व्यापार
आयात प्रतिस्थापनहरित क्रांतिकांडलाजेएनपीटी
मुंबई पत्तनउड़ानरत्न और आभूषणडि-लाइसेंसिंग
1भारत के विदेश व्यापार की वृद्धि और प्रारूप
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दो देशों के बीच होने वाला व्यापार है। यह सभी देशों के लिए फ़ायदेमंद है, क्योंकि कोई भी देश अपनी हर ज़रूरत खुद पूरी नहीं कर सकता; हर देश को कुछ चीज़ें दूसरे देशों से खरीदनी पड़ती हैं और कुछ चीज़ें, जो वह अच्छी बनाता है, बेचनी पड़ती हैं। विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बहुत छोटी है, कुल मात्रा का सिर्फ़ लगभग 1%, फिर भी विश्व की अर्थव्यवस्था में इसकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दो या अधिक देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान है। यह इसलिए होता है क्योंकि कोई भी देश अपनी सभी ज़रूरतों के लिए आत्मनिर्भर नहीं है।
स्वतंत्रता के बाद से भारत के विदेश व्यापार में मात्रा, संघटन और दिशा, तीनों में बड़ा बदलाव आया है। 1950-51 में भारत का वैदेशिक व्यापार सिर्फ़ ₹1,214 करोड़ का था। 2021-22 तक यह बढ़कर लगभग ₹77,19,796 करोड़ हो गया। इस तेज़ वृद्धि की कई वजहें हैं: विनिर्माण क्षेत्र में आई तेज़ी, सरकार की उदार व्यापार नीतियाँ, और बाज़ारों की विविधरूपता।
व्यापार संतुलन किसी देश के निर्यात और आयात के मूल्य का अंतर है। जब आयात का मूल्य निर्यात से ज़्यादा हो, तो व्यापार संतुलन ऋणात्मक होता है, जिसे व्यापार घाटा कहते हैं।
तालिका 8-1 दिखाती है कि आयात और निर्यात, दोनों लगातार बढ़े हैं, फिर भी आयात का मूल्य हमेशा निर्यात से ज़्यादा रहा है, यानी भारत का व्यापार घाटा लगातार बना हुआ है।
| वर्ष | निर्यात (₹ करोड़) | आयात (₹ करोड़) | व्यापार संतुलन (₹ करोड़) |
|---|---|---|---|
| 2004-05 | 3,75,340 | 5,01,065 | −1,25,725 |
| 2009-10 | 8,45,534 | 13,63,736 | −5,18,202 |
| 2013-14 | 19,05,011 | 27,15,434 | −8,10,423 |
| 2016-17 | 18,52,340 | 25,77,422 | −7,25,082 |
| 2021-22 | 31,47,021 | 45,72,775 | −14,25,753 |
स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 और 2022-23 (NCERT तालिका 8-1)

“भारत का व्यापार संतुलन हमेशा से ऋणात्मक रहा है” यह तथ्य सीधे पूछा जाता है। जवाब में तालिका 8-1 से कम-से-कम दो वर्षों के आँकड़े ज़रूर लिखें।
2भारत के निर्यात का संघटन
भारत क्या निर्यात करता है, इसका मिश्रण लगातार बदलता रहा है। निर्यात में कृषि एवं समवर्गी उत्पाद और विनिर्मित वस्तुओं की हिस्सेदारी घटी है, जबकि पेट्रोलियम एवं अपरिष्कृत उत्पाद और अन्य वस्तुओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। अयस्क और खनिजों की हिस्सेदारी लगभग स्थिर बनी रही है।
| वस्तु समूह | 2015-16 | 2016-17 | 2020-21 | 2021-22 |
|---|---|---|---|---|
| कृषि एवं समवर्गी उत्पाद | 12.6% | 12.3% | 14.3% | 11.9% |
| अयस्क एवं खनिज | 1.6% | 1.9% | 3.2% | 2.0% |
| विनिर्मित वस्तुएँ | 72.9% | 73.6% | 71.2% | 67.8% |
| पेट्रोलियम व अपरिष्कृत उत्पाद | 11.9% | 11.7% | 9.2% | 16.4% |
| अन्य वस्तुएँ | 1.1% | 0.5% | 2.1% | 1.9% |
निर्यात में प्रतिशत हिस्सेदारी। स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 और 2022-23 (NCERT तालिका 8-2)
पारंपरिक कृषि वस्तुओं में काजू के निर्यात में गिरावट आई है, इसकी वजह चीन और दूसरे पूर्वी एशियाई देशों से मिल रही कड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा है। लेकिन कुछ नई कृषि वस्तुओं का निर्यात बढ़ा है: फूलों की खेती से जुड़े उत्पाद, ताज़े फल, समुद्री उत्पाद और चीनी। 2021-22 में भारत के कुल निर्यात मूल्य में अकेले विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 67.8% थी, और इसमें इंजीनियरिंग वस्तुओं ने अच्छी वृद्धि दिखाई। भारत के विदेश व्यापार में रत्न और आभूषणों की भी बड़ी हिस्सेदारी है।
| वस्तु समूह | निर्यात मूल्य 2021-22 (₹ करोड़) |
|---|---|
| कृषि एवं समवर्गी उत्पाद | 3,75,742 |
| अयस्क एवं खनिज | 63,754 |
| विनिर्मित वस्तुएँ | 21,32,296 |
| खनिज ईंधन और स्नेहक | 5,15,310 |
स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 (NCERT तालिका 8-3)
✓ बढ़ते हुए निर्यात
- पेट्रोलियम व अपरिष्कृत उत्पाद
- अन्य वस्तुएँ
- पुष्पकृषि, ताज़े फल, समुद्री उत्पाद, चीनी
- इंजीनियरिंग वस्तुएँ, रत्न और आभूषण
✗ घटते हुए निर्यात
- कृषि एवं समवर्गी उत्पाद (कुल हिस्सेदारी)
- विनिर्मित वस्तुएँ (कुल हिस्सेदारी)
- काजू जैसी पारंपरिक वस्तुएँ
3भारत के आयात का संघटन
भारत ने 1950 और 1960 के दशक में खाद्यान्नों की गंभीर कमी झेली। उस समय आयात की प्रमुख वस्तुएँ थीं: खाद्यान्न, पूँजीगत माल, मशीनरी और उपस्कर। आयात हमेशा निर्यात से ज़्यादा रहने के कारण भुगतान संतुलन नकारात्मक ही रहा, चाहे आयात प्रतिस्थापन के कितने भी प्रयास किए गए हों।
आयात प्रतिस्थापन का मतलब है, जो चीज़ पहले विदेश से मँगानी पड़ती थी, उसे देश के अंदर ही बनाना, ताकि विदेशी सामान पर निर्भरता कम हो और विदेशी मुद्रा बचे।
भारत के आयात की अन्य प्रमुख वस्तुओं में मोती, बहुमूल्य और अल्प मूल्य रत्न, सोना-चांदी, और अलौह धातुएँ शामिल हैं।
| वस्तु समूह | 2015-16 | 2016-17 | 2020-21 | 2021-22 |
|---|---|---|---|---|
| खाद्य एवं संबंधित वस्तुएँ | 5.1% | 5.6% | 4.5% | 4.4% |
| ईंधन (कोयला, POL) | 25.4% | 26.7% | 25.1% | 31.6% |
| उर्वरक | 2.1% | 1.3% | 1.9% | 2.3% |
| पेपरबोर्ड विनिर्माण और अखबारी कागज़ | 0.8% | 0.9% | 0.8% | 0.7% |
| पूँजीगत वस्तुएँ | 13.0% | 13.6% | 12.7% | 10.1% |
| अन्य | 38.1% | 37.0% | 41.6% | 38.5% |
आयात में प्रतिशत हिस्सेदारी। स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 (NCERT तालिका 8-4)
| वस्तु | आयात मूल्य 2021-22 (₹ करोड़) |
|---|---|
| उर्वरक एवं उर्वरक विनिर्माण | 1,05,796 |
| खाद्य तेल | 1,41,532 |
| लुगदी और अपशिष्ट कागज़ | 11,934 |
| अलौह धातुएँ | 4,99,766 |
| लोहा और इस्पात | 94,053 |
| पेट्रोलियम, तेल और स्नेहक | 12,07,803 |
| मोती, बहुमूल्य एवं अल्प मूल्य रत्न | 2,31,279 |
| चिकित्सीय एवं भेषजीय उत्पाद | 67,545 |
| रासायनिक उत्पाद | 3,08,882 |
स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 (NCERT तालिका 8-5)
छात्र अक्सर सोचते हैं कि अपने तेल क्षेत्र मिलने के बाद भारत ने पेट्रोलियम आयात करना बंद कर दिया। असल में पेट्रोलियम, तेल और स्नेहक ही भारत की सबसे बड़ी आयात वस्तु है; 1970 के दशक के बाद जो बदलाव आया वह यह था कि खाद्यान्न के आयात की जगह उर्वरक और पेट्रोलियम ने ले ली, आयात पूरी तरह बंद नहीं हुआ।
4भारत के व्यापार की दिशा
भारत के व्यापारिक संबंध विश्व के अधिकतर देशों और प्रमुख व्यापारी गुटों के साथ हैं। तालिका 8-6 भारत के क्षेत्रवार आयात व्यापार को दो वर्षों के लिए दिखाती है।
| क्षेत्र | आयात 2016-17 (₹ करोड़) | आयात 2021-22 (₹ करोड़) |
|---|---|---|
| यूरोप | 4,03,972 | 6,40,577 |
| अफ्रीका | 1,93,327 | 3,68,156 |
| उत्तरी अमेरिका | 1,95,332 | 3,78,041 |
| लैटिन अमेरिका | 1,15,762 | 1,61,995 |
| एशिया एवं आसियान | 15,44,520 | 29,18,577 |
स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 और 2022-23 (NCERT तालिका 8-6)
भारत का उद्देश्य आगामी पाँच वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अपनी हिस्सेदारी दुगुनी करना है। इसके लिए भारत पहले से ही कुछ अनुकूल उपाय अपना चुका है: आयात उदारीकरण, आयात करों में कमी, डि-लाइसेंसिंग (विअनुज्ञाकरण), और प्रक्रिया से उत्पाद के एकस्व (पेटेंट) में बदलाव।
भारत का अधिकतर विदेशी व्यापार समुद्री और वायु मार्गों से होता है। एक छोटा-सा हिस्सा सड़क मार्ग से भी होता है, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ।
5प्रवेश द्वार के रूप में समुद्री पत्तन
भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा है और इसकी तटरेखा लंबी है। जल सस्ते परिवहन के लिए एक सपाट, सस्ता तल देता है, बशर्ते समुद्र में हलचल न हो। इसीलिए भारत में समुद्री यात्राओं की एक लंबी परंपरा रही है; भारत के कई जगहों के नाम “पत्तन” शब्द से जुड़े हैं। एक दिलचस्प परीक्षा-योग्य तथ्य: भारत के पश्चिमी तट पर पूर्वी तट से ज़्यादा पत्तन हैं।
भारत में पत्तनों का उपयोग प्राचीन काल से होता आया है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रवेश द्वार के रूप में इनका उभरना यूरोपीय व्यापारियों के आगमन और अंग्रेज़ों द्वारा भारत के उपनिवेशीकरण के बाद ही महत्त्वपूर्ण बना। इसी वजह से पत्तनों के आकार और गुणवत्ता में विविधता आई: कुछ पत्तनों का प्रभाव क्षेत्र बहुत बड़ा हो गया, कुछ का सीमित ही रहा।
पृष्ठ प्रदेश किसी पत्तन का वह भीतरी क्षेत्र है जिसकी सेवा वह पत्तन करता है, यानी जहाँ से माल इकट्ठा होकर निर्यात के लिए आता है, और जहाँ आयातित माल बाँटा जाता है। पृष्ठ प्रदेश की सीमा तय करना मुश्किल है, क्योंकि यह क्षेत्र पर स्थिर नहीं होता और अक्सर दूसरे पत्तन के पृष्ठ प्रदेश से मिल भी जाता है।
प्रमुख पत्तन (12)
- नीति केंद्र सरकार तय करती है
- केंद्र सरकार नियामक कार्य भी संभालती है
- कुल यातायात का बड़ा हिस्सा इन्हीं से गुज़रता है
छोटे / मझोले पत्तन (200)
- नीति और कार्य राज्य सरकारें तय करती हैं
- हर एक की यातायात हिस्सेदारी छोटी होती है
अंग्रेज़ों ने भारतीय पत्तनों का उपयोग मुख्यतः अपने पृष्ठ प्रदेशों के संसाधनों को खींचने के “चूषण केंद्र” के रूप में किया। जैसे-जैसे रेलवे भीतरी इलाकों तक फैली, स्थानीय बाज़ार क्षेत्रीय बाज़ारों से, क्षेत्रीय बाज़ार राष्ट्रीय बाज़ारों से, और राष्ट्रीय बाज़ार अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से जुड़ते चले गए। यह क्रम 1947 तक चलता रहा।
यह उम्मीद थी कि स्वतंत्रता के बाद यह “चूषण” वाला क्रम उलट जाएगा, लेकिन विभाजन ने भारत से इसके दो सबसे महत्त्वपूर्ण पत्तन ही छीन लिए: कराची पत्तन पाकिस्तान चला गया, और चिटगाँव पत्तन तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान, यानी आज के बांग्लादेश में चला गया। यह परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य है; दोनों पत्तनों और दोनों देशों को गड्डमड्ड न करें।
इस नुकसान की भरपाई के लिए कई नए पत्तन विकसित किए गए: पश्चिम में कांडला, और पूर्व में कोलकाता के पास हुगली नदी पर डायमंड हार्बर। इतने बड़े झटके के बावजूद, स्वतंत्रता के बाद भारतीय पत्तन लगातार बढ़ते रहे और आज आधुनिक अवसंरचना के साथ घरेलू और विदेशी, दोनों तरह का बड़ा व्यापार संभालते हैं। पहले पत्तनों के विकास और आधुनिकीकरण की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सरकारी अभिकरणों की थी; आज यातायात बढ़ने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले खड़ा होने की ज़रूरत को देखते हुए निजी उद्यमियों को भी बुलाया जाता है।
6भारत के प्रमुख पत्तन
भारत के तट पर 12 प्रमुख पत्तन हैं। हर एक की अपनी खास कहानी, माल या पृष्ठ प्रदेश है।
6.1 पश्चिमी तट के पत्तन
| पत्तन | स्थिति और प्रकार | खासियत | पृष्ठ प्रदेश |
|---|---|---|---|
| दीनदयाल पत्तन (कांडला) | कच्छ की खाड़ी के मुहाने पर | मुंबई पर दबाव घटाने के लिए बना; पेट्रोलियम, पेट्रोलियम उत्पाद और उर्वरक के लिए खास सुविधा; वाडीनार में अपतटीय टर्मिनल | पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत |
| मुंबई | प्राकृतिक पत्तन, भारत का सबसे बड़ा पत्तन | मध्य पूर्व, भूमध्यसागरीय देशों, उत्तरी अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और यूरोप के मार्गों के पास; 20 किमी लंबा, 6-10 किमी चौड़ा, 54 गोदियाँ, देश का सबसे बड़ा तेल टर्मिनल | मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान का कुछ हिस्सा |
| जवाहरलाल नेहरू पत्तन (न्हावा-शेवा) | मुंबई का अनुषंगी पत्तन | मुंबई पर दबाव कम करने के लिए विकसित; भारत का सबसे बड़ा कंटेनर पत्तन | मुंबई जैसा ही |
| मुरगांव | ज़ुआरी नदमुख के मुहाने पर, गोवा; प्राकृतिक पत्तन | 1961 के पुनर्प्रतिरूपण के बाद महत्त्व बढ़ा, जापान को लौह-अयस्क निर्यात के लिए; कोंकण रेलवे ने पृष्ठ प्रदेश काफ़ी बढ़ाया | कर्नाटक, गोवा, दक्षिणी महाराष्ट्र |
| न्यू मंगलौर | कर्नाटक | लौह-अयस्क और लौह-सांद्र का निर्यात; उर्वरक, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य तेल, कॉफ़ी, चाय, लुगदी, सूत, ग्रेनाइट पत्थर, शीरा भी संभालता है | कर्नाटक |
| कोच्चि | वेम्बनाड कयाल के मुहाने पर; प्राकृतिक पत्तन, “अरब सागर की रानी” | स्वेज-कोलंबो जहाज़ी मार्ग के पास | केरल, दक्षिणी कर्नाटक, दक्षिण-पश्चिमी तमिलनाडु |
6.2 पूर्वी तट के पत्तन
| पत्तन | स्थिति और प्रकार | खासियत | पृष्ठ प्रदेश |
|---|---|---|---|
| कोलकाता (श्यामा प्रसाद मुखर्जी) | हुगली नदी पर, बंगाल की खाड़ी से 128 किमी भीतर | अंग्रेज़ों ने विकसित किया; निर्यात विशाखापट्नम, पारादीप और अपने ही अनुषंगी पत्तन हल्दिया की ओर मुड़ने से महत्त्व घटा; हुगली में गाद जमने की समस्या | उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, पूर्वोत्तर राज्य; नेपाल और भूटान को भी सेवा |
| हल्दिया | कोलकाता से 105 किमी अनुप्रवाह पर | कोलकाता की भीड़भाड़ कम करने के लिए बना; बड़ा माल संभालता है: लौह-अयस्क, कोयला, पेट्रोलियम और उत्पाद, उर्वरक, जूट और जूट उत्पाद, कपास और सूती धागा | कोलकाता जैसा ही |
| पारादीप | महानदी डेल्टा में, कटक से लगभग 100 किमी | सबसे गहरा पोताश्रय, बहुत बड़े जहाज़ों के लिए उपयुक्त; मुख्यतः बड़े पैमाने पर लौह-अयस्क के निर्यात के लिए विकसित | ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड |
| विशाखापट्नम | आंध्र प्रदेश; भू-आबद्ध पोताश्रय, ठोस चट्टान और बालू काटकर बनी नहर से समुद्र से जुड़ा | लौह-अयस्क, पेट्रोलियम और सामान्य माल के लिए बाहरी पत्तन | आंध्र प्रदेश, तेलंगाना |
| चेन्नई | पूर्वी तट के सबसे पुराने पत्तनों में से एक; कृत्रिम पत्तन, 1859 में बना | तट के पास उथले पानी की वजह से बहुत बड़े जहाज़ों के लिए उपयुक्त नहीं | तमिलनाडु, पुदुच्चेरी |
| कामराजार (एन्नोर) | चेन्नई से 25 किमी उत्तर | नया विकसित पत्तन, चेन्नई पर दबाव कम करने के लिए | तमिलनाडु |
| वी-ओ- चिदंबरनार (तूतीकोरिन) | तमिलनाडु | चेन्नई पर दबाव कम करने के लिए ही विकसित; कोयला, नमक, खाद्यान्न, खाद्य तेल, चीनी, रसायन, पेट्रोलियम उत्पाद संभालता है | तमिलनाडु |
“पत्तन और पोताश्रय में अंतर बताइए” यह सीधा 2-3 अंकों वाला सवाल है। पोताश्रय समुद्र का वह सुरक्षित हिस्सा है जहाँ जहाज़ सुरक्षित रुक सकते हैं, प्राकृतिक (जैसे मुंबई, मुरगांव, कोच्चि) या कृत्रिम (जैसे चेन्नई)। पत्तन वह पोताश्रय है जहाँ गोदियाँ, क्रेन और गोदाम बनाकर माल और यात्रियों को चढ़ाने-उतारने की व्यवस्था कर दी गई हो। हर पत्तन को एक पोताश्रय चाहिए, लेकिन हर पोताश्रय पत्तन के रूप में विकसित नहीं होता।
7हवाई अड्डे और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वायु परिवहन की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसका फ़ायदा यह है कि यह लंबी दूरी तक उच्च मूल्य वाले या नाशवान सामान को सबसे कम समय में ले जा सकता है। लेकिन यह बहुत महँगा है और भारी, स्थूल वस्तुओं के लिए उपयुक्त नहीं, इसीलिए वायु व्यापार की हिस्सेदारी समुद्री व्यापार के मुक़ाबले हमेशा छोटी ही रहती है।
वायु व्यापार का फ़ायदा
- ढुलाई और निपटान में सबसे कम समय
- उच्च मूल्य वाले सामान के लिए बेहतर (आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स)
- लंबी दूरी पर नाशवान सामान के लिए बेहतर (फूल, फल)
वायु व्यापार का नुकसान
- समुद्री परिवहन से बहुत महँगा
- भारी, स्थूल वस्तुओं के लिए अनुपयुक्त
- इसीलिए इसकी कुल हिस्सेदारी समुद्री मार्गों के आगे छोटी रह जाती है
देश में 25 प्रमुख हवाई अड्डे काम कर रहे थे (वार्षिक रिपोर्ट 2016-17): अहमदाबाद, बेंगलूरु, चेन्नई, दिल्ली, गोवा, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई, तिरुवनंतपुरम, श्रीनगर, जयपुर, कालीकट, नागपुर, कोयम्बटूर, कोच्चि, लखनऊ, पुणे, चंडीगढ़, मंगलूरु, विशाखापट्नम, इंदौर, पटना, भुवनेश्वर और कन्नूर।
उड़ान योजना, जो 2017 से चल रही है, अब तक देशभर के 73 असेवित या अल्पसेवित हवाई अड्डों को चालू कर चुकी है, जिसमें 9 हेलीपोर्ट और 2 जल हवाई अड्डे भी शामिल हैं (स्रोत: पीआईबी, नागरिक उड्डयन मंत्रालय, भारत सरकार, 2023)।
भारत के वायु परिवहन की खासियतें, जैसे भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और अलग-अलग एयरलाइनें, परिवहन वाले अध्याय में विस्तार से पढ़ाई गई हैं। भारत के वायु मार्गों की पूरी तस्वीर के लिए वह अध्याय दोबारा देखें।
- विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ़ ~1% है, पर व्यापार मूल्य ₹1,214 करोड़ (1950-51) से बढ़कर ₹77,19,796 करोड़ (2021-22) हो गया। आयात हमेशा निर्यात से ज़्यादा रहा है, इसीलिए भारत का व्यापार घाटा लगातार बना हुआ है (तालिका 8-1)।
- निर्यात: विनिर्माण (2021-22 में 67.8%) और कृषि की हिस्सेदारी घट रही है; पेट्रोलियम और अन्य वस्तुओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है; काजू घट रहा है, पुष्पकृषि/फल/समुद्री उत्पाद/चीनी बढ़ रहे हैं; रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग वस्तुएँ बड़ी कमाई देती हैं।
- आयात: 1950-60 के दशक की खाद्य कमी से खाद्यान्न सबसे बड़ा आयात बना; हरित क्रांति ने 1970 के बाद इसे खत्म किया; 1973 के ऊर्जा संकट ने पेट्रोलियम और उर्वरक को नया मुख्य आयात बना दिया; पूँजीगत वस्तुओं का आयात लगातार घट रहा है।
- व्यापार की दिशा: एशिया और आसियान भारत के आयात का सबसे बड़ा स्रोत है, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से कहीं आगे। भारत का लक्ष्य पाँच वर्षों में व्यापार हिस्सेदारी दोगुनी करना है, आयात उदारीकरण, कम आयात कर, डि-लाइसेंसिंग और उत्पाद पेटेंट के ज़रिए।
- व्यापार ज़्यादातर समुद्र और वायु से होता है; सिर्फ़ छोटा हिस्सा सड़क से, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान को।
- भारत में 12 प्रमुख पत्तन (केंद्र द्वारा नियमित) और 200 छोटे/मझोले पत्तन (राज्यों द्वारा नियमित) हैं; पश्चिमी तट पर पूर्वी तट से ज़्यादा पत्तन हैं।
- विभाजन ने भारत से कराची पत्तन (पाकिस्तान को) और चिटगाँव पत्तन (बांग्लादेश को) छीन लिए; भरपाई के लिए कांडला और डायमंड हार्बर विकसित हुए। पत्तनों की क्षमता 1951 के 2 करोड़ टन से बढ़कर 2016 में 83.7+ करोड़ टन हो गई।
- सभी 12 प्रमुख पत्तनों को नाम, तट, एक खासियत और पृष्ठ प्रदेश के साथ याद रखें: पश्चिम में कांडला, मुंबई, जेएनपीटी, मुरगांव, न्यू मंगलौर, कोच्चि; पूर्व में कोलकाता, हल्दिया, पारादीप, विशाखापट्नम, चेन्नई, एन्नोर, तूतीकोरिन।
- वायु व्यापार सबसे तेज़ पर सबसे महँगा है, इसीलिए इसकी मात्रा कम रहती है; यह उच्च मूल्य या नाशवान सामान के लिए उपयुक्त है। उड़ान योजना (2017 से) ने 73 असेवित/अल्पसेवित हवाई अड्डे खोले हैं, जिनमें 9 हेलीपोर्ट और 2 जल हवाई अड्डे शामिल हैं।
- 1 अंकअंतर्राष्ट्रीय व्यापार को परिभाषित कीजिए।
- 1 अंकविश्व व्यापार में भारत की लगभग कितनी हिस्सेदारी है?
- 1 अंक1950-51 में भारत के वैदेशिक व्यापार का मूल्य कितना था?
- 1 अंकविभाजन में भारत ने कौन-से दो पत्तन खोए?
- 1 अंकभारत में कितने प्रमुख पत्तन हैं?
- 1 अंकभारत का सबसे बड़ा कंटेनर पत्तन कौन-सा है?
- 1 अंक“अरब सागर की रानी” किस पत्तन को कहते हैं?
- 1 अंकउड़ान योजना के तहत कब से असेवित हवाई अड्डे चालू किए जा रहे हैं?
- 1 अंकभारत के किस तट पर ज़्यादा पत्तन हैं, पूर्वी या पश्चिमी?
- 1 अंकव्यापार घाटा क्या होता है?
- 3 अंकभारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
- 2 अंकपत्तन और पोताश्रय में अंतर बताइए।
- 2 अंकपृष्ठप्रदेश के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
- 3 अंकवे महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ बताइए जिन्हें भारत विभिन्न देशों से आयात करता है।
- 2 अंकभारत के पूर्वी तट पर स्थित पत्तनों के नाम बताइए।
- 3 अंक1970 के दशक के बाद भारत के आयात की टोकरी खाद्यान्न से हटकर क्यों बदली?
- 2 अंकआयात प्रतिस्थापन किसे कहते हैं?
- 3 अंकभारत ने कराची और चिटगाँव पत्तन क्यों खोए, और इसकी भरपाई कैसे की गई?
- 2 अंकभारत के पश्चिमी तट पर पूर्वी तट से ज़्यादा पत्तन क्यों हैं? (संकेत: सोचिए कि यूरोपीय व्यापारियों के लिए प्रवेश द्वार कौन-से बने।)
- 3 अंकभारत में प्रमुख पत्तन और छोटे पत्तन में क्या अंतर है?
- 2 अंकभारत के व्यापार में वायु परिवहन की हिस्सेदारी समुद्री परिवहन से कम क्यों रहती है, एक कारण बताइए।
- 3 अंकअंतर्राष्ट्रीय व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भारत ने कौन-से उपाय अपनाए हैं?
- 5 अंकभारत में निर्यात और आयात व्यापार के संयोजन का वर्णन कीजिए।
- 5 अंकभारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की बदलती प्रकृति पर एक टिप्पणी लिखिए।
- 5 अंकभारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रवेश द्वार के रूप में समुद्री पत्तनों की वृद्धि और भूमिका बताइए, विभाजन के असर सहित।
- 5 अंकभारत के किन्हीं पाँच प्रमुख पत्तनों का उनकी स्थिति और पृष्ठ प्रदेश सहित वर्णन कीजिए।
- 1 अंकदो देशों के मध्य व्यापार कहलाता है
(क) अंतर्देशीय व्यापार(ख) बाह्य व्यापार(ग) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार(घ) स्थानीय व्यापार - 1 अंकनिम्नलिखित में से कौन-सा एक स्थलबद्ध पोताश्रय है?
(क) विशाखापट्नम(ख) मुंबई(ग) कामराजार (एन्नोर)(घ) हल्दिया - 1 अंकभारत का अधिकांश विदेशी व्यापार वहन होता है
(क) स्थल और समुद्र द्वारा(ख) स्थल और वायु द्वारा(ग) समुद्र और वायु द्वारा(घ) समुद्र द्वारा - 1 अंकमुंबई पर दबाव कम करने के लिए अनुषंगी पत्तन के रूप में कौन-सा पत्तन विकसित किया गया?
(क) कांडला(ख) जवाहरलाल नेहरू पत्तन(ग) मुरगांव(घ) कोच्चि - 1 अंकमुरगांव पत्तन का महत्त्व 1961 के पुनर्प्रतिरूपण के बाद मुख्यतः किसके निर्यात से बढ़ा?
(क) कपास(ख) लौह-अयस्क, जापान को(ग) चाय(घ) पेट्रोलियम - 1 अंक2016 में भारत के पत्तनों की माल ढुलाई क्षमता लगभग कितनी थी?
(क) 2 करोड़ टन(ख) 20 करोड़ टन(ग) 83.7 करोड़ टन(घ) 170 करोड़ टन - 1 अंकक्षेत्रवार भारत के आयात व्यापार (2021-22) में सबसे बड़ी हिस्सेदारी किसकी है?
(क) यूरोप(ख) अफ्रीका(ग) उत्तरी अमेरिका(घ) एशिया व आसियान - 1 अंकउड़ान योजना के तहत कितने हेलीपोर्ट चालू किए गए हैं?
(क) 2(ख) 9(ग) 25(घ) 73
कारण (R): इस पूरे समय में भारत के आयात का मूल्य निर्यात के मूल्य से ज़्यादा ही रहा है।
कारण (R): भारत के विदेशी व्यापार का एक छोटा हिस्सा आज भी नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ सड़क मार्ग से होता है।
कारण (R): वायु परिवहन बहुत महँगा है और भारी, स्थूल वस्तुओं के लिए अनुपयुक्त है।
कारण (R): चेन्नई एक कृत्रिम पत्तन है, जो 1859 में उथले पानी वाले तट पर बनाया गया था।