भूआकृति विज्ञान
1भारत की भूवैज्ञानिक संरचना
पृथ्वी की उम्र लगभग 460 करोड़ वर्ष है। इतने लंबे समय में इसकी सतह को दो तरह की ताकतों ने लगातार बदला है, पृथ्वी के अंदर से काम करने वाली ताकतें (अंतर्जात बल) और सतह पर बाहर से काम करने वाली ताकतें (बहिर्जात बल)। आप पहले पढ़ चुके हैं कि इंडियन प्लेट कभी भूमध्य रेखा के दक्षिण में थी, फिर ऑस्ट्रेलियन प्लेट से अलग हो गई, और तब से लगातार उत्तर की तरफ खिसक रही है। इसी उत्तर की तरफ खिसकने और अंतर्जात-बहिर्जात बलों के साथ मिलकर काम करने से भारत की आज की भूवैज्ञानिक संरचना बनी है।
अंतर्जात बल
- पृथ्वी के अंदर से काम करते हैं
- प्लेट संचलन, भ्रंश, वलन का कारण बनते हैं
- भू-आकृतियाँ ऊपर उठाते हैं (पर्वत, पठार)
बहिर्जात बल
- पृथ्वी की सतह पर काम करते हैं
- अपक्षय, नदी, हवा, लहरें शामिल हैं
- भू-आकृतियों को घिसते और नीचा करते हैं
भूवैज्ञानिक संरचना और शैल समूह की भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भूवैज्ञानिक खंडों में बाँटा जाता है:
प्रायद्वीपीय खंड
भारत का सबसे पुराना और सबसे कठोर भूखंड, प्राचीन चट्टानों से बना।
हिमालय और अन्य अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ
जवान, कमज़ोर पर्वत, जो अभी भी बन रहे हैं।
सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान
दोनों के बीच नदियों से बनता मैदान, जो अभी भी भर रहा है।
1.1 प्रायद्वीपीय खंड
- इसकी उत्तरी सीमा कच्छ से शुरू होकर अरावली श्रेणी के पश्चिम से दिल्ली तक, फिर यमुना और गंगा के समानांतर राजमहल की पहाड़ियों और गंगा डेल्टा तक जाती है।
- कर्बी एंगलोंग और मेघालय का पठार (पूर्वोत्तर में) और राजस्थान (पश्चिम में) भी इसी खंड के विस्तार हैं। पश्चिम बंगाल में मालदा भ्रंश इसके पूर्वोत्तर हिस्से को छोटा नागपुर पठार से अलग करता है।
- राजस्थान में मरुस्थल और मरुस्थल जैसी स्थलाकृतियाँ इसी पुराने खंड के ऊपर बिछी हैं।
- यह मुख्यतः बहुत पुराने नाइस और ग्रेनाइट से बना है, और कैंब्रियन कल्प से एक कठोर खंड के रूप में खड़ा है, केवल इसका पश्चिमी तट समुद्र में डूबा है और कुछ हिस्से विवर्तनिक क्रिया से बदले हैं।
- इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट का हिस्सा होने के कारण इसमें फिर भी ऊर्ध्वाधर हलचलें और खंड भ्रंश हुए हैं। नर्मदा, तापी और महानदी की रिफ़्ट घाटियाँ और सतपुड़ा ब्लॉक पर्वत इसी के उदाहरण हैं।
- इसमें ज़्यादातर अवशिष्ट पहाड़ियाँ (बहुत लंबे समय में घिसी हुई) हैं, अरावली, नल्लामाला, जावादी, वेलीकोण्डा, पालकोण्डा श्रेणी और महेंद्रगिरी पहाड़ियाँ।
- यहाँ की नदी घाटियाँ उथली हैं और उनकी प्रवणता कम है। पूर्व की तरफ बहने वाली ज़्यादातर नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले डेल्टा बनाती हैं, जैसे महानदी, कृष्णा, कावेरी और गोदावरी।
1.2 हिमालय और अन्य अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ
- कठोर प्रायद्वीपीय खंड के उलट, ये पर्वत भूवैज्ञानिक रूप से जवान, कमज़ोर और लचीले हैं।
- ये अभी भी बहिर्जात और अंतर्जात बलों की अंतर्क्रिया से प्रभावित होते हैं, जिससे लगातार नए भ्रंश, वलन और क्षेप बनते रहते हैं।
- इनकी उत्पत्ति विवर्तनिक है और तेज़ बहाव वाली नदियाँ इन्हें अभी भी काट रही हैं, इसीलिए यहाँ गॉर्ज, ट-आकार घाटियाँ, क्षिप्रिकाएँ और जल-प्रपात जैसी जवान, अभी भी घिस रही भू-आकृतियाँ मिलती हैं।
भू-अभिनति गर्त (Geosyncline) पृथ्वी की परत में बना एक बड़ा, लंबा गड्ढा है, जहाँ लाखों वर्षों में मोटी तलछट जमा होती है और बाद में यह ऊपर उठकर वलित पर्वत बन सकता है।
1.3 सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान
- यह तीसरा खंड सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों का बनाया हुआ मैदान है।
- यह शुरुआत में एक भू-अभिनति गर्त था, जो हिमालय पर्वत निर्माण के तीसरे चरण में, लगभग 6.4 करोड़ वर्ष पहले, अपने सबसे बड़े आकार तक पहुँचा।
- तब से यह हिमालय और प्रायद्वीपीय नदियों के लाए अवसादों से लगातार भरता जा रहा है।
- यहाँ जलोढ़ निक्षेप की औसत गहराई 1,000 से 2,000 मीटर है।
भारत की भूवैज्ञानिक संरचना ही तय करती है कि यहाँ की भू-आकृति, अपवाह और यहाँ तक कि मिट्टी भी कैसी होगी। इसीलिए यह अध्याय पहले संरचना पढ़ता है और फिर भूआकृति विज्ञान, यानी ज़मीन का असली रूप।
2भूआकृति विज्ञान और छह भूआकृतिक खंड
किसी क्षेत्र की भूआकृति उसकी संरचना, उस पर चल रही प्रक्रिया और विकास की अवस्था का नतीजा होती है।
भारत की ज़मीन में बहुत विविधता है। उत्तर में ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति का बड़ा क्षेत्र है, जिसमें पर्वत श्रेणियाँ, ऊँची चोटियाँ, सुंदर घाटियाँ और गहरे महाखड्ड हैं। दक्षिण एक स्थिर पठार है, जिसमें कटे-फटे पठार, घिसी हुई चट्टानें और कगारों की कतारें हैं। इन दोनों के बीच उत्तर भारत का विशाल मैदान है।
इन्हीं बड़े अंतरों के आधार पर भारत को छह भूआकृतिक खंडों में बाँटा जाता है:

3उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला
इस खंड में दो हिस्से हैं, हिमालय और उत्तर-पूर्वी पहाड़ियाँ। हिमालय एक अकेली श्रेणी नहीं है, यह कई समानांतर श्रेणियों से मिलकर बना है।
| हिमालय की श्रेणी | दूसरा नाम | ख़ास बात |
|---|---|---|
| बृहत हिमालय | हिमाद्रि, केंद्रीय अक्षीय श्रेणी | सबसे ऊँची, लगातार चलने वाली श्रेणी, लगभग 2,500 किलोमीटर लंबी (पूर्व-पश्चिम), 160 से 400 किलोमीटर चौड़ी (उत्तर-दक्षिण) |
| पार हिमालय | इसी पट्टी में काराकोरम, ज़ास्कर, लद्दाख श्रेणियाँ आती हैं | बृहत हिमालय के उत्तर में, वर्षा-छाया क्षेत्र में, यहीं भारत का शीत मरुस्थल है |
| मध्य हिमालय | हिमाचल | बृहत हिमालय और शिवालिक के बीच, नीची और ज़्यादा टूटी हुई श्रेणियाँ |
| शिवालिक | बाह्य हिमालय | सबसे नई, सबसे दक्षिणी और सबसे नीची श्रेणी, मैदानों की तरफ |
- हिमालय की लंबाई के साथ दिशा बदलती जाती है, भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व, दार्जिलिंग और सिक्किम क्षेत्र में पूर्व-पश्चिम, अरुणाचल प्रदेश में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पश्चिम, और नागालैंड, मणिपुर तथा मिज़ोरम में उत्तर-दक्षिण दिशा में।
- एक मज़बूत लंबी दीवार की तरह खड़ा हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य और पूर्वी एशिया से अलग करता है। यह सिर्फ़ भौतिक रोधक नहीं, बल्कि जलवायु, अपवाह और सांस्कृतिक विभाजक भी है।
“उत्तर से दक्षिण हिमालय की चार श्रेणियाँ बताइए” जैसा एक अंक का सवाल हर साल आता है। क्रम याद रखें, पार हिमालय, बृहत हिमालय, मध्य हिमालय, शिवालिक (उत्तर से दक्षिण) या अगर सवाल उल्टा पूछे तो इसे उल्टा लिखें।
4उत्तरी भारत का मैदान
- यह मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के लाए जलोढ़ (मिट्टी) से बना है।
- यह पूर्व से पश्चिम लगभग 3,200 किलोमीटर लंबा है और इसकी चौड़ाई 150 से 300 किलोमीटर है। सबसे गहरी जगह जलोढ़ की गहराई 1,000 से 2,000 मीटर तक पहुँचती है।
- हरियाणा और दिल्ली सिंधु और गंगा नदी तंत्रों के बीच जल-विभाजक का काम करते हैं।
- ब्रह्मपुत्र उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती है, फिर बांग्लादेश में घुसने से ठीक पहले धुबरी के पास लगभग 90° मुड़कर दक्षिण की तरफ चली जाती है।
- यहाँ की मिट्टी उपजाऊ जलोढ़ है, इसीलिए यह पट्टी गेहूँ, चावल, गन्ना और जूट उगाती है और बहुत बड़ी आबादी को पालती है।
| पट्टी (उत्तर से दक्षिण) | चौड़ाई | कैसी दिखती है |
|---|---|---|
| भाभर | 8 से 10 किलोमीटर | शिवालिक के गिरिपाद पर संकरी पट्टी, नदियाँ यहाँ कंकड़-पत्थर छोड़ती हैं और अक्सर ज़मीन में समा जाती हैं |
| तराई | 10 से 20 किलोमीटर | भाभर के दक्षिण में, नदियाँ यहाँ बिना पक्की नाली के फिर सतह पर आ जाती हैं, इसीलिए यह दलदली है, यहाँ घना जंगल और तरह-तरह के जीव-जंतु मिलते हैं |
| बांगर | – | तराई के दक्षिण की पुरानी जलोढ़ मिट्टी, जलोढ़ मैदान का ऊँचा, पुराना हिस्सा |
| खादर | – | नई जलोढ़ मिट्टी, नदी के पास बनती है, हर साल बाढ़ से लगभग नई हो जाती है |
- यहाँ नदियाँ अपनी प्रौढ़ावस्था में हैं, इसीलिए बालू-रोधिका, विसर्प, गोखुर झीलें और गुंफित वाहिकाएँ जैसी भू-आकृतियाँ बनी हैं। ब्रह्मपुत्र का मैदान नदीय द्वीपों और बालू-रोधिकाओं के लिए जाना जाता है, और यहाँ समय-समय पर बाढ़ आती रहती है।
- यही विशाल नदियाँ अपने मुहाने पर दुनिया के सबसे बड़े डेल्टाओं में से कुछ बनाती हैं, जिसमें सुंदरवन डेल्टा सबसे मशहूर उदाहरण है। डेल्टा के अलावा यह एक लगभग सपाट मैदान है, जिसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 50 से 150 मीटर है।
“बांगर और खादर में अंतर” लगभग हर साल पूछा जाता है। एक-एक लाइन काफ़ी है, बांगर पुरानी जलोढ़ है और ऊँचाई पर है, खादर नई जलोढ़ है, नदी के पास और नीचे है, और बाढ़ से नई होती रहती है।
5प्रायद्वीपीय पठार
- यह नदी के मैदान से लगभग 150 मीटर की ऊँचाई से उठकर 600 से 900 मीटर तक पहुँचता है, इसका आकार एक टेढ़े-मेढ़े त्रिभुज जैसा है।
- इसकी बाहरी सीमा दिल्ली कटक (उत्तर-पश्चिम में, अरावली का विस्तार) से लेकर राजमहल पहाड़ियों (पूर्व), गिर श्रेणी (पश्चिम) और इलायची पहाड़ियों (दक्षिण) तक जाती है, और उत्तर-पूर्व में शिलांग तथा कर्बी-एंगलोंग पठार तक इसका विस्तार दिखता है।
- यह हज़ारीबाग, पलामू, राँची, मालवा, कोयंबटूर और कर्नाटक पठार जैसे कई सपाट-शीर्ष पठारों से मिलकर बना है।
- यह भारत के सबसे पुराने और सबसे स्थिर भूखंडों में से एक है। इसकी ऊँचाई पश्चिम से पूर्व की तरफ घटती जाती है, जो यहाँ की नदियों के बहाव की दिशा से भी साबित होता है।
- यहाँ टॉर, ब्लॉक पर्वत, रिफ़्ट घाटियाँ, पर्वत स्कंध, नंगी चट्टानें, टेकरीनुमा पहाड़ियाँ और दीवार जैसी क्वार्ट्ज़ाइट भित्तियाँ मिलती हैं, जो पानी जमा करने के लिए प्राकृतिक जगह बनाती हैं। पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी हिस्से में काली मिट्टी सबसे ज़्यादा है।
- यह पठार बार-बार ऊपर उठने और डूबने के दौर से गुज़रा है, साथ में भू-पर्पटी में भ्रंश भी बने हैं, इनमें भीमा भ्रंश याद रखने लायक है क्योंकि यहाँ बार-बार भूकंप आते हैं। उत्तर-पश्चिमी हिस्से में नदी खड्ड और महाखड्डों की जटिल बनावट है, चंबल, भिंड और मोरेना के खड्ड इसके जाने-माने उदाहरण हैं।

ऊँचाई के मुख्य लक्षणों के आधार पर प्रायद्वीपीय पठार को तीन भागों में बाँटा जाता है:
5.1 दक्कन का पठार
- इसकी सीमा पश्चिमी घाट (पश्चिम), पूर्वी घाट (पूर्व) और सतपुड़ा, मैकाल श्रेणी तथा महादेव पहाड़ियों (उत्तर) से बनती है।
- पश्चिमी घाट को अलग-अलग जगह अलग नाम से जाना जाता है, महाराष्ट्र में सह्याद्रि, कर्नाटक और तमिलनाडु में नीलगिरि पहाड़ियाँ, और केरल में अनामलाई तथा इलायची पहाड़ियाँ।
- पश्चिमी घाट पूर्वी घाट से ज़्यादा ऊँचे और लगातार चलने वाले हैं, औसत ऊँचाई लगभग 1,500 मीटर है, जो उत्तर से दक्षिण बढ़ती जाती है। ज़्यादातर प्रायद्वीपीय नदियाँ यहीं से निकलती हैं।
- पूर्वी घाट टूटे-टूटे और नीचे हैं, और महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी जैसी नदियों ने इन्हें ख़ूब काटा है। इनकी श्रेणियों में जावादी पहाड़ियाँ, पालकोण्डा श्रेणी, नल्लामाला पहाड़ियाँ और महेंद्रगिरी पहाड़ियाँ शामिल हैं।
- पूर्वी और पश्चिमी घाट नीलगिरि पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।
अनामलाई पहाड़ियों पर स्थित अनाईमुडी पूरे प्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊँची चोटी है। नीलगिरि पहाड़ियों पर स्थित डोडाबेटा दूसरी सबसे ऊँची चोटी है।
5.2 मध्य उच्च भूभाग
- पश्चिम में इसकी सीमा अरावली श्रेणी बनाती है। सतपुड़ा श्रेणी कगारदार पठारों की एक कतार से बनी है, जिसकी ऊँचाई 600 से 900 मीटर है, और यह दक्कन के पठार की उत्तरी सीमा बनाती है।
- यह अवशिष्ट पर्वतों का एक क्लासिक उदाहरण है, बहुत ज़्यादा घिसा हुआ और टूटी-टूटी श्रेणियों में बँटा हुआ। इसका विस्तार पश्चिम में जैसलमेर तक जाता है, जहाँ यह अनुदैर्ध्य रेत के टीलों और चंद्रमा-आकार के बरखानों से ढका है। यहाँ मिलने वाले संगमरमर, स्लेट और नाइस जैसे कायांतरित चट्टान इसके पुराने भूगर्भीय इतिहास का सबूत हैं।
- इसकी सामान्य ऊँचाई 700 से 1,000 मीटर है, और यह उत्तर तथा उत्तर-पूर्व की तरफ ढलता है। यमुना की ज़्यादातर सहायक नदियाँ विंध्याचल और कैमूर श्रेणियों से निकलती हैं, जबकि अरावली से निकलने वाली बनास चंबल की एकमात्र मुख्य सहायक नदी है।
- इसका पूर्वी विस्तार राजमहल पहाड़ियाँ हैं, जिनके दक्षिण में खनिज संपन्न छोटा नागपुर पठार है।
5.3 उत्तर-पूर्वी पठार
- यह मुख्य प्रायद्वीपीय पठार का ही एक विस्तार है। माना जाता है कि हिमालय बनने के समय इंडियन प्लेट के उत्तर-पूर्व की तरफ खिसकने से राजमहल पहाड़ियों और मेघालय के पठार के बीच एक बड़ा भ्रंश बना, और यह गड्ढा बाद में नदियों के जमा किए जलोढ़ से भर गया।
- आज मेघालय और कर्बी एंगलोंग पठार मुख्य प्रायद्वीपीय खंड से अलग-थलग खड़े हैं। मेघालय का पठार आगे गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों में बँटा है, इनके नाम यहाँ रहने वाली जनजातियों के नाम पर रखे गए हैं। इसका एक और विस्तार असम की कर्बी एंगलोंग पहाड़ियों में मिलता है।
- छोटा नागपुर की तरह यह पठार भी कोयला, लोहा, सिलीमेनाइट, चूना-पत्थर और यूरेनियम से भरपूर है। यहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से सबसे ज़्यादा वर्षा होती है, इसीलिए यह बहुत ज़्यादा घिसा हुआ है, चेरापूंजी में तो नंगी चट्टान की सतह है और वनस्पति लगभग नहीं के बराबर।
6भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीप समूह
6.1 भारतीय मरुस्थल
- यह अरावली पहाड़ियों के उत्तर-पश्चिम में स्थित है, इसे मरुस्थली भी कहते हैं।
- यहाँ ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर अनुदैर्ध्य टीले और बरखान बिखरे हैं, और यहाँ साल में 150 मिलीमीटर से कम वर्षा होती है, इसीलिए यहाँ की जलवायु शुष्क है और वनस्पति बहुत कम है।
- मेसोज़ोइक काल में यह इलाक़ा समुद्र के नीचे था, इसका सबूत आकल में मिला काष्ठ जीवाश्म पार्क (जीवाश्म लगभग 18 करोड़ वर्ष पुराने हैं) और जैसलमेर के पास ब्रह्मसर में मिले समुद्री निक्षेप हैं।
- नीचे की चट्टान भले ही प्रायद्वीपीय पठार का ही विस्तार हो, पर यहाँ की भारी शुष्कता ने अपनी अलग सतह बनाई है, छत्रक चट्टानें, स्थानांतरी टीले और मरुद्यान (ज़्यादातर दक्षिणी हिस्से में)।
- ढाल के हिसाब से इसे दो हिस्सों में बाँटा जाता है, उत्तरी हिस्सा सिंध की तरफ ढलता है और दक्षिणी हिस्सा कच्छ के रन की तरफ।
- यहाँ की ज़्यादातर नदियाँ अल्पकालिक हैं, यानी बस बरसात में ही बहती हैं, दक्षिणी हिस्से में बहने वाली लूनी नदी इसका बड़ा अपवाद है। कम वर्षा और ज़्यादा वाष्पीकरण इसे पानी की कमी वाला क्षेत्र बनाते हैं। कुछ नदियाँ आगे बहकर झील या प्लाया में मिल जाती हैं, यह अंतःस्थलीय अपवाह का उदाहरण है, और इन प्लाया झीलों का खारा पानी नमक बनाने के काम आता है।
बरखान चंद्रमा के आकार का रेतीला टीला है, जो हवा के लगातार एक ही दिशा से चलने से बनता है, इसके सिरे हवा की उलटी दिशा में निकले होते हैं।
प्लाया मरुस्थल की एक छोटी, अस्थायी झील है, जिसमें खारा पानी भरा रहता है, यह तब बनती है जब किसी अंतःस्थलीय नदी को समुद्र तक जाने का कोई रास्ता नहीं मिलता।

6.2 तटीय मैदान
भारत की लंबी तटरेखा को स्थिति और वहाँ की सक्रिय भूआकृतिक प्रक्रियाओं के आधार पर दो हिस्सों में बाँटा जाता है।
पश्चिमी तटीय मैदान
- एक जलमग्न तट, माना जाता है कि पौराणिक नगर द्वारका यहीं समुद्र में डूबा है
- संकरा है, इसीलिए प्राकृतिक पत्तन देता है, कांडला, मजगाँव, जेएलएन पत्तन नावा शेवा, मार्मागाओ, मैंगलोर, कोचीन
- बँटवारा (उत्तर से दक्षिण): कच्छ और काठियावाड़ तट, कोंकण तट, गोवा तट, मालाबार तट
- बीच में संकरा और उत्तर-दक्षिण में चौड़ा है, यहाँ की नदियाँ डेल्टा नहीं बनातीं
- मालाबार तट पर “कयाल” (बैकवाटर) मिलते हैं, मछली पकड़ने, अंतःस्थलीय आवागमन और पर्यटन के लिए
पूर्वी तटीय मैदान
- एक उभरा हुआ तट, इसीलिए पश्चिमी मैदान से चौड़ा है
- महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के अच्छी तरह बने डेल्टा
- उभरे तट होने से यहाँ पत्तन और बंदरगाह कम हैं
- महाद्वीपीय शेल्फ समुद्र में लगभग 500 किलोमीटर तक फैला है
- कयाल जैसी कोई स्थानीय बैकवाटर व्यवस्था यहाँ नहीं है
कयाल केरल के मालाबार तट पर मिलने वाला एक उथला, समुद्र से जुड़ा बैकवाटर है, जो मछली पकड़ने, अंतःस्थलीय नौकायन और पर्यटन के काम आता है। केरल की मशहूर नेहरू ट्रॉफी वल्लमकली नौका दौड़ हर साल पुन्नामदा कयाल में होती है।
महाद्वीपीय शेल्फ किसी भूखंड के चारों तरफ मिलने वाला उथला, धीरे-धीरे ढलता समुद्री तल है, जो आगे जाकर अचानक गहरा हो जाता है।
26 दिसंबर 2004 को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं में से एक, हिंद महासागर की सुनामी की चपेट में आया था। इसने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और पुदुचेरी के तटों को भी बुरी तरह प्रभावित किया।
6.3 द्वीप समूह
भारत के दो बड़े द्वीप समूह हैं, एक बंगाल की खाड़ी में और दूसरा अरब सागर में।
| बंगाल की खाड़ी (अंडमान और निकोबार) | अरब सागर (लक्षद्वीप और मिनिकॉय) | |
|---|---|---|
| संख्या | लगभग 572 द्वीप और द्वीपसमूह | लगभग 36 द्वीप, इनमें से 11 पर आबादी है |
| स्थिति | 6°उत्तर से 14°उत्तर, 92°पूर्व से 94°पूर्व | 8°उत्तर से 12°उत्तर, 71°पूर्व से 74°पूर्व, केरल तट से 220 से 440 किलोमीटर दूर |
| उत्पत्ति | माना जाता है कि समुद्र में डूबे पर्वतों के ऊपरी हिस्से हैं, कुछ छोटे द्वीप ज्वालामुखी मूल के हैं | पूरी तरह प्रवाल निक्षेप से बने |
| आंतरिक बँटवारा | अंडमान (उत्तर) और निकोबार (दक्षिण), बीच में टेन डिग्री चैनल | अमीनी द्वीप (उत्तर) और कैनानोर द्वीप (दक्षिण), बीच में नाइन डिग्री चैनल |
| ख़ास बात | बैरन द्वीप, भारत का एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी | मिनिकॉय, सबसे बड़ा द्वीप, 453 वर्ग किलोमीटर |
| जलवायु | संवहनी वर्षा, भूमध्यरेखीय वनस्पति, प्रवाल निक्षेप और सुंदर समुद्र तट | पूर्वी तरफ कंकड़, शिंगिल, गोलाश्मिका और गोलाश्म वाले तूफ़ानी समुद्र तट |
- अंडमान-निकोबार के दो मुख्य उप-समूह रीची द्वीपसमूह और लबरीन्थ द्वीप हैं।
- ज़रूरी चोटियाँ, सैडल चोटी (उत्तर अंडमान, 738 मीटर), माउंट डियावोलो (मध्य अंडमान, 515 मीटर), माउंट कोयोब (दक्षिण अंडमान, 460 मीटर) और माउंट थुइलर (ग्रेट निकोबार, 642 मीटर)।

संरचना तय करती है कि ज़मीन किस चीज़ से बनी है, भूआकृति विज्ञान तय करता है कि वह ज़मीन आख़िर में कौन सा रूप लेती है, पर्वत, मैदान, पठार, मरुस्थल, तट या द्वीप।
इस अध्याय की सबसे बड़ी बात
- भारत के तीन भूवैज्ञानिक खंड हैं, कठोर प्रायद्वीपीय खंड, जवान हिमालय और अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ, और अभी भी भर रहा सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान।
- भूआकृति विज्ञान बताता है कि संरचना आख़िर में कौन सा रूप लेती है, छह खंड, उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान, द्वीप समूह।
- हिमालय की चार श्रेणियाँ हैं, पार हिमालय, बृहत हिमालय, मध्य हिमालय और शिवालिक, और यह भौतिक, जलवायु, अपवाह तथा सांस्कृतिक विभाजक का काम करता है।
- उत्तरी मैदान भाभर से तराई और फिर बांगर-खादर तक, उत्तर से दक्षिण चलता है, यह भारत की सबसे उपजाऊ, सबसे घनी आबादी वाली पट्टी है।
- प्रायद्वीपीय पठार भारत का सबसे पुराना भूखंड है, इसे दक्कन का पठार, मध्य उच्च भूभाग और उत्तर-पूर्वी पठार में बाँटा जाता है।
- अनाईमुडी (2,695 मीटर) प्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊँची चोटी है, बैरन द्वीप भारत का एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी है।
- पश्चिमी तट जलमग्न और संकरा है, यहाँ डेल्टा नहीं बनते, पूर्वी तट उभरा हुआ, चौड़ा है और यहाँ अच्छे डेल्टा बनते हैं।
- भारत के दो द्वीप समूह हैं, बंगाल की खाड़ी वाला (समुद्र में डूबे पर्वतों के ऊपरी हिस्से, कुछ ज्वालामुखी मूल के) और अरब सागर वाला (पूरी तरह प्रवाल से बना)।
- 1 अंकअंडमान द्वीप को निकोबार द्वीप से कौन सा जल क्षेत्र अलग करता है?
(क) 11° चैनल(ख) 10° चैनल(ग) मन्नार की खाड़ी(घ) अंडमान सागर - 1 अंक‘डोडाबेटा’ चोटी किस पहाड़ी श्रृंखला में स्थित है?
(क) नीलगिरि पहाड़ियाँ(ख) कार्डामम पहाड़ियाँ(ग) अनामलाई पहाड़ियाँ(घ) नल्लामाला पहाड़ियाँ - 1 अंकप्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊँची चोटी कौन सी है?
(क) डोडाबेटा(ख) अनाईमुडी(ग) महेंद्रगिरी(घ) कालसुबाई - 1 अंकभाभर पट्टी किस श्रेणी के गिरिपाद के समानांतर है?
(क) विंध्याचल श्रेणी(ख) अरावली श्रेणी(ग) सतपुड़ा श्रेणी(घ) शिवालिक श्रेणी - 1 अंकमेघालय-कर्बी एंगलोंग पठार को छोटा नागपुर पठार क्षेत्र से कौन सा भ्रंश अलग करता है?
(क) मालदा भ्रंश(ख) भीमा भ्रंश(ग) नर्मदा भ्रंश(घ) सोन भ्रंश - 1 अंकभारत का एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी बैरन द्वीप किस द्वीप समूह में है?
(क) लक्षद्वीप(ख) अंडमान और निकोबार द्वीप समूह(ग) कच्छ की खाड़ी(घ) मन्नार की खाड़ी - 1 अंकउत्तरी भारत का मैदान पूर्व से पश्चिम लगभग कितना लंबा है?
(क) 2,500 किलोमीटर(ख) 1,500 किलोमीटर(ग) 4,000 किलोमीटर(घ) 3,200 किलोमीटर - 1 अंकनिम्नलिखित में से कौन उत्तरी भारत के मैदान की पुरानी जलोढ़ है?
(क) खादर(ख) भाभर(ग) बांगर(घ) तराई
- 1 अंक
अभिकथन (A): प्रायद्वीपीय खंड भारत के सबसे स्थिर भूखंडों में से एक है।
कारण (R): प्रायद्वीपीय खंड कैंब्रियन कल्प से एक कठोर खंड के रूप में खड़ा है, केवल इसका पश्चिमी तट समुद्र में डूबा है और कुछ हिस्से विवर्तनिक क्रिया से बदले हैं। - 1 अंक
अभिकथन (A): भारतीय मरुस्थल में वार्षिक वर्षा बहुत कम, अधिकतर 150 मिलीमीटर से भी कम होती है।
कारण (R): भारतीय मरुस्थल अरावली पहाड़ियों के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। - 1 अंक
अभिकथन (A): अंडमान द्वीप और निकोबार द्वीप को टेन डिग्री चैनल अलग करता है।
कारण (R): अंडमान और निकोबार का पूरा द्वीप समूह केवल ज्वालामुखी क्रिया से बना है। - 1 अंक
अभिकथन (A): पूर्वी तटीय मैदान पर पश्चिमी तटीय मैदान से ज़्यादा प्राकृतिक पत्तन और बंदरगाह हैं।
कारण (R): उभरे हुए तट पर एक चौड़ा, कम गहरा महाद्वीपीय शेल्फ होता है, जिससे गहरे पानी के पत्तन बनाना मुश्किल हो जाता है।
- 1 अंकभूआकृति विज्ञान की परिभाषा दीजिए।
- 1 अंकभारत के तीन भूवैज्ञानिक खंडों के नाम बताइए।
- 1 अंकपूर्वी और पश्चिमी घाट किस पहाड़ी श्रृंखला में आपस में मिलते हैं?
- 1 अंकभारत के एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी और उसके द्वीप समूह का नाम बताइए।
- 1 अंकमरुस्थली क्या है?
- 1 अंकअंडमान द्वीप को निकोबार द्वीप से अलग करने वाले चैनल का नाम बताइए।
- 3 अंकअगर किसी व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो, तो वह कौन-से तटीय मैदान से होकर जाएगा और क्यों?
- 3 अंकभारत में ठंडा मरुस्थल कहाँ स्थित है? इस क्षेत्र की मुख्य श्रेणियों के नाम बताएँ।
- 3 अंकपश्चिमी तटीय मैदान पर डेल्टा क्यों नहीं बनता?
- 3 अंकबांगर और खादर में क्या अंतर है?
- 3 अंकप्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पश्चिमी भाग की कोई चार स्थलाकृतिक विशेषताएँ बताइए।
- 3 अंकमेघालय का पठार बहुत ज़्यादा घिसा हुआ क्यों है?
- 3 अंककयाल क्या है? इसका इस्तेमाल किस काम के लिए होता है, कोई एक बताइए।
- 5 अंकअरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करें।
- 5 अंकउत्तरी भारत के मैदान की नदी घाटी में पाई जाने वाली महत्त्वपूर्ण भू-आकृतियाँ कौन सी हैं?
- 5 अंकयदि आप बद्रीनाथ से सुंदरवन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ चलें, तो रास्ते में कौन-सी मुख्य भू-आकृतियाँ मिलेंगी?
- 5 अंकप्रायद्वीपीय पठार के तीन बड़े भागों का उनकी मुख्य विशेषताओं के साथ वर्णन करें।
- 5 अंकप्रायद्वीपीय खंड को हिमालय से भूवैज्ञानिक रूप से ज़्यादा स्थिर क्यों माना जाता है, समझाइए।
- 5 अंकभारत के पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदानों का वर्णन करते हुए दोनों में अंतर बताइए।
- क्या मैं बिना देखे तीनों भूवैज्ञानिक खंड और छहों भूआकृतिक खंड क्रम से बता सकता हूँ?
- क्या मैं उत्तर से दक्षिण हिमालय की चारों श्रेणियाँ गिना सकता हूँ?
- क्या मैं भाभर, तराई, बांगर और खादर में अंतर समझा सकता हूँ?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि पश्चिमी तट पर डेल्टा क्यों नहीं बनते पर पूर्वी तट पर बनते हैं?
- क्या मैं दोनों द्वीप समूहों की उत्पत्ति, संख्या और स्थिति की तुलना कर सकता हूँ?