NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 8 «स्थानीय शासन» की प्रश्नावली के नौ प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 ग्राम पंचायत के लिए सहायक या बाधक स्थितियाँ
प्र. भारत का संविधान ग्राम पंचायत को स्व-शासन की इकाई के रूप में देखता है। नीचे कुछ स्थितियों का वर्णन किया गया है। इन पर विचार कीजिए और बताइए कि स्व-शासन की इकाई बनने के क्रम में ग्राम पंचायत के लिए ये स्थितियाँ सहायक हैं या बाधक?
(क) प्रदेश की सरकार ने एक बड़ी कंपनी को विशाल इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति दी है, जिससे बहुत-से गाँवों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। दुष्प्रभाव की चपेट में आनेवाले गाँवों में से एक की ग्राम सभा ने यह प्रस्ताव पारित किया कि क्षेत्र में कोई भी बड़ा उद्योग लगाने से पहले गाँववासियों की राय ली जानी चाहिए और उनकी शिकायतों की सुनवाई होनी चाहिए।
(ख) सरकार का फ़ैसला है कि उसके कुल ख़र्चे का 20 प्रतिशत पंचायतों के माध्यम से व्यय होगा।
(ग) ग्राम पंचायत विद्यालय का भवन बनाने के लिए लगातार धन माँग रही है, लेकिन सरकारी अधिकारियों ने माँग को यह कहकर ठुकरा दिया है कि धन का आबंटन कुछ दूसरी योजनाओं के लिए हुआ है और धन को अलग मद में ख़र्च नहीं किया जा सकता।
(घ) सरकार ने डुंगरपुर नामक गाँव को दो हिस्सों में बाँट दिया है और गाँव के एक हिस्से को जमुना तथा दूसरे को सोहना नाम दिया है। अब डुंगरपुर नामक गाँव सरकारी खाते में मौजूद नहीं है।
(ङ) एक ग्राम पंचायत ने पाया कि उसके इलाक़े में पानी के स्रोत तेजी से कम हो रहे हैं। ग्राम पंचायत ने फ़ैसला किया कि गाँव के नौजवान श्रमदान करें और गाँव के पुराने तालाब तथा कुएँ को फिर से काम में आने लायक़ बनाएँ।
उत्तर:
(क) बाधक। बड़ा फ़ैसला (इस्पात संयंत्र की अनुमति) राज्य सरकार के स्तर पर हुआ, प्रभावित गाँवों की ग्राम सभा से पहले कोई सलाह नहीं ली गई, ग्राम सभा का प्रस्ताव अपने-आप में सही क़दम है, पर यह दिखाता है कि असल शक्ति अब भी ऊपर के स्तर पर केंद्रित है।
(ख) सहायक। सरकारी ख़र्च का बड़ा हिस्सा पंचायतों के ज़रिए ख़र्च होना, स्थानीय स्तर को संसाधन और निर्णय की वास्तविक शक्ति देता है, जो स्व-शासन की बुनियादी शर्त है।
(ग) बाधक। ग्राम पंचायत के पास स्कूल-भवन जैसी बुनियादी ज़रूरत के लिए भी धन ख़र्च करने का अधिकार नहीं, ऊपर से बजट-मद तय होना, स्थानीय स्वायत्तता को सीमित करता है।
(घ) बाधक। गाँव के नाम और सीमा जैसी बुनियादी पहचान को ऊपर से बिना पूछे बदल देना, ग्राम पंचायत को स्वायत्त स्व-शासन इकाई मानने के बजाय सरकारी प्रशासन की एक इकाई भर मानने जैसा है।
(ङ) सहायक। ग्राम पंचायत ख़ुद अपने इलाक़े की समस्या (जल-स्रोतों की कमी) पहचानकर, अपने संसाधनों (श्रमदान) से उसका समाधान निकाल रही है, बिना ऊपर के आदेश की प्रतीक्षा किए, यही स्व-शासन का असली रूप है।
2 ग्राम पंचायत को दी जाने वाली पाँच शक्तियाँ
प्र. मान लीजिए कि आपको किसी प्रदेश की तरफ़ से स्थानीय शासन की कोई योजना बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। ग्राम पंचायत स्व-शासन की इकाई के रूप में काम करे, इसके लिए आप उसे कौन-सी शक्तियाँ देना चाहेंगे? ऐसी पाँच शक्तियों का उल्लेख करें और प्रत्येक शक्ति के बारे में दो-दो पंक्तियों में यह भी बताएँ कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है।
उत्तर:
1. अपना कर लगाने और वसूलने का अधिकार: जब तक ग्राम पंचायत के पास अपने स्रोत का राजस्व नहीं होगा, वह हर काम के लिए ऊपर की सरकार पर निर्भर रहेगी, इससे स्वायत्तता ख़त्म हो जाती है।
2. बजट बनाने और ख़र्च तय करने की शक्ति: गाँव की प्राथमिकताएँ गाँव वाले ही सबसे बेहतर जानते हैं, इसलिए यह तय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास होना चाहिए कि पैसा कहाँ ख़र्च हो।
3. 29 विषयों (ग्यारहवीं अनुसूची) पर योजना बनाने और लागू करने की शक्ति: कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे स्थानीय विकास के विषयों पर योजना का अधिकार पंचायत के पास हो, ताकि योजना स्थानीय ज़रूरत के अनुसार बने, न कि ऊपर से थोपी जाए।
4. कर्मचारियों पर निगरानी और जवाबदेही तय करने की शक्ति: स्थानीय स्तर पर काम करने वाले सरकारी कर्मचारी (जैसे शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी) ग्राम पंचायत के प्रति भी जवाबदेह हों, ताकि योजनाएँ काग़ज़ पर न रहकर ज़मीन पर लागू हों।
5. ग्राम सभा की बैठक बुलाने और उसके फ़ैसलों को लागू करवाने की शक्ति: ग्राम सभा प्रत्यक्ष लोकतंत्र का मंच है, उसके फ़ैसलों को पंचायत द्वारा लागू करवाना अनिवार्य हो, तभी आम जनता की भागीदारी सार्थक बनेगी।
3 73वें संशोधन में आरक्षण के प्रावधान
प्र. सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए संविधान के 73वें संशोधन में आरक्षण के क्या प्रावधान हैं? इन प्रावधानों से ग्रामीण स्तर के नेतृत्व का खाका किस तरह बदला है?
उत्तर:
आरक्षण के प्रावधान: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित हैं, महिलाओं के लिए हर स्तर पर कम-से-कम एक तिहाई स्थान आरक्षित हैं, और यह आरक्षण SC, ST तथा OBC के लिए निर्धारित सीटों के भीतर भी लागू होता है, यानी SC/ST/OBC कोटे में भी एक तिहाई सीटें उस वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। सरपंच/अध्यक्ष जैसे प्रधान पद भी इसी अनुपात में आरक्षित हैं।
नेतृत्व के खाके में बदलाव: इस आरक्षण से लगभग 32 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि स्थानीय शासन में आए, जिनमें से लगभग 12.7 लाख महिलाएँ हैं, यानी दस लाख से ज़्यादा महिलाएँ और सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लोग पहली बार निर्णय लेने की स्थिति में पहुँचे। गीता राठौड़ (सीहोर, मध्य प्रदेश की जामोनिया तालाब ग्राम पंचायत की सरपंच) जैसी महिलाओं ने पहले आरक्षित सीट से और बाद में सामान्य सीट से जीतकर दिखाया कि आरक्षण महिलाओं को नेतृत्व का वास्तविक अनुभव और स्वीकृति दिला सकता है।
4 73वें संशोधन से पहले और बाद का मुख्य भेद
प्र. संविधान के 73वें संशोधन से पहले और संशोधन के बाद के स्थानीय शासन के बीच मुख्य भेद बताएँ।
उत्तर:
1. संवैधानिक दर्जा: पहले स्थानीय निकाय राज्य सरकारों की इच्छा पर निर्भर थे, राज्य सरकार चाहे तो इन्हें भंग भी कर सकती थी, अब त्रि-स्तरीय पंचायती राज ढाँचे को संवैधानिक दर्जा मिल गया है।
2. नियमित चुनाव: पहले चुनाव नियमित नहीं होते थे, अब हर पाँच साल में चुनाव अनिवार्य है, और भंग होने पर छह महीने के भीतर फिर से चुनाव कराना ज़रूरी है।
3. आरक्षण: पहले महिलाओं और SC/ST के लिए आरक्षण का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं था, अब एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए और जनसंख्या के अनुपात में SC/ST के लिए आरक्षित हैं।
4. राज्य चुनाव आयुक्त और राज्य वित्त आयोग: अब चुनाव करवाने के लिए स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयुक्त और वित्तीय हस्तांतरण तय करने के लिए राज्य वित्त आयोग का प्रावधान है, पहले ऐसी कोई स्वतंत्र संस्था नहीं थी।
5. विषयों की सूची: अब ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषय स्पष्ट रूप से पंचायतों को सौंपे गए हैं, पहले ऐसा कोई निश्चित दायरा तय नहीं था।
5 आलोक, नेहा और जयेश की बातचीत पर मत
प्र. नीचे लिखी बातचीत पढ़ें। इस बातचीत में जो मुद्दे उठाए गए हैं उसके बारे में अपना मत दो सौ शब्दों में लिखें।
आलोक: हमारे संविधान में स्त्री और पुरुष को बराबरी का दर्जा दिया गया है। स्थानीय निकायों में स्त्रियों को आरक्षण देने से सत्ता में उनकी बराबर की भागीदारी सुनिश्चित हुई है।
नेहा: लेकिन, महिलाओं का सिर्फ़ सत्ता के पद पर काबिज़ होना ही काफ़ी नहीं है। यह भी ज़रूरी है कि स्थानीय निकायों के बजट में महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान हो।
जयेश: मुझे आरक्षण का यह गोरखधंधा पसंद नहीं। स्थानीय निकाय को चाहिए कि वह गाँव के सभी लोगों का ख्याल रखे और ऐसा करने पर महिलाओं और उनके हितों की देखभाल अपने आप हो जाएगी।
उत्तर:
तीनों की बातों में आंशिक सच्चाई है, पर पूरी तस्वीर किसी एक की बात से नहीं बनती। आलोक सही कहते हैं कि आरक्षण के बिना महिलाओं की स्थानीय सत्ता में भागीदारी लगभग नगण्य रहती, आँकड़े दिखाते हैं कि आरक्षण के बाद लाखों महिलाएँ निर्वाचित होकर आईं, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
पर नेहा की बात भी उतनी ही अहम है, केवल पद मिल जाने से महिलाओं के हित सुरक्षित नहीं हो जाते, अगर बजट में उनकी ज़रूरतों (जैसे पीने का पानी, सुरक्षा, स्वास्थ्य) के लिए अलग से प्रावधान न हो, तो सत्ता में भागीदारी का असर सीमित रह जाता है। कई शोध यह भी दिखाते हैं कि महिला प्रतिनिधि अक्सर पानी और स्वच्छता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं, इसलिए बजट में उनकी आवाज़ ज़रूरी है।
जयेश की बात कमज़ोर है, “सबका ख्याल रखने” की उम्मीद पर छोड़ देने से इतिहास में महिलाओं की उपेक्षा ही हुई है, यही वजह थी कि आरक्षण की ज़रूरत पड़ी। बिना आरक्षण के सत्ता के ढाँचे स्वाभाविक रूप से पुरुष-प्रधान बने रहते हैं।
इसलिए मेरा मत है कि आरक्षण ज़रूरी शुरुआती क़दम है, पर अकेला काफ़ी नहीं, इसे बजट में महिलाओं के लिए स्पष्ट प्रावधान और क्षमता-निर्माण के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
6 73वें संशोधन के प्रावधान और सरोकार
प्र. 73वें संशोधन के प्रावधानों को पढ़ें। यह संशोधन निम्नलिखित सरोकारों में से किससे ताल्लुक़ रखता है?
(क) पद से हटा दिये जाने का भय जन-प्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
(ख) भूस्वामी सामंत और ताक़तवर जातियों का स्थानीय निकायों में दबदबा रहता है।
(ग) ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता बहुत ज़्यादा है। निरक्षर लोग गाँव के विकास के बारे में फ़ैसला नहीं ले सकते हैं।
(घ) प्रभावकारी साबित होने के लिए ग्राम पंचायतों के पास गाँव की विकास योजना बनाने की शक्ति और संसाधन का होना ज़रूरी है।
उत्तर:
(क) से संबंधित है: हर पाँच साल में नियमित चुनाव और छह महीने के भीतर पुनर्चुनाव का प्रावधान, जन-प्रतिनिधियों को जनता के प्रति लगातार जवाबदेह बनाए रखता है, पद से हटाए जाने का यही भय जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
(ख) से संबंधित है: महिलाओं और SC/ST के लिए आरक्षण का प्रावधान, ठीक इसी चिंता को संबोधित करता है कि भूस्वामी और ताक़तवर जातियों का स्थानीय निकायों पर एकतरफ़ा दबदबा न बना रहे।
(घ) से संबंधित है: ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषय और वित्तीय हस्तांतरण के लिए राज्य वित्त आयोग का प्रावधान, ग्राम पंचायतों को योजना बनाने की वास्तविक शक्ति और संसाधन देने के मक़सद से ही जोड़े गए हैं।
(ग) से संशोधन का सीधा संबंध नहीं है, 73वें संशोधन में निरक्षरता दूर करने या इसके समाधान का कोई प्रावधान नहीं है, यह एक अलग, शिक्षा-नीति से जुड़ा सरोकार है।
7 स्थानीय शासन के तर्क और वेंगैवसल का फ़ैसला
प्र. नीचे स्थानीय शासन के पक्ष में कुछ तर्क दिए गए हैं। इन तर्कों को आप अपनी पसंद से वरीयता क्रम में सजाएँ और बताएँ कि किसी एक तर्क की अपेक्षा दूसरे को आपने ज़्यादा महत्त्वपूर्ण क्यों माना है। आपके जानते वेंगैवसल गाँव की ग्राम पंचायत का फ़ैसला निम्नलिखित कारणों में से किस पर और कैसे आधारित था?
(क) सरकार स्थानीय समुदाय को शामिल कर अपनी परियोजना कम लागत में पूरी कर सकती है।
(ख) स्थानीय जनता द्वारा बनायी गई विकास योजना सरकारी अधिकारियों द्वारा बनायी गई विकास योजना से ज़्यादा स्वीकृत होती है।
(ग) लोग अपने इलाक़े की ज़रूरत, समस्याओं और प्राथमिकताओं को जानते हैं। सामुदायिक भागीदारी द्वारा उन्हें विचार-विमर्श करके अपने जीवन के बारे में फ़ैसला लेना चाहिए।
(घ) आम जनता के लिए अपने प्रदेश अथवा राष्ट्रीय विधायिका के जन-प्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना मुश्किल होता है।
उत्तर:
मेरी वरीयता: (ग) > (ख) > (घ) > (क)। (ग) को सबसे ऊपर रखा है क्योंकि यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत, यानी अपने बारे में ख़ुद फ़ैसला लेने के अधिकार, को छूता है, बाक़ी तीन तर्क इसी बुनियादी सिद्धांत के व्यावहारिक नतीजे हैं।
वेंगैवसल का फ़ैसला मुख्यतः (ग) पर आधारित था। तमिलनाडु के वेंगैवसल गाँव की ग्राम पंचायत ने 1997 में यह फ़ैसला किया कि गाँव के सामुदायिक तालाब की ज़मीन 71 सरकारी कर्मचारियों में से हर एक को 2-2 हेक्टेयर देने के बजाय गाँव के सामूहिक इस्तेमाल के लिए बनी रहनी चाहिए, क्योंकि गाँव वाले अपने इलाक़े की ज़रूरत (सिंचाई और पानी के लिए तालाब की अहमियत) ज़िला प्रशासन से बेहतर जानते थे। कांचिपुरम के कलेक्टर ने इस फ़ैसले को पलट दिया, मद्रास उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने कलेक्टर के पक्ष में फ़ैसला दिया, पर पंचायत की अपील पर बाद में खंडपीठ ने पंचायत के पक्ष में फ़ैसला दिया, यह मामला दिखाता है कि स्थानीय ज्ञान और ऊपर के प्रशासनिक फ़ैसले में टकराव कैसे होता है।
8 विकेंद्रीकरण के साधन की पहचान
प्र. आपके अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा विकेंद्रीकरण का साधन है? शेष को विकेंद्रीकरण के साधन के रूप में आप पर्याप्त विकल्प क्यों नहीं मानते?
(क) ग्राम पंचायत का चुनाव कराना।
(ख) गाँव के निवासी ख़ुद तय करें कि कौन-सी नीति और योजना गाँव के लिए उपयोगी है।
(ग) ग्राम सभा की बैठक बुलाने की ताक़त।
(घ) प्रदेश सरकार ने ग्रामीण विकास की एक योजना चला रखी है। खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) ग्राम पंचायत के सामने एक रिपोर्ट पेश करता है कि इस योजना में कहाँ तक प्रगति हुई है।
उत्तर:
(ख) वास्तविक विकेंद्रीकरण का सबसे सटीक साधन है, क्योंकि इसमें निर्णय लेने की असली शक्ति गाँव के निवासियों के पास है, यही विकेंद्रीकरण का मूल मक़सद है, केवल संस्थागत ढाँचा नहीं बल्कि वास्तविक निर्णायक अधिकार का स्थानांतरण।
(क) पर्याप्त नहीं है। ग्राम पंचायत का चुनाव कराना एक ज़रूरी शुरुआती क़दम है, पर अगर चुनी हुई पंचायत के पास फ़ैसला लेने की वास्तविक शक्ति और संसाधन न हों, तो चुनाव कराना अपने-आप में विकेंद्रीकरण नहीं, केवल संस्था बनाना भर है।
(ग) पर्याप्त नहीं है। ग्राम सभा की बैठक बुलाने की ताक़त ज़रूरी है, पर अगर बैठक में सिर्फ़ ऊपर से आए फ़ैसलों की सूचना दी जाए, फ़ैसला लेने का असली अधिकार न हो, तो यह भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
(घ) विकेंद्रीकरण का साधन नहीं है, यह तो सिर्फ़ ऊपर से बनाई गई योजना की प्रगति-रिपोर्ट पेश करना है, ग्राम पंचायत के पास इस योजना को बदलने या उस पर फ़ैसला लेने की कोई शक्ति नहीं दिखती, यह केवल सूचना का आदान-प्रदान है।
9 प्राथमिक शिक्षा में विकेंद्रीकरण : ग्राम सभा की बैठक
प्र. दिल्ली विश्वविद्यालय का एक छात्र प्राथमिक शिक्षा के निर्णय लेने में विकेंद्रीकरण की भूमिका का अध्ययन करना चाहता था। उसने गाँववासियों से कुछ सवाल पूछे। गाँव का हर बालक/बालिका विद्यालय जाए, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कौन-से क़दम उठाए जाने चाहिए, इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए ग्राम सभा की बैठक बुलाई जानी है।
(क) बैठक के लिए उचित दिन कौन-सा होगा, इसका फ़ैसला आप कैसे करेंगे? सोचिए कि आपके चुने हुए दिन में कौन बैठक में आ सकता है और कौन नहीं?
(अ) खंड विकास अधिकारी अथवा कलेक्टर द्वारा तय किया हुआ कोई दिन। (ब) गाँव का बाज़ार जिस दिन लगता है। (स) रविवार (द) नाग पंचमी/संक्रांति
(ख) बैठक के लिए उचित स्थान क्या होगा? कारण भी बताएँ।
(अ) ज़िला-कलेक्टर के परिपत्र में बताई गई जगह। (ब) गाँव का कोई धार्मिक स्थान। (स) दलित मोहल्ला। (द) ऊँची जाति के लोगों का टोला। (ध) गाँव का स्कूल।
(ग) ग्राम सभा की बैठक में पहले ज़िला-समाहर्ता (कलेक्टर) द्वारा भेजा गया परिपत्र पढ़ा गया, जिसमें शैक्षिक रैली के क़दमों और रास्ते की बात थी। बैठक में उन बच्चों के बारे में चर्चा नहीं हुई जो कभी स्कूल नहीं आते, न बालिकाओं की शिक्षा, स्कूल भवन की दशा या खुलने-बंद होने के समय पर। बैठक रविवार को हुई इसलिए कोई महिला शिक्षक नहीं आ सकीं। लोगों की भागीदारी के लिहाज़ से इसे आप अच्छा कहेंगे या बुरा? कारण भी बताएँ।
(घ) अपनी कक्षा की कल्पना ग्राम सभा के रूप में करें। जिस मुद्दे पर बैठक में चर्चा होनी थी उस पर कक्षा में बातचीत करें और लक्ष्य को पूरा करने के लिए कुछ उपाय सुझाएँ।
उत्तर:
(क) सबसे उचित दिन वह होगा जिस दिन ज़्यादातर लोग खेत या मज़दूरी के काम पर न गए हों और औरतें भी घर के काम से फ़ुर्सत में हों, ऊपर से तय दिन (अ) या धार्मिक त्योहार (द) पर स्थानीय ज़रूरतों की अनदेखी हो सकती है। बाज़ार का दिन (ब) इसलिए अनुपयुक्त है कि उस दिन लोग ख़रीद-बिक्री में व्यस्त रहते हैं, बैठक में मन लगाकर शामिल नहीं हो पाएँगे। रविवार (स) पर, जैसा (ग) में दिखा, महिला शिक्षक जैसे कुछ अहम लोग नहीं आ पाते। इसलिए सबसे बेहतर तरीक़ा यह होगा कि ग्राम सभा ख़ुद गाँव वालों से पूछकर, बहुसंख्य लोगों की सुविधा के अनुसार दिन तय करे, न कि ऊपर से या परंपरा से थोपा हुआ कोई दिन।
(ख) गाँव का स्कूल (ध) सबसे उचित स्थान है, यह शिक्षा से सीधे जुड़ा, तटस्थ और सभी जातियों-समुदायों के लिए सुलभ स्थान है। धार्मिक स्थान (ब) कुछ समुदायों को असहज कर सकता है, दलित मोहल्ला (स) या ऊँची जाति का टोला (द) चुनना पक्षपात का संकेत देगा और दूसरे समूहों की भागीदारी घटाएगा, ज़िला-कलेक्टर द्वारा तय जगह (अ) ज़रूरी नहीं कि स्थानीय लोगों के लिए सुविधाजनक हो।
(ग) यह भागीदारी के लिहाज़ से बुरा उदाहरण है। बैठक का एजेंडा ऊपर से (कलेक्टर के परिपत्र से) तय हुआ, गाँव के असली मुद्दों, जैसे स्कूल न आने वाले बच्चे, बालिका-शिक्षा, स्कूल भवन की हालत, पर चर्चा तक नहीं हुई, और रविवार को बैठक रखने से महिला शिक्षक जैसा एक ज़रूरी पक्ष बाहर रह गया। यह दिखाता है कि ग्राम सभा की बैठक बुलाना अपने आप में काफ़ी नहीं, अगर एजेंडा और समय स्थानीय ज़रूरत और सबकी भागीदारी को ध्यान में रखकर तय न हो।
(घ) कक्षा-चर्चा के लिए सुझाव: बैठक का दिन और समय गाँव वालों से पूछकर तय करें, एजेंडा में स्कूल न आने वाले बच्चों की सूची बनाना और कारण जानना शामिल करें, बालिकाओं की शिक्षा में आने वाली रुकावटों (जैसे सुरक्षा, घर का काम) पर अलग से चर्चा करें, स्कूल भवन और समय-सारणी पर अभिभावकों और शिक्षकों दोनों की राय लें, और बैठक में महिलाओं तथा हाशिए के समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए समय व स्थान दोनों उनके अनुकूल रखें।
ऊपर के अधिकांश प्रश्नों का मूल सूत्र एक ही है: विकेंद्रीकरण तभी असली है जब निर्णय लेने की शक्ति ख़ुद स्थानीय लोगों के हाथ में हो, सिर्फ़ ढाँचा (चुनाव, बैठक, संस्था) बना देना काफ़ी नहीं। परीक्षा में इसी सूत्र को अलग-अलग उदाहरणों (ग्राम पंचायत, ग्राम सभा, वेंगैवसल) पर लागू करके दिखाना सबसे ज़्यादा अंक दिलाता है।