1 दो अलग-अलग रास्ते
1.1 उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में चीन और जापान
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में पूर्वी एशिया पर चीन का प्रभुत्व था। लंबी परंपरा की वारिस छींग राजवंश की सत्ता अटल दिखती थी। इसके मुक़ाबले जापान, एक छोटा-सा द्वीप-देश, अलग-थलग पड़ा हुआ लगता था। लेकिन कुछ ही दशकों में सब कुछ पलट गया। चीन अशांति में डूब गया और औपनिवेशिक चुनौती का सामना नहीं कर सका: शाही सरकार का राजनीतिक नियंत्रण जाता रहा, वह असरदार सुधार नहीं कर पाई, और देश गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। दूसरी ओर जापान ने एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य खड़ा किया, एक औद्योगिक अर्थव्यवस्था बनाई, और ताइवान (1895) तथा कोरिया (1910) को अपने अधीन कर एक औपनिवेशिक साम्राज्य तक क़ायम कर लिया। उसने 1894 में उसी चीन को हराया, जिससे उसने अपनी संस्कृति और आदर्श लिए थे, और 1905 में एक यूरोपीय ताक़त, रूस को भी हरा दिया।
चीन की प्रतिक्रिया धीमी रही। चीनी विचारकों ने अपनी परंपराओं को आधुनिक दुनिया के मुताबिक़ फिर से गढ़ने की कोशिश की, ताकि देश पश्चिमी और जापानी नियंत्रण से मुक्त हो सके। उन्हें लगा कि असमानताएँ हटाना और देश का पुनर्निर्माण करना, दोनों मक़सद क्रांति के ज़रिए ही हासिल हो सकते हैं। चीनी साम्यवादी दल (CCP) 1949 में गृहयुद्ध जीतकर सत्ता में आया। लेकिन 1970 के दशक के आख़िर तक चीनी नेताओं को लगने लगा कि उनकी विचारधारा आर्थिक विकास में रुकावट बन रही है, इसलिए व्यापक सुधार किए गए जिनसे पूँजीवाद और खुला बाज़ार लौट आए, भले ही पार्टी का राजनीतिक नियंत्रण बना रहा।
जापान एक उन्नत औद्योगिक देश बन गया, लेकिन साम्राज्य की चाहत उसे युद्ध और मित्र देशों (Allied forces) के हाथों हार तक ले गई। अमरीकी अधिग्रहण (US Occupation) से एक ज़्यादा लोकतांत्रिक व्यवस्था शुरू हुई, और जापान ने अपनी अर्थव्यवस्था इस तरह बनाई कि 1970 के दशक तक वह एक बड़ी आर्थिक शक्ति बनकर उभरा। जापान का आधुनिकीकरण पूँजीवाद के सिद्धांतों पर टिका था, और यह उस दुनिया में हुआ जिस पर पश्चिमी उपनिवेशवाद हावी था; जापान अपने विस्तार को यही कहकर सही ठहराता था कि वह पश्चिमी दबदबे का विरोध कर एशिया को आज़ाद करा रहा है।
प्रश्न 6 (लघु निबंध) में हमेशा पूछा जाता है कि क्या जापान की तेज़ औद्योगीकरण नीति ने पड़ोसी देशों से युद्ध और पर्यावरण-विनाश को जन्म दिया। जवाब दोनों के लिए हाँ है, और इसका सबूत खंड 5 व 3 में दिए तथ्यों से दें (1894-95 में चीन और 1904-05 में रूस से युद्ध; तनाको शोज़ो का 1897 का प्रदूषण-विरोधी आंदोलन और 1960 के दशक में मिनामाता का पारा-विषाक्तता कांड)।
1.2 भौगोलिक और सांस्कृतिक अंतर
चीन एक विशाल महाद्वीपीय देश है जो कई जलवायु क्षेत्रों में फैला है। इसका केंद्र तीन बड़ी नदी-व्यवस्थाओं पर टिका है: पीली नदी (ह्वांग हे), यांग्त्सी नदी (चांग च्यांग), जो दुनिया की तीसरी सबसे लंबी नदी है, और पर्ल नदी। ज़्यादातर देश पहाड़ी है। प्रमुख जातीय समूह हान है और मुख्य भाषा चीनी (पुतोंगहुआ) है, लेकिन उइगर, ह्वेई, मंचू और तिब्बती जैसी कई अन्य जातियाँ और कैंतोनीज़ (यू) व शंघाई की (वू) जैसी बोलियाँ भी हैं। चीनी खान-पान इसी क्षेत्रीय विविधता को दिखाता है: दक्षिण में कैंतोनीज़ खाना (डिम सम), उत्तर में गेहूँ, पश्चिम में तीखा शेचवान खाना, और पूर्व में चावल और गेहूँ दोनों।
इसके मुक़ाबले जापान द्वीपों की एक कड़ी है, जिसमें होन्शू, क्यूशू, शिकोकू और होक्काइदो सबसे बड़े हैं। मुख्य द्वीपों का आधे से ज़्यादा हिस्सा पहाड़ी है, और जापान भूकंप-संभावित क्षेत्र में बसा है, जिसने वहाँ की वास्तुकला को प्रभावित किया है। आबादी में ज़्यादातर जापानी हैं, साथ ही एक छोटा-सा आइनू समुदाय और वे कोरियाई भी हैं जिन्हें कोरिया के जापानी उपनिवेश रहते हुए ज़बरन मज़दूरी के लिए लाया गया था। जापान में पशुपालन की परंपरा नहीं है; चावल मुख्य फ़सल है और मछली प्रोटीन का बड़ा स्रोत।
| विशेषता | चीन | जापान |
|---|---|---|
| भौगोलिक स्वरूप | विशाल महाद्वीपीय देश, कई जलवायु क्षेत्र, ज़्यादातर पहाड़ी | द्वीपों की कड़ी (होन्शू, क्यूशू, शिकोकू, होक्काइदो), आधे से ज़्यादा पहाड़ी, भूकंप-संभावित |
| नदियाँ | पीली नदी, यांग्त्सी (दुनिया की तीसरी सबसे लंबी), पर्ल नदी | अध्याय में किसी बड़ी नदी-व्यवस्था का उल्लेख नहीं |
| प्रमुख लोग / भाषा | हान लोग, पुतोंगहुआ (चीनी); उइगर, ह्वेई, मंचू, तिब्बती अल्पसंख्यक | ज़्यादातर जापानी; छोटा आइनू समुदाय; उपनिवेश काल में ज़बरन लाए गए कोरियाई मज़दूर |
| मुख्य भोजन | क्षेत्रीय: चावल (दक्षिण/पूर्व), गेहूँ (उत्तर), तीखा खाना (शेचवान) | चावल और मछली (साशिमी/सूशी); पशुपालन की परंपरा नहीं |
2 पुराना जापान: तोकुगावा व्यवस्था
2.1 शोगुन, दाइम्यो और समुराई
पहले एक सम्राट क्योतो से जापान पर राज करता था, लेकिन बारहवीं सदी तक शाही दरबार की सत्ता शोगुनों के हाथ चली गई, जो सम्राट के नाम पर राज करते थे। 1603 से 1867 तक शोगुन का पद तोकुगावा परिवार के पास रहा (एदो शोगुनशाही)। देश 250 से ज़्यादा प्रांतों में बँटा था, जिन पर दाइम्यो नाम के सामंत शासन करते थे। शोगुन दाइम्यो को राजधानी एदो (आज का तोक्यो) में लंबे समय तक रहने का आदेश देकर नियंत्रित रखता था, ताकि वे कोई ख़तरा खड़ा न कर सकें; वह बड़े शहरों और खानों पर भी नियंत्रण रखता था। समुराई, यानि योद्धा वर्ग, शोगुन और दाइम्यो की सेवा करने वाला शासक अभिजात वर्ग था।
हथियार सिर्फ़ समुराई के पास
किसानों को निरस्त्र कर दिया गया; सिर्फ़ समुराई तलवार रख सकते थे। इससे पिछली सदियों के लगातार युद्धों का अंत हुआ और शांति-व्यवस्था बनी।
दाइम्यो अपने प्रांत में बँधे
दाइम्यो को अपने-अपने प्रांत की राजधानी में रहने का आदेश था, हर एक को काफ़ी हद तक स्थानीय स्वायत्तता मिली हुई थी।
भूमि-सर्वेक्षण
सर्वेक्षणों से ज़मीन-मालिकों और करदाताओं की पहचान हुई और भूमि की उपजाऊपन की श्रेणी तय हुई, जिससे राज्य की आमदनी स्थिर रही।
सोलहवीं सदी के अंत के इन तीन बदलावों ने भविष्य की नींव रखी। सत्रहवीं सदी के मध्य तक दाइम्यो की राजधानियाँ इतनी बड़ी हो गईं कि जापान के पास दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर, एदो, तो था ही, साथ ही दो और बड़े शहर, ओसाका और क्योतो, और कम-से-कम आधा दर्जन क़िले-नगर भी थे जिनकी आबादी 50,000 से ज़्यादा थी। उस समय ज़्यादातर यूरोपीय देशों में सिर्फ़ एक ही बड़ा शहर होता था। इससे एक व्यापारिक अर्थव्यवस्था बनी जिसमें असली वित्तीय और साख की व्यवस्थाएँ थीं, जहाँ किसी व्यक्ति की क़ाबिलियत उसकी विरासत में मिली हैसियत से ज़्यादा मायने रखने लगी। शहरों में एक जीवंत संस्कृति पनपी: व्यापारी नाटक और कलाओं को संरक्षण देते थे, और पढ़ने का शौक़ इतना बढ़ा कि एदो में लोग एक कटोरी नूडल की क़ीमत में किताब “किराए” पर ले सकते थे।
हेइआन दरबार की एक काल्पनिक डायरी के रूप में मुरासाकी शिकिबु ने जेंजी की कहानी लिखी, जो जापानी साहित्य की सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बनी। उस दौर में मुरासाकी जैसी कई महिला लेखिकाएँ उभरीं, जो जापानी लिपि में लिखती थीं, जबकि पुरुष शिक्षा और शासन के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी लिपि में लिखते थे। यह उपन्यास राजकुमार जेंजी के प्रेम-जीवन को दिखाता है और यह भी कि महिलाओं को अपना पति चुनने और अपनी ज़िंदगी जीने की कितनी आज़ादी थी।
2.2 पेरी से पहले की रेशम-अर्थव्यवस्था
जापान को धनी माना जाता था क्योंकि वह चीन से रेशम और भारत से कपड़े जैसी विलासिता की चीज़ें आयात करता था, लेकिन इनकी क़ीमत सोने-चाँदी में चुकाने से अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ा। इस वजह से तोकुगावा शासकों ने क़ीमती धातुओं के निर्यात पर रोक लगाई और आयात घटाने के लिए क्योतो के निशिजिन इलाक़े में रेशम-उद्योग को बढ़ावा दिया; निशिजिन का रेशम दुनिया में सबसे बेहतरीन माना जाने लगा। पैसे का बढ़ता इस्तेमाल और चावल का एक बाज़ार बनना दिखाता है कि पेरी के आने से बहुत पहले ही अर्थव्यवस्था नए ढंग से विकसित हो रही थी। इसी दौर में प्राचीन जापानी साहित्य के अध्ययन, जैसे जेंजी की कहानी और सम्राट के सूर्य-देवी से वंशज होने की मिथक-कथाओं ने लोगों को चीनी सांस्कृतिक प्रभाव पर सवाल उठाने और एक अलग जापानी पहचान खोजने के लिए प्रेरित किया।
3 मेजी पुनर्स्थापना
3.1 पेरी के “काले जहाज़” और शोगुन का पतन
देश के भीतर असंतोष के साथ-साथ व्यापार और कूटनीतिक संबंधों की माँग भी बढ़ रही थी। 1853 में अमरीका ने कमोडोर मैथ्यू पेरी (1794-1858) को जापान भेजा, ताकि वह ऐसी संधि पर दस्तख़त कराए जो व्यापार और कूटनीतिक संबंधों की इजाज़त दे; जापान ने अगले साल, 1854 में यह संधि मान ली। अमरीका के लिए जापान चीन के बाज़ार के रास्ते पर था, और उसके व्हेल-शिकार जहाज़ों को ईंधन भरने की जगह चाहिए थी; इससे पहले जापान से व्यापार करने वाला इकलौता पश्चिमी देश हॉलैंड था।

जिन्हें जापानी लोग “काले जहाज़” कहते थे (इनके लकड़ी के जोड़ कोलतार से सील किए जाते थे), वे चित्रों और कार्टूनों में अजीबोगरीब विदेशियों और उनकी आदतों को दिखाने के लिए छापे गए, और जापान के “खुलने” का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गए। पेरी के आने का जापानी राजनीति पर गहरा असर पड़ा: सम्राट, जिसकी अब तक बहुत कम राजनैतिक सत्ता थी, फिर से एक अहम शख़्सियत बनकर उभरा। 1868 में एक आंदोलन ने शोगुन को ज़बरदस्ती सत्ता से हटाया और सम्राट को एदो ले आया, जिसे राजधानी बनाकर तोक्यो (“पूर्वी राजधानी”) नाम दिया गया। इसे ही मेजी पुनर्स्थापना कहते हैं।
मेजी पुनर्स्थापना (1868) वह आंदोलन था जिसने तोकुगावा शोगुन को ज़बरन सत्ता से हटाकर असली राजनैतिक अधिकार सम्राट को लौटा दिया, जिसकी राजधानी एदो को तोक्यो नाम देकर बनाई गई। यही वह मोड़ है जिसने जापान के तेज़ आधुनिकीकरण को मुमकिन बनाया।
3.2 “समृद्ध देश, मज़बूत सेना”
अधिकारियों और आम लोगों को पता था कि यूरोपीय देश भारत और अन्य जगहों पर औपनिवेशिक साम्राज्य खड़े कर रहे हैं, और अंग्रेज़ों के हाथों चीन की हार की ख़बर लोकप्रिय नाटकों तक में पहुँच रही थी, इसलिए यह डर सच लगने लगा कि कहीं जापान भी उपनिवेश न बन जाए। कुछ विद्वान यूरोप के नए विचारों से सीखना चाहते थे, कुछ यूरोपीयों को बाहर ही रखना चाहते थे पर उनकी तकनीक अपनाने को तैयार थे, और कुछ धीरे-धीरे और सीमित “खुलेपन” के पक्ष में थे। सरकार ने एक नारे के साथ अपनी नीति का ऐलान किया।
फुकोकु क्योहे (“समृद्ध देश, मज़बूत सेना”) मेजी सरकार का मार्गदर्शक नारा था। इसका मतलब था कि जापान को मज़बूत अर्थव्यवस्था और मज़बूत सेना, दोनों बनानी होंगी, वरना भारत जैसी दशा में विदेशी ताक़त के अधीन हो जाना पड़ेगा। इसके लिए राष्ट्रीयता की भावना गढ़नी थी और प्रजा को नागरिकों में बदलना था।
साथ ही, सरकार ने वह भी बनाया जिसे वे “सम्राट-व्यवस्था” कहते थे: सम्राट, नौकरशाही और सेना के साथ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा जो सत्ता चलाती थी। इसे बनाने के लिए अधिकारियों को यूरोपीय राजतंत्रों का अध्ययन करने भेजा गया। सम्राट को सूर्य-देवी का सीधा वंशज मानकर श्रद्धा दी जाती थी, लेकिन साथ ही उसे पश्चिमीकरण के नेता के रूप में भी दिखाया गया: उसका जन्मदिन राष्ट्रीय अवकाश बना, उसने पश्चिमी शैली की सैन्य वर्दी पहनी, और उसके नाम पर जारी आदेशों से आधुनिक संस्थाएँ खड़ी हुईं। शिक्षा पर शाही घोषणा-पत्र (1890) ने लोगों से विद्या हासिल करने और जनकल्याण बढ़ाने का आह्वान किया।

4 आधुनिक जापान का निर्माण
4.1 एक नई स्कूली व्यवस्था
1870 के दशक से एक नई स्कूली व्यवस्था बनने लगी। लड़के-लड़कियों दोनों के लिए स्कूल जाना ज़रूरी था और 1910 तक यह लगभग हर जगह लागू हो चुका था; फ़ीस बहुत मामूली थी। पाठ्यक्रम पश्चिमी ढाँचे पर आधारित था, लेकिन 1870 के दशक से आधुनिक विचारों के साथ-साथ वफ़ादारी और जापानी इतिहास पढ़ाने पर भी ज़ोर दिया जाने लगा। शिक्षा मंत्रालय पाठ्यक्रम, किताबों के चुनाव और शिक्षकों की ट्रेनिंग, सब पर नियंत्रण रखता था; एक अनिवार्य “नैतिक शिक्षा” के पाठ्यक्रम में बच्चों से माता-पिता का सम्मान करने, देश के प्रति वफ़ादार रहने और अच्छा नागरिक बनने को कहा जाता था।
जापानियों ने छठी सदी में चीनी लिपि उधार ली थी, लेकिन चूँकि उनकी भाषा चीनी से बहुत अलग है, इसलिए उन्होंने दो ध्वन्यात्मक (फ़ोनेटिक) लिपियाँ बनाईं, हीरागाना और काताकाना, जिन्हें चीनी अक्षरों (कांजी) के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाता था। हीरागाना को स्त्रीलिंग माना जाता है क्योंकि हेइआन काल की कई महिला लेखिकाओं ने, जैसे मुरासाकी ने, इसी में लिखा था। 1880 के दशक में यह सुझाव भी आया कि जापान पूरी तरह ध्वन्यात्मक लिपि अपना ले, या यूरोपीय भाषा ही अपना ले; दोनों में से कुछ नहीं हुआ।
4.2 प्रशासन, सेना, और लोकतंत्र की सीमाएँ
देश को एक करने के लिए मेजी सरकार ने पुरानी गाँव और प्रांत की सीमाओं को बदलकर नया प्रशासनिक ढाँचा थोपा। हर प्रशासनिक इकाई को स्थानीय स्कूल और स्वास्थ्य-सुविधाएँ चलाने लायक़ राजस्व जुटाना था और सेना में भर्ती केंद्र का काम भी करना था; बीस साल से ऊपर हर युवक को सैन्य सेवा करनी ज़रूरी थी। एक क़ानूनी व्यवस्था राजनैतिक समूहों के गठन को नियंत्रित करती थी, सभाओं पर रोक लगाती थी, और सख़्त सेंसरशिप लागू करती थी, और हर क़दम पर इसका विरोध होता था।
सबसे अहम बात यह है कि सेना और नौकरशाही को सीधे सम्राट के अधीन रखा गया, न कि चुनी हुई सरकार के अधीन, इसलिए संविधान लागू होने के बाद भी वे नागरिक नियंत्रण से बाहर रहे। लोकतांत्रिक संविधान और सम्राट-नियंत्रित आधुनिक सेना, इन दोनों आदर्शों के बीच के इस तनाव के दूरगामी नतीजे निकले: सेना ने आक्रामक विदेश-नीति के लिए दबाव डाला, जिससे चीन और रूस से युद्ध हुए (जापान दोनों जीता), जबकि ज़्यादा लोकतंत्र की जनता की माँग अक्सर सरकार की आक्रामक नीतियों के सीधे विरोध में खड़ी होती थी।
यह मत लिखें कि मेजी संविधान से जापान पूरी तरह लोकतंत्र बन गया। इसने सीमित मताधिकार पर आधारित एक डायट बनाई, जिसके अधिकार सीमित थे, और सेना-नौसेना 1889 के बाद भी सीधे सम्राट को जवाबदेह रहीं, न कि चुनी हुई सरकार को। यही वजह है कि 1918-31 की लोकप्रिय रूप से चुनी सरकारें बाद में राष्ट्रीय-एकता वाली सरकारों और अंततः सेना के हाथों सत्ता खो बैठीं।
4.3 अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण
मेजी सुधारों के लिए पैसा कृषि-कर से जुटाया गया। जापान की पहली रेलवे लाइन, तोक्यो और योकोहामा बंदरगाह के बीच, 1870-72 में बनी। यूरोप से कपड़ा-मशीनें आयात हुईं, विदेशी तकनीशियनों ने मज़दूरों को ट्रेनिंग दी और स्कूल-विश्वविद्यालयों में पढ़ाया, और जापानी छात्रों को विदेश भेजा गया। 1872 में आधुनिक बैंकिंग संस्थाएँ शुरू हुईं। मित्सुबिशी और सुमितोमो जैसी कंपनियों को सब्सिडी और कर-छूट देकर बड़े जहाज़-निर्माता बनाया गया, ताकि जापानी व्यापार अब जापानी जहाज़ों से ही हो।
ज़ाइबात्सू बड़े जापानी व्यापारिक संगठन थे जो अकेले-अकेले परिवारों के नियंत्रण में थे (जैसे मित्सुबिशी और सुमितोमो)। इन्होंने मेजी काल से लेकर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तक जापानी अर्थव्यवस्था पर दबदबा रखा, जब तक अमरीकी अधिग्रहण के दौरान इन्हें तोड़ने की कोशिश नहीं हुई।
जापान की आबादी 1872 में 3.5 करोड़ से बढ़कर 1920 में 5.5 करोड़ हो गई। आबादी का दबाव कम करने के लिए सरकार ने पहले उत्तरी द्वीप होक्काइदो, जो मूल निवासी आइनू लोगों का घर था, और फिर हवाई, ब्राज़ील और जापान के बढ़ते औपनिवेशिक साम्राज्य की ओर प्रवास को बढ़ावा दिया। उद्योग ने लोगों को शहरों की ओर खींचा: 1925 तक 21 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती थी, जो 1935 तक बढ़कर 32 प्रतिशत (2.25 करोड़) हो गई।
4.4 औद्योगिक मज़दूर
विनिर्माण में काम करने वालों की संख्या 1870 में 7 लाख से बढ़कर 1913 में 40 लाख हो गई, जिनमें से ज़्यादातर पाँच से कम लोगों वाली छोटी इकाइयों में बिना किसी मशीनरी के काम करते थे। आधुनिक फ़ैक्ट्रियों में आधे से ज़्यादा मज़दूर महिलाएँ थीं, और 1886 में जापान की पहली आधुनिक हड़ताल भी महिलाओं ने ही आयोजित की थी; पुरुष मज़दूरों की संख्या महिलाओं से ज़्यादा सिर्फ़ 1930 के दशक में हुई। बड़ी फ़ैक्ट्रियों (100 से ज़्यादा मज़दूर) की संख्या 1909 में 1,000 से बढ़कर 1930 के दशक तक 4,000 से ज़्यादा हो गई, फिर भी 1940 में 5,50,000 से ज़्यादा छोटी कार्यशालाओं में पाँच से कम लोग काम करते थे। इससे परिवार-केंद्रित सोच बनी रही, ठीक वैसे ही जैसे राष्ट्रवाद को एक मज़बूत पितृसत्तात्मक व्यवस्था से सहारा मिलता था, जिसमें सम्राट को परिवार के मुखिया जैसा माना जाता था।
एक किसान के स्वयं-शिक्षित बेटे, तनाको शोज़ो एक बड़े राजनैतिक व्यक्तित्व बनकर उभरे। उन्होंने 1880 के दशक के जन-अधिकार आंदोलन में हिस्सा लिया, जो संवैधानिक सरकार की माँग करता था, और पहली डायट के सदस्य चुने गए। उनका मानना था कि आम लोगों की बलि औद्योगिक तरक़्क़ी की ख़ातिर नहीं दी जानी चाहिए। जब आशियो ताँबे की खान ने वातारासे नदी को प्रदूषित कर 100 वर्ग मील खेती की ज़मीन बर्बाद कर दी और एक हज़ार परिवारों को प्रभावित किया, तो तनाको ने जापान का पहला औद्योगिक-प्रदूषण-विरोधी आंदोलन चलाया (1897, 800 गाँववालों के साथ जन-प्रदर्शन), जिससे सरकार को क़दम उठाने पड़े; 1904 तक फ़सलें फिर सामान्य हो गईं।
5 राष्ट्रवाद, युद्ध और पुनर्निर्माण
5.1 डायट और आक्रामक राष्ट्रवाद
मेजी संविधान सीमित मताधिकार पर टिका था और इसने सीमित अधिकारों वाली एक डायट बनाई।
डायट मेजी संविधान (1889) से बनी जापानी संसद थी। इसका नाम जर्मन क़ानूनी विचारों के गहरे असर की वजह से संसद के लिए इस्तेमाल होने वाले जर्मन शब्द से लिया गया है।
1918 से 1931 के बीच लोकप्रिय रूप से चुने गए प्रधानमंत्रियों ने सरकारें बनाईं, लेकिन इसके बाद सत्ता पार्टी-रेखाओं से ऊपर बनी राष्ट्रीय-एकता सरकारों के पास चली गई। 1890 से सम्राट की सेनाओं के सेनापति वाली भूमिका का यह अर्थ निकाला जाने लगा कि सेना और नौसेना का नियंत्रण स्वतंत्र है, चुनी हुई सरकार से बाहर। 1899 में प्रधानमंत्री ने आदेश दिया कि केवल कार्यरत जनरल और एडमिरल ही मंत्री बन सकते हैं, जिससे सेना और मज़बूत हुई; यह जापान के बढ़ते औपनिवेशिक साम्राज्य के साथ-साथ इस डर से भी जुड़ा था कि जापान पश्चिमी ताक़तों की दया पर है, और इसी डर का इस्तेमाल सैन्य विस्तार और ज़्यादा टैक्स के विरोध को चुप कराने के लिए किया गया।
5.2 “पश्चिमीकरण” और “परंपरा”
जापानी बुद्धिजीवियों की एक के बाद एक पीढ़ियों में पश्चिमी देशों से जापान के रिश्ते को लेकर अलग-अलग राय रही।
एक ग़रीब समुराई परिवार में जन्मे फुकुज़ावा ने नागासाकी और ओसाका में डच और पश्चिमी विज्ञान पढ़ा, फिर अंग्रेज़ी सीखी, और 1860 में अनुवादक के तौर पर अमरीका गए। उन्होंने वह स्कूल बनाया जो आज केइओ विश्वविद्यालय है, और पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा देने वाली संस्था मेइरोकुशा के मुख्य सदस्यों में से एक थे। द एनकरेजमेंट टू लर्निंग (1872-76) में उन्होंने लिखा, “जापान को जिस चीज़ पर गर्व है वह बस उसका प्राकृतिक सौंदर्य है,” और कहा कि जापान को सिर्फ़ आधुनिक फ़ैक्ट्रियाँ नहीं, बल्कि “सभ्यता की आत्मा” भी चाहिए। पश्चिम के प्रति इस पूरी प्रतिबद्धता के लिए उनका जुमला था “एशिया को त्यागो”: जापान को अपनी “एशियाई” पहचान छोड़नी होगी। उनका मार्गदर्शक सिद्धांत था: “स्वर्ग ने न किसी को किसी से ऊपर बनाया, न किसी को किसी से नीचे।”
अगली पीढ़ी ने इसका जवाब दिया। दार्शनिक मियाके सेत्सुरे (1860-1945) ने कहा कि हर राष्ट्र को विश्व-सभ्यता के हित में अपनी ख़ास प्रतिभाओं का विकास करना चाहिए: “अपने देश को समर्पित होना दुनिया को समर्पित होना है।” जन-अधिकार आंदोलन के नेता उएकी एमोरी (1857-1892) फ़्रांसीसी क्रांति के प्राकृतिक अधिकारों और जन-संप्रभुता के सिद्धांतों की तारीफ़ करते थे और हर व्यक्ति के लिए उदार शिक्षा चाहते थे: “व्यवस्था से ज़्यादा क़ीमती आज़ादी है।” कुछ लोग तो महिलाओं के लिए मताधिकार तक की माँग करने लगे। इस दबाव से सरकार को संविधान का ऐलान करना पड़ा।
5.3 रोज़मर्रा की ज़िंदगी और “आधुनिक लड़की”
कई पीढ़ियों के एक साथ रहने वाला पुराना पितृसत्तात्मक परिवार धीरे-धीरे बदलने लगा, जैसे-जैसे लोग समृद्ध होते गए, एक नए आदर्श की जगह बनी: एकल परिवार, जिसे होमु (अंग्रेज़ी शब्द “होम” से) कहा गया, जहाँ पति कमाने वाला और पत्नी घर संभालने वाली होती थी। इससे नए घरेलू सामान, नए मनोरंजन और नए तरह के मकानों की माँग बढ़ी; 1920 के दशक में सस्ते मकान सिर्फ़ 200 येन जमा और दस साल तक 12 येन महीना देकर मिल जाते थे, जबकि उस समय बैंक कर्मचारी की तनख़्वाह 40 येन महीना होती थी।
मोगा, यानि “आधुनिक लड़की”, 1920 के दशक के शहरी जापान में स्त्री-पुरुष समानता, विश्वबंधुत्व की संस्कृति और विकसित अर्थव्यवस्था के मेल का प्रतीक थी। नए मध्यम-वर्गीय परिवार बिजली से चलने वाली ट्राम, सार्वजनिक पार्क (1878 से), डिपार्टमेंट स्टोर और “गिनबुरा” (तोक्यो के फ़ैशनेबल गिंज़ा इलाक़े में यूँ ही घूमना) का आनंद लेते थे।
पहला रेडियो स्टेशन 1925 में खुला। फ़िल्में 1899 में शुरू हुईं, और जल्दी ही एक दर्जन कंपनियाँ हर साल सैकड़ों फ़िल्में बनाने लगीं; अभिनेत्री मात्सुई सुमाको इब्सन के नाटक अ डॉल्स हाउस में नोरा का किरदार निभाकर राष्ट्रीय सितारा बन गईं। यह ज़बरदस्त जीवंतता और पारंपरिक सामाजिक-राजनैतिक मान्यताओं पर सवाल उठाने का दौर था।
5.4 “आधुनिकता पर विजय” और युद्ध की राह
राष्ट्र-केंद्रित राष्ट्रवाद 1930-40 के दशक में चरम पर पहुँच गया, जब जापान ने चीन और बाक़ी एशिया में अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए युद्ध छेड़े, और पर्ल हार्बर पर अमरीका के हमले के बाद यह दूसरे विश्वयुद्ध में बदल गया। इस दौर में समाज पर नियंत्रण बढ़ा, असहमति रखने वालों का दमन हुआ, और युद्ध का समर्थन करने वाली देशभक्त संस्थाएँ बनीं (जिनमें से कई महिलाओं की थीं)।
1943 की एक संगोष्ठी, “आधुनिकता पर विजय”, में इस दुविधा पर बहस हुई कि आधुनिक बने रहते हुए पश्चिम का मुक़ाबला कैसे किया जाए। दार्शनिक निशितानी केइजी ने “आधुनिक” को पश्चिमी सोच की तीन धाराओं, पुनर्जागरण, प्रोटैस्टेंट सुधार, और प्राकृतिक विज्ञान के उदय, की एकता बताया, और कहा कि जापान की अपनी “नैतिक शक्ति” ने उसे उपनिवेश बनने से बचाया, और अब जापान का कर्तव्य है कि वह एक नई विश्व-व्यवस्था, एक “बड़ा पूर्वी एशिया”, बनाए।
5.5 हार के बाद: फिर से एक वैश्विक आर्थिक शक्ति
मित्र देशों (Allied forces) के हाथों हार के साथ जापान के औपनिवेशिक साम्राज्य के सपने का अंत हुआ; हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए। अमरीकी नेतृत्व वाले अधिग्रहण (1945-47) के दौरान जापान को निःशस्त्र किया गया, और एक नया संविधान लाया गया जिसमें अनुच्छेद 9, यानि “युद्ध-निषेध खंड”, शामिल था, जो युद्ध को राज्य-नीति के औज़ार के तौर पर त्याग देता है। कृषि-सुधार, मज़दूर संगठनों की फिर से स्थापना, और ज़ाइबात्सू को तोड़ने की कोशिश भी की गई। राजनैतिक दल फिर से सक्रिय हुए, और 1946 के पहले युद्धोत्तर चुनाव में महिलाओं ने पहली बार मतदान किया।
अर्थव्यवस्था के तेज़ पुनर्निर्माण को युद्धोत्तर “चमत्कार” कहा गया, लेकिन असल में यह जापान के जन-आंदोलनों और राजनैतिक भागीदारी को लेकर उसकी लंबी बौद्धिक परंपरा में जड़ जमाए हुए था, साथ ही अमरीकी सहयोग ने भी मदद की। 1960 के दशक में बेरोक-टोक औद्योगीकरण से स्वास्थ्य और पर्यावरण को हुए नुक़सान के विरोध में नागरिक-समाज के आंदोलन भी बढ़े: कैडमियम-विषाक्तता और मिनामाता में पारे की विषाक्तता से जन-दबाव बना कि सरकार पहचान और मुआवज़ा दे, जिससे सरकारी कार्रवाई और नए पर्यावरण-क़ानून बने; 1980 के दशक के मध्य से जापान ने दुनिया के सबसे सख़्त पर्यावरण-नियमों में से कुछ लागू कर दिए।
6 पतन की ओर छींग चीन
6.1 संकट पर चीन की तीन प्रतिक्रियाएँ
आधुनिक चीन का पूरा इतिहास एक सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है: संप्रभुता कैसे वापस पाई जाए, विदेशी क़ब्ज़े का अपमान कैसे ख़त्म हो, और समानता व विकास कैसे लाया जाए। चीनी बहस तीन धाराओं में बँटी थी: कांग यूवेई (1858-1927) और लियांग किचाउ (1873-1929) जैसे शुरुआती सुधारवादी, जो पारंपरिक विचारों को नए ढंग से इस्तेमाल करना चाहते थे; सन यात-सेन जैसे गणतंत्रवादी क्रांतिकारी, जो जापान और पश्चिम से प्रेरित थे; और चीनी साम्यवादी दल (CCP), जो पुरानी असमानताएँ ख़त्म कर विदेशियों को बाहर करना चाहता था।
6.2 अफ़ीम युद्ध और त्रिकोणीय व्यापार
पश्चिम से चीन का पहला सामना सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में हुआ, जब जेसुइट धर्म-प्रचारकों ने खगोलशास्त्र और गणित का परिचय दिया; शुरू में इसका असर सीमित था, लेकिन उन्नीसवीं सदी में जब ब्रिटेन ने ज़ोर-ज़बरदस्ती से अपना अफ़ीम-व्यापार बढ़ाया, तो इसने पहला अफ़ीम युद्ध (1839-42) छेड़ दिया। इससे छींग राजवंश कमज़ोर पड़ा और सुधार की माँगें और बुलंद हुईं।

त्रिकोणीय व्यापार वह व्यापार-ढाँचा था जिसने अफ़ीम युद्ध को जन्म दिया। चीन की चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तनों की भारी माँग थी, लेकिन पश्चिमी सामान को चीन में कोई बाज़ार नहीं मिलता था, इसलिए पश्चिम को चाँदी में भुगतान करना पड़ता था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसका हल भारत में अफ़ीम उगाकर और उसे चीन में बेचकर निकाला; वहाँ से मिली चाँदी से चीनी चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन ख़रीदे जाते थे, जिन्हें फिर ब्रिटेन में बेचा जाता था।
6.3 सुधारवादी, पोलैंड, और भारत का सवाल
कांग यूवेई और लियांग किचाउ जैसे छींग सुधारवादियों को लगा कि चीन को उपनिवेश बनने से बचाने के लिए एक आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था, नई सेना, शिक्षा-व्यवस्था और संवैधानिक सरकार के लिए स्थानीय सभाएँ बनानी होंगी। उपनिवेश बन चुके देशों का नकारात्मक उदाहरण चीनी विचारकों पर गहरा असर डालता था: अठारहवीं सदी में पोलैंड के बँटवारे का उदाहरण इतना मशहूर हुआ कि 1890 के दशक के आख़िर तक “पोलैंड बनाना” (बोलान वो) एक क्रिया-रूप में इस्तेमाल होने लगा। भारत का उदाहरण भी दिया जाता था। 1903 में लियांग किचाउ ने लिखा कि भारत “एक ऐसा देश है जिसे एक ग़ैर-देश, यानि ईस्ट इंडिया कंपनी ने तबाह किया,” और भारतीयों को अंग्रेज़ों के आगे झुकने के लिए आलोचना की, क्योंकि आम चीनी लोग देख चुके थे कि अंग्रेज़ चीन के ख़िलाफ़ युद्धों में भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
6.4 कन्फ्यूशियसवाद पर सवाल, और पुरानी परीक्षा-व्यवस्था की समाप्ति
कन्फ्यूशियसवाद, जो कन्फ्यूशियस (551-479 ईसा पूर्व) और उनके शिष्यों की शिक्षाओं से बना, अच्छे आचरण, व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और सही सामाजिक संबंधों पर केंद्रित था। इसने दो हज़ार साल से ज़्यादा समय तक चीनी सामाजिक मानकों और राजनैतिक विचारों को गढ़ा, लेकिन उन्नीसवीं सदी के आख़िर तक इसे नए विचारों की राह में एक रुकावट माना जाने लगा।
आधुनिक विषय पढ़ने के लिए छात्रों को जापान, ब्रिटेन और फ़्रांस भेजा गया; 1890 के दशक में जापान जाने वाले कई छात्र आगे चलकर बड़े गणतंत्रवादी नेता बने। चीनियों ने तो न्याय, अधिकार और क्रांति जैसे यूरोपीय शब्दों के जापानी अनुवाद तक उधार ले लिए, जो पुराने रिश्ते का उलटा था, क्योंकि दोनों भाषाएँ एक जैसी चित्रात्मक (ideographic) लिपि इस्तेमाल करती थीं। 1905 में, चीनी धरती पर लड़े गए रूस-जापान युद्ध के ठीक बाद, सदियों पुरानी चीनी परीक्षा-व्यवस्था ख़त्म कर दी गई।
चीन के शासक अभिजात वर्ग (1850 तक क़रीब 11 लाख लोग) में प्रवेश ज़्यादातर एक परीक्षा से ही मिलता था, जिसमें शास्त्रीय चीनी में “आठ-टाँगों वाला निबंध” (पा-कू वेन) लिखना पड़ता था। यह हर तीन साल में दो बार होती थी, और सिर्फ़ 1-2 प्रतिशत उम्मीदवार ही पहला स्तर पास कर पाते थे, आमतौर पर 24 साल की उम्र तक। 1850 से पहले देश भर में क़रीब 5,26,869 नागरिक और 2,12,330 सैन्य उपाधि-धारक थे, लेकिन सरकारी पद सिर्फ़ 27,000 ही थे, इसलिए कई उपाधि-धारकों को नौकरी नहीं मिलती थी। यह परीक्षा सिर्फ़ साहित्यिक कौशल माँगती थी और विज्ञान-तकनीक के विकास में रुकावट मानी जाती थी; इसे 1905 में आधुनिक दुनिया के लिए अप्रासंगिक मानकर ख़त्म कर दिया गया।
7 गणतंत्र, क्रांति और साम्यवादी दल
7.1 सन यात-सेन और 1911 का गणतंत्र
मांचू (छींग) साम्राज्य को उखाड़कर 1911 में सन यात-सेन (1866-1925) के नेतृत्व में गणतंत्र स्थापित हुआ, जिन्हें सर्वसम्मति से आधुनिक चीन का जनक माना जाता है। एक ग़रीब परिवार में जन्मे सन यात-सेन ने मिशनरी स्कूलों में पढ़ाई की, जहाँ उन्हें लोकतंत्र और ईसाई धर्म से परिचय मिला, और राजनीति में आने से पहले चिकित्सा की पढ़ाई की।

सन यात-सेन के तीन सिद्धांत (सन मिन चुई) थे: राष्ट्रवाद (मांचू शासन को उखाड़ना, जिसे विदेशी राजवंश माना जाता था, और अन्य विदेशी साम्राज्यवादियों को भी हटाना), लोकतंत्र (लोकतांत्रिक सरकार बनाना), और समाजवाद (पूँजी को नियंत्रित करना और भूमि-स्वामित्व को बराबर करना)।
4 मई 1919 को बीजिंग में एक ग़ुस्से भरा प्रदर्शन हुआ, जो युद्धोत्तर शांति-सम्मेलन के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ था: जीतने वाले पक्ष का सहयोगी होते हुए भी चीन को अपनी छीनी हुई ज़मीनें वापस नहीं मिलीं। इस चार मई आंदोलन ने एक पूरी पीढ़ी को परंपरा पर सवाल उठाने और विज्ञान, लोकतंत्र व राष्ट्रवाद के ज़रिए चीन को बचाने का आह्वान करने के लिए प्रेरित किया, साथ ही सरल लिखित भाषा, पैर बाँधने की प्रथा और विवाह-असमानता ख़त्म करने, और आर्थिक विकास जैसे सुधारों की माँग उठी।
7.2 कुओमीनतांग और चियांग काई-शेक
कुओमीनतांग (जन-राष्ट्रीय दल) ने सन यात-सेन के विचारों पर अपना राजनैतिक दर्शन बनाया और कपड़ा, भोजन, आवास व यातायात को “चार बड़ी ज़रूरतें” बताया। सन यात-सेन की मृत्यु के बाद चियांग काई-शेक (1887-1975) ने इसका नेतृत्व संभाला और क्षेत्रीय “सरदारों” को क़ाबू में लाने व साम्यवादियों को ख़त्म करने के लिए सैन्य अभियान छेड़ा।
चियांग एक धर्मनिरपेक्ष, “इसी दुनिया पर केंद्रित” कन्फ्यूशियसवाद की वक़ालत करते थे, लेकिन साथ ही देश को सैन्य रूप से भी संगठित करना चाहते थे, और लोगों से “एकसमान व्यवहार की आदत और सहजबोध” विकसित करने को कहते थे। उन्होंने महिलाओं की भूमिका घर तक सीमित रखने के लिए “शील, दिखावट, वाणी और काम” के चार गुण तय किए; यहाँ तक कि पहनावे की लंबाई भी तय की गई। कुओमीनतांग का आधार शहरी था: शंघाई में औद्योगिक मज़दूर वर्ग 1919 तक 5 लाख तक पहुँच गया था, हालाँकि इनमें से बहुत कम लोग जहाज़-निर्माण जैसे आधुनिक उद्योगों में थे; ज़्यादातर “छोटे शहरी” (श्याओ शिमिन), यानि व्यापारी और दुकानदार थे। पेकिंग विश्वविद्यालय (1902) जैसे स्कूल-विश्वविद्यालय फैले, और पत्रकारिता बढ़ी, जिसकी मिसाल है लाइफ़ वीकली, जिसकी प्रसार-संख्या 1926 के 2,000 से बढ़कर 1933 तक 2,00,000 हो गई।
अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद कुओमीनतांग देश को एकजुट नहीं कर पाया: उसका सामाजिक आधार बहुत संकुचित था, और उसने सन यात-सेन के वादे किए भूमि व पूँजी सुधार कभी लागू नहीं किए, किसानों और बढ़ती असमानता को नज़रअंदाज़ कर लोगों की असल समस्याओं की जगह सैन्य अनुशासन को तरजीह दी।
7.3 माओ त्सेतुंग और साम्यवादी दल का उदय
रूसी क्रांति के तुरंत बाद, 1921 में CCP की स्थापना हुई।
कॉमिन्टर्न (तीसरा इंटरनेशनल), जिसे लेनिन और ट्रॉट्स्की ने मार्च 1918 में बनाया, का मक़सद ऐसी विश्व-सरकार बनाने में मदद करना था जो शोषण ख़त्म कर दे। इसने दुनिया भर के साम्यवादी दलों को इस पारंपरिक मार्क्सवादी सोच के आधार पर समर्थन दिया कि क्रांति शहरी मज़दूर वर्ग से आएगी, और 1943 में इसे भंग कर दिया गया।
माओ त्सेतुंग (1893-1976) ने कॉमिन्टर्न की शहरी रणनीति से हटकर अपनी क्रांति का आधार किसानों को बनाया, जिससे आख़िरकार CCP इतना ताक़तवर हो गया कि उसने कुओमीनतांग को हरा दिया। 1928 से 1934 तक, माओ के जियांग्सी पहाड़ी अड्डे में ज़मीन को छीनकर बाँटने के ज़रिए एक किसान-परिषद (सोवियत) संगठित की गई; माओ ने स्वतंत्र सरकार और सेना पर ज़ोर दिया, ग्रामीण महिला-संगठनों का समर्थन किया, और एक नया विवाह-क़ानून बनाया जिसने जबरन विवाह पर रोक लगाई और तलाक़ को आसान बनाया।

लॉन्ग मार्च (1934-35) CCP का वह 6,000 मील लंबा पीछे हटना था, जिसमें कुओमीनतांग की घेराबंदी से बचकर जियांग्सी के अड्डे से शानशी प्रांत के येनान में नया ठिकाना बनाया गया। वहाँ पार्टी ने सरदारशाही ख़त्म करने, भूमि-सुधार लागू करने और विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ने का कार्यक्रम बनाया, जिससे किसानों के बीच उसका मज़बूत आधार बना।
युद्ध के मुश्किल सालों में CCP और कुओमीनतांग ने 1937 से शुरू हुए जापानी आक्रमण के ख़िलाफ़ मिलकर काम किया, लेकिन युद्ध ख़त्म होते ही CCP ने ख़ुद को सत्ता में स्थापित कर कुओमीनतांग को हरा दिया।
8 साम्यवादी शासन में चीन
8.1 नया लोकतंत्र और ग्रेट लीप फॉरवर्ड
1949 में जनवादी गणराज्य चीन की स्थापना हुई, जो “नए लोकतंत्र” के सिद्धांत पर आधारित था, यानि सभी सामाजिक वर्गों का गठबंधन, न कि सोवियत संघ की “सर्वहारा की तानाशाही”। अर्थव्यवस्था के अहम हिस्से सरकारी नियंत्रण में आ गए, और निजी उद्यम व भूमि-स्वामित्व धीरे-धीरे ख़त्म कर दिए गए; यह कार्यक्रम 1953 तक चला, जब सरकार ने समाजवादी बदलाव का कार्यक्रम शुरू करने का ऐलान किया।
ग्रेट लीप फॉरवर्ड (1958) चीन को तेज़ी से औद्योगीकृत करने की नीति थी: लोगों को अपने घर के पिछवाड़े इस्पात की भट्टियाँ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, और ग्रामीण ज़मीन को सामूहिक स्वामित्व वाले जन-कम्यूनों में संगठित किया गया। 1958 तक 26,000 कम्यून बन चुके थे, जो 98 प्रतिशत किसान आबादी को कवर करते थे, लेकिन पिछवाड़े की भट्टियों से बना इस्पात औद्योगिक इस्तेमाल के लायक़ नहीं था।
माओ एक “समाजवादी मनुष्य” गढ़ना चाहते थे, जिसमें पाँच प्रेम हों: मातृभूमि, जनता, श्रम, विज्ञान और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति, और इसके लिए जन-संगठन बनाए गए (अकेले अखिल-चीन जनवादी महिला महासंघ के 7.6 करोड़ सदस्य थे)। लेकिन 1953-54 तक ही लियू शाओछी (1896-1969) और देंग श्याओपिंग (1904-97) जैसे नेता औद्योगिक संगठन और आर्थिक विकास पर ज़्यादा ध्यान देने की माँग करने लगे थे, क्योंकि कम्यून-व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही थी।
8.2 सांस्कृतिक क्रांति
महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति (माओ द्वारा 1965/66 में शुरू) “पुरानी संस्कृति, पुरानी रीतियों और पुरानी आदतों” के ख़िलाफ़ एक अभियान था, जिसका नेतृत्व रेड गार्ड्स (ज़्यादातर छात्र और सेना) करते थे। पेशेवर दक्षता से ज़्यादा वैचारिक निष्ठा को महत्व दिया जाता था; छात्रों और पेशेवरों को “जनता से सीखने” गाँवों में भेजा गया, और तर्कसंगत बहस की जगह निंदा और नारों ने ले ली।
सांस्कृतिक क्रांति से उथल-पुथल का दौर शुरू हुआ, जिसने पार्टी को कमज़ोर किया और अर्थव्यवस्था व शिक्षा-व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। 1960 के दशक के आख़िर से हालात धीरे-धीरे बदलने लगे, और 1975 तक पार्टी फिर से सामाजिक अनुशासन और औद्योगिक अर्थव्यवस्था बनाने पर ध्यान देने लगी।
8.3 1978 से सुधार, और तियानमेन चौक
सांस्कृतिक क्रांति के बाद देंग श्याओपिंग ने पार्टी का नियंत्रण मज़बूत रखते हुए एक समाजवादी बाज़ार-अर्थव्यवस्था शुरू की।
1978 में पार्टी के लक्ष्य के तौर पर घोषित चार आधुनिकीकरण थे: विज्ञान, उद्योग, कृषि और रक्षा का विकास। बहस की इजाज़त थी, बशर्ते पार्टी पर ही सवाल न उठाया जाए।
इस नए खुले माहौल में, 5 दिसंबर 1978 को “पाँचवाँ आधुनिकीकरण” नाम की एक दीवार-पोस्टर में कहा गया कि लोकतंत्र के बिना बाक़ी चार आधुनिकीकरण बेकार होंगे, और CCP की इस बात के लिए आलोचना की गई कि उसने ग़रीबी और यौन-शोषण जैसी समस्याएँ हल नहीं कीं। इन माँगों को दबा दिया गया, लेकिन 1989 में, चार मई आंदोलन की सत्तरवीं सालगिरह पर, बुद्धिजीवियों ने फिर से खुलेपन की माँग उठाई। बीजिंग के तियानमेन चौक पर छात्रों के प्रदर्शन को बेरहमी से दबा दिया गया, जिसकी दुनिया भर में कड़ी निंदा हुई।
सुधारों के बाद की बहस आज भी जारी है: पार्टी का मुख्य नज़रिया मज़बूत राजनैतिक नियंत्रण के साथ-साथ आर्थिक उदारीकरण और विश्व-बाज़ार से जुड़ाव का समर्थन करता है, जबकि आलोचक सामाजिक वर्गों, क्षेत्रों, और स्त्री-पुरुषों के बीच बढ़ती असमानता की ओर इशारा करते हैं, और कन्फ्यूशियसवाद जैसे “पारंपरिक” विचारों की बढ़ती वापसी को भी नोट करते हैं।
9 ताइवान और कोरिया
9.1 ताइवान की कहानी
CCP से हारकर चियांग काई-शेक 1949 में ताइवान भाग गए, अपने साथ 30 करोड़ अमरीकी डॉलर से ज़्यादा का सोना ले गए, और वहाँ “गणराज्य चीन” स्थापित किया। 1894-95 के युद्ध के बाद चीन द्वारा सौंपे जाने के बाद से ताइवान जापान का उपनिवेश था; कैरो घोषणा (1943) ने इसकी संप्रभुता चीन को लौटा दी। फ़रवरी 1947 के प्रदर्शनों को बेरहमी से दबाने के बाद, चियांग के नेतृत्व वाली कुओमीनतांग सरकार ने राजनैतिक विरोध और आज़ाद बोलने पर रोक लगाकर एक दमनकारी शासन चलाया, स्थानीय ताइवानियों को सत्ता से दूर रखा, लेकिन साथ ही ऐसे भूमि-सुधार भी किए जिनसे उत्पादकता बढ़ी और अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण हुआ: 1973 तक ताइवान की प्रति-व्यक्ति आय जापान के बाद एशिया में दूसरे नंबर पर थी, और अमीर-ग़रीब का फ़ासला लगातार घटता गया।
ताइवान का लोकतंत्र में बदलाव चियांग की मृत्यु (1975) के बाद धीरे-धीरे शुरू हुआ और 1987 में मार्शल लॉ हटने और विपक्षी दलों को क़ानूनी दर्जा मिलने के साथ तेज़ हुआ, जिससे मुक्त चुनावों के ज़रिए स्थानीय ताइवानी सत्ता में आए। चूँकि ताइवान को चीन का हिस्सा माना जाता है, इसलिए ज़्यादातर देशों के वहाँ सिर्फ़ व्यापारिक मिशन हैं, पूर्ण दूतावास नहीं, हालाँकि “क्रॉस-स्ट्रेट” व्यापार, निवेश और यात्रा लगातार आसान होते गए हैं।
9.2 कोरिया की कहानी: उपनिवेश से बँटवारे तक
उन्नीसवीं सदी के आख़िर में कोरिया के जोसोन वंश (1392-1910) ने चीन, जापान और पश्चिम के बढ़ते दबाव के बीच अपने ही स्तर पर आधुनिकीकरण सुधारों की कोशिश की। शाही जापान ने 1910 में कोरिया को उपनिवेश बनाकर 500 साल पुराने राजवंश का अंत कर दिया; कोरियाइयों ने जापान के सांस्कृतिक दमन और ज़बरन आत्मसातीकरण का प्रदर्शनों और एक अस्थायी सरकार बनाकर विरोध किया। 35 साल बाद, अगस्त 1945 में जापान की द्वितीय विश्वयुद्ध में हार के साथ औपनिवेशिक शासन ख़त्म हुआ। इसके बाद कोरिया को अस्थायी रूप से 38वें अक्षांश-रेखा पर बाँट दिया गया (उत्तर में सोवियत, दक्षिण में UN/अमरीका); यह बँटवारा स्थायी हो गया जब 1948 में उत्तर और दक्षिण में अलग-अलग सरकारें बनीं।
9.3 युद्ध, तानाशाही और तेज़ आर्थिक वृद्धि
कोरियाई युद्ध (जून 1950 – जुलाई 1953), जिसमें दक्षिण को अमरीकी नेतृत्व वाली UN सेना और उत्तर को साम्यवादी चीन का समर्थन मिला, एक शीत-युद्धकालीन छद्म युद्ध था, जो शांति-संधि नहीं बल्कि युद्ध-विराम पर ख़त्म हुआ; कोरिया आज भी बँटा हुआ है। इस युद्ध ने उपनिवेश-काल का उद्योग तबाह कर दिया और दक्षिण कोरिया को अमरीकी सहायता पर निर्भर बना दिया। राष्ट्रपति सिंगमन री ने ग़ैर-क़ानूनी संविधान-संशोधनों से दो बार अपना शासन बढ़ाया, जब तक अप्रैल क्रांति (1960) के धांधली-विरोधी प्रदर्शनों ने उन्हें इस्तीफ़ा देने पर मजबूर नहीं किया। मई 1961 में जनरल पार्क चुंग-ही ने सैन्य तख़्तापलट से सत्ता हथिया ली।
1963 में राष्ट्रपति चुने गए पार्क ने राज्य-नेतृत्व वाली, निर्यात-केंद्रित आर्थिक नीति अपनाई: पंचवर्षीय योजनाओं ने बड़ी कंपनियों को बढ़ावा दिया और कोरिया को आयात-प्रतिस्थापन से हटाकर निर्यात की ओर मोड़ा, पहले कपड़ा जैसे हल्के उद्योग, फिर 1960 के दशक के आख़िर से इस्पात और जहाज़-निर्माण जैसे भारी और रासायनिक उद्योग।
सैमौल (नया गाँव) आंदोलन (1970) ने कोरिया की ग्रामीण आबादी को कृषि आधुनिक बनाने के लिए संगठित किया, ताकि लोगों की मानसिकता निष्क्रिय से सक्रिय और उम्मीद से भरी बने। बाद में यह शहरी और औद्योगिक इलाक़ों तक फैला, और आज कोरिया यह मॉडल विकासशील देशों के साथ साझा करता है।
कोरिया की तरक़्क़ी प्रशिक्षित नौकरशाहों, पढ़े-लिखे मज़दूर वर्ग, विदेशी तकनीक अपनाने वाली खुली अर्थव्यवस्था, विदेशी निवेश, ऊँची घरेलू बचत, और विदेश में काम कर रहे कोरियाई मज़दूरों की भेजी रक़म पर भी टिकी थी। लेकिन इसी तरक़्क़ी ने पार्क की तानाशाही सत्ता को भी बल दिया: उन्होंने तीसरी बार चुनाव लड़ने के लिए संविधान बदला (1971), और अक्तूबर 1972 में यूसिन संविधान लागू किया, जिससे राष्ट्रपति-पद स्थायी हो गया और राष्ट्रपति को लगभग असीमित अधिकार मिल गए, यहाँ तक कि किसी भी क़ानून को “आपातकालीन उपाय” कहकर रद्द करने का अधिकार भी। 1979 के तेल-संकट और लगातार विरोधों के बीच, अक्तूबर 1979 में पार्क की हत्या कर दी गई।
9.4 लोकतंत्रीकरण और IMF संकट
चुन के दौर में आर्थिक वृद्धि तेज़ हुई (1980 में 1.7% से 1983 तक 13.2%), लेकिन बढ़ती शिक्षा और शहरीकरण से राजनैतिक जागरूकता भी बढ़ी, और जून 1987 में एक छात्र की यातना से मौत का पर्दाफ़ाश होने पर व्यापक जून लोकतंत्र आंदोलन छिड़ गया, जिसने सीधे राष्ट्रपति-चुनाव के लिए संविधान-संशोधन करवाया। रोह ताए-वू पहले ऐसे चुनाव (1987) में जीते; किम यंग-सैम 1992 में पहले नागरिक राष्ट्रपति बने।
निर्यात-आधारित विकास जारी रहा, और कोरिया 1996 में OECD में शामिल हुआ, लेकिन व्यापार-घाटे और बड़ी कंपनियों की लापरवाह उधारी से 1997 में विदेशी मुद्रा संकट आ गया, जिसे आपातकालीन IMF सहायता से सुलझाया गया; नागरिकों ने विदेशी क़र्ज़ चुकाने में मदद के लिए गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट के ज़रिए अपना निजी सोना तक दे दिया। उस दिसंबर किम डेइ-जुंग का चुना जाना कोरिया में सत्ता का पहला शांतिपूर्ण हस्तांतरण, विपक्ष के नेता के हाथ में, था। इसके बाद तीन और शांतिपूर्ण हस्तांतरण हुए, आख़िर में पार्क ग्युन-हे का महाभियोग (2017, 2016 के “कैंडललाइट प्रदर्शनों” के बाद) और मून जे-इन का चुनाव। किताब का अपना निष्कर्ष: कोरियाई लोकतंत्र आर्थिक विकास का ऋणी है, लेकिन इसे आगे बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका नागरिकों की बढ़ी हुई राजनैतिक जागरूकता की रही।
प्रश्न 5 में सीधे पूछा जाता है कि कोरिया ने 1997 के मुद्रा-संकट का सामना कैसे किया। तीन बातें दें: (1) IMF से आपातकालीन वित्तीय सहायता, (2) विदेशी क़र्ज़ चुकाने में मदद के लिए नागरिकों का गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट, और (3) एक साल पहले ही (1996) OECD में शामिल होकर अर्थव्यवस्था और खोलना।
10 आधुनिकीकरण के दो रास्ते
औद्योगिक समाज एक-दूसरे जैसे बनने की बजाय अपने-अपने अलग रास्तों से आधुनिक बने। जापान ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी और पारंपरिक कौशल-प्रथाओं को नए तरीक़ों से इस्तेमाल किया, लेकिन इसका अभिजात-नेतृत्व वाला आधुनिकीकरण एक आक्रामक राष्ट्रवाद, असहमति को दबाने वाला शासन, और ऐसा औपनिवेशिक साम्राज्य भी लाया जिसने क्षेत्र में नफ़रत की विरासत छोड़ी। चीन का रास्ता बिल्कुल अलग था: विदेशी साम्राज्यवाद और एक कमज़ोर, हिचकिचाती छींग सरकार ने मिलकर राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था को तोड़ दिया, जिससे सरदारशाही, गृहयुद्ध और जापानी आक्रमण के ज़रिए भारी दुख आया।
जापान का रास्ता
- आधुनिकीकरण ऊपर से, सम्राट के आस-पास मौजूद पुराने अभिजात वर्ग के नेतृत्व में हुआ
- परंपरागत संस्थाओं को छोड़ा नहीं गया, बल्कि नए ढंग से इस्तेमाल किया गया (जैसे “सम्राट-व्यवस्था”, वफ़ादारी सिखाने वाली मेजी स्कूली व्यवस्था)
- आख़िर में एक आक्रामक औपनिवेशिक साम्राज्य और दूसरे विश्वयुद्ध में हार तक पहुँचा
- असली लोकतंत्रीकरण किसी क्रांति से नहीं, बल्कि युद्धोत्तर अमरीकी अधिग्रहण से आया
चीन का रास्ता
- दशकों के विदेशी अपमान और गृहयुद्ध के बाद, आधुनिकीकरण क्रांति के ज़रिए आया
- CCP ने परंपरा को ही ख़त्म करने की लड़ाई लड़ी, जिसे वह जनता को ग़रीब और महिलाओं को दबाए रखने वाली मानता था
- “जनता को सत्ता” का नारा देते हुए भी एक बेहद केंद्रीकृत राज्य बनाया
- पुरानी असमानताएँ हटाईं और शिक्षा फैलाई, लेकिन आर्थिक सुधार के बाद भी सख़्त एक-दलीय राजनैतिक नियंत्रण बनाए रखा
यह समझना ज़रूरी है कि जापान का बदलाव सिर्फ़ पुरानी परंपराओं को दोहराना या जस-का-तस बचाए रखना नहीं था, बल्कि उन्हें नए ढंग से रचनात्मक रूप से इस्तेमाल करना था: मेजी स्कूली व्यवस्था यूरोप-अमरीका के ढाँचे पर बनी थी, लेकिन इसका असली मक़सद वफ़ादार नागरिक गढ़ना था, जिसके लिए सम्राट के प्रति वफ़ादारी का पाठ अनिवार्य था। इसी तरह चीन का साम्यवादी कार्यक्रम भी मुक्ति और समानता का वादा करता था, लेकिन उसकी दमनकारी राजनैतिक व्यवस्था अक्सर इन आदर्शों को जनता को नियंत्रित करने वाले नारों में बदल देती थी; फिर भी इसने सदियों पुरानी असमानताएँ सचमुच हटाईं। आज दोनों देश उसी बुनियादी सवाल से जूझ रहे हैं जो यह अध्याय उठाता है: पुरानी विरासत में से क्या रखा जाए, यह तय करते हुए एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में कैसे विकास किया जाए।
10.1 समयरेखा: जापान और चीन साथ-साथ
| वर्ष | जापान | चीन |
|---|---|---|
| 1603 | तोकुगावा इएयासु ने एदो शोगुनशाही स्थापित की | 1644-1911: छींग राजवंश |
| 1630 | सीमित डच व्यापार को छोड़कर जापान ने देश को पश्चिमी ताक़तों के लिए बंद किया | |
| 1839-60 | दो अफ़ीम युद्ध | |
| 1854 | जापान-अमरीका शांति-संधि से जापान का एकांतवास ख़त्म | |
| 1868 | मेजी पुनर्स्थापना | |
| 1872 | अनिवार्य शिक्षा; पहली रेलवे लाइन (तोक्यो-योकोहामा) | |
| 1889 | मेजी संविधान लागू | |
| 1894-95 | जापान-चीन युद्ध | |
| 1904-05 | जापान-रूस युद्ध | |
| 1910 | कोरिया का अधिग्रहण, 1945 तक उपनिवेश | |
| 1912 | सन यात-सेन ने कुओमीनतांग बनाई | |
| 1919 | चार मई आंदोलन | |
| 1921 | CCP की स्थापना | |
| 1925 | सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार | |
| 1926-49 | चीन में गृहयुद्ध | |
| 1931 | चीन पर जापान का आक्रमण | |
| 1934 | लॉन्ग मार्च | |
| 1941-45 | प्रशांत युद्ध | |
| 1945 | हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम | |
| 1946-52 | अमरीकी अधिग्रहण; जापान को लोकतांत्रिक व निःशस्त्र बनाने के सुधार | |
| 1949 | जनवादी गणराज्य चीन की स्थापना; चियांग काई-शेक ने ताइवान में गणराज्य चीन बनाया | |
| 1956 | जापान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना | |
| 1962 | सीमा-विवाद पर चीन का भारत पर हमला | |
| 1964 | तोक्यो में ओलंपिक खेल, एशिया में पहली बार | |
| 1966 | सांस्कृतिक क्रांति | |
| 1976 | माओ त्सेतुंग और झोऊ एनलाई का निधन | |
| 1997 | हॉन्ग कॉन्ग ब्रिटेन ने चीन को लौटाया |
- 1800 में चीन पूर्वी एशिया पर हावी था; कुछ ही दशकों में जापान ने आधुनिकीकरण कर ताइवान (1895) और कोरिया (1910) को उपनिवेश बना लिया, जबकि चीन गृहयुद्ध और विदेशी नियंत्रण में फँस गया
- पुराना जापान: शोगुन (तोकुगावा, 1603-1867) दाइम्यो और समुराई के ज़रिए राज करते थे; पेरी से पहले ही व्यापारिक अर्थव्यवस्था और निशिजिन रेशम-उद्योग मौजूद था
- पेरी (1853) ने जापान को ज़बरन खोला; 1868 की मेजी पुनर्स्थापना ने शोगुन को हटाया; नारा था फुकोकु क्योहे, “समृद्ध देश, मज़बूत सेना”
- मेजी जापान ने अनिवार्य स्कूल, सम्राट के सीधे नियंत्रण वाली आधुनिक सेना (डायट के नहीं), रेलवे (1870-72), और ज़ाइबात्सू-नेतृत्व वाला उद्योग बनाया
- आक्रामक राष्ट्रवाद (सीमित अधिकार वाली डायट, नागरिक नियंत्रण से बाहर सेना) से चीन (1894-95) और रूस (1904-05) से युद्ध, फिर WWII तक बात पहुँची
- युद्धोत्तर: अमरीकी अधिग्रहण (1945-47), अनुच्छेद 9, ज़ाइबात्सू तोड़ने की कोशिश, महिलाओं का पहला मतदान (1946); जापान का युद्धोत्तर “चमत्कार” और 1964 ओलंपिक
- चीन: अफ़ीम युद्ध (1839-42) और त्रिकोणीय व्यापार ने छींग को कमज़ोर किया; कन्फ्यूशियसवाद पर सवाल उठे; परीक्षा-व्यवस्था 1905 में ख़त्म हुई
- सन यात-सेन का गणतंत्र (1911), तीन सिद्धांत, और चार मई आंदोलन (1919) से कुओमीनतांग (चियांग काई-शेक) बनाम CCP (माओ त्सेतुंग, किसान-आधारित) की लड़ाई शुरू हुई
- लॉन्ग मार्च (1934-35) से येनान; 1949 में जनवादी गणराज्य चीन; ग्रेट लीप फॉरवर्ड (1958); सांस्कृतिक क्रांति (1965/66); देंग के चार आधुनिकीकरण (1978) और तियानमेन (1989)
- ताइवान: चियांग की कुओमीनतांग 1949 में वहाँ भागी, दमनकारी पर भूमि-सुधार करने वाला शासन चलाया, 1987 से लोकतांत्रिक बनी
- कोरिया: 1910 में जापान का उपनिवेश, 1948 में बँटवारा, कोरियाई युद्ध 1950-53, पार्क चुंग-ही की निर्यात-आधारित वृद्धि और यूसिन संविधान, 1987 में लोकतंत्रीकरण, 1997 का IMF संकट
- दो रास्ते: जापान ऊपर से आधुनिकीकरण कर स्वतंत्र रहा पर आक्रामक साम्राज्य बनाया; चीन ने क्रांति से आधुनिकीकरण किया और केंद्रीकृत पार्टी-नियंत्रण बनाए रखा
- क्या मैं तोकुगावा काल के वे तीन 16वीं सदी के आख़िर के बदलाव बता सकता हूँ जिन्होंने जापान की बाद की तरक़्क़ी की नींव रखी?
- क्या मैं फुकोकु क्योहे समझा सकता हूँ और इसकी वजह से सरकार के दो क़दम बता सकता हूँ?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि 1889 के बाद भी सेना नागरिक नियंत्रण से बाहर क्यों रही?
- क्या मैं त्रिकोणीय व्यापार को एक वाक्य में समझा सकता हूँ?
- क्या मैं तीनों सिद्धांत बता सकता हूँ और हर एक का मतलब जोड़ सकता हूँ?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि माओ की किसान-आधारित रणनीति कॉमिन्टर्न की शहरी रणनीति से कैसे अलग थी और क्यों सफल हुई?
- क्या मैं चार आधुनिकीकरण बता सकता हूँ, और “पाँचवें आधुनिकीकरण” पोस्टर की माँग बता सकता हूँ?
- क्या मैं कोरिया को पार्क चुंग-ही के तख़्तापलट (1961) से मून जे-इन के चुनाव (2017) तक पाँच घटनाओं में जोड़ सकता हूँ?
- क्या मैं जापान और चीन के रास्तों को एक-एक तुलना-बिंदु में बता सकता हूँ?
- 1 अंक1853 में जापान के बंदरगाह ज़बरन खुलवाने किसे भेजा गया था?
- 1 अंक“फुकोकु क्योहे” नारे का क्या मतलब है?
- 1 अंकWWII के बाद तक जापान की अर्थव्यवस्था पर हावी रहने वाले परिवार-नियंत्रित बड़े व्यापार-घरानों को क्या कहा जाता था?
- 1 अंकपहला अफ़ीम युद्ध किस साल लड़ा गया था?
- 1 अंकआधुनिक चीन का जनक सर्वसम्मति से किसे माना जाता है?
- 1 अंकचीनी साम्यवादी दल की स्थापना किस साल हुई?
- 1 अंक1978 के चार आधुनिकीकरण क्या थे?
- 1 अंकयूसिन संविधान (कोरिया, 1972) क्या था?
- 3 अंकमेजी पुनर्स्थापना से पहले के वे कौन-से बड़े घटनाक्रम थे जिन्होंने जापान का तेज़ आधुनिकीकरण मुमकिन बनाया? (NCERT)
- 3 अंकपश्चिमी ताक़तों की चुनौती का सामना छींग राजवंश ने कैसे किया? (NCERT)
- 3 अंकसन यात-सेन के तीन सिद्धांत क्या थे? (NCERT)
- 2 अंकब्रिटेन, भारत और चीन के बीच “त्रिकोणीय व्यापार” समझाइए।
- 3 अंक1905 में चीनी परीक्षा-व्यवस्था क्यों ख़त्म कर दी गई?
- 2 अंकलॉन्ग मार्च क्या था, और CCP ने यह क़दम क्यों उठाया?
- 3 अंकमाओ त्सेतुंग का क्रांति के प्रति नज़रिया कॉमिन्टर्न के पारंपरिक नज़रिए से कैसे अलग था?
- 2 अंकग्वांगजू लोकतंत्रीकरण आंदोलन क्या था?
- 5 अंकजापान के विकास के साथ-साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कैसे बदलाव आए, चर्चा कीजिए। (NCERT)
- 5 अंकक्या जापान की तेज़ औद्योगीकरण नीति ने पड़ोसियों से युद्ध और पर्यावरण-विनाश को जन्म दिया? (NCERT)
- 5 अंकक्या आप मानते हैं कि माओ त्सेतुंग और CCP चीन को मुक्ति दिलाने और उसकी मौजूदा क़ामयाबी की बुनियाद डालने में सफल रहे? (NCERT)
- 5 अंककोरिया ने 1997 के विदेशी मुद्रा संकट का सामना किस तरह किया? (NCERT)
- 5 अंकक्या साउथ कोरिया की आर्थिक वृद्धि ने उसके लोकतंत्रीकरण में योगदान दिया? (NCERT)
- 5 अंकजापान और चीन के आधुनिकीकरण के रास्तों की तुलना करें और बताएं कि वे इतने अलग क्यों निकले।
- 1 अंकमेजी पुनर्स्थापना किस साल हुई थी?
(क) 1853(ख) 1868
(ग) 1889(घ) 1905 - 1 अंकमेजी काल के नारे “फुकोकु क्योहे” का मतलब है:
(क) एशिया को त्यागो(ख) आधुनिकता पर विजय
(ग) समृद्ध देश, मज़बूत सेना(घ) पश्चिम से सीखो - 1 अंकमेजी सरकार की मदद से कौन-सी कंपनी बड़ी जहाज़-निर्माता बनी?
(क) तोयोता(ख) मित्सुबिशी
(ग) सोनी(घ) होंडा - 1 अंकपहला अफ़ीम युद्ध किनके बीच लड़ा गया?
(क) ब्रिटेन और चीन(ख) जापान और चीन
(ग) ब्रिटेन और जापान(घ) रूस और चीन - 1 अंकचीनी परीक्षा-व्यवस्था आख़िरकार किस साल ख़त्म हुई?
(क) 1839(ख) 1894
(ग) 1905(घ) 1911 - 1 अंकमाओ त्सेतुंग ने अपनी क्रांतिकारी रणनीति किस पर आधारित की?
(क) शहरी मज़दूर वर्ग(ख) किसानों
(ग) सिर्फ़ सेना(घ) विदेशी हस्तक्षेप - 1 अंकजनवादी गणराज्य चीन की स्थापना किस साल हुई?
(क) 1911(ख) 1934
(ग) 1949(घ) 1958 - 1 अंक1970 से कोरिया के ग्रामीण इलाक़ों को आधुनिक बनाने वाला आंदोलन कौन-सा था?
(क) अप्रैल क्रांति(ख) गोल्ड कलेक्शन मूवमेंट
(ग) सैमौल आंदोलन(घ) जून लोकतंत्र आंदोलन
कारण (R): सेना और नौसेना सीधे सम्राट के अधीन रखी गई थीं, और 1890 से यह माना जाने लगा कि उनका नियंत्रण नागरिक सरकार से बाहर, स्वतंत्र है।
कारण (R): माओ ने इसके बजाय अपना क्रांतिकारी कार्यक्रम किसानों पर आधारित किया, जियांग्सी और बाद में येनान जैसे अड्डों से भूमि का पुनर्वितरण करते हुए।
कारण (R): मार्शल लॉ सिर्फ़ 1987 में हटाया गया और तभी विपक्षी दलों को क़ानूनी दर्जा मिला, जिसके बाद ताइवान का लोकतांत्रिक बदलाव असल में तेज़ हुआ।