कक्षा 11 भूगोल अध्याय 12 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास के नोट्स हिंदी में

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • भू-आकृति और भूदृश्य में क्या अंतर है, और हर भू-आकृति का अपना एक इतिहास क्यों होता है
  • प्रवाहित जल तरुणावस्था में घाटियाँ कैसे काटता है, और मंद पड़ने पर जलोढ़ पंख व डेल्टा कैसे बनाता है
  • चूना-पत्थर के प्रदेश भूमिगत रूप से इतने अलग क्यों दिखते हैं, और कार्स्ट स्थलाकृति असल में क्या है
  • घर्षण करते हिमनद पर्वतों की तीखी चोटियाँ कैसे तराशते हैं, और मलबे की लंबी कटकें कैसे छोड़ जाते हैं
  • तरंगें दो बिल्कुल भिन्न प्रकार के तटों को कैसे गढ़ती हैं, और स्पिट व लैगून क्या होते हैं
  • मरुस्थल का भूदृश्य केवल पवन से नहीं, बल्कि पवन व कभी-कभार की तेज़ वर्षा दोनों से मिलकर कैसे बनता है
भू-आकृतिभूदृश्यपेनीप्लेनकार्स्ट स्थलाकृति
स्टैलेक्टाइटस्टैलेग्माइटसर्कहिमोढ़एस्कर
ड्रमलिनस्पिटलैगूनपेडीमेंटबरखान

1भू-आकृति क्या है?

चट्टानों के अपक्षय के बाद प्रवाहित जल, भूमिगत जल, पवन, हिमनद और तरंगों जैसे
भू-आकृतिक कारक उन पर काम करना शुरू करते हैं, जिससे अपरदन होता है। अपरदन से
धरातल का रूप बदलता है, और अपरदन से हटाया गया पदार्थ कहीं-न-कहीं जमा भी होता है,
जिससे धरातल फिर बदलता है। आगे बढ़ने से पहले दो मिलते-जुलते शब्दों को साफ़-साफ़
समझ लेते हैं।

याद रखेंपरिभाषा 1

भू-आकृति पृथ्वी के धरातल का एक छोटा से मध्यम आकार का भाग है, जिसकी
अपनी भौतिक आकृति, आकार और पदार्थ होते हैं, और जो किसी खास भू-आकृतिक प्रक्रिया व
कारक से बनती है।

याद रखेंपरिभाषा 2

भूदृश्य पृथ्वी के धरातल का वह विस्तृत भाग है, जो कई संबंधित
भू-आकृतियों के मिलने से बनता है।

अधिकतर भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ धीमी गति से काम करती हैं, इसीलिए किसी भू-आकृति
को बनने में लंबा समय लगता है, और एक बार बनने के बाद भी वह जब तक प्रक्रियाएँ व
कारक उस पर काम करते रहते हैं, धीरे या तेज़ी से बदलती रहती है। जलवायु में बदलाव,
या भूखंड की ऊर्ध्वाधर व क्षैतिज गति, किसी प्रक्रिया की तीव्रता बदल सकती है, या
उसे किसी दूसरी प्रक्रिया से बदल भी सकती है।

याद रखेंपरिभाषा 3

भू-आकृतियों का विकास उन अवस्थाओं को कहते हैं, जिनसे गुजरकर एक
भू-आकृति दूसरी भू-आकृति में बदल जाती है, या पहली बार बनने के बाद अपना ही रूप
बदल लेती है। इसीलिए हर भू-आकृति का अपना एक इतिहास होता है, जो जीवन की
अवस्थाओं जैसी अवस्थाओं से गुजरता है: तरुणावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था।

क्या आप जानते हैं?

प्रवाहित जल किसी भूखंड पर बहुत लंबे समय तक काम करता रहे, तो नदी-बेसिनों के
बीच के अवरोध लगभग समतल हो जाते हैं। बचा हुआ लगभग समतल मैदान पेनीप्लेन
कहलाता है, यानी “लगभग एक समतल”। इस पर अकेले खड़े कठोर चट्टान के अवशेष
मोनाडनॉक कहलाते हैं।

1.1 नदीय भूदृश्य की अवस्थाएँ

भू-आकृतियों के विकास को समझने का सबसे आसान तरीका एक नदी घाटी को समय के साथ
देखना है। नदी जैसे-जैसे पुरानी होती जाती है, उसकी घाटी की आकृति, बाढ़-मैदान और
विसर्प, सभी एक तय क्रम में बदलते हैं।

चित्र 1: नदी घाटी की अवस्थाओं के प्रारेखीय अनुप्रस्थ काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। तरुणावस्था: उथली V-आकार की घाटी, बाढ़-मैदान अनुपस्थित या बहुत संकरा, चौड़े समतल विभाजकों पर दलदल। प्रौढ़ावस्था: घाटी V-आकार की परंतु गहरी, विभाजक स्पष्ट, और घाटी के भीतर बाढ़-मैदान में नदी विसर्प बनाती है। वृद्धावस्था: विस्तृत बाढ़-मैदान, स्वतंत्र विसर्प व गोखुर झीलें, भूदृश्य समुद्रतल के बराबर या थोड़ा ऊँचा।
चित्र 1: नदी घाटी की अवस्थाओं के प्रारेखीय अनुप्रस्थ काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। तरुणावस्था:
उथली V-आकार की घाटी, बाढ़-मैदान अनुपस्थित या बहुत संकरा, चौड़े समतल विभाजकों पर दलदल। प्रौढ़ावस्था:
घाटी V-आकार की परंतु गहरी, विभाजक स्पष्ट, और घाटी के भीतर बाढ़-मैदान में नदी विसर्प बनाती है।
वृद्धावस्था: विस्तृत बाढ़-मैदान, स्वतंत्र विसर्प व गोखुर झीलें, भूदृश्य समुद्रतल के बराबर या थोड़ा ऊँचा।
अवस्था धाराएँ व समाकलन घाटी व बाढ़-मैदान विशेष लक्षण
तरुणावस्था कम धाराएँ, कमज़ोर समाकलन, मूल ढाल पर बहती हुई छिछली V-आकार घाटियाँ, बाढ़-मैदान नहीं या मुख्य धारा के सहारे बहुत संकरा चौड़े व समतल जल-विभाजक, दलदल-दलदल व झीलों सहित; जहाँ कठोर चट्टान है वहाँ जल-प्रपात व क्षिप्रिका
प्रौढ़ावस्था धाराएँ अधिक, अच्छा समाकलन घाटियाँ अब भी V-आकार पर गहरी; मुख्य धाराएँ चौड़ी, विसर्पों के साथ चौड़ा बाढ़-मैदान तरुणावस्था के समतल अंतर-धारा क्षेत्र व दलदल ख़त्म; जल-विभाजक तीखे; जल-प्रपात व क्षिप्रिका लुप्त
वृद्धावस्था कुछ ही छोटी सहायक धाराएँ, मंद ढाल धाराएँ विस्तृत बाढ़-मैदानों पर मुक्त रूप से विसर्पित, प्राकृतिक तटबंध व गोखुर झीलों सहित जल-विभाजक चौड़े व समतल, झीलों-दलदल सहित; अधिकतर भूदृश्य समुद्र-तल पर या उसके निकट
परीक्षा संकेत

“पेनीप्लेन क्या है, और उस पर क्या बचता है?” एक आम लघु प्रश्न है। एक पंक्ति
में उत्तर: प्रवाहित जल के लगातार अपरदन से भूखंड लगभग समतल मैदान में बदल जाता
है जिसे पेनीप्लेन कहते हैं, और उस पर केवल कठोर चट्टान के अलग-थलग टीले, यानी
मोनाडनॉक, बचे रहते हैं।

2प्रवाहित जल

आर्द्र प्रदेशों में, जहाँ भारी वर्षा होती है, प्रवाहित जल सबसे महत्त्वपूर्ण
भू-आकृतिक कारक है। इसके दो अंग हैं: चादर प्रवाह, जो सामान्य धरातल पर एक
परत के रूप में बहता है, और रैखिक प्रवाह, जो घाटियों में नदियों व सरिताओं
के रूप में बहता है। तीव्र ढाल पर धाराएँ अपरदन करती हैं; लगातार अपरदन से ढाल मंद
पड़ने पर धारा धीमी हो जाती है और निक्षेपण सक्रिय हो जाता है। चैनल जितना मंद, उतना
ही अधिक निक्षेपण।

चादर अपरदनसतह पर बहता जल धरातल की पतली परत हटाता है
→
रिलप्रवाह छोटी, संकरी नालियों में केंद्रित होता है
→
गलीरिल गहरी, चौड़ी और लंबी होती जाती है
→
घाटी तंत्रगलियाँ मिलकर घाटियों का जाल बनाती हैं

2.1 प्रवाहित जल के अपरदित स्थलरूप

घाटियाँ छोटी, संकरी रिल के रूप में शुरू होती हैं और लंबी, चौड़ी गलियों में
बदल जाती हैं। आकार व आकृति के आधार पर कई तरह की घाटियाँ पहचानी जा सकती हैं।

चित्र 2: प्रारेखीय अनुप्रस्थ काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। गॉर्ज गहरी घाटी है जिसके पार्श्व तीव्र ढाल के, लगभग सीधे होते हैं और जिसकी चौड़ाई तल व ऊपरी भाग में लगभग समान होती है; यह कठोर चट्टानों में बनता है। कैनियन के किनारे सीढ़ीनुमा खड़े ढाल वाले होते हैं, यह तल की अपेक्षा ऊपर अधिक चौड़ी होती है और प्रायः क्षैतिज स्तरित अवसादी चट्टानों में बनती है; यह गॉर्ज जितनी गहरी हो सकती है।
चित्र 2: प्रारेखीय अनुप्रस्थ काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। गॉर्ज गहरी घाटी है जिसके पार्श्व तीव्र ढाल
के, लगभग सीधे होते हैं और जिसकी चौड़ाई तल व ऊपरी भाग में लगभग समान होती है; यह कठोर चट्टानों में बनता
है। कैनियन के किनारे सीढ़ीनुमा खड़े ढाल वाले होते हैं, यह तल की अपेक्षा ऊपर अधिक चौड़ी होती है और प्रायः
क्षैतिज स्तरित अवसादी चट्टानों में बनती है; यह गॉर्ज जितनी गहरी हो सकती है।
1

जलगर्तिका तथा अवनमित कुंड

पहाड़ी नदियों के चट्टानी तल पर अपरदन व घूमते चट्टानी टुकड़ों के घर्षण से कमोबेश
वृत्ताकार गर्त बनते हैं जिन्हें जलगर्तिका कहते हैं। इनमें कंकड़-गोलाश्म जल के साथ घूमकर
इन्हें बड़ा करते हैं, और कई गर्त आपस में मिलकर नदी-घाटी को गहरा करते हैं। जलप्रपात के तल में
जल के ऊँचाई से गिरने व शिलाखंडों के घूमने से बने विशाल व गहरे कुंड अवनमित कुंड कहलाते हैं।

2

अधःकर्तित या गभीरीभूत विसर्प

मंद ढालों पर बहती नदियाँ अधिक पार्श्व अपरदन करती हैं, इसलिए बाढ़ व डेल्टा मैदानों में विसर्प
बनना आम है। परंतु कठोर चट्टानों में भी बहुत गहरे व चौड़े विसर्प कटे मिलते हैं, जिन्हें अधःकर्तित
या गभीरीभूत विसर्प कहते हैं। तरुणावस्था में ऊँचे समतल धरातल पर बने विसर्प अंततः उन ऊँचे
धरातलों में गभीरीभूत हो जाते हैं।

3

नदी वेदिकाएँ

नदी वेदिकाएँ घाटी के पुराने तल या बाढ़-मैदान के पुराने स्तर की निशानी
हैं, जो या तो चट्टानी सतह के रूप में या जलोढ़ के निक्षेप के रूप में मिलती
हैं। ये धारा द्वारा अपने ही पुराने बाढ़-मैदान में ऊर्ध्वाधर अपरदन से बनती
हैं। नदी के दोनों किनारों पर समान ऊँचाई की वेदिकाओं को युग्मित
वेदिकाएँ
कहते हैं।

क्या आप जानते हैं?

NCERT की पाठ्यपुस्तक में गॉर्ज की असली तस्वीर होगेनक्कल के पास, धर्मपुरी
ज़िला, तमिलनाडु में बहती कावेरी नदी
की है, जहाँ नदी एक संकरी, खड़ी दीवारों
वाली गॉर्ज से होकर गुजरती है, ठीक चित्र 2 में दिखाई गई आकृति जैसी।

2.2 प्रवाहित जल के निक्षेपित स्थलरूप

1

जलोढ़ पंख

जब पहाड़ी ढाल से मोटा मलबा ढोती धारा अचानक मंद ढाल वाले पदस्थल मैदान में
प्रवेश करती है, तो भार को आगे ढोना मुश्किल हो जाता है और वह चौड़े,
शंकु-आकार निक्षेप के रूप में जमा हो जाता है, जिसे जलोढ़ पंख कहते हैं।
आर्द्र प्रदेशों में पंख कम व मंद ढाल के होते हैं, जबकि शुष्क व अर्ध-शुष्क
जलवायु में ऊँचे व तीव्र ढाल के। पंख पर बहने वाली धारा अक्सर कई भागों में
बँट जाती है, जिन्हें वितरिकाएँ कहते हैं।

2

डेल्टा

डेल्टा जलोढ़ पंख जैसा ही बनता है, बस यह समुद्र में नदी का भार गिरने
से बनता है। डेल्टा के निक्षेप अच्छी तरह छँटे व स्तरित होते हैं: सबसे मोटा
पदार्थ पहले जमता है और महीन गाद व चिकनी मिट्टी आगे तक बहकर जाती है। डेल्टा
के बढ़ने के साथ इसकी वितरिकाएँ लंबी होती जाती हैं।

3

बाढ़-मैदान, प्राकृतिक तटबंध व विसर्पी रोधिका

बाढ़-मैदान नदी का सबसे बड़ा निक्षेपित स्थलरूप है। नदी का अपने ही
निक्षेपों से बना तल सक्रिय बाढ़-मैदान है; किनारे के ऊपर का भाग, जो
केवल बाढ़ में डूबता है, निष्क्रिय बाढ़-मैदान है। प्राकृतिक
तटबंध
नदी-किनारों पर मोटे पदार्थ की निचली, लंबी व समांतर कटकें हैं।
विसर्पी रोधिका बड़ी नदियों के विसर्पों के अवतल ढालों पर (पुस्तक के शब्दों में) प्रवाहित जल
द्वारा किनारे के साथ रैखिक रूप में जमा तलछट है, जो चौड़ाई में लगभग एक-सी रहती है और मिश्रित आकार
के तलछट से बनी होती है।

याद रखेंपरिभाषा 4

विसर्प नदी के मार्ग में बना एक फंदेनुमा मोड़ है। यह स्वयं कोई
भू-आकृति नहीं
, केवल एक चैनल प्रतिरूप है, जो (i) अत्यंत मंद ढाल पर जल के
किनारों पर पार्श्विक रूप से काम करने की प्रवृत्ति, (ii) जलोढ़ किनारों की
असंगठित व अनियमित प्रकृति, और (iii) कोरिओलिस बल, जो पवन की तरह बहते जल को भी
मोड़ देता है, इन तीन कारणों से बनता है।

चित्र 3: विसर्प का बाहरी किनारा लगातार कटने से वह गहरे फंदे में बदल जाता है। जब भीतरी संकरी गर्दन आख़िरकार कट जाती है, तो पुराना फंदा अर्धचंद्राकार गोखुर झील के रूप में छूट जाता है। ये योजनाबद्ध अवस्थाएँ हैं, किसी वास्तविक नदी-मार्ग की नहीं।
चित्र 3: विसर्प का बाहरी किनारा लगातार कटने से वह गहरे फंदे
में बदल जाता है। जब भीतरी संकरी गर्दन आख़िरकार कट जाती है, तो पुराना फंदा
अर्धचंद्राकार गोखुर झील के रूप में छूट जाता है। ये योजनाबद्ध अवस्थाएँ
हैं, किसी वास्तविक नदी-मार्ग की नहीं।

बड़ी नदियों के विसर्पों में उत्तल किनारे पर सक्रिय निक्षेपण और अवतल किनारे पर अधोरदन
होता है। अवतल किनारा कटाव किनारा कहलाता है और तीव्र कगार के रूप में दिखता है; उत्तल किनारे का
ढाल मंद होता है। विसर्प जब गहरे छल्लों का रूप ले लेते हैं तो मोड़ के बिंदुओं पर अपरदन से कट जाते हैं
और गोखुर झील बन जाती है।

आम गलती

परीक्षा में विसर्प को “भू-आकृति” मत लिखिए। पाठ स्पष्ट कहता है कि विसर्प
केवल एक चैनल प्रतिरूप है। बड़ी नदी के बाढ़ या डेल्टा मैदान का गहरा विसर्प-छल्ला कट जाने पर जो
बचता है, वह गोखुर झील है।

3भूमिगत जल

यह भाग भूमिगत जल को संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि इसके अपरदन व निक्षेपण के
काम के रूप में देखता है। भूमिगत जल वहाँ अच्छी तरह रिसता है जहाँ चट्टानें
पारगम्य, पतली परतों वाली व अच्छी तरह संधित हों। भूमिगत जल द्वारा पदार्थ का
यांत्रिक निष्कासन नगण्य है; असली काम रासायनिक घोल व निक्षेपण का है, जो मुख्य रूप
से चूना-पत्थर व डोलोमाइट में सक्रिय होता है, क्योंकि इनमें कैल्सियम
कार्बोनेट प्रचुर मात्रा में होता है।

याद रखेंपरिभाषा 5

कार्स्ट स्थलाकृति चूना-पत्थर या डोलोमाइट पर भूमिगत जल के घोल व
निक्षेपण से बने विशिष्ट स्थलरूपों को कहते हैं। इसका नाम बाल्कन क्षेत्र के
कार्स्ट प्रदेश
से पड़ा है, जो एड्रियाटिक सागर से सटा है और जहाँ इन
भू-आकृतियों का सबसे पहले अध्ययन हुआ।

3.1 कार्स्ट के अपरदित स्थलरूप

कार्स्ट के अपरदित स्थलरूप
विलयन रंध्र (swallow holes)चूना-पत्थर की सतह पर घुलन क्रिया से बने छोटे से मध्यम आकार के, गोल या लगभग गोल उथले गर्त
घोलरंध्र (sinkhole)ऊपर से वृत्ताकार, नीचे कीप जैसा; कुछ वर्ग मीटर से एक हैक्टेयर चौड़ा, आधा मीटर से 30+ मीटर गहरा। कुछ केवल घुलन से बनते हैं; नीचे की कंदरा की छत गिरने से बने बड़े छिद्र “ध्वस्त या निपात रंध्र” (डोलाइन) कहलाते हैं। ध्वस्त रंध्रों की अपेक्षा घोलरंध्र अधिक संख्या में पाए जाते हैं
युवाला (घाटी-रंध्र)कई घोलरंध्र व डोलाइन जब किनारों के धँसने या छत गिरने से आपस में मिल जाते हैं, तो बनने वाली लंबी खाई
लेपीज़समांतर संधियों पर असमान घोल-क्रिया से बनी अनियमित सतह, तीखी नोक, नाली व कटक से भरी; लेपीज़ के विस्तृत क्षेत्र चिकने होकर चूना-पत्थर के चबूतरे बन जाते हैं
गुफाएँ व सुरंगेंचट्टान की परतों के बीच से चूना-पत्थर घुलने पर बनी लंबी, संकरी-से-चौड़ी दरारें; दोनों छोर पर खुली गुफा को सुरंग कहते हैं

सामान्यतः धरातलीय जल घोलरंध्रों व विलयन रंध्रों से गुजरकर अंतर्भौम नदी के रूप में बहता है और कुछ
दूरी के बाद किसी कंदरा से भूमिगत नदी के रूप में फिर निकल आता है। इसीलिए चूना-पत्थर प्रदेशों में धरातलीय
प्रवाह की अपेक्षा भौम जल प्रवाह अधिक होता है।

क्या आप जानते हैं?

घोलरंध्र कभी-कभी मिट्टी की पतली परत से ढके होते हैं और छिछले तालाब जैसे
दिखते हैं। ऐसे में पैर रखने पर ज़मीन धँस जाती है, ठीक वैसे ही जैसे रेगिस्तान की
रेत में धँस जाते हैं।

3.2 कार्स्ट के निक्षेपित स्थलरूप

पानी में घुला कैल्सियम कार्बोनेट तब फिर से जम जाता है जब पानी वाष्पित हो
जाता है या खुरदरी गुफा-सतह पर बहते हुए अपनी कार्बन डाइऑक्साइड खो देता है, इसी से
चूना-पत्थर की गुफा की जानी-पहचानी बनावट बनती है।

चित्र 4: प्रारेखीय गुफा-काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। स्टैलेक्टाइट छत से हिमस्तंभ की तरह लटकते हैं, आधार पर चौड़े और नीचे के सिरे की ओर पतले। स्टैलेग्माइट किसी स्टैलेक्टाइट के ठीक नीचे, उससे टपकते जल से, फर्श से ऊपर उठता है। दोनों मिल जाएँ तो स्तंभ बनता है।
चित्र 4: प्रारेखीय गुफा-काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। स्टैलेक्टाइट छत से हिमस्तंभ की तरह लटकते हैं, आधार
पर चौड़े और नीचे के सिरे की ओर पतले। स्टैलेग्माइट किसी स्टैलेक्टाइट के ठीक नीचे, उससे टपकते जल से,
फर्श से ऊपर उठता है। दोनों मिल जाएँ तो स्तंभ बनता है।

4हिमनद

हिमनद गुरुत्वाकर्षण से धीरे-धीरे, प्रतिदिन कुछ सेंटीमीटर से कुछ मीटर
तक, खिसकती बर्फ की राशि है, जो या तो धरातल पर चादर की तरह फैलती है
(महाद्वीपीय या पीडमौंट हिमनद) या पर्वतीय घाटी में एक रैखिक धारा की
तरह बहती है (घाटी या पर्वतीय हिमनद)। बर्फ इतनी भारी होती है कि
इसका अपरदन बहुत तेज़ होता है: घाटी के तल व किनारों पर घसीटे गए चट्टान के टुकड़े
भारी घर्षण व उत्खनन करते हैं, जो ऊँचे पर्वतों को भी निचली पहाड़ियों व मैदानों
में बदल सकता है।

परीक्षा संकेत

भारत के अपने हिमनद भी हैं, हिमालय-संबंधी उत्तर में इनका नाम लेना फ़ायदेमंद
है: उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर के हिमालय में कई हिमनद हैं।
गंगोत्री हिमनद के स्नाउट को गोमुख कहते हैं, जो भागीरथी नदी को जल देता
है; अलकापुरी हिमनद अलकनंदा को जल देता है। भागीरथी व अलकनंदा देवप्रयाग
में मिलकर गंगा नदी बनाती हैं।

4.1 हिमनद के अपरदित स्थलरूप

चित्र 5: प्रारेखीय हिमनद स्थलरूप (पैमाने के अनुसार नहीं)। बाएँ: सर्क कई दिशाओं से पर्वत में शीर्ष की ओर कटते हैं; तीन या अधिक सर्क मिलने पर तीखी, खड़े ढाल वाली हॉर्न चोटी बनती है, और सर्कों के बीच के विभाजक पतले होकर दंतुरित कटक (अरेत) बनते हैं; सर्क के तल में टार्न झील हो सकती है। दाएँ: हिमनद घाटी गर्त की भाँति U-आकार की होती है, तल चौड़ा व किनारे तीव्र ढाल वाले; मुख्य घाटी के एक ओर ऊँचाई पर लटकती घाटी खुलती है, जहाँ से प्रायः जलप्रपात गिरता है।
चित्र 5: प्रारेखीय हिमनद स्थलरूप (पैमाने के अनुसार नहीं)। बाएँ: सर्क कई दिशाओं से पर्वत में शीर्ष की ओर
कटते हैं; तीन या अधिक सर्क मिलने पर तीखी, खड़े ढाल वाली हॉर्न चोटी बनती है, और सर्कों के बीच के
विभाजक पतले होकर दंतुरित कटक (अरेत) बनते हैं; सर्क के तल में टार्न झील हो सकती है। दाएँ: हिमनद
घाटी गर्त की भाँति U-आकार की होती है, तल चौड़ा व किनारे तीव्र ढाल वाले; मुख्य घाटी के एक ओर ऊँचाई पर
लटकती घाटी खुलती है, जहाँ से प्रायः जलप्रपात गिरता है।
याद रखेंपरिभाषा 6

सर्क हिमानी घाटी के सिरे पर जमा बर्फ द्वारा काटा गया एक गहरा, लंबा व
चौड़ा गर्त या बेसिन है, जिसके सिर व किनारों पर खड़ी, अवतल-से-ऊर्ध्वाधर दीवारें
होती हैं। हिमनद पिघल जाने के बाद अक्सर इसमें एक झील बन जाती है, जिसे सर्क
या तार्न झील
कहते हैं।

क्या आप जानते हैं?

आल्प्स की सबसे ऊँची चोटी मैटरहॉर्न और हिमालय की सबसे ऊँची चोटी
माउंट एवरेस्ट, दोनों हॉर्न हैं, जो कई दिशाओं से एक साथ काम कर रहे सर्क
के शीर्षोन्मुख अपरदन से तीखे बने हैं।

हिमानी घाटियाँ (गर्त) U-आकार की होती हैं, जिनका तल चौड़ा और किनारे खड़े व
चिकने होते हैं। समुद्र में डूबे बहुत गहरे हिमानी गर्त, जो बाद में सागर से भर
जाते हैं, ऊँचे अक्षांशों वाले तटों पर फियोर्ड बनाते हैं।

4.2 हिमनद के निक्षेपित स्थलरूप

पिघलती बर्फ से सीधे गिरा असंगठित, हर आकार का मलबा हिमानी गोलाश्म-मृत्तिका
(टिल)
कहलाता है, जो अधिकतर कोणीय-से-अर्ध-कोणीय होता है। इसके विपरीत हिमानी
गलित-जल की धाराओं से छँटा व ढोया गया पदार्थ हिमानी-जलोढ़ निक्षेप कहलाता
है, जो लगभग स्तरित और गोलाकार किनारों वाला होता है।

निक्षेपित स्थलरूप यह क्या है
अंतस्थ हिमोढ़ हिमनद के अंतिम सिरे (टो) पर जमा टिल की लंबी कटक
पार्श्विक हिमोढ़ हिमानी घाटी के किनारों पर बनी कटक; कभी-कभी अंतस्थ हिमोढ़ से जुड़कर घोड़े की नाल जैसी आकृति बनाती है
तलस्थ हिमोढ़ घाटी हिमनद के तेज़ी से पीछे हटने पर छूटी टिल की अनियमित चादर
मध्यस्थ हिमोढ़ घाटी के बीच में, पार्श्विक हिमोढ़ों से घिरी कटक; अक्सर कमज़ोर बनी होती है और तलस्थ हिमोढ़ से अलग पहचानना मुश्किल होता है
एस्कर बर्फ के नीचे बहती धारा से बना, मोटे पदार्थ का घुमावदार कटक
हिमानी धौत मैदान हिमानी पर्वतों के पद पर या हिम-चादर की सीमा से आगे हिमानी-जलोढ़ निक्षेपों के चौड़े, सपाट जलोढ़ पंख, जो मिलकर मैदान बनाते हैं
ड्रमलिन टिल की चिकनी, अंडाकार, कटकनुमा पहाड़ी, लगभग 1 किमी लंबी व 30 मी ऊँची तक; भारी व खड़ा स्टॉस छोर हिमनद की ओर, पतला टेल छोर विपरीत दिशा में, जो हिम-गति की दिशा बताता है
परीक्षा संकेत

“टिल और हिमानी-जलोढ़ निक्षेप में अंतर बताइए” एक सामान्य 30-शब्दीय प्रश्न
है। एक-एक पंक्ति: टिल असंगठित व कोणीय होता है, सीधे बर्फ से गिरता है; हिमानी-
जलोढ़ निक्षेप छँटा, गोलाकार व स्तरित होता है, हिमानी गलित-जल से ढोकर जमाया
जाता है।

5तरंगें और धाराएँ

तटीय प्रक्रियाएँ सबसे गतिशील व विनाशकारी हैं: एक ही जगह एक मौसम में अपरदन और
अगले में निक्षेपण हो सकता है, और एक ही तूफान या सुनामी वर्षों की सामान्य तरंगों
से अधिक नुकसान कर सकती है। समुद्र-तल को स्थिर मानते हुए, तटीय विकास को समझने का
सबसे आसान तरीका दो बिल्कुल भिन्न प्रकार के तटों की तुलना करना है।

उच्च, चट्टानी (निमग्न) तट

  • नदियाँ “डूबी” हुई दिखती हैं; तटरेखा बेहद दंतुरित होती है
  • पुरानी हिमानी घाटियों के सागर से मिलने पर फियोर्ड बनते हैं
  • अपरदन की आकृतियाँ प्रमुख; पहाड़ी ढाल सीधे पानी में गिरते हैं
  • भारत का पश्चिमी तट इसी प्रकार का है: उच्च, चट्टानी, पीछे हटता तट

निम्न, अवसादी (उन्मग्न) तट

  • नदियाँ तटीय मैदान व डेल्टा बनाकर अपनी लंबाई बढ़ाती हैं
  • तटरेखा चिकनी होती है, केवल लैगून व ज्वारीय क्रीक से टूटती है
  • निक्षेपण की आकृतियाँ प्रमुख; दलदल व दलदली भूमि आम है
  • भारत का पूर्वी तट इसी प्रकार का है: निम्न अवसादी तट

5.1 उच्च चट्टानी तटों के अपरदित स्थलरूप

1

भृगु तथा वेदिकाएँ

ऊँचे चट्टानी तटों पर तरंगें अत्यधिक बल से प्रहार करती हैं और पहाड़ी पार्श्व भृगु का आकार ले
लेते हैं। लगभग सभी समुद्री भृगु तीव्र ढाल के होते हैं, कुछ मीटर से 30 मीटर या अधिक ऊँचे। तरंगों के
लगातार प्रहार से भृगु पीछे हटते हैं और सामने तरंग घर्षित चबूतरा बनता है; तरंग की औसत ऊँचाई से
ऊपर मिलने वाले ऐसे चबूतरे तरंग घर्षित वेदिकाएँ कहलाते हैं।

2

समुद्री कंदराएँ

तरंगें और उनके साथ टकराता शैल मलबा भृगु के आधार पर रिक्त स्थान बनाकर उसे गहराई तक खोखला कर देते हैं,
जिससे समुद्री कंदराएँ बनती हैं। कंदराओं की छत गिरने से भृगु स्थल की ओर और पीछे हट जाते हैं।

3

समुद्री स्टैक

भृगु के पीछे हटने से कुछ प्रतिरोधी चट्टानें तट से थोड़ी दूर अलग-थलग छूट जाती हैं; ये समुद्री
स्टैक
कहलाती हैं। ये भी अस्थायी हैं और अंततः तंग तटीय मैदान बन जाता है।

भृगु से गिरा मलबा टूटकर गोल होता है और तट से दूर जमा होता है; समय के साथ तरंग घर्षित वेदिका के सामने
तरंग निर्मित वेदिका बनती है। वेलांचली प्रवाह व तरंगें अपरदित पदार्थ को पुलिन और रोधिकाओं
(तट के समानांतर रेत/शिंगिल की कटकें) के रूप में जमा करती हैं। जल के ऊपर दिखने वाली रोधिका रोध
कहलाती है; खाड़ी के शीर्षस्थल से जुड़ी रोधिका स्पिट है; खाड़ी का मुख बंद होने पर लैगून बनता
है, जो बाद में भरकर तटीय मैदान बन जाता है।

चित्र 6: उच्च चट्टानी तट का प्रारेखीय अनुप्रस्थ काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। तरंगें भृगु के आधार को काटकर समुद्री कंदरा बनाती हैं; पीछे हटता भृगु अपने सामने तरंग घर्षित चबूतरा छोड़ता है जिस पर अलग-थलग समुद्री स्टैक खड़ा रहता है, और अपरदित पदार्थ तट से दूर तरंग निर्मित वेदिका बनाता है।
चित्र 6: उच्च चट्टानी तट का प्रारेखीय अनुप्रस्थ काट (पैमाने के अनुसार नहीं)। तरंगें भृगु के आधार को काटकर
समुद्री कंदरा बनाती हैं; पीछे हटता भृगु अपने सामने तरंग घर्षित चबूतरा छोड़ता है जिस पर अलग-थलग समुद्री
स्टैक खड़ा रहता है, और अपरदित पदार्थ तट से दूर तरंग निर्मित वेदिका बनाता है।

5.2 निम्न अवसादी तटों के निक्षेपित स्थलरूप

1

पुलिन (बीच) व बालू-टिब्बे

पुलिन रेत के अस्थायी जमाव हैं; जिनमें छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर हों उन्हें
शिंगल पुलिन कहते हैं। पुलिन के ठीक पीछे पवन रेत उठाकर बालू-टिब्बे
के रूप में जमा करती है, जो अक्सर तटरेखा के समांतर लंबी कटकों में बनते हैं।

2

रोधिका, बैरियर व स्पिट

अपतटीय रोधिका तट के लगभग समांतर, डूबी हुई रेत या शिंगल की कटक है।
अधिक रेत जमने पर उभरकर यह बैरियर बार बन जाती है। किसी अंतरीप से जुड़ी
बैरियर बार को स्पिट कहते हैं।

3

लैगून

जब बैरियर बार व स्पिट किसी खाड़ी के मुहाने को घेरकर बंद कर देती हैं, तो
भीतर बचा जलाशय लैगून कहलाता है। भूमि से आने वाला तलछट धीरे-धीरे
लैगून को भरकर तटीय मैदान में बदल देता है।

क्या आप जानते हैं?

तूफान या सुनामी से तट की पहली रक्षा-पंक्ति अपतटीय रोधिकाएँ होती हैं, जो
तरंग की अधिकांश शक्ति सोख लेती हैं। इसके बाद बैरियर, पुलिन, बालू-टिब्बे व
मैंग्रोव (जहाँ हों) बाकी शक्ति सोखते हैं। इनमें से किसी को नुकसान पहुँचाना
अगली बड़ी लहर के सामने तट व वहाँ रहने वाले लोगों को अधिक असुरक्षित बना देता
है।

6पवन

गर्म मरुस्थलों को आकार देने वाले दो प्रमुख कारकों में से एक पवन है, और यह
अकेला ज़िम्मेदार नहीं: मरुस्थलों में वर्षा कम-कम ही होती है, पर जब होती है तो
मूसलाधार होती है, इसीलिए बरसाती जल की चादर-बाढ़ भी बहुत सारा अपक्षयित पदार्थ
हटाती है। पवन तीन तरीकों से काम करती है: अपवाहन (धूल व महीन कणों को
उठाकर हटाना), अपघर्षण (रेत के कणों का चट्टान की सतह को घिसना जैसे-जैसे वे
बहते हैं), और आघात (उड़ते हुए कण की सीधी टक्कर की शक्ति)।

6.1 मरुस्थलों के अपरदित स्थलरूप

याद रखेंपरिभाषा 7

पेडीमेंट पर्वत के पद पर स्थित हल्की ढाल वाला चट्टानी तल है, जिस पर
मलबे की पतली परत हो सकती है या नहीं, और जो पार्श्विक धारा-अपरदन व चादर-बाढ़ के
मिले-जुले असर से बनता है। पेडीमेंट के समांतर ढाल-पश्चगमन (बैकवास्टिंग) से पीछे
बढ़ने पर पर्वत धीरे-धीरे घिसकर निम्न, समतल पदस्थली (पेडीप्लेन) में बदल
जाता है, और पीछे पुराने पर्वत का बचा-खुचा टीला इंसेलबर्ग कहलाता है।

स्थलरूप यह कैसे बनता है
प्लाया मरुस्थली बेसिन के केंद्र में उथली, अस्थायी झील, जहाँ आसपास की पहाड़ियों का अपवाह इकट्ठा होता है; सूखने पर अक्सर समृद्ध नमक-निक्षेप छोड़ जाती है
क्षारीय क्षेत्र (कल्लर भूमि) बार-बार सूखने से नमक से ढका प्लाया मैदान
वात-गर्त पवन द्वारा लगातार अपक्षयित मलबा या ढीली मिट्टी उड़ाने से बना उथला गर्त
मरुस्थली गुफाएँ पवन-अपघर्षण से “ब्लो-आउट” गड्ढे लगातार गहरे व चौड़े होकर गुफा जितने बड़े हो जाते हैं
छत्रक, टेबल तथा पीठिका शैल पवन-अपवाहन व अपघर्षण से असमान रूप से घिसे चट्टान-अवशेष, जिनकी संकरी डंडी पर चौड़ी टोपी बच जाती है

6.2 पवन के निक्षेपित स्थलरूप: बालू-टिब्बे

पवन एक अच्छा छँटाई करने वाला कारक है: जैसे-जैसे यह मंद पड़ती है, कण आकार के
अनुसार जमने लगते हैं। कोई अवरोध व स्थिर रेत-आपूर्ति मिलने पर कई अलग-अलग
टिब्बे-आकृतियाँ बन सकती हैं।

चित्र 7: ऊपर से देखे गए पाँच प्रकार के बालू-टिब्बे (प्रारेखीय, पैमाने के अनुसार नहीं), पवन बाएँ से दाएँ। बरखान: नव चंद्राकार, भुजाएँ पवन की दिशा में। परवलयिक: उलटा बरखान, भुजाएँ पवन के विपरीत। सीफ: बरखान जैसा पर केवल एक भुजा। अनुदैर्ध्य: पवन के समानांतर लंबी, कम ऊँची कटकें। अनुप्रस्थ: पवन की दिशा के समकोण पर।
चित्र 7: ऊपर से देखे गए पाँच प्रकार के बालू-टिब्बे (प्रारेखीय, पैमाने के अनुसार नहीं), पवन बाएँ से दाएँ।
बरखान: नव चंद्राकार, भुजाएँ पवन की दिशा में। परवलयिक: उलटा बरखान, भुजाएँ पवन के विपरीत। सीफ: बरखान जैसा
पर केवल एक भुजा। अनुदैर्ध्य: पवन के समानांतर लंबी, कम ऊँची कटकें। अनुप्रस्थ: पवन की दिशा के समकोण पर।
टिब्बा किन दशाओं में बनता है
बरखान हिंदी संस्करण केवल आकृति बताता है (भुजाएँ पवनों की दिशा में); अंग्रेज़ी संस्करण के अनुसार पवन की दिशा स्थायी व मध्यम हो और धरातल लगभग समान हो
परवलयिक रेतीले धरातल पर आंशिक रूप से वनस्पति हो
सीफ पवनों की दिशा में बदलाव; इसकी अकेली भुजा ऊँची व बहुत लंबी हो सकती है
अनुदैर्ध्य रेत की आपूर्ति कम और पवनों की दिशा स्थायी; अत्यधिक लंबी व कम ऊँची कटकें
अनुप्रस्थ पवनों की दिशा निश्चित हो और रेत का स्रोत पवनों की दिशा के समकोण पर हो; अधिक लंबे व कम ऊँचे

जब रेत की आपूर्ति अधिक हो तो नियमित बालू-टिब्बे प्रायः एक-दूसरे में विलीन होकर अपनी विशेष आकृति खो
देते हैं। मरुस्थलों के अधिकतर टिब्बे खिसकते रहते हैं; कुछ, विशेषकर मानव बस्तियों के निकट, स्थिर हो जाते हैं।

आम गलती

परवलयिक टिब्बे को बरखान जैसा मत समझिए। पाठ इसे “उलटा बरखान” कहता है: इसकी
भुजाएँ पवन की ओर (विपरीत दिशा में) मुड़ी होती हैं, बरखान की पवन-अनुगामी
भुजाओं के ठीक उलट, और यह वहाँ बनता है जहाँ रेतीली सतह आंशिक रूप से वनस्पति से
ढकी हो।

परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं भू-आकृति व भूदृश्य की परिभाषा दे सकता हूँ, और बिना देखे नदी
    घाटी की तरुणावस्था-प्रौढ़ावस्था-वृद्धावस्था समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं गॉर्ज व कैनियन में अंतर बता सकता हूँ?
  • क्या मैं प्रवाहित जल, भूमिगत जल, हिमनद, तट व पवन के अपरदित व निक्षेपित
    स्थलरूप एक-एक करके गिना सकता हूँ?
  • क्या मैं बता सकता हूँ कि विसर्प भू-आकृति क्यों नहीं है, पर गोखुर झील
    क्यों है?
  • क्या मैं सभी पाँच प्रकार के बालू-टिब्बों के नाम व विशेषताएँ बता सकता हूँ?
सभी परिभाषाएँ एक साथ
भू-आकृतिपृथ्वी के धरातल का छोटा-मध्यम भाग, अपनी आकृति, आकार व पदार्थ के साथ
भूदृश्यकई संबंधित भू-आकृतियों से मिलकर बना विस्तृत भाग
पेनीप्लेनप्रवाहित जल के लगातार अपरदन से बना लगभग समतल मैदान, मोनाडनॉक सहित
विसर्पनदी के मार्ग का फंदेनुमा मोड़; स्वयं भू-आकृति नहीं, केवल चैनल प्रतिरूप
कार्स्ट स्थलाकृतिचूना-पत्थर/डोलोमाइट पर भूमिगत जल के घोल व निक्षेपण से बने स्थलरूप, बाल्कन के कार्स्ट प्रदेश के नाम पर
सर्कहिमानी घाटी के सिरे पर बर्फ से कटा खड़ी दीवारों वाला गहरा गर्त, प्रायः तार्न झील सहित
पेडीमेंट / पदस्थली / इंसेलबर्गपर्वत-पद का चट्टानी ढाल; मरुस्थली पर्वत घिसने पर बचा निम्न मैदान; उस पर खड़ा बचा-खुचा अवशेष
त्वरित पुनरावृत्ति: परीक्षा से पहली रात यह पढ़ें
  • भू-आकृति = धरातल का छोटा-मध्यम भाग; भूदृश्य = कई भू-आकृतियाँ मिलकर;
    विकास = वे अवस्थाएँ जिनसे भू-आकृति गुजरती है, जीवन की तरुणावस्था-प्रौढ़ावस्था-
    वृद्धावस्था जैसी
  • प्रवाहित जल: तरुणावस्था (V-घाटी, बाढ़-मैदान नहीं) → प्रौढ़ावस्था (गहरी
    V, बढ़ता बाढ़-मैदान) → वृद्धावस्था (विस्तृत बाढ़-मैदान, मुक्त विसर्प, गोखुर
    झीलें); गॉर्ज (खड़ी, समान चौड़ाई) बनाम कैनियन (सीढ़ीनुमा, ऊपर चौड़ी); जलोढ़
    पंख व डेल्टा भार गिरने से बनते हैं; विसर्प भू-आकृति नहीं, चैनल प्रतिरूप है
  • भूमिगत जल चूना-पत्थर को कार्स्ट स्थलाकृति में बदलता है: घोलरंध्र, डोलाइन,
    युवाला, लेपीज़, गुफाएँ व सुरंगें (अपरदित); स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट व
    स्तंभ (निक्षेपित)
  • हिमनद सर्क, हॉर्न, अरेत, हिमानी गर्त व फियोर्ड तराशते हैं; टिल को अंतस्थ,
    पार्श्विक, तलस्थ व मध्यस्थ हिमोढ़, साथ ही एस्कर, हिमानी धौत मैदान व ड्रमलिन
    के रूप में जमा करते हैं
  • उच्च चट्टानी तट (भारत का पश्चिम) अपरदित हैं: भृगु, तरंग-घर्षित वेदिका,
    समुद्री कंदराएँ, समुद्री स्टैक। निम्न अवसादी तट (भारत का पूर्व) निक्षेपित हैं:
    पुलिन, बालू-टिब्बे, रोधिका, बैरियर, स्पिट, लैगून
  • मरुस्थलों में पवन (अपवाहन, अपघर्षण, आघात) व कभी-कभार की चादर-बाढ़
    पेडीमेंट, पदस्थली, इंसेलबर्ग, प्लाया व वात-गर्त तराशते हैं, और बरखान,
    परवलयिक, सीफ, अनुदैर्ध्य व अनुप्रस्थ टिब्बे जमा करते हैं
बहुविकल्पीय प्रश्न
  1. 1 अंकस्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?
    (क) तरुणावस्था(ख) प्रथम प्रौढ़ावस्था
    (ग) अंतिम प्रौढ़ावस्था(घ) वृद्धावस्था
  2. 1 अंकएक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल हैं, किस नाम से जानी जाती है?
    (क) U-आकार घाटी(ख) अंधी घाटी
    (ग) गॉर्ज(घ) कैनियन
  3. 1 अंकनिम्न में से किस प्रदेश में रासायनिक अपक्षय प्रक्रिया यांत्रिक अपक्षय प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है?
    (क) आर्द्र प्रदेश(ख) शुष्क प्रदेश
    (ग) चूना-पत्थर प्रदेश(घ) हिमनद प्रदेश
  4. 1 अंकनिम्न में से कौन-सा वक्तव्य “लेपीज़” शब्द को परिभाषित करता है?
    (क) छोटे-मध्यम आकार का उथला गर्त
    (ख) ऐसा स्थलरूप जिसका ऊपरी मुख वृत्ताकार व नीचे कीप-आकार हो
    (ग) धरातल से जल टपकने से बना स्थलरूप
    (घ) तीखे कटक व खाँच वाला अनियमित धरातल
  5. 1 अंकगहरे, लंबे व चौड़े गर्त या बेसिन, जिसके सिर व किनारों पर खड़ी अवतल दीवारें होती हैं, उसे क्या कहते हैं?
    (क) सर्क(ख) घाटी हिमनद
    (ग) पार्श्विक हिमोढ़(घ) एस्कर
  6. 1 अंकभू-आकृति की परिभाषा है:
    (क) कोई भी विशाल पठार या पर्वत तंत्र
    (ख) धरातल का छोटा-मध्यम भाग, अपनी आकृति, आकार व पदार्थ सहित
    (ग) किसी देश की पूरी तटरेखा(घ) किसी नदी का पूरा अपवाह-बेसिन
  7. 1 अंकलंबे समय तक नदी-अपरदन के बाद बचा लगभग समतल धरातल, जिस पर कठोर टीले बिखरे हों, कहलाता है:
    (क) पदस्थली(ख) पेनीप्लेन
    (ग) बाढ़-मैदान(घ) हिमानी धौत मैदान
  8. 1 अंककार्स्ट स्थलाकृति को नाम देने वाला कार्स्ट प्रदेश कहाँ स्थित है?
    (क) आल्प्स, भूमध्य सागर के निकट(ख) बाल्कन, एड्रियाटिक सागर के निकट
    (ग) एंडीज़, प्रशांत महासागर के निकट(घ) रॉकीज़, आर्कटिक महासागर के निकट
  9. 1 अंककिसी अंतरीप से जुड़ी बैरियर बार को कहते हैं:
    (क) लैगून(ख) स्पिट
    (ग) डेल्टा(घ) फियोर्ड
  10. 1 अंकअर्धचंद्राकार बालू-टिब्बा जिसकी भुजाएँ पवन-दिशा में मुड़ी हों, कहलाता है:
    (क) सीफ(ख) परवलयिक टिब्बा
    (ग) बरखान(घ) अनुप्रस्थ टिब्बा
अभिकथन (A): विसर्प को नदी की एक भू-आकृति माना जाता है।
कारण (R): पाठ कहता है कि विसर्प केवल एक चैनल प्रतिरूप है, जो पार्श्विक अपरदन, असंगठित किनारों व कोरिओलिस बल से बनता है, स्वयं भू-आकृति नहीं है।
अभिकथन (A): भारत के पूर्वी तट पर मुख्यतः भृगु व समुद्री स्टैक जैसी अपरदित आकृतियाँ पाई जाती हैं।
कारण (R): भारत का पूर्वी तट एक निम्न अवसादी तट है, जहाँ पुलिन, स्पिट व लैगून जैसी निक्षेपित आकृतियाँ प्रमुख हैं।
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
  1. 3 अंकचट्टानों में अधःकर्तित विसर्प और मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प क्या बताते हैं?
  2. 3 अंकघाटी रंध्र अथवा युवाला का विकास कैसे होता है?
  3. 3 अंकचूनायुक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौम जल प्रवाह अधिक पाया जाता है, क्यों?
  4. 3 अंकहिमनद घाटियों में कई रैखिक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्थिति व नाम बताएँ।
  5. 3 अंकमरुस्थली क्षेत्रों में पवन कैसे अपना कार्य करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरदित स्थलरूपों का निर्माण करता है?
  6. 3 अंकस्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट में अंतर स्पष्ट कीजिए।
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
  1. 5 अंकआर्द्र व शुष्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। विस्तार से वर्णन करें।
  2. 5 अंकचूना चट्टानें आर्द्र व शुष्क जलवायु में भिन्न व्यवहार करती हैं क्यों? चूना प्रदेशों में प्रमुख व मुख्य भू-आकृतिक प्रक्रिया कौन सी है और इसके क्या परिणाम हैं?
  3. 5 अंकहिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों व मैदानों में कैसे परिवर्तित करते हैं, या किस प्रक्रिया से यह कार्य संपन्न होता है, बताएँ।
केस स्टडी
एक नदी मंद ढाल पर एक विस्तृत बाढ़-मैदान से होकर बहती है। वर्षों में इसके फंदे
गहरे व संकरी-गर्दन वाले मोड़ों में बदल जाते हैं। एक बाढ़ के दौरान नदी ऐसे ही एक
मोड़ की संकरी गर्दन को सीधा काट देती है, और पुराना फंदा पीछे छूट जाता है।
  1. 1 अंकनदी के मार्ग के इस फंदेनुमा मोड़ को, कटने से पहले, क्या कहते हैं?
  2. 2 अंकछूटा हुआ फंदा कौन-सी भू-आकृति बनता है, और इसकी घुमावदार आकृति लंबे समय तक क्यों दिखती रहती है?
उत्तर कुंजी
MCQ 1-10(क) (घ) (ग) (घ) (क) (ख) (ख) (ख) (ख) (ग)
अभिकथन-कारण 1(घ): A असत्य है, विसर्प चैनल प्रतिरूप है, भू-आकृति नहीं; R सत्य है
अभिकथन-कारण 2(घ): A असत्य है, भारत के पूर्वी तट पर मुख्यतः निक्षेपित आकृतियाँ हैं; R सत्य है व इसकी व्याख्या करता है
लघु प्रश्न 1जलोढ़ मैदान के विसर्प बताते हैं कि नदी अत्यंत मंद ढाल पर पार्श्व अपरदन कर रही है; कठोर चट्टान के अधःकर्तित (गभीरीभूत) विसर्प बताते हैं कि विसर्प पहले मंद धरातल पर बने और बाद में नदी के निम्न कटाव से चट्टान में गहरे धँस गए
लघु प्रश्न 2पास के घोलरंध्र व डोलाइन किनारों के धँसने या छत गिरने से आपस में जुड़ जाते हैं, जिससे एक लंबी खाई बनती है जिसे घाटी-रंध्र या युवाला कहते हैं
लघु प्रश्न 3चूना-पत्थर आसानी से घुलनशील व अच्छी तरह संधित होता है, इसीलिए सतह का जल जल्दी रिसकर भूमिगत घोल-मार्गों से बहने लगता है, सतह पर बहने के बजाय
लघु प्रश्न 4अंतस्थ, पार्श्विक, तलस्थ व मध्यस्थ हिमोढ़ तथा एस्कर, सभी हिमानी घाटी/गर्त के भीतर या उसके अंत में मिलते हैं
लघु प्रश्न 5पवन अपवाहन, अपघर्षण व आघात से अपरदन करती है; पर यह अकेली नहीं, मरुस्थल की कभी-कभार की मूसलाधार वर्षा से बनी चादर-बाढ़ भी अपरदन व परिवहन करती है
लघु प्रश्न 6स्टैलेक्टाइट गुफा की छत से नीचे की ओर पतला होते हुए लटकता है; स्टैलेग्माइट टपकते पानी से फर्श से ऊपर उठता है; दोनों मिलकर स्तंभ बनाते हैं
केस स्टडी 1विसर्प
केस स्टडी 2गोखुर झील; इसकी घुमावदार आकृति लंबे समय दिखती है क्योंकि यह बस नदी द्वारा छोड़ा गया पुराना, जल से भरा चैनल है, जो समय के साथ धीरे-धीरे ही तलछट से भरता है
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