संघवाद। भारत में अनुच्छेद 371 और 371ए जैसे प्रावधानों से कुछ इकाइयों (जैसे नगालैंड) को विशेष दर्जा दिया गया है, यानी असमतोल संघवाद।
(ग) सकारात्मक कार्य-योजना: पश्चिम में (जैसे अमेरिका में) यह 1964 के नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद शुरू हुई। भारत में यह संविधान में शुरू से ही (लगभग दो दशक पहले) SC-ST आरक्षण के रूप में शामिल थी।
(घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार: पश्चिम के कई स्थिर लोकतंत्रों में भी महिलाओं और मज़दूर वर्ग को वोट का अधिकार बहुत देर से मिला। भारत ने शुरुआत से ही, संविधान बनते वक़्त, बिना किसी भेदभाव के सबको वोट का अधिकार दिया।
5 भारत में अपनाया गया धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत
प्र. निम्नलिखित में धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा सिद्धांत भारत के संविधान में अपनाया गया है?
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(ख) राज्य का धर्म से नज़दीकी रिश्ता है।
(ग) राज्य धर्मों के बीच भेदभाव कर सकता है।
(घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।
(ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।
उत्तर: (घ) और (ङ) भारत में अपनाए गए सिद्धांत हैं। (घ) सही है, भारतीय संविधान सभी धार्मिक समुदायों को शिक्षा-संस्था चलाने जैसे अधिकार देता है। (ङ) सही है, राज्य को धर्म के मामलों में सीमित पर वास्तविक हस्तक्षेप की शक्ति है, जैसे छुआछूत जैसी कुरीतियाँ हटाने के लिए। (क) ग़लत है, भारत में राज्य का धर्म से पूरी तरह “कोई लेना-देना नहीं” वाला रुख़ नहीं अपनाया गया। (ख) ग़लत है, राज्य किसी एक धर्म के साथ “नज़दीकी रिश्ता” नहीं रखता, यह धर्मनिरपेक्षता के ही ख़िलाफ़ होगा। (ग) ग़लत है, राज्य धर्मों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता।
6 कथनों का सुमेलन
प्र. निम्नलिखित कथनों को सुमेलित करें:
(क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बर्ताव की आलोचना की आज़ादी।
(ख) संविधान-सभा में फ़ैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना।
(ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्व को स्वीकार करना।
(घ) अनुच्छेद 371
(ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपत्ति में असमान अधिकार।
विकल्प: आधारभूत महत्व की उपलब्धि, प्रक्रियागत उपलब्धि, लैंगिक-न्याय की उपेक्षा, उदारवादी व्यक्तिवाद, धर्म-विशेष की ज़रूरतों के प्रति ध्यान देना।
उत्तर:
(क) → उदारवादी व्यक्तिवाद। किसी भी प्रथा (यहाँ विधवाओं के प्रति बर्ताव) की खुलकर आलोचना करने की आज़ादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (उदारवादी व्यक्तिवाद) का उदाहरण है।
(ख) → प्रक्रियागत उपलब्धि। स्वार्थ की बजाय तर्कबुद्धि से फ़ैसला लेना, राजनीतिक विचार-विमर्श में विश्वास नाम की प्रक्रियागत उपलब्धि है।
(ग) → आधारभूत महत्व की उपलब्धि। व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्व को स्वीकार करना समूहगत अधिकार (सांस्कृतिक विशिष्टता की अभिव्यक्ति का अधिकार) है, यानी अध्याय में पहले बताई गई तीन केंद्रीय विशेषताओं में तीसरी और कुल पाँच आधारभूत महत्व की उपलब्धियों में से एक।
(घ) → धर्म-विशेष की ज़रूरतों के प्रति ध्यान देना। अनुच्छेद 371 असमतोल संघवाद के ज़रिए किसी ख़ास क्षेत्र/समुदाय की विशेष ज़रूरतों का ध्यान रखने का उदाहरण है।
(ङ) → लैंगिक-न्याय की उपेक्षा। महिलाओं-बच्चों को संपत्ति में असमान अधिकार संविधान की लैंगिक-न्याय संबंधी सीमा को दर्शाता है।
7 “उधार का दस्तावेज़” वाली बहस
प्र. यह चर्चा एक कक्षा में चल रही थी। विभिन्न तर्कों को पढ़ें और बताएँ कि आप इनमें किससे सहमत हैं और क्यों?
जयेश: मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेज़ है।
सबा: क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा कुछ है ही नहीं? क्या मूल्यों और विचारों पर हम “भारतीय” या “पश्चिमी” जैसा लेबल चिपका सकते हैं? महिलाओं-पुरुषों की समानता का ही मामला लो, इसमें “पश्चिमी” कहने जैसा क्या है? और अगर ऐसा है भी तो क्या हम इसे महज़ पश्चिमी होने के कारण ख़ारिज कर दें?
जयेश: मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय-शासन व्यवस्था नहीं अपनाई?
नेहा: तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे तो हम सिर्फ़ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं थे, बल्कि उपनिवेशवाद के सिद्धांत के ख़िलाफ़ थे। इसका उस व्यवस्था को अपनाने से कोई लेना-देना नहीं जो हम चाहते थे, चाहे वह कहीं से भी आई हो।
उत्तर: मैं सबा और नेहा के तर्कों से सहमत हूँ। सबा सही कहती हैं कि किसी मूल्य या विचार पर “भारतीय” या “पश्चिमी” का लेबल लगाना ही ग़लत है, अच्छे विचार (जैसे स्त्री-पुरुष समानता) सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज नहीं किए जा सकते कि वे कहीं और से आए। नेहा भी सही कहती हैं कि आज़ादी की लड़ाई उपनिवेशवाद (यानी बाहरी सत्ता द्वारा शासन) के ख़िलाफ़ थी, न कि किसी ख़ास प्रकार की शासन-व्यवस्था के ख़िलाफ़, इसलिए संसदीय व्यवस्था अपनाना “उधार” या “ग़ुलामी” का प्रतीक नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर लिया गया फ़ैसला था। जयेश की बात इसलिए कमज़ोर है क्योंकि वह सिर्फ़ किसी विचार की “उत्पत्ति” को देखता है, उसकी उपयोगिता या तर्कसंगतता को नहीं।
8 संविधान-निर्माण की अप्रतिनिधिक प्रक्रिया
प्र. ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर के कारण बताएँ।
उत्तर:
यह इसलिए कहा जाता है क्योंकि संविधान सभा का गठन उस समय हुआ जब सार्वभौम मताधिकार लागू नहीं था, और इसके ज़्यादातर सदस्य समाज के अगड़े तबकों से थे, यानी “आवाज़” के लिहाज़ से यह अप्रतिनिधिक थी। पर इससे संविधान पूरी तरह प्रतिनिध्यात्मक-हीन नहीं हो जाता, क्योंकि प्रतिनिधित्व का एक दूसरा पहलू भी है, “राय”। संविधान सभा की बहसों को पढ़ने से पता चलता है कि उसमें बहुत व्यापक दायरे के मुद्दे और राय उठाए गए, सदस्यों ने सिर्फ़ अपने व्यक्तिगत सरोकार नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न तबकों के हित भी उठाए। इसीलिए हर छोटे शहर में अंबेडकर की मूर्ति मिलना महज़ प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि दलितों की इस भावना का इज़हार है कि संविधान उनकी आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। इसलिए “आवाज़” के लिहाज़ से भले ही कमी हो, “राय” के लिहाज़ से संविधान काफ़ी हद तक प्रतिनिधिमूलक है।
9 लैंगिक-न्याय की सीमा
प्र. भारतीय संविधान की एक सीमा यह है कि इसमें लैंगिक-न्याय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। आप इस आरोप की पुष्टि में कौन-से प्रमाण देंगे? यदि आज आप संविधान लिख रहे होते, तो इस कमी को दूर करने के लिए किन प्रावधानों की सिफ़ारिश करते?
उत्तर:
प्रमाण: संविधान परिवार के भीतर की असमानताओं, जैसे संपत्ति में महिलाओं और बच्चों के असमान अधिकार, वैवाहिक क़ानूनों में लैंगिक भेदभाव, और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर ज़्यादा स्पष्ट प्रावधान नहीं करता। ये मामले काफ़ी हद तक व्यक्तिगत क़ानूनों (पर्सनल लॉ) पर छोड़ दिए गए, जिनमें अक्सर लैंगिक असमानता बनी रहती है।
सुझाव: अगर आज संविधान लिखा जा रहा होता, तो परिवार-संबंधी संपत्ति और विरासत में स्त्री-पुरुष को स्पष्ट रूप से बराबर अधिकार देने वाला एक समान प्रावधान, घरेलू हिंसा से सुरक्षा को मौलिक अधिकार का हिस्सा बनाना, और सभी धर्मों के व्यक्तिगत क़ानूनों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने वाला एक संवैधानिक निर्देश शामिल किया जा सकता था।
10 सामाजिक-आर्थिक अधिकार : मौलिक या नीति निर्देशक?
प्र. क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि “एक ग़रीब और विकासशील देश में कुछ एक बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों की केंद्रीय विशेषता के रूप में दर्ज करने के बजाय राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों वाले खंड में क्यों रख दिए गए, यह स्पष्ट नहीं है”? आपके जानते सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्व वाले खंड में रखने के क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर:
मैं आंशिक रूप से सहमत हूँ, यह वाक़ई एक वैध सवाल है। संभावित कारण ये हो सकते हैं: (1) उस समय भारत की आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर थी, तुरंत सभी सामाजिक-आर्थिक अधिकार (जैसे रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य की गारंटी) को मौलिक अधिकार बनाकर लागू करना व्यावहारिक रूप से असंभव होता। (2) मौलिक अधिकार अदालत में लागू करवाए जा सकते हैं, अगर ये अधिकार मौलिक बनते और राज्य इन्हें तुरंत पूरा न कर पाता, तो अदालतें बार-बार सरकार को असफल घोषित करतीं, जिससे संविधान की साख को नुक़सान होता। (3) नीति-निर्देशक तत्वों के रूप में रखकर, इन्हें एक दीर्घकालीन लक्ष्य के रूप में रखा गया, जिसे सरकारें धीरे-धीरे, संसाधनों के अनुसार पूरा कर सकें। फिर भी, यह तर्क पूरी तरह संतोषजनक नहीं है, क्योंकि शिक्षा जैसे कुछ अधिकार बाद में (86वें संशोधन से) मौलिक अधिकार बनाए भी गए, जो दिखाता है कि यह असंभव नहीं था।
11 संविधान दिवस
प्र. आपके विद्यालय ने 26 नवंबर को संविधान दिवस कैसे मनाया?
उत्तर: यह एक व्यक्तिगत/स्कूल-आधारित अनुभव पर आधारित प्रश्न है, जिसका उत्तर हर विद्यार्थी अपने स्कूल में हुई गतिविधियों (जैसे प्रस्तावना का सामूहिक वाचन, संविधान पर भाषण-प्रतियोगिता, निबंध लेखन, वाद-विवाद, या संविधान-निर्माताओं पर आधारित प्रदर्शनी) के आधार पर स्वयं लिखें।