- रघुवीर सहाय का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ, पत्रकारिता और सम्मान
- ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ की पूरी कविता, भाग-दर-भाग सरल भावार्थ के साथ
- कविता में कोष्ठक (ब्रैकेट) की तकनीक का असली अर्थ और महत्त्व
- टेलीविज़न माध्यम की संवेदनहीनता पर कविता का व्यंग्य समझना
- कविता की भाषा-शैली और काव्य-सौंदर्य पहचानना
- अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
1 कवि परिचय: रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील ‘नागर’ चेहरा हैं। सड़क, चौराहा, दफ़्तर, अखबार, संसद, बस, रेल और बाज़ार की बेलौस (बेबाक) भाषा में उन्होंने कविता लिखी और घर-मुहल्ले के चरित्रों को हमारी चेतना का स्थायी नागरिक बनाया। हत्या-लूटपाट, आगज़नी, राजनैतिक भ्रष्टाचार जैसे विषय उनकी कविता में उतरकर खोजी पत्रकारिता की सनसनीखेज रपटें नहीं रह जाते, बल्कि आत्मान्वेषण (खुद को टटोलने) का माध्यम बन जाते हैं। पेशे से पत्रकार होते हुए भी वे सिर्फ़ पत्रकार नहीं, सिद्ध कथाकार और कवि भी थे; कविता को उन्होंने एक कहानीपन और एक नाटकीय वैभव दिया। पाठ के अनुसार रघुवीर जी ने भारतीय समाज में ताकतवरों की बढ़ती हैसियत और सत्ता के खिलाफ़ भी साहित्य और पत्रकारिता के पाठकों का ध्यान खींचा।
1.1 प्रमुख रचनाएँ और पत्रकारिता
काव्य-संकलन
सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो-हँसो जल्दी हँसो
पत्रकारिता
ऑल इंडिया रेडियो (हिंदी समाचार विभाग) → पत्रिका ‘कल्पना’ (हैदराबाद) → दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ तथा ‘दिनमान’
अन्य महत्त्वपूर्ण कविता
‘रामदास’: आधुनिक हिंदी कविता की एक महत्त्वपूर्ण रचना मानी जाती है
काव्य-प्रवृत्ति
छोटे या लघु की महत्ता का स्वीकार (हाशिए के लोगों के अनुभव); ताकतवरों की बढ़ती हैसियत और सत्ता के खिलाफ़ पाठकों का ध्यान खींचना; साधारण शैली में दारुण विडंबनाओं को पकड़ने की कला
रघुवीर सहाय के जन्म-निधन वर्ष, उनके तीन काव्य-संकलनों के नाम और पत्रकारिता से जुड़ी संस्थाओं के नाम याद रखें। ध्यान रहे: ‘दूसरा सप्तक’ रघुवीर सहाय की अपनी किताब नहीं, बल्कि अज्ञेय द्वारा संपादित संकलन है जिसमें उनकी आरंभिक कविताएँ छपीं।
रघुवीर सहाय की कविता में जातीय या वैयक्तिक स्मृतियाँ लगभग नहीं के बराबर हैं, इसलिए उनके दोनों पाँव वर्तमान में ही गड़े हैं। फिर भी उनकी कविता मार्मिक उजास (मन को छू लेने वाली रोशनी) और व्यंग्य-बुझी खुरदरी मुसकानों से पटी पड़ी है। छंदानुशासन के लिहाज़ से भी वे अनुपम हैं, पर ज़्यादातर उन्होंने बातचीत की सहज शैली में ही लिखा।

2 कैमरे में बंद अपाहिज: भूमिका
अत्यंत साधारण और अनायास-सी प्रतीत होने वाली शैली में समाज की दारुण विडंबनाओं को पकड़ने की जो कला रघुवीर सहाय की कविताओं में मिलती है, उसका प्रतिनिधि उदाहरण है यह कविता, ‘कैमरे में बंद अपाहिज’, जो संग्रह ‘जो लोग भूल गये हैं’ से ली गई है। कविता में यह दिखाया गया है कि शारीरिक चुनौती को झेलते व्यक्ति से टेलीविज़न-कैमरे के सामने किस तरह के सवाल पूछे जाएँगे और कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए उससे कैसी भंगिमा (हाव-भाव) की अपेक्षा की जाएगी, इसे कवि ने लगभग सपाट (सीधे-सादे) तरीके से बयान किया है।
किसी की पीड़ा को बहुत बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचाने वाले व्यक्ति को उस पीड़ा के प्रति स्वयं संवेदनशील होने और दूसरों को संवेदनशील बनाने का दावेदार होना चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि आप जब पीड़ा को पर्दे पर उभारने का प्रयास करते हैं, तब कारोबारी दबाव के तहत आपका रवैया संवेदनहीन हो जाता है।
पाठ की भूमिका से
सहाय जी की यह कविता टेलीविज़न स्टूडियो के भीतर की दुनिया को उभारती ज़रूर है, लेकिन इसे सिर्फ़ टेलीविज़न माध्यम से जोड़कर देखना ज़रूरी नहीं। अपनी व्यंजना (गूढ़ अर्थ) में यह कविता हर ऐसे व्यक्ति की ओर इशारा करती है, जो दुख-दर्द, यातना-वेदना को बेचना चाहता है। इस कविता को शारीरिक चुनौती झेलते लोगों के प्रति संवेदनशील नज़रिया अपनाने के लिए प्रेरित करने वाले पाठ के रूप में भी देखा जा सकता है। इसके लिए कवि ने धुर (चरम) संवेदनहीनता को रेखांकित करने का तरीका अपनाया है: वह दिखाता है कि करुणा जगाने के मकसद से शुरू हुआ कार्यक्रम कैसे क्रूर बन जाता है।
3 कैमरे में बंद अपाहिज: पूरी कविता
“हम दूरदर्शन पर बोलेंगे
हम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएँगे
एक बंद कमरे में
उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा
देता है?
(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा)
हाँ तो बताइए आपका दुख क्या है
जल्दी बताइए वह दुख बताइए
बता नहीं पाएगा
सोचिए
बताइए
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है
कैसा
यानी कैसा लगता है
(हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?)
सोचिए
बताइए
थोड़ी कोशिश करिए
(यह अवसर खो देंगे?)
आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे
इंतज़ार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का
करते हैं?
(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)
फिर हम परदे पर दिखलाएँगे
फूली हुई आँख की एक बड़ी तसवीर
बहुत बड़ी तसवीर
और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी
(आशा है आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे)
एक और कोशिश
दर्शक
धीरज रखिए
देखिए
हमें दोनों एक संग रुलाने हैं
आप और वह दोनों
(कैमरा
बस करो
नहीं हुआ
रहने दो
परदे पर वक्त की कीमत है)
अब मुसकुराएँगे हम
आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम
(बस थोड़ी ही कसर रह गई)
धन्यवाद।”
4 खंड-वार सरल भावार्थ
कविता में कोई बंद-संख्या नहीं दी गई; समझने की सुविधा के लिए यहाँ इसे पाँच अर्थ-खंडों में बाँटा गया है (यह विभाजन पाठ का नहीं है):
“हम समर्थ शक्तिवान” और “हम एक दुर्बल को लाएँगे” पंक्तियों का व्यंग्य समझाते समय यह लिखें कि यहाँ माध्यम (टीवी) की सत्ता और अपाहिज व्यक्ति की असहायता के बीच एक असंतुलन दिखाया गया है।
5 कोष्ठक (ब्रैकेट) की भूमिका
कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं। इन्हें कार्यक्रम के पीछे की असली, अनकही बातचीत के रूप में पढ़ा जा सकता है: कार्यक्रम की टीम के आपसी निर्देश, स्वीकारोक्तियाँ और स्टूडियो के भीतर की सचाई, जो कविता के संकेत के अनुसार दर्शक तक नहीं पहुँचतीं (जैसे “(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)”)। कोष्ठक के बाहर की पंक्तियाँ वह “प्रस्तुत” चेहरा हैं जो दर्शक देखते हैं; कोष्ठक के भीतर की पंक्तियाँ वह असली, संवेदनहीन और व्यावसायिक सोच हैं जो पर्दे के पीछे चलती है।
| कोष्ठक के बाहर (कार्यक्रम का प्रस्तुत चेहरा) | कोष्ठक में (पर्दे के पीछे की सोच के रूप में पढ़ी जा सकने वाली पंक्तियाँ) |
|---|---|
| हाँ तो बताइए आपका दुख क्या है | (कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा) |
| आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है / कैसा / यानी कैसा लगता है | (हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?) |
| सोचिए, बताइए, थोड़ी कोशिश करिए | (यह अवसर खो देंगे?) |
| इंतज़ार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का | (यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा) |
| फिर हम परदे पर दिखलाएँगे / फूली हुई आँख की एक बड़ी तसवीर … और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी | (आशा है आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे) |
| आप और वह दोनों… अब मुसकुराएँगे हम | (कैमरा / बस करो / नहीं हुआ / रहने दो / परदे पर वक्त की कीमत है) |
| आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम, धन्यवाद। | (बस थोड़ी ही कसर रह गई) |
सबसे तीखी कोष्ठक-पंक्तियों में से एक वह है जिसमें रोने को ‘अपंगता की पीड़ा’ मान लेने की उम्मीद जताई गई है।

6 काव्य-सौंदर्य और भाषा-शैली
व्यंग्य (Satire/Irony) का अर्थ है किसी बात को हल्के-फुल्के या घुमावदार ढंग से कहकर गहरी चोट करना। इस कविता का एक प्रमुख व्यंग्य अंतिम पंक्तियों में है, जहाँ एक अपाहिज व्यक्ति के शोषण को “सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम” कहकर औपचारिक रूप से “धन्यवाद” कहा जाता है।
6.1 प्रमुख काव्य-विशेषताएँ
मुक्त छंद
कविता मुक्त छंद में है, न तुक-बंदी, न मात्रा/छंद का बंधन।
बोलचाल की सपाट भाषा
भाषा लगभग सपाट और सीधी है, अलंकारों का प्रयोग बहुत कम है (‘बहुत बड़ी तसवीर’, ‘पूछ-पूछकर’ जैसी आवृत्ति ज़रूर है), और यही सपाटता कविता के व्यंग्य को और तीखा बनाती है।
प्रश्नवाचक-आदेशात्मक शृंखला
“बताइए”, “सोचिए”, “देखिए” जैसे प्रश्नवाचक और आदेशात्मक वाक्यों की शृंखला कविता को एक वास्तविक साक्षात्कार जैसा नाटकीय रूप देती है।
शीर्षक की विडंबना
“अपाहिज” शारीरिक रूप से भले असहाय हो, पर शीर्षक के व्यंग्य को इस संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है कि असली अपंगता संवेदनहीन व्यवस्था में है। शीर्षक “कैमरे में बंद अपाहिज” इसी विडंबना की ओर इशारा करता है।
यह न लिखें कि यह कविता केवल दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति संवेदनशीलता की बात करती है। कविता की असली व्यंजना इससे कहीं बड़ी है, यह हर उस व्यक्ति और माध्यम पर व्यंग्य करती है जो दिखावे और कारोबारी लाभ के लिए किसी की पीड़ा को बेचना चाहता है। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि यह कविता पूरी है, किसी लंबी कविता का अंश नहीं।
- क्या मैं रघुवीर सहाय का जन्म-वर्ष, निधन-वर्ष और उनके तीनों काव्य-संकलनों के नाम बिना देखे लिख सकता हूँ?
- क्या मैं कविता के पाँचों अर्थ-खंडों को क्रम से अपने शब्दों में समझा सकता हूँ?
- क्या मैं कोष्ठक की भूमिका और कम-से-कम दो कोष्ठक-पंक्तियों के उदाहरण दे सकता हूँ?
- क्या मैं “हम समर्थ शक्तिवान” पंक्ति का व्यंग्य समझा सकता हूँ?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि यह कविता पूरी है, अंश नहीं, और संग्रह “जो लोग भूल गये हैं” से ली गई है?
- रघुवीर सहाय: जन्म 1929 (लखनऊ), निधन 1990 (दिल्ली); दूसरा सप्तक (1951) में आरंभिक कविताएँ; 3 काव्य-संकलन; साहित्य अकादेमी पुरस्कार
- ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ (संग्रह: जो लोग भूल गये हैं), पूरी कविता, टीवी कैमरे के सामने अपाहिज के नकली साक्षात्कार पर आधारित
- 5 अर्थ-खंड (पाठ का विभाजन नहीं): सत्ता की घोषणा → प्रश्नों की झड़ी → रुलाने की कोशिश → कोष्ठक में पर्दे के पीछे की असलियत → व्यंग्यपूर्ण समापन
- कोष्ठक की पंक्तियाँ पर्दे के पीछे की असली, संवेदनहीन सोच के रूप में पढ़ी जा सकती हैं (‘(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)’)
- केंद्रीय व्यंग्य: करुणा जगाने के मकसद से शुरू हुआ कार्यक्रम कारोबारी दबाव में क्रूर बन जाता है