- प्राकृतिक वनस्पति को रोपित वनस्पति से कैसे अलग पहचानें, और भारत में इतनी विविधता क्यों है
- भारत के पाँच प्रकार के वन, हर एक कहाँ मिलता है और उसकी पहचान वाली प्रजातियाँ कौन-सी हैं
- ऊँचाई के साथ हिमालय की वनस्पति कैसे बदलती है, और दक्षिणी पहाड़ी वनों को शोलास क्यों कहते हैं
- आर्द्र भूमि, रामसर स्थल और मैंग्रोव वन क्या हैं, और भारत के प्रमुख स्थल कहाँ हैं
- वन नीति के उद्देश्य, और सामाजिक, कृषि, सामुदायिक व फार्म वानिकी में अंतर
- वन्य प्राणी क्यों घट रहे हैं, और वन्य प्राणी अधिनियम, प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलीफेंट व जीव मंडल निचय क्या करते हैं
1प्राकृतिक वनस्पति क्या है?
प्राकृतिक वनस्पति वह पौधा समुदाय है जो लंबे समय तक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उगता है, ताकि उसकी प्रजातियाँ वहाँ की मिट्टी और जलवायु के अनुसार यथासंभव खुद को ढाल सकें। गाँव के बगीचे का आम का पेड़ और जंगल में उगा वही पेड़, दोनों एक ही प्रजाति के होते हैं, पर केवल जंगल वाला ही प्राकृतिक वनस्पति कहलाता है, क्योंकि बगीचे का पेड़ इंसान की देखभाल में, इंसान की चुनी हुई जगह पर उगता है।
प्राकृतिक वनस्पति वह पौधा समुदाय है जो लंबे समय तक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उगता है, ताकि उसकी प्रजातियाँ मिट्टी और जलवायु के अनुसार यथासंभव खुद को ढाल सकें।
भारत की वनस्पति क्षेत्र दर क्षेत्र बहुत बदलती है, क्योंकि यहाँ की जलवायु और मिट्टी भी बदलती रहती है। हिमालय की ऊँचाइयों पर शीतोष्ण वनस्पति मिलती है, पश्चिमी घाट और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन मिलते हैं, और राजस्थान के मरुस्थल में सिर्फ कैक्टस और काँटेदार झाड़ियाँ, यह सब एक ही देश में है।
2भारत के वनों के प्रकार
प्रमुख वनस्पति प्रकार और जलवायु परिस्थिति के आधार पर भारतीय वनों को पाँच वर्गों में बाँटा जा सकता है।
2.1 उष्ण कटिबंधीय सदाबहार एवं अर्ध-सदाबहार वन
ये वन पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढाल पर, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की पहाड़ियों पर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मिलते हैं, यानी उन उष्ण और आर्द्र प्रदेशों में जहाँ वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है और औसत वार्षिक तापमान 22° सेल्सियस से अधिक रहता है।
उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन वहाँ उगते हैं जहाँ वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक और औसत तापमान 22° सेल्सियस से अधिक रहता है। ये वन सघन और पर्तों वाले होते हैं, भूमि के नज़दीक झाड़ियाँ-बेलें, ऊपर छोटे पेड़ और सबसे ऊपर 60 मीटर तक ऊँचे पेड़, और पत्ते झड़ने का कोई निश्चित समय न होने से ये साल भर हरे-भरे दिखते हैं।
| विशेषता | सदाबहार वन | अर्ध-सदाबहार वन |
|---|---|---|
| कहाँ मिलते हैं | पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढाल, उत्तर-पूर्वी पहाड़ियाँ, अंडमान-निकोबार | इन्हीं क्षेत्रों के अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले भाग |
| वर्षा / तापमान | 200 सेंटीमीटर से अधिक; 22° सेल्सियस से अधिक | थोड़ी कम वर्षा |
| स्वरूप | साल भर हरे-भरे, पर्तों वाले, वृक्ष 60 मीटर तक ऊँचे | सदाबहार और आर्द्र पर्णपाती वृक्षों का मिश्रण; बेलें सदाबहार जैसा रूप देती हैं |
| मुख्य प्रजातियाँ | रोजवुड, महोगनी, ऐनी, एबनी | व्हाइट सीडर, होलक, कैल |
अंग्रेज भारत में वनों की आर्थिक महत्ता समझते थे, इसलिए उन्होंने इनका बड़े पैमाने पर दोहन शुरू किया। गढ़वाल और कुमाऊँ के ओक वनों की जगह रेल पटरी बिछाने के लिए ज़रूरी चीड़ के पेड़ उगाए गए, और चाय, कॉफी व रबड़ के बागान लगाने के लिए भी वन साफ किए गए। लकड़ी ऊष्मा रोधक होती है, इसलिए अंग्रेजों ने इसका प्रयोग इमारत निर्माण में भी भरपूर मात्रा में किया। इस तरह संरक्षण को भूलकर वनों का व्यापारिक इस्तेमाल शुरू हुआ।
2.2 उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती (मानसून) वन
भारत में ये वन सबसे अधिक फैले हुए हैं, इन्हें मानसून वन भी कहा जाता है, और ये 70-200 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। जल की उपलब्धता के आधार पर इन्हें आर्द्र और शुष्क पर्णपाती वनों में बाँटा जाता है।
आर्द्र पर्णपाती
- वर्षा 100-200 सेंटीमीटर
- उत्तर-पूर्वी राज्य, हिमालय के गिरीपद, पश्चिमी घाट की पूर्वी ढाल, ओडिशा
- सागवान, साल, शीशम, हुर्रा, महुआ, आँवला, सेमल, कुसुम, चंदन
शुष्क पर्णपाती
- वर्षा 70-100 सेंटीमीटर
- प्रायद्वीप के अधिक वर्षा वाले भाग, उत्तर प्रदेश व बिहार के मैदान
- तेंदु, पलास, अमलतास, बेल, खैर, अक्सलवूड
शुष्क पर्णपाती वन पार्कनुमा भूदृश्य बनाते हैं, यानी खुली घास के बीच सागवान और अन्य पेड़ बिखरे रहते हैं। पर जैसे ही शुष्क ऋतु शुरू होती है, पेड़ों के पत्ते पूरी तरह झड़ जाते हैं और वही ज़मीन नंगे पेड़ों वाला घास का मैदान लगने लगती है। राजस्थान के पश्चिमी और दक्षिणी भागों में कम वर्षा और अत्यधिक पशु चारण के कारण वनस्पति बहुत विरल है।
2.3 उष्ण कटिबंधीय काँटेदार वन
ये वन वहाँ पाए जाते हैं जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेंटीमीटर से कम होती है, यानी दक्षिण-पश्चिमी पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अर्ध-शुष्क क्षेत्र।
उष्ण कटिबंधीय काँटेदार वन घास और काँटेदार झाड़ियों का मिश्रण है, जो वहाँ मिलता है जहाँ वर्षा 50 सेंटीमीटर से कम होती है। यहाँ पौधे साल के अधिकतर समय पर्णरहित रहते हैं, जिससे ज़मीन झाड़ीनुमा दिखती है।
इनकी मुख्य प्रजातियाँ बबूल, बेर, जंगली खजूर, खैर, नीम, खेजड़ी और पलास हैं, और नीचे लगभग 2 मीटर ऊँची गुच्छ घास उगती है।
3पर्वतीय वन
पहाड़ी क्षेत्रों में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है, और प्राकृतिक वनस्पति भी उसी के अनुसार बदलती है। भारत के पर्वतीय वन दो प्रकार के हैं: उत्तरी (हिमालयी) पर्वतीय वन और दक्षिणी (प्रायद्वीपीय) पर्वतीय वन।
3.1 उत्तरी (हिमालयी) पर्वतीय वन

हिमालय के पश्चिमी भाग में बहुमूल्य वृक्ष प्रजाति देवदार के वन पाए जाते हैं; देवदार की लकड़ी अधिक मजबूत होती है और निर्माण कार्य में प्रयुक्त होती है। इसी तरह चिनार और वालनट के पेड़, जिनकी लकड़ी कश्मीर के मशहूर हस्तशिल्प में इस्तेमाल होती है, पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इन पेटियों के भीतर शीतोष्ण घास के मैदान भी मिलते हैं, और उससे ऊपर एल्पाइन वन व चरागाह मिलते हैं। इन ऊँचे चरागाहों का उपयोग गुज्जर, बकरवाल, भुटिया और गद्दी जैसे समुदाय ऋतु-प्रवास (एक जगह से दूसरी जगह पशु चराने) के लिए करते हैं। हिमालय की दक्षिणी ढालों पर उत्तरी ढालों से अधिक वर्षा होती है, इसलिए वहाँ वनस्पति भी घनी होती है।
3.2 दक्षिणी (प्रायद्वीपीय) पर्वतीय वन
| विशेषता | दक्षिणी (प्रायद्वीपीय) पर्वतीय वन |
|---|---|
| कहाँ मिलते हैं | तीन अलग-अलग भागों में: पश्चिमी घाट, विंध्याचल और नीलगिरी |
| केवल ऊपरी भाग ही शीतोष्ण क्यों | चूँकि ये श्रृंखलाएँ उष्ण कटिबंध में पड़ती हैं और इनकी समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 1,500 मीटर ही है, इसलिए यहाँ ऊँचाई वाले क्षेत्र में शीतोष्ण कटिबंधीय और निचले क्षेत्रों में उपोष्ण कटिबंधीय वनस्पति पाई जाती है |
| परतें | ऊपर शीतोष्ण, नीचे उपोष्ण कटिबंधीय (केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक) |
| स्थानीय नाम | यहाँ के शीतोष्ण वनों को शोलास कहा जाता है, नीलगिरी, अन्नामलाई और पालनी पहाड़ियों में |
| मुख्य प्रजातियाँ | मैगनोलिया, लॉरेल, सिनकोना, वैटल |
| यहाँ भी मिलते हैं | सतपुड़ा और मैकाल श्रेणियों में |
शोलास दक्षिणी (प्रायद्वीपीय) पर्वतीय वनों के शीतोष्ण वन हैं, जो नीलगिरी, अन्नामलाई और पालनी पहाड़ियों में केवल लगभग 1,500 मीटर की ऊँचाई पर मिलते हैं।
4वेलांचली व अनूप वन
भारत में तरह-तरह के आर्द्र आवास हैं, कुल मिलाकर 39 लाख हेक्टेयर, जिसका लगभग 70 प्रतिशत भाग चावल की खेती के अंतर्गत आता है। ओडिशा की चिलका झील और भरतपुर का केउलादेव राष्ट्रीय पार्क रामसर अधिवेशन के तहत जलकुक्कुट आवास के रूप में संरक्षित हैं।
4.1 आर्द्र भूमि और रामसर अधिवेशन
आर्द्र भूमि वह ज़मीन है जहाँ साल के पूरे या कुछ हिस्से में पानी सतह को ढँके रहता है या सतह के नज़दीक बना रहता है, और जो दलदल, झील व लैगून जैसे आवासों को सहारा देती है।
रामसर अधिवेशन (अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्र भूमियों का अधिवेशन) संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की मान्यता प्राप्त आर्द्र भूमियों की रक्षा करता है।
| क्र. | आर्द्र भूमि वर्ग | क्षेत्र |
|---|---|---|
| 1 | दक्कन पठार के जलाशय + दक्षिण-पश्चिमी तटीय लैगून | दक्षिण भारत |
| 2 | खारे पानी वाली भूमि | राजस्थान, गुजरात, कच्छ की खाड़ी |
| 3 | ताज़े पानी की झीलें व जलाशय (केउलादेव राष्ट्रीय पार्क सहित) | राजस्थान होते हुए गुजरात से मध्य प्रदेश तक |
| 4 | डेल्टाई आर्द्र भूमि व लैगून (चिलका झील सहित) | भारत का पूर्वी तट |
| 5 | ताज़े पानी के दलदल | गंगा का मैदान |
| 6 | बाढ़ के मैदान और पहाड़ी/गिरीपद दलदल | ब्रह्मपुत्र घाटी, उत्तर-पूर्वी भारत, हिमालय गिरीपद |
| 7 | पर्वतीय झीलें और नदियाँ | कश्मीर और लद्दाख |
| 8 | मैंग्रोव व अन्य द्वीपीय आर्द्र भूमि | अंडमान और निकोबार द्वीप समूह |
4.2 मैंग्रोव वन
मैंग्रोव वन तट के किनारे खारे दलदल, ज्वारीय खाड़ी, पंक मैदान और ज्वारनदमुख में उगने वाली नमक-सहिष्णु प्रजातियों का वन है, जो तरह-तरह के पक्षियों को आश्रय देता है।

मैंग्रोव वन अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में सबसे अधिक विकसित हैं; महानदी, गोदावरी और कृष्णा डेल्टा भी महत्त्वपूर्ण हैं। इन वनों पर अतिक्रमण का खतरा बना रहता है, इसलिए इनका सक्रिय संरक्षण ज़रूरी है।
5वन संरक्षण
वनों का जीवन और पर्यावरण के साथ गहरा संबंध है, और ये अर्थव्यवस्था व समाज को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाभ पहुँचाते हैं। इसीलिए भारत सरकार ने 1952 में एक राष्ट्रीय वन नीति अपनाई, जिसे 1988 में संशोधित किया गया। नई नीति टिकाऊ वन प्रबंध पर बल देती है, यानी वन भंडार का संरक्षण व विस्तार करते हुए स्थानीय लोगों की ज़रूरतें भी पूरी करना।
5.1 वन नीति
| क्र. | वन नीति, 1988 का उद्देश्य |
|---|---|
| 1 | देश के 33 प्रतिशत भाग को वन क्षेत्र के अंतर्गत लाना (यह लक्ष्य उस समय के राष्ट्रीय स्तर से 6 प्रतिशत अधिक था) |
| 2 | पर्यावरण संतुलन बनाए रखना; जहाँ पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ा है वहाँ उसे बहाल करना |
| 3 | देश की प्राकृतिक धरोहर, जैव-विविधता और आनुवंशिक पूल का संरक्षण |
| 4 | मृदा अपरदन, मरुस्थलीकरण, बाढ़ और सूखे पर रोक |
| 5 | सामाजिक वानिकी और निम्नीकृत भूमि पर वनरोपण से वन क्षेत्र बढ़ाना |
| 6 | वन उत्पादकता बढ़ाकर वन-निर्भर लोगों तक इमारती लकड़ी, ईंधन, चारा व भोजन पहुँचाना, और लकड़ी के विकल्पों को बढ़ावा देना |
| 7 | महिलाओं को शामिल करते हुए, पेड़ लगाने और कटाई रोकने के लिए एक व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करना |
5.2 सामाजिक, कृषि, सामुदायिक व फार्म वानिकी
सामाजिक वानिकी का अर्थ है पर्यावरणीय, सामाजिक और ग्रामीण विकास में मदद के लिए वनों का प्रबंध व सुरक्षा, तथा ऊसर भूमि पर वनरोपण। राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976-79) ने इसे शहरी, ग्रामीण और फार्म वानिकी, तीन वर्गों में बाँटा है।
| प्रकार | इसमें क्या शामिल है |
|---|---|
| शहरी वानिकी | शहरों के भीतर और आसपास सार्वजनिक/निजी भूमि पर पेड़ लगाना व उनका प्रबंध: हरित पट्टी, पार्क, सड़कों के किनारे की जगह, औद्योगिक व व्यापारिक हरित पट्टी |
| ग्रामीण वानिकी | कृषि वानिकी (एक ही ज़मीन पर पेड़ और फसलें, बंजर भूमि सहित) और सामुदायिक वानिकी (गाँव-चरागाह, मंदिर-भूमि, सड़क किनारे, नहर किनारे, रेल पटरी और स्कूल की ज़मीन पर पेड़, पूरे समुदाय के लाभ के लिए, भूमिहीन लोगों सहित) को बढ़ावा देती है |
| फार्म वानिकी | किसान अपनी ज़मीन पर व्यापारिक या गैर-व्यापारिक मक़सद से पेड़ लगाते हैं; वन विभाग छोटे-मझोले किसानों को मुफ़्त पौधे देता है |
5.3 वन और जनजातीय जीवन
वन और जनजातीय समुदाय एक-दूसरे के बिना सच में विकसित नहीं हो सकते। वानिकी के बारे में जनजातियों का सदियों पुराना पारंपरिक ज्ञान वन विकास में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, और किया भी जा सकता है।
जनजातियों को वनों से गौण उत्पाद संग्रह करने वाले न समझकर, उन्हें वन संरक्षण में भागीदार बनाया जाना चाहिए।
बहुत-सी जनजातियों के लिए वन ही घर, रोज़ी-रोटी और अस्तित्व है। यह उन्हें भोजन, फल, खाने लायक पत्ते, शहद, पौष्टिक जड़ें और शिकार के लिए वन्य जानवर देता है, साथ ही घर बनाने का सामान और कलाकारी की वस्तुएँ भी।
6वन्य प्राणी एवं संरक्षित क्षेत्र
6.1 भारत में वन्य प्राणी: संख्या क्यों घट रही है
अनुमान है कि पृथ्वी पर ज्ञात सभी पौधों और प्राणियों की प्रजातियों में से 4-5 प्रतिशत भारत में पाई जाती हैं, और इसकी वजह है यहाँ के पारिस्थितिकी तंत्रों की भारी विविधता, जिसे सदियों से संरक्षित रखा गया है। मानवीय गतिविधियों ने इनमें से कई आवासों को बिगाड़ दिया है, और कुछ प्रजातियाँ अब लुप्त होने के कगार पर हैं।
औद्योगिक दोहन
औद्योगिक व तकनीकी विकास से वन संसाधनों के दोहन की गति तेज़ हुई।
भूमि की सफाई
खेती, बस्ती, सड़क, खदान और जलाशयों के लिए ज़मीन साफ़ की गई।
चारा व ईंधन का दबाव
चारे-ईंधन के लिए पेड़ों की कटाई और स्थानीय लोगों द्वारा लकड़ी निकालना।
पशु चारण
पालतू पशुओं का चारण वन्य प्राणियों के आवास को नुक़सान पहुँचाता है।
शिकार व अवैध शिकार
पहले शौक़ के लिए होने वाला शिकार अब व्यापारिक अवैध शिकार बन गया है।
जंगल की आग
आग से वन और उसमें रहने वाले वन्य प्राणी, दोनों नष्ट होते हैं।
6.2 वन्य प्राणी संरक्षण: कानून और परियोजनाएँ
भारत में वन्य प्राणियों की रक्षा की परंपरा बहुत पुरानी है, यह पंचतंत्र जैसी पुरानी कहानियों में भी झलकती है। अब इस परंपरा को कानून और समर्पित संरक्षण परियोजनाओं का साथ मिला है।
वन्य प्राणी अधिनियम, 1972 भारत में वन्य प्राणियों की रक्षा का मुख्य कानूनी ढाँचा है। इसके दो उद्देश्य हैं: अधिनियम की अनुसूची में सूचीबद्ध संकटापन्न प्रजातियों को सुरक्षा देना, और नेशनल पार्क, अभयवन व संरक्षित क्षेत्रों को कानूनी सहायता देना। इसे 1991 में पूरी तरह संशोधित किया गया, सज़ा को कठोर बनाया गया और कुछ पौधों की प्रजातियों को भी संरक्षण दिया गया।
| योजना | शुरुआत | उद्देश्य | विस्तार |
|---|---|---|---|
| प्रोजेक्ट टाइगर | 1973 | वैज्ञानिक, सौंदर्यात्मक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्य के लिए बाघों की व्यवहार्य जनसंख्या बनाए रखना; प्राकृतिक धरोहर का संरक्षण | 1973 में 9 निचय (16,339 किमी²), अब बढ़कर 58 निचय (84,487 किमी² मुख्य आवास), 18 राज्यों में फैले |
| प्रोजेक्ट एलीफेंट | 1992 | जंगली हाथियों की दीर्घकालिक जनसंख्या का संरक्षण | 18 राज्यों में लागू |

आज भारत में विश्व की 75 प्रतिशत से अधिक बाघ जनसंख्या है।
प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट के अलावा, सरकार मगरमच्छ प्रजनन परियोजना, प्रोजेक्ट हंगुल (कश्मीर स्टैग के लिए) और हिमालयी कस्तूरी मृग के लिए भी संरक्षण परियोजना चलाती है।
6.3 जीव मंडल निचय
जीव मंडल निचय एक विशेष और प्रतिनिधि पारिस्थितिकी तंत्र है, स्थलीय भी और तटीय भी, जिसे यूनेस्को के मानव और जीवमंडल कार्यक्रम (MAB) के तहत अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलती है।
जीव मंडल निचय एक प्रतिनिधि स्थलीय या तटीय पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसे यूनेस्को के मानव और जीवमंडल कार्यक्रम (MAB) के तहत अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलती है। इसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं (पुस्तक का चित्र 5.8): संरक्षण (जीव विविधता और परिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण), विकास (पर्यावरण और विकास का मेल-जोल) और व्यवस्था (पर्यावरण अनुसंधान और देख-रेख के लिए अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क)।
भारत में 18 जीव मंडल निचय हैं; इनमें से 12 को यूनेस्को के विश्व नेटवर्क में मान्यता मिली है।
| क्र. | जीव मंडल निचय | वर्ष | राज्य/केंद्र शासित प्रदेश |
|---|---|---|---|
| 1 | नीलगिरी | 1986 | तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक |
| 2 | नंदा देवी | 1988 | उत्तराखंड |
| 3 | नोकरेक | 1988 | मेघालय |
| 4 | मानस | 1989 | असम |
| 5 | सुंदर वन | 1989 | पश्चिम बंगाल |
| 6 | मन्नार की खाड़ी | 1989 | तमिलनाडु |
| 7 | ग्रेट निकोबार | 1989 | अंडमान निकोबार द्वीप समूह |
| 8 | सिमिलीपाल | 1994 | ओडिशा |
| 9 | डिब्रू-साईकोवा | 1997 | असम |
| 10 | दिहांग-देबाँग | 1998 | अरुणाचल प्रदेश |
| 11 | पंचमढ़ी | 1999 | मध्य प्रदेश |
| 12 | कंचनजुंगा | 2000 | सिक्किम |
| 13 | अगस्त्यमलाई | 2001 | केरल |
| 14 | अचनकमर-अमरकटंक | 2005 | मध्य प्रदेश |
| 15 | कच्छ | 2008 | गुजरात |
| 16 | ठंडा रेगिस्तान | 2009 | हिमाचल प्रदेश |
| 17 | शेष अचलम | 2010 | आंध्र प्रदेश |
| 18 | पन्ना | 2011 | मध्य प्रदेश |
गहरे (मोटे) अक्षरों वाले नाम वे 12 जीव मंडल निचय हैं जिन्हें यूनेस्को के विश्व नेटवर्क में मान्यता मिली है (तालिका 5.1, हिंदी संस्करण)।
6.4 मानचित्र कार्य (सीबीएसई 2026-27)
सीबीएसई इस अध्याय से भारत के रेखा मानचित्र पर वनों के प्रकार पहचानने और नीचे दिए वन्य प्राणी आरक्षित क्षेत्र दिखाकर नाम लिखने को कहता है (भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर दिया गया रेखा मानचित्र प्रयोग करें)।
| वन का प्रकार (पहचानें) | कहाँ दिखाएँ (अध्याय के अनुसार) |
|---|---|
| उष्ण कटिबंधीय सदाबहार | पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की पहाड़ियाँ, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह |
| उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती | आर्द्र: उत्तर-पूर्वी राज्य और हिमालय के गिरीपद, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल, ओडिशा। शुष्क: प्रायद्वीप के अधिक वर्षा वाले भाग, उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदान |
| उष्ण कटिबंधीय काँटेदार | दक्षिण-पश्चिमी पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अर्ध-शुष्क क्षेत्र |
| पर्वतीय | हिमालय; दक्षिण में पश्चिमी घाट, विंध्याचल और नीलगिरी (नीलगिरी, अन्नामलाई और पालनी पहाड़ियों में शोलास) |
| वेलांचली व अनूप | सुंदर वन (पश्चिम बंगाल), अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, महानदी, गोदावरी और कृष्णा के डेल्टा |
| आरक्षित क्षेत्र (दिखाकर नाम लिखें) | प्रकार | राज्य / केंद्र शासित प्रदेश |
|---|---|---|
| कॉर्बेट | राष्ट्रीय उद्यान | उत्तराखंड |
| काज़ीरंगा | राष्ट्रीय उद्यान | असम |
| रणथंभौर | राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान |
| शिवपुरी (माधव) | राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश |
| सिमिलीपाल | राष्ट्रीय उद्यान | ओडिशा |
| केउलादेव घाना (भरतपुर) | पक्षी विहार | राजस्थान |
| रंगनाथिट्टू | पक्षी विहार | कर्नाटक |
| पेरियार | वन्य प्राणी अभयवन | केरल |
| राजाजी | वन्य प्राणी अभयवन | उत्तराखंड |
| मुदुमलाई | वन्य प्राणी अभयवन | तमिलनाडु |
| दाचीगाम | वन्य प्राणी अभयवन | जम्मू और कश्मीर |

हर वन प्रकार को अलग प्रतिरूप (पैटर्न) से छायांकित करें और संकेत-सूची में समझाएँ। आरक्षित क्षेत्रों के लिए छोटा चिह्न प्रयोग करें (जैसे राष्ट्रीय उद्यान के लिए त्रिभुज, पक्षी विहार के लिए वृत्त, अभयवन के लिए वर्ग), पास में नाम लिखें और चिह्न संकेत-सूची में जोड़ें। पहले पेंसिल से काम करें।
- वर्षा के अनुसार पाँच वन प्रकार: सदाबहार (200 सेंटीमीटर से अधिक), पर्णपाती (70-200 सेंटीमीटर), काँटेदार (50 सेंटीमीटर से कम), साथ ही पर्वतीय (ऊँचाई पर निर्भर) और वेलांचली व अनूप (तटीय आर्द्र भूमि)
- आर्द्र पर्णपाती को शुष्क पर्णपाती (70-100 सेंटीमीटर) से ज़्यादा वर्षा (100-200 सेंटीमीटर) चाहिए
- पर्वतीय वन: उत्तरी (हिमालयी) में ऊँचाई के अनुसार परतें; दक्षिणी (प्रायद्वीपीय) वनों को शोलास कहते हैं
- मैंग्रोव 4,992 किमी² में फैले हैं, यानी विश्व के कुल का 7 प्रतिशत, ज़्यादातर सुंदरबन और अंडमान-निकोबार में
- वन नीति: 1952, 1988 में संशोधित; लक्ष्य 33 प्रतिशत वन क्षेत्र
- सामाजिक वानिकी की तीन शाखाएँ: शहरी, ग्रामीण (कृषि + सामुदायिक वानिकी) और फार्म वानिकी
- वन्य प्राणी अधिनियम: 1972, 1991 में संशोधित; 107 नेशनल पार्क, 573 वन्य प्राणी अभयवन
- प्रोजेक्ट टाइगर (1973): 9 निचय बढ़कर 58 हुए; बाघों की संख्या 1,411 (2006) से 3,682 (2023) हुई। प्रोजेक्ट एलीफेंट (1992): 18 राज्य
- भारत में 18 जीव मंडल निचय, 12 को यूनेस्को की मान्यता, संरक्षण-विकास-अनुसंधान को साथ लेकर चलते हैं
- 1 अंकचंदन किस तरह के वन का उदाहरण है?
(क) सदाबहार वन(ख) डेल्टाई वन(ग) पर्णपाती वन(घ) काँटेदार वन - 1 अंकप्रोजेक्ट टाइगर किस उद्देश्य से शुरू किया गया?
(क) बाघ मारने के लिए(ख) बाघ को शिकार से बचाने के लिए(ग) बाघ को चिड़ियाघर में डालने के लिए(घ) बाघ पर फिल्म बनाने के लिए - 1 अंकनंदा देवी जीव मंडल निचय किस राज्य में स्थित है?
(क) बिहार(ख) उत्तराखंड(ग) उत्तर प्रदेश(घ) ओडिशा - 1 अंकभारत के कितने जीव मंडल निचय यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त हैं?
(क) एक(ख) बारह(ग) दो(घ) चार - 1 अंकवन नीति के अनुसार देश के कितने प्रतिशत भाग को वनों के अधीन होना चाहिए?
(क) 33(ख) 55(ग) 44(घ) 22 - 1 अंककिस वन को “मानसून वन” भी कहा जाता है?
(क) सदाबहार(ख) उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती(ग) काँटेदार(घ) पर्वतीय - 1 अंकशोलास कहाँ मिलते हैं?
(क) हिमालय में(ख) नीलगिरी, अन्नामलाई और पालनी पहाड़ियों में(ग) थार मरुस्थल में(घ) सुंदरबन में - 1 अंकभारत के मैंग्रोव वन लगभग कितने क्षेत्र में फैले हैं?
(क) 2,992 किमी²(ख) 4,992 किमी²(ग) 6,992 किमी²(घ) 8,992 किमी²
- 1 अंक
अभिकथन (A): देवदार की लकड़ी को बहुत मूल्यवान माना जाता है।
कारण (R): यह एक टिकाऊ लकड़ी है, जो मुख्यतः निर्माण कार्य में इस्तेमाल होती है। - 1 अंक
अभिकथन (A): उष्ण कटिबंधीय काँटेदार वन बहुत अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों से जुड़े हैं।
कारण (R): ये वन वहाँ पाए जाते हैं जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेंटीमीटर से कम होती है। - 1 अंक
अभिकथन (A): मैंग्रोव वन पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में सबसे अधिक विकसित हैं।
कारण (R): भारत के मैंग्रोव वन विश्व के कुल मैंग्रोव क्षेत्र का लगभग 33 प्रतिशत हैं।
- 50 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्र में मिलने वाले वन का नाम बताइए।
- वन्य प्राणी अधिनियम किस वर्ष पास हुआ था?
- नीलगिरी, अन्नामलाई और पालनी पहाड़ियों के शीतोष्ण वनों का स्थानीय नाम क्या है?
- इस अध्याय में बताए गए दो रामसर स्थलों के नाम लिखिए।
- प्रोजेक्ट एलीफेंट कितने राज्यों में लागू है?
- वन नीति के अनुसार देश के कितने प्रतिशत भाग को वनों के अंतर्गत लाने का लक्ष्य है?
- प्राकृतिक वनस्पति क्या है? जलवायु की किन परिस्थितियों में उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं?
- जलवायु की कौन-सी परिस्थितियाँ सदाबहार वन उगने के लिए अनुकूल हैं?
- सामाजिक वानिकी से आपका क्या अभिप्राय है?
- जीवमंडल निचय को परिभाषित करें। वन क्षेत्र और वन आवरण में क्या अंतर है?
- सुंदरबन के अलावा भारत के किन्हीं दो मैंग्रोव-समृद्ध क्षेत्रों के नाम बताइए।
- उष्ण कटिबंधीय काँटेदार वनों में मिलने वाली तीन प्रजातियों के नाम लिखिए।
- वन संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
- वन और वन्य जीव संरक्षण में लोगों की भागीदारी कैसे महत्त्वपूर्ण है?
- उत्तरी (हिमालयी) पर्वतीय वनों का वर्णन करें और बताएँ कि ऊँचाई के साथ वनस्पति कैसे बदलती है।
- भारत में प्रोजेक्ट टाइगर के उद्देश्य और उपलब्धियाँ समझाइए।