- कुँवर नारायण का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और सम्मान
- ‘कविता के बहाने’ की पूरी कविता, बंद-दर-बंद सरल भावार्थ के साथ
- ‘बात सीधी थी पर’ की पूरी कविता, भाग-दर-भाग सरल भावार्थ के साथ
- दोनों कविताओं के प्रमुख बिंब, प्रतीक और अलंकार पहचानना
- दोनों कविताओं की मुक्त छंद शैली और काव्य-सौंदर्य समझना
- अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
1 कवि परिचय: कुँवर नारायण
‘गर्द से ढँकी हर पुरानी किताब खोलने की बात कहने वाले’ कुँवर नारायण ने सन् 1950 के आस-पास काव्य-लेखन की शुरुआत की। पाठ के अनुसार, सीधी घोषणाएँ और फ़ैसले उनकी कविताओं में नहीं मिलते, क्योंकि जीवन को मुकम्मल तौर पर समझने वाला एक खुलापन उनके कवि-स्वभाव की मूल विशेषता है। इसीलिए संशय, संभ्रम (उलझन) और प्रश्नाकुलता (सवाल पूछते रहने की आदत) उनकी कविता के बीज शब्द हैं। वे पूरी तरह नागर संवेदना, यानी शहरी संवेदनशीलता, के कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में विवरण (लंबा वर्णन) बहुत कम मिलता है, पर वैयक्तिक और सामाजिक ऊहापोह (उधेड़बुन) का तनाव पूरी व्यंजकता में सामने आता है। पाठ एक पंक्ति में कहता है: “इनकी तटस्थ वीतराग दृष्टि नोच-खसोट, हिंसा-प्रतिहिंसा से सहमे हुए एक संवेदनशील मन के आलोड़नों के रूप में पढ़ी जा सकती है।”
न जाने कब से बंद / एक दिन इस तरह खुला घर का दरवाज़ा / जैसे गर्द से ढँकी / एक पुरानी किताब
पाठ के आरंभ में दी गई कुँवर नारायण की पंक्तियाँ
1.1 प्रमुख रचनाएँ
कुँवर नारायण ने कई विधाओं में लिखा: कविता के अलावा चिंतनपरक लेख, कहानियाँ और सिनेमा तथा अन्य कलाओं पर समीक्षाएँ भी लिखीं, किंतु कविता की विधा को उनके सृजन-कर्म में हमेशा प्राथमिकता प्राप्त रही। नई कविता के दौर में, जब प्रबंधत्व की दावेदार लंबी कविताएँ प्रबंध काव्य की जगह लेने लगीं, तब उन्होंने ‘आत्मजयी’ जैसा प्रबंध काव्य रचकर भरपूर प्रतिष्ठा पाई।
काव्य संग्रह (5)
चक्रव्यूह (1956), परिवेश: हम तुम, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों
प्रबंध काव्य
आत्मजयी
कहानी संग्रह
आकारों के आस-पास
समीक्षा और साक्षात्कार
आज और आज से पहले (समीक्षा); मेरे साक्षात्कार
‘कुँवर नारायण के किन्हीं दो काव्य संग्रहों के नाम लिखिए’ या ‘आत्मजयी किस विधा की रचना है’ जैसे प्रश्नों के लिए ऊपर के चारों कार्ड याद रखें, पर ध्यान रहे कि आत्मजयी एक काव्य संग्रह नहीं, प्रबंध काव्य है।
1.2 प्रमुख पुरस्कार
कुँवर नारायण को सात प्रमुख पुरस्कार मिले: साहित्य अकादेमी पुरस्कार, कुमारन आशान पुरस्कार, व्यास सम्मान, प्रेमचंद पुरस्कार, लोहिया सम्मान, कबीर सम्मान और ज्ञानपीठ पुरस्कार।
आलोचकों के अनुसार कुँवर नारायण की कविता में व्यर्थ का उलझाव, अखबारी सतहीपन और वैचारिक धुंध नहीं, बल्कि संयम, परिष्कार और साफ़-सुथरापन मिलता है। भाषा और विषय की विविधता उनकी विशेष पहचान है। उनकी कविता में यथार्थ का खुरदरापन भी है और उसका सहज सौंदर्य भी।

2 कविता 1: कविता के बहाने का परिचय
‘कविता के बहाने’ कुँवर नारायण के संग्रह ‘इन दिनों’ से ली गई है, और पाठ्यपुस्तक में पूरी कविता दी गई है, कोई अंश नहीं। आज का समय कविता के वजूद (अस्तित्व) को लेकर आशंकित है: शक है कि यांत्रिकता (मशीनीकरण) के दबाव से कविता बचेगी नहीं। ऐसे में यह कविता, कविता की अपार संभावनाओं को टटोलने (खोजने) का एक अवसर देती है।
कविता के बहाने यह एक यात्रा है जो चिड़िया, फूल से लेकर बच्चे तक की है। एक ओर प्रकृति है दूसरी ओर भविष्य की ओर कदम बढ़ाता बच्चा।
पाठ की भूमिका से
चिड़िया की उड़ान की एक सीमा है, फूल के खिलने की भी एक निश्चित परिणति (अंत) है, पर बच्चे के सपने असीम हैं और बच्चों के खेल में किसी प्रकार की सीमा का कोई स्थान नहीं होता। कविता भी शब्दों का ऐसा ही खेल है, जिसमें जड़-चेतन, अतीत-वर्तमान-भविष्य सब केवल उपकरण (साधन मात्र) हैं। इसीलिए जहाँ कहीं रचनात्मक ऊर्जा होगी, वहाँ सीमाओं के बंधन खुद-ब-खुद टूट जाते हैं, चाहे वह घर की सीमा हो, भाषा की सीमा हो या समय की।
3 कविता के बहाने: पूरी कविता
“कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने
बाहर भीतर
इस घर, उस घर
कविता के पंख लगा उड़ने के माने
चिड़िया क्या जाने?
कविता एक खिलना है फूलों के बहाने
कविता का खिलना भला फूल क्या जाने!
बाहर भीतर
इस घर, उस घर
बिना मुरझाए महकने के माने
फूल क्या जाने?
कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने।”
4 कविता के बहाने: बंद-वार सरल भावार्थ
यह कविता तीन बंदों में बँटी है, हर बंद एक अलग “बहाने” (चिड़िया, फूल, बच्चे) पर टिका है, और तीनों का ढाँचा लगभग एक जैसा दोहराया गया है:
तीनों बंदों की तुलना में ध्यान रखें कि तीसरे बंद का अंत बाकी दोनों से अलग है: “चिड़िया/फूल क्या जाने?” (प्रश्नवाचक, नकारात्मक) बदलकर “बच्चा ही जाने।” (सकारात्मक कथन) हो जाता है। यह परिवर्तन कविता के अंत की विशेषता है; कविता का केंद्रीय भाव पाठ के अनुसार यह है कि जहाँ रचनात्मक ऊर्जा होगी, वहाँ सीमाओं के बंधन खुद-ब-खुद टूट जाते हैं।
5 कविता 2: बात सीधी थी पर का परिचय
‘बात सीधी थी पर’ कुँवर नारायण के संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है, और यह भी पाठ्यपुस्तक में पूरी कविता के रूप में दी गई है। यह कविता कथ्य (बात/विषय) और माध्यम (भाषा) के द्वंद्व को उकेरते हुए भाषा की सहजता की बात करती है।
कथ्य और माध्यम का द्वंद्व का अर्थ है जो बात (कथ्य) मन में सीधी और स्पष्ट होती है, उसे सही शब्दों (माध्यम/भाषा) में ढालना अक्सर उतना आसान नहीं होता। पाठ के अनुसार, “हर बात के लिए कुछ खास शब्द नियत होते हैं ठीक वैसे ही जैसे हर पेंच के लिए एक निश्चित खाँचा होता है।” जब बात सही शब्द से जुड़ जाती है तो वह बिना दबाव या अतिरिक्त मेहनत के, सहूलियत (सरलता) से हो जाती है।
6 बात सीधी थी पर: पूरी कविता
“बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए—
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई।
सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाए
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनाई दे रही थी
तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह।
आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी!
हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया।
ऊपर से ठीकठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताकत!
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा—
‘क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?'”
7 बात सीधी थी पर: भाग-वार सरल भावार्थ
यह कविता एक ही घटना को क्रम से आगे बढ़ाती है, इसलिए इसे चार भागों में समझना आसान है:
यह न लिखें कि कविता में “पेंच खोला गया”, कविता में कवि पेंच खोलने की जगह उसे उलटा कसता चला गया, यही उसकी भूल थी। साथ ही यह भी याद रखें कि ‘बात सीधी थी पर’ और ‘कविता के बहाने’ दोनों इस अध्याय में पूरी कविताएँ हैं, किसी लंबी कविता के अंश नहीं।
8 दोनों कविताओं के प्रमुख बिंब, प्रतीक और अलंकार
रूपक अलंकार (Metaphor) में एक वस्तु को सीधे दूसरी वस्तु कह दिया जाता है, “जैसे” या “समान” जैसे तुलनावाचक शब्दों के बिना, जैसे “कविता एक उड़ान है”, “कविता एक खिलना है”, “कविता एक खेल है”। यहाँ कविता को सीधे उड़ान/खिलना/खेल कह दिया गया है।
मानवीकरण (Personification) में किसी निर्जीव वस्तु या भाव को इंसान जैसे गुण या क्रियाएँ करते हुए दिखाया जाता है। ‘बात सीधी थी पर’ में “बात” को अंत में एक शरारती बच्चे की तरह खेलते और सवाल पूछते हुए दिखाया गया है। यह मानवीकरण का उदाहरण है।
व्यंग्य (Satire/Irony) का अर्थ है किसी बात को हल्के-फुल्के या घुमावदार ढंग से कहकर गहरी चोट करना। ‘बात सीधी थी पर’ का अंतिम प्रश्न (“क्या तुमने भाषा को सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”) कवि पर एक हल्का पर गहरा व्यंग्य माना जा सकता है। व्यंग्य कहने का एक ढंग है, अलंकार नहीं।
| कविता | बिंब/प्रतीक/अलंकार/कथन-शैली | अर्थ |
|---|---|---|
| कविता के बहाने | चिड़िया | पाठ के अनुसार चिड़िया की उड़ान की सीमा है; कविता की उड़ान का अर्थ वह नहीं जानती |
| कविता के बहाने | फूल | फूल के खिलने के साथ उसकी परिणति निश्चित है; कविता बिना मुरझाए महकती है |
| कविता के बहाने | बच्चा | पाठ के अनुसार बच्चे के सपने असीम हैं और बच्चों के खेल में सीमा का कोई स्थान नहीं; सब घर एक कर देना |
| कविता के बहाने | “कविता एक उड़ान/खिलना/खेल है” | रूपक अलंकार, तीनों बंदों में दोहराई गई शैली |
| बात सीधी थी पर | पेंच, चूड़ी, कील | पाठ के शब्दों में ‘मूर्त्त उपमान’, जिनसे कथ्य की अमूर्त्तता साकार की गई है (कथ्य और माध्यम का द्वंद्व) |
| बात सीधी थी पर | “बात” का शरारती बच्चे की तरह खेलना | मानवीकरण |
| बात सीधी थी पर | अंतिम प्रश्न | कवि पर हल्की पर गहरी चोट (व्यंग्य, कहने का ढंग; अलंकार नहीं) |
9 काव्य-सौंदर्य
कविता के बहाने
- मुक्त छंद (किसी तय मात्रा-क्रम का बंधन नहीं), पर ‘बहाने / जाने / माने’ जैसी तुकें; तीन समानांतर बंद
- आवृत्ति-शैली, हर बंद एक जैसा ढाँचा दोहराता है
- अंतिम बंद में अंत बदल जाता है: “बच्चा ही जाने।”
- प्रकृति (चिड़िया, फूल) से बच्चे तक की यात्रा
बात सीधी थी पर
- मुक्त छंद, एक ही घटना का क्रमिक विकास
- मूर्त उपमान: पेंच, चूड़ी, कील
- अंत में मानवीकरण और कवि पर व्यंग्य
- भाषा और कथ्य के द्वंद्व पर केंद्रित
दोनों कविताओं में भाषा बोलचाल की और सरल दिखने वाली है, पर उनमें रूपक और मानवीकरण जैसे अलंकार भी हैं और भीतर गहरी वैचारिकता (संशय, प्रश्नाकुलता) भी, जिन्हें पाठ कुँवर नारायण की कविता के बीज शब्द कहता है।
पाठ पंत की ये पंक्तियाँ देता है: “सुंदर है सुमन, विहग सुंदर / मानव तुम सबसे सुंदरतम।” पंत की इस कविता में प्रकृति की तुलना में मनुष्य को अधिक सुंदर और समर्थ बताया गया है; पाठ कहता है कि ‘कविता के बहाने’ में इस आशय को व्यक्त करने वाले बिंदु खोजिए (जैसे चिड़िया और फूल ‘क्या जाने?’, पर “बच्चा ही जाने।”)। पाठ यह भी कहता है कि प्रतापनारायण मिश्र का निबंध ‘बात’ और नागार्जुन की कविता ‘बातें’ ढूँढ़कर पढ़ें।
चिड़िया-फूल-बच्चा, पेंच-चूड़ी-कील
पहली तिकड़ी ‘कविता के बहाने’ के तीन बंद याद दिलाती है (बढ़ते क्रम में, सीमित से असीम तक), दूसरी तिकड़ी ‘बात सीधी थी पर’ की पूरी कहानी का क्रम याद दिलाती है (बात फँसना → पेंच कसना → चूड़ी मरना → कील की तरह ठोंक देना)।
- क्या मैं कुँवर नारायण का जन्म-वर्ष, निधन-वर्ष और उनकी पाँचों काव्य संग्रहों के नाम बिना देखे लिख सकता हूँ?
- क्या मैं ‘कविता के बहाने’ के तीनों बंदों का भावार्थ अपने शब्दों में क्रम से लिख सकता हूँ?
- क्या मैं ‘बात सीधी थी पर’ की पूरी घटना को चार भागों में क्रम से सुना सकता हूँ?
- क्या मैं रूपक, मानवीकरण और व्यंग्य का एक-एक उदाहरण दोनों कविताओं से दे सकता हूँ?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि दोनों कविताएँ पूरी हैं, किसी लंबी कविता के अंश नहीं?
- कुँवर नारायण: जन्म 1927 (उ.प्र.), निधन 2017 (दिल्ली); 5 काव्य संग्रह, 7 पुरस्कार, ज्ञानपीठ सहित
- ‘कविता के बहाने’ (संग्रह: इन दिनों) · 3 बंद: चिड़िया, फूल, बच्चे के बहाने; अंत सकारात्मक “बच्चा ही जाने”
- ‘बात सीधी थी पर’ (संग्रह: कोई दूसरा नहीं) · 4 भाग: बात का फँसना, व्यर्थ प्रयास, चूड़ी मरना, बात का व्यंग्यपूर्ण प्रश्न
- रूपक (कविता=उड़ान/खिलना/खेल), मूर्त उपमान (पेंच-चूड़ी-कील), मानवीकरण (बात का बच्चे जैसा खेलना), व्यंग्य (अंतिम प्रश्न; कहने का ढंग, अलंकार नहीं)
- दोनों मुक्त छंद में (तय मात्रा-क्रम नहीं; ‘कविता के बहाने’ में तुकें भी), बोलचाल की सरल भाषा में गहरी वैचारिकता लिए हुए