Class 11 History Chapter 5 Changing Cultural Traditions Notes in Hindi

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पुनर्जागरणमानवतावादनगर-राज्यमुद्रण-यंत्रपाप-स्वीकारोक्तिप्रोटैस्टेंट सुधारवादकैथलिक चर्च के आंतरिक सुधारसूर्य-केंद्रित सिद्धांतवैज्ञानिक क्रांतियथार्थवाद

1“रेनेसाँ” शब्द, बर्कहार्ट और इतिहास का मानवतावादी दृष्टिकोण

1.1 बढ़ते हुए नगरों वाला यूरोप

चौदहवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक, यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या लगातार बढ़ती रही। इन नगरों में रहने वाले लोग खुद को गाँव के लोगों से ज़्यादा “सभ्य” मानने लगे। एक अलग तरह की नगरीय संस्कृति विकसित हुई, और तीन नगर तो सबसे आगे निकल गए, फ़्लोरेंस, वेनिस और रोम, जो कला और विद्या के केंद्र बन गए। अमीर और अभिजात परिवार कलाकारों-लेखकों को अपने यहाँ काम करने के लिए धन देते थे, यानी वे कलाकारों और लेखकों के आश्रयदाता (patron) थे।

इसी दौर में मुद्रण के आविष्कार से किताबें और चित्र बहुत अधिक लोगों तक पहुँचने लगे, यहाँ तक कि दूर-दराज़ के नगरों-देशों में रहने वाले लोगों तक भी। जैसे-जैसे लोग ज़्यादा पढ़ने लगे, इतिहास की एक समझ भी विकसित हुई: वे अपने “आधुनिक” विश्व की तुलना यूनानियों-रोमनों की “प्राचीन” दुनिया से करने लगे।

याद रखेंपरिभाषा 1

आश्रयदाता (patron) वह धनी या शक्तिशाली व्यक्ति है जो किसी कलाकार, लेखक या विद्वान को आर्थिक और सामाजिक सहयोग देता है, और बदले में उसके काम से जुड़ने की प्रतिष्ठा पाता है। पुनर्जागरण काल के आश्रयदाताओं में पोप, राजकुमार, धनी व्यापारी परिवार और महाजन शामिल थे।

इस दौर में दो और बड़े बदलाव हुए। पहला, धर्म को अब हर व्यक्ति की अपनी पसंद माना जाने लगा, न कि सिर्फ वह जो चर्च बताए। दूसरा, विज्ञान और भूगोल ने मिलकर दो पुरानी मान्यताओं को एक साथ ग़लत साबित कर दिया: वैज्ञानिकों ने सौर-मंडल को समझते हुए चर्च की उस धारणा को गलत सिद्ध किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में स्थिर है, और नए भौगोलिक ज्ञान ने यह धारणा भी उलट दी कि भूमध्यसागर विश्व का केंद्र है।

क्या आप जानते हैं?

इस दौर का इतिहास इतनी बारीकी से इसलिए समझा जा सकता है क्योंकि इससे जुड़ी बहुत सारी सामग्री आज भी बची है: दस्तावेज़, मुद्रित पुस्तकें, चित्र, मूर्तियाँ, भवन और वस्त्र, जो यूरोप और अमरीका के अभिलेखागारों, कला-दीर्घाओं और संग्रहालयों में सावधानी से सुरक्षित रखे गए हैं।

1.2 “रेनेसाँ” शब्द और जैकब बर्कहार्ट

उन्नीसवीं शताब्दी से इतिहासकारों ने इस दौर के सांस्कृतिक बदलावों के लिए “रेनेसाँ” शब्द का प्रयोग शुरू किया, जिसका शाब्दिक अर्थ है “पुनर्जन्म” (हिंदी में इसे पुनर्जागरण भी कहा जाता है)। इस विचार पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देने वाले इतिहासकार थे जैकब बर्कहार्ट (1818-97), स्विट्ज़रलैंड के बासले (Basle; हिंदी पुस्तक में मुद्रण-त्रुटि से ‘ब्रेसले’) विश्वविद्यालय के एक स्विस विद्वान।

याद रखेंपरिभाषा 2

पुनर्जागरण (शाब्दिक अर्थ “पुनर्जन्म”) उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों का दिया हुआ नाम है उन सांस्कृतिक बदलावों के लिए, जो चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक यूरोप में हुए, जब यूनानी-रोमन प्राचीनता के अध्ययन पर टिकी एक नई “मानवतावादी” संस्कृति सबसे पहले इतालवी नगरों में फली-फूली।

बर्कहार्ट जर्मन इतिहासकार लियोपोल्ड वॉन रांके (1795-1886) के विद्यार्थी थे। रांके ने उन्हें सिखाया था कि इतिहासकार का असली काम है सरकारी दस्तावेज़ों और फ़ाइलों के आधार पर राज्यों और राजनीति के बारे में लिखना। बर्कहार्ट इससे सहमत नहीं थे: उनके लिए राजनीति ही इतिहास का सब कुछ नहीं थी, इतिहास संस्कृति से उतना ही जुड़ा था जितना राजनीति से।

1860 में बर्कहार्ट ने एक किताब लिखी, दि सिविलाइज़ेशन ऑफ दि रेनेसाँ इन इटली। इसमें उन्होंने साहित्य, वास्तुकला और चित्रकला के ज़रिए यह बताया कि चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक इतालवी नगरों में एक नई “मानवतावादी” संस्कृति कैसे फली-फूली। यह संस्कृति एक नई मान्यता पर टिकी थी: कि व्यक्ति, एक इंसान के रूप में, अपने बारे में खुद निर्णय ले सकता है और अपनी दक्षता बढ़ा सकता है। ऐसा व्यक्ति “आधुनिक” था, बर्कहार्ट के अनुसार, न कि “मध्यकालीन मानव” जैसा, जिसकी सोच पर चर्च का नियंत्रण था।

1.3 इतिहास का मानवतावादी दृष्टिकोण

मानवतावादी खुद यह मानते थे कि वे सदियों के अंधकार के बाद “सच्ची सभ्यता” को फिर से स्थापित कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना था कि रोमन साम्राज्य के पतन के बाद एक “अंधकार युग” शुरू हुआ था। बाद के विद्वानों ने बिना कोई सवाल उठाए यह मान लिया कि चौदहवीं शताब्दी से यूरोप में एक “नया युग” शुरू हुआ।

याद रखेंपरिभाषा 3

“मध्यकाल” (मध्य युग) जैसी संज्ञाओं का प्रयोग रोम साम्राज्य के पतन के बाद एक हज़ार वर्ष की समयावधि के लिए किया गया। मानवतावादियों का तर्क था कि “मध्ययुग” में चर्च ने लोगों की सोच को इस तरह जकड़ रखा था कि यूनानियों-रोमनों का सारा ज्ञान मिट गया, और उन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू होने वाले काल के लिए “आधुनिक” शब्द का इस्तेमाल किया। “अंधकार युग” पूरे मध्य युग का दूसरा नाम नहीं है: मानवतावादियों और बाद के विद्वानों के कालक्रम में मध्य युग 5-14 शताब्दी है और अंधकार युग केवल उसका आरंभिक हिस्सा, 5-9 शताब्दी।

काल मानवतावादियों और बाद के विद्वानों का दिया नाम
5वीं-14वीं शताब्दी मध्य युग
5वीं-9वीं शताब्दी अंधकार युग
9वीं-11वीं शताब्दी आरंभिक मध्य युग
11वीं-14वीं शताब्दी उत्तर मध्य युग
15वीं शताब्दी से आगे आधुनिक युग
आम ग़लती

यह मत लिखिए कि आज के सभी इतिहासकार “अंधकार युग” को सचमुच अंधकारमय मानते हैं। NCERT साफ़ इसका उल्टा कहती है: नए शोध के साथ, आज के इतिहासकारों ने इस बँटवारे पर सवाल उठाए हैं, और किसी भी काल को सांस्कृतिक रूप से “अंधकारमय” कहने से बचते हैं।

परीक्षा संकेत

“‘पुनर्जागरण’ पर सबसे अधिक बल किस इतिहासकार ने दिया, और बर्कहार्ट का तर्क क्या था?” यह एक बहुत आम 3 अंकों का सवाल है। यह मत लिखिए कि यह शब्द बर्कहार्ट ने गढ़ा: पुस्तक के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने ‘रेनेसाँ’ शब्द का प्रयोग किया, और बर्कहार्ट ने इस पर बहुत अधिक बल दिया। हमेशा बर्कहार्ट का नाम, साल 1860, और किताब का नाम दि सिविलाइज़ेशन ऑफ दि रेनेसाँ इन इटली साथ-साथ लिखें, अलग-अलग नहीं।

2इटली के नगरों का पुनरुत्थान

2.1 रोम के पतन के बाद इटली

पश्चिम रोम साम्राज्य के पतन के बाद, इटली के जो नगर कभी राजनैतिक और सांस्कृतिक केंद्र थे, वे खंडहर बन गए। कोई एक एकीकृत सरकार नहीं थी, और रोम के पोप, जो अपने ही राज्य में सार्वभौम थे, पूरे इटली में एक मज़बूत राजनैतिक शक्ति नहीं थे।

इसी दौरान इटली के इर्द-गिर्द बाकी यूरोप एक नया रूप ले रहा था। पश्चिमी यूरोप सामंती संबंधों से जुड़ रहा था और लातिनी चर्च के नेतृत्व में एकीकृत हो रहा था। पूर्वी यूरोप बाइज़ेंटाइन साम्राज्य के अधीन था। इससे भी आगे पश्चिम में इस्लाम अपनी एक साझी सभ्यता बना रहा था। इटली खुद कमज़ोर और अनेक टुकड़ों में बँटा हुआ था, पर विडंबना यह है कि यही आस-पास के बदलाव इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में मददगार साबित हुए।

चरण 1बाइज़ेंटाइन साम्राज्य और इस्लामी देशों के बीच व्यापार बढ़ता है
↓
चरण 2इसी व्यापार से इटली के तटवर्ती बंदरगाह फिर से जीवंत हो उठते हैं
↓
चरण 3बारहवीं शताब्दी से मंगोल रेशम-मार्ग से चीन के साथ व्यापार शुरू करते हैं, पश्चिमी यूरोप से व्यापार भी बढ़ता है
↓
परिणामइस पूरे व्यापार में इटली के नगरों की केंद्रीय भूमिका बन जाती है

2.2 साम्राज्य नहीं, नगर-राज्य

इटली के नगरों ने अब खुद को किसी शक्तिशाली साम्राज्य का हिस्सा मानना छोड़ दिया। इसके बदले, वे खुद को स्वतंत्र नगर-राज्य मानने लगे।

याद रखेंपरिभाषा 4

नगर-राज्य एक स्वतंत्र, स्वशासित राज्य होता है जिसमें एक नगर और उसके आस-पास की ज़मीन शामिल होती है, न कि यह किसी बड़े राज्य या साम्राज्य का हिस्सा होता है। पुनर्जागरण काल का इटली ऐसे ही अनेक नगर-राज्यों से मिलकर बना था, हर एक की अपनी सरकार थी।

पुस्तक का मानचित्र 1 इटली के राज्य दिखाता है। वह जो दिखाता है, उसे यहाँ एक तालिका के रूप में दिया गया है, जो ठीक वही जानकारी देती है जो “इटली की राजनैतिक स्थिति” वाला परीक्षा प्रश्न माँगता है:

नगर / क्षेत्र शासन का तरीका
फ़्लोरेंस गणराज्य
वेनिस गणराज्य; जिनोआ के साथ, दोनों सबसे “जीवंत” नगर माने गए
जिनोआ वेनिस के साथ, दो सबसे जीवंत इतालवी नगरों में से एक
रोम पोप द्वारा शासित, जो अपने राज्य में सार्वभौम थे
बाकी इतालवी नगर “दरबारी-नगर”, राजकुमारों द्वारा शासित

वेनिस और जिनोआ (Genoa; हिंदी पुस्तक में यह नाम मुद्रण-त्रुटि से ‘जिनेवा’ छपा है) बाकी यूरोप से एक अहम बात में अलग थे: यहाँ धर्माधिकारी राजनैतिक रूप से हावी नहीं थे, और न ही यहाँ शक्तिशाली सामंत थे। इसके बदले, धनी व्यापारी और महाजन शहर के शासन में सक्रिय भाग लेते थे। इससे नागरिकता की भावना जड़ पकड़ने लगी: यहाँ तक कि जब किसी नगर पर कुछ समय के लिए सैनिक तानाशाहों का शासन रहा, तब भी वहाँ के लोगों का नागरिक होने का गर्व कम नहीं हुआ।

मूल स्रोत: नगर-राज्य

कार्डिनल गेसपारो कोन्तारिनी (1483-1542) ने अपनी किताब दि कॉमनवेल्थ एण्ड गवर्नमेंट ऑफ वेनिस (1534) में वेनिस की लोकतांत्रिक सरकार का वर्णन किया: नगर का सारा अधिकार एक परिषद के हाथों में था, जिसमें 25 वर्ष की उम्र पार कर चुके शहर के सभी “संभ्रांत” पुरुष शामिल हो सकते थे। उन्होंने बताया कि आम जनता को इस परिषद से बाहर इसलिए रखा गया क्योंकि आम लोगों के शासन वाले नगरों में “बहुत उपद्रव और जन-आंदोलन” होते हैं। कुछ वेनिसवासी इस बात से असहमत थे और चाहते थे कि शासन योग्यता और धन के आधार पर हो, पर वेनिस के “बुद्धिमान और समझदार पूर्वजों” ने तय किया कि सदस्यता कुलीनता के आधार पर हो, बशर्ते यह मुट्ठी भर सबसे शक्तिशाली लोगों तक सीमित न रहे, ताकि हर कुलीन या “सद्गुणों से सम्मानित” नागरिक इसमें भाग ले सके।

चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी
1300इटली के पादुआ विश्वविद्यालय में मानवतावाद पढ़ाया जाने लगा
1341पेट्रार्क को रोम में “राजकवि” की उपाधि दी गई
1349फ़्लोरेंस में विश्वविद्यालय स्थापित हुआ
1390जेफ्री चॉसर की केन्टरबरी टेल्स प्रकाशित हुई
1436ब्रूनेलेशी ने फ़्लोरेंस के ड्यूमा का डिज़ाइन बनाया
1453ऑटोमन तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया के बाइज़ेंटाइन शासक को हराया
1454गुटेनबर्ग ने विभाज्य टाइप से बाइबल छापी
1484पुर्तगाली गणितज्ञों ने सूर्य के अवलोकन से अक्षांश की गणना की
1492कोलंबस अमरीका पहुँचा
1495लियोनार्डो दा विन्ची ने “द लास्ट सपर” चित्रित किया
1512माइकल एन्जिलो ने सिस्टीन चैपल की छत चित्रित की

3विश्वविद्यालय और मानवतावाद

3.1 विधि से प्राचीनता के अध्ययन तक

यूरोप के सबसे पुराने विश्वविद्यालय इतालवी नगरों में ही स्थापित हुए थे। पादुआ और बोलोनिया ग्यारहवीं शताब्दी से ही विधि अध्ययन के केंद्र थे, क्योंकि इन नगरों में व्यापार मुख्य गतिविधि थी, और व्यापार को वकीलों और नोटरी (यानी एक साथ सॉलिसिटर और रिकॉर्ड-रखने वाले) की ज़रूरत थी, जो व्यापारिक समझौतों को लिख और समझा सकें। इनके बिना बड़े पैमाने पर व्यापार करना मुमकिन ही नहीं था।

विधि लोकप्रिय बनी रही, पर उसे पढ़ने के तरीके में बदलाव आया: अब इसे प्राचीन रोमन संस्कृति के नज़रिए से पढ़ा जाने लगा। फ़्रांचेस्को पेट्रार्क (1304-78) इसी बदलाव के प्रतिनिधि थे। पेट्रार्क के लिए प्राचीनता, यानी प्राचीन यूनानी-रोमन दुनिया, एक अलग तरह की सभ्यता थी, और इसे सही मायने में समझने का एकमात्र रास्ता था प्राचीन यूनानी-रोमन लेखकों के अपने ही शब्दों को पढ़ना। इसीलिए उन्होंने प्राचीन लेखकों के गहन, ध्यान से पढ़ने पर ज़ोर दिया, न कि सिर्फ उनके सार पर।

याद रखेंपरिभाषा 5

मानवतावाद उस नई शिक्षा-पद्धति से निकली संस्कृति को दिया गया नाम है, जो उन्नीसवीं सदी के इतिहासकारों ने गढ़ा: यह विश्वास कि सीखने लायक बहुत कुछ ऐसा भी है जो अकेले धार्मिक शिक्षा नहीं दे सकती। पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों तक “मानवतावादी” का मतलब था व्याकरण, अलंकारशास्त्र, काव्य, इतिहास और नैतिक दर्शन पढ़ाने वाला गुरु। लातिनी शब्द ह्यूमेनिटास, जिससे “ह्यूमेनिटिज़” शब्द बना, सदियों पहले रोमन विधिवेत्ता और निबंधकार सिसरो (106-43 ईसा पूर्व), जो जूलियस सीज़र के समकालीन थे, ने संस्कृति के अर्थ में इस्तेमाल किया था। मानवतावादी विषय धर्म से नहीं जुड़े थे, इनमें वाद-विवाद और चर्चा से विकसित होने वाले कौशलों पर ज़ोर था।

मूल स्रोत

फ़्लोरेंस के मानवतावादी जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला (1463-94) ने अपनी किताब ऑन दि डिगनिटी ऑफ मैन (1486) में लिखा कि प्लेटो और अरस्तू के लिए सत्य की खोज में वाद-विवाद से बेहतर कुछ नहीं था, ठीक वैसे ही जैसे व्यायाम से शरीर की ताकत बढ़ती है।

3.2 फ़्लोरेंस केंद्र बनता है

ये नए, “क्रांतिकारी” विचार अनेक विश्वविद्यालयों का ध्यान खींचने लगे, ख़ासकर पेट्रार्क के अपने गृह-नगर फ़्लोरेंस के नए-नए स्थापित विश्वविद्यालय का। तेरहवीं शताब्दी के अंत तक फ़्लोरेंस व्यापार या विद्या के किसी केंद्र के रूप में जाना ही नहीं जाता था। पंद्रहवीं शताब्दी में यह सब नाटकीय ढंग से बदल गया। किसी नगर की पहचान उसकी संपत्ति जितनी ही उसके बड़े नागरिकों से भी बनती है, और फ़्लोरेंस मशहूर हुआ दो लोगों की वजह से: दाँते अलिगहियरी (1265-1321), जो एक सामान्य नागरिक होते हुए भी धार्मिक विषयों पर लिखते थे, और जोटो (1267-1337), एक कलाकार जिन्होंने सजीव चित्र बनाए, बिल्कुल उन कठोर-सपाट आकृतियों से अलग जो पहले के कलाकार बनाते थे।

इसके बाद फ़्लोरेंस इटली का सबसे रोमांचक बौद्धिक नगर और कलात्मक रचनात्मकता का केंद्र बन गया। यहीं से “रेनेसाँ व्यक्ति” शब्द भी आता है, जो अनेक रुचियों और कौशलों वाले व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता है, क्योंकि इस दौर में मशहूर हुए बहुत सारे लोग एक साथ विद्वान, राजनयिक, धर्मशास्त्री और कलाकार थे।

3.3 विज्ञान और दर्शनशास्त्र: अरबों का योगदान

मध्य युग भर में भिक्षु और पादरी यूनानियों-रोमनों की बहुत सारी रचनाओं से परिचित तो थे, पर उन्होंने इस ज्ञान को कभी व्यापक रूप से नहीं फैलाया। चौदहवीं शताब्दी में विद्वानों ने पहली बार प्लेटो और अरस्तू जैसे यूनानी लेखकों की अनूदित रचनाएँ पढ़नी शुरू कीं, और इसके लिए यूरोप अपने विद्वानों का नहीं बल्कि अरब अनुवादकों का ऋणी था, जिन्होंने इन प्राचीन पांडुलिपियों को बड़ी सावधानी से सहेजा और अनुवाद किया। अरबी भाषा में प्लेटो, अफ़लातून और एरिसटोटिल, अरस्तू नाम से जाने जाते थे।

यह लेन-देन दोनों तरफ़ से हुआ: यूनानियों ने भी अरबी और फ़ारसी रचनाओं (प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और रसायनशास्त्र पर) का अनुवाद कर उन्हें आगे बाकी यूरोप तक पहुँचाया। टॉलेमी का ग्रंथ अलमजेस्ट (खगोलशास्त्र पर, 140 ईसवी से पहले यूनानी में लिखा गया, बाद में अरबी में अनुवादित) आज भी अपने नाम में अरबी उपसर्ग “अल” लिए हुए है, यही इस अरबी संबंध का एक छोटा सा सबूत है।

मुस्लिम विद्वान यूरोपीय/लातिनी नाम किसके लिए जाने गए
इब्न-सिना (980-1037) “एविसिना” बुखारा, मध्य एशिया के अरब चिकित्सक-दार्शनिक
अल-राज़ी “रेज़ेस” एक चिकित्सा विश्वकोश के लेखक
इब्न रूश्द (1126-98) “अविरोज़” स्पेन के अरब दार्शनिक; दर्शनशास्त्र और धार्मिक विश्वास के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश की, यही पद्धति बाद में ईसाई विचारकों ने भी अपनाई
क्या आप जानते हैं?

इन तीनों विद्वानों के नाम इतनी अच्छी तरह यूरोपीय रूप में ढल गए कि बाद की पीढ़ियों ने इब्न-सिना, अल-राज़ी और इब्न रूश्द को यूरोपीय ही समझ लिया। साथ ही, इस दौर में विद्यालयों में सिर्फ लड़कों को दाख़िला मिलता था।

मानवतावादी विषय धीरे-धीरे विद्यालयों में भी आने लगे, न सिर्फ इटली में बल्कि पूरे यूरोप में, हालाँकि विश्वविद्यालयों की पाठ्यचर्या पर विधि, चिकित्सा और धर्मशास्त्र का दबदबा बना रहा।

4कलाकार, यथार्थवाद और वास्तुकला

4.1 मानवतावादी विचारों को फैलाने का एक और तरीका: कला

विश्वविद्यालयों की औपचारिक शिक्षा ही एकमात्र रास्ता नहीं था जिससे मानवतावादियों ने उस दौर की सोच को आकार दिया। कला, वास्तुकला और किताबें भी उतनी ही असरदार थीं, और कहीं ज़्यादा लोगों तक पहुँचती थीं।

मूल स्रोत

अल्वर्ट ड्यूरर (1471-1528) ने लिखा कि “कला” प्रकृति में ही छुपी होती है, और जो इसे बाहर निकाल सके, वही इसका मालिक है; किसी कलाकृति का बहुत कुछ रेखागणित से भी दिखाया जा सकता है; और कोई भी काम जितना ज़्यादा जीवन के असली रूप के करीब हो, उतना ही बेहतर दिखता है। उनका 1508 का रेखाचित्र “प्रार्थनारत हस्त” इस दौर की गहरी धार्मिकता के साथ-साथ इंसानी क्षमता में एक नए भरोसे को भी दिखाता है।

कलाकारों ने अतीत की रचनाओं के अध्ययन से प्रेरणा ली। रोमन संस्कृति के भौतिक अवशेष उतने ही उत्साह से खोजे गए जितने प्राचीन ग्रंथ: रोम के पतन के एक हज़ार साल बाद भी, रोम और दूसरे उजड़े हुए नगरों के खंडहरों में कला के टुकड़े मिल रहे थे। “पूर्ण अनुपात” वाली प्राचीन मूर्तियों के प्रति प्रशंसा से इतालवी मूर्तिकार भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाना चाहते थे। 1416 में दोनातल्लो (1386-1466) ने अपनी सजीव मूर्तियों से एक नई शुरुआत की।

चित्र 1 : लियोनार्डो दा विन्ची का माना जाने वाला स्वयं-चित्र (लगभग 1512), जिनकी रुचि वनस्पति विज्ञान और शरीर रचना से लेकर गणित और कला तक फैली थी।
चित्र 1: लियोनार्डो दा विन्ची का माना जाने वाला स्वयं-चित्र (लगभग 1512), जिनकी रुचि वनस्पति विज्ञान और शरीर रचना से लेकर गणित और कला तक फैली थी।
याद रखेंपरिभाषा 6

यथार्थवाद उस नए गुण को दिया गया नाम है जो पुनर्जागरण काल की इतालवी कला में विकसित हुआ, जिसमें शरीर रचना, रेखागणित, भौतिकी और सौंदर्यबोध को मिलाकर लोगों और चीज़ों को यथासंभव असली जैसा दिखाया जाता था। यह शैली उन्नीसवीं शताब्दी तक इस्तेमाल होती रही।

कलाकारों की शरीर-रचना संबंधी सटीकता में वैज्ञानिकों ने सीधी मदद की: मानव हड्डियों की बनावट ठीक से समझने के लिए कलाकार चिकित्सा-विद्यालयों की प्रयोगशालाओं तक जाते थे। पादुआ विश्वविद्यालय के बेल्जियन चिकित्सा-प्राध्यापक आन्ड्रीयस वेसेलियस (1514-64) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मानव शरीर की चीर-फाड़ किया, यहीं से आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान की शुरुआत मानी जाती है।

परीक्षा संकेत

लियोनार्डो दा विन्ची पर छोटे प्रश्न बहुत आते हैं। उनके बारे में चार बातें याद रखें: उनकी रुचि वनस्पति विज्ञान, शरीर रचना, गणित और कला तक फैली थी; उन्होंने मोना लीसा और द लास्ट सपर चित्रित किए; उन्होंने उड़ने का सपना देखा और एक उड़न-यंत्र डिज़ाइन किया; और उन्होंने खुद को “प्रयोग का शिष्य” कहकर हस्ताक्षर किए।

चित्रकारों के पास कॉपी करने के लिए कोई पुराना मॉडल नहीं था, इसलिए मूर्तिकारों की ही तरह उन्होंने जितना हो सके उतना यथार्थवादी चित्रण किया। रेखागणित के ज्ञान से उन्हें परिदृश्य (perspective) समझने में मदद मिली, और प्रकाश की बदलती गुणवत्ता पर ध्यान देने से उनके चित्रों में त्रिआयामी गुण आया। तेल को माध्यम बनाकर चित्र बनाने से पहले से कहीं ज़्यादा समृद्ध रंग मिलने लगे। कई चित्रों में वस्त्रों के रंग और डिज़ाइन में चीनी और फ़ारसी कला का असर भी दिखता है, जो मंगोलों के ज़रिए इतालवी कलाकारों तक पहुँचा था।

4.2 वास्तुकला: शाही रोम की नकल

रोम खुद पंद्रहवीं शताब्दी में शानदार ढंग से फिर से जीवंत हुआ। 1417 से पोप राजनैतिक रूप से मज़बूत हो गए, क्योंकि 1378 से चले आ रहे दो प्रतिद्वंद्वी पोपों वाला संकट अब खत्म हो चुका था। पोपों ने रोम के अपने इतिहास के अध्ययन को खुलकर बढ़ावा दिया, और पुरातत्वविदों (उस समय पुरातत्व एक बिल्कुल नया कौशल था) ने शहर के खंडहरों की सावधानी से खुदाई की।

याद रखेंपरिभाषा 7

इस खुदाई से एक “नई” वास्तुकला शैली को प्रेरणा मिली, जो असल में शाही रोमन शैली का ही पुनरुत्थान थी, और आज इसे “शास्त्रीय” शैली की वास्तुकला कहा जाता है। पोप, धनी व्यापारी और कुलीन वर्ग, सभी ने इस शास्त्रीय शैली से परिचित वास्तुकारों को काम पर रखा, और कलाकारों-मूर्तिकारों ने इन भवनों को चित्रों, मूर्तियों और नक्काशी से सजाया।

चित्र 2 : रोम के सिस्टीन चैपल की छत, जिसे माइकल एन्जिलो ने चित्रित किया (1508-1512)।
चित्र 2: रोम के सिस्टीन चैपल की छत, जिसे माइकल एन्जिलो ने चित्रित किया (1508-1512)।

कुछ लोग एक साथ चित्रकार, मूर्तिकार और वास्तुकार तीनों में माहिर थे। सबसे बड़ी मिसाल हैं माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती (1475-1564), जिन्हें पोप के लिए चित्रित सिस्टीन चैपल की छत, “दि पाइटा” नाम की मूर्ति, और सेंट पीटर्स चर्च के गुंबद के डिज़ाइन के लिए याद किया जाता है, तीनों ही रोम में। फिलिप्पो ब्रूनेलेशी (1337-1446), जिन्होंने फ़्लोरेंस के भव्य ड्यूमा का डिज़ाइन बनाया, उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक मूर्तिकार के रूप में की थी।

चित्र 3 : फ़्लोरेंस कैथीड्रल का ड्यूमा, जिसका गुंबद फिलिप्पो ब्रूनेलेशी ने डिज़ाइन किया।
चित्र 3: फ़्लोरेंस कैथीड्रल का ड्यूमा, जिसका गुंबद फिलिप्पो ब्रूनेलेशी ने डिज़ाइन किया।
क्या आप जानते हैं?

सोलहवीं शताब्दी की इतालवी वास्तुकला ने शाही रोमन भवनों की कई विशेषताएँ सीधे अपनाईं। इसी दौर का एक और बदलाव: अब कलाकार अपने ही नाम से जाने जाते थे, न कि पहले की तरह किसी समूह या गिल्ड के सदस्य के रूप में।

5प्रथम मुद्रित पुस्तकें

5.1 “सबसे बड़ी क्रांति” मुद्रण क्यों थी

अगर दूसरे देशों के लोगों को इतालवी कलाकारों के चित्र, मूर्तियाँ या भवन देखने होते, तो उन्हें खुद इटली जाना पड़ता था। पर लिखे हुए शब्द के साथ ऐसा नहीं था: इटली में जो कुछ लिखा गया, वह अब दूसरे देशों तक भी पहुँच सकता था, और इसकी वजह थी सोलहवीं शताब्दी की सबसे बड़ी क्रांति, मुद्रण तकनीक में महारत हासिल करना।

इसके लिए यूरोप दूसरे लोगों का ऋणी था: मुद्रण की तकनीक के लिए चीनियों का, और मंगोल शासकों का, क्योंकि यूरोपीय व्यापारी और राजदूत मंगोल दरबारों में जाकर ही इस तकनीक से परिचित हुए थे। ठीक यही बात तीन और महत्वपूर्ण आविष्कारों के साथ भी सच थी, आग्नेयास्त्र, कम्पास और फलक।

चित्र 4 : गुटेनबर्ग को अपने मुद्रण-यंत्र से पहली छपी हुई प्रति जाँचते हुए दिखाती एक बाद की नक्काशी।
चित्र 4: गुटेनबर्ग को अपने मुद्रण-यंत्र से पहली छपी हुई प्रति जाँचते हुए दिखाती एक बाद की नक्काशी।

इससे पहले ग्रंथ केवल गिनी-चुनी हाथ से लिखी प्रतियों में ही मौजूद रहते थे। 1455 में जर्मन शिल्पकार गुटेनबर्ग (1400-1458) की कार्यशाला में बाइबल की 150 प्रतियाँ छापी गईं, यही गुटेनबर्ग थे जिन्होंने पहला मुद्रण-यंत्र बनाया। इससे पहले एक भिक्षु को बाइबल की सिर्फ एक प्रति हाथ से लिखने में उतना ही समय लगता था।

चित्र 5 : गुटेनबर्ग बाइबल की एक बची हुई प्रति का एक पन्ना, यूरोप में विभाज्य टाइप से छपी पहली बड़ी किताब।
चित्र 5: गुटेनबर्ग बाइबल की एक बची हुई प्रति का एक पन्ना, यूरोप में विभाज्य टाइप से छपी पहली बड़ी किताब।
याद रखेंपरिभाषा 8

मुद्रण-यंत्र वह मशीन थी जिसे जर्मनी के जोहानेस गुटेनबर्ग (1400-1458) ने विभाज्य टाइप के साथ बनाया, और जिसकी कार्यशाला में 1455 में बाइबिल की 150 प्रतियाँ छापी गईं। इससे एक जैसे पन्ने तेज़ी से और बड़ी संख्या में छापे जा सकते थे, बिना हर किताब की हर प्रति को हाथ से लिखे।

5.2 किताबें खरीदी जा सकने से क्या बदला

1500 तक इटली में अनेक क्लासिकी ग्रंथ, जो लगभग सभी लातिनी में थे, छप चुके थे। मुद्रित किताबें खरीदी जा सकने लगीं, तो विद्यार्थी अब सिर्फ अपने गुरु के नोट्स पर निर्भर नहीं रहे। विचार, राय और जानकारी अब पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी और व्यापकता से फैलने लगे: एक नई सोच वाली मुद्रित किताब जल्दी ही सैकड़ों पाठकों तक पहुँच सकती थी। लोग अपनी खुद की प्रति खरीद सकते थे, इसीलिए वे अकेले भी पढ़ सकते थे, और इसी से आम लोगों में पढ़ने की आदत विकसित हुई।

परीक्षा संकेत

पंद्रहवीं शताब्दी के अंत से आल्प्स पर्वत के पार मानवतावादी संस्कृति के तेज़ी से फैलने की सबसे बड़ी वजह थी कि मुद्रित किताबें अब चारों ओर उपलब्ध थीं। यही एक बात यह भी बताती है कि मुद्रण से पहले बौद्धिक आंदोलन छोटे-छोटे इलाकों तक ही क्यों सीमित रहते थे, यह जोड़ परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है।

मूल स्रोत

लिओन बतिस्ता अल्बर्टी (1402-72), जिन्होंने कला सिद्धांत और वास्तुकला दोनों पर लिखा, ने “वास्तुकार” की परिभाषा दी: वह व्यक्ति जो भारी सामग्री को जोड़कर-हिलाकर, लोगों के काम आने वाली कोई भी संरचना बड़ी सुंदरता से बना और पूरी कर सके।

6व्यक्ति की नई अवधारणा: धन, शिष्टाचार और स्त्रियाँ

6.1 धन, सुख और मानव प्रकृति

मानवतावादी संस्कृति की एक खास बात थी मानव जीवन पर धर्म की पकड़ का कमज़ोर पड़ना। इतालवी लोग भौतिक धन, सत्ता और वैभव की ओर ज़बरदस्त तरीके से आकर्षित थे, फिर भी यह ज़रूरी नहीं कि वे अधार्मिक हों। वेनिस के मानवतावादी फ्रेन्चेस्को बरबारो (1390-1454) ने तो धन अर्जित करने को पाप नहीं बल्कि एक सद्गुण मानते हुए एक पुस्तिका ही लिख डाली।

लोरेन्ज़ो वल्ला (1406-1457) ने अपनी किताब ऑन प्लेज़र में लिखा कि इतिहास का अध्ययन मनुष्य को पूर्णता की ओर ले जाता है, और उन्होंने सुख के विरुद्ध ईसाई आदेश की आलोचना की। इसी दौर में अच्छे शिष्टाचार पर भी ध्यान बढ़ने लगा, विनम्रता से बोलना कैसा हो, सही ढंग से कपड़े कैसे पहनने चाहिए, और एक “संस्कारी व्यक्ति” में कौन-से गुण होने चाहिए।

मानवतावाद का मतलब यह भी था कि व्यक्ति सिर्फ सत्ता और धन की होड़ में शामिल हुए बिना भी अपना जीवन खुद गढ़ सकता है। यह विचार इस मान्यता से गहरा जुड़ा था कि मानव प्रकृति बहुआयामी है, जो सामंती समाज की उस पुरानी सोच के बिल्कुल उलट थी जिसमें समाज को तीन अलग-अलग “वर्गों” में बाँट दिया गया था।

मूल स्रोत

निकोलो मैकियावेली ने अपनी किताब दि प्रिंस (1513) के पंद्रहवें अध्याय में मनुष्यों, खासकर राजकुमारों, के आपस में विरोधाभासी गुणों की एक लंबी सूची दी, उदार या कंजूस, दयालु या क्रूर, वफ़ादार या बेवफ़ा, विनम्र या घमंडी। मैकियावेली का मानना था कि “सभी मनुष्य बुरे हैं” और अपने बुरे स्वभाव को दिखाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, क्योंकि इंसानी इच्छाएँ कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होतीं; उनके अनुसार हर मानवीय कार्य के पीछे सबसे शक्तिशाली प्रेरणा है, स्वार्थ।

6.2 स्त्रियों की आकांक्षाएँ

व्यक्तित्व और नागरिकता की यह नई सोच, हालाँकि, स्त्रियों को बाहर ही रखती थी। अभिजात परिवारों के पुरुष ही सार्वजनिक जीवन पर हावी थे और परिवार के हर फ़ैसले वे ही लेते थे। बेटों को पारिवारिक व्यवसाय या सार्वजनिक जीवन में उनकी जगह लेने के लिए शिक्षित किया जाता था, जबकि कभी-कभी छोटे बेटों को चर्च में भेज दिया जाता था।

दहेज पारिवारिक व्यवसाय में लगाया जाता था, पर उस व्यवसाय को चलाने में स्त्रियों की कोई राय नहीं होती थी। शादियाँ अक्सर सिर्फ दो परिवारों के बीच व्यावसायिक गठबंधन मज़बूत करने के लिए तय की जाती थीं, और अगर बेटी के लिए पर्याप्त दहेज का इंतज़ाम नहीं हो पाता, तो उसे ईसाई मठ में भेजकर भिक्षुणी का जीवन जीने को कहा जाता था। साफ़ है कि स्त्रियों की सार्वजनिक भूमिका बहुत सीमित थी, और उन्हें बस “घर की रखवाली करने वाली” माना जाता था।

अभिजात परिवारों की स्त्रियाँ

  • अपने ही दहेज से चलने वाले पारिवारिक व्यवसाय में कोई राय नहीं
  • शादियाँ व्यावसायिक गठबंधन के लिए तय होती थीं
  • कम दहेज होने पर ईसाई मठ भेजी जा सकती थीं
  • भूमिका सिर्फ “घर की रखवाली” तक सीमित

व्यापारी परिवारों की स्त्रियाँ

  • पत्नियाँ अक्सर परिवार की दुकान चलाने में सक्रिय मदद करतीं
  • पति के काम के लिए बाहर जाने पर व्यवसाय खुद संभालतीं
  • व्यापारी की जल्दी मृत्यु होने पर विधवा को बड़ी सार्वजनिक भूमिका निभानी पड़ती

कुछ स्त्रियाँ बौद्धिक रूप से बेहद रचनात्मक थीं, और मानवतावादी शिक्षा की अहमियत को गहराई से समझती थीं। वेनिस की कसान्द्रा फेदेले (1465-1558) ने लिखा कि भले ही साहित्य के अध्ययन से स्त्रियों को कोई प्रतिफल या गरिमा न मिले, फिर भी हर स्त्री को इसे अपनाना चाहिए। फेदेले खुद यूनानी और लातिनी भाषा में इतनी दक्ष थीं कि उन्हें पादुआ विश्वविद्यालय में भाषण देने के लिए बुलाया गया। वे उन कुछ वेनिसवासी महिला लेखिकाओं में से थीं जिन्होंने गणराज्य की आलोचना की कि उसने “स्वतंत्रता” की परिभाषा को इतना सीमित बना दिया कि वह सिर्फ पुरुषों की इच्छाओं के अनुकूल हो।

मंटुआ की मार्चिसा ईसाबेला दि इस्ते (1474-1539) एक और उल्लेखनीय स्त्री थीं, जिन्होंने अपने पति की अनुपस्थिति में खुद अपना राज्य चलाया, और मंटुआ का छोटा-सा दरबार अपनी बौद्धिक प्रतिभा के लिए मशहूर हो गया। इन सब उदाहरणों में स्त्रियों के अपने लेखन से यही पता चलता है कि पुरुषों के दबदबे वाली दुनिया में अपनी एक पहचान बनाने के लिए उन्हें आर्थिक शक्ति, संपत्ति और शिक्षा की ज़रूरत थी, यह उनकी अपनी दृढ़ मान्यता थी।

मूल स्रोत

लेखक और राजनयिक बाल्थासार कास्टिल्योनी ने अपनी किताब दि कोर्टियर (1528) में लिखा कि स्त्री को अपने तौर-तरीकों, बर्ताव, बोलचाल और अंदाज़ में किसी भी रूप में पुरुष जैसा नहीं दिखना चाहिए: जहाँ पुरुष में एक मज़बूत, दृढ़ पौरुष होना चाहिए, वहीं स्त्री में हर बात में एक कोमल, नाज़ुक स्त्रीत्व दिखना चाहिए। हालाँकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि मन के अनेक गुण, जैसे अच्छे शिष्टाचार, चतुराई और समझदारी, स्त्री के लिए भी उतने ही ज़रूरी हैं जितने पुरुष के लिए।

परीक्षा संकेत

एक बहुत पूछा जाने वाला तुलनात्मक प्रश्न: “स्त्रियों की आकांक्षाओं को एक स्त्री (फेदेले) और एक पुरुष (कास्टिल्योनी) ने किस तरह अलग-अलग व्यक्त किया?” हमेशा याद रखें कि दोनों ही आख़िरकार स्त्रियों के एक ही वर्ग, यानी अभिजात और शिक्षित स्त्रियों, की बात कर रहे थे, सभी स्त्रियों की नहीं।

7धर्म सुधार आंदोलन: धर्म के भीतर वाद-विवाद

7.1 मानवतावाद उत्तरी यूरोप तक पहुँचता है

व्यापार, यात्रा, सैन्य विजय और कूटनीतिक संपर्कों ने इतालवी नगरों-दरबारों को व्यापक दुनिया से जोड़ दिया। इस नई संस्कृति की शिक्षित और धनी वर्ग द्वारा प्रशंसा और नकल की गई, पर इसके बहुत कम विचार ही आम लोगों तक पहुँच पाए, जो वैसे भी पढ़-लिख नहीं सकते थे।

पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के शुरुआती दौर में उत्तरी यूरोप के विश्वविद्यालयों के विद्वान भी मानवतावादी विचारों की ओर आकर्षित होने लगे। अपने इतालवी साथियों की तरह, वे भी शास्त्रीय यूनानी-रोमन ग्रंथों पर ध्यान देते थे, पर साथ ही ईसाई धर्मग्रंथों पर भी। इटली से एक बड़ा फ़र्क यह था कि यह आंदोलन किसने आगे बढ़ाया: इटली में पेशेवर विद्वानों का इस पर वर्चस्व था, जबकि उत्तरी यूरोप में मानवतावाद ने चर्च के ही अनेक सदस्यों को अपनी ओर खींचा।

इन उत्तरी मानवतावादियों ने ईसाइयों से कहा कि वे धर्म का पालन ठीक वैसे ही करें जैसा उनके अपने प्राचीन ग्रंथों में लिखा है, और बाद में जोड़े गए “अनावश्यक कर्मकांडों” को त्याग दें। यह मनुष्य को एक मुक्त, विवेकपूर्ण कर्ता मानने का एक बिल्कुल नया नज़रिया था, जो इस विश्वास से प्रेरित था कि ईश्वर दूर बैठा है, उसने मनुष्य को बनाया ज़रूर, पर उसे “यहीं और अभी” खुशी खोजते हुए स्वतंत्र जीवन जीने की पूरी आज़ादी भी दे दी।

याद रखेंपरिभाषा 9

पाप-स्वीकारोक्ति (indulgences) कैथलिक पादरियों द्वारा बेचे जाने वाले वे दस्तावेज़ थे जो यह दावा करते थे कि इन्हें ख़रीदने वाले व्यक्ति को उसके किए गए पापों के बोझ से मुक्ति मिल जाएगी। इंग्लैंड के टॉमस मोर (1478-1535) और हॉलैंड के इरेस्मस (1466-1536) जैसे ईसाई मानवतावादियों ने चर्च पर आरोप लगाया कि वह ठीक इसी प्रथा के ज़रिए आम लोगों से धन ठगकर एक लालची संस्था बन गया है।

जब बाइबल छपने लगी और स्थानीय भाषाओं में अनुवाद होने लगे, तो आम ईसाई खुद इसे पढ़ सके, और उन्हें पता चला कि उनका धर्म तो ऐसी प्रथाओं की इजाज़त देता ही नहीं। यूरोप के लगभग हर हिस्से में किसान चर्च द्वारा लगाए गए करों के विरुद्ध विद्रोह करने लगे, वहीं राजा भी राज-काज के मामलों में चर्च की लगातार दखलअंदाज़ी से चिढ़ने लगे।

आम ग़लती

“कॉन्स्टैनटाइन के अनुदान” को अक्सर ग़लत तरीके से लिखा जाता है। यह एक दस्तावेज़ था, जिसे माना जाता था कि प्रथम ईसाई रोमन सम्राट कॉन्स्टैनटाइन ने जारी किया था, और पादरी इसी दस्तावेज़ के आधार पर न्यायिक और वित्तीय शक्तियों का दावा करते थे। मानवतावादी विद्वानों ने साबित कर दिया कि यह दस्तावेज़ जाली था, असली नहीं, और राजाओं को यह जानकर खुशी हुई क्योंकि इससे चर्च का राज-काज में दखल देने का दावा कमज़ोर पड़ गया।

7.2 मार्टिन लूथर और प्रोटैस्टेंट सुधारवाद

चित्र 6 : मार्टिन लूथर, लगभग 1530 में लुकास क्रानाख (वरिष्ठ) की कार्यशाला द्वारा बनाया गया चित्र।
चित्र 6: मार्टिन लूथर, लगभग 1530 में लुकास क्रानाख (वरिष्ठ) की कार्यशाला द्वारा बनाया गया चित्र।

1517 में एक जर्मन युवा भिक्षु मार्टिन लूथर (1483-1546) ने कैथलिक चर्च के विरुद्ध एक अभियान छेड़ दिया। उनका तर्क था कि मनुष्य को ईश्वर से संपर्क साधने के लिए किसी पादरी की ज़रूरत ही नहीं है: ईश्वर में पूर्ण विश्वास ही अकेले किसी व्यक्ति को सही जीवन और स्वर्ग की ओर ले जा सकता है।

याद रखेंपरिभाषा 10

प्रोटैस्टेंट सुधारवाद वह आंदोलन है, जिसे मार्टिन लूथर ने 1517 में शुरू किया, जिसके कारण जर्मनी और स्विटज़रलैंड के चर्चों ने पोप और कैथलिक चर्च से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया, यह तर्क देते हुए कि सिर्फ विश्वास ही, बिना किसी पादरी के बीच में आए, मुक्ति की ओर ले जा सकता है।

स्विटज़रलैंड में लूथर के विचारों को उलरिक ज़्विंगली (1484-1531) ने और आगे फैलाया, और बाद में जौं कैल्विन (1509-64) ने। व्यापारियों के समर्थन से इन सुधारकों को नगरों में कहीं ज़्यादा समर्थन मिला, जबकि ग्रामीण इलाकों में कैथलिक चर्च अपना प्रभाव बनाए रखने में कामयाब रहा।

जर्मनी के कुछ अन्य सुधारक, जैसे एनाबेपटिस्ट सम्प्रदाय के नेता, इससे भी आगे निकल गए, उन्होंने मुक्ति के विचार को हर तरह के सामाजिक शोषण को खत्म करने से जोड़ दिया। उनका तर्क था कि ईश्वर ने सबको बराबर बनाया है, इसलिए किसी को कर देने की ज़रूरत नहीं, और हर किसी को अपना पादरी खुद चुनने का अधिकार है। यह बात सामंतवाद से पीड़ित किसानों को बहुत भाई।

मूल स्रोत

विलियम टिंडेल (1494-1536), एक अंग्रेज़ लूथरवादी, जिन्होंने 1506 में बाइबल का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, ने प्रोटैस्टेंटवाद का समर्थन इस तर्क से किया कि धर्मग्रंथ को मातृभाषा में न देना ही पादरियों का लोगों को अज्ञान और अंधविश्वास में रखने का तरीका था, ताकि वे अपने अभिमान और लालच को संतुष्ट कर सकें।

लूथर खुद इस तरह के आमूल परिवर्तनवाद के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने तो जर्मन शासकों से किसान-विद्रोह को दबाने की अपील की, जो 1525 में हुआ भी। पर फिर भी आमूल विचार टिके रहे, और फ़्रांस में प्रोटैस्टेंटों के विरोध से जुड़ गए, जहाँ कैथलिक शासकों के अत्याचार झेल रहे प्रोटैस्टेंट यह दावा करने लगे कि जनता को एक अत्याचारी शासक को हटाने और अपनी पसंद का नेता चुनने का अधिकार है। अंततः फ़्रांस में, बाकी यूरोप के कई हिस्सों की तरह ही, कैथलिक चर्च ने प्रोटैस्टेंटों को अपनी पसंद से उपासना करने की छूट दे दी। इंग्लैंड में शासकों ने पोप से अपना नाता ही खत्म कर लिया, और तभी से राजा या रानी ही चर्च के प्रमुख बन गए।

7.3 कैथलिक चर्च खुद में सुधार करता है

कैथलिक चर्च ने इस नुकसान को चुपचाप सहा नहीं, उसने भी खुद में अनेक आंतरिक सुधार करने शुरू किए। स्पेन और इटली में पादरियों ने सरल जीवन जीने और ग़रीबों की सेवा पर ज़ोर देना शुरू किया। स्पेन में इग्नेशियस लोयोला ने प्रोटैस्टेंटवाद का मुकाबला करने के लिए 1540 में सोसाइटी ऑफ जीसस की स्थापना की। उनके अनुयायी जेसुइट कहलाए, जिनका काम था ग़रीबों की सेवा करना और दूसरी संस्कृतियों के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाना।

सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी
1516टॉमस मोर की यूटोपिया प्रकाशित हुई
1517मार्टिन लूथर ने नाइन्टी फाइव थिसेज़ लिखीं
1522लूथर ने बाइबल का जर्मन में अनुवाद किया
1525जर्मनी में किसान विद्रोह
1543आन्ड्रीयस वेसेलियस ने ऑन ऐनॉटमी लिखी
1559इंग्लैंड में एंग्लिकन चर्च स्थापित हुआ, राजा/रानी उसके प्रमुख बने
1569गेरहार्डस मरकेटर ने पृथ्वी का बेलनाकार मानचित्र तैयार किया
1582पोप ग्रैगरी XIII ने ग्रैगोरियन कैलेंडर लागू किया
1628विलियम हार्वे ने हृदय को रक्त-संचरण से जोड़ा
1673पेरिस में ‘अकादमी ऑफ साइंसेज़’ की स्थापना हुई
1687आइज़क न्यूटन की प्रिन्सिपिया मैथेमेटिका प्रकाशित हुई

8विज्ञान, और “पुनर्जागरण” पर पुनर्विचार

8.1 कोपरनिकसीय क्रांति

मनुष्य को पापी मानने वाली ईसाई सोच को एक बिल्कुल अलग दिशा से भी चुनौती मिली, इस बार वैज्ञानिकों की तरफ़ से। इसका मोड़-बिंदु था कोपरनिकस (1473-1543) का काम, जो मार्टिन लूथर के ही समकालीन थे।

चित्र 7 : कोपरनिकस का एक चित्र, जिनके सिद्धांत ने पृथ्वी की जगह सूर्य को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा।
चित्र 7: कोपरनिकस का एक चित्र, जिनके सिद्धांत ने पृथ्वी की जगह सूर्य को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा।

ईसाइयों का विश्वास था कि पृथ्वी एक पापपूर्ण जगह है, और पाप के इसी भारी बोझ की वजह से यह स्थिर है, ब्रह्मांड के बिल्कुल केंद्र में टिकी हुई, जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह घूमते हैं। कोपरनिकस ने इसके उलट यह घोषित किया कि पृथ्वी सहित सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।

याद रखेंपरिभाषा 11

सूर्य-केंद्रित सिद्धांत कोपरनिकस का यह दावा है कि पृथ्वी और बाकी सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं, न कि इसका उल्टा, जिससे चर्च द्वारा समर्थित उस पुरानी पृथ्वी-केंद्रित धारणा की जगह ले ली गई।

कोपरनिकस खुद एक निष्ठावान ईसाई थे, और उन्हें डर था कि परंपरावादी पादरी उनके सिद्धांत पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे। इसी डर की वजह से उन्होंने अपने जीते-जी अपनी पांडुलिपि दि रिवल्यूशनिबस (“परिभ्रमण”) को छपने ही नहीं दिया; अपनी मृत्युशय्या पर उन्होंने इसे अपने अनुयायी जोशिम रिटिकस को सौंपा।

“स्वर्ग” और पृथ्वी के बीच के इस फ़र्क को पाटने में लोगों को आधी शताब्दी से भी ज़्यादा वक़्त लगा, और यह हुआ खगोलशास्त्री जोहानेस कैप्लर (1571-1630) और गैलिलियो गैलिली (1564-1642) के लेखन के ज़रिए। कैप्लर की किताब कॉस्मोग्राफिकल मिस्ट्री ने सूर्य-केंद्रित सिद्धांत को और लोकप्रिय बनाया, यह दिखाकर कि ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्त में नहीं, बल्कि दीर्घवृत्त (ellipse) में घूमते हैं। इसके बाद गैलिलियो ने अपने काम दि मोशन में एक गतिशील ब्रह्मांड की धारणा को पुख़्ता कर दिया। यह पूरी वैज्ञानिक क्रांति बाद में आइज़क न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के साथ अपने शिखर पर पहुँची।

याद रखने की तरकीब

पहले को, फिर कै + गै, अंत में न्यू

कोपरनिकस ने सबसे पहले सूर्य-केंद्रित ब्रह्मांड का विचार दिया, पर अपनी पांडुलिपि छपने नहीं दी। आधी शताब्दी से अधिक समय बीतने पर कैप्लर (दीर्घ वृत्ताकार मार्ग, कॉस्मोग्राफिकल मिस्ट्री) और गैलिलियो (गतिशील विश्व, दि मोशन), जो एक ही दौर में लिख रहे थे, ने “स्वर्ग” और “पृथ्वी” के अंतर को समाप्त किया। विज्ञान की यह क्रांति न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के साथ अपने चरम पर पहुँची।

8.2 ब्रह्मांड को पढ़ना: वैज्ञानिक क्रांति

गैलिलियो ने एक बार कहा था कि बाइबल, जो स्वर्ग का रास्ता रोशन करती है, यह ज़्यादा नहीं बताती कि आकाश असल में काम कैसे करता है। इन विचारकों ने मिलकर यह दिखा दिया कि असली ज्ञान, जो सिर्फ मान्यता से अलग चीज़ है, अवलोकन और प्रयोग पर आधारित होना चाहिए।

याद रखेंपरिभाषा 12

इतिहासकार ज्ञान की इस पूरी नई पद्धति को, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बारे में विचारों को सिर्फ मान्यता से नहीं बल्कि अवलोकन और प्रयोग से परखा जाता है, वैज्ञानिक क्रांति का नाम देते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा यह नया रास्ता दिखाए जाने के बाद, भौतिकी, रसायनशास्त्र और जीवविज्ञान में तेज़ी से प्रगति हुई।

इसका नतीजा यह हुआ कि संशयवादियों और अनास्थावानों के मन में सृष्टि के स्रोत के रूप में ईश्वर की जगह धीरे-धीरे प्रकृति लेने लगी। जिन लोगों ने अपनी आस्था बनाए रखी, वे भी अब एक ऐसे दूरवर्ती ईश्वर की बात करने लगे जो भौतिक जीवन को सीधे नियंत्रित नहीं करता। वैज्ञानिक समाजों ने इन विचारों को सार्वजनिक क्षेत्र में एक बिल्कुल नई वैज्ञानिक संस्कृति बनाकर लोकप्रिय बनाया: पेरिस अकादमी, जिसकी स्थापना 1670 में हुई, और लंदन की रॉयल सोसाइटी, जो 1662 में प्राकृतिक ज्ञान के प्रसार के लिए बनी, दोनों ही आम लोगों के लिए सार्वजनिक व्याख्यान और प्रयोग आयोजित करती थीं।

8.3 क्या सचमुच कोई यूरोपीय “पुनर्जागरण” हुआ था?

NCERT इस अध्याय को “पुनर्जागरण” की पूरी अवधारणा पर फिर से सोचने के लिए कहते हुए ख़त्म करती है। क्या यह सचमुच अतीत से एक तीखा विच्छेद था, यूनानी-रोमन विचारों का सच में एक “पुनर्जन्म”? क्या उससे पहले का दौर, बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी, सचमुच “अंधकार” का समय था?

आम ग़लती

बर्कहार्ट के “पुनर्जागरण” वाले विचार को इस अध्याय का आख़िरी, तय निष्कर्ष मानकर मत लिखिए। NCERT साफ़ कहती है कि इंग्लैंड के पीटर बर्क जैसे आधुनिक इतिहासकारों का तर्क है कि बर्कहार्ट ने इस काल और उससे पहले के काल के बीच के फ़र्क को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। किताब में उनके दोनों दावों, कि यह एक तीखा विच्छेद था, और कि इस दौर में ईसाई-पूर्व नज़रिये ने ईसाई नज़रिये की जगह ले ली, दोनों को ही बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया माना गया है। पहले की सदियों के विद्वान भी यूनानी-रोमन संस्कृति से परिचित थे, और धर्म पूरे समय बेहद महत्वपूर्ण बना रहा।

पुनर्जागरण को शुद्ध गतिशीलता-रचनात्मकता और मध्य युग को शुद्ध उदासी-ठहराव मानकर देखना एक अति-सरलीकरण है। “पुनर्जागरण” के अनेक तत्व असल में बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी तक खोजे जा सकते हैं, और कुछ इतिहासकारों के अनुसार नौवीं शताब्दी के फ़्रांस में भी कुछ वैसा ही साहित्यिक-कलात्मक उभार देखने को मिला था।

इस दौर के सांस्कृतिक बदलाव सिर्फ रोम और यूनान की “क्लासिकी” सभ्यता से ही नहीं गढ़े गए थे। रोमन संस्कृति की पुरातात्विक और साहित्यिक पुनर्खोज ने ज़रूर उसके प्रति गहरी प्रशंसा पैदा की, पर इस समय तक एशिया की तकनीकें और कौशल यूनानियों-रोमनों के ज्ञान से बहुत आगे निकल चुके थे। नई नौवहन तकनीकों से लोग पहले से कहीं ज़्यादा दूर तक यात्रा कर सकने लगे, और इस्लाम के विस्तार व मंगोल विजयों ने एशिया और उत्तरी अफ़्रीका को यूरोप से जोड़ दिया, राजनैतिक रूप से नहीं, बल्कि व्यापार और साझे ज्ञान के ज़रिए। यूरोपीय लोगों ने सिर्फ यूनानियों-रोमनों से ही नहीं, भारत, अरब, ईरान, मध्य एशिया और चीन से भी सीखा, यह क़र्ज़ लंबे समय तक स्वीकार नहीं किया गया, क्योंकि इस दौर का इतिहास पहले-पहल एक यूरोप-केंद्रित नज़रिये से ही लिखा गया।

8.4 व्यक्ति की नई भूमिका, और भाषा पर टिका राष्ट्र

इस दौर का एक सचमुच अहम बदलाव यह था कि जीवन के “निजी” और “सार्वजनिक” क्षेत्र धीरे-धीरे अलग-अलग होने लगे। “सार्वजनिक” क्षेत्र का मतलब था सरकार और औपचारिक धर्म का दायरा, जबकि “निजी” क्षेत्र में परिवार और व्यक्ति का अपना धर्म आता था।

अब व्यक्ति की एक निजी भूमिका भी थी और एक सार्वजनिक भी। वह अब सिर्फ सामंती समाज के “तीन वर्गों” में से किसी एक का सदस्य भर नहीं था, वह अपने आप में भी एक स्वतंत्र व्यक्ति था। जैसे कोई कलाकार अब सिर्फ किसी गिल्ड का सदस्य नहीं रह गया था, वह अपने ही हुनर के लिए भी जाना जाता था। अठारहवीं शताब्दी में व्यक्ति की यही पहचान राजनीतिक रूप में सामने आई, इस विश्वास के साथ कि हर व्यक्ति को बराबर राजनैतिक अधिकार हासिल हैं।

इसके साथ ही एक और बदलाव भी चल रहा था: यूरोप के अलग-अलग क्षेत्र अब भाषा के आधार पर अपनी अलग पहचान बनाने लगे। यूरोप, जो पहले कुछ हद तक रोमन साम्राज्य से, और बाद में लातिनी भाषा और ईसाई धर्म से जुड़ा हुआ था, अब अलग-अलग राज्यों में बँटने लगा, हर एक अपनी साझी भाषा से एकजुट।

सारी परिभाषाएँ एक जगह
आश्रयदाता (patron)वह धनी या शक्तिशाली व्यक्ति जो किसी कलाकार, लेखक या विद्वान को सहयोग देता है
पुनर्जागरण (रेनेसाँ)“पुनर्जन्म”; उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों का दिया नाम, यूरोप के 14वीं-17वीं शताब्दी के सांस्कृतिक बदलावों के लिए
मध्य युगरोम साम्राज्य के पतन के बाद के एक हज़ार वर्ष (मानवतावादियों के कालक्रम में 5-14 शताब्दी); मानवतावादियों के अनुसार इसमें चर्च ने यूनानी-रोमन ज्ञान को मिटा दिया
अंधकार युगउसी कालक्रम में केवल 5-9 शताब्दी; मानवतावादी मानते थे कि रोमन साम्राज्य के टूटने के बाद “अंधकारयुग” शुरू हुआ, आज के इतिहासकार इस नाम पर सवाल उठाते हैं
नगर-राज्यएक स्वतंत्र, स्वशासित राज्य जिसमें एक नगर और उसके आस-पास की ज़मीन शामिल हो
मानवतावादप्राचीनता के सीधे अध्ययन पर टिकी संस्कृति, यह विश्वास कि अकेले धर्म से ज़्यादा भी सीखने लायक है
यथार्थवादपुनर्जागरण काल की कला का नया, असली जैसा दिखने वाला गुण, शरीर रचना, रेखागणित, भौतिकी और सौंदर्यबोध का मेल
शास्त्रीय (वास्तुकला)पंद्रहवीं शताब्दी की “नई” शैली, जो असल में शाही रोमन वास्तुकला का ही पुनरुत्थान थी
मुद्रण-यंत्रगुटेनबर्ग की मशीन जो विभाज्य टाइप से एक जैसे पन्ने तेज़ी से बड़ी संख्या में छापती थी
पाप-स्वीकारोक्ति (indulgences)पादरियों द्वारा बेचे जाने वाले दस्तावेज़, जो व्यक्ति को उसके पापों से मुक्ति का दावा करते थे
प्रोटैस्टेंट सुधारवादलूथर का 1517 का आंदोलन, यह तर्क कि सिर्फ विश्वास (पादरी नहीं) मुक्ति की ओर ले जाता है, जिससे जर्मनी-स्विटज़रलैंड पोप से अलग हुए
कैथलिक चर्च के आंतरिक सुधारप्रोटैस्टेंट चुनौती के बाद कैथलिक चर्च द्वारा शुरू किए गए अनेक सुधार, सरल जीवन और ग़रीबों की सेवा पर ज़ोर
सूर्य-केंद्रित सिद्धांतकोपरनिकस का यह दावा कि पृथ्वी और ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं, न कि इसका उल्टा
वैज्ञानिक क्रांतिमान्यता की जगह अवलोकन और प्रयोग पर आधारित ज्ञान की नई पद्धति
तुरंत दोहराव: परीक्षा से एक रात पहले यह ज़रूर पढ़ें
  • बर्कहार्ट (1860) ने इतालवी नगरों की नई मानवतावादी संस्कृति (14वीं-17वीं शताब्दी) का वर्णन किया, जिसे उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने “पुनर्जागरण” कहा; पीटर बर्क जैसे आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि उन्होंने अतीत से फ़र्क को बढ़ा-चढ़ाकर बताया
  • इतालवी नगर स्वतंत्र नगर-राज्य बने; फ़्लोरेंस-वेनिस गणराज्य थे, वेनिस-जिनोआ सबसे जीवंत, रोम पोप के अधीन
  • पेट्रार्क के यूनानी-रोमन ग्रंथों के गहन अध्ययन से “मानवतावाद” की नींव पड़ी; यूनानी ग्रंथ यूरोप तक उन अरब अनुवादकों के ज़रिए पहुँचे जिन्होंने पांडुलिपियों का संरक्षण और अनुवाद किया; इतालवी दुनिया में ज्ञानी माने गए मुसलमान विद्वानों में हकीम-दार्शनिक इब्न-सिना, आयुर्विज्ञान विश्वकोश के लेखक अल-राज़ी और दार्शनिक इब्न रूश्द थे
  • दा विन्ची, माइकल एन्जिलो, दोनातल्लो जैसे कलाकारों ने “यथार्थवाद” विकसित किया; वास्तुकला में शाही रोमन “शास्त्रीय” शैली का पुनरुत्थान हुआ
  • गुटेनबर्ग के 1455 के मुद्रण-यंत्र से मानवतावादी विचार पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से पूरे यूरोप में फैले
  • मानवतावाद के नए व्यक्ति में स्त्रियाँ शामिल नहीं थीं; फेदेले और कास्टिल्योनी स्त्रियों के बारे में स्त्री और पुरुष, दोनों के नज़रिए देते हैं
  • लूथर के 1517 के धर्मसुधार ने पाप-स्वीकारोक्ति और पादरियों की भूमिका पर चर्च को बाँट दिया; कैथलिक चर्च ने अनेक आंतरिक सुधार शुरू किए
  • कोपरनिकस, कैप्लर और गैलिलियो ने पृथ्वी-केंद्रित ब्रह्मांड की जगह सूर्य-केंद्रित ब्रह्मांड को स्थापित किया, यहीं से वैज्ञानिक क्रांति शुरू हुई
  • अध्याय की असली अंतिम बात: अब व्यक्ति की एक निजी और एक सार्वजनिक भूमिका थी, और यूरोप भाषा के आधार पर अलग-अलग राष्ट्रों में बँट रहा था
परीक्षा से पहले खुद जाँच लें
  • क्या मैं बिना देखे बर्कहार्ट का नाम, उनकी किताब और साल बता सकता हूँ?
  • क्या मैं कम से कम तीन इतालवी नगर-राज्यों के नाम और उनके शासन का तरीका बता सकता हूँ?
  • क्या मैं बता सकता हूँ कि अरब अनुवादक यूरोपीय मानवतावाद के लिए क्यों ज़रूरी थे?
  • क्या मैं पाप-स्वीकारोक्ति और नाइन्टी फाइव थिसेज़ के बीच का फ़र्क बता सकता हूँ?
  • क्या मैं बता सकता हूँ कि कोपरनिकस, कैप्लर, गैलिलियो और न्यूटन में से हर एक ने ब्रह्मांड की नई समझ में क्या जोड़ा?
अभ्यास प्रश्न: 1 अंक
  1. 1 अंक“पुनर्जागरण” पर सबसे अधिक बल किस इतिहासकार ने और किस किताब में दिया?
  2. 1 अंकउन दो इतालवी नगरों के नाम बताइए जो गणराज्य थे।
  3. 1 अंक1341 में रोम में पेट्रार्क को कौन-सी उपाधि दी गई?
  4. 1 अंकपहला मुद्रण-यंत्र किसने बनाया, और किस साल उन्होंने बाइबल की 150 प्रतियाँ छापीं?
  5. 1 अंकमार्टिन लूथर ने 1517 में कौन-सा दस्तावेज़ लिखा?
  6. 1 अंकसोसाइटी ऑफ जीसस की स्थापना किसने, और किस साल की?
  7. 1 अंककोपरनिकस के अनुसार पृथ्वी और बाकी ग्रह किसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं?
  8. 1 अंकवह लातिनी शब्द बताइए जिससे “ह्यूमेनिटिज़” शब्द बना, और इसे ‘संस्कृति’ के अर्थ में लेने वाले रोमन लेखक का नाम भी।
अभ्यास प्रश्न: 2 और 3 अंक
  1. 3 अंकचौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी-रोमन संस्कृति के कौन-से तत्व पुनर्जीवित हुए? (NCERT)
  2. 3 अंकमानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी नगरों में क्यों हुआ? (NCERT)
  3. 2 अंकयूरोप में मानवतावाद के विकास में अरब अनुवादकों की क्या भूमिका थी?
  4. 3 अंक“पाप-स्वीकारोक्ति” शब्द को समझाइए, और यह इरेस्मस-टॉमस मोर जैसे ईसाई मानवतावादियों को क्यों नाराज़ करता था?
  5. 3 अंक“कॉन्स्टैनटाइन का अनुदान” क्या था, और यह राजाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?
  6. 2 अंकअभिजात और व्यापारी परिवारों में स्त्रियों की स्थिति में दो अंतर बताइए।
  7. 3 अंकमुद्रण के आविष्कार ने मानवतावादी विचारों को आल्प्स पर्वत के पार फैलाने में कैसे मदद की?
  8. 2 अंककैथलिक चर्च के “आंतरिक सुधारों” से क्या तात्पर्य है? इसका एक उदाहरण दीजिए।
  9. 3 अंकपृथ्वी के ब्रह्मांड में स्थान को लेकर चर्च की पुरानी मान्यता और कोपरनिकस के सिद्धांत में क्या अंतर था?
  10. 2 अंकNCERT के अनुसार आज के इतिहासकार “अंधकार युग” के नाम पर सवाल क्यों उठाते हैं?
अभ्यास प्रश्न: 5 अंक / निबंधात्मक
  1. 5 अंकमानवतावादी विचारों की क्या विशेषताएँ थीं? (NCERT)
  2. 5 अंकसत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा, इसका एक सुचिंतित विवरण दीजिए। (NCERT)
  3. 5 अंकइस काल की इतालवी वास्तुकला की इस्लामी वास्तुकला से तुलना कीजिए। (NCERT)
  4. 5 अंकवेनिस और समकालीन फ़्रांस में “अच्छी सरकार” के विचारों की तुलना कीजिए। (NCERT)
  5. 5 अंकधर्म के भीतर उन वाद-विवादों का वर्णन कीजिए जिनसे प्रोटैस्टेंट सुधारवाद की शुरुआत हुई, और कैथलिक चर्च ने इसका जवाब कैसे दिया।
  6. 5 अंक“आज के इतिहासकार यह सवाल उठाते हैं कि क्या पुनर्जागरण नाम का कोई तीखा विच्छेद सचमुच हुआ था।” पीटर बर्क के तर्क और अध्याय के अपने प्रमाणों की मदद से चर्चा कीजिए।
बहुविकल्पीय प्रश्न
  1. 1 अंक“दि सिविलाइज़ेशन ऑफ दि रेनेसाँ इन इटली” किसने लिखी?
    (क) लियोपोल्ड वॉन रांके(ख) जैकब बर्कहार्ट
    (ग) पीटर बर्क(घ) फ़्रांचेस्को पेट्रार्क
  2. 1 अंकNCERT के अनुसार कौन-से दो इतालवी नगर “सबसे जीवंत” थे?
    (क) फ़्लोरेंस और रोम(ख) वेनिस और जिनोआ
    (ग) रोम और वेनिस(घ) फ़्लोरेंस और जिनोआ
  3. 1 अंकपहला मुद्रण-यंत्र किसने बनाया?
    (क) जोहानेस गुटेनबर्ग(ख) लिओन बतिस्ता अल्बर्टी
    (ग) आन्ड्रीयस वेसेलियस(घ) मार्टिन लूथर
  4. 1 अंकअरबी भाषा में एरिसटोटिल (Aristotle) किस नाम से जाने जाते थे?
    (क) अफ़लातून(ख) अविरोज़
    (ग) अरस्तू(घ) एविसिना
  5. 1 अंकफ़्लोरेंस के ड्यूमा का गुंबद किसने डिज़ाइन किया?
    (क) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती(ख) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी
    (ग) दोनातल्लो(घ) लियोनार्डो दा विन्ची
  6. 1 अंकमार्टिन लूथर ने कैथलिक चर्च के विरुद्ध अपना अभियान किस साल शुरू किया?
    (क) 1500(ख) 1517
    (ग) 1525(घ) 1540
  7. 1 अंकयह सबसे पहले किसने दिखाया कि ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्त में नहीं बल्कि दीर्घवृत्त में घूमते हैं?
    (क) कोपरनिकस(ख) गैलिलियो
    (ग) कैप्लर(घ) न्यूटन
  8. 1 अंकसोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट) की स्थापना किसने की?
    (क) इग्नेशियस लोयोला(ख) इरेस्मस
    (ग) उलरिक ज़्विंगली(घ) जौं कैल्विन
अभिकथन (A): कोपरनिकस ने अपने जीते-जी अपनी पांडुलिपि “दि रिवल्यूशनिबस” को छपने नहीं दिया।
कारण (R): एक निष्ठावान ईसाई होने के कारण कोपरनिकस को अपने सूर्य-केंद्रित सिद्धांत पर परंपरावादी पादरियों की प्रतिक्रिया का डर था।
अभिकथन (A): आज के इतिहासकार बर्कहार्ट के इस दावे को बिना किसी सवाल के मान लेते हैं कि “पुनर्जागरण” और “अंधकार युग” के बीच एक तीखा विच्छेद था।
कारण (R): पीटर बर्क जैसे आधुनिक इतिहासकारों का तर्क है कि बर्कहार्ट ने इस काल और उससे पहले के काल के बीच के फ़र्क को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।
अभिकथन (A): पुनर्जागरण काल के इटली में व्यक्तित्व और नागरिकता का नया आदर्श स्त्रियों और पुरुषों, दोनों पर समान रूप से लागू होता था।
कारण (R): अभिजात परिवारों की स्त्रियों की अपने ही दहेज से चलने वाले पारिवारिक व्यवसाय में कोई राय नहीं होती थी, और उनकी सार्वजनिक भूमिका सीमित ही रही।
उत्तर कुंजी
बहुविकल्पीय 1-8(ख) (ख) (क) (ग) (ख) (ख) (ग) (क)
A-R 1(क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
A-R 2(घ) A ग़लत है: आज के इतिहासकार बर्कहार्ट के इस दावे पर सवाल उठाते हैं, उसे बिना सवाल माने नहीं मानते। R सही है।
A-R 3(घ) A ग़लत है: व्यक्तित्व और नागरिकता का यह नया आदर्श स्त्रियों को बाहर रखता था। R सही है, और यही बताता है कि A क्यों ग़लत है।
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