कक्षा 11 भूगोल अध्याय 3 अपवाह तंत्र के नोट्स हिंदी में

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • अपवाह, अपवाह द्रोणी, जल-संभर और जलग्रहण क्षेत्र को परिभाषित करना, और नदी द्रोणी व जल-संभर में अंतर बताना
  • विवरण से अपवाह प्रतिरूप को पहचानना: वृक्षाकार, अरीय, जालीनुमा या अभिकेंद्री
  • यह समझना कि किताब भारतीय नदियों को हिमालयी और प्रायद्वीपीय अपवाह में क्यों बाँटती है, और हर समूह कैसे बना
  • सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के उद्गम, मार्ग और सहायक नदियों का वर्णन करना
  • सातों प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियों को उनकी मुख्य जानकारी के साथ पहचानना
  • यह चर्चा करना कि भारत में एक साथ बाढ़ और सूखा क्यों आते हैं, और नदी प्रदूषण रोकने के लिए क्या किया जा रहा है
अपवाह द्रोणीजल-संभरजलग्रहण क्षेत्रवृक्षाकारपूर्ववर्ती नदीडेल्टाज्वारनदमुखनमामि गंगे

1 अपवाह की मूल बातें

कंठस्थ करेंपरिभाषा 1

निश्चित वाहिकाओं (चैनलों) के माध्यम से जल के बहाव को अपवाह कहते हैं, और ऐसी वाहिकाओं के जाल को अपवाह तंत्र कहा जाता है। इसका प्रतिरूप भूवैज्ञानिक समयावधि, चट्टानों की प्रकृति एवं संरचना, स्थलाकृति, ढाल, बहते जल की मात्रा और बहाव कितनी बार होता है, इन सब पर निर्भर करता है।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 2

जिस क्षेत्र से एक नदी अपना जल इकट्ठा करती है, उसे उसका जलग्रहण क्षेत्र कहते हैं। नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा मिलकर अपवाहित उसी क्षेत्र को अपवाह द्रोणी कहते हैं: बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी कहा जाता है, जबकि छोटी नदियों और नालों के क्षेत्र को आमतौर पर जल-संभर कहते हैं (यानी द्रोणी एक बड़ा जल-संभर ही है)।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 3

एक अपवाह द्रोणी को दूसरे से अलग करने वाली सीमा-रेखा को जल-विभाजक (जल-संभर) कहते हैं। द्रोणी और जल-संभर एकता के परिचायक हैं: एक भाग में बदलाव पूरे क्षेत्र को प्रभावित करता है, इसीलिए इन्हें सूक्ष्म, मध्यम या बृहत नियोजन इकाइयों के रूप में अच्छा माना जाता है।

1.1 चार अपवाह प्रतिरूप

अपवाह प्रतिरूप
वृक्षाकारपेड़ की शाखाओं जैसा फैलाव, जैसे उत्तरी मैदान की नदियाँ
अरीयनदियाँ किसी पर्वत से सभी दिशाओं में बाहर की ओर बहती हैं, जैसे अमरकंटक श्रेणी की नदियाँ
जालीनुमामुख्य सहायक नदियाँ समांतर बहती हैं और द्वितीयक सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हैं
अभिकेंद्रीनदियाँ सभी दिशाओं से आकर एक झील या गर्त में मिलती हैं
परीक्षा संकेत

“अरीय” और “अभिकेंद्री” एक-दूसरे के विपरीत हैं और यह MCQ में बहुत पूछा जाता है: अरीय नदियाँ किसी केंद्र से बाहर की ओर (तीलियों की तरह) बहती हैं, जबकि अभिकेंद्री नदियाँ किसी एक बिंदु की ओर (फ़नल में पानी जाने की तरह) बहती हैं।

2 भारतीय अपवाह तंत्र का वर्गीकरण

किताब भारतीय नदियों को तीन अलग-अलग आधारों पर बाँटती है। इनमें से केवल तीसरा आधार ही इस अध्याय के आगे के हिस्से में प्रयोग होता है।

2.1 समुद्र में जल विसर्जन के आधार पर

समूह अपवाह क्षेत्र का हिस्सा मुख्य नदियाँ
बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र ≈77% गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा आदि
अरब सागर का अपवाह तंत्र ≈23% सिंधु, नर्मदा, तापी, माही, पेरियार

ये दोनों समूह दिल्ली कटक, अरावली और सह्याद्रि द्वारा अलग किए जाते हैं, जो मिलकर भारत का मुख्य जल-विभाजक बनाते हैं।

2.2 जल-संभर के आकार के आधार पर

श्रेणी जलग्रहण क्षेत्र द्रोणियों की संख्या उदाहरण
वृहत नदी द्रोणी 20,000 वर्ग किमी से अधिक 14 गंगा, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, तापी, नर्मदा, माही, पेन्नार, साबरमती, बराक
मध्यम नदी द्रोणी 2,000-20,000 वर्ग किमी 44 कालिंदी, पेरियार, मेघना
लघु नदी द्रोणी 2,000 वर्ग किमी से कम कई छोटी नदियाँ कम वर्षा वाले क्षेत्रों की नदियाँ

2.3 उद्गम के आधार पर: इस किताब की अपनी योजना

हिमालयी अपवाह

  • पिघलती बर्फ और वर्षा दोनों से पोषित, इसलिए बारहमासी
  • युवा, अभी भी विकसित हो रही घाटियाँ, गहरे महाखड्ड
  • पहाड़ों में अत्यंत टेढ़ा मार्ग, मैदानों में विसर्पण की प्रवृत्ति
  • गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र की द्रोणियाँ

प्रायद्वीपीय अपवाह

  • मुख्यतः वर्षा से पोषित, इसलिए कई अनित्यवाही
  • पुरानी, परिपक्व, चौड़ी और उथली श्रेणीबद्ध घाटियाँ
  • स्थिर मार्ग, विसर्पण नहीं (नर्मदा और तापी को छोड़कर)
  • महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी की द्रोणियाँ
आम ग़लती

यह किताब की अपनी चुनी हुई योजना है, पर किताब खुद मानती है कि यह अपूर्ण है: चंबल, बेतवा और सोन उत्तरी प्रायद्वीप से निकलती हैं फिर भी इसी वर्गीकरण के कारण इन्हें हिमालयी (गंगा) तंत्र में गिना जाता है, जबकि वास्तव में ये असली हिमालयी नदियों से आयु और उत्पत्ति में कहीं पुरानी हैं।

3 हिमालयी अपवाह का विकास

मायोसीन (लगभग 2.4 करोड़ से 50 लाख वर्ष पहले)एक विशाल नदी, शिवालिक या इंडो-ब्रह्म, पूरे हिमालय की लंबाई में असम से पंजाब होते हुए सिंध तक बहती थी और सिंध की खाड़ी में गिरती थी। प्रमाण: शिवालिक श्रेणी की निरंतरता, इसकी झील से बनी उत्पत्ति, और रेत, गाद, चिकनी मिट्टी, गोलाश्म व शिलासमूह जैसे जलोढ़ निक्षेप।
प्लीस्टोसीन उत्थानपोटवार पठार (दिल्ली कटक) के उत्थान ने सिंधु-गंगा जल-विभाजक बनाया, और राजमहल पहाड़ियों व मेघालय पठार के बीच माल्दा गर्त के धँसने से गंगा और ब्रह्मपुत्र का प्रवाह बंगाल की खाड़ी की ओर मुड़ गया।
परिणाम: तीन तंत्रइंडो-ब्रह्म नदी टूटकर तीन तंत्रों में बँट गई: (i) पश्चिम में सिंधु और उसकी पाँच सहायक नदियाँ, (ii) मध्य में गंगा और उसकी हिमालयी सहायक नदियाँ, (iii) पूर्व में असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी हिमालयी सहायक नदियाँ।

4 हिमालयी अपवाह की नदी प्रणालियाँ

4.1 सिंधु प्रणाली

2,880 किमीकुल लंबाई (भारत में 1,114 किमी)
11.65 लाखवर्ग किमी कुल द्रोणी (भारत में 3.21 लाख वर्ग किमी)
4,164 मीटरउद्गम स्थल की ऊँचाई

विश्व की सबसे बड़ी नदी द्रोणियों में से एक। यह तिब्बत के कैलाश पर्वत श्रेणी में बोखर चू (31°15′ उत्तर, 81°40′ पूर्व; हिंदी पाठ्यपुस्तक में यहाँ भूल से 80°40′ छपा है, अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तक 81°40′ देती है) के पास से निकलती है, ऊँचाई 4,164 मीटर, जहाँ इसे सिंगी खंबान (“शेर का मुख”) कहा जाता है। यह उत्तर-पश्चिम दिशा में लद्दाख और ज़ास्कर श्रेणियों के बीच बहती है, गिलगित के पास एक शानदार महाखड्ड बनाती है, चिलास (दरदिस्तान क्षेत्र) के पास पाकिस्तान में प्रवेश करती है, और अंततः कराची के पूर्व में अरब सागर में मिलती है। भारत में यह लद्दाख और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेशों से होकर बहती है।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 4

पूर्ववर्ती नदी वह नदी है जो जिस पर्वत को पार करती है उससे भी पुरानी होती है: पहाड़ के उठने से पहले ही उसका मार्ग तय हो चुका था, और पहाड़ के उठने के साथ-साथ उसने महाखड्ड काटकर अपना वही मार्ग बनाए रखा। सतलुज, सुबनसिरी और कोसी सभी पूर्ववर्ती नदियाँ हैं।

सहायक नदी उद्गम ख़ास बात
झेलम वेरीनाग का सोता, पीर पंजाल की तलहटी, कश्मीर घाटी श्रीनगर और वूलर झील से होकर बहती है; झंग (पाकिस्तान) के पास चेनाब से मिलती है
चेनाब चंद्रा और भागा धाराएँ केलोंग (हिमाचल प्रदेश) के पास तांडी में मिलती हैं सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी; इसे चंद्रभागा भी कहते हैं; पाकिस्तान में प्रवेश से पहले 1,180 किमी बहती है
रावी रोहतांग दर्रे के पश्चिम में, कुल्लू पहाड़ियाँ (हिमाचल प्रदेश) चंबा घाटी से होकर बहती है; सराई सिद्धू के पास चेनाब से मिलती है
व्यास व्यास कुंड, रोहतांग दर्रे के पास (4,000 मीटर) कुल्लू घाटी से होकर बहती है; हरिके में सतलुज से मिलती है
सतलुज राक्षस ताल, मानसरोवर के पास, तिब्बत (4,555 मीटर) तिब्बती नाम लांगचेन खंबाब; पूर्ववर्ती नदी; भाखड़ा नांगल नहर प्रणाली को जल देती है

ये पाँच नदियाँ मिलकर पंचनद (“पाँच नदियाँ”) कहलाती हैं, जो मीथनकोट से थोड़ा ऊपर सिंधु से मिलती हैं। सिंधु की अन्य हिमालयी सहायक नदियाँ हैं: श्योक, गिलगित, ज़ास्कर, हुंज़ा, नुब्रा, शिगर, गास्टिंग और द्रास। काबुल नदी अटक के पास दाहिने किनारे पर मिलती है; ख़ुर्रम, टोची, गोमल, विबोआ और सांगर (सभी सुलेमान श्रेणियों से) आगे दक्षिण में मिलती हैं।

4.2 गंगा प्रणाली

अपनी द्रोणी के आकार और सांस्कृतिक महत्त्व, दोनों दृष्टि से भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी: भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली।

चित्र 1 : गोमुख, उत्तराखंड में गंगोत्री हिमनद का छोर, जहाँ से भागीरथी (गंगा की मुख्य धारा) शुरू होती है। फ़ोटो: Atarax42 / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0
चित्र 1: गोमुख, उत्तराखंड में गंगोत्री हिमनद का छोर, जहाँ से भागीरथी (गंगा की मुख्य धारा) शुरू होती है। फ़ोटो: Atarax42 / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0
जानकारी विवरण
उद्गम गंगोत्री हिमनद, गोमुख (3,900 मीटर) पर, उत्तरकाशी जिला, उत्तराखंड; देवप्रयाग तक इसे भागीरथी कहा जाता है
देवप्रयाग भागीरथी अलकनंदा (बद्रीनाथ के ऊपर सतोपंथ हिमनद से) से मिलती है; यहाँ से इसे गंगा कहा जाता है
अलकनंदा की अपनी सहायक नदियाँ धौली और विष्णु गंगा जोशीमठ (विष्णुप्रयाग) में मिलती हैं; पिंडर कर्णप्रयाग में मिलती है; मंदाकिनी रूद्रप्रयाग में मिलती है
मैदानों में प्रवेश हरिद्वार में
लंबाई / द्रोणी 2,525 किमी; भारत में द्रोणी ≈8.6 लाख वर्ग किमी
राज्यवार लंबाई उत्तराखंड 110 किमी · उत्तर प्रदेश 1,450 किमी · बिहार 445 किमी · पश्चिम बंगाल 520 किमी
मुहाना भागीरथी और पद्मा उपधाराओं में बँटती है; सागर द्वीप के पास बंगाल की खाड़ी में मिलती है
सहायक नदी किनारा ख़ास बात
सोन दायाँ (मुख्य) अमरकंटक पठार से निकलती है; जलप्रपात बनाती है; पटना के पश्चिम में आरा के पास मिलती है
यमुना दायाँ गंगा की सबसे पश्चिमी और सबसे लंबी सहायक नदी; उद्गम यमुनोत्री हिमनद, बंदरपूँछ श्रेणी (6,316 मीटर); प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा से मिलती है
चंबल, सिंध, बेतवा, केन यमुना का दायाँ किनारा सभी प्रायद्वीपीय पठार से निकलती हैं; चंबल महू (मालवा पठार) के पास से निकलती है, गांधीसागर बाँध से गुजरती है, और अपनी बीहड़ों (बैडलैंड स्थलाकृति) के लिए मशहूर है
हिंडन, रिंद, सेंगर, वरुणा यमुना का बायाँ किनारा यमुना की छोटी बायीं सहायक नदियाँ
गंडक बायाँ नेपाल में कालीगंडक और त्रिशूलगंगा से मिलकर बनती है; बिहार के चंपारण में प्रवेश करती है; सोनपुर में गंगा से मिलती है
घाघरा बायाँ मापचाचुंगो हिमनदों से निकलती है; सरदा मैदानों में इससे मिलती है; छपरा में गंगा से मिलती है
कोसी बायाँ पूर्ववर्ती नदी; मुख्य धारा अरुण (तिब्बत में एवरेस्ट के उत्तर में); सोन कोसी और तमुर कोसी मिलकर सप्त कोसी बनाती हैं; अपने भारी गाद भार के कारण बार-बार मार्ग बदलने से “बिहार का शोक” कहलाती है
रामगंगा बायाँ गैरसैंण के पास गढ़वाल पहाड़ियों से निकलने वाली छोटी नदी; कन्नौज के पास गंगा से मिलती है
महानंदा बायाँ (अंतिम) दार्जिलिंग पहाड़ियों से निकलती है; पश्चिम बंगाल में गंगा की अंतिम बायीं सहायक नदी
सरदा (सरयू) घाघरा में मिलती है मिलम हिमनद से निकलती है (वहाँ इसे गौरीगंगा कहते हैं); भारत-नेपाल सीमा पर काली/चौक कहलाती है; घाघरा से मिलती है
दामोदर हुगली में मिलती है छोटानागपुर पठार के पूर्वी छोर पर, भ्रंश घाटी में; हुगली से मिलती है; मुख्य सहायक नदी बराकर; कभी “बंगाल का शोक” कहलाती थी, अब दामोदर घाटी कार्पोरेशन द्वारा नियंत्रित
क्या आप जानते हैं? नमामि गंगे कार्यक्रम

जून 2014 में एक प्रमुख कार्यक्रम के रूप में स्वीकृत, जिसका उद्देश्य प्रदूषण रोकना और गंगा का पुनरुद्धार करना है। इसके मुख्य स्तंभ: सीवरेज ट्रीटमेंट अवसंरचना, नदी-तट विकास, नदी-सतह की सफाई, जैव-विविधता, वनरोपण, जन जागरूकता, औद्योगिक अपशिष्ट निगरानी, और गंगा ग्राम।

4.3 ब्रह्मपुत्र प्रणाली

जानकारी विवरण
उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के पास, कैलाश श्रेणी का चेमायुँगडुंग हिमनद
तिब्बत में दक्षिणी तिब्बत के सूखे, समतल क्षेत्र में लगभग 1,200 किमी पूर्व की ओर बहती है, जहाँ इसे सांग्पो (“शुद्ध करने वाली”) कहा जाता है; रांगो सांग्पो वहाँ इसकी मुख्य दाहिनी सहायक नदी है
महाखड्ड मध्य हिमालय में नामचा बरवा (7,755 मीटर) के पास गहरा महाखड्ड बनाती है; सिशंग (या दिशंग) के रूप में निकलती है
भारत में प्रवेश अरुणाचल प्रदेश में सादिया के पश्चिम में; बायें किनारे पर दिबांग (सिकांग) और लोहित के मिलने के बाद इसे ब्रह्मपुत्र कहा जाता है
असम में 750 किमी; बायाँ किनारा: बूढ़ी दिहिंग, धनसरी (दक्षिण); दायाँ किनारा: सुबनसिरी (पूर्ववर्ती, तिब्बत से), कामेंग, मानस, संकोश
बांग्लादेश में प्रवेश धुबरी के पास; तिस्ता दाहिने किनारे पर मिलती है और इसे जमुना कहा जाने लगता है; बंगाल की खाड़ी में पहुँचने से पहले पद्मा से मिल जाती है
आम ग़लती

ब्रह्मपुत्र बाढ़, चैनल में बदलाव और किनारों के कटाव के लिए मशहूर है, क्योंकि इसकी अधिकतर सहायक नदियाँ बड़ी हैं और भारी वर्षा वाले जलग्रहण क्षेत्र से बहुत सारा गाद लाती हैं। इसे कोसी की “बिहार का शोक” वाली पहचान से मिलाएँ नहीं: कारण (सहायक नदियों का भारी गाद) एक जैसा है, पर दोनों अलग-अलग राज्यों की अलग नदियाँ हैं।

5 प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र

यह हिमालयी अपवाह से पुराना है, जो इसकी चौड़ी, काफ़ी हद तक श्रेणीबद्ध, उथली घाटियों और परिपक्व नदियों से पता चलता है।

5.1 यह कैसे विकसित हुआ: तीन भूवैज्ञानिक घटनाएँ

1

पश्चिमी किनारे का धँसाव

प्रारंभिक टर्शियरी काल में, प्रायद्वीप का पश्चिमी किनारा समुद्र में धँस गया, जिससे मूल जल-विभाजक के दोनों ओर की सममित अपवाह व्यवस्था बिगड़ गई।

2

हिमालय का उत्थान

प्रायद्वीपीय खंड का उत्तरी किनारा धँसा और भ्रंश-दोष (ट्रफ़ फ़ॉल्टिंग) हुआ। नर्मदा और तापी अब इन्हीं भ्रंशों में बहती हैं और अपने ही अवसाद से दरारों को भरती हैं, इसीलिए इनमें जलोढ़ और डेल्टाई निक्षेप की कमी है।

3

उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की हल्की झुकाव

इस झुकाव ने पूरे प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र को बंगाल की खाड़ी की ओर उन्मुख कर दिया।

5.2 सामान्य विशेषताएँ

कंठस्थ करेंपरिभाषा 5

पश्चिमी घाट अधिकतर प्रायद्वीपीय नदियों के लिए मुख्य जल-विभाजक का काम करते हैं: अधिकतर बड़ी नदियाँ पश्चिम से पूर्व बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, जबकि समुद्र की ओर वाले छोटे नाले अरब सागर में गिरते हैं। प्रायद्वीपीय नदियाँ स्थिर मार्ग रखती हैं, विसर्पण नहीं करतीं, और ज़्यादातर अनित्यवाही हैं; भ्रंश घाटियों में बहने वाली नर्मदा और तापी इसके दो अपवाद हैं।

ध्यान दें: चंबल, सिंध, बेतवा, केन और सोन भी उत्तरी प्रायद्वीप से निकलती हैं, पर किताब इन्हें (ऊपर भाग 4.2 में) गंगा प्रणाली में रखती है, नीचे दी गई प्रायद्वीपीय नदी प्रणालियों में नहीं।

5.3 सात प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियाँ

नदी उद्गम लंबाई जलग्रहण क्षेत्र मुहाना / ख़ास बात
महानदी सिहावा, रायपुर जिला, छत्तीसगढ़ 851 किमी 1.42 लाख वर्ग किमी (मध्य प्रदेश+छत्तीसगढ़ 53%, ओडिशा 47%) ओडिशा से होकर बंगाल की खाड़ी में; निचले मार्ग में कुछ नौकायन
गोदावरी नासिक जिला, महाराष्ट्र 1,465 किमी 3.13 लाख वर्ग किमी, सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली “दक्षिण गंगा” कहलाती है; राजामुंदरी के बाद बड़ा डेल्टा बनाती है; पोलावरम के पास भारी बाढ़; सहायक नदियाँ पेनगंगा, इंद्रावती, प्राणहिता, मंजरा
कृष्णा महाबलेश्वर, सह्याद्रि 1,401 किमी महाराष्ट्र 27%, कर्नाटक 44%, आंध्र प्रदेश+तेलंगाना 29% पूर्व की ओर बहने वाली दूसरी सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी; सहायक नदियाँ कोयना, तुंगभद्रा, भीमा
कावेरी ब्रह्मगिरि पहाड़ियाँ (1,341 मीटर), कर्नाटक 800 किमी 81,155 वर्ग किमी (केरल 3%, कर्नाटक 41%, तमिलनाडु 56%) बारहमासी: ऊपरी हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से और निचला हिस्सा उत्तर-पूर्व मानसून से पानी पाता है; सहायक नदियाँ काबीनी, भवानी, अमरावती
नर्मदा अमरकंटक पठार (≈1,057 मीटर) 1,312 किमी 98,796 वर्ग किमी सतपुड़ा (दक्षिण) और विंध्य श्रेणी (उत्तर) के बीच भ्रंश घाटी में; जबलपुर के पास संगमरमर की चट्टानों में धुआँधार जलप्रपात; भरूच के दक्षिण में अरब सागर में 27 किमी लंबे ज्वारनदमुख से मिलती है; सरदार सरोवर परियोजना
तापी मुलताई, बेतूल जिला, मध्य प्रदेश 724 किमी 65,145 वर्ग किमी (महाराष्ट्र 79%, मध्य प्रदेश 15%, गुजरात 6%) दूसरी बड़ी पश्चिम की ओर बहने वाली नदी; नर्मदा की तरह भ्रंश घाटी में बहती है
लूनी पुष्कर के पास गोविंदगढ़ में सरस्वती और साबरमती दो धाराओं के मिलने से बनती है – अरावली के पश्चिम में, राजस्थान की सबसे बड़ी नदी प्रणाली पूरी तरह अल्पकालिक (एफ़ेमरल); कच्छ के रण तक बहती है
चित्र 2 : धुआँधार जलप्रपात, जहाँ नर्मदा जबलपुर के पास संगमरमर की चट्टानों से होकर गिरती है। फ़ोटो: Hariya1234 / Wikimedia Commons / CC BY 3.0
चित्र 2: धुआँधार जलप्रपात, जहाँ नर्मदा जबलपुर के पास संगमरमर की चट्टानों से होकर गिरती है। फ़ोटो: Hariya1234 / Wikimedia Commons / CC BY 3.0
सिंधु (भारत में)1,114 किमी
गंगा2,525 किमी
गोदावरी1,465 किमी
कृष्णा1,401 किमी
नर्मदा1,312 किमी
महानदी851 किमी
कावेरी800 किमी
तापी724 किमी
कंठस्थ करेंपरिभाषा 6

डेल्टा वह पंखे के आकार की स्थलाकृति है जो एक नदी अपने मुहाने पर अवसाद जमाकर और कई उपधाराओं में बँटकर बनाती है; यह वहाँ बनता है जहाँ समुद्र की ज्वारीय क्रिया अवसाद को बहा ले जाने के लिए बहुत कमज़ोर होती है (जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा, गोदावरी डेल्टा)। ज्वारनदमुख नदी का वह फ़नल-आकार का मुहाना है जहाँ मीठा पानी समुद्र के पानी से मिल जाता है; यह वहाँ बनता है जहाँ तेज़ ज्वार अवसाद को जमने ही नहीं देता; नर्मदा और तापी दोनों डेल्टा नहीं बल्कि ज्वारनदमुख से समुद्र में मिलती हैं।

6 भारत के नदी जल का उपयोग और संरक्षण

भारत की नदियाँ हर साल जल की भारी मात्रा ढोती हैं, पर यह समय और स्थान दोनों में बहुत असमान रूप से बँटा है: कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आती है जबकि उसी समय दूसरे क्षेत्र सूखे का सामना करते हैं, क्योंकि बरसात के मौसम का ज़्यादातर पानी बिना जमा हुए सीधे समुद्र में बह जाता है।

6.1 बारहमासी बनाम अनित्यवाही नदियाँ

बारहमासी नदियाँ

  • पूरे साल जल ढोती हैं
  • पिघलती बर्फ और वर्षा दोनों से पोषित
  • सभी हिमालयी नदियाँ, साथ ही कावेरी (दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी दोनों मानसूनों से पोषित, इसलिए पूरे साल कम उतार-चढ़ाव के साथ बहती है)

अनित्यवाही नदियाँ

  • सूखे मौसम में बहुत कम पानी
  • मुख्यतः वर्षा से पोषित
  • कावेरी को छोड़कर अधिकतर प्रायद्वीपीय नदियाँ

6.2 नदी जल के उपयोग में छह समस्याएँ

1

पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता न होना

जहाँ और जब पानी चाहिए, वहाँ पर्याप्त पानी न होना

2

नदी जल प्रदूषण

सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, दाह-संस्कार का कचरा, विसर्जित मूर्तियाँ-फूल, और नहाना-कपड़े धोना, सब नदियों को प्रदूषित करते हैं

3

गाद का भार

कोसी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में भारी मात्रा में अवसाद

4

असमान मौसमी बहाव

अधिकतर बहाव बरसात के मौसम में ही केंद्रित होता है

5

राज्यों के बीच नदी जल विवाद

एक ही द्रोणी साझा करने वाले राज्य पानी के बँटवारे पर असहमत होते हैं

6

संकरी होती वाहिकाएँ

बस्तियों का विस्तार थालवेग (चैनल की सबसे गहरी, सबसे तेज़ धारा वाली रेखा) की ओर बढ़ने से नदी का अपना ही मार्ग संकरा हो जाता है

क्या आप जानते हैं?

किताब स्वयं पाँच वास्तविक अंतर-द्रोणी स्थानांतरण/मोड़ योजनाओं को उदाहरण के रूप में नाम देती है: पेरियार दिक्परिवर्तन (Diversion) योजना, इंदिरा गांधी नहर परियोजना, कुर्नूल-कुडप्पा नहर, व्यास-सतलुज लिंक नहर, और गंगा-कावेरी लिंक नहर।

किताब में नामित सफाई प्रयास

गंगा एक्शन प्लान और दिल्ली में यमुना की सफाई का अभियान, दोनों सीधे नामित किए गए हैं, नमामि गंगे कार्यक्रम (भाग 4.2) के साथ-साथ।

6.3 मानचित्र कार्य (CBSE 2026-27)

बोर्ड अध्याय 3 के ये बिंदु भारत के राजनीतिक रेखा-मानचित्र पर दिखाने और नामांकित करने को कहता है (भारत सरकार का मानचित्र प्रयोग करें)। नदियाँ उद्गम से मुहाने तक रेखा से, नाम रेखा के साथ; झीलें बिंदु या छोटे छायांकित भाग से पहचानी जाती हैं।

बिंदु कहाँ स्थित है क्या दिखाएँ
सिंधु लद्दाख में भारत में प्रवेश, लद्दाख और ज़ास्कर श्रेणियों के बीच उत्तर-पश्चिम की ओर बहकर पाकिस्तान की ओर; अरब सागर लद्दाख में तीर के साथ इसका मार्ग
सतलुज शिपकी ला (हिमाचल प्रदेश) से भारत में, भाखड़ा और रोपड़ होकर पंजाब के मैदान में, सिंधु तंत्र में मिलती है हिमाचल प्रदेश और पंजाब से होकर मार्ग
गंगा गंगोत्री हिमनद (उत्तराखंड), उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल होकर बंगाल की खाड़ी पूरा मार्ग और नाम
यमुना यमुनोत्री हिमनद (उत्तराखंड), प्रयाग (प्रयागराज) में गंगा से मिलती है गंगा तक मार्ग
चंबल मालवा पठार पर महू के पास (मध्य प्रदेश), कोटा (राजस्थान) होकर यमुना से मिलती है यमुना तक मार्ग
दामोदर छोटा नागपुर पठार (झारखंड), भ्रंश घाटी में पूर्व की ओर बहकर हुगली (पश्चिम बंगाल) से मिलती है हुगली तक मार्ग
ब्रह्मपुत्र अरुणाचल प्रदेश में भारत में प्रवेश (दिहांग के रूप में), असम घाटी में पश्चिम की ओर, फिर दक्षिण में बांग्लादेश अरुणाचल प्रदेश और असम से होकर मार्ग
महानदी सिहावा के पास (छत्तीसगढ़), ओडिशा होकर बंगाल की खाड़ी पूरा मार्ग और नाम
गोदावरी नासिक ज़िला (महाराष्ट्र), तेलंगाना और आंध्र प्रदेश होकर बंगाल की खाड़ी पूरा मार्ग और नाम
कृष्णा महाबलेश्वर (महाराष्ट्र), कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश होकर बंगाल की खाड़ी पूरा मार्ग और नाम
कावेरी ब्रह्मगिरि पहाड़ियाँ (कर्नाटक), तमिलनाडु होकर बंगाल की खाड़ी पूरा मार्ग और नाम
नर्मदा अमरकंटक पठार (मध्य प्रदेश), भ्रंश घाटी में पश्चिम की ओर मध्य प्रदेश और गुजरात होकर अरब सागर (खंभात की खाड़ी) पूरा मार्ग और नाम
तापी मुलताई, बेतूल ज़िला (मध्य प्रदेश), महाराष्ट्र और गुजरात होकर पश्चिम में अरब सागर पूरा मार्ग और नाम
लूनी पुष्कर के पास अरावली (राजस्थान), दक्षिण-पश्चिम में बहकर कच्छ के रन तक रन तक मार्ग
वूलर झील जम्मू और कश्मीर, झेलम पर बिंदु या छोटा छायांकित भाग और नाम
सांभर झील राजस्थान, जयपुर के पश्चिम में; खारे पानी की झील बिंदु या छोटा छायांकित भाग और नाम
चिलका झील ओडिशा तट, महानदी डेल्टा के दक्षिण में बिंदु या छोटा छायांकित भाग और नाम
कोलेरू झील आंध्र प्रदेश, गोदावरी और कृष्णा डेल्टा के बीच बिंदु या छोटा छायांकित भाग और नाम
पुलिकट झील आंध्र प्रदेश-तमिलनाडु सीमा पर, चेन्नई के उत्तर में तट पर बिंदु या छोटा छायांकित भाग और नाम
वेंबनाड झील केरल तट (कोच्चि के पास का कयाल) बिंदु या छोटा छायांकित भाग और नाम
पाक जलसंधि तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच दोनों के बीच समुद्र में नाम लिखिए
मन्नार की खाड़ी पाक जलसंधि के दक्षिण में, तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच उस समुद्र में नाम लिखिए
कच्छ का रन उत्तर-पश्चिमी गुजरात का खारा दलदली क्षेत्र, जहाँ लूनी समाप्त होती है क्षेत्र पर नाम लिखिए
कच्छ की खाड़ी काठियावाड़ प्रायद्वीप के उत्तर में अरब सागर की खाड़ी, गुजरात उस खाड़ी में नाम लिखिए
खंभात की खाड़ी काठियावाड़ प्रायद्वीप के दक्षिण-पूर्व में अरब सागर की खाड़ी, जहाँ नर्मदा और तापी समुद्र में गिरती हैं उस खाड़ी में नाम लिखिए
भारत की रूपरेखा पर वूलर, सांभर, चिलका, कोलेरू, पुलिकट और वेंबनाड झीलें, पाक जलसंधि, मन्नार की खाड़ी, कच्छ का रन, कच्छ की खाड़ी और खंभात की खाड़ी
मानचित्र कार्य (CBSE 2026-27): ऊपर की तालिका की छह झीलें, पाक जलसंधि, मन्नार की खाड़ी, कच्छ का रन तथा कच्छ और खंभात की खाड़ियाँ। नदियों का मार्ग तालिका से बनाइए।
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं एक-एक पंक्ति में बता सकता/सकती हूँ कि अपवाह, नदी द्रोणी, जल-संभर और जलग्रहण क्षेत्र का क्या मतलब है?
  • क्या मैं चारों अपवाह प्रतिरूपों के नाम बता सकता/सकती हूँ, हर एक के लिए एक नदी उदाहरण के साथ?
  • क्या मैं तीन चरणों में बता सकता/सकती हूँ कि हिमालयी अपवाह तीन तंत्रों में कैसे बँटा?
  • क्या मैं गोमुख से बंगाल की खाड़ी तक गंगा का मार्ग, हर संगम स्थल का नाम लेते हुए, बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं बिना देखे सातों प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियों के नाम, एक-एक ख़ास बात के साथ, बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं नदी जल उपयोग की छह समस्याओं के नाम और हर तरह के लिए एक समाधान योजना बता सकता/सकती हूँ?
फटाफट रिवीज़न: परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
  • अपवाह तंत्र = वाहिकाओं का जाल; अपवाह द्रोणी/जल-संभर = वह क्षेत्र जो यह अपवाहित करता है; जलग्रहण क्षेत्र = जहाँ से पानी आता है
  • चार प्रतिरूप: वृक्षाकार (पेड़ जैसा), अरीय (पहाड़ से बाहर की ओर), जालीनुमा (समांतर + समकोण), अभिकेंद्री (अंदर की ओर मिलना)
  • हिमालयी अपवाह: युवा, बारहमासी, बर्फ़+वर्षा से पोषित, गहरे महाखड्ड (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र)
  • प्रायद्वीपीय अपवाह: पुरानी, ज़्यादातर अनित्यवाही, स्थिर मार्ग, विसर्पण नहीं (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी; नर्मदा और तापी भ्रंश घाटी वाले अपवाद हैं)
  • इंडो-ब्रह्म नदी (मायोसीन) को प्लीस्टोसीन उत्थान ने पोटवार पठार और माल्दा गर्त के ज़रिए सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र तंत्रों में बाँटा
  • देवप्रयाग में गंगा बनती है (भागीरथी + अलकनंदा) और हरिद्वार में मैदानों में प्रवेश करती है; लंबाई 2,525 किमी
  • ब्रह्मपुत्र तिब्बत में सांग्पो है, भारत में प्रवेश करते ही सिशंग/दिशंग, और बांग्लादेश में जमुना
  • गोदावरी = सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी, “दक्षिण गंगा” कहलाती है; नर्मदा और तापी भ्रंश घाटियों में बहती हैं, इनमें जलोढ़ व डेल्टा निक्षेप की कमी है
  • नदी जल उपयोग की छह समस्याएँ: उपलब्धता, प्रदूषण, गाद, असमान बहाव, अंतर-राज्यीय विवाद, संकरी होती वाहिकाएँ
बहुविकल्पीय प्रश्न (NCERT अभ्यास से)
  1. 1 अंककौन-सी नदी “बंगाल का शोक” के नाम से जानी जाती थी?
    (क) गंडक(ख) कोसी(ग) सोन(घ) दामोदर
  2. 1 अंककिस नदी की द्रोणी भारत में सबसे बड़ी है?
    (क) सिंधु(ख) ब्रह्मपुत्र(ग) गंगा(घ) कृष्णा
  3. 1 अंकइनमें से कौन-सी नदी “पंचनद” में शामिल नहीं है?
    (क) रावी(ख) सिंधु(ग) चेनाब(घ) झेलम
  4. 1 अंककौन-सी नदी भ्रंश घाटी में बहती है?
    (क) सोन(ख) यमुना(ग) नर्मदा(घ) लूनी
  5. 1 अंकअलकनंदा और भागीरथी का संगम स्थल कहाँ है?
    (क) विष्णुप्रयाग(ख) रूद्रप्रयाग(ग) कर्णप्रयाग(घ) देवप्रयाग
अभिकथन (A): नर्मदा और तापी डेल्टा के बजाय ज्वारनदमुख से समुद्र में मिलती हैं।
कारण (R): दोनों नदियाँ भ्रंश-दोषों में बहती हैं और अपने मुहाने तक बहुत कम जलोढ़ व डेल्टाई अवसाद ले जाती हैं।
परीक्षा संकेत

दोनों कथन सही हैं, और R, A की सही व्याख्या करता है: यह जोड़ी नीचे दी गई उत्तर कुंजी में विकल्प (क) है।

लघु व दीर्घ उत्तरीय अभ्यास
  1. 2 अंकनदी द्रोणी और जल-संभर में अंतर बताएँ।
  2. 2 अंकवृक्षाकार और जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप में क्या अंतर है?
  3. 2 अंकअरीय और अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप में क्या अंतर है?
  4. 2 अंकडेल्टा और ज्वारनदमुख में अंतर बताएँ, हर एक का एक नदी उदाहरण देते हुए।
  5. 3 अंकगंगा को भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी क्यों माना जाता है?
  6. 3 अंककोसी को “बिहार का शोक” क्यों कहा जाता है, समझाएँ।
  7. 3 अंकभारत में नदियों को आपस में जोड़ने के सामाजिक-आर्थिक लाभ क्या हैं? (लगभग 30 शब्दों में)
  8. 3 अंकप्रायद्वीपीय नदियों की तीन विशेषताएँ लिखें। (लगभग 30 शब्दों में)
  9. 3 अंकवर्तमान प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र को आकार देने वाली तीन भूवैज्ञानिक घटनाओं के नाम बताएँ।
  10. 3 अंकभारत के नदी जल उपयोग की छह समस्याओं की सूची बनाएँ।
  11. 3 अंकपूर्ववर्ती नदी क्या है? इस अध्याय से दो उदाहरण दें।
  12. 3 अंकनर्मदा और तापी डेल्टा क्यों नहीं बनातीं?
  13. 4 अंकवर्णन करें कि इंडो-ब्रह्म नदी तीन अलग-अलग अपवाह तंत्रों में कैसे बँटी।
  14. 4 अंकब्रह्मपुत्र का मार्ग उसके उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में मिलने तक बताएँ, हर चरण में इसका नाम बताते हुए।
  15. 4 अंकगोमुख से हरिद्वार तक गंगा का मार्ग वर्णित करें।
  16. 4 अंकनमामि गंगे कार्यक्रम क्या है? इसके किन्हीं चार स्तंभों के नाम बताएँ।
  17. 4 अंकअध्याय में बताए गए नदी जल प्रदूषण के किन्हीं चार कारणों की व्याख्या करें।
  18. 6 अंकउत्तर भारतीय (हिमालयी) नदियों की महत्वपूर्ण विशेषताएँ क्या हैं? ये प्रायद्वीपीय नदियों से किस प्रकार भिन्न हैं? (125 शब्दों से अधिक में न दें)
  19. 6 अंकमान लीजिए आप हिमालय की तलहटी के साथ-साथ हरिद्वार से सिलीगुड़ी तक यात्रा कर रहे हैं। इस मार्ग में आने वाली मुख्य नदियों के नाम बताएँ, और इनमें से किसी एक की विशेषताओं का वर्णन करें। (125 शब्दों से अधिक में न दें)
  20. 6 अंकसिंधु नदी प्रणाली का वर्णन करें: इसका उद्गम, भारत में इसका मार्ग, और इसकी पाँच मुख्य पंजाब सहायक नदियाँ।
उत्तर कुंजी
प्र1(घ) दामोदर
प्र2(ग) गंगा
प्र3(ख) सिंधु
प्र4(ग) नर्मदा
प्र5(घ) देवप्रयाग
A&R(क): दोनों कथन सही हैं, और R सही व्याख्या करता है
प्र6भाग 1 देखें: द्रोणी बड़ी नदी का बड़ा जलग्रहण क्षेत्र; जल-संभर छोटी नदी के लिए वही, आकार में कहीं छोटा।
प्र7भाग 1.1 का चित्र देखें: वृक्षाकार = पेड़ जैसा फैलाव; जालीनुमा = समांतर मुख्य + समकोण द्वितीयक नदियाँ।
प्र8भाग 1.1 देखें: अरीय = पहाड़ी से बाहर की ओर (अमरकंटक); अभिकेंद्री = अंदर की ओर एक झील/गर्त में।
प्र9परिभाषा 6 देखें: डेल्टा, कमज़ोर ज्वार, अवसाद जमता है (गंगा); ज्वारनदमुख, तेज़ ज्वार, फ़नल मुहाना (नर्मदा)।
प्र10भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली; बड़ा सांस्कृतिक महत्त्व।
प्र11भाग 4.2 की कोसी पंक्ति देखें: भारी गाद स्वयं अपनी वाहिका अवरूद्ध कर देता है, जिससे बार-बार मार्ग बदलता है।
प्र12अतिरिक्त पानी सूखा-ग्रस्त द्रोणियों तक पहुँचता है; सिंचाई, जलविद्युत, नौवहन और पेयजल आपूर्ति बढ़ती है।
प्र13स्थिर मार्ग, विसर्पण नहीं, ज़्यादातर अनित्यवाही (नर्मदा-तापी को छोड़कर): परिभाषा 5 देखें।
प्र14भाग 5.1 की तीन घटनाएँ: पश्चिमी किनारे का धँसाव, हिमालयी उत्थान से भ्रंश-दोष, उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व झुकाव।
प्र15उपलब्धता, प्रदूषण, गाद, असमान बहाव, अंतर-राज्यीय विवाद, संकरी वाहिकाएँ (भाग 6.2)।
प्र16परिभाषा 4 देखें: पर्वत से भी पुरानी नदी, महाखड्ड काटकर मूल मार्ग बनाए रखती है; उदाहरण सतलुज, सुबनसिरी।
प्र17दोनों भ्रंश घाटी में बहती हैं और अवसाद वहीं जमा देती हैं, इसलिए मुहाने तक बहुत कम पहुँचता (भाग 5.1, घटना 2)।
प्र18भाग 3 की समय-रेखा देखें: इंडो-ब्रह्म को पोटवार पठार व माल्दा गर्त ने तीन तंत्रों में बाँटा।
प्र19भाग 4.3 की तालिका के अनुसार: चेमायुँगडुंग → सांग्पो → सिशंग/दिशंग → ब्रह्मपुत्र → जमुना → पद्मा → बंगाल की खाड़ी।
प्र20भाग 4.2 की गंगा तालिका के अनुसार: गंगोत्री (गोमुख) → भागीरथी → देवप्रयाग (+अलकनंदा) → गंगा → हरिद्वार।
प्र21भाग 4.2 का “क्या आप जानते हैं” बॉक्स देखें, स्वीकृति तिथि और किन्हीं चार स्तंभों के लिए।
प्र22अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, श्मशान का कचरा, त्योहारी विसर्जन, नहाना-धोना (भाग 6.2)।
प्र23भाग 2.3 की तालिका देखें: हिमालयी = युवा, बारहमासी, महाखड्ड, मैदानों में विसर्पण; प्रायद्वीपीय = पुरानी, अनित्यवाही, स्थिर मार्ग।
प्र24उदाहरण: गंगा, रामगंगा, कोसी, महानंदा; कोसी को इसके पूर्ववर्ती उद्गम व बदलते मार्ग के लिए विस्तार से बताएँ (भाग 4.2)।
प्र25भाग 4.1 पूरा देखें: बोखर चू से उद्गम, लद्दाख-बाल्टिस्तान का मार्ग, और मीथनकोट के ऊपर मिलने वाली पाँच पंचनद नदियाँ।
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