कक्षा 12 इतिहास अध्याय 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

अध्याय 3 का निचोड़, आख़िरी वक़्त के रिवीज़न के लिए: परिभाषाएँ, नाम, तालिकाएँ, समय-रेखा और एक रिकैप। पूरी व्याख्या विस्तृत नोट्स में अलग से मौजूद है।

महाभारतपितृवंशिकतागोत्रबहिर्विवाहअंतर्विवाहवर्णजातिचाण्डालसातवाहनस्त्रीधनमनुस्मृति

1 सारी परिभाषाएँ एक ही जगह

ये शब्द-दर-शब्द याद कीजिए
कुलसंस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए प्रयुक्त शब्द; पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी कुल के पूर्वज इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं
जाति (बंधुओं के अर्थ में)संबंधियों के एक बड़े समूह के लिए प्रयुक्त शब्द, संस्कृत ग्रंथों में
पितृवंशिकतावंश-परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र-प्रपौत्र से आगे चलती है
मातृवंशिकतावंश-परंपरा जो माँ से जुड़ी होती है
बहिर्विवाहअपने गोत्र से बाहर विवाह करने की अपेक्षित प्रथा
अंतर्विवाहएक ही समूह, गोत्र, कुल या स्थान के भीतर विवाह करने की प्रथा
बहुपत्नी प्रथाएक पुरुष की अनेक पत्नियाँ होने की सामाजिक परिपाटी
बहुपति प्रथाएक स्त्री के अनेक पति होने की पद्धति, जैसा द्रौपदी के विवाह में
कन्यादानविवाह में कन्या की भेंट को पिता का धार्मिक कर्तव्य मानना
गोत्रकिसी वैदिक ऋषि के नाम पर वर्गीकृत समूह; सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते
वर्णचार शास्त्रीय सामाजिक श्रेणियाँ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, जीविका पर आधारित
जाति (सामाजिक वर्गीकरण के अर्थ में)वर्ण से भिन्न, असीमित संख्या वाली सामाजिक श्रेणी; नए व्यवसायों से जुड़कर बढ़ती रही
श्रेणीएक ही जीविका/व्यवसाय से जुड़ी जातियों का संगठन, जैसे मंदसौर के रेशम बुनकर
वणिकव्यापारियों के लिए संस्कृत ग्रंथों/अभिलेखों में प्रयुक्त शब्द
म्लेच्छअसंस्कृत भाषी/बाहरी माने जाने वाले समुदायों के लिए हेय शब्द, जैसे शक
निषादवन-निवासी शिकारी समुदाय, जिससे एकलव्य जुड़ा माना जाता था
अस्पृश्यवर्ण-व्यवस्था से बाहर माना जाने वाला वर्ग
चाण्डालशव-अंत्येष्टि और मृत पशु-स्पर्श करने वाले, वर्ण-व्यवस्था में सबसे निम्न कोटि में रखे गए
स्त्रीधनविवाह में मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व; पति का अधिकार नहीं, संतान को विरासत में मिलता
आख्यानमहाभारत का कथा-संग्रह वाला भाग
उपदेशात्मकमहाभारत का नैतिक शिक्षा/निर्देश वाला भाग, जैसे भगवद्गीता
महासम्मतसुत्तपिटक के मिथक में जनता द्वारा चुने गए पहले शासक की उपाधि

2 महाभारत: ग्रंथ के रूप में

पहलू क्या याद रखना है
समालोचनात्मक संस्करण वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में 1919 में शुरू, 47 वर्ष में पूर्ण, 13,000 पृष्ठों में प्रकाशित; कश्मीर-नेपाल से केरल-तमिलनाडु तक पांडुलिपियों में समानता मिली, साथ ही क्षेत्रीय प्रभेद भी
मुख्य कथा कौरव और पांडव के बीच भूमि व सत्ता को लेकर संघर्ष; युद्ध में पांडव विजयी, पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित
रचना-काल लगभग 500 ई.पू. से 400 ईस्वी तक, चार चरणों में: सूतों की मौखिक रचना, ब्राह्मणों का लेखन (~5वीं सदी ई.पू.), विष्णु-भक्ति का प्रभाव (~200 ई.पू.-200 ईस्वी), उपदेशात्मक प्रकरण (~200-400 ईस्वी)
आकार प्रारंभिक रूप में लगभग 10,000 से कम श्लोक, अंततः एक लाख से अधिक
विषयवस्तु के दो भाग आख्यान (कथाएँ) और उपदेशात्मक (नैतिक शिक्षा); विभाजन एकांकी नहीं, दोनों मिश्रित
प्रचलित रचयिता ऋषि व्यास (साहित्यिक परंपरा के अनुसार)
महाभारत को ‘इतिहास’ कहा जाना संस्कृत परंपरा में महाभारत ‘इतिहास’ श्रेणी में: अर्थ ‘ऐसा ही था’; ऐतिहासिकता निश्चित नहीं
हस्तिनापुर उत्खनन बी.बी. लाल, 1951-52, मेरठ ज़िला; स्तर 2 (~12वीं-7वीं शताब्दी ई.पू.) मिट्टी की दीवारें; स्तर 3 (~6ठी-3री शताब्दी ई.पू.) पक्की ईंटें, शोषक-घट, वलय-कूप, नाम-सादृश्य मात्र संयोग हो सकता है

3 बंधुता, विवाह और वर्ण-जाति: एक नज़र में

विषय क्या याद रखना है
पितृवंशिक आदर्श ~6ठी शताब्दी ई.पू. से अधिकतर राजवंशों में; अपवाद: पुत्र न होने पर भाई उत्तराधिकारी, प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ सत्ता भोगती थीं
विवाह के आठ प्रकार (मनुस्मृति) पहले चार ‘उत्तम’ (जैसे पहला: वेदज्ञ वर को कन्या का दान; चौथा: पिता द्वारा दायित्व-स्मरण); शेष चार निंदित (जैसे पाँचवाँ: धन देकर वधू-प्राप्ति; छठा: स्वेच्छा-संयोग)
गोत्र के दो नियम (1) विवाह के बाद स्त्री का गोत्र पति का माना जाता; (2) सगोत्र-विवाह वर्जित
सातवाहन मातृनाम गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि जैसे नाम माताओं का महत्व दिखाते हैं, पर उत्तराधिकार पितृवंशिक ही रहा; कई रानियों ने पति का नहीं, पिता का गोत्र-नाम रखा, और कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं: बहिर्विवाह के आदर्श के विपरीत, अंतर्विवाह का उदाहरण
चार वर्ण और जीविका ब्राह्मण (अध्ययन-यज्ञ), क्षत्रिय (युद्ध-रक्षा-न्याय), वैश्य (कृषि-पशुपालन-व्यापार), शूद्र (अन्य तीन वर्णों की सहायता)। भगवद्गीता संकेत करती है कि यह व्यवस्था गुण और कर्म पर आधारित थी, जन्म से निर्धारित कठोर व्यवस्था नहीं
अक्षत्रिय राजा मौर्य (बहस), शुंग-कण्व (ब्राह्मण), शक रुद्रदामन (म्लेच्छ माने गए, पर संस्कृत अभिलेख), गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि (ब्राह्मण दावा)
श्रेणी का उदाहरण मंदसौर अभिलेख (~5वीं शताब्दी ईस्वी): लाट (गुजरात) से आए रेशम बुनकर, दशपुर में बसे, सामूहिक रूप से सूर्य मंदिर बनवाया
वर्ण से बाहर निषाद (एकलव्य), यायावर पशुपालक, राक्षस (हिडिम्बा-भीम विवाह), म्लेच्छ कहलाते, पर विचार-आदान-प्रदान भी होता था
अस्पृश्यता चाण्डाल, शव-अंत्येष्टि, मृत-पशु-स्पर्श, वधिक कार्य; मनुस्मृति में गाँव-बाहर निवास, फेंके बर्तन, मृतकों के वस्त्र के नियम; फ़ा-शिएन (~5वीं शताब्दी), करताल बजाकर सूचना देना; मातंग जातक, चाण्डाल-पुत्र का प्रतिरोध

4 संपत्ति और सामाजिक विषमता की व्याख्या

विषय क्या याद रखना है
द्यूत-क्रीड़ा प्रकरण युधिष्ठिर ने स्वर्ण-हस्ति-रथ-दास-सेना-कोष-राज्य-अनुज-स्वयं फिर द्रौपदी को दाँव पर लगाया; प्रश्न उठा कि क्या हारा हुआ व्यक्ति किसी और को दाँव पर लगा सकता है, पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला
स्त्रीधन विवाह-उपहार पर स्त्री का स्वामित्व, संतान को विरासत में; पति का अधिकार नहीं, पर मनुस्मृति गुप्त-संचय से चेतावनी भी देती है
धन-अर्जन के तरीके (मनुस्मृति) पुरुष: 7 तरीके (विरासत, खोज, खरीद, विजय, निवेश, कार्य, भेंट); स्त्री: 6 तरीके (मुख्यतः उपहार-आधारित)
बौद्ध सामाजिक अनुबंध सुत्तपिटक का मिथक: लोगों ने सहमति से एक शासक (महासम्मत) चुना, बदले में कर (चावल का अंश) दिया: व्यवस्था मानव-निर्मित, अतः परिवर्तनीय भी
तमिलकम् का वैकल्पिक आदर्श दानशीलता का सम्मान, कंजूसी की निंदा; संगम साहित्य (~पहली शताब्दी ईस्वी) में सरदार-चारण संबंध (पुरुनानूरू)

5 कौन कौन है

नाम किसलिए याद रखें
वी.एस. सुकथांकर महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण के प्रणेता, 1919
जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन 1973 में अंग्रेज़ी अनुवाद आरंभ, 1978 में मृत्यु से अधूरा रहा
ऋषि व्यास महाभारत के प्रचलित रचयिता; द्रुपद को द्रौपदी के विवाह के दो स्पष्टीकरण देते हैं (इंद्र के अवतार; शिव से पाँच बार वर माँगने वाली स्त्री); कुंती की आज्ञा मिलाकर ग्रंथ में तीन स्पष्टीकरण
कौरव-पांडव महाभारत की मुख्य कथा के दो प्रतिद्वंद्वी पक्ष, कुरु वंश से
धृतराष्ट्र, पांडु भाई; पांडु पहले राजा बने (धृतराष्ट्र नेत्रहीन होने से), पांडु की असामयिक मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने
द्रौपदी पाँचों पांडवों की सहपत्नी; द्यूत-क्रीड़ा में दाँव पर लगाई गई; उसके प्रश्न का कोई निष्कर्ष नहीं निकला
कुंती पांडवों की माता; लाक्षागृह-कांड में निषादी को धोखा देती है (महाश्वेता देवी की कथा का आधार)
गांधारी दुर्योधन की माता, जिसने उसे युद्ध न करने की सलाह दी
द्रोण, एकलव्य द्रोण ने निषाद एकलव्य को शिष्य मानने से इनकार किया, बाद में गुरु-दक्षिणा में अँगूठा माँगा
हिडिम्बा, घटोत्कच राक्षसी जिसने भीम से विवाह किया; उनका पुत्र घटोत्कच
गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि प्रसिद्ध सातवाहन शासक; स्वयं को ब्राह्मण बताया, वर्ण-मिश्रित विवाह पर रोक का दावा किया, फिर भी रुद्रदामन परिवार से वैवाहिक संबंध बनाया
रुद्रदामन शक शासक (~दूसरी शताब्दी ईस्वी); सुदर्शन सरोवर जीर्णोद्धार का संस्कृत अभिलेख
बी.बी. लाल पुरातत्ववेत्ता; 1951-52 में हस्तिनापुर का उत्खनन
फ़ा-शिएन, श्वैन-त्सांग चीनी बौद्ध यात्री; अस्पृश्यों व वधिकों की सामाजिक स्थिति दर्ज की
मातंग मातंग जातक का बोधिसत्त्व, चाण्डाल-पुत्र के रूप में जन्म; अपने पुत्र माण्डव्य से भेंट-योग्यता पर तर्क करता है
महाश्वेता देवी बांग्ला लेखिका; ‘कुंती ओ निषादी’ नामक आधुनिक पुनर्पाठ की रचयिता
मौरिस विंटरविट्ज़ भारतीय साहित्य के इतिहासकार; महाभारत को ‘संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व’ बताया

6 समय-रेखा: साहित्यिक परंपराएँ और महाभारत-अध्ययन

c. 500 ई.पू.पाणिनि की अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण)
c. 500-200 ई.पू.प्रमुख धर्मसूत्र (संस्कृत में)
c. 500-100 ई.पू.आरंभिक बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक सहित (पालि में)
c. 500 ई.पू.-400 ईस्वीरामायण और महाभारत की रचना (संस्कृत में)
c. 200 ई.पू.-200 ईस्वीमनुस्मृति की रचना; तमिल संगम साहित्य का संकलन
c. 100 ईस्वीचरक और सुश्रुत संहिता (आयुर्वेद)
c. 200 ईस्वी सेपुराणों का संकलन
c. 300 ईस्वीभरतमुनि का नाट्यशास्त्र
c. 300-600 ईस्वीअन्य धर्मशास्त्र
c. 400-500 ईस्वीकालिदास के संस्कृत नाटक; आर्यभट्ट-वराहमिहिर के ग्रंथ; जैन ग्रंथों का संग्रहण (प्राकृत में)
1919-66महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन
1973वैन बियुटेनेन का अंग्रेज़ी अनुवाद आरंभ, 1978 में उनकी मृत्यु से अधूरा
फटाफट रिवीज़न : परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
  • महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण 1919 में सुकथांकर के नेतृत्व में शुरू हुआ, 47 वर्ष में पूरा हुआ, और उपमहाद्वीप-भर की पांडुलिपियों में समानता के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रभेद भी दिखाए
  • महाभारत की मुख्य कथा (कौरव-पांडव संघर्ष) ने पितृवंशिक उत्तराधिकार के आदर्श को सुदृढ़ किया, यद्यपि अपवाद (भाई-उत्तराधिकार, प्रभावती गुप्त) मौजूद थे
  • विवाह के नियम (बहिर्विवाह, गोत्र, आठ प्रकार) शास्त्रों में स्पष्ट थे, पर सातवाहन रानियों के गोत्र और द्रौपदी के बहुपति विवाह जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि वास्तविक व्यवहार अक्सर इनसे भिन्न था
  • वर्ण मात्र चार थे और शास्त्र-निर्धारित, पर जाति असीमित थी और नए व्यवसायों से बढ़ती गई; मौर्य-शुंग-शक-सातवाहन के उदाहरण दिखाते हैं कि वास्तविक सत्ता वर्ण-दावों पर नहीं, संसाधन जुटाने की क्षमता पर निर्भर थी
  • चाण्डाल जैसे समूह वर्ण-व्यवस्था से बाहर, ‘अस्पृश्य’ माने जाते थे, पर मातंग जातक जैसी कथाएँ इस धारणा के प्रतिरोध का भी साक्ष्य देती हैं
  • संपत्ति के अधिकार में लिंग-आधारित भेद स्पष्ट था (पुरुष के 7 बनाम स्त्री के 6 अर्जन-तरीके, द्यूत-क्रीड़ा प्रकरण), जबकि स्त्रीधन इसका एक सीमित अपवाद था
  • बौद्ध सामाजिक-अनुबंध सिद्धांत (सुत्तपिटक) ने राजत्व को मानवीय चयन (महासम्मत, बदले में चावल का अंश) पर आधारित बताया; मानव-निर्मित व्यवस्था बदली भी जा सकती है; बौद्धों ने जन्म पर आधारित प्रतिष्ठा के दावों को भी नकारा
  • इतिहासकार महाभारत का प्रयोग सावधानी से करते हैं: यह ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से लिखा, बहुस्तरीय, सहस्राब्दियों में रचा गया ग्रंथ है, और हस्तिनापुर जैसे पुरातात्विक साक्ष्य भी इसकी ऐतिहासिकता को निश्चित रूप से सिद्ध नहीं करते