इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. स्थानीय शासन किसे कहते हैं?
उत्तर: गाँव और ज़िला स्तर की सरकार, जो आम नागरिकों के सबसे क़रीब होती है और उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं से सीधे जुड़ी होती है।
प्र. पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए कितना आरक्षण है?
उत्तर: एक-तिहाई सीटें, यह सभी तीनों स्तर पर लागू है।
प्र. 73वाँ संशोधन किससे जुड़ा है?
उत्तर: ग्रामीण स्थानीय निकायों यानी पंचायती राज संस्थाओं से।
प्र. राज्य वित्त आयोग की नियुक्ति कब होती है?
उत्तर: हर पाँच वर्ष में एक बार।
प्र. PESA अधिनियम किस वर्ष बना?
उत्तर: 1996 में।
प्र. 29 विषय किस अनुसूची में सूचीबद्ध हैं?
उत्तर: ग्यारहवीं अनुसूची में।
प्र. डॉ- बी- आर- अंबेडकर स्थानीय शासन को लेकर किस बात से चिंतित थे?
उत्तर: ग्रामीण भारत की जाति-पाँति और गुटबाज़ी से, जो स्थानीय शासन के उद्देश्य को मटियामेट कर सकती थी।
प्र. ग्रामीण स्थानीय निकाय कुल राजस्व का कितना प्रतिशत जुटाते हैं?
उत्तर: सिर्फ़ 0.24 प्रतिशत।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. गीता राठौड़ की कहानी संक्षेप में बताइए।
उत्तर: मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले की गीता राठौड़ 1995 में आरक्षित सीट से सरपंच चुनी गईं, और 2000 में सामान्य सीट से दोबारा चुनी गईं। उन्होंने पानी की टंकियाँ ठीक कराईं, स्कूल बनवाया, सड़कें बनवाईं, और महिलाओं पर अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
प्र. वेंगैवसल मामले का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर: 1997 में तमिलनाडु सरकार ने वेंगैवसल ग्राम पंचायत क्षेत्र की ज़मीन 71 सरकारी कर्मचारियों को आबंटित की। सरपंच और पंचायत ने इसका समर्थन करने से इनकार किया, मामला अदालत गया, और खंडपीठ ने अंततः पंचायत के पक्ष में फ़ैसला देते हुए इसे पंचायतों के संवैधानिक दर्जे का उल्लंघन बताया।
प्र. नेहरू और अंबेडकर की स्थानीय शासन को लेकर अलग-अलग चिंताएँ क्या थीं?
उत्तर: नेहरू अति-स्थानीयता को राष्ट्रीय एकता के लिए ख़तरा मानते थे। अंबेडकर ग्रामीण समाज की जाति-पाँति और गुटबाज़ी से चिंतित थे, जो स्थानीय शासन के अच्छे उद्देश्य को नाकाम कर सकती थी।
प्र. 73वें संशोधन के तहत पंचायती राज का त्रि-स्तरीय ढाँचा बताइए।
उत्तर: आधार पर ग्राम पंचायत (गाँव या गाँवों का समूह), मध्यवर्ती स्तर पर मंडल/तालुका पंचायत (छोटे राज्यों में ज़रूरी नहीं), और शीर्ष पर ज़िला पंचायत (पूरे ज़िले का ग्रामीण क्षेत्र)।
प्र. महिला आरक्षण से जुड़ा ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ नियम समझाइए।
उत्तर: महिलाओं का एक-तिहाई आरक्षण सिर्फ़ सामान्य सीटों में नहीं, बल्कि SC-ST और OBC के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी लागू होता है, यानी कोई सीट एक साथ महिला और SC/ST दोनों के लिए आरक्षित हो सकती है।
प्र. राज्य निर्वाचन आयुक्त और भारत के निर्वाचन आयोग में क्या फ़र्क़ है?
उत्तर: राज्य निर्वाचन आयुक्त पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कराता है और भारत के निर्वाचन आयोग जितना ही स्वायत्त है, पर वह निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में नहीं है और उससे जुड़ा भी नहीं है।
प्र. जनगणना के अनुसार किसी क्षेत्र को शहरी मानने की दो शर्तें बताइए।
उत्तर: 1. न्यूनतम जनसंख्या 5,000 हो।
2. कम से कम 75 प्रतिशत पुरुष कामकाजी आबादी ग़ैर-कृषि कार्यों में लगी हो।
प्र. बोलिविया के 1994 के जन-भागीदारी क़ानून की दो मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: 1. महापौरों (presidente municipal) का प्रत्यक्ष चुनाव।
2. नई नगरपालिकाओं को स्वतः वित्तीय हस्तांतरण की व्यवस्था।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. भारत में स्थानीय शासन के ऐतिहासिक विकास को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर: 1. भारत में शुरू से ही ‘सभाओं’ के रूप में स्व-शासी ग्राम समुदाय मौजूद रहे, जो समय के साथ पंचायतों का रूप ले गए।
2. आधुनिक निर्वाचित स्थानीय निकाय 1882 के बाद लार्ड रिपन की पहल से बने, इन्हें ‘लोकल बोर्ड’ कहा गया।
3. 1919 के भारत सरकार अधिनियम के बाद कई प्रांतों में ग्राम पंचायतें बनीं, यह सिलसिला 1935 के अधिनियम के बाद भी जारी रहा।
4. महात्मा गांधी ने आर्थिक-राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण की वकालत की, ग्राम पंचायतों को इसका मुख्य साधन माना।
प्र. संविधान में स्थानीय शासन को उचित महत्व न मिलने के कारण विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. विभाजन की उथल-पुथल के कारण संविधान का झुकाव एक मज़बूत केंद्र की ओर हो गया।
2. नेहरू ख़ुद अति-स्थानीयता को राष्ट्रीय एकता के लिए ख़तरा मानते थे।
3. डॉ- बी- आर- अंबेडकर के नेतृत्व में संविधान सभा की एक मज़बूत आवाज़ यह मानती थी कि ग्रामीण भारत की जाति-पाँति और गुटबाज़ी स्थानीय शासन के अच्छे उद्देश्य को ही नाकाम कर देगी।
4. फिर भी किसी सदस्य ने विकास योजनाओं में जन-भागीदारी के महत्व से इनकार नहीं किया, इसलिए स्थानीय शासन को नीति निर्देशक सिद्धांतों में जगह मिली, भले ही वह अदालत में लागू करवाने योग्य न हो।
प्र. 73वें संशोधन के मुख्य प्रावधान बताइए।
उत्तर: 1. सभी राज्यों में एक समान त्रि-स्तरीय पंचायती राज ढाँचा (ग्राम, मंडल/तालुका, ज़िला पंचायत)।
2. सभी वयस्क मतदाताओं की अनिवार्य ग्राम सभा।
3. तीनों स्तर के प्रत्यक्ष चुनाव, 5 वर्ष का कार्यकाल, भंग होने पर 6 महीने में नए चुनाव।
4. महिलाओं के लिए एक-तिहाई और SC-ST के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण, दोनों अध्यक्ष पदों पर भी लागू।
5. ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों का हस्तांतरण, राज्य निर्वाचन आयुक्त और राज्य वित्त आयोग की अनिवार्य नियुक्ति।
प्र. 74वाँ संशोधन 73वें संशोधन से किस तरह मिलता-जुलता और अलग है?
उत्तर: 1. मिलता-जुलता: दोनों में प्रत्यक्ष चुनाव, आरक्षण, विषयों का हस्तांतरण, राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग जैसे प्रावधान समान हैं।
2. अलग: 73वाँ ग्रामीण क्षेत्रों (पंचायती राज) के लिए है, जबकि 74वाँ शहरी क्षेत्रों (नगरपालिका) के लिए है।
3. 73वें में विषय ग्यारहवीं अनुसूची में हैं, 74वें में विषय बारहवीं अनुसूची में हैं।
4. 74वाँ संशोधन शहरी क्षेत्र की एक स्पष्ट जनगणना-आधारित परिभाषा (न्यूनतम जनसंख्या, ग़ैर-कृषि कार्य में प्रतिशत, जनसंख्या घनत्व) पर आधारित है, जो 73वें में लागू नहीं होती।
प्र. पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं और SC-ST प्रतिनिधित्व के आँकड़े बताइए।
उत्तर: 1. ज़िला पंचायतों में कम से कम 200 महिला अध्यक्ष, मंडल/तालुका पंचायतों में 2,000 महिला अध्यक्ष, ग्राम पंचायतों में 80,000 से ज़्यादा महिला सरपंच हैं।
2. नगर निगमों में 30 से ज़्यादा महिला महापौर, नगर पालिकाओं में 500 से ज़्यादा महिला अध्यक्ष, लगभग 650 नगर पंचायतें महिलाओं के नेतृत्व में हैं।
3. भारत की आबादी में 16.2% अनुसूचित जाति और 8.2% अनुसूचित जनजाति है, क़रीब 6.6 लाख निर्वाचित सदस्य इन्हीं दो समुदायों से हैं।
4. इससे स्थानीय निकायों की सामाजिक बनावट में बड़ा बदलाव आया है, हालाँकि इससे कभी-कभी दबदबे को लेकर तनाव भी पैदा होता है।
प्र. स्थानीय शासन की सीमित स्वायत्तता को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: 1. 29 विषय सौंपे जाने के बावजूद, कई राज्यों ने ज़्यादातर विषय स्थानीय निकायों को हस्तांतरित नहीं किए।
2. इससे स्थानीय निकाय असरदार ढंग से काम नहीं कर पाते, और इतने सारे प्रतिनिधि चुनने की कवायद कुछ हद तक प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है।
3. वित्तीय रूप से भी स्थानीय निकाय बेहद कमज़ोर हैं, ग्रामीण स्थानीय निकाय कुल राजस्व का सिर्फ़ 0.24 प्रतिशत जुटाते हैं, पर सरकार के कुल ख़र्च का 4 प्रतिशत करते हैं।
4. इससे वे केंद्र-राज्य के अनुदान पर निर्भर रहते हैं, जिससे उनकी स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता कमज़ोर पड़ती है।
प्र. PESA अधिनियम, 1996 का उद्देश्य और मुख्य प्रावधान समझाइए।
उत्तर: 1. 73वें संशोधन के प्रावधान भारत के कई राज्यों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर लागू नहीं होते थे।
2. 1996 में एक अलग अधिनियम बनाकर पंचायत व्यवस्था के प्रावधानों को इन क्षेत्रों तक बढ़ाया गया।
3. कई आदिवासी समुदायों की जंगल-जल जैसे साझे संसाधनों की देखभाल की अपनी परंपराएँ हैं, यह अधिनियम इन समुदायों के अपने तरीक़े से संसाधन-प्रबंधन के अधिकार की रक्षा करता है।
4. इसके लिए इन क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को ज़्यादा अधिकार दिए गए हैं, और निर्वाचित ग्राम पंचायतों को कई मामलों में ग्राम सभा की सहमति लेनी पड़ती है, यह विविधता और विकेंद्रीकरण की भावना के अनुरूप है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. गीता राठौड़ और वेंगैवसल, दोनों कहानियों के आधार पर बताइए कि स्थानीय शासन लोकतंत्र को कैसे मज़बूत करता है।
उत्तर: 1. गीता राठौड़ की कहानी सार्थक भागीदारी की मिसाल है: मध्य प्रदेश की एक गृहिणी से राजनीतिक रूप से दूरदर्शी नेता बनीं गीता ने अपनी पंचायत की सामूहिक शक्ति से पानी की टंकियाँ ठीक कराईं, स्कूल बनवाया, सड़कें बनवाईं और महिलाओं पर अत्याचार के विरुद्ध लड़ीं।
2. वेंगैवसल की कहानी जवाबदेही की मिसाल है: तमिलनाडु की एक सरपंच और उनकी पंचायत ने उच्च अधिकारियों के दबाव के बावजूद ग़लत ज़मीन-आबंटन का समर्थन करने से इनकार किया, और अंततः अदालत में जीत हासिल की।
3. दोनों कहानियाँ दिखाती हैं कि स्थानीय शासन आम नागरिकों को अपने जीवन, ज़रूरतों और विकास से जुड़े फ़ैसलों में शामिल होने का मौक़ा देता है।
4. लोकतंत्र सिर्फ़ सार्थक भागीदारी नहीं, जवाबदेही भी है, मज़बूत और जीवंत स्थानीय सरकारें दोनों को सुनिश्चित करती हैं, इसलिए स्थानीय शासन को मज़बूत करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मज़बूत करने जैसा ही है।
प्र. संविधान सभा में स्थानीय शासन को लेकर उठी चिंताओं और बहस को विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. संविधान बनते वक़्त स्थानीय शासन का विषय राज्यों को सौंपा गया, और नीति निर्देशक सिद्धांतों में इसे सलाह-मशविरे की प्रकृति का, अदालत में लागू न करवाने योग्य बनाया गया।
2. दो प्रमुख कारणों से स्थानीय शासन को उचित महत्व नहीं मिला: पहला, विभाजन की उथल-पुथल से संविधान का झुकाव मज़बूत केंद्र की ओर हुआ, नेहरू अति-स्थानीयता को राष्ट्रीय एकता के लिए ख़तरा मानते थे।
3. दूसरा, डॉ- बी- आर- अंबेडकर के नेतृत्व में एक मज़बूत आवाज़ यह मानती थी कि ग्रामीण भारत की जाति-पाँति और गुटबाज़ी स्थानीय शासन के अच्छे उद्देश्य को नाकाम कर देगी।
4. फिर भी किसी सदस्य ने विकास योजनाओं में जन-भागीदारी के महत्व से इनकार नहीं किया, कई सदस्य ग्राम पंचायत को भारत के लोकतंत्र का आधार बनाना चाहते थे।
5. अनंतशयनम अयंगर ने कहा कि लोकतंत्र के हक़ में गाँवों को स्व-शासन की कला में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, हमें गाँवों को सुधारने में समर्थ होना चाहिए।
6. यह बहस दिखाती है कि संविधान निर्माता स्थानीय शासन के महत्व को समझते थे, पर उस समय की व्यावहारिक चिंताओं (एकता, गुटबाज़ी) के कारण इसे तुरंत मज़बूत संवैधानिक दर्जा नहीं दे सके, यह काम बाद में 73वें-74वें संशोधन से पूरा हुआ।
प्र. 73वें और 74वें संशोधन के मुख्य प्रावधानों और उनके महत्व को विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. 1989 में केंद्र सरकार ने दो संशोधन प्रस्तावित किए, 1992 में संसद ने पारित किया, दोनों 1993 में लागू हुए, राज्यों को अपने क़ानून बदलने के लिए 1 वर्ष दिया गया।
2. 73वाँ (ग्रामीण, पंचायती राज) संशोधन: त्रि-स्तरीय ढाँचा, अनिवार्य ग्राम सभा, प्रत्यक्ष चुनाव (5 वर्ष कार्यकाल, भंग होने पर 6 महीने में चुनाव), महिला-SC-ST आरक्षण (SC-ST सीटों के भीतर महिला आरक्षण सहित), ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों का हस्तांतरण।
3. 74वाँ (शहरी, नगरपालिका) संशोधन: जनगणना-आधारित शहरी क्षेत्र की परिभाषा, 73वें जैसे ही प्रावधान (चुनाव, आरक्षण, विषय-हस्तांतरण) पर शहरी क्षेत्रों के लिए, बारहवीं अनुसूची में विषय।
4. दोनों संशोधनों ने राज्य निर्वाचन आयुक्त (स्वायत्त, ECI से स्वतंत्र) और राज्य वित्त आयोग (हर 5 वर्ष) की अनिवार्य नियुक्ति सुनिश्चित की।
5. इन संशोधनों ने स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा और एकरूपता दी, निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या को नाटकीय रूप से बढ़ाया, ख़ासकर महिलाओं और SC-ST समुदायों के लिए।
6. फिर भी, राज्यों द्वारा 29 विषयों का पूरा हस्तांतरण न होना और वित्तीय निर्भरता, इन संशोधनों की सीमाएँ भी उजागर करते हैं।
प्र. स्थानीय शासन की उपलब्धियों और सीमाओं, दोनों को आँकड़ों सहित विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. उपलब्धियाँ: भारत में लगभग 2,40,000 ग्राम पंचायतें, 6,000 मंडल पंचायतें, 600+ ज़िला पंचायतें, और 100+ नगर निगम, 1,400 नगर पालिकाएँ, 2,000+ नगर पंचायतें हैं; हर 5 वर्ष में 32 लाख से ज़्यादा प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं, जिनमें 13 लाख से ज़्यादा महिलाएँ हैं, यह संख्या राज्य विधानसभाओं और संसद के कुल 5,000 से कम प्रतिनिधियों से कहीं ज़्यादा है।
2. महिला और SC-ST प्रतिनिधित्व में भी बड़ा इज़ाफ़ा हुआ है, जैसे 80,000 से ज़्यादा महिला सरपंच और लगभग 6.6 लाख SC-ST निर्वाचित सदस्य।
3. सीमाएँ: 29 विषय सौंपे जाने के बावजूद कई राज्यों ने ज़्यादातर विषय हस्तांतरित नहीं किए, जिससे स्थानीय निकाय सीमित स्वायत्तता में ही काम कर पाते हैं।
4. वित्तीय रूप से भी वे कमज़ोर हैं, ग्रामीण स्थानीय निकाय कुल राजस्व का सिर्फ़ 0.24 प्रतिशत जुटाते हैं, पर सरकार के कुल ख़र्च का 4 प्रतिशत करते हैं, जिससे वे अनुदान पर निर्भर रहते हैं।
5. सामाजिक बदलाव के साथ तनाव भी आया है, दबदबे वाले समूह आसानी से सत्ता नहीं छोड़ना चाहते, हालाँकि यह तनाव हमेशा बुरा नहीं होता।
6. निष्कर्ष यह है कि क़ानून बनाना काफ़ी नहीं, असली लोकतंत्र इन प्रावधानों के व्यावहारिक अमल में है, बोलिविया जैसा सफल उदाहरण दिखाता है कि सही राजनीतिक इच्छाशक्ति से असरदार विकेंद्रीकरण संभव है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक गीता राठौड़ किस राज्य और ज़िले की सरपंच थीं?
उत्तर: मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले की।
(ख) 2 अंक 1995 और 2000 के उनके दो चुनावों में क्या फ़र्क़ था?
उत्तर: 1995 में वे एक आरक्षित सीट से चुनी गई थीं, जबकि 2000 में गाँव वालों ने उनके अच्छे काम के इनाम में उन्हें एक सामान्य (अनारक्षित) सीट से दोबारा चुना, यानी दूसरी बार आरक्षण के बिना भी उनकी लोकप्रियता से जीत हुई।
(ग) 3 अंक यह कहानी स्थानीय शासन और महिला आरक्षण के बारे में क्या बताती है?
उत्तर: यह दिखाती है कि महिला आरक्षण सिर्फ़ प्रतीकात्मक भागीदारी नहीं देता, बल्कि महिलाओं को असली नेतृत्व क्षमता दिखाने का मौक़ा भी देता है। गीता राठौड़ ने आरक्षित सीट से शुरुआत कर अपनी काबिलियत साबित की, और बाद में बिना आरक्षण के भी दोबारा चुनी गईं, यह दिखाता है कि आरक्षण एक शुरुआती अवसर देता है, जिसका सही इस्तेमाल कर महिलाएँ आगे स्वतंत्र रूप से भी नेतृत्व कर सकती हैं। यह स्थानीय शासन की उस ताक़त को भी दिखाता है कि यह आम नागरिकों, ख़ासकर महिलाओं, को वास्तविक बदलाव लाने की शक्ति देता है।
(क) 1 अंक वेंगैवसल ग्राम पंचायत किस राज्य में है?
उत्तर: तमिलनाडु में।
(ख) 2 अंक एकल पीठ और खंडपीठ के फ़ैसलों में क्या फ़र्क़ था?
उत्तर: एकल पीठ ने कलेक्टर के आदेश को सही ठहराया था, यह मानते हुए कि ज़मीन-आबंटन के लिए पंचायत की सहमति ज़रूरी नहीं थी। खंडपीठ ने अपील पर यह फ़ैसला पलट दिया, यह कहते हुए कि सरकार का आदेश सिर्फ़ पंचायत की शक्तियों का हनन नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक दर्जे का घोर उल्लंघन भी था।
(ग) 3 अंक यह मामला पंचायतों के संवैधानिक दर्जे और स्वायत्तता के बारे में क्या सिखाता है?
उत्तर: यह दिखाता है कि 73वें संशोधन के बाद पंचायतों को सिर्फ़ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक संवैधानिक दर्जा मिला है, जिसे उच्च अधिकारी भी मनमाने ढंग से नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। साथ ही यह भी दिखाता है कि पंचायतों को अपनी शक्तियों की रक्षा के लिए अक्सर अदालत तक जाना पड़ता है, यानी क़ानूनी प्रावधान होने के बावजूद व्यवहार में स्थानीय स्वायत्तता को लागू करवाना आसान नहीं है, और यही इस अध्याय का मुख्य सबक़ भी है कि असली लोकतंत्र क़ानून में नहीं, उसके अमल में है।