इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. आलोक धन्वा का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म सन् 1948 में मुंगेर, बिहार में हुआ था।
प्र. आलोक धन्वा की पहली कविता का नाम क्या है और वह कब प्रकाशित हुई?
उत्तर: उनकी पहली कविता ‘जनता का आदमी’ है, जो सन् 1972 में प्रकाशित हुई।
प्र. आलोक धन्वा का एकमात्र काव्य संग्रह कौन-सा है और वह कब प्रकाशित हुआ?
उत्तर: उनका एकमात्र काव्य संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ है, जो सन् 1998 में प्रकाशित हुआ।
प्र. आलोक धन्वा को कौन-कौन से प्रमुख सम्मान मिले हैं?
उत्तर: उन्हें राहुल सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का साहित्य सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान और पहल सम्मान मिले हैं।
प्र. ‘पतंग’ कविता के बारे में एक तथ्य बताइए जो पाठ की भूमिका में दिया गया है।
उत्तर: ‘पतंग’ मूलतः एक लंबी कविता है, जिसका तीसरा भाग पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है।
प्र. ‘पतंग’ कविता किस छंद-शैली में लिखी गई है?
उत्तर: यह मुक्त छंद में लिखी गई है, इसमें कोई निश्चित तुक-योजना या मात्रा-बंधन नहीं है।
प्र. बच्चे जन्म से ही अपने साथ क्या लाते हैं, और उससे किस बात का संकेत मिलता है?
उत्तर: बच्चे जन्म से ही अपने साथ कपास लाते हैं; इसे उनकी कोमलता और हल्केपन के संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है।
प्र. छतों के खतरनाक किनारों पर बच्चों को गिरने से कौन बचाता है?
उत्तर: सिर्फ़ उनके अपने रोमांचित (उत्साहित) शरीर का संगीत ही उन्हें गिरने से बचाता है, कोई बाहरी सहारा नहीं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. आलोक धन्वा के बारे में पाठ में कहा गया है कि उन्होंने ‘कभी थोक के भाव में लेखन नहीं किया’। इसका कारण क्या बताया गया है?
उत्तर: पाठ के अनुसार, इतनी व्यापक ख्याति के बावजूद या शायद उसी की वजह से बनी हुई अपेक्षाओं के दबाव के चलते, आलोक धन्वा ने कभी थोक के भाव में लेखन नहीं किया (यानी ढेर सारी रचनाएँ जल्दी-जल्दी नहीं लिखीं)। सन् 72 से लेखन आरंभ करने के बाद उनका पहला और अभी तक का एकमात्र काव्य संग्रह सन् 98 में प्रकाशित हुआ।
प्र. आलोक धन्वा की सामाजिक-सांस्कृतिक सक्रियता के बारे में लिखिए।
उत्तर: काव्य-लेखन के अलावा पिछले दो दशकों से वे देश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक व सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने जमशेदपुर में अध्ययन-मंडलियों का संचालन किया और रंगकर्म तथा साहित्य पर कई राष्ट्रीय संस्थानों व विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता रहे हैं।
प्र. ‘पतंग’ कविता का केंद्रीय भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पतंग के बहाने इस कविता में बालसुलभ इच्छाओं और उमंगों का सुंदर चित्रण किया गया है। पतंग बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना है, और आसमान में उड़ती पतंग उन ऊँचाइयों की हद है जिन्हें बालमन छूना और उसके पार जाना चाहता है।
प्र. कविता के पहले खंड में शरद ऋतु के आगमन का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
उत्तर: शरद ऋतु मानो अपनी नयी चमकीली साइकिल पर, पुलों को पार करते हुए, ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजाते हुए और चमकीले इशारों से बच्चों को बुलाते हुए आती है, और आकाश को इतना मुलायम बना देती है कि पतंग ऊपर उठ सके।
प्र. कविता में पतंग को ‘दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: कवि चाहता है कि शरद आकाश को इतना मुलायम बना दे कि पतंग ऊपर उठ सके, और दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़, यानी दुनिया का सबसे पतला कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी भी उड़ सके। इन विशेषणों से पतंग का हलकापन, नाज़ुकपन और रंग-बिरंगापन एक साथ उभरता है।
प्र. ‘महज़ एक धागे के सहारे’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ बच्चों को महज़ एक धागे के सहारे थाम लेती हैं। यह धागा बच्चों और आकाश की ऊँचाइयों के बीच का एकमात्र, नाज़ुक जुड़ाव है। इसे जीवन की डोर के बिंब के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
प्र. ‘पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं, अपने रंध्रों के सहारे’ पंक्ति का क्या अर्थ है?
उत्तर: बच्चे छतों के खतरनाक किनारों पर होते हुए भी, पतंग उड़ाने के उत्साह और रोमांच में इतने डूब जाते हैं कि मानो वे भी पतंगों के साथ अपने रंध्रों (रोम-छिद्रों) के सहारे उड़ रहे हों। यह उनके भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है।
प्र. कविता के अंतिम खंड में गिरकर बच जाने पर बच्चों की प्रतिक्रिया कैसी बताई गई है?
उत्तर: अगर बच्चे कभी छतों के खतरनाक किनारों से गिरते हैं और बच जाते हैं, तब तो वे और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं। पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई उनके बेचैन पैरों के पास आती है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. आलोक धन्वा के जीवन-परिचय के मुख्य बिंदु लिखिए।
उत्तर: जन्म 1948, मुंगेर (बिहार)। लेखन-आरंभ 1972 से, पहली कविता ‘जनता का आदमी’। ‘भागी हुई लड़कियाँ’ और ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ से व्यापक प्रसिद्धि। एकमात्र काव्य संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ (1998)। चार प्रमुख सम्मान: राहुल, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, बनारसी प्रसाद भोजपुरी, पहल। कभी थोक के भाव में लेखन नहीं किया। जमशेदपुर में अध्ययन-मंडलियों का संचालन तथा अतिथि व्याख्याता के रूप में सक्रियता।
प्र. ‘पतंग’ कविता की रचना-पृष्ठभूमि और उसकी विशेष बनावट स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: ‘पतंग’ आलोक धन्वा के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ का हिस्सा है। यह एक लंबी कविता है, जिसके तीसरे भाग को पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है। पाठ में यह अंश तीन खंडों (पंक्ति-समूहों) में छपा है, जिन पर कोई संख्या नहीं दी गई: पहले खंड में शरद के आगमन का वर्णन, दूसरे में कपास व धागे के सहारे का वर्णन, और तीसरे में गिरकर बच जाने पर निडरता का वर्णन है। कविता मुक्त छंद में है: इसमें कोई बँधी तुक-योजना या टेक नहीं, और पंक्तियाँ अलग-अलग लंबाई की हैं।
प्र. कविता के पहले खंड के आधार पर ‘भादो के बाद प्रकृति में आए परिवर्तन’ का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर: सबसे तेज़ बौछारों के साथ भादो (बरसात का महीना; पाठ की भूमिका इसे अँधेरे से जोड़ती है) चला जाता है। खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा होता है। शरद मानो एक साइकिल-सवार की तरह पुलों को पार करते हुए आता है: नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते, ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजाते, और पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को चमकीले इशारों से बुलाते हुए। शरद आकाश को इतना मुलायम बना देती है कि पतंग ऊपर उठ सके, दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़, सबसे पतला कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके, और सीटियों, किलकारियों व तितलियों की इतनी नाज़ुक दुनिया शुरू हो सके।
प्र. पतंग के लिए ‘सबसे हलकी और रंगीन चीज़’, ‘सबसे पतला कागज़’ और ‘सबसे पतली कमानी’ जैसे विशेषणों का प्रयोग क्यों किया गया है?
उत्तर: पतंग को आकाश में ऊँचा उड़ने के लिए बेहद हलका होना ज़रूरी है, इसलिए कवि ने उसे बनाने वाली चीज़ों, कागज़ और बाँस की कमानी, को ‘सबसे पतला’ और ‘सबसे पतली’ कहा है। यह अतिशयोक्ति (बढ़ा-चढ़ाकर कहना) पतंग की नाज़ुकता, हल्केपन और उसकी सुंदरता (रंगीन होने) दोनों को उभारती है, और इसे बच्चों की कोमल, नाज़ुक पर उत्साही दुनिया के संकेत के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
प्र. कविता के दूसरे खंड के आधार पर बताइए कि बच्चों और पतंगों के बीच का संबंध कैसा दर्शाया गया है।
उत्तर: बच्चे जन्म से ही अपने साथ कपास लाते हैं (इसे कोमलता का संकेत माना जा सकता है)। वे बेसुध दौड़ते हैं, छतों को भी नरम बनाते और दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए, डाल की तरह लचीले वेग से अकसर छतों के खतरनाक किनारों तक पहुँचते हैं। वहाँ गिरने से बचाता है सिर्फ़ उनके रोमांचित शरीर का संगीत। पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें महज़ एक धागे के सहारे थामे रखती हैं, और बच्चे भी मानो पतंगों के साथ, अपने रंध्रों के सहारे, उड़ ही रहे होते हैं। इस संबंध को साहस, विश्वास और गहरे भावनात्मक जुड़ाव के रूप में पढ़ा जा सकता है।
प्र. ‘पतंग’ कविता में मुक्त छंद और मानवीकरण के उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए कि ये काव्य-प्रयुक्तियाँ क्या हैं।
उत्तर: मुक्त छंद वह रचना-शैली है जिसमें कोई निश्चित तुक-योजना या मात्रा-बंधन नहीं होता; ‘पतंग’ मुक्त छंद में है, इसकी पंक्तियाँ अलग-अलग लंबाई की हैं और इसमें कोई बँधी तुक या टेक नहीं। मानवीकरण में प्रकृति को मनुष्य जैसी क्रिया करते दिखाया जाता है, जैसे ‘शरद आया…अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए, घंटी बजाते हुए’ में शरद ऋतु को मनुष्य की तरह साइकिल चलाते और घंटी बजाते दिखाया गया है, यह मानवीकरण का स्पष्ट उदाहरण है।
प्र. कविता के अंतिम खंड के आधार पर कविता के अंत में व्यक्त साहस के भाव को समझाइए।
उत्तर: अंतिम खंड पाठ में छपे अंश का सबसे छोटा खंड है। इसमें कहा गया है कि अगर बच्चे कभी छतों के खतरनाक किनारों से गिरते हैं और बच जाते हैं, तब तो हार मानने या डरने के बजाय वे और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं। पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई उनके बेचैन पैरों के पास आती है। इसे जोखिम उठाने और उससे उबरने पर मिलने वाले आत्मबल के चित्र के रूप में पढ़ा जा सकता है; पाठ की भूमिका भी कहती है कि भय पर विजय पाते बच्चे गिर-गिरकर सँभलते हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. ‘पतंग’ कविता के आधार पर बचपन की उमंगों और साहस का चित्रण विस्तार से कीजिए।
उत्तर: पतंग बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना है; आसमान में उड़ती पतंग उँचाइयों की वे हदें हैं जिन्हें बालमन छूना चाहता है और उसके पार जाना चाहता है। पहले खंड में शरद ऋतु के आगमन के साथ पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को बुलावा मिलता है, आकाश मुलायम होता है ताकि सबसे हलकी, रंगीन चीज़ उड़ सके। दूसरे खंड में बच्चे, जो जन्म से ही अपने साथ कपास लाते हैं, बेसुध दौड़ते हुए अकसर छतों के खतरनाक किनारों तक चले जाते हैं, जहाँ गिरने से बचाता है सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत, यानी उनका अपना उत्साह, कोई बाहरी वस्तु नहीं। तीसरे खंड में अगर वे गिरकर बच जाते हैं, तो और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं। पाठ की भूमिका के अनुसार ये भय पर विजय पाते बच्चे हैं, जो गिर-गिरकर सँभलते हैं और हर बार नयी-नयी पतंगों को सबसे ऊँचा उड़ाने का हौसला लिए शरद की प्रतीक्षा करते हैं।
प्र. ‘पतंग’ कविता में प्रयुक्त प्रमुख बिंबों और प्रतीकों की सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर: दृश्य बिंब: ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा’ सवेरे की लालिमा को जीवंत करता है (उपमा)। ध्वन्यात्मक बिंब: ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए’ और शरद की घंटी की आवाज़ ध्वनि-चित्र रचते हैं। मानवीकरण: ‘शरद आया पुलों को पार करते हुए / अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए’ में ऋतु को मनुष्य जैसी क्रियाएँ करते दिखाया गया है। प्रतीक: पाठ की भूमिका भादो को अँधेरे और शरद को उजाले से जोड़ती है, और पतंग को बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना कहती है। कपास को बच्चों की कोमलता का संकेत, और ‘महज़ एक धागे’ को बच्चों और ऊँचाइयों के नाज़ुक जुड़ाव के रूप में पढ़ा जा सकता है। ये सभी बिंब-प्रतीक मिलकर कविता को एक जीवंत, बहुसंवेदी अनुभव बना देते हैं।
प्र. ‘पतंग’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए और बताइए कि यह मुक्त छंद की कसौटी पर कैसे खरी उतरती है।
उत्तर: सारांश: भादो की सबसे तेज़ बौछारें चली जाती हैं, शरद ऋतु मानो पुलों को पार करते हुए, साइकिल पर, घंटी बजाते हुए बच्चों को पतंग उड़ाने बुलाती है, आकाश इतना मुलायम हो जाता है कि सबसे हलकी-पतली चीज़ भी उड़ सके (पहला खंड)। बच्चे, जो जन्म से ही अपने साथ कपास लाते हैं, बेसुध दौड़ते हुए अकसर छतों के खतरनाक किनारों तक जाते हैं, जहाँ उन्हें बचाता है सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत; पतंगों की ऊँचाइयाँ उन्हें महज़ एक धागे के सहारे थाम लेती हैं (दूसरा खंड)। गिरकर बच जाने पर वे और भी निडर हो जाते हैं (तीसरा खंड)। मुक्त छंद की कसौटी: कोई निश्चित तुक-योजना या मात्रा-बंधन नहीं, पंक्तियाँ भाव के प्रवाह में लंबी-छोटी हैं (‘सवेरा हुआ’ से लेकर ‘पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे’ तक), और कोई टेक नहीं दोहराई जाती; ये मुक्त छंद के लक्षण इस कविता में स्पष्ट दिखते हैं।
प्र. आलोक धन्वा की काव्य-यात्रा और उनकी लेखन-शैली की विशेषताएँ, ‘पतंग’ कविता के संदर्भ में, विस्तार से लिखिए।
उत्तर: जीवन-परिचय: जन्म 1948 मुंगेर, लेखन-आरंभ 1972 से, पहली कविता ‘जनता का आदमी’, उसके बाद ‘भागी हुई लड़कियाँ’, ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ से प्रसिद्धि। लोकप्रियता: सातवें-आठवें दशक में बहुत छोटी अवस्था में गिनी-चुनी कविताओं से अपार लोकप्रियता; 1972-1973 में प्रकाशित आरंभिक कविताएँ हिंदी के अनेक गंभीर काव्यप्रेमियों को ज़बानी याद रही हैं; आलोचकों के अनुसार उनके प्रभाव का मूल्यांकन अभी ठीक से हुआ नहीं है। थोक के भाव में लेखन नहीं: व्यापक ख्याति से बनी अपेक्षाओं के दबाव के चलते उन्होंने कभी थोक के भाव में लेखन नहीं किया; 26 वर्षों में केवल एक संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ (1998)। सामाजिक सक्रियता: सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यकर्ता, जमशेदपुर में अध्ययन-मंडलियाँ, रंगकर्म तथा साहित्य पर अतिथि व्याख्याता। ‘पतंग’ में झलक: बालसुलभ इच्छाओं और उमंगों का चित्रण, और प्रकृति के परिवर्तन व बाल-क्रियाकलापों के लिए सुंदर बिंबों का उपयोग (पाठ की भूमिका)।
प्र. पाठ में छपे अंश के तीनों खंडों की तुलना विषय, भाव और लंबाई के आधार पर कीजिए।
उत्तर: पहला खंड (सबसे लंबा): विषय, भादो के बाद शरद का आगमन; भाव, उत्सुकता और नयेपन का उल्लास; प्रमुख बिंब, पुल, साइकिल, घंटी, मुलायम आकाश। दूसरा खंड (मध्यम लंबाई): विषय, बच्चों की दौड़ और छत के किनारों तक का साहसिक सफ़र; भाव, रोमांच और उत्साह; प्रमुख बिंब, कपास, मृदंग, धागा, रंध्र। तीसरा खंड (सबसे छोटा): विषय, गिरकर बच जाने पर की प्रतिक्रिया; भाव, निडरता; प्रमुख बिंब, सुनहला सूरज, और भी तेज़ घूमती पृथ्वी। तीनों खंडों को मिलाकर बचपन के उत्साह से लेकर साहस तक की एक यात्रा के रूप में पढ़ा जा सकता है।
5 केस स्टडी
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके।
(क) 2 अंक इस अंश में शरद ऋतु के आगमन को किस काव्य-प्रयुक्ति से दिखाया गया है?
उत्तर: मानवीकरण से, शरद को साइकिल चलाते, घंटी बजाते और इशारों से बुलाते हुए, यानी मनुष्य जैसी क्रियाएँ करते हुए दिखाया गया है।
(ख) 2 अंक ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा’ में कौन-सा अलंकार है और क्यों?
उत्तर: यह उपमा अलंकार है, क्योंकि सवेरे की लालिमा की तुलना ‘जैसा’ शब्द के प्रयोग से खरगोश की आँखों से की गई है।
(ग) 2 अंक आकाश को मुलायम बनाने का क्या उद्देश्य बताया गया है?
उत्तर: ताकि पतंग ऊपर उठ सके, और दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़, सबसे पतला कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी भी उड़ सके।
सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
(क) 2 अंक इस अंश में बच्चों को गिरने से क्या बचाता है, और इसका क्या भाव है?
उत्तर: उन्हें सिर्फ़ उनके अपने रोमांचित (उत्साहित) शरीर का संगीत बचाता है, यह दर्शाता है कि खतरे के सामने बच्चों का सहारा उनका अपना रोमांचित, उत्साही मन है, कोई बाहरी वस्तु नहीं।
(ख) 2 अंक ‘महज़ एक धागे के सहारे’ पंक्ति का प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: धागा बच्चों और पतंगों की ऊँचाइयों के बीच का एकमात्र, नाज़ुक जुड़ाव है (‘महज़ एक धागे के सहारे’)। इसे जीवन की डोर या किसी लक्ष्य तक पहुँचने के छोटे पर भरोसेमंद सहारे के प्रतीक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
(ग) 2 अंक ‘अपने रंध्रों के सहारे उड़ना’ पंक्ति से बच्चों के भावनात्मक जुड़ाव के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर: पता चलता है कि बच्चे पतंग उड़ाने में इतने डूब जाते हैं कि छतों पर होते हुए भी, अपने रंध्रों (रोम-छिद्रों) के सहारे मानो वे भी पतंगों के साथ आकाश में उड़ रहे हों, यह उनके पूर्ण तादात्म्य (एकाकार होने) को दर्शाता है।