इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. ‘कुल’ शब्द का संस्कृत ग्रंथों में क्या अर्थ है?
उत्तर: संस्कृत ग्रंथों में ‘कुल’ शब्द का प्रयोग परिवार के लिए होता था (और ‘जाति’ का बांधवों के बड़े समूह के लिए); पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी कुल के पूर्वज इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं।
प्र. मातृवंशिकता किसे कहते हैं?
उत्तर: मातृवंशिकता उस वंश-परंपरा को कहते हैं जो माँ से जुड़ी होती है, अर्थात वंश माँ की ओर से चलता है।
प्र. बहुपत्नी प्रथा क्या है?
उत्तर: बहुपत्नी प्रथा एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ होने की सामाजिक परिपाटी है।
प्र. बहुपति प्रथा क्या है?
उत्तर: बहुपति प्रथा एक स्त्री के अनेक पति होने की पद्धति है, जैसा द्रौपदी के विवाह में देखा गया।
प्र. गोत्र क्या था?
उत्तर: गोत्र एक ऐसी श्रेणी थी जिसमें लोगों (विशेषकर ब्राह्मणों) को किसी वैदिक ऋषि के नाम पर वर्गीकृत किया जाता था; उस गोत्र के सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे।
प्र. शूद्रों की जीविका क्या मानी जाती थी?
उत्तर: शूद्रों से अपेक्षा की जाती थी कि वे समाज के सुचारु संचालन में अन्य तीन वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) की सहायता करें।
प्र. चाण्डाल किसे कहा जाता था?
उत्तर: शवों की अंत्येष्टि और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा जाता था; उन्हें वर्ण-व्यवस्था में सबसे निम्न कोटि में रखा जाता था।
प्र. भगवद्गीता महाभारत के किस भाग का हिस्सा है?
उत्तर: भगवद्गीता महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश है, जहाँ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. परिवार और बंधुता के अध्ययन को इतिहासकार क्यों महत्वपूर्ण मानते हैं?
उत्तर: इतिहासकार परिवार और बंधुता संबंधी विचारों का विश्लेषण इसलिए करते हैं क्योंकि इससे लोगों की सोच का पता चलता है। संभवतः इन विचारों ने लोगों के क्रियाकलापों को प्रभावित किया होगा, और उसी तरह व्यवहार ने भी विचारों पर असर डाला होगा।
प्र. बहिर्विवाह और अंतर्विवाह में क्या अंतर है?
उत्तर: बहिर्विवाह में गोत्र से बाहर विवाह करना अपेक्षित होता है, जबकि अंतर्विवाह में वैवाहिक संबंध समूह (गोत्र, कुल, जाति या स्थान) के भीतर ही होते हैं।
प्र. गोत्र के दो प्रमुख नियम क्या थे?
उत्तर: पहला, विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था। दूसरा, एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे (सगोत्र-विवाह वर्जित था)।
प्र. सातवाहन राजाओं के नामों से क्या पता चलता है?
उत्तर: सातवाहन राजाओं के नाम जैसे ‘गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि’ उनके मातृनाम से चिह्नित थे, जो यह संकेत देता है कि माताएँ महत्वपूर्ण थीं। परंतु सिंहासन का उत्तराधिकार फिर भी पितृवंशिक ही होता था।
प्र. भगवद्गीता वर्ण-व्यवस्था के बारे में क्या संकेत देती है?
उत्तर: भगवद्गीता संकेत करती है कि चार वर्णों की व्यवस्था गुण अथवा विशेषताएँ और कर्म अथवा कार्य पर आधारित थी, न कि जन्म से निर्धारित कोई कठोर सामाजिक व्यवस्था; ऐसे ही उल्लेख बौद्ध परंपराओं में भी मिलते हैं।
प्र. श्रेणी क्या थी और मंदसौर अभिलेख इसका क्या उदाहरण देता है?
उत्तर: श्रेणी एक ही जीविका/व्यवसाय से जुड़ी जातियों का संगठन था। मंदसौर अभिलेख में लाट (गुजरात) से आए रेशम बुनकरों की एक श्रेणी का वर्णन है जो दशपुर में बसी और सामूहिक रूप से सूर्य मंदिर बनवाया।
प्र. स्त्रीधन क्या था और इस पर किसका अधिकार माना जाता था?
उत्तर: स्त्रीधन विवाह के समय स्त्री को मिले उपहारों पर उसका स्वामित्व था। इसे उसकी संतान विरासत में प्राप्त कर सकती थी और इस पर उसके पति का कोई अधिकार नहीं होता था।
प्र. सुत्तपिटक के मिथक के अनुसार ‘महासम्मत’ उपाधि किसे और क्यों दी गई?
उत्तर: सुत्तपिटक के मिथक के अनुसार लोगों ने सामूहिक रूप से एक व्यक्ति को चुना जो उचित को दंडित करे और अनुचित को निष्कासित करे; सबके द्वारा चुने जाने के कारण उसे ‘महासम्मत’ की उपाधि मिली, और बदले में लोग उसे चावल का अंश (कर) देते थे।
प्र. इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय किन पहलुओं की जाँच करते हैं?
उत्तर: इतिहासकार ग्रंथ की भाषा (संस्कृत, पालि, प्राकृत या तमिल), ग्रंथ के प्रकार (मंत्र या कथा), लेखक(कों) के दृष्टिकोण, श्रोताओं की अभिरुचि, तथा संभावित रचना-काल व रचना-भूमि की जाँच करते हैं।
प्र. बी.बी. लाल के उत्खनन में हस्तिनापुर के स्तर 3 में क्या साक्ष्य मिले?
उत्तर: स्तर 3 (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) में कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर मिले, साथ ही गंदे पानी के निकास के लिए शोषक-घट और ईंटों के नाले, तथा कुओं व मल-निकासी के लिए वलय-कूपों का प्रयोग भी मिला।
प्र. मौर्य वंश की उत्पत्ति पर बहस क्यों है?
उत्तर: बाद के बौद्ध ग्रंथों में मौर्यों को क्षत्रिय बताया गया है, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीतिक सत्ता जन्म से अधिक समर्थन और संसाधन जुटाने की क्षमता पर निर्भर करती थी।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. महाभारत की मुख्य कथा ने पितृवंशिकता के आदर्श को कैसे सुदृढ़ किया?
उत्तर: महाभारत कौरव और पांडव के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष की कहानी है। युद्ध में पांडव विजयी हुए, जिसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार को उद्घोषित किया गया। यद्यपि पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी अस्तित्व में थी, महाभारत की इस मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को समाज में और अधिक सुदृढ़ किया: पितृवंशिकता में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों, यहाँ तक कि राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे। अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से इसी प्रणाली का अनुसरण करते थे, यद्यपि पुत्र न होने पर भाई या अन्य बंधु का उत्तराधिकारी बनना, और कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों का सत्ता भोगना, इसके अपवाद भी थे।
प्र. गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि का उदाहरण जाति-व्यवस्था के भीतर आत्मसात की जटिलता को कैसे दर्शाता है?
उत्तर: गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि, सातवाहन कुल के सबसे प्रसिद्ध शासक, ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और साथ ही क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया: जबकि ब्राह्मणीय शास्त्रों के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए। उसने यह भी दावा किया कि उसने चार वर्णों के बीच विवाह संबंधों पर रोक लगाई, अर्थात वह वर्ण-शुद्धता का समर्थक था। फिर भी उसने शक राजा रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध स्थापित किए, जबकि शकों को ब्राह्मण म्लेच्छ/बर्बर मानते थे। यह विरोधाभास, वर्ण-मर्यादा की रक्षा का दावा करते हुए भी उस मर्यादा से बाहर के लोगों से वैवाहिक संबंध बनाना, दिखाता है कि जाति के भीतर सामाजिक आत्मसात एक जटिल, अक्सर अंतर्विरोधी प्रक्रिया थी, जहाँ राजनीतिक सुविधा शास्त्रीय आदर्शों पर हावी हो सकती थी।
प्र. मातंग जातक की कथा चाण्डालों के प्रतिरोध को कैसे दर्शाती है?
उत्तर: मातंग जातक में बोधिसत्त्व को एक चाण्डाल-पुत्र मातंग के रूप में चित्रित किया गया है, जो अपमान सहने के बावजूद तप से अलौकिक शक्ति प्राप्त करता है। जब उसका अपना पुत्र माण्डव्य (जो तीन वेदों का विद्वान बन चुका था) उसे यह कहकर भिक्षा देने से मना करता है कि वह ‘पतित’ है और भिक्षा के योग्य नहीं, मातंग उत्तर देता है कि जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर वे अज्ञानी हैं, वे भेंट के पात्र नहीं: इसके विपरीत जो दोषमुक्त हैं वे भेंट के योग्य हैं। यह कथा वर्ण-आधारित प्रतिष्ठा की धारणा को सीधे चुनौती देती है और दिखाती है कि बौद्ध साहित्य में चाण्डालों को केवल पीड़ित के रूप में नहीं बल्कि नैतिक श्रेष्ठता के दावेदार के रूप में भी प्रस्तुत किया गया, जो ब्राह्मणीय ग्रंथों के चित्रण से बिल्कुल भिन्न है।
प्र. द्यूत-क्रीड़ा प्रकरण स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में क्या उजागर करता है?
उत्तर: द्यूत-क्रीड़ा में युधिष्ठिर ने क्रमशः स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य व प्रजा की संपत्ति, अपने अनुजों और अंततः स्वयं को दाँव पर लगाकर गँवा दिया, और इसके बाद द्रौपदी को भी दाँव पर लगाया। इस प्रकरण पर द्रौपदी का प्रश्न, क्या स्वयं को हार चुका व्यक्ति किसी और को दाँव पर लगा सकता है, दो परस्पर-विरोधी मतों को जन्म देता है: एक मत के अनुसार पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है इसलिए यह अनुचित नहीं था, दूसरे मत के अनुसार दासत्व स्वीकार कर चुका व्यक्ति किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता। इस विवाद का कोई निष्कर्ष नहीं निकला। यह प्रकरण स्पष्ट करता है कि स्त्रियों को कुछ हद तक पति की संपत्ति जैसा भी माना जा सकता था, और यह भी कि इस पर स्वयं ग्रंथ के भीतर मतभेद मौजूद थे: जो दर्शाता है कि यह मुद्दा उस समय भी विवादास्पद रहा होगा।
प्र. इतिहासकार महाभारत जैसे ग्रंथों का उपयोग करते समय किन सावधानियों को ध्यान में रखते हैं?
उत्तर: इतिहासकार सबसे पहले यह ध्यान रखते हैं कि महाभारत जैसे ग्रंथ मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा, उन्हीं के दृष्टिकोण से, संस्कृत में लिखे गए: अतः ये सार्वभौमिक सामाजिक वास्तविकता का नहीं बल्कि एक विशेष वर्ग की दृष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरा, ग्रंथों में वर्णित आदर्श और वास्तविक व्यवहार में अंतर होता था: उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के आरंभिक इतिहासकारों की ग़लती यह थी कि उन्होंने संस्कृत ग्रंथों को सतही तौर पर पढ़कर मान लिया कि जो लिखा गया वैसा ही व्यवहार में होता था; बाद में पालि, प्राकृत व तमिल ग्रंथों से पता चला कि इन आदर्शों की अवहेलना भी होती थी। तीसरा, महाभारत जैसी विशाल, सहस्राब्दियों में रची गई रचना में विभिन्न कालों की परतें मिली हुई हैं, अतः किसी एक अंश को एक निश्चित काल का प्रतिनिधि मान लेना ग़लत होगा। चौथा, इतिहासकार यह भी परखते हैं कि ग्रंथ की रचना किस उद्देश्य और किन श्रोताओं के लिए हुई, क्योंकि इससे उसकी विषयवस्तु प्रभावित होती है।
प्र. बौद्ध सामाजिक-अनुबंध सिद्धांत के क्या व्यापक निहितार्थ थे?
उत्तर: सुत्तपिटक के मिथक के अनुसार आरंभ में मानव पूर्ण रूप से विकसित नहीं थे और सभी जीव शांति की एक आदर्श अवस्था में रहते थे, प्रकृति से आवश्यकता-भर ही ग्रहण करते थे। क्रमशः लालच, प्रतिहिंसा और कपट बढ़ने पर उन्होंने सामूहिक रूप से एक व्यक्ति को चुना जो उचित को दंडित व अनुचित को निष्कासित करे: इस सेवा के बदले उसे कर (चावल का अंश) दिया गया, और वह ‘महासम्मत’ कहलाया। इसके कई महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं: पहला, यह दिखाता है कि राजा का पद जन्मजात दैवीय अधिकार नहीं बल्कि लोगों की सहमति पर निर्भर एक सामाजिक व्यवस्था थी। दूसरा, यह आर्थिक व सामाजिक संबंधों को मानव-निर्मित मानता है, दैवीय विधान नहीं। तीसरा, और सबसे महत्वपूर्ण, यदि मनुष्य स्वयं इस व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार थे तो भविष्य में इसमें परिवर्तन भी ला सकते थे। बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा के दावों को भी अस्वीकार किया।
प्र. द्रौपदी के पाँच पांडवों से विवाह के बारे में महाभारत में दिए गए तीन स्पष्टीकरण कौन से हैं, और इतिहासकार इनकी व्याख्या कैसे करते हैं?
उत्तर: पहला स्पष्टीकरण भाग्यवादी है: व्यास द्रुपद को बताते हैं कि पांडव वास्तव में इंद्र के अवतार थे और द्रौपदी उनकी पत्नी का ही पुनर्जन्म थी, अतः नियति ने ही यह विवाह निश्चित कर दिया था। दूसरा स्पष्टीकरण पूर्वजन्म से जुड़ा है: एक युवा स्त्री ने शिव से पति पाने का वर माँगते समय उत्साहवश एक के बजाय पाँच बार वर माँग लिया, और वही स्त्री द्रौपदी बनी। तीसरा, कुंती की अनजाने में दी गई आज्ञा (बिना देखे ‘जो लाया है उसे आपस में बाँट लो’) भी एक कारण बनी। आधुनिक इतिहासकार इन बहुविध स्पष्टीकरणों को इस बात के प्रमाण के रूप में देखते हैं कि लेखक(कों) को स्वयं इस असामान्य विवाह को उचित ठहराने में कठिनाई महसूस हुई, जो संकेत देता है कि बहुपति प्रथा धीरे-धीरे अमान्य होती गई। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि ऐसे विवाह का वर्णन स्वयं दिखाता है कि यह प्रथा शासक वर्ग में प्रचलित रही होगी; यह हिमालय क्षेत्र में आज भी प्रचलित है; और कुछ इतिहासकार इसे युद्ध के समय स्त्रियों की कमी से जोड़ते हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में विवाह तथा गोत्र संबंधी नियमों की चर्चा कीजिए, और स्पष्ट कीजिए कि वास्तविक व्यवहार इनसे किस प्रकार भिन्न रहा होगा।
उत्तर: धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र (लगभग 500 ई.पू. से संकलित, सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति लगभग 200 ई.पू.-200 ईस्वी) विवाह के आठ प्रकारों को मान्यता देते हैं, जिनमें पहले चार ‘उत्तम’ और शेष निंदित माने गए। पुत्रियों का विवाह बहिर्विवाह के नियम के अंतर्गत गोत्र से बाहर करना अपेक्षित था, और कन्यादान पिता का धार्मिक कर्तव्य माना गया। गोत्र-व्यवस्था के दो नियम थे: विवाह के बाद स्त्री का गोत्र पति का माना जाता, और सगोत्र-विवाह वर्जित था। किंतु वास्तविक साक्ष्य इन आदर्शों से विचलन दिखाते हैं। सातवाहन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों का विश्लेषण बताता है कि उनके नाम पिता के गोत्रों (गौतम, वसिष्ठ) से उद्भूत थे, यानी उन्होंने पति के गोत्र का नाम नहीं अपनाया, जो ब्राह्मणीय नियम के विरुद्ध था; साथ ही कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के आदर्श के विपरीत है और दक्षिण भारत में प्रचलित अंतर्विवाह (बंधुओं में विवाह) की वैकल्पिक प्रथा को दर्शाता है। इसी तरह द्रौपदी का पाँचों पांडवों से विवाह बहुपति प्रथा का उदाहरण है, जो शास्त्रीय आदर्श के सर्वथा विपरीत है, फिर भी हिमालय क्षेत्र में आज भी प्रचलित है। भीम-हिडिम्बा विवाह वर्ण/समुदाय-सीमा के पार जाने वाला संबंध है। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्रीय आदर्श ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तावित एक ‘सार्वभौमिक’ मानक ज़रूर था, पर उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय विविधता और संचार की बाधाओं के कारण इसका प्रभाव कभी वास्तव में सार्वभौमिक नहीं रहा: वास्तविक सामाजिक संबंध शास्त्रीय नियमों से कहीं अधिक जटिल और विविध थे।
प्र. वर्ण और जाति में क्या अंतर था, और यह अध्याय किन उदाहरणों से सामाजिक गतिशीलता को दर्शाता है?
उत्तर: वर्ण चार थे, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, प्रत्येक की जीविका शास्त्रों में निर्धारित थी (क्रमशः अध्ययन-यज्ञ, युद्ध-रक्षा-न्याय, कृषि-पशुपालन-व्यापार, सेवा)। जाति, इसके विपरीत, एक असीमित श्रेणी थी: नए सामाजिक समूहों व नए व्यवसायों के उदय के साथ-साथ जातियों की संख्या निरंतर बढ़ती गई, और एक ही जीविका से जुड़ी जातियाँ श्रेणियों में संगठित होती थीं (जैसे मंदसौर अभिलेख के रेशम बुनकर)। इस अध्याय में सामाजिक गतिशीलता के कई उदाहरण मिलते हैं। पहला, अक्षत्रिय राजाओं का उदय: मौर्य वंश की उत्पत्ति पर बहस (बौद्ध ग्रंथों में क्षत्रिय, ब्राह्मणीय शास्त्र में ‘निम्न’ कुल), शुंग-कण्व वंश के ब्राह्मण होते हुए राजा बनना, और शक जैसे ‘म्लेच्छ’ मूल के शासकों का संस्कृतीकरण (रुद्रदामन का संस्कृत अभिलेख): दिखाते हैं कि वास्तविक सत्ता जन्म से अधिक संसाधन जुटाने की क्षमता पर निर्भर थी। दूसरा, गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि का उदाहरण दिखाता है कि एक शासक स्वयं को ब्राह्मण घोषित कर सकता था जबकि शास्त्रीय आदर्श में राजा को क्षत्रिय होना चाहिए था। तीसरा, मंदसौर के बुनकरों का उदाहरण दिखाता है कि श्रेणी के सदस्य अपनी मूल जीविका के अतिरिक्त अन्य पेशे भी अपना सकते थे। इस तरह वर्ण एक स्थिर शास्त्रीय ढाँचा था, जबकि जाति और वास्तविक सामाजिक व्यवहार कहीं अधिक तरल और गतिशील थे।
प्र. इतिहासकार महाभारत को किस प्रकार के स्रोत के रूप में उपयोग करते हैं, और इस उपयोग की क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर: इतिहासकार महाभारत का विश्लेषण करते समय कई पहलुओं पर ध्यान देते हैं: भाषा (संस्कृत, जो वेदों/प्रशस्तियों की तुलना में सरल है, अतः व्यापक स्तर पर समझी जाती थी), विषयवस्तु (आख्यान बनाम उपदेशात्मक, यद्यपि यह विभाजन एकांकी नहीं), लेखक(कों) व श्रोताओं का दृष्टिकोण, और रचना-काल। रचना का इतिहास बहुस्तरीय है: मूल कथा-रचयिता संभवतः सूत (भाट-सारथी) रहे होंगे, जिन्होंने मौखिक रूप से कथा रची; लगभग पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखित रूप दिया (यह कुरु-पांचाल के सरदारी से राजतंत्र में संक्रमण का काल था); लगभग 200 ई.पू.-200 ईस्वी में विष्णु-भक्ति के प्रभाव से कृष्ण को विष्णु-अवतार दर्शाया गया; और लगभग 200-400 ईस्वी में मनुस्मृति-सदृश उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए, जिससे यह ग्रंथ प्रारंभिक रूप के संभवतः 10,000 से भी कम श्लोकों से बढ़कर एक लाख से अधिक श्लोकों का हो गया। इतिहासकार इसका उपयोग सामाजिक इतिहास पुनर्निर्मित करने के लिए करते हैं: जैसे पितृवंशिकता, विवाह-नियम, वर्ण-व्यवस्था और संपत्ति-अधिकार की समझ। किंतु इसकी गंभीर सीमाएँ भी हैं: यह मुख्यतः ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से लिखा गया, अतः हाशिए के समूहों (निषाद, चाण्डाल, स्त्री) का प्रतिनिधित्व दूसरों की दृष्टि से ही मिलता है; बी.बी. लाल के हस्तिनापुर उत्खनन जैसे पुरातात्विक प्रयास भी इसकी ऐतिहासिकता को निश्चित रूप से सिद्ध नहीं कर पाए: नाम-सादृश्य मात्र संयोग हो सकता है। अतः महाभारत इतिहासकारों के लिए मूल्यवान परंतु सतर्कतापूर्वक प्रयोग किया जाने वाला स्रोत है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक ‘पुत्त’ शब्द किस भाषा का है और इसका क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘पुत्त’ प्राकृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ‘पुत्र’ है।
(ख) 2 अंक सातवाहन राजाओं के मातृनाम से इतिहासकार क्या निष्कर्ष निकालने में सावधानी बरतते हैं?
उत्तर: मातृनाम से यह प्रतीत होता है कि माताएँ महत्वपूर्ण थीं, किंतु इतिहासकार यह भी ध्यान रखते हैं कि सातवाहन राजाओं के संदर्भ में सिंहासन का उत्तराधिकार फिर भी पितृवंशिक ही होता था: अतः मातृनाम मातृवंशिक उत्तराधिकार का प्रमाण नहीं है।
(ग) 3 अंक गद्यांश में वर्णित रानियों के गोत्र-संबंधी तथ्य से बहिर्विवाह और अंतर्विवाह की अवधारणा किस तरह स्पष्ट होती है?
उत्तर: बहिर्विवाह के ब्राह्मणीय नियम के अनुसार विवाह के बाद स्त्री का गोत्र पति का हो जाना चाहिए था और सगोत्र-विवाह वर्जित था। परंतु गद्यांश दिखाता है कि कई सातवाहन रानियों ने पिता के गोत्र (गौतम, वसिष्ठ) का नाम कायम रखा, और पुस्तक के अनुसार कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं: यह अंतर्विवाह (बंधुओं में विवाह) की एक वैकल्पिक प्रथा का उदाहरण है, जो दक्षिण भारत के कई समुदायों में प्रचलित थी और ब्राह्मणीय बहिर्विवाह के आदर्श से मेल नहीं खाती।
(क) 1 अंक युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दाँव पर लगाने से पहले किन-किन चीज़ों को दाँव पर लगाया था?
उत्तर: स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य व प्रजा की संपत्ति, अपने अनुजों और अंततः स्वयं को।
(ख) 2 अंक द्रौपदी के प्रश्न पर सामने आए दोनों मत क्या थे?
उत्तर: पहला मत: चूँकि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है, इसलिए स्वयं को हारने के बाद भी युधिष्ठिर का द्रौपदी को दाँव पर लगाना अनुचित नहीं था। दूसरा मत: एक बार स्वयं दासत्व स्वीकार कर चुका व्यक्ति किसी अन्य (यहाँ द्रौपदी) को दाँव पर लगाने का अधिकार खो देता है, अतः यह अनुचित था।
(ग) 3 अंक यह प्रकरण आरंभिक भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति के बारे में क्या दर्शाता है, और इस पर बहस स्वयं क्या संकेत देती है?
उत्तर: यह प्रकरण दिखाता है कि स्त्री को कुछ हद तक पति की ‘संपत्ति’ के समान भी माना जा सकता था, जिसे अन्य संपत्ति की तरह ही दाँव पर लगाया जा सकता था। साथ ही, इस पर द्रौपदी द्वारा उठाया गया प्रश्न और उस पर सामने आए दो परस्पर-विरोधी मत यह भी दिखाते हैं कि यह विषय ग्रंथ के भीतर भी विवादास्पद व असमाधानित रहा: अर्थात यह विचार सर्वसम्मत नहीं था कि स्त्री पूर्णतः पति की संपत्ति है, और महाभारत जैसे ग्रंथ स्वयं भी परस्पर-विरोधी सामाजिक विचारों को धारण करते थे, जो इतिहासकारों को यह सतर्क निष्कर्ष निकालने पर मजबूर करता है कि आदर्श और वास्तविक व्यवहार में हमेशा भिन्नता रही होगी।