इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. राजनीतिक दर्शन के नज़रिये की कोई एक बात बताइए।
उत्तर: संविधान में इस्तेमाल हुए ‘अधिकार’, ‘नागरिकता’ जैसे पदों के संभावित अर्थ समझना।
प्र. जापान के संविधान को बोलचाल में क्या कहा जाता है?
उत्तर: शांति संविधान।
प्र. भारतीय संविधान की सामाजिक न्याय प्रतिबद्धता का सबसे अच्छा उदाहरण क्या है?
उत्तर: अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण।
प्र. पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को क्या कहा जाता है?
उत्तर: पारस्परिक निषेध।
प्र. भारत में धर्म-राज्य अलगाव को क्या कहा जाता है?
उत्तर: सिद्धांतगत दूरी।
प्र. अनुच्छेद 371ए किस राज्य से जुड़ा है?
उत्तर: नगालैंड से।
प्र. नेहरू ने संविधान सभा की माँग को किसकी सामूहिक माँग बताया?
उत्तर: पूर्ण आत्मनिर्णय की सामूहिक माँग।
प्र. संविधान के दर्शन का सबसे अच्छा सार-संक्षेप कहाँ मिलता है?
उत्तर: संविधान की प्रस्तावना में।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. राजनीतिक दर्शन के नज़रिये की तीन बातें संक्षेप में बताइए।
उत्तर: 1. संविधान की अवधारणाओं (‘अधिकार’, ‘नागरिकता’ आदि) की व्याख्या करना।
2. संविधान की बुनियादी अवधारणाओं से मेल खाती एक सुसंगत दृष्टि बनाना।
3. संविधान को संविधान सभा की बहसों से जोड़कर पढ़ना।
प्र. प्रतिनिधित्व के ‘आवाज़’ और ‘राय’ के बीच फ़र्क़ समझाइए।
उत्तर: ‘आवाज़’ का मतलब है लोगों की पहचान उनकी अपनी भाषा-आवाज़ से हो। ‘राय’ का मतलब है बहसों में समाज के विभिन्न तबकों के विचार-सरोकार शामिल होना। संविधान सभा ‘आवाज़’ के लिहाज़ से अप्रतिनिधिक थी, पर ‘राय’ के लिहाज़ से नहीं।
प्र. पणिक्कर के अनुसार भारतीय उदारवाद की दो धाराएँ बताइए।
उत्तर: पहली धारा राममोहन राय से शुरू हुई, जिन्होंने व्यक्ति और महिलाओं के अधिकारों पर ज़ोर दिया। दूसरी धारा में स्वामी विवेकानंद, के. सी. सेन और जस्टिस रानाडे शामिल थे, जिन्होंने हिंदू धर्म के भीतर सामाजिक न्याय का जज़्बा जगाया।
प्र. भारत के धर्मनिरपेक्षता मॉडल के पश्चिमी मॉडल से अलग होने के दो कारण बताइए।
उत्तर: 1. धार्मिक समूहों के अधिकार: व्यक्तियों जितनी ही ज़रूरी समुदायों के बीच बराबरी भी है।
2. राज्य का हस्तक्षेप का अधिकार: छुआछूत जैसे रिवाजों को ख़त्म करने के लिए राज्य का सक्रिय हस्तक्षेप ज़रूरी था।
प्र. असमतोल संघवाद क्या है, उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: असमतोल संघवाद का मतलब है कि संघ की अलग-अलग इकाइयों की क़ानूनी हैसियत में अंतर होना, जैसे अनुच्छेद 371ए के तहत नगालैंड को विशेष दर्जा दिया गया है, जबकि अमेरिकी संघवाद पूरी तरह समतोल है।
प्र. पृथक निर्वाचन-मंडल क्यों अस्वीकार किया गया?
उत्तर: पृथक निर्वाचन-मंडल इसलिए अस्वीकार नहीं हुआ कि इससे धार्मिक भेद पैदा होता, बल्कि इसलिए क्योंकि इससे राष्ट्रीय-जीवन की सहजता को नुक़सान पहुँचता, संविधान थोपी हुई एकता की बजाय सच्ची भाईचारे की भावना चाहता था।
प्र. संविधान की दो प्रक्रियागत उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर: 1. राजनीतिक विचार-विमर्श में विश्वास, यानी असहमति-मतभेद को सकारात्मक मूल्य मानना।
2. समझौते और समायोजन की भावना, यानी महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहुमत की बजाय सर्वानुमति से फ़ैसला लेना।
प्र. संविधान की तीन सीमाएँ बताइए।
उत्तर: 1. राष्ट्रीय एकता की धारणा बहुत केंद्रीकृत है।
2. लैंगिक-न्याय के मुद्दों, ख़ासकर परिवार से जुड़े, पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया।
3. कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों की बजाय नीति निर्देशक तत्वों में रखे गए।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. जापान के संविधान के उदाहरण से यह कैसे पता चलता है कि संविधान बनने की परिस्थितियाँ निर्माताओं की सोच पर असर डालती हैं?
उत्तर: 1. 1947 का जापानी संविधान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बना, जब जापान युद्ध की भारी तबाही झेल चुका था।
2. इसकी प्रस्तावना में शांति की कामना और मानवीय रिश्तों के उच्च आदर्शों के प्रति सचेत रहने की बात कही गई।
3. अनुच्छेद 9 में जापान ने युद्ध और सैन्य शक्ति को हमेशा के लिए त्यागने की घोषणा की।
4. इसीलिए इसे ‘शांति संविधान’ कहा जाता है, यह दिखाता है कि युद्ध के अनुभव ने सीधे संविधान की भावना को आकार दिया।
प्र. व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति भारतीय संविधान की प्रतिबद्धता को राममोहन राय और रौलेट एक्ट के उदाहरण से समझाइए।
उत्तर: 1. 19वीं सदी की शुरुआत में ही राममोहन राय ने प्रेस की आज़ादी पर अंग्रेज़ी रोक का विरोध किया।
2. रौलेट एक्ट ने मनमानी गिरफ़्तारी के विरुद्ध स्वतंत्रता छीनने की कोशिश की, जिसका राष्ट्रीय आंदोलन ने पुरज़ोर विरोध किया।
3. संविधान अंगीकार करने से 40 साल पहले तक हर INC प्रस्ताव में व्यक्ति की स्वतंत्रता एक ग़ैर-समझौता योग्य मूल्य मानी जाती थी।
4. यही वजह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मनमानी गिरफ़्तारी के विरुद्ध स्वतंत्रता भारतीय संविधान का अभिन्न हिस्सा बनीं।
प्र. भारतीय उदारवाद पश्चिमी शास्त्रीय उदारवाद से किस तरह अलग है?
उत्तर: 1. शास्त्रीय पश्चिमी उदारवाद हमेशा सामाजिक न्याय और सामुदायिक मूल्यों पर व्यक्ति को तरजीह देता है।
2. भारतीय उदारवाद हमेशा सामाजिक न्याय से जुड़ा रहा है, जैसा SC-ST आरक्षण से पता चलता है।
3. भारतीय संविधान समुदाय-आधारित अधिकार भी देता है, जैसे धार्मिक समुदायों का शिक्षा-संस्था चलाने का अधिकार।
4. इस तरह भारतीय उदारवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय-सामुदायिक अधिकार, दोनों को साथ लेकर चलता है।
प्र. ‘सिद्धांतगत दूरी’ की अवधारणा को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: 1. पश्चिमी धारणा में धर्मनिरपेक्षता का मतलब है पारस्परिक निषेध, यानी राज्य और धर्म एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों से पूरी तरह दूर रहें।
2. भारत में यह संभव नहीं था, क्योंकि छुआछूत जैसे धर्म-स्वीकृत रिवाज व्यक्ति की गरिमा छीनते थे, जिनके ख़ात्मे के लिए राज्य का हस्तक्षेप ज़रूरी था।
3. इसलिए भारत में राज्य धर्म से ‘सिद्धांतगत दूरी’ रखता है, यानी वह ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप कर सकता है (जैसे छुआछूत रोकना) या दूर रह सकता है (जैसे धार्मिक संस्थाओं के आंतरिक मामलों में)।
4. यह तय इस आधार पर होता है कि किस क़दम से स्वतंत्रता, समता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलता है।
प्र. ‘अप्रतिनिधिक’ आलोचना को ‘आवाज़’ और ‘राय’ के फ़र्क़ से समझाइए।
उत्तर: 1. संविधान सभा का गठन तब हुआ जब सार्वभौम मताधिकार नहीं था, ज़्यादातर सदस्य समाज के अगड़े तबके से थे।
2. ‘आवाज़’ के लिहाज़ से देखें तो संविधान सभा अप्रतिनिधिक थी, क्योंकि सदस्य सीमित मताधिकार से चुने गए थे, सार्वभौम मताधिकार से नहीं।
3. ‘राय’ के लिहाज़ से देखें तो संविधान सभा बिल्कुल अप्रतिनिधिक नहीं थी, क्योंकि बहसों में समाज के विभिन्न तबकों के सरोकार और हित उठाए गए।
4. अंबेडकर की मूर्तियाँ आज भी दलितों की उस भावना को दिखाती हैं कि संविधान उनकी आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है।
प्र. ‘विदेशी दस्तावेज़’ आलोचना और उसके जवाब को समझाइए।
उत्तर: 1. आलोचना है कि भारतीय संविधान पश्चिमी संविधानों की अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद नक़ल है और भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाता।
2. यह सच है कि संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है, पर यह अंधी नक़ल नहीं थी।
3. कई भारतीयों ने आधुनिक विचारों को अपनी परंपरा की बुराइयों के ख़िलाफ़ विरोध के तौर पर अपनाया, जैसे 1841 से दलितों का नए क़ानून का इस्तेमाल।
4. पश्चिमी आधुनिकता और स्थानीय संस्कृति के मेल से एक ‘संकर संस्कृति’ बनी, यह चयन और अनुकूलन की प्रक्रिया थी, नक़ल की नहीं।
प्र. संविधान की तीन सीमाओं को विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. राष्ट्रीय एकता की धारणा बहुत केंद्रीकृत है, यानी राज्यों को उतनी स्वायत्तता नहीं मिली जितनी कुछ लोग चाहते थे।
2. लैंगिक-न्याय के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों, ख़ासकर परिवार के भीतर की असमानताओं पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया।
3. यह स्पष्ट नहीं कि एक ग़रीब विकासशील देश में सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकार बनाने की बजाय नीति निर्देशक तत्वों में क्यों डाला गया।
4. फिर भी किताब के अनुसार ये सीमाएँ संविधान के दर्शन को गंभीर ख़तरे में डालने जितनी गंभीर नहीं हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. संविधान की पाँच आधारभूत महत्व की उपलब्धियों (केंद्रीय विशेषताओं) को विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. उदारवादी व्यक्तिवाद (व्यक्ति की स्वतंत्रता): राममोहन राय से शुरू हुई एक सदी की बौद्धिक-राजनीतिक गतिविधि का परिणाम, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मनमानी गिरफ़्तारी के विरुद्ध स्वतंत्रता इसके उदाहरण हैं।
2. सामाजिक न्याय: भारतीय उदारवाद हमेशा सामाजिक न्याय से जुड़ा रहा, SC-ST आरक्षण इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
3. समूहगत अधिकार (सांस्कृतिक विशिष्टता की अभिव्यक्ति का अधिकार): समुदाय-आधारित अधिकार, जैसे धार्मिक समुदायों का अपनी शिक्षा-संस्था चलाने का अधिकार।
4. सार्वभौम मताधिकार: बिना किसी भेद के सबको वोट का अधिकार, जिसकी झलक कंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया बिल (1895) और मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट (1928) में पहले ही मिलती है।
5. संघवाद: अनुच्छेद 371 और 371ए जैसे असमतोल प्रावधानों से क्षेत्रीय ज़रूरतों का सम्मान।
अध्याय पहले तीन विशेषताएँ एक साथ गिनाता है, फिर दो और जोड़ता है, और इन्हीं पाँचों को आधारभूत महत्व की उपलब्धियाँ कहता है।
प्र. संविधान की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा और भारत के दो अलग रास्तों को विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता का मतलब है पारस्परिक निषेध, यानी धर्म और राज्य एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों से पूरी तरह दूर रहें, ताकि व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।
2. भारत में यह मॉडल दो कारणों से अलग हुआ: पहला, धार्मिक समूहों के अधिकार, क्योंकि व्यक्ति का आत्म-सम्मान उसके समुदाय की हैसियत पर निर्भर करता है, इसलिए सभी धार्मिक समुदायों को शिक्षा-संस्था चलाने जैसे अधिकार दिए गए।
3. दूसरा, राज्य के हस्तक्षेप का अधिकार, क्योंकि छुआछूत जैसे रिवाज इतने गहरे थे कि राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप के बिना इनका ख़ात्मा संभव न था।
4. इसलिए भारत में धर्म-राज्य अलगाव का मतलब है सिद्धांतगत दूरी, जिसमें राज्य ज़रूरत के हिसाब से हस्तक्षेप कर भी सकता है और दूर भी रह सकता है।
5. यह तय इस बात से होता है कि किस क़दम से स्वतंत्रता, समता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलता है।
6. इस तरह भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी मॉडल से ज़्यादा जटिल पर भारतीय परिस्थितियों के ज़्यादा अनुकूल है।
प्र. संविधान की आलोचनाओं (अस्त-व्यस्त, अप्रतिनिधिक, विदेशी) को विस्तार से समझाइए और उनका जवाब भी दीजिए।
उत्तर: 1. अस्त-व्यस्त: यह मानकर कि संविधान एक कसे हुए दस्तावेज़ में समाना चाहिए, पर भारत ने चुनाव आयोग-लोक सेवा आयोग जैसे कई विवरण एक ही दस्तावेज़ में समेटे, इसलिए यह बड़ा दिखता है, यह अमेरिका जैसे देशों के लिए भी पूरी तरह सच नहीं।
2. अप्रतिनिधिक: ‘आवाज़’ के लिहाज़ से संविधान सभा अप्रतिनिधिक थी (सीमित मताधिकार से चुनी गई), पर ‘राय’ के लिहाज़ से नहीं, क्योंकि बहसों में सभी तबकों के सरोकार शामिल हुए।
3. विदेशी: यह आरोप कि संविधान पश्चिमी संविधानों की नक़ल है, पर यह अंधी नक़ल नहीं, चयन और अनुकूलन की प्रक्रिया थी, कई भारतीयों ने आधुनिक विचारों को अपनी परंपरा की बुराइयों के ख़िलाफ़ विरोध के रूप में अपनाया।
4. तीनों आलोचनाओं के जवाब यह दिखाते हैं कि आलोचनाएँ आंशिक रूप से सही होते हुए भी संविधान की गहरी समझ के बिना अधूरी हैं।
5. संविधान का आकार भारत की विशेष ज़रूरतों का परिणाम है, न कि किसी योजनागत ग़लती का।
6. इसी तरह संविधान की तथाकथित ‘पश्चिमीता’ भी सोच-समझकर किया गया चयन है, बेसोची नक़ल नहीं।
प्र. प्रस्तावना को संविधान के दर्शन का सार-संक्षेप क्यों माना जाता है, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. प्रस्तावना में संविधान के सभी मुख्य उद्देश्यों (न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व) का ज़िक्र एक ही जगह मिलता है।
2. इसमें एक विनम्र दावा भी है: यह संविधान महान व्यक्तियों के समूह ने नहीं, बल्कि ‘हम भारत के लोग’ ने रचा और अंगीकार किया।
3. इससे पता चलता है कि जनता ख़ुद अपनी नियति की नियंता है, और लोकतंत्र वह साधन है जिससे लोग अपना वर्तमान-भविष्य आकार देते हैं।
4. पचास से ज़्यादा साल के मतभेदों (अदालत-सरकार टकराव, केंद्र-राज्य मतभेद, दलों की लड़ाई) के बावजूद हर नेता और नागरिक अब भी इसी साझा दृष्टि में विश्वास रखता है।
5. यह साझा दृष्टि संविधान के अमल में लाने का सबसे क़ीमती नतीजा है।
6. इसलिए 1950 में संविधान बनाना जितनी बड़ी उपलब्धि थी, आज उसकी भावना को जीवंत बनाए रखना उतनी ही बड़ी उपलब्धि है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक राममोहन राय ने किसका विरोध किया था?
उत्तर: प्रेस की आज़ादी पर अंग्रेज़ी सरकार की रोक का।
(ख) 2 अंक रौलेट एक्ट का राष्ट्रीय आंदोलन ने विरोध क्यों किया?
उत्तर: क्योंकि रौलेट एक्ट मनमानी गिरफ़्तारी के विरुद्ध लोगों की स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करता था, यह व्यक्ति की बुनियादी स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ था, इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन ने इसका ज़ोरदार विरोध किया।
(ग) 3 अंक यह गद्यांश भारतीय संविधान की व्यक्ति-स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में क्या दिखाता है?
उत्तर: यह दिखाता है कि संविधान की व्यक्ति-स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता कोई अचानक या हल्की-फुल्की बात नहीं थी, बल्कि लगभग एक सदी तक चली बौद्धिक और राजनीतिक गतिविधि का नतीजा थी। राममोहन राय से शुरू होकर, रौलेट एक्ट के विरोध तक, और फिर 40 साल तक कांग्रेस के हर दस्तावेज़ में इस मूल्य के दोहराए जाने तक, यह एक निरंतर, गहरी जड़ें जमाई हुई प्रतिबद्धता थी। यही वजह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मनमानी गिरफ़्तारी के विरुद्ध स्वतंत्रता जैसे अधिकार भारतीय संविधान का इतना अभिन्न हिस्सा बन गए, और इससे पता चलता है कि भारतीय संविधान का उदारवादी चरित्र किसी विदेशी नक़ल का नतीजा नहीं, बल्कि भारत के अपने संघर्ष से उपजा है।
(क) 1 अंक संविधान ने धर्म के आधार पर किसे नकार दिया?
उत्तर: पृथक निर्वाचन-मंडल को।
(ख) 2 अंक पृथक निर्वाचन-मंडल की अस्वीकृति की असली वजह क्या थी?
उत्तर: इसकी अस्वीकृति इसलिए नहीं थी कि इससे धार्मिक समुदायों में भेद पैदा होता या राष्ट्रीय एकता को सीधा ख़तरा होता, बल्कि इसलिए थी कि इससे राष्ट्रीय-जीवन की सहजता (स्वाभाविक कामकाज) को नुक़सान पहुँचता।
(ग) 3 अंक यह गद्यांश ‘थोपी हुई एकता’ और ‘सच्ची भाईचारे’ के फ़र्क़ को कैसे स्पष्ट करता है?
उत्तर: यह गद्यांश दिखाता है कि संविधान-निर्माता सिर्फ़ ऊपर से थोपी गई, दिखावटी एकता नहीं चाहते थे, वे चाहते थे कि विभिन्न समुदाय आपस में सच्चे भाईचारे की भावना से जुड़ें। सरदार पटेल का ‘एक समुदाय’ का आह्वान इसी भावना को दर्शाता है, यह मानने की माँग नहीं कि सब एक जैसे हैं, बल्कि यह भरोसा कि बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के भेद को भुलाकर लोग साथ रह सकते हैं। डॉ. अंबेडकर के लिए भी यही लक्ष्य सबसे प्रिय था। इसलिए पृथक निर्वाचन-मंडल को नकारना धार्मिक समुदायों को दबाने की कोशिश नहीं थी, बल्कि एक स्वस्थ, एकीकृत राष्ट्रीय जीवन बनाने की कोशिश थी, जिसमें विविधता और एकता दोनों की जगह हो।