कक्षा 11 भूगोल अध्याय 6 प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ के नोट्स हिंदी में

सीबीएसई 2026-27

सीबीएसई 2026-27 में इस अध्याय का मूल्यांकन केवल आंतरिक मूल्यांकन के रूप में, परियोजना और प्रस्तुतीकरण के माध्यम से होता है। यह वार्षिक सैद्धांतिक परीक्षा का भाग नहीं है।

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • प्राकृतिक संकट और प्राकृतिक आपदा में असली फर्क, और हर संकट आपदा क्यों नहीं बनता
  • भारत की अपनी भौगोलिक स्थिति, प्लेट संचलन, तटरेखा और मानसून इसे लगभग हर तरह की आपदा के प्रति सुभेद्य कैसे बनाते हैं
  • भूकंप, सुनामी, चक्रवात, बाढ़, सूखा और भूस्खलन के कारण, खतरे वाले क्षेत्र और बचाव के उपाय, एक-एक करके
  • सरकार आपदा से निपटने के लिए जिस तीन-चरण ढाँचे का इस्तेमाल करती है, वह पहले, दौरान और बाद में
संकटआपदायॉकोहामा रणनीतिIDNDRविवर्तनिकसुनामीकोरियोलिस बलतूफान महोर्मिराष्ट्रीय बाढ़ आयोगसूखास्थानांतरी कृषिआपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005

1संकट क्या है? आपदा क्या है?

परिवर्तन कभी रुकता नहीं है। कुछ परिवर्तन धीमे होते हैं, जैसे नदी का हज़ारों साल में एक घाटी बना देना। कुछ अचानक होते हैं, जैसे भूकंप। प्रकृति इनमें से किसी को भी अच्छा या बुरा नहीं कहती, ये बस होते रहते हैं। यह सिर्फ मानव के नज़रिए से है कि कोई परिवर्तन डरावना लगता है, क्योंकि इससे हमारी जान और संपत्ति को खतरा होता है।

याद रखेंपरिभाषा 1

आपदा एक ऐसी अवांछित घटना है जो उन शक्तियों से पैदा होती है जो अधिकतर मानव के नियंत्रण से बाहर हैं, जो बहुत कम या बिना चेतावनी के अचानक घटित होती है, और जिससे जीवन और संपत्ति को गंभीर क्षति पहुँचती है, यहाँ तक कि बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु और चोट भी होती है, इसीलिए इससे निपटने के लिए सामान्य वैधानिक आपातकालीन सेवाओं से कहीं ज़्यादा प्रयास करने पड़ते हैं।

बहुत से छात्र “संकट” और “आपदा” को एक ही मान लेते हैं। किताब इन्हें दो अलग-अलग, पर जुड़ी हुई चीज़ें मानती है, इसलिए यह फर्क ठीक-ठीक याद कर लें।

प्राकृतिक संकट

  • प्रकृति का एक तत्व (तीव्र ढाल, समुद्री धारा, अस्थिर संरचना) जिसमें नुकसान पहुँचाने की क्षमता होती है
  • यह स्थायी या अचानक आने वाला हो सकता है, पर अभी आपदा नहीं बना
  • उदाहरण: शहर के नीचे एक भ्रंश रेखा

प्राकृतिक आपदा

  • वह संकट जो असल में घटित हो चुका है: अचानक, बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि करता है
  • एक बार शुरू होने पर लोगों का इस पर बहुत कम या कोई नियंत्रण नहीं रहता
  • उदाहरण: वही भ्रंश रेखा जब भूकंप बनकर टूटती है
याद रखेंपरिभाषा 2

प्राकृतिक संकट प्राकृतिक पर्यावरण के वे तत्व हैं, जैसे महासागरीय धाराएँ, तीव्र ढाल, अस्थिर संरचनात्मक आकृतियाँ या विषम जलवायु, जिनमें लोगों या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की क्षमता होती है।

हर आपदा प्राकृतिक नहीं होती। कुछ पूरी तरह मानव-निर्मित हैं: भोपाल गैस त्रासदी और चेरनोबिल नाभिकीय आपदा मानवीय भूल से हुईं, प्रकृति से नहीं; युद्ध, CFC (क्लोरोफ्लोरो कार्बन) गैसों का छोड़ा जाना, और ध्वनि, वायु, जल तथा मिट्टी का प्रदूषण भी सीधे मानव के कारण हैं। कुछ आपदाएँ प्राकृतिक होती हैं, पर मानवीय गतिविधियाँ इन्हें और बदतर बना देती हैं: वनों की कटाई और गलत भूमि-उपयोग एक सामान्य बरसात को भी बाढ़ या भूस्खलन में बदल देते हैं।

1

सीधे मानव के कारण

भोपाल गैस त्रासदी, चेरनोबिल नाभिकीय आपदा, युद्ध, CFC व ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन, ध्वनि/वायु/जल/मिट्टी प्रदूषण।

2

मानव के कारण बदतर होने वाली

वनों की कटाई, गलत भूमि-उपयोग और कमज़ोर ढलानों पर निर्माण से बढ़े भूस्खलन और बाढ़।

परीक्षा संकेत

मानव-निर्मित आपदाओं को बेहतर नियमन से रोका जा सकता है। प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, इसीलिए किताब का अपना निष्कर्ष है कि इनके लिए सिर्फ निवारण और तैयारी ही एकमात्र रास्ता है, रोकथाम नहीं। यह लाइन याद रखें: यह अध्याय की मुख्य दलील है, और आपदा प्रबंधन पर किसी भी लंबे उत्तर में इसे लिखें।

आपदाओं को समझने का तरीका भी बदल गया है। पहले लोग बस आपदा-प्रवण इलाकों में रहना टाल देते थे, इसीलिए नुकसान सीमित रहता था। आज तकनीक ने मानव को कहीं भी बना लेने की ताकत दे दी है, इसीलिए शहर और बंदरगाह ठीक आपदा-प्रवण इलाकों में ही बस गए हैं, जैसे नदी के बाढ़ मैदानों का उपनिवेशीकरण और मुंबई व चेन्नई जैसे तटीय बंदरगाह शहर। यही वजह है कि आपदाओं से होने वाला नुकसान बढ़ गया है, भले ही इन्हें पहले से भाँपने की हमारी क्षमता भी बढ़ी है।

1989प्राकृतिक आपदाओं से बढ़ते वैश्विक नुकसान का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र महासभा में उठाया गया
1993भू-शिखर सम्मेलन रियो डि जनेरो, ब्राज़ील में हुआ
मई 1994यॉकोहामा, जापान में आपदा प्रबंधन पर विश्व सम्मेलन हुआ; इसमें यॉकोहामा रणनीति और सुरक्षित विश्व के लिए कार्य-योजना अपनाई गई, और 1990-2000 को अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दशक (IDNDR) घोषित किया गया
साथ हीभारत ने एक ठोस कदम के रूप में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान बनाया
यॉकोहामा प्रस्ताव, संक्षेप में

हर देश की अपने नागरिकों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने की संप्रभु ज़िम्मेदारी है; विकासशील, स्थल-रुद्ध और छोटे द्वीपीय देशों को प्राथमिकता दी जाएगी; हर देश अपनी आपदा-निवारण क्षमता और कानून मज़बूत करेगा; और देश तकनीक साझा करने, सूचना और संसाधनों को जुटाने में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग करेंगे।

1.2 प्राकृतिक आपदाओं का वर्गीकरण

आपदाओं से वैज्ञानिक तरीके से निपटने के लिए पहले इनकी पहचान और वर्गीकरण ज़रूरी है। किताब हर प्राकृतिक आपदा को चार बड़े समूहों में बाँटती है, इस आधार पर कि वह पर्यावरण के किस हिस्से को प्रभावित करती है।

प्राकृतिक आपदाएँ
वायुमंडलीयबर्फानी तूफान, आँधी-तूफान, तड़ित, टॉरनेडो, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, सूखा, ओलावृष्टि, पाला, लू, शीत लहर
भौमिकभूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, भूस्खलन, हिमस्खलन, भू-अवतलन, मृदा अपरदन
जलीयबाढ़, ज्वारीय लहरें, तूफान महोर्मि, सुनामी
जैविकपौधे-जंतु उपनिवेशक (जैसे टिड्डी), कीट प्रकोप, फफूँद/जीवाणु/विषाणु रोग जैसे बर्ड फ्लू, डेंगू

भारत इस सूची की लगभग हर आपदा हर साल झेलता है, जिसमें हज़ारों जानें और करोड़ों रुपये की संपत्ति चली जाती है। इसकी वजह इसका विशाल आकार और विविधता है, इसीलिए विद्वान इसे भारतीय उपमहाद्वीप और विविधता में एकता की भूमि कहते हैं। विशाल भौगोलिक क्षेत्र, अनेक जलवायु और संस्कृतियाँ, लंबा औपनिवेशिक इतिहास, और बहुत बड़ी जनसंख्या, ये सब मिलकर भारत को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति कम नहीं, बल्कि और ज़्यादा सुभेद्य बनाते हैं।

2भूकंप और सुनामी

2.1 भूकंप

भूकंप सभी प्राकृतिक आपदाओं में सबसे अपूर्वसूचनीय (जिसका पहले से पता न चले) और सबसे विध्वंसक है। सबसे ज़्यादा नुकसान विवर्तनिक हलचल से आते हैं, यानी पृथ्वी की परत के अंदर गहरी हलचल से; जबकि ज्वालामुखी विस्फोट, चट्टान गिरने, भूस्खलन, खदानों में भू-अवतलन, या किसी नए बाँध-जलाशय के भार से आने वाले भूकंप बहुत छोटे क्षेत्र को प्रभावित करते हैं।

चरण 1इंडियन प्लेट हर साल लगभग 1 सेंटीमीटर उत्तर व उत्तर-पूर्व की ओर खिसकती रहती है
↓
चरण 2उत्तर में यूरेशियन प्लेट इसे रोकती है, इसीलिए दोनों प्लेटें आपस में लॉक हो जाती हैं
↓
चरण 3लॉक हुए बिंदुओं पर लगातार ऊर्जा जमा होती रहती है, और तनाव बढ़ता जाता है
↓
परिणामअंततः लॉक टूट जाता है, और हिमालय की चाप के साथ-साथ अचानक ऊर्जा निकलकर भूकंप का रूप ले लेती है
संकेत (अभ्यास प्रश्न 2)

“हिमालय और भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अधिक भूकंप क्यों आते हैं?” ऊपर दिए गए फ्लोचार्ट से एक लाइन में उत्तर दें: इंडियन प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, और जब भी जमा हुआ तनाव मुक्त होता है, भूकंप आता है।

सबसे सुभेद्य राज्य और केंद्रशासित प्रदेश हैं जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग क्षेत्र, और पूर्वोत्तर के सभी सात राज्य। यहाँ तक कि पुराने, स्थिर प्रायद्वीपीय पठार में भी भीषण भूकंप आ चुके हैं, गुजरात में 1819, 1956 और 2001 में, और महाराष्ट्र में 1967 और 1993 में। कुछ वैज्ञानिकों ने महाराष्ट्र के लातूर-ओसमानाबाद के पास भीमा (कृष्णा) नदी के साथ एक नई भ्रंश रेखा का सिद्धांत दिया है, जिसके अनुसार शायद इंडियन प्लेट वहीं टूट रही है।

1200 से ज़्यादा पुराने भूकंपों का अध्ययन करने के बाद, राष्ट्रीय भूभौतिकी प्रयोगशाला, भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण, मौसम विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने भारत को पाँच भूकंपीय क्षति-जोखिम क्षेत्रों में बाँटा है, क्रम से: अति अधिक, अधिक, मध्यम, निम्न और अति निम्न क्षति जोखिम। किताब पहले तीन क्षेत्रों के इलाके अलग-अलग बताती है, फिर बचे हुए सुरक्षित इलाकों को एक साथ रखती है, इसीलिए नीचे की तालिका भी उसी क्रम में है।

क्षति-जोखिम क्षेत्र शामिल इलाके
अति अधिक क्षति जोखिम पूर्वोत्तर के राज्य; बिहार में इंडो-नेपाल सीमा के साथ दरभंगा और अररिया के उत्तर के इलाके; उत्तराखंड; पश्चिमी हिमाचल प्रदेश (धर्मशाला के आस-पास); कश्मीर घाटी; गुजरात का कच्छ क्षेत्र
अधिक क्षति जोखिम जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के बाकी हिस्से; उत्तरी पंजाब; पूर्वी हरियाणा; दिल्ली; पश्चिमी उत्तर प्रदेश; उत्तरी बिहार
मध्यम से अति निम्न क्षति जोखिम देश के बाकी हिस्से
सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र अधिकतर दक्कन के पठार का स्थिर भूभाग

घनी आबादी वाले इलाके में भूकंप एक विपत्ति बन जाता है: यह घरों, कारखानों, सड़कों और संचार लिंक को एक साथ तोड़ देता है, और इसी वजह से बाद में राहत कार्य बहुत मुश्किल हो जाता है। भूकंप ज़मीन में दरारें भी बना सकता है जिनसे पानी और गैस बाहर निकलकर आसपास की ज़मीन को डुबो देती हैं, और यह भूस्खलन का भी कारण बनता है, जिससे नदियाँ रुक जाती हैं, कभी-कभी नई झीलें बन जाती हैं या नदी का रास्ता ही बदल जाता है।

ज़मीन पर असर मानव-निर्मित संरचनाओं पर असर पानी पर असर
दरारें, ज़मीन धँसना, भूस्खलन, द्रवीकरण, भू-दाब दरार पड़ना, खिसकना, पलटना, मुड़ना, गिरना असामान्य लहरें, जल-गतिक दबाव, सुनामी
1

निगरानी करें

लगातार निगरानी के लिए भूकंप नियंत्रण केंद्र बनाएँ, और टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल जानने के लिए जी.पी.एस. (जियोग्राफिकल पोज़ीशनिंग सिस्टम) का इस्तेमाल करें।

2

मानचित्र बनाएँ, जानकारी दें

देश का सुभेद्यता मानचित्र तैयार करें, और असुरक्षित इलाकों में रहने वाले लोगों तक यह जोखिम जानकारी पहुँचाएँ।

3

सोच-समझकर निर्माण करें

सुभेद्य इलाकों में घरों की बनावट और डिज़ाइन बदलें; वहाँ ऊँची इमारतें और बड़े उद्योग न बनने दें।

4

भूकंपरोधी डिज़ाइन अपनाएँ

सुभेद्य इलाकों में भूकंपरोधी डिज़ाइन और हल्की निर्माण सामग्री का इस्तेमाल अनिवार्य करें।

2.2 सुनामी

याद रखेंपरिभाषा 3

सुनामी (जिसे बंदरगाह लहरें या भूकंपीय समुद्री लहर भी कहते हैं) ऊँची, खड़ी समुद्री लहरों की एक शृंखला है, जो तब बनती है जब भूकंप या ज्वालामुखी विस्फोट से समुद्र तल अचानक खिसक जाता है और पानी की बहुत बड़ी मात्रा एक झटके में हट जाती है।

सुनामी गहरे समुद्र में और तट के पास बिलकुल अलग तरह से बर्ताव करती है, और यही वजह है कि खुले समुद्र में दूर मौजूद जहाज़ों को इसके गुज़रने का पता तक नहीं चलता।

गहरे समुद्र में

  • तरंग लंबाई बहुत अधिक होती है
  • लहर की ऊँचाई कम, बस एक-दो मीटर
  • जहाज़ धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होता है, और लगभग अप्रभावित रहता है

तट के पास (उथला पानी)

  • तरंग लंबाई कम होती जाती है, पर समय वही रहता है
  • लहर की ऊँचाई बढ़ जाती है, कभी-कभी 15 मीटर या उससे ज़्यादा
  • तट पर भारी तबाही मचाती है, इसीलिए इसे “उथले पानी की लहर” भी कहते हैं

सुनामी सबसे ज़्यादा प्रशांत महासागर की “रिंग ऑफ फायर” के साथ आती है, जैसे अलास्का, जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, श्रीलंका और भारत के तट। सबसे विनाशकारी सुनामी 26 दिसंबर 2004 को आई थी, जिसमें हिंद महासागर के आस-पास 300,000 से ज़्यादा लोगों की जान गई। इस आपदा के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय सुनामी चेतावनी प्रणाली से जुड़ गया।

आम गलती

सुनामी हवा या तूफान से नहीं, बल्कि समुद्र तल के अचानक खिसकने से बनती है, आमतौर पर भूकंप से। इसे चक्रवात की तूफान महोर्मि के साथ न मिलाएँ, जो अगले भाग में बताई गई बिलकुल अलग प्रक्रिया है।

3उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

याद रखेंपरिभाषा 4

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के बीच बनने वाला एक तीव्र निम्न-वायुदाब तंत्र है, जो क्षैतिज रूप से 500-1,000 किमी और ऊर्ध्वाधर रूप से 12-14 किमी तक फैला होता है, जिसके केंद्र के चारों ओर बहुत तेज़ हवाएँ चलती हैं। यह एक ऊष्मा इंजन की तरह काम करता है, जो समुद्र से हवा द्वारा इकट्ठी की गई नमी के संघनन से निकलने वाली गुप्त ऊष्मा से चलता है।

1

गर्म, नम हवा

इसकी बड़ी और लगातार आपूर्ति, जिससे भारी मात्रा में गुप्त ऊष्मा निकलती है।

2

तेज़ कोरियोलिस बल

केंद्र के निम्न दाब को भरने से रोकने के लिए ज़रूरी। यही वजह है कि 0° और 5° अक्षांश के बीच चक्रवात कभी नहीं बनते, क्योंकि वहाँ कोरियोलिस बल बहुत कमज़ोर होता है।

3

अस्थिर क्षोभमंडल

इससे वह स्थानीय हलचल बनती है जिसके चारों ओर चक्रवात घूमना शुरू करता है।

4

तेज़ ऊर्ध्वाधर वायु फान न हो

ऐसी वेज गुप्त ऊष्मा के ऊर्ध्वाधर परिवहन को बिगाड़ देती है और चक्रवात बनने से रोक देती है।

चित्र 1 (योजनामूलक चित्र, पैमाने पर नहीं; समझाने के लिए बनाया गया, पुस्तक से नहीं): उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का अनुप्रस्थ काट। गर्म, नम हवा समुद्र के ऊपर से भीतर आती है और नेत्र-भित्ति में सबसे तेज़ी से ऊपर उठती है, जहाँ संघनन से वह गुप्त ऊष्मा मुक्त होती है जो चक्रवात को ऊर्जा देती है (सबसे तेज़ हवाएँ और सबसे भारी वर्षा); बीच के शांत नेत्र में हवा नीचे उतरती है; बाहरी वर्षा पट्टियाँ थोड़ी-थोड़ी देर में भारी बारिश लाती हैं।
चित्र 1 (योजनामूलक चित्र, पैमाने पर नहीं; समझाने के लिए बनाया गया, पुस्तक से नहीं): उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का अनुप्रस्थ काट। गर्म, नम हवा समुद्र के ऊपर से भीतर आती है और नेत्र-भित्ति में सबसे तेज़ी से ऊपर उठती है, जहाँ संघनन से वह गुप्त ऊष्मा मुक्त होती है जो चक्रवात को ऊर्जा देती है (सबसे तेज़ हवाएँ और सबसे भारी वर्षा); बीच के शांत नेत्र में हवा नीचे उतरती है; बाहरी वर्षा पट्टियाँ थोड़ी-थोड़ी देर में भारी बारिश लाती हैं।
समुद्र सामान्य उत्पत्ति अक्षांश/देशांतर मौसम
बंगाल की खाड़ी 16°-21° उत्तर, 92° पूर्व से पश्चिम में; जुलाई तक लगभग 18° उत्तर और 90° पूर्व के पश्चिम में (सुंदरबन डेल्टा के पास) खिसक जाता है ज़्यादातर अक्टूबर-नवंबर; वैसे अधिकांश चक्रवात मानसून के दौरान 10°-15° उत्तर के बीच बनते हैं
अरब सागर किताब अलग से अक्षांश नहीं देती; वह केवल यह कहती है कि मानसूनी मौसम के दौरान (दोनों सागरों के) चक्रवात 10° से 15° उत्तर अक्षांशों के बीच पैदा होते हैं अधिकतर मानसूनी मौसम

समुद्र से जितनी दूर चक्रवात जाता है, उसकी ताकत उतनी ही कम होती जाती है, क्योंकि इसकी ऊर्जा गर्म, नम समुद्री हवा की गुप्त ऊष्मा से आती है। भारतीय तट पर चक्रवाती तूफानों की औसत गति 180 किमी/घंटा होती है। इनका सबसे नुकसानदेह असर तूफान महोर्मि है, यानी बहुत तेज़ हवाओं और निम्न दाब से समुद्र के स्तर का असामान्य रूप से ऊपर उठ जाना, जो भारी बारिश के साथ मिलकर बस्तियों और खेतों को डुबो देता है और ढाँचों को तोड़ देता है।

4बाढ़

याद रखेंपरिभाषा 5

बाढ़ तब आती है जब नदी चैनलों की क्षमता से ज़्यादा पानी बढ़ जाता है और वह आस-पास के निचले बाढ़ मैदानों में फैल जाता है, जिससे ज़मीन और बस्तियाँ डूब जाती हैं।

ज़्यादातर दूसरी आपदाओं के उलट, बाढ़ धीरे-धीरे बनती है और पहले से पता चले इलाकों में साल के लगभग तय समय पर आती है। इसे भारी सतही अपवाह, चक्रवात की तूफान महोर्मि, बहुत लंबे समय तक तेज़ बारिश, बर्फ-हिम का पिघलना, ज़मीन में पानी के रिसाव की कमी, या मिट्टी के कटाव से आई अतिरिक्त गाद जैसी चीज़ें पैदा कर सकती हैं। दक्षिण, दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया में, खासकर चीन, भारत और बांग्लादेश में बाढ़ें बहुत आम और नुकसानदेह हैं।

इसमें मानव गतिविधियों का भी बड़ा हाथ है: वनों की कटाई, गलत खेती के तरीके, प्राकृतिक जल-निकासी में रुकावट, और बाढ़ मैदानों व नदी-तटों पर घर व खेत बना लेना, ये सब बाढ़ को और बदतर बनाते हैं। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने भारत की 4 करोड़ हैक्टेयर ज़मीन को बाढ़-प्रवण बताया है।

बाढ़ का प्रकार प्रभावित राज्य/क्षेत्र
नदी की बाढ़ (सबसे ज़्यादा बाढ़-प्रवण राज्य) असम, पश्चिम बंगाल, बिहार; साथ ही पंजाब और उत्तर प्रदेश
चक्रवात से तटीय बाढ़ ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात
अचानक आने वाली बाढ़ (हाल का रुझान) पंजाब, राजस्थान, उत्तरी गुजरात, हरियाणा
लौटते मानसून से बाढ़ तमिलनाडु, नवंबर-जनवरी के दौरान

बाढ़ से होने वाला नुकसान

  • फसलें, सड़कें, रेल-पटरियाँ और पुल नष्ट होते हैं
  • लाखों लोग बेघर होते हैं, मवेशी बह जाते हैं
  • हैज़ा, आंत्रशोथ, हेपेटाइटिस जैसी जल-जनित बीमारियाँ फैलती हैं

बाढ़ का एक फायदा भी

  • हर साल खेतों पर उपजाऊ गाद जमा करती है
  • सबसे अच्छा उदाहरण: असम का मजौली, दुनिया का सबसे बड़ा नदीय द्वीप, ब्रह्मपुत्र की बाढ़ के बाद बेहतरीन धान की फसल देता है
  • यह फायदा नुकसान के सामने बहुत छोटा है
1

बाँध बनाएँ

बाढ़-प्रवण इलाकों में बाढ़-रोधी तटबंध और बाँध बनाएँ।

2

पेड़ लगाएँ

वनीकरण करें, और बाढ़ पैदा करने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में भारी निर्माण को हतोत्साहित करें।

3

नदी-चैनल साफ रखें

नदी चैनलों से मानव अतिक्रमण हटाएँ और बाढ़ मैदानों की आबादी घटाएँ, खासकर पश्चिम व उत्तर के अचानक-बाढ़ वाले इलाकों में।

4

तटों पर आश्रय बनाएँ

तूफान महोर्मि से प्रभावित तटीय इलाकों के लिए चक्रवात आश्रय केंद्र।

5सूखा

याद रखेंपरिभाषा 6

सूखा पानी की कमी का एक लंबा दौर है, जो अपर्याप्त बारिश, वाष्पीकरण की असामान्य रूप से तेज़ दर, और जलाशयों व भूजल के अत्यधिक इस्तेमाल से बनता है।

सूखा एक अकेली, सीधी चीज़ नहीं है, यह बारिश, वाष्पीकरण, मिट्टी की नमी, खेती के तरीकों और सामाजिक-आर्थिक हालात का जटिल मेल है। किताब इसके चार अलग-अलग प्रकार बताती है।

सूखे का प्रकार यह किस वजह से होता है
मौसम विज्ञान संबंधी सूखा समय और जगह पर बुरी तरह बँटी हुई, लंबे समय तक चली अपर्याप्त बारिश
कृषि सूखा (मिट्टी की नमी वाला सूखा) फसलों के लिए ज़रूरी मिट्टी की नमी बहुत कम रह जाना, जिससे फसल खराब हो जाती है। जिस इलाके की 30% से ज़्यादा फसली ज़मीन सिंचित है, वह इस श्रेणी से बाहर रहता है
जल विज्ञान संबंधी सूखा जलाशयों, झीलों और जलभृतों का पानी बारिश से भरने की क्षमता से कम रह जाना
पारिस्थितिक सूखा पानी की कमी से किसी प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता गिर जाना, जिससे पूरा तंत्र प्रभावित होता है
19%भारत के कुल क्षेत्रफल और 12% जनसंख्या को हर साल सूखे का सामना करना पड़ता है
30%भारत का क्षेत्र सूखा-प्रवण है, जिससे लगभग 5 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं
गंभीरता शामिल इलाके
अत्यधिक सूखा-प्रभावित अरावली पहाड़ियों के पश्चिम में राजस्थान का ज़्यादातर हिस्सा (मरुस्थली क्षेत्र) और गुजरात का कच्छ क्षेत्र; जैसलमेर और बाड़मेर ज़िलों में औसत सालाना बारिश 90 मिमी से भी कम होती है
अधिक सूखा-प्रवण पूर्वी राजस्थान, ज़्यादातर मध्य प्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक पठार के भीतरी इलाके, उत्तरी तमिलनाडु के भीतरी इलाके, दक्षिणी झारखंड, ओडिशा के भीतरी इलाके
मध्यम सूखा-प्रभावित उत्तरी राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के दक्षिणी ज़िले, गुजरात व महाराष्ट्र के बाकी हिस्से (कोंकण छोड़कर), झारखंड, तमिलनाडु का कोयंबटूर पठार, कर्नाटक के भीतरी इलाके
क्या आप जानते हैं?

किताब सूखे के बढ़ते असर के लिए चार पुराने शब्द इस्तेमाल करती है: अकाल (अनाज की कमी), तृण अकाल (चारे की कमी), जल अकाल (पानी की कमी), और जब तीनों एक साथ आ जाएँ तो त्रि-अकाल, जो सबसे भयानक स्थिति है।

इनके अलावा, सूखे से बड़ी संख्या में मवेशी मर जाते हैं, लोग अपने पशुओं के साथ पलायन करने पर मजबूर हो जाते हैं, और पानी की कमी की वजह से लोग दूषित पानी पीते हैं, जिससे आंत्रशोथ, हैज़ा और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।

1

तुरंत राहत

साफ पीने का पानी, दवाइयाँ, मवेशियों के लिए चारा-पानी, और ज़रूरत पड़ने पर लोगों व पशुओं को सुरक्षित जगह भेजना।

2

पानी खोजें

भूजल और जलभृतों की पहचान, अतिरिक्त पानी वाले इलाकों से कमी वाले इलाकों में नदी जल का स्थानांतरण, नदियों को जोड़ने की योजना, बाँध व जलाशय बनाना।

3

तकनीक का इस्तेमाल

सुदूर संवेदन और उपग्रहों से प्राप्त चित्रों से जोड़ने लायक नदी-द्रोणियों और भूमिगत जल भंडारण की संभावना का पता लगाना।

4

लंबे समय की योजना

सूखा-रोधी फसलों की जानकारी फैलाना, किसानों को इनकी खेती की ट्रेनिंग देना, और छत पर वर्षा जल संलवन को बढ़ावा देना।

6भूस्खलन

याद रखेंपरिभाषा 7

भूस्खलन गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में, किसी कमज़ोर सतह के साथ-साथ, चट्टानों और मलबे की बड़ी मात्रा का तेज़ी से ढलान पर नीचे खिसकना है।

भूकंप या चक्रवात जैसी बड़ी, क्षेत्रीय ताकतों के उलट, भूस्खलन बहुत स्थानीय हालात, जैसे भूविज्ञान, ढलान, भूमि-उपयोग, वनस्पति और मानव गतिविधि, पर निर्भर करता है। यही वजह है कि इसकी जानकारी जुटाना और मुश्किल भी है और महँगा भी।

सुभेद्यता क्षेत्र शामिल इलाके
अत्यधिक सुभेद्यता हिमालय के युवा, अस्थिर पहाड़ और अंडमान-निकोबार द्वीप; पश्चिमी घाट व नीलगिरी के तेज़ बारिश-खड़ी ढलान वाले इलाके; पूर्वोत्तर क्षेत्र; बार-बार भूकंप वाले इलाके; भारी सड़क-बाँध निर्माण वाले इलाके
अधिक सुभेद्यता लगभग वैसी ही स्थितियाँ, थोड़ी कम तीव्रता के साथ: असम के मैदानों को छोड़कर सभी हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्य
मध्यम व कम सुभेद्यता कम बारिश वाला ट्रांस-हिमालयी लद्दाख और स्पिती (हिमाचल प्रदेश); स्थिर, कम बारिश वाली अरावली पहाड़ियाँ; पश्चिमी व पूर्वी घाट के वृष्टि-छाया इलाके; दक्कन का पठार (कभी-कभार ही भूस्खलन)
खनन व अवतलन से भूस्खलन झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा, केरल
भूस्खलन से सुरक्षित राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल व असम के ज़्यादातर हिस्से, दक्षिणी राज्यों के तटीय मैदान

भले ही सीधे प्रभावित इलाका छोटा हो, भूस्खलन का असर बहुत दूर तक जा सकता है: यह सड़कें और रेल-पटरियाँ रोक सकता है, और नदी को बाँधकर या मोड़कर कहीं और बाढ़ ला सकता है। इससे उस इलाके में आना-जाना और व्यापार भी ज़्यादा जोखिम भरा और महँगा हो जाता है, जो विकास को धीमा कर देता है।

1

निर्माण सीमित करें

अत्यधिक सुभेद्यता वाले क्षेत्रों में सड़क, बाँध जैसी बड़ी परियोजनाओं को सीमित करें।

2

सोच-समझकर खेती करें

खेती को घाटियों और हल्की ढलान तक सीमित रखें; जोखिम भरे इलाकों में बड़ी बस्तियों को बढ़ने से रोकें।

3

हरियाली बढ़ाएँ

बड़े पैमाने पर वनीकरण, और जल बहाव को कम करने के लिए बाँध का निर्माण करें।

4

खेती का तरीका बदलें

पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में स्थानांतरी कृषि की जगह सीढ़ीनुमा खेती को बढ़ावा दें।

7आपदा प्रबंधन

चक्रवात असल में भूकंप, सुनामी या ज्वालामुखी विस्फोट से ज़्यादा आसानी से संभाले जा सकते हैं, क्योंकि आधुनिक निगरानी तकनीक इनके समय, जगह, दिशा और तीव्रता का काफी हद तक पहले से अनुमान लगा सकती है। इससे सरकारें पहले से चक्रवात आश्रय, तटबंध, डाइक और जलाशय बना सकती हैं, और हवा की रफ्तार धीमी करने के लिए पेड़ लगा सकती हैं। फिर भी भारत, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों में जान-माल का नुकसान होता रहता है, क्योंकि बहुत सारे लोग सीधे सुभेद्य तट पर ही रहते हैं।

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005

यह अधिनियम आपदा को इस तरह परिभाषित करता है: “किसी क्षेत्र में घटित एक महाविपत्ति, दुर्घटना, संकट या गंभीर घटना, जो प्राकृतिक या मानवकृत कारणों या दुर्घटना या लापरवाही का परिणाम हो, और जिससे बड़े स्तर पर जान की क्षति या मानव पीड़ा, पर्यावरण की हानि एवं विनाश हो, और जिसकी प्रकृति या परिमाण प्रभावित क्षेत्र में रहने वाले मानव समुदाय की सहनक्षमता से परे हो।”

हर आपदा से, चाहे उसकी वजह कुछ भी हो, तीन चरणों में निपटा जाता है।

चरण 1 · आपदा से पहलेआँकड़े और सूचना इकट्ठा करना, सुभेद्यता मानचित्र तैयार करना, जागरूकता फैलाना, और योजना, तैयारी व निवारण के उपाय पहले से करना
↓
चरण 2 · आपदा के समययुद्ध स्तर पर बचाव व राहत: लोगों को निकालना, आश्रय स्थल व राहत कैंप बनाना, पानी, भोजन, कपड़े व दवाई पहुँचाना
↓
चरण 3 · आपदा के पश्चातप्रभावित लोगों का बचाव और पुनर्वास, और भविष्य की आपदाओं से निपटने के लिए क्षमता-निर्माण पर ध्यान
2/3भारत का लगभग इतना क्षेत्र, और लगभग उतनी ही जनसंख्या, किसी न किसी आपदा के प्रति सुभेद्य है

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की स्थापना, ये भारत सरकार के इस दिशा में उठाए गए दो सबसे स्पष्ट कदम हैं।

आपदाएँ प्राकृतिक या मानवकृत, दोनों तरह की हो सकती हैं, पर हर संकट आपदा नहीं बनता, और चूँकि प्राकृतिक आपदाओं को असल में रोका नहीं जा सकता, इसीलिए इनके निवारण और तैयारी ही एकमात्र असली रास्ता है।

अध्याय का अपना निष्कर्ष

झटपट रिवीज़न: परीक्षा से पहले रात में यही पढ़ें
  • संकट यानी नुकसान की संभावना; आपदा यानी वह नुकसान जो असल में बड़े और बेकाबू स्तर पर हो चुका है
  • भारत अपने विशाल आकार, विविध जलवायु, और बड़ी, असमान रूप से सुरक्षित जनसंख्या की वजह से बहुत आपदा-प्रवण है
  • प्राकृतिक आपदाएँ चार समूहों में बँटती हैं: वायुमंडलीय, भौमिक, जलीय और जैविक
  • भूकंप इंडियन प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने से आते हैं; भारत में अति अधिक से अति निम्न तक 5 क्षति-जोखिम क्षेत्र हैं
  • सुनामी गहरे समुद्र में छोटी और तट के पास बहुत बड़ी होती है, जो ज़्यादातर लोगों की सोच से बिलकुल उलटा है
  • उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को गर्म-नम हवा, तेज़ कोरियोलिस बल, अस्थिर क्षोभमंडल और बिना ऊर्ध्वाधर वायु फान चाहिए, और भूमध्य रेखा के 5° के अंदर कभी नहीं बनता
  • बाढ़ सुनिश्चित क्षेत्रों में और वर्ष के अपेक्षित समय पर आती है; असम, पश्चिम बंगाल और बिहार अधिक बाढ़-प्रवण राज्य हैं
  • सूखे के 4 प्रकार हैं (मौसम विज्ञान संबंधी, कृषि, जल विज्ञान संबंधी, पारिस्थितिक), और सबसे ज़्यादा असर पश्चिमी राजस्थान व कच्छ में पड़ता है
  • भूस्खलन क्षेत्रीय नहीं, बल्कि स्थानीय कारकों से नियंत्रित होता है, इसीलिए इसकी निगरानी सबसे मुश्किल है
  • आपदा प्रबंधन के हमेशा 3 चरण होते हैं: आपदा-पूर्व योजना, आपदा के समय बचाव-राहत, और आपदा-पश्चात पुनर्वास
अभ्यास प्रश्न: 1 अंक
  1. 1 अंकप्राकृतिक संकट की परिभाषा दें।
  2. 1 अंकप्राकृतिक आपदाओं को वर्गीकृत करने वाले चार समूहों के नाम बताएँ।
  3. 1 अंकतूफान महोर्मि क्या है?
  4. 1 अंकउस आयोग का नाम बताएँ जिसने भारत की 4 करोड़ हैक्टेयर ज़मीन को बाढ़-प्रवण बताया।
  5. 1 अंकअकाल, तृण अकाल और जल अकाल का क्या मतलब है?
  6. 1 अंकभारत के सबसे बड़े नदीय द्वीप का नाम और वह किस नदी में है, बताएँ।
  7. 1 अंकस्थानांतरी कृषि क्या है, और यह कहाँ की जाती है?
अभ्यास प्रश्न: 2 और 3 अंक
  1. 2 अंकसंकट किस दशा में आपदा बन जाता है?
  2. 2 अंकहिमालय और भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अधिक भूकंप क्यों आते हैं?
  3. 2 अंकउष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति के लिए बुनियादी शर्तें क्या हैं?
  4. 2 अंकपूर्वी भारत की बाढ़, पश्चिमी भारत की बाढ़ से कैसे अलग है?
  5. 2 अंकमध्य और पश्चिमी भारत में सूखा ज़्यादा क्यों पड़ता है?
  6. 3 अंकप्राकृतिक संकट और प्राकृतिक आपदा में एक-एक उदाहरण के साथ अंतर बताएँ।
  7. 3 अंकसुनामी गहरे समुद्र में कम और तट के पास ज़्यादा नुकसान क्यों करती है?
  8. 3 अंकसूखे के चार प्रकार और उनके कारण बताएँ।
अभ्यास प्रश्न: 5 अंक
  1. 5 अंकभारत में भूस्खलन-प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करें और इनसे होने वाली आपदाओं को कम करने के उपाय सुझाएँ।
  2. 5 अंकसुभेद्यता क्या है? सूखे के आधार पर भारत को सुभेद्यता क्षेत्रों में बाँटें और निवारण के उपाय सुझाएँ।
  3. 5 अंकविकास कार्य कब आपदा का कारण बन सकता है? इस अध्याय के उदाहरणों से समझाएँ।
  4. 5 अंकभारत के पाँच भूकंपीय क्षति-जोखिम क्षेत्रों और भूकंप का नुकसान घटाने के कदमों का वर्णन करें।
  5. 5 अंकआपदा प्रबंधन के तीन चरण समझाएँ, हर चरण में किए जाने वाले एक-एक काम के उदाहरण के साथ।
  6. 5 अंकभुज और लातूर भूकंपों पर एक टिप्पणी लिखें, और इन्होंने भारत के “स्थिर” प्रायद्वीपीय पठार के बारे में क्या दिखाया।
बहुवैकल्पिक प्रश्न
  1. 1 अंकभारत के निम्नलिखित राज्यों में से किसमें बाढ़ सबसे ज़्यादा आती है?
    (क) बिहार(ख) पश्चिम बंगाल(ग) असम(घ) उत्तर प्रदेश
  2. 1 अंकउत्तराखंड के किस ज़िले में मालपा भूस्खलन आपदा हुई थी?
    (क) बागेश्वर(ख) चंपावत(ग) अल्मोड़ा(घ) पिथोरागढ़
  3. 1 अंकनिम्नलिखित में से किस राज्य में सर्दी के महीनों में बाढ़ आती है?
    (क) असम(ख) पश्चिम बंगाल(ग) केरल(घ) तमिलनाडु
  4. 1 अंकदुनिया का सबसे बड़ा नदीय द्वीप मजौली किस नदी में स्थित है?
    (क) गंगा(ख) ब्रह्मपुत्र(ग) गोदावरी(घ) सिंधु
  5. 1 अंकबर्फानी तूफान किस प्राकृतिक संकट समूह में आता है?
    (क) वायुमंडलीय(ख) जलीय(ग) भौमिक(घ) जैविक
  6. 1 अंक0° और 5° अक्षांश के बीच उष्ण कटिबंधीय चक्रवात नहीं बनता, क्योंकि:
    (क) वहाँ समुद्र बहुत ठंडा है(ख) वहाँ कोरियोलिस बल बहुत कमज़ोर है(ग) वहाँ नमी नहीं है(घ) वहाँ क्षोभमंडल बहुत स्थिर है
  7. 1 अंक“आपदा” को परिभाषित करने वाला आपदा प्रबंधन अधिनियम किस वर्ष पारित हुआ?
    (क) 1994(ख) 1999(ग) 2005(घ) 2010
  8. 1 अंकयॉकोहामा रणनीति और सुरक्षित विश्व के लिए कार्य-योजना किस सम्मेलन में अपनाई गई?
    (क) 1989(ख) 1993(ग) मई 1994(घ) 2000
अभिकथन और कारण
  1. 1 अंक
    अभिकथन (A): खुले समुद्र में दूर मौजूद जहाज़ सुनामी से लगभग अप्रभावित रहते हैं।
    कारण (R): गहरे पानी में सुनामी की तरंगदैर्ध्य बहुत लंबी और ऊँचाई बहुत कम होती है, इसीलिए यह जहाज़ को सिर्फ एक-दो मीटर ही ऊपर उठाती है।
  2. 1 अंक
    अभिकथन (A): दक्कन का पठार भूकंप के मामले में भारत के सबसे सुरक्षित इलाकों में से एक माना जाता है।
    कारण (R): यह एक स्थिर भूभाग है जो निम्न से अति निम्न भूकंपीय क्षति-जोखिम क्षेत्र में आता है।
  3. 1 अंक
    अभिकथन (A): हर प्राकृतिक संकट अंततः प्राकृतिक आपदा बन ही जाता है।
    कारण (R): आपदा तभी बनती है जब कोई संकट असल में घटित होकर किसी समुदाय की सहनक्षमता से ज़्यादा नुकसान कर दे।
उत्तर कुंजी
बहुवैकल्पिक 1-8(ग) असम · (घ) पिथोरागढ़ · (घ) तमिलनाडु · (ख) ब्रह्मपुत्र · (क) वायुमंडलीय · (ख) कोरियोलिस बल कमज़ोर · (ग) 2005 · (ग) मई 1994
A&R 1(क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या करता है
A&R 2(क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या करता है
A&R 3(घ) A गलत है, हर संकट आपदा नहीं बनता; R अपने आप में सही है
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