आत्मपरिचय और एक गीत — हरिवंश राय बच्चन

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • हरिवंश राय बच्चन का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और उनकी काव्य-शैली की मुख्य विशेषताएँ
  • हालावाद क्या है और उमर ख़य्याम के प्रभाव से यह कैसे जन्मा
  • ‘आत्मपरिचय’ कविता के हर अंतरे का सरल भावार्थ और उसमें छिपा जीवन-दर्शन
  • ‘एक गीत’ कविता में टेक (दुहराई जाने वाली पंक्ति) के ज़रिये समय और अकेलेपन का चित्रण
  • दोनों कविताओं में प्रयुक्त प्रमुख अलंकार और काव्य-सौंदर्य पहचानना
  • अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
हालावादप्रीतिकलहविरोधाभास अलंकारगीति काव्यटेकआत्मपरिचयएक गीत

1 कवि परिचय: हरिवंश राय बच्चन

चित्र 1 हरिवंश राय बच्चन के सम्मान में भारतीय डाक द्वारा 2003 में जारी डाक टिकट। चित्र: India Post, Government of India / Wikimedia Commons / GODL-India
चित्र 1 हरिवंश राय बच्चन के सम्मान में भारतीय डाक द्वारा 2003 में जारी डाक टिकट। चित्र: India Post, Government of India / Wikimedia Commons / GODL-India

हरिवंश राय बच्चन हिंदी के उन गिने-चुने कवियों में हैं जिनकी कविता आज भी स्कूल-कॉलेज से बाहर, आम पाठकों की ज़ुबान पर चढ़ी रहती है। उनका कार्यक्षेत्र साहित्य तक सीमित नहीं रहा, वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे, आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबद्ध रहे और फिर विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ रहे, पूरा जीवनक्रम (वर्षवार) नीचे समयरेखा में देखें।

1907इलाहाबाद में जन्म
1935प्रसिद्ध काव्य संग्रह ‘मधुशाला’ प्रकाशित
1938‘मधुबाला’ और ‘मधुकलश’ प्रकाशित
1942-1952इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक
बाद मेंविदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ
2003मुंबई में निधन

1.1 प्रमुख रचनाएँ

बच्चन जी की संपूर्ण रचनावली बाद में ‘बच्चन ग्रंथावली’ नाम से दस खंडों में प्रकाशित हुई। उनका लेखन कई विधाओं में फैला है:

हरिवंश राय बच्चन की रचनाएँ
काव्य संग्रहमधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल-अंतर, मिलनयामिनी, सतरंगिणी, आरती और अंगारे, नए पुराने झरोखे, टूटी-फूटी कड़ियाँ
आत्मकथा (चार खंड)क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक
अनुवादहैमलेट, जनगीता, मैकबेथ
डायरीप्रवासी की डायरी
परीक्षा संकेत

‘बच्चन जी की कोई दो रचनाओं के नाम लिखिए’ जैसे प्रश्न में ऊपर की सूची में से कोई भी दो नाम लिखे जा सकते हैं।

1.2 काव्य-शैली की विशेषता

दोनों महायुद्धों के बीच मध्यवर्ग के विक्षुब्ध, विकल मन को बच्चन ने वाणी का वरदान दिया। उन्होंने छायावाद की लाक्षणिक वक्रता के बजाय सीधी-सादी जीवंत भाषा और संवेदनसिक्त गेय शैली में अपनी बात कही, यानी उनकी कविता गाई जा सकने वाली और सरल है। बच्चन छायावादोत्तर गीतिकाव्य (छायावाद के बाद के गीत-प्रधान काव्य) के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं।

पाठ के अनुसार, व्यक्तिगत जीवन में घटी घटनाओं की सहज अनुभूति की ईमानदार अभिव्यक्ति बच्चन के यहाँ कविता बनकर प्रकट हुई। यही विशेषता हिंदी काव्य संसार में उनकी विलक्षण लोकप्रियता का मूल आधार है।

Learn by heartपरिभाषा 1

गीति काव्य (Lyrical Poetry) वह काव्य है जिसमें कवि अपने निजी भावों, अनुभूतियों और मनोदशा को गेय (गाने योग्य) शैली में, सरल और संगीतात्मक भाषा में व्यक्त करता है। बच्चन की दोनों कविताएँ, ‘आत्मपरिचय’ और ‘एक गीत’, गीति काव्य के उदाहरण हैं।

1.3 उमर ख़य्याम का प्रभाव और हालावाद

मध्ययुगीन फ़ारसी कवि उमर ख़य्याम का मस्तानापन (बेफ़िक्र, नशीला अंदाज़) बच्चन की प्रारंभिक कविताओं में, विशेषकर ‘मधुशाला’ में, एक अनोखे रूप में सामने आता है। इसमें जीवन को एक विस्तृत रूपक (extended metaphor) से समझाया गया है:

1

जीवन

मधुकलश (मधु/नशे का घड़ा) है

2

दुनिया

मधुशाला (शराबखाना) है

3

कल्पना

साकी (शराब परोसने वाला/वाली) है

4

कविता

वह प्याला है जिसमें ढालकर जीवन पाठक को पिलाया जाता है

Learn by heartपरिभाषा 2

हालावाद बच्चन के काव्य-दर्शन को दिया गया नाम है, जिसमें पूरी तन्मयता से जीवन का घूँट भरने और कड़वा-खट्टा भी सहज भाव से स्वीकार करने की बात कही गई है। पाठ के अनुसार तब अंततः एक सूफ़ियाना-सी बेखयाली (बेफ़िक्री) मन पर छाती है, एक के बहाने सारी दुनिया से इश्क हो जाता है और तेरा-मेरा के समस्त झगड़े काफ़ूर हो जाते हैं। पाठ इसे ‘बच्चन का हालावादी दर्शन’ कहता है।

सावधान

हालावाद को छायावाद समझने की भूल न करें। छायावाद हिंदी काव्य की एक अलग, पहले की धारा है, जिसकी ‘लाक्षणिक वक्रता’ के बजाय बच्चन ने सीधी-सादी भाषा अपनाई; हालावाद विशेष रूप से बच्चन के ‘हालावादी दर्शन’ से जुड़ा एक अलग नज़रिया है।

1.4 गद्य लेखन

बच्चन जी का कवि-रूप सबसे अधिक प्रसिद्ध है, लेकिन उन्होंने कहानी, नाटक और डायरी के साथ-साथ एक बेहतरीन आत्मकथा (चार खंडों में) भी लिखी। यह आत्मकथा ईमानदार आत्मस्वीकृति (अपनी कमज़ोरियों को भी खुलकर स्वीकार करना) और प्रांजल (सरल-सुंदर) शैली के कारण आज भी निरंतर पढ़ी जाती है।

क्या आप जानते हैं?

आरोह भाग 2 के काव्य खंड की शुरुआत में बहादुरशाह ज़फ़र की ग़ज़ल ‘लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में’ 1857 के 150 वर्ष होने पर दी गई है; यह बच्चन की रचना नहीं है।

2 कविता 1: आत्मपरिचय

‘आत्मपरिचय’ शीर्षक की यह कविता 10 अंतरों में बँटी है, प्रत्येक अंतरा 4 पंक्तियों का। पाठ के अनुसार पूरी कविता का सारांश एक पंक्ति में यह बनता है कि दुनिया से कवि का संबंध प्रीतिकलह (प्रेमपूर्ण नोक-झोंक) का है, और उसका जीवन विरुद्धों का सामंजस्य है।

पाठ यह भी कहता है कि अपने को जानना दुनिया को जानने से ज़्यादा कठिन है, समाज से व्यक्ति का नाता खट्टा-मीठा तो होता ही है, और जगजीवन से पूरी तरह निरपेक्ष रहना संभव नहीं; दुनिया चाहे जितना कष्ट दे, मनुष्य दुनिया से कटकर रह भी नहीं पाता।

Learn by heartपरिभाषा 3

प्रीतिकलह का अर्थ है प्रेम में होने वाली नोक-झोंक या मीठी कलह। पाठ के अनुसार पूरी कविता का सारांश यह है कि दुनिया से कवि का संबंध प्रीतिकलह का है।

Learn by heartठस्सा

पाठ के अनुसार विरुद्धों का सामंजस्य साधते-साधते कवि के व्यक्तित्व में ऐसी बेखुदी और मस्ती उतर आई है कि ‘दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ / बाज़ार से गुज़रा हूँ खरीदार नहीं हूँ’ जैसा कुछ कहने का ठस्सा पैदा हुआ है। पाठ कहता है: “यह ठस्सा ही छायावादोत्तर गीतिकाव्य का प्राण है।”

पूरी कविता: आत्मपरिचय

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ।
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ!

मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ।
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ।
जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!

मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना!

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता।
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना।
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ।
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

2.1 अंतरा-वार सरल भावार्थ

1

जग-जीवन का भार, फिर भी प्यार

कवि दुनियादारी का बोझ ढोता है, पर साथ ही प्रेम भी लिए फिरता है। वह ‘साँसों के दो तार’ लिए फिरता है, जिन्हें किसी ने छूकर झंकृत (गुंजायमान) कर दिया है; इन्हें जीवन की डोर के रूप में पढ़ा जा सकता है।

2

स्नेह-सुरा का पान

कवि प्रेम रूपी मदिरा का पान करता है और लोकप्रियता या जगत की राय की परवाह किए बिना अपने मन का गीत गाता है, यह उसकी आत्मनिष्ठ (subjective) रचना-दृष्टि है।

3

स्वप्नों का संसार

असली संसार अधूरा और अपूर्ण लगता है, इसलिए कवि अपनी कल्पना से बनाए स्वप्नों के संसार में जीता है।

4

भवसागर में मस्त बहना

जहाँ दुनिया भव-सागर तरने के लिए नाव बनाती है, वहीं कवि उसकी मौजों पर मस्ती से बहता है। इसे पलायन के बजाय स्वीकृति के रूप में पढ़ा जा सकता है।

5

उन्माद में अवसाद

कवि यौवन का उन्माद (मस्ती का आवेग) लिए फिरता है, पर उन्मादों में अवसाद भी है। बाहर से हँसता दिखता है, पर भीतर किसी की याद में रोता है, यह सुख-दुख का द्वंद्व है।

6

नादान वहीं है जहाँ दाना

कवि प्रश्न करता है कि यत्न करके भी सत्य किसने जाना? जहाँ अपने को ज्ञानी (दाना) समझने वाले होते हैं, वहीं मूर्खता (नादानी) भी छिपी होती है। कवि सीखा हुआ ज्ञान भुलाना सीख रहा है। इसे पांडित्य के अहंकार पर व्यंग्य के रूप में पढ़ा जा सकता है।

7

मैं और, जग और

कवि स्वयं को दुनिया से बिलकुल अलग मानता है। दुनिया जिस धरती पर धन-वैभव जोड़ती है, कवि हर कदम से उसी धरती को ठुकराता है। इसे भौतिकवाद-विरोधी सोच के रूप में पढ़ा जा सकता है।

8

खंडहर का भाग

राजाओं के महल जिस वैभव पर वारे जाते हैं, कवि उस वैभव को नहीं, बल्कि खंडहर (विनाश-अवशेष) के हिस्से को अपनाता है, यानी दिखावटी शान से ज़्यादा सच्चाई को गले लगाना।

9

रोना बनाम गाना

कवि का रोना दुनिया ‘गाना’ समझती है, उसका फूट पड़ना ‘छंद बनाना’ कहलाता है। कवि पूछता है: जब वह स्वयं को दुनिया का एक नया ‘दीवाना’ मानता है, तो लोग उसे ‘कवि’ की उपाधि क्यों देते हैं?

10

मस्ती का संदेश

कवि दीवानों जैसा वेश और पूरी (निःशेष) मादकता लिए फिरता है। उसका लक्ष्य है ऐसा मस्ती भरा संदेश देना जिसे सुनकर पूरी दुनिया झूम उठे।

याद रखने की तरकीब

भार-प्यार, उन्माद-अवसाद, राग-आग

कविता में बार-बार आने वाली तीन विरोधी-भाव जोड़ियाँ ये हैं: ‘जग-जीवन का भार’ और ‘जीवन में प्यार’, ‘यौवन का उन्माद’ और ‘उन्मादों में अवसाद’, ‘रोदन में राग’ और ‘शीतल वाणी में आग’।

2.2 काव्य-सौंदर्य

प्रमुख अलंकार व विशेषताएँ
विरोधाभास अलंकार, प्रतीकात्मकता, गीति शैली, आत्मकथात्मक लहजा
Learn by heartपरिभाषा 4

विरोधाभास अलंकार वह अलंकार है जिसमें ऊपर से देखने पर दो बातें एक-दूसरे का खंडन करती लगती हैं, पर गहराई से देखने पर उनमें कोई विरोध नहीं रहता और एक गहरा सत्य प्रकट होता है, जैसे ‘शीतल वाणी में आग’ या ‘उन्मादों में अवसाद’।

3 कविता 2: एक गीत

‘एक गीत’ बच्चन के गीत-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ से ली गई है। पाठ के अनुसार इस गीत में प्रकृति की दैनिक परिवर्तनशीलता (दिन का ढलना) के संदर्भ में प्राणि-वर्ग (विशेषकर मनुष्य) के धड़कते हृदय को सुनने की काव्यात्मक कोशिश है। कविता तीन अंतरों में है। टेक (दुहराई जाने वाली पंक्ति) कविता के आरंभ में एक बार आती है और हर अंतरे के अंत में दोहराई जाती है।

Learn by heartपरिभाषा 5

टेक (पुनरावृत्ति/Refrain) गीत की वह पंक्ति है जो हर अंतरे में बार-बार दोहराई जाती है और कविता के मूल भाव को रेखांकित करती है। ‘एक गीत’ में टेक है: ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’

पूरी कविता: एक गीत

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं,
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे,
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

3.1 अंतरा-वार सरल भावार्थ

अंतरा 1राह में कहीं रात न हो जाए, मंज़िल भी दूर नहीं, यही सोचकर दिन भर का थका हुआ पथिक भी तेज़ी से चलने लगता है।
↓
अंतरा 2बच्चे प्रत्याशा (आशा) में नीड़ों से झाँक रहे होंगे, यही सोच पक्षियों के पंखों में चंचलता भर देती है, वे तेज़ी से घोंसले लौटते हैं।
↓
अंतरा 3कवि पूछता है: मुझसे मिलने को कौन व्याकुल है? मैं किसके लिए बेचैन होऊँ? यह प्रश्न उसके कदम धीमे कर देता है और हृदय में विह्वलता (व्याकुलता) भर देता है।
सामान्य भूल

पहले दो अंतरों के कारण अलग-अलग हैं: पथिक रात होने से पहले मंज़िल तक पहुँचना चाहता है (राह में रात न हो जाए, मंज़िल भी दूर नहीं), और पक्षी इसलिए जल्दी लौटते हैं क्योंकि उनके बच्चे प्रत्याशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे। पथिक की प्रतीक्षा करने वाले किसी व्यक्ति की बात कविता में नहीं है। तीसरे अंतरे में कवि पूछता है, ‘मुझसे मिलने को कौन विकल?’, और यही प्रश्न उसके पद शिथिल कर देता है। इस विरोधाभासी मोड़ को भूलकर तीनों अंतरों को एक जैसा न समझें।

3.2 काव्य-सौंदर्य

टेक ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ की बार-बार आवृत्ति (पुनरुक्ति, साथ ही ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश) से समय के तेज़ी से बीतने का बोध होता है और गीत गेय बनता है। पाठ के अनुसार बहुत ही सरल, सर्वानुभूत बिंबों (पथिक, पक्षी) के ज़रिये किसी अगोचर सत्य की रूहानी छुअन महसूस करा देना बच्चन की अलग विशेषता है, और यह गीत उसका एक बेहतर नमूना है। अंतिम अंतरे में स्वर कवि के अपने प्रश्न की ओर मुड़ जाता है; इसे कवि के निजी अकेलेपन के रूप में पढ़ा जा सकता है।

Learn by heartगीत का बड़ा सत्य (पाठ के अनुसार)

किसी प्रिय आलंबन या विषय से भावी साक्षात्कार का आश्वासन ही हमारे प्रयास के पगों की गति में चंचल तेज़ी भर सकता है; अन्यथा हम शिथिलता और फिर जड़ता को प्राप्त होने के अभिशप्त हो जाते हैं। गीत इस बड़े सत्य के साथ समय के गुज़रते जाने के एहसास में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ कर गुज़रने का जज़्बा भी लिए हुए है।

4 दोनों कविताओं की तुलना

आत्मपरिचय

  • 10 बड़े अंतरे, आत्मकथात्मक और दार्शनिक लहजा
  • केंद्रीय भाव: प्रीतिकलह, विरोधों का सामंजस्य
  • स्वर: अपने विरोधी भावों को स्वीकारते हुए अपना परिचय

एक गीत

  • 3 छोटे अंतरे, एक टेक के साथ गीत-शैली
  • भाव: समय के गुज़रने का एहसास; प्रिय से मिलने का आश्वासन ही गति में तेज़ी भरता है; लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ कर गुज़रने का जज़्बा
  • स्वर: दिन ढलने की जल्दी, अंत में विह्वलता
कविता के आसपास और आपसदारी (पाठ के प्रश्न)

पाठ पूछता है कि संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है। आपसदारी में जयशंकर प्रसाद की ‘आत्मकथ्य’ कविता की कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं और पूछा गया है कि क्या ‘आत्मपरिचय’ से इसका कोई संबंध दिखाई देता है। दोनों के उत्तर NCERT समाधान में दिए गए हैं।

सभी परिभाषाएँ एक साथ
गीति काव्यकवि के निजी भावों को गेय, सरल शैली में व्यक्त करने वाला काव्य
हालावादबच्चन का काव्य-दर्शन: जीवन के हर घूँट को सहज भाव से स्वीकार करना
प्रीतिकलहप्रेम में होने वाली मीठी नोक-झोंक: बच्चन और संसार का संबंध
विरोधाभास अलंकारऊपर से विरोधी लगने वाली बातों में गहरा सत्य छिपा होना
टेकगीत में हर अंतरे में दोहराई जाने वाली पंक्ति
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं बच्चन का जन्म-निधन वर्ष और दो प्रमुख रचनाएँ बिना देखे लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं हालावाद को उमर ख़य्याम और मधुशाला के रूपक से जोड़कर समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं ‘आत्मपरिचय’ के किसी भी अंतरे का भावार्थ अपने शब्दों में लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं ‘एक गीत’ की टेक और उसके काव्यात्मक प्रभाव को समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं दोनों कविताओं में एक-एक उदाहरण देकर विरोधाभास अलंकार पहचान सकता हूँ?
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • बच्चन: 1907 इलाहाबाद – 2003 मुंबई; प्रमुख रचनाएँ व कार्यक्षेत्र के लिए ऊपर की समयरेखा देखें
  • हालावाद, प्रीतिकलह, टेक और विरोधाभास अलंकार, चारों परिभाषाएँ ऊपर की ‘सभी परिभाषाएँ एक साथ’ सूची में हैं
  • आत्मपरिचय के सभी 10 अंतरों का भावार्थ एक बार सरसरी निगाह से दोहरा लें
  • एक गीत: पथिक की जल्दी का कारण रात और दूरी, पक्षियों की जल्दी का कारण प्रतीक्षारत बच्चे, और तीसरे अंतरे में कवि का प्रश्न ‘मुझसे मिलने को कौन विकल?’