कक्षा 12 इतिहास अध्याय 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I, अध्याय 3 ‘बंधुत्व, जाति तथा वर्ग’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्न, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और हर एक का पूरा आदर्श उत्तर। किताब इन्हें चार हिस्सों में बाँटती है: पाँच ‘उत्तर दीजिए’ (100-150 शब्द), चार ‘लघु निबंध लिखिए’ (500 शब्द), एक मानचित्र-कार्य और दो परियोजना-कार्य जिनमें से कोई एक करना है। इनके बाद अध्याय के भीतर स्रोतों और चित्रों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए बीस प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। पहले अपना उत्तर लिखिए, फिर इससे मिलाइए।

शुरू करने से पहले

अंग्रेज़ी संस्करण इन्हीं बारह प्रश्नों को इसी क्रम में पूछता है, पर उसका शब्द-रूप हिंदी का सीधा अनुवाद नहीं है। प्रश्न 6 में उद्धृत विंटरविट्ज़ के कथन का शब्द-चयन और प्रश्न 5 का संजय-अवतरण दोनों संस्करणों में एक ही भाव रखते हैं, बस शब्दांतर अलग है। हिंदी में पेपर देने वाले विद्यार्थी हिंदी संस्करण के इन्हीं रूपों से उत्तर लिखें।

लिखने का तरीक़ा: प्रश्न 1 से 5 के उत्तर लगभग 100-150 शब्दों में होते हैं, इसलिए चार से छह ठोस बिंदु काफ़ी हैं। प्रश्न 6 से 9 लघु निबंध हैं, इसलिए उनमें उपशीर्षक और एक निष्कर्ष ज़रूर दीजिए। इस अध्याय में उदाहरण महाभारत की कथाओं और अभिलेखों से आते हैं, इसलिए हर बिंदु में जहाँ बन सके स्रोत का नाम (महाभारत, मनुस्मृति, मंदसौर अभिलेख आदि) ज़रूर लिखिए।

1 उत्तर दीजिए (100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1

प्र. स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण रही होगी?

उत्तर:
संसाधनों का स्पष्ट हस्तांतरण। पितृवंशिकता (पिता से पुत्र, फिर पौत्र तक चलने वाली वंश-परंपरा) संसाधनों, विशेषकर सिंहासन और भूमि, के स्पष्ट, विवादरहित हस्तांतरण को सुनिश्चित करती थी।
महाभारत स्वयं इसकी चेतावनी है। कौरव और पांडव के बीच भूमि व सत्ता का संघर्ष दिखाता है कि उत्तराधिकार अस्पष्ट रहने पर क्या विनाश हो सकता है; युद्ध के बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार का उद्घोषण इसी अनिश्चितता को स्थायी रूप से समाप्त करने का प्रयास था।
वंश-गौरव और पहचान। यह व्यवस्था पुरुष वंशजों की निरंतरता पर टिकी कुल-पहचान को भी सुदृढ़ करती थी।
धार्मिक स्वीकृति भी थी। ऋग्वेद के विवाह-मंत्रों (स्रोत 1, ‘उत्तम पुत्रों’ की कामना) से पता चलता है कि यह आदर्श धार्मिक-सांस्कृतिक रूप से भी स्थापित था।
अपवाद भी थे। पुत्र न होने पर भाई/बंधु उत्तराधिकारी बन सकते थे, और प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ विशेष परिस्थितियों में सत्ता भोगती थीं: पर सामान्य नियम पितृवंशिक ही था।

प्रश्न 2

प्र. क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे? चर्चा कीजिए।

उत्तर:
शास्त्रीय आदर्श। धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा बन सकते थे।
मौर्य वंश पर बहस। बौद्ध ग्रंथ मौर्यों को क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं। मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग और कण्व स्वयं ब्राह्मण थे।
शक शासकों का उदाहरण। मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण म्लेच्छ/बर्बर मानते, फिर भी शक राजा रुद्रदामन के सुदर्शन सरोवर जीर्णोद्धार अभिलेख से पता चलता है कि शक्तिशाली म्लेच्छ भी संस्कृतीय परिपाटी से अवगत थे।
सातवाहन का उदाहरण। गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को ब्राह्मण बताया, जबकि शास्त्रीय आदर्श में राजा को क्षत्रिय होना चाहिए था।
निष्कर्ष। वास्तविक राजनीतिक सत्ता जन्म से अधिक समर्थन व संसाधन जुटाने की क्षमता पर निर्भर करती थी; राजा अपने वर्ण-दावे स्वयं गढ़ते और बदलते भी थे।

प्रश्न 3

प्र. द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए व उनके अंतर को भी स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
द्रोण: धर्म वर्ण की रक्षा करता है। द्रोण एकलव्य (निषाद) को शिष्य मानने से इनकार करते हैं, फिर गुरु-दक्षिणा के बहाने उसका अँगूठा माँगकर सुनिश्चित करते हैं कि वह अपने क्षत्रिय शिष्य अर्जुन से बेहतर धनुर्धर न बने: यहाँ धर्म विशेषाधिकार बचाने का साधन है।
हिडिम्बा: धर्म लचीला दिखता है। राक्षसी हिडिम्बा और मानव भीम का विवाह महाकाव्य स्वीकार करता है, यद्यपि सीमित शर्तों (दिन में हिडिम्बा के साथ, रात्रि में पांडवों के पास) के साथ: यह सामान्य ब्राह्मणीय विवाह से अलग, पर अस्वीकृत नहीं।
मातंग: धर्म पूरी तरह उलट जाता है। चाण्डाल-पुत्र मातंग तप-ज्ञान से इतनी ऊँचाई पाता है कि वह अपने ब्राह्मण-समान पुत्र माण्डव्य को सिखाता है कि सच्चा भेंट-योग्य व्यक्ति जन्म से नहीं, दोषमुक्त आचरण से बनता है।
अंतर। द्रोण वर्ण-व्यवस्था की पुष्टि करते हैं, हिडिम्बा उसकी सीमाओं पर लचीलापन दिखाती है, और मातंग उसे सीधे नकारता है: तीनों कथाएँ मिलकर दिखाती हैं कि ‘धर्म’ किसकी दृष्टि से परिभाषित हो रहा है, इस पर निर्भर करता था।

प्रश्न 4

प्र. किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज के उस ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था?

उत्तर:
ब्राह्मणीय दृष्टिकोण: दैवीय व स्थायी। पुरुषसूक्त पर आधारित मत के अनुसार वर्ण-विभाजन सृष्टि के आरंभ से निश्चित, स्थायी और जन्म-आधारित दैवीय व्यवस्था है, जिसे बदला नहीं जा सकता।
बौद्ध दृष्टिकोण: मानव-निर्मित व ऐतिहासिक। सुत्तपिटक के एक मिथक के अनुसार आरंभ में सभी जीव शांति की एक आदर्श अवस्था में रहते थे और प्रकृति से केवल आवश्यकता-भर लेते थे; लालच, प्रतिहिंसा और कपट बढ़ने पर उन्होंने स्वयं सहमति से एक शासक (महासम्मत) चुना, बदले में उसे कर (चावल का अंश) दिया।
मूल अंतर। बौद्ध दृष्टिकोण में समाज और शासन मानवीय कर्म व सामूहिक निर्णय से बना है, दैवीय नहीं: इसलिए सैद्धांतिक रूप से परिवर्तनीय भी है, जबकि ब्राह्मणीय दृष्टिकोण में वर्ण-व्यवस्था अपरिवर्तनीय दैवीय विधान है।

प्रश्न 5

प्र. निम्नलिखित अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर दूत संजय को संबोधित कर रहे हैं:

संजय धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ; मैं कृपाचार्य के चरण स्पर्श करता हूँ; (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा (धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ; मैं उन सब युवा कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं; सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनका जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं; मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पत्नियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, ‘मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं’; मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं, अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा; सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा। दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा।

इस सूची को बनाने के आधारों की पहचान कीजिए – उम्र, लिंग, भेद व बंधुत्व के संदर्भ में। क्या कोई अन्य आधार भी हैं? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में उन्हें एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है?

उत्तर:
आयु के आधार पर। ‘युवा कुरु योद्धा’ बनाम ‘वृद्ध राजा’ और ‘वृद्धा स्त्रियाँ’।
लिंग के आधार पर। पुरुषों (ब्राह्मण, पुरोहित, योद्धा) और स्त्रियों (माताएँ, पत्नियाँ, कुलवधुएँ, पुत्रियाँ, गणिकाएँ, दासियाँ) के लिए अलग-अलग अभिवादन।
सामाजिक प्रतिष्ठा/वर्ण और गुरु-भाव के आधार पर। सबसे पहले ब्राह्मण और मुख्य पुरोहित, फिर गुरु द्रोण और कृपाचार्य, फिर कुरु वंश के प्रधान भीष्म और वृद्ध राजा धृतराष्ट्र; दासी से जन्मे विदुर को भी “सर्वोपरि” नमस्कार, क्योंकि वे “पिता और माता के सदृश” हैं: ज्ञान और निकटता जन्म की सीमा को पार कर सकते थे।
बंधुत्व/पारिवारिक निकटता के आधार पर। ‘हमारे भाई, पुत्र और पौत्र’ कहकर संबंध जताया गया।
निष्कर्ष। सूची के अंत में सबसे कम प्रतिष्ठा वाले वर्ग (गणिकाएँ, दासियाँ, वृद्ध-विकलांग-असहाय) आते हैं: पूरी सूची स्वयं एक सामाजिक पदानुक्रम की झलक बन जाती है।

2 निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6

प्र. भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के बारे में लिखा था कि: ‘चूँकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है; बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीज़ें इसमें निहित हैं; (वह) भारतीयों की आत्मा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।’ चर्चा कीजिए।

उत्तर:
कथन का सही पक्ष। महाभारत आख्यान (वीरगाथा, प्रेम, युद्ध, पारिवारिक कलह) और उपदेशात्मक सामग्री (भगवद्गीता जैसी दार्शनिक शिक्षा, धर्मशास्त्र-सदृश आचार-संहिता) दोनों को एक साथ समेटे है।
रचना का विस्तार भी इसी बात का प्रमाण है। इसकी रचना एक हज़ार वर्षों (लगभग 500 ई.पू. से 400 ईस्वी तक) में चरणबद्ध रूप से हुई, जिसमें अलग-अलग कालों और क्षेत्रों की अनेक कहानियाँ व मूल्य समाहित होते गए।
निरंतर पुनर्पाठ। महाभारत ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अलग-अलग भाषाओं, नाटकों, चित्रों और आधुनिक पुनर्पाठों (जैसे महाश्वेता देवी की ‘कुंती ओ निषादी’) के माध्यम से भारतीय समाज के बदलते नैतिक प्रश्नों को प्रतिबिंबित किया है।
कथन की सीमा। महाभारत मुख्यतः ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से संस्कृत में लिखा ग्रंथ है, अतः यह ‘संपूर्ण’ भारतीय आत्मा का नहीं बल्कि उन वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, नगरीय कुलीन) के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व अधिक करता है जिन्होंने इसे रचा और सुरक्षित रखा।
हाशिए की आवाज़ें। निषाद, चाण्डाल, स्त्री जैसे हाशिए के समूहों के अनुभव इसमें केवल दूसरों (मुख्यतः ब्राह्मण लेखकों) की दृष्टि से ही झलकते हैं।

प्रश्न 7

प्र. क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।

उत्तर:
शैली में विविधता। आख्यान (सरल कथा-शैली) और उपदेशात्मक अंश (दार्शनिक शैली, जैसे भगवद्गीता) की शैलियाँ स्पष्ट रूप से भिन्न हैं, जो अलग-अलग रचनाकारों का संकेत देती हैं।
रचना-काल में हज़ार वर्ष का अंतराल। मूल कथा के प्रारंभिक रचयिता संभवतः मौखिक परंपरा के सूत रहे होंगे; लगभग पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखित रूप दिया; लगभग 200 ई.पू.-400 ईस्वी के बीच विष्णु-भक्ति व मनुस्मृति-सदृश प्रकरण क्रमशः जुड़े।
आकार भी प्रमाण है। प्रारंभिक रूप में संभवतः 10,000 से भी कम श्लोक, अंततः एक लाख से अधिक: एक जीवनकाल में एक व्यक्ति द्वारा असंभव।
समालोचनात्मक संस्करण का साक्ष्य। 1919-66 की परियोजना में पांडुलिपियों के बीच पाए गए अनेक क्षेत्रीय प्रभेद दिखाते हैं कि विभिन्न क्षेत्रों के रचनाकारों ने अपने-अपने संस्करण में परिवर्तन किए।
निष्कर्ष। परंपरा में ऋषि व्यास को रचयिता माना जाता है, पर यह एक प्रतीकात्मक श्रेय अधिक प्रतीत होता है, ऐतिहासिक तथ्य कम।

प्रश्न 8

प्र. आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर:
संपत्ति में असमानता। मनुस्मृति पुरुषों के लिए धन-अर्जन के सात तरीके गिनाती है, स्त्रियों के लिए केवल छह, वे भी मुख्यतः उपहार-आधारित; सामान्यतः भूमि-पशु-धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था (स्त्रीधन एक सीमित अपवाद)।
द्यूत-क्रीड़ा प्रकरण। युधिष्ठिर द्वारा स्वयं को हारने के बाद द्रौपदी को भी दाँव पर लगाना और इस पर उठा विवाद दिखाता है कि पत्नी को पति की ‘संपत्ति’ जैसा भी माना जा सकता था।
विवाह के नियमों में असमानता। पुत्रियों को बहिर्विवाह के अंतर्गत नियंत्रित किया जाता था, कन्यादान पिता का धार्मिक कर्तव्य माना जाता था, पुत्रों के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं था।
वंश-व्यवस्था भी पितृवंशिक थी। सातवाहन शासकों के मातृनाम के बावजूद उत्तराधिकार पितृवंशिक ही रहा।
निष्कर्ष। लिंग एक केंद्रीय संरचनात्मक तत्व था जिसने संपत्ति, विवाह, वंश और सामाजिक प्रतिष्ठा: सभी को आकार दिया।

प्रश्न 9

प्र. उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।

उत्तर:
सातवाहन रानियों के गोत्र। सातवाहन राजाओं से विवाह करने वाली कई स्त्रियों के नाम उनके पिता के गोत्र (गौतम, वसिष्ठ) से उद्भूत थे, यानी उन्होंने पति के गोत्र का नाम नहीं अपनाया, जो ब्राह्मणीय नियम के विरुद्ध था; साथ ही कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के आदर्श के विपरीत है और अंतर्विवाह (बंधुओं में विवाह) की उस वैकल्पिक प्रथा की ओर संकेत करता है जो दक्षिण भारत के कई समुदायों में प्रचलित थी।
द्रौपदी का बहुपति विवाह। पाँचों पांडवों से विवाह शास्त्रीय आदर्श के सर्वथा विपरीत है; लेखक(कों) ने इस प्रसंग के लिए तीन स्पष्टीकरण दिए (कुंती की आज्ञा, और व्यास की दो कथाएँ: इंद्र के अवतार तथा शिव से पाँच बार वर माँगने वाली स्त्री), जो संकेत देता है कि बहुपति प्रथा धीरे-धीरे अमान्य होती गई; फिर भी यह शासक वर्ग में प्रचलित रही होगी, और हिमालय क्षेत्र में आज भी प्रचलित है।
भीम-हिडिम्बा विवाह। वर्ण/समुदाय-सीमा के पार जाने वाला संबंध।
गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि का विरोधाभास। स्वयं वर्ण-मिश्रित विवाहों पर रोक का दावा करते हुए भी रुद्रदामन (शक, ब्राह्मणीय दृष्टि में म्लेच्छ) के परिवार से वैवाहिक संबंध बनाया।
निष्कर्ष। वास्तविक सामाजिक व्यवहार शास्त्रीय आदर्शों से अक्सर अलग और अधिक जटिल था।

3 मानचित्र कार्य

प्रश्न 10

प्र. इस अध्याय के मानचित्र की अध्याय 2 के मानचित्र 1 से तुलना कीजिए। कुरु-पांचाल क्षेत्र के पास स्थित महाजनपदों और नगरों की सूची बनाइए।

नोट

यह पाठ्यपुस्तक के मानचित्रों पर करने का अभ्यास है; यहाँ उत्तर सूची के रूप में दिया गया है।

उत्तर:
महाजनपद (इस अध्याय के मानचित्र के अनुसार)। कुरु और उसके पड़ोसी शूरसेन, मत्स्य, वत्स और कोशल; थोड़ा दूर अवन्ति, मल्ल और शाक्य। (कुरु के साथी पांचाल के लिए अध्याय 2 का मानचित्र 1 देखिए।)
नगर। कुरु-पांचाल क्षेत्र के सबसे निकट: हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, मथुरा और विराट; आगे पूर्व और दक्षिण में: कौशाम्बी, अयोध्या, श्रावस्ती, वाराणसी, सारनाथ, कपिलवस्तु, लुंबिनी, पावा, कुशीनगर, वैशाली, पाटलिपुत्र, बोधगया और उज्जयिनी।
निष्कर्ष। कुरु-पांचाल क्षेत्र ऊपरी गंगा-यमुना क्षेत्र में था, जिसके आसपास कई महाजनपद और नगर स्थित थे।

4 परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11

प्र. अन्य भाषाओं में महाभारत की पुनर्व्याख्या के बारे में जानिए। इस अध्याय में वर्णित महाभारत के किन्हीं दो प्रसंगों का इन भिन्न भाषा वाले ग्रंथों में किस तरह निरूपण हुआ है उनकी चर्चा कीजिए। जो भी समानता और विभिन्नता आप इन वृत्तांत में देखते हैं उन्हें स्पष्ट कीजिए।

उत्तर (परियोजना के लिए तरीका):
अध्याय के दो प्रसंग चुनिए। जैसे: लाक्षागृह, एकलव्य और द्रोण, हिडिम्बा और भीम, द्रौपदी का विवाह, या द्यूत-क्रीड़ा।
अध्याय का ही एक उदाहरण। संस्कृत ग्रंथ में लाक्षागृह से बचने से पहले कुंती एक भोज का आयोजन करती हैं; एक निषाद स्त्री अपने पाँच पुत्रों के साथ आती है, वे मदिरा पीकर सो जाते हैं, और उनके शव मिलने पर लोग समझते हैं कि पांडव मर गए। महाश्वेता देवी (बांग्ला लेखिका) की कहानी ‘कुंती ओ निषादी’ युद्ध के बाद की कथा कहती है: एक निषादी कुंती को याद दिलाती है कि मरने वाली स्त्री उसकी सास थी, और कुंती ने उन छह निर्दोष जीवनों को एक बार भी याद नहीं किया। घटनाएँ वही हैं, पर पुनर्कथन दृष्टिकोण को निषादों की ओर मोड़ देता है और उस प्रश्न को उठाता है जिस पर संस्कृत ग्रंथ मौन है।
दूसरे प्रसंग के लिए किसी अन्य भाषा का कोई पुनर्कथन (पुस्तक, नाटक या धारावाहिक, जिसे आप स्वयं देख-पढ़ सकें) चुनिए और उसी तरह तुलना कीजिए: क्या समान रहा, क्या जोड़ा या छोड़ा गया, और किसका दृष्टिकोण सामने आया।
निष्कर्ष। अध्याय के अनुसार महाकाव्य के कई भाषाओं में संस्करण लोगों और समुदायों के बीच निरंतर संवाद से बने, और हर पुनर्कथन अपने रचयिताओं की चिंताओं को दर्शाता है।

प्रश्न 12

प्र. कल्पना कीजिए कि आप एक लेखक हैं और एकलव्य की कथा को अपने दृष्टिकोण से लिखिए।

उत्तर (सुझाव, रचनात्मक प्रथम-पुरुष पुनर्लेखन):
‘मैंने मिट्टी से गुरु द्रोण की एक प्रतिमा बनाई क्योंकि उन्होंने मुझे अपना शिष्य मानने से इनकार कर दिया था, केवल इसलिए कि मैं वन में रहने वाला निषाद था, क्षत्रिय नहीं। वर्षों की अकेली साधना से मैंने स्वयं को उस कला में ढाला जो किसी को सिखाई नहीं गई थी। जब द्रोण ने अंततः गुरु-दक्षिणा में मेरा अँगूठा माँगा, तो मैंने बिना हिचक उसे काटकर दे दिया: इसलिए नहीं कि यह उचित था, बल्कि इसलिए कि मैंने उन्हें अपना गुरु मान लिया था, चाहे उन्होंने मुझे कभी अपना शिष्य न माना हो। आज मैं पूछता हूँ: क्या धर्म वही है जो एक वर्ग अपने विशेषाधिकार बचाने के लिए तय करे?’
ध्यान रखें। यह एक रचनात्मक उत्तर है: विद्यार्थी अपनी स्वयं की मौलिक रचना प्रस्तुत करें, कथा के मूल तत्वों (निषाद पहचान, द्रोण का अस्वीकार, अँगूठे की माँग) को छूते हुए।

5 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न

अध्याय के भीतर स्रोतों और चित्रों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए प्रश्न, उसी क्रम में जिसमें पुस्तक उन्हें छापती है।

पाठगत प्रश्न 1 · पृष्ठ 56 · स्रोत 1

प्र. इस मंत्र के संदर्भ में, विवाह का वधू और वर के लिए क्या अभिप्राय है? इसकी चर्चा कीजिए। क्या ये अभिप्राय समान हैं या फिर इनमें भिन्नताएँ हैं?

उत्तर: ये अभिप्राय समान नहीं हैं। वधू के लिए: पुरोहित कहता है, ‘मैं इसे यहाँ से मुक्त करता हूँ किंतु वहाँ से नहीं।’ ‘यहाँ’ का अर्थ पिता का गृह और ‘वहाँ’ का अर्थ पति का गृह है। विवाह के बाद वधू पिता का घर छोड़कर पति के घर से ‘मज़बूती से’ बँध जाती है; उससे अपेक्षा है कि उसके ‘उत्तम पुत्र’ हों, और उसका सौभाग्य पति के प्रेम पर निर्भर है। ब्राह्मणीय गोत्र-नियम के अनुसार विवाह के बाद उसे पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था। वर के लिए: उसे न अपना घर छोड़ना पड़ता है, न कुछ खोना पड़ता है; उसे ऐसी पत्नी मिलती है जो उसके पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्रों को जन्म देगी। अध्याय के अनुसार पितृवंशिकता के प्रति यह झुकाव शासक परिवारों और धनी वर्ग के पुरुषों में था। अतः विवाह वधू के पूरे जीवन और पहचान को बदल देता था, जबकि वर के लिए यह उसके अपने वंश की निरंतरता सुनिश्चित करता था।

पाठगत प्रश्न 2 · पृष्ठ 57 · स्रोत 2

प्र. उद्धरण पढ़िए और उन सारे मूल तत्वों की सूची तैयार कीजिए जिनका राजा बनने के लिए प्रस्ताव किया गया है। एक विशेष कुल में जन्म लेना कितना महत्वपूर्ण था? इनमें से कौन-सा मूल तत्व सही लगता है? क्या ऐसा कोई तत्व है जो आपको अनुचित लगता है?

उत्तर: उद्धरण में दिए गए मूल तत्व: (1) राजकुल में जन्म और पिता से पुत्र को उत्तराधिकार: दुर्योधन का तर्क है कि यदि पांडव पांडु से विरासत पाते हैं तो उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी होंगे; (2) ज्येष्ठता: बड़े भाई होने के नाते सिंहासन धृतराष्ट्र को मिलना था; (3) शारीरिक योग्यता: ‘अपूर्णता के कारण’ (नेत्रहीन होने से) उन्हें सिंहासन का अधिकार नहीं था; (4) आयु: पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने क्योंकि सभी राजकुमार अल्पवयस्क थे; (5) योग्यता, सदाचार और जनता का समर्थन: हस्तिनापुर के नागरिक पांडवों को ‘अधिक योग्य और सदाचारी’ मानकर पसंद करते थे।
विशेष कुल में जन्म का महत्त्व: बहुत अधिक। सभी दावेदार एक ही कुरु कुल के हैं, और दुर्योधन का पूरा डर यही है कि वह और उसके पुत्र राज्य के उत्तराधिकार से बेदखल हो जाएँगे।
सही लगने वाले तत्व: योग्यता, सदाचार, परिपक्व आयु और जनता का समर्थन राजा चुनने के उचित आधार लगते हैं।
अनुचित लगने वाले तत्व: केवल जन्म के आधार पर निर्णय, जिससे दूसरे कुलों के योग्य लोग और सभी पुत्रियाँ बाहर हो जाती हैं; और किसी व्यक्ति को उसके अन्य गुणों के बावजूद केवल शारीरिक अपूर्णता (जैसे नेत्रहीनता) के कारण बाहर रखना। जैसा अध्याय कहता है, इस प्रकरण में परस्पर विरोधी विचार मिलते हैं।

पाठगत प्रश्न 3 · पृष्ठ 58 · स्रोत 3

प्र. इनमें से प्रत्येक विवाह पद्धति के विषय में चर्चा कीजिए कि विवाह का निर्णय किसके द्वारा लिया गया था: (क) वधू (ख) वर (ग) वधू का पिता (घ) वर का पिता (ङ) अन्य लोग

उत्तर:
पहली पद्धति: (ग) वधू का पिता। वह स्वयं वेदज्ञ वर को आमंत्रित करता है और कन्या को बहुमूल्य वस्त्रों और अलंकारों से विभूषित कर दान करता है; वधू की कोई भूमिका नहीं।
चौथी पद्धति: (ग) वधू का पिता। वह वर-वधू युगल को ‘तुम साथ मिलकर अपने दायित्वों का पालन करो’ कहकर संबोधित करता है और वर का सम्मान कर कन्या का दान करता है।
पाँचवीं पद्धति: (ख) वर, जो अपनी क्षमता व इच्छानुसार वधू के बांधवों को और स्वयं वधू को यथेष्ट धन देकर वधू प्राप्त करता है; (ङ) वधू के बांधव भी इसमें भागीदार हैं क्योंकि वे धन स्वीकार करते हैं।
छठी पद्धति: (क) वधू और (ख) वर दोनों मिलकर: यह स्त्री और पुरुष के बीच अपनी इच्छा से संयोग है, जिसकी उत्पत्ति काम से है।
वर का पिता (घ): इन चारों में से किसी भी पद्धति में निर्णय नहीं लेता। ध्यान रहे, धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में पहले चार प्रकार ‘उत्तम’ माने जाते थे और बाकी (पाँचवीं और छठी सहित) निंदित।

पाठगत प्रश्न 4 · पृष्ठ 59 · स्रोत 4

प्र. यहाँ कितने गोतमी-पुत्त तथा कितने वसिथि (वैकल्पिक वर्तनी वसथि) पुत्त हैं?

उत्तर: हिंदी संस्करण में छपी सूची में तीन गोतमी-पुत्त हैं (राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि, राजा गोतमी-पुत्त सामि-सिरि-यन-सातकनि और राजा गोतमी-पुत्त सिरी-विजय-सातकनि) और एक वसिथि-पुत्त है (राजा वसिथि-पुत्त (सामि) सिरि-पुलुमायि)। ‘वसथि’ वर्तनी इस सूची में नहीं आई है। शेष राजाओं में एक मधारि-पुत्त और दो हरिति-पुत्त हैं। (अंग्रेज़ी संस्करण की सूची में पाँचवाँ नाम ‘वसथि-पुत्त चत्तरपन-सातकनि’ छपा है, इसलिए वहाँ वसिथि/वसथि-पुत्त दो हैं; परीक्षा में अपनी पुस्तक की सूची के अनुसार उत्तर दीजिए।) ये नाम माताओं के गोत्रों (गौतम और वशिष्ठ) से बने हैं, जिससे पता चलता है कि रानियों ने विवाह के बाद भी पति के गोत्र के स्थान पर अपने पिता का गोत्र नाम बनाए रखा।

पाठगत प्रश्न 5 · पृष्ठ 60 · स्रोत 5

प्र. क्या यह उद्धरण आपको आरंभिक भारतीय समाज में माँ को किस दृष्टि से देखा जाता था इसका जायज़ा देता है।

उत्तर: हाँ, कुछ हद तक। माता गांधारी अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को गंभीर राजनीतिक और नैतिक सलाह देती हैं: शांति की संधि से वह अपने पिता, माता और शुभेच्छुकों का सम्मान करेगा; विवेकी पुरुष जो इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है वही राज्य की रखवाली करता है; लालच और क्रोध को पराजित करना चाहिए; और युद्ध से न धर्म मिलता है, न अर्थ, न प्रसन्नता। इससे लगता है कि माताओं का सम्मान था और वे राजा को भी राज-काज पर सलाह दे सकती थीं। पर दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी, वह युद्ध में लड़ा और हार गया; इससे पता चलता है कि माँ की सलाह की अनदेखी हो सकती थी और वास्तविक सत्ता पुरुषों के हाथ में थी। अध्याय सावधान करता है कि सातवाहन राजा मातृनाम से जाने जाते थे, फिर भी उनका उत्तराधिकार पितृवंशिक था।

पाठगत प्रश्न 6 · पृष्ठ 60 · चर्चा कीजिए

प्र. आजकल बच्चों का नामकरण किस भाँति होता है? क्या ये नाम इस अंश में वर्णित नामों से मिलते-जुलते हैं अथवा भिन्न हैं?

उत्तर: आजकल: अधिकतर बच्चों को एक निजी नाम और एक कुलनाम (उपनाम) मिलता है जो प्रायः पिता की ओर से आता है; कुछ क्षेत्रों में पिता का नाम या गाँव का नाम आद्याक्षर या मध्य नाम के रूप में जुड़ता है; कुछ समुदायों में गोत्र या जाति का नाम लगाया जाता है; और विवाह के बाद कई स्त्रियाँ पति का उपनाम अपना लेती हैं, जबकि कुछ अपना ही रखती हैं। अब सरकारी दस्तावेज़ों में माँ का नाम भी दर्ज होता है और कुछ लोग अपने नाम में माँ का नाम भी जोड़ते हैं। समानताएँ: नाम आज भी कुल और प्रायः पिता की ओर के वंश को दर्शाते हैं; स्त्रियों द्वारा पति का उपनाम अपनाना उस नियम जैसा है जिसमें स्त्री को विवाह के बाद पति के गोत्र का माना जाता था। भिन्नताएँ: सातवाहन राजाओं को मातृनाम (माता के नाम से उद्भूत, जैसे गोतमी-पुत्त, वसिथि-पुत्त) से जाना जाता था, जो आज दुर्लभ है; और उनकी रानियों ने पति का गोत्र अपनाने के बजाय पिता का गोत्र नाम ही बनाए रखा।

पाठगत प्रश्न 7 · पृष्ठ 62 · स्रोत 7

प्र. इस कहानी के द्वारा निषादों को कौन-सा संदेश दिया जा रहा था? क्षत्रियों को इससे क्या संदेश मिला होगा? क्या आपको लगता है कि एक ब्राह्मण के रूप में द्रोण धर्मसूत्र का अनुसरण कर रहे थे जब वे धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे थे?

उत्तर: निषादों को संदेश: वे धनुर्विद्या जैसे कौशल, जो क्षत्रियों के माने जाते थे, सीखने का प्रयास न करें और अपने लिए तय भूमिका में ही रहें। वनवासी निषाद एकलव्य स्वयं अभ्यास करके सिद्धहस्त तीरंदाज़ बन गया, फिर भी उसे गुरु दक्षिणा के रूप में अपने दाहिने हाथ का अँगूठा देना पड़ा और उसकी तेज़ी चली गई। कहानी उन्हें यह भी सिखाती है कि ब्राह्मण गुरु की आज्ञा बिना प्रश्न किए माननी चाहिए। क्षत्रियों को संदेश: श्रेष्ठ योद्धा के रूप में उनकी स्थिति की रक्षा की जाएगी, आवश्यकता पड़ने पर ब्राह्मण भी करेंगे, जैसे द्रोण ने अपना वचन निभाया कि कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहेगा। द्रोण और धर्मसूत्र: नहीं। धर्मसूत्रों के अनुसार ब्राह्मणों का मुख्य कर्तव्य वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, तथा दान देना और लेना था। युद्ध-कौशल यानी धनुर्विद्या की शिक्षा देना इन कर्तव्यों में नहीं था, इसलिए द्रोण ब्राह्मण के लिए निर्धारित जीविका का पालन नहीं कर रहे थे।

पाठगत प्रश्न 8 · पृष्ठ 64 · स्रोत 8

प्र. क्या आपको लगता है कि रेशम के बुनकर उस जीविका का पालन कर रहे थे जो उनके लिए शास्त्रों ने तय की थी?

उत्तर: नहीं, पूरी तरह नहीं। मंदसौर अभिलेख बताता है कि श्रेणी की सदस्यता रेशम बुनने के शिल्प पर आधारित थी, फिर भी कुछ सदस्यों ने बिलकुल अलग जीविकाएँ अपना लीं: कुछ को संगीत से प्रेम था, कुछ को सैकड़ों उत्तम जीवनियों के रचयिता होने का गर्व था, कुछ धार्मिक व्याख्यानों में तल्लीन थे, कुछ धार्मिक अनुष्ठानों में श्रेष्ठ थे, कुछ (वैदिक) खगोल शास्त्र में पारंगत थे और कुछ युद्ध में शूरवीर थे। बुनकर लाट (गुजरात) से दशपुर (मंदसौर) चले गए थे और उन्होंने अपने शिल्प से अर्जित धन को मिलकर सूर्य देवता के मंदिर पर खर्च किया। इससे पता चलता है कि वास्तविक जीविकाएँ शास्त्रों में तय नियमों से कहीं अधिक लचीली थीं।

पाठगत प्रश्न 9 · पृष्ठ 65 · स्रोत 9

प्र. इस सारांश में उन व्यवहारों को निर्दिष्ट कीजिए जो अब्राह्मणीय प्रतीत होते हैं।

उत्तर: (1) एक स्त्री, हिडिम्बा, ने स्वयं अपना पति चुना और भीम से विवाह का प्रस्ताव किया; उसके पिता ने कन्यादान नहीं किया। (2) उसने कहा कि भीम के लिए उसने मित्र, बांधव और अपने धर्म का भी परित्याग कर दिया है। (3) एक क्षत्रिय पांडव ने एक राक्षसी से विवाह किया, जो वर्ण व्यवस्था से बाहर थी। (4) दंपति दिन भर साथ रहते और भीम रात्रि में अपने परिवार के पास लौट आते, यह एक असामान्य व्यवस्था थी। (5) घटोत्कच के जन्म के बाद माँ और पुत्र पांडवों को छोड़कर वन में चले गए, यानी पुत्र माँ के लोगों के बीच पला। (6) राक्षसों को नरभक्षी बताया गया है; अध्याय के अनुसार कुछ इतिहासकार मानते हैं कि राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों में चित्रित मानदंडों से भिन्न थे।

पाठगत प्रश्न 10 · पृष्ठ 67 · स्रोत 10

प्र. इस कथा में उन तत्वों की ओर इंगित कीजिए जिनसे यह ज्ञात हो कि वह मातंग के नज़रिए से लिखे गए थे।

उत्तर: (1) कथा का नायक मातंग एक चाण्डाल है, और वही बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) है। (2) दिथ्थ मांगलिक का ‘मैंने कुछ अशुभ देख लिया है’ कहना और उसके सेवकों द्वारा मातंग की पिटाई अन्यायपूर्ण दिखाई गई है, और ‘उपवास से क्षीण’ मातंग के कष्ट को सहानुभूति से बताया गया है। (3) उसका विरोध सफल होता है: सात दिन तक दरवाज़े पर लेटे रहने के बाद दिथ्थ को उसे सौंप दिया जाता है। (4) वह अलौकिक शक्ति प्राप्त करता है और आकाश में जाकर अदृश्य हो जाता है, यानी अपमान करने वालों से श्रेष्ठ सिद्ध होता है। (5) कथा की सीख उसी के मुँह से कही गई है: ‘जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत जो लोग दोषमुक्त हैं वे भेंट के योग्य हैं।’ (6) ब्राह्मणीय पवित्रता के विचार मानने वाला उसका पुत्र माण्डव्य गलत सिद्ध होता है, दिथ्थ उससे माफ़ी माँगती है, और उसके भिक्षा पात्र का बचा भोजन माण्डव्य तथा ब्राह्मणों को दिया जाता है, जो पवित्रता के नियमों को उलट देता है।

पाठगत प्रश्न 11 · पृष्ठ 67 · चर्चा कीजिए

प्र. इस प्रकरण में कौन से स्रोत हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि लोग ब्राह्मणों द्वारा बताई गई जीविका का अनुसरण करते थे? कौन से स्रोत हैं जिनसे अलग संभावनाओं की जानकारी मिलती है?

उत्तर: नियमों के पालन का संकेत देने वाले स्रोत: स्वयं धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र, जिनमें मनुस्मृति के चाण्डालों के ‘कर्तव्य’ (गाँव के बाहर रहना, संबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि करना, वधिक का कार्य करना) हैं; फा-शिएन (अस्पृश्यों का सड़क पर करताल बजाना) और श्वैन-त्सांग (वधिकों और सफ़ाई करने वालों का नगर से बाहर रहना) के विवरण, जो बताते हैं कि ये नियम लागू किए जाते थे; और एकलव्य की कहानी (स्रोत 7), जो निषाद को उसके ‘स्थान’ पर रखने के लिए थी।
अलग संभावनाएँ दिखाने वाले स्रोत: स्रोत 6 का ऋग्वैदिक सूक्त (वक्ता कवि, पिता वैद्य, माता अन्न पीसने वाली); ब्राह्मण द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना; अक्षत्रिय राजा, जैसे ‘निम्न’ कुल के कहे गए मौर्य, ब्राह्मण शुंग और कण्व, शक, और स्वयं को अनूठा ब्राह्मण बताने वाले सातवाहन गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि; मृच्छकटिकम् के नायक चारुदत्त को ब्राह्मण-वणिक और अभिलेख में दो भाइयों को क्षत्रिय-वणिक कहा जाना; रेशम बुनकरों का मंदसौर अभिलेख (स्रोत 8); हिडिम्बा की कहानी (स्रोत 9); और मातंग जातक (स्रोत 10)।

पाठगत प्रश्न 12 · पृष्ठ 68 · स्रोत 11

प्र. क्या आपको ऐसा लगता है कि यह प्रकरण इस बात की ओर इंगित करता है कि पत्नियों को पतियों की निजी संपत्ति माना जाए?

उत्तर: कुछ हद तक, हाँ। युधिष्ठिर ने स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य और अनुजों के बाद द्रौपदी को भी दाँव पर लगाया, मानो वह भी एक संपत्ति हो; और पहले मत के अनुसार स्वयं को हार जाने के बाद भी उसे दाँव पर लगाना अनुचित नहीं था ‘क्योंकि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है’। पर यह विचार सबको मान्य नहीं था: दूसरे मत के अनुसार दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता; द्रौपदी ने स्वयं प्रश्न उठाया; मुद्दों का कोई निष्कर्ष नहीं निकला; और अंततः धृतराष्ट्र ने पांडवों और द्रौपदी को उनकी निजी स्वतंत्रता लौटा दी। स्मृति परंपरा में स्त्रियों को स्त्रीधन पर स्वामित्व भी मिला था, जिस पर पति का कोई अधिकार नहीं था। अतः यह प्रकरण दिखाता है कि कुछ लोग पत्नी को पति की संपत्ति मानते थे, पर इस मत पर विवाद था।

पाठगत प्रश्न 13 · पृष्ठ 69 · स्रोत 12

प्र. स्त्री और पुरुष किस प्रकार धन प्राप्त कर सकते थे इसकी तुलना कीजिए व अंतर भी स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: पुरुष (मनुस्मृति के अनुसार सात तरीके): विरासत, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा, तथा सज्जनों द्वारा दी गई भेंट को स्वीकार करके। स्त्री (छः तरीके): वैवाहिक अग्नि के सामने तथा वधूगमन के समय मिली भेंट; स्नेह के प्रतीक के रूप में मिला उपहार; भ्राता, माता और पिता द्वारा दिए गए उपहार; परवर्ती काल में मिली भेंट; तथा वह सब कुछ जो ‘अनुरागी’ पति से उसे प्राप्त हो।
समानता: दोनों भेंट के रूप में धन प्राप्त कर सकते थे।
अंतर: पुरुष अपने प्रयास और इच्छा से (कार्य, निवेश, खरीद, विजय) तथा विरासत से सक्रिय रूप में धन अर्जित कर सकते थे; स्त्रियों के तरीके लगभग पूरी तरह परिवार या पति से मिली भेंटें थीं, यानी वे दूसरों की सद्भावना पर निर्भर थीं। स्त्रियों की सूची में विरासत, कार्य और निवेश नहीं हैं। यह अध्याय के इस निष्कर्ष से मेल खाता है कि भूमि, पशु और धन पर सामान्यतः पुरुषों का ही नियंत्रण था, जिससे स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता और प्रखर हुई।

पाठगत प्रश्न 14 · पृष्ठ 70 · स्रोत 13

प्र. अवन्तिपुत्र के पहले वक्तव्य को दुबारा पढ़िए। इसमें कौन से विचार ऐसे हैं जो ब्राह्मणीय ग्रंथों/परंपराओं से लिए गए हैं? क्या आप इनमें से किसी विचार के स्रोत की पहचान कर सकते हैं? इस ग्रंथ के अनुसार सामाजिक असमानता के लिए क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है?

उत्तर: ब्राह्मणीय विचार: ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं और अन्य जातियाँ निम्न कोटि की; ब्राह्मण का वर्ण शुभ्र है और अन्य जातियाँ काली; केवल ब्राह्मण पवित्र हैं; ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्र हैं, ब्रह्मा के मुख से जन्मे, उनसे ही रचित और ब्रह्मा के वंशज हैं। स्रोत: ब्राह्मण के सृष्टिकर्ता के मुख से जन्म लेने का विचार ऋग्वेद के ‘पुरुषसूक्त’ से आता है (जिसका उल्लेख अध्याय के अभ्यास में है), और वर्णों का क्रम, जिसमें ब्राह्मण सबसे ऊपर हैं, तथा पवित्रता के विचार धर्मसूत्रों और मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों से आते हैं। सामाजिक असमानता का स्पष्टीकरण: जन्म नहीं, धन। कच्चन और अवन्तिपुत्र इस पर सहमत होते हैं कि जिस शूद्र के पास धन, अनाज, स्वर्ण या रजत हो, वह दूसरे शूद्र को, बल्कि क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी आज्ञाकारी सेवक बना सकता था; इसलिए इस आधार पर चारों वर्ण ‘एकदम समान’ हैं। यह बौद्धों द्वारा जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार करने को दर्शाता है।

पाठगत प्रश्न 15 · पृष्ठ 71 · स्रोत 14

प्र. चारण ने सरदार को दानी बताने के लिए किस तरह के दाँव-पेंच अपनाए? धन अर्जित करने के लिए सरदार को क्या करना होता था जिससे वह उसका कुछ अंश चारण को दे सके?

उत्तर: दाँव-पेंच: (1) वह अन्य कवियों के सामने सरदार की खुलकर प्रशंसा करता है कि वह दानप्रिय है और ‘चारणों की क्षुधा का शत्रु’ है; (2) वह मानता है कि सरदार के पास हर रोज़ खर्च करने के लिए धन नहीं है, पर कहता है कि वह इतना ओछा नहीं कि मना कर दे, यानी सरदार की प्रतिष्ठा दाँव पर लगा देता है; (3) वह अन्य चारणों को अपनी गरीबी मिटाने के लिए साथ चलने का निमंत्रण देता है, जिससे सरदार की ख्याति फैलती है; (4) वह भूख से क्षीण पसलियाँ दिखाकर सरदार की करुणा जगाने की बात करता है। सरदार धन कैसे जुटाता: युद्ध करके। सरदार गाँव के लोहार से कहेगा, ‘मुझे युद्ध के लिए एक लंबा भाला तैयार कर दो, एक ऐसा भाला जिसका सीधा फलक हो!’ अर्थात् उससे अपेक्षा थी कि वह युद्ध और धावों से धन प्राप्त करे और उसका अंश चारणों में बाँटे।

पाठगत प्रश्न 16 · पृष्ठ 71 · चर्चा कीजिए

प्र. वर्तमान समाजों में सामाजिक रिश्ते किस तरह परिचालित होते हैं? क्या यह अतीत के सामाजिक रिश्तों से मिलते-जुलते हैं, अथवा भिन्न हैं?

उत्तर: समानताएँ: धन और सत्ता आज भी प्रतिष्ठा और अनुयायी दिलाते हैं, जैसा धनाढ्य शूद्र की कहानी में है; आश्रयदाता आज भी कलाकारों, लेखकों और कवियों को सहायता देते हैं, और नेता उपकार के बदले प्रशंसा और निष्ठा की अपेक्षा रखते हैं, जैसे तमिल सरदार और उनके चारण; दान और विवाह-त्योहारों पर दिए गए उपहार सम्मान दिलाते हैं; और कई स्थानों पर जाति, वर्ग और लिंग की असमानताएँ आज भी रिश्तों को प्रभावित करती हैं। भिन्नताएँ: संविधान सभी नागरिकों को कानून के सामने समान बनाता है और अस्पृश्यता समाप्त की गई है; लोग जन्म से तय जीविका के बजाय अपनी पसंद का व्यवसाय चुन सकते हैं; स्त्रियों को संपत्ति और विरासत के अधिकार हैं; काम का मूल्य किसी आश्रयदाता की भेंट के बजाय वेतन या मज़दूरी से मिलता है; और राज्य कल्याणकारी योजनाएँ चलाता है, इसलिए लोग किसी सरदार की उदारता पर कम निर्भर हैं।

पाठगत प्रश्न 17 · पृष्ठ 71 · चित्र 3.7

प्र. मूर्तिकार ने सरदार व उसके अनुयायी के बीच अंतर को कैसे दर्शाया है?

उत्तर: अमरावती (आंध्र प्रदेश) की इस पत्थर की मूर्ति (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) में: (1) आकार: सरदार बहुत बड़ा और ऊँचा दिखाया गया है, जबकि अनुयायी छोटा है और उसकी कमर तक ही पहुँचता है; (2) वेशभूषा और आभूषण: सरदार ऊँचा, सजा हुआ शिरोभूषण, भारी हार, कुंडल और बाजूबंद तथा बारीक नक्काशी वाला अधोवस्त्र पहने है, जबकि अनुयायी की वेशभूषा और आभूषण बहुत साधारण हैं; (3) मुद्रा: सरदार एक हाथ अनुयायी के सिर पर रखे है, जो अधिकार और संरक्षण का संकेत है, और दूसरे उठे हुए हाथ में कोई वस्तु पकड़े है; अनुयायी नीचे खड़ा ऊपर देख रहा है। आकार, वेशभूषा और मुद्रा के माध्यम से मूर्तिकार ने सरदार की ऊँची हैसियत दिखाई है।

पाठगत प्रश्न 18 · पृष्ठ 76 · स्रोत 15

प्र. क्या आपको लगता है कि लाल की खोज और महाकाव्य में वर्णित हस्तिनापुर में समानता है।

उत्तर: नहीं, विशेष समानता नहीं है। महाकाव्य ऐसे नगर का वर्णन करता है जो ‘समुद्र की भाँति भरा हुआ’ था, ‘सैकड़ों प्रासादों से संकुलित’ था, जिसके सिंहद्वार, तोरण और कंगूरे सघन बादलों की तरह घुमड़ रहे थे, और जो इंद्र की नगरी के समान शोभायमान था। बी.बी. लाल के उत्खनन (1951-52) में हस्तिनापुर में कहीं अधिक साधारण बस्ती मिली। दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) में आवास गृहों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, केवल मिट्टी की दीवारें और कच्ची ईंटें, तथा सरकंडे की छाप वाला मिट्टी का पलस्तर, जिससे पता चलता है कि कुछ घरों की दीवारें सरकंडों की थीं। तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) में घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के थे, जिनमें शोषक-घट, ईंटों के नाले और वलय-कूप थे। प्रासादों, सिंहद्वारों या कंगूरों का कोई साक्ष्य नहीं मिला। उत्खनन सीमित क्षेत्र में ही हुआ था, पर अध्याय सुझाता है कि नगर का यह चित्रण संभवतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बाद जोड़ा गया जब इस क्षेत्र में नगरों का विकास हुआ, या यह मात्र कवियों की कल्पना की उड़ान थी।

पाठगत प्रश्न 19 · पृष्ठ 76 · स्रोत 16

प्र. आपको क्यों लगता है कि लेखक(कों) ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए?

उत्तर: तीन स्पष्टीकरण ये हैं: (1) कुंती ने बिना देखे ही पुत्रों से लाई गई वस्तु को आपस में बाँट लेने को कहा, और उनकी आज्ञा की अवहेलना नहीं की जा सकती थी; (2) ऋषि व्यास ने बताया कि पांडव वास्तव में इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था, अतः नियति ने ही उनका साथ तय किया था; (3) व्यास ने यह भी बताया कि एक युवा स्त्री ने पति प्राप्ति के लिए शिव से एक के बजाय पाँच बार वर माँग लिया था और वही द्रौपदी के रूप में जन्मी। संभावित कारण: ब्राह्मणों की दृष्टि में बहुपति प्रथा अमान्य और अवांछित थी, इसलिए प्रमुख पात्रों के इस विवाह को स्वीकार्य बनाने के लिए लेखकों को दैवी कारणों सहित मज़बूत तर्कों की ज़रूरत थी; एक स्पष्टीकरण से शायद सभी श्रोता संतुष्ट न होते; और महाकाव्य कई शताब्दियों में रचा और बढ़ाया गया, इसलिए अलग-अलग लेखकों ने अपने-अपने स्पष्टीकरण जोड़े होंगे। इतिहासकारों का सुझाव है कि इतने विभिन्न स्पष्टीकरण स्वयं बताते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा धीरे-धीरे लोगों के बीच अमान्य होती चली गई।

पाठगत प्रश्न 20 · पृष्ठ 77 · चर्चा कीजिए

प्र. इस अध्याय में महाभारत से उद्धृत अंशों को एक बार फिर पढ़िए। इनमें से प्रत्येक के विषय में यह चर्चा कीजिए कि क्या वे वास्तव में सत्य थे। ये उद्धरण हमें महाकाव्य के रचयिताओं, पाठकों या फिर श्रोताओं के विषय में क्या बताते हैं?

उत्तर: क्या वे वास्तव में सत्य थे?
(1) स्वजन के मध्य लड़ाई क्यों हुई (स्रोत 2): किसी राजकुल में उत्तराधिकार का विवाद पूरी तरह संभव है, पर ठीक यही शब्द किसी अभिलेख की तरह दर्ज नहीं हैं। (2) माता की सलाह (स्रोत 5): शांति के लिए माँ की विनती विश्वसनीय है, पर भाषण एक साहित्यिक रचना है। (3) एकलव्य (स्रोत 7): कुत्ते के मुँह में एक साथ सात तीर और अँगूठा काटकर देना अतिरंजित है; यह कहानी ‘उचित’ सामाजिक कर्तव्यों की सीख है। (4) हिडिम्बा (स्रोत 9): रूप बदलने वाली राक्षसी अक्षरशः सत्य नहीं, पर यह वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोगों से संपर्क की स्मृति हो सकती है। (5) द्रौपदी के प्रश्न (स्रोत 11): द्यूत क्रीड़ा एक कहानी हो सकती है, पर पत्नी पर स्वामित्व की बहस वास्तविक प्रश्नों को दर्शाती है। (6) हस्तिनापुर (स्रोत 15): यह चित्रण लाल की खोजों से मेल नहीं खाता। (7) द्रौपदी का विवाह (स्रोत 16): इंद्र के अवतार और शिव के वरदान जैसे दैवी स्पष्टीकरण अक्षरशः सत्य नहीं हो सकते।
रचयिताओं के विषय में: मूल कथा संभवतः ‘सूत’ कहे जाने वाले भाट सारथियों ने रची जो क्षत्रिय योद्धाओं की विजय पर कविताएँ लिखते थे; पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा को अपनाकर लिखा। ये अंश पितृवंशिकता और उत्तराधिकार, वर्ण व्यवस्था और ‘उचित’ कर्तव्यों के प्रति उनकी चिंता, और बहुपति प्रथा जैसी असहज प्रथाओं को समझाने की उनकी ज़रूरत दिखाते हैं।
पाठकों और श्रोताओं के विषय में: श्रोताओं में राजत्व, युद्ध और उत्तराधिकार में रुचि रखने वाले क्षत्रिय अभिजन थे, पर महाभारत की संस्कृत वेदों से कहीं अधिक सरल होने के कारण इसे व्यापक स्तर पर समझा जाता था, इसलिए आम लोग भी कहानियाँ सुनते और दोहराते थे। श्रोताओं को नाटकीय कथाएँ पसंद थीं, उन्हें स्पष्टीकरणों से संतुष्ट करना पड़ता था, और उन्हें वे मानदंड सिखाए जा रहे थे जिनका पालन रचयिता चाहते थे।