- आलोक धन्वा का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और सम्मान
- ‘पतंग’ कविता किस बड़ी कविता का हिस्सा है और पाठ्यपुस्तक में क्या छपा है
- पाठ में छपे अंश के तीनों खंडों का सरल भावार्थ, क्रम से
- पतंग, कपास, धागा और भादो-शरद जैसे प्रमुख बिंब व प्रतीकों का अर्थ
- कविता की मुक्त छंद शैली और उसमें प्रयुक्त काव्य-सौंदर्य पहचानना
- अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
1 कवि परिचय: आलोक धन्वा
आलोक धन्वा हिंदी के उन कवियों में हैं जिन्होंने बहुत कम लिखा, पर जो कुछ लिखा वह पाठकों की ज़ुबान पर चढ़ गया। उन्होंने बहुत छोटी अवस्था में ही, गिनी-चुनी कविताओं से अपार लोकप्रियता पा ली थी। सन् 1972-1973 में प्रकाशित उनकी आरंभिक कविताएँ हिंदी के अनेक गंभीर काव्यप्रेमियों को ज़बानी याद रही हैं। आलोचकों का मानना है कि हिंदी कविता पर उनके प्रभाव का सही मूल्यांकन अभी तक नहीं हो पाया है।
1.1 प्रमुख रचनाएँ
आलोक धन्वा की रचनाओं की एक खास बात है उनकी बेहद कम मात्रा। लेखन शुरू करने के 26 साल बाद, सन् 1998 में, उनका पहला और अभी तक का एकमात्र काव्य संग्रह छपा।
पहली कविता
‘जनता का आदमी’ (1972 में प्रकाशित)
प्रसिद्धि दिलाने वाली कविताएँ
‘भागी हुई लड़कियाँ’, ‘ब्रूनो की बेटियाँ’
एकमात्र काव्य संग्रह
‘दुनिया रोज़ बनती है’ (1998)
‘आलोक धन्वा की कोई दो रचनाओं के नाम लिखिए’ या ‘उनके एकमात्र काव्य संग्रह का नाम बताइए’ जैसे प्रश्नों के लिए ऊपर के तीनों कार्ड याद रखें।
1.2 प्रमुख सम्मान
आलोक धन्वा को चार प्रमुख सम्मान मिले हैं: राहुल सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का साहित्य सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान और पहल सम्मान।
1.3 लेखन-शैली और सक्रियता
“थोक के भाव में लेखन” का अर्थ है ढेर सारी रचनाएँ जल्दी-जल्दी लिखना। पाठ के अनुसार, “इतनी व्यापक ख्याति के बावजूद या शायद उसी की वजह से बनी हुई अपेक्षाओं के दबाव के चलते, आलोक धन्वा ने कभी थोक के भाव में लेखन नहीं किया।” सन् 72 से लेखन आरंभ करने के बाद उनका पहला और अभी तक का एकमात्र काव्य संग्रह सन् 98 में प्रकाशित हुआ।
काव्य-लेखन के अलावा, पिछले दो दशकों से आलोक धन्वा देश के विभिन्न हिस्सों में एक सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं।
आलोक धन्वा ने जमशेदपुर में अध्ययन-मंडलियों (पढ़ने-लिखने के छोटे समूहों) का संचालन किया, और रंगकर्म तथा साहित्य विषयों पर कई राष्ट्रीय संस्थानों व विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता के रूप में भी भाग लिया।
2 कविता का परिचय: पतंग
पाठ्यपुस्तक में दी गई ‘पतंग’ आलोक धन्वा के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ का ही हिस्सा है, पर एक ज़रूरी बात ध्यान रखने की है: ‘पतंग’ असल में एक लंबी कविता है, और पाठ्यपुस्तक में उसका तीसरा भाग शामिल किया गया है। यानी आप जो कविता यहाँ पढ़ रहे हैं वह पूरी कविता नहीं, उसका एक अंश है।
मुक्त छंद (Free Verse) वह काव्य-रचना है जिसमें न तो कोई निश्चित तुक-योजना (rhyme) होती है और न मात्रा या छंद का कोई बंधा हुआ नियम। पंक्तियाँ भाव के प्रवाह के अनुसार छोटी-बड़ी होती रहती हैं। ‘पतंग’ मुक्त छंद में लिखी कविता है, इसमें बँधी हुई टेक या अंतरे नहीं मिलते।
पतंग के बहाने इस कविता में बालसुलभ इच्छाओं एवं उमंगों का सुंदर चित्रण किया गया है। … पतंग बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना है।
पाठ की भूमिका से
आसमान में उड़ती पतंग उन ऊँचाइयों की हद है जिन्हें बालमन छूना चाहता है और उसके भी पार जाना चाहता है। कविता धीरे-धीरे बिंबों की एक नई दुनिया में ले जाती है, जहाँ शरद ऋतु का चमकीला इशारा है, तितलियों की रंगीन दुनिया है, दिशाओं के मृदंग बजते हैं। एक ओर छतों के खतरनाक कोने से गिरने का भय है, तो दूसरी ओर उस भय पर विजय पाते, गिर-गिरकर सँभलते बच्चे हैं, जिनके पास पृथ्वी का हर कोना खुद-ब-खुद चला आता है।
3 पाठ्यपुस्तक में दिया गया अंश
“सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके—
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके—
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके—
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाज़ुक दुनिया
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
छतों के खतरनाक किनारों तक—
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।”
4 खंड-वार सरल भावार्थ
पाठ्यपुस्तक में यह अंश तीन खंडों (पंक्ति-समूहों) में छपा है। पाठ में इन खंडों की कोई संख्या नहीं दी गई है; यहाँ समझने की सुविधा के लिए इन्हें खंड 1, 2, 3 कहा गया है। इन्हें क्रम से समझते हैं:
अंश के इन तीन खंडों को कविता के ‘अंतरे’ न लिखें, यह कविता मुक्त छंद में है, बँधे अंतरों वाली गीत-रचना नहीं। इन खंडों को कविता के ‘भाग 1, 2, 3’ भी न कहें: पाठ्यपुस्तक में पूरी लंबी कविता ‘पतंग’ का तीसरा भाग छपा है, और ये तीनों खंड उसी तीसरे भाग के हैं।
5 प्रमुख बिंब और प्रतीक
बिंब (Imagery) कविता में शब्दों से बनाया गया वह मानसिक चित्र है जो पाठक की इंद्रियों (आँख, कान, स्पर्श) को छूकर किसी दृश्य या ध्वनि को सजीव कर देता है, जैसे ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा’ एक दृश्य बिंब है और ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाना’ एक ध्वन्यात्मक (ध्वनि से जुड़ा) बिंब है।
प्रतीक (Symbol) वह वस्तु या शब्द है जो अपने शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ एक गहरा, छिपा हुआ भाव भी व्यक्त करता है। इस कविता में ‘पतंग’ बच्चों की उमंगों और ऊँची उड़ान भरने की चाह का प्रतीक है।

| बिंब / प्रतीक | पंक्ति में स्थान | अर्थ |
|---|---|---|
| खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा | खंड 1 | उपमा अलंकार, सवेरे की लालिमा का दृश्य बिंब |
| शरद आया पुलों को पार करते हुए | खंड 1 | ऋतु का मानवीकरण: शरद मानो पुलों को पार करके, नए मौसम के रूप में आता है (गतिशील दृश्य बिंब) |
| शरद का साइकिल पर, घंटी बजाते आना | खंड 1 | ऋतु का मानवीकरण, नयेपन व उत्साह का बिंब |
| कपास | खंड 2 | इसे बच्चों की कोमलता और हल्केपन के संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है |
| दिशाओं को मृदंग की तरह बजाना | खंड 2 | ध्वन्यात्मक बिंब; ‘मृदंग की तरह’ में उपमा |
| रोमांचित शरीर का संगीत | खंड 2 | पाठ के अनुसार गिरने से बचाता है ‘सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत’, यानी बच्चों का अपना उत्साह, कोई बाहरी वस्तु नहीं |
| महज़ एक धागा | खंड 2 | बच्चों और पतंगों की ऊँचाइयों के बीच का नाज़ुक जुड़ाव (केवल एक धागा) |
| भादो और शरद | खंड 1 | क्रमशः अँधेरे और उजाले के प्रतीक (पाठ की भूमिका में ‘भादो (अँधेरे)’ और ‘शरद (उजाला)’ लिखा है) |
| पतंग | इस अंश में | पाठ के अनुसार ‘बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना’; ऊँचाइयों की वे हदें जिन्हें बालमन छूना चाहता है |
6 काव्य-सौंदर्य
मुक्त छंद
न तुक-योजना, न बँधी मात्रा, भाव के अनुसार छोटी-बड़ी पंक्तियाँ।
शरद का पुलों को पार करते हुए आना, साइकिल चलाना और घंटी बजाना: ऋतु को इंसान जैसी क्रियाएँ करते दिखाना।
बिंब-योजना
दृश्य (लाल सवेरा, रंग-बिरंगी पतंगें) और ध्वन्यात्मक (घंटी, मृदंग, सीटियाँ) बिंबों का भरपूर प्रयोग।
विस्तृत रूपक
पतंग उड़ाने को इस अंश में बचपन के साहस, जोखिम उठाने और ऊँची उड़ान भरने की चाह के रूपक के रूप में पढ़ा जा सकता है।
कागज़-कमानी-धागा, भादो-शरद, कपास-मृदंग
ये तीन जोड़ियाँ याद रहें तो कविता के सभी प्रमुख बिंब अपने आप याद आ जाते हैं: पतंग किससे बनी है, मौसम कब बदला, और बच्चों की कोमलता व उत्साह किन बिंबों से दिखाई गई है।
- क्या मैं आलोक धन्वा का जन्म-वर्ष, स्थान और उनकी तीन प्रमुख रचनाएँ बिना देखे लिख सकता हूँ?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि पाठ्यपुस्तक में ‘पतंग’ कविता का कौन-सा भाग छपा है?
- क्या मैं अंश के तीनों खंडों का भावार्थ अपने शब्दों में क्रम से लिख सकता हूँ?
- क्या मैं कपास, धागा और भादो-शरद जैसे प्रतीकों का अर्थ समझा सकता हूँ?
- क्या मैं मुक्त छंद और मानवीकरण का एक-एक उदाहरण कविता से दे सकता हूँ?
- आलोक धन्वा: जन्म 1948 मुंगेर (बिहार); लेखन-आरंभ 1972; एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ (1998)
- चार सम्मान: राहुल, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, बनारसी प्रसाद भोजपुरी, पहल
- ‘पतंग’ एक लंबी कविता का तीसरा भाग है, न कि पूरी कविता
- खंड 1: भादो के बाद शरद का पुलों को पार करते हुए आगमन, आकाश का मुलायम होना; खंड 2: कपास, रोमांचित शरीर का संगीत, धागे का सहारा; खंड 3: गिरकर बच जाने पर और भी निडर होना
- मुक्त छंद, मानवीकरण और बिंब-योजना ही कविता का प्रमुख काव्य-सौंदर्य है