उषा — शमशेर बहादुर सिंह

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • शमशेर बहादुर सिंह का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और सम्मान
  • प्रयोगवादी काव्यधारा और इस कविता की पृष्ठभूमि
  • ‘उषा’ की पूरी कविता, हर उपमान का सरल भावार्थ के साथ विश्लेषण
  • कविता के पाँच प्रमुख उपमान, अंतिम मोड़ (जादू टूटना) और उनके अर्थ
  • कविता की मुक्त छंद शैली, बिंबधर्मिता और काव्य-सौंदर्य समझना
  • अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
शमशेर बहादुर सिंहउषाबिंबधर्मी कविप्रयोगवादमुक्त छंदशब्द-चित्रउपमा अलंकार

1 कवि परिचय: शमशेर बहादुर सिंह

पाठ के अनुसार शमशेर बहादुर सिंह की पहचान एक “बिंबधर्मी कवि” के रूप में है, यानी ऐसा कवि जो अपनी बात सीधे कहने के बजाय शब्दों से चित्र बनाकर कहता है। खुद को उर्दू और हिंदी का दोआब (दो नदियों के बीच की उपजाऊ ज़मीन) मानने वाले शमशेर की कविता एक संधिस्थल पर खड़ी है, यानी वह जगह जहाँ दो अलग-अलग चीज़ें आकर मिलती हैं। पाठ के आरंभ में यह पंक्ति दी गई है: “तुमने ‘धरती’ का पद्य पढ़ा है? उसकी सहजता प्राण है।”

191113 जनवरी को देहरादून (उत्तर प्रदेश, अब उत्तराखंड) में जन्म
1943 सेप्रयोगवादी काव्यधारा का आरंभ (शमशेर: विचारों में प्रगतिशील, शिल्प में प्रयोगधर्मी)
बाद मेंछह प्रमुख काव्य-कृतियाँ प्रकाशित, ‘उर्दू-हिंदी कोश’ का संपादन
1993अहमदाबाद में निधन

1.1 प्रमुख रचनाएँ

शमशेर की पहचान एक बिंबधर्मी कवि के रूप में है। उनकी छह प्रकाशित रचनाएँ हैं: कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, चुका भी हूँ नहीं मैं, इतने पास अपने, बात बोलेगी, काल तुझसे होड़ है मेरी। कविता के अलावा उन्होंने ‘उर्दू-हिंदी कोश’ का संपादन भी किया, जो उनके उर्दू-हिंदी दोआब वाले व्यक्तित्व का ही एक और प्रमाण है।

1

प्रकाशित रचनाएँ (6)

कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, चुका भी हूँ नहीं मैं, इतने पास अपने, बात बोलेगी, काल तुझसे होड़ है मेरी

2

संपादन

‘उर्दू-हिंदी कोश’ का संपादन

3

सम्मान

साहित्य अकादेमी पुरस्कार, कबीर सम्मान (और अन्य कई पुरस्कार)

4

पहचान

बिंबधर्मी कवि, विचारों में प्रगतिशील, शिल्प में प्रयोगधर्मी

परीक्षा संकेत

पाठ में दी गई छह प्रकाशित रचनाएँ और सम्मान (साहित्य अकादेमी, कबीर सम्मान सहित अनेक पुरस्कार) याद रखें।

6प्रकाशित रचनाएँ
2प्रमुख सम्मान मिले
14पंक्तियों में छपी कविता ‘उषा’
क्या आप जानते हैं?

शमशेर अपनी कविता में शब्दों से ठीक वैसे ही काम लेते थे जैसे एक चित्रकार रंग, रेखा और कूची (ब्रश) से काम लेता है। पाठ में उनकी अपनी पंक्तियाँ उद्धृत हैं: “ओ माध्यम! क्षमा करना कि मैं तुम्हारे पार जाना चाहता हूँ।” पाठ के अनुसार उनकी मूल चिंता माध्यम का उपयोग करते हुए भी बंधन से परे जाने की है; उनका चित्रकार मन भाषातीत हो जाना चाहता है (यहाँ माध्यम को भाषा का संकेत माना जा सकता है)।

2 कवि का व्यक्तित्व: संधिस्थल पर खड़ी कविता

शमशेर की कविता की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह किसी एक खाने में बँधी नहीं है, बल्कि कई कलाओं और भावों के मिलन-बिंदु पर खड़ी है। यह मिलन दो तरह का है:

कला के स्तर पर मिलन

  • साहित्य
  • चित्रकला
  • संगीत

अनुभव के स्तर पर मिलन

  • मूर्तता (ठोस, दिखने वाला) ↔ अमूर्तता (जो छुआ न जा सके)
  • ऐंद्रिय (इंद्रियों से जुड़ा अनुभव) ↔ ऐंद्रियेतर (इंद्रियों से परे)
Learn by heartपरिभाषा 1

बिंबधर्मी कवि वह कवि होता है जो अपनी बात सीधे कहने के बजाय ऐसे शब्द-चित्र (बिंब) रचता है कि पाठक के मन में दृश्य खुद-ब-खुद उभर आए। शमशेर की यह बिंबधर्मिता शब्दों से रंग, रेखा, स्वर और कूची की अद्भुत कशीदाकारी (कढ़ाई जैसी बारीक बुनावट) करने का माद्दा (क्षमता) रखती है।

शमशेर का चित्रकार-मन कलाओं के बीच की दूरी को न केवल पाटता (कम करता) है, बल्कि भाषा से भी आगे, भाषातीत हो जाना चाहता है। उनकी मूल चिंता माध्यम का उपयोग करते हुए भी बंधन से परे जाने की है। कथा और शिल्प, दोनों ही स्तरों पर उनकी कविता का मिज़ाज़ (अंदाज़) अलग है: उर्दू शायरी के प्रभाव से उन्होंने संज्ञा और विशेषण से अधिक बल सर्वनामों, क्रियाओं, अव्ययों (जैसे और, पर, ही) और मुहावरों को दिया है। उन्होंने खुद भी कुछ अच्छे शेर कहे हैं।

सचेत इंद्रियों का यह कवि जब प्रेम, पीड़ा, संघर्ष और सृजन को गूँथकर कविता का महल बनाता है तो वह ठोस तो होता ही है, अनुगूँजों से भी भरा होता है। वह पाठक को न केवल पढ़े जाने के लिए आमंत्रित करती है, बल्कि सुनने और देखने को भी।

पाठ की अपनी भूमिका, आरोह भाग 2

3 पृष्ठभूमि: प्रयोगवादी काव्यधारा और ‘उषा’ का जन्म

प्रयोगवादी काव्यधारा सन् 1943 से प्रारंभ हुई और अपने साथ कविता के शिल्प (बनावट) से जुड़े बहुत से नए प्रयोग लेकर आई। नए बिंब, नए प्रतीक और नए उपमान कविता के उपकरण (औज़ार) बन गए। यहाँ तक कि पुराने उपमानों में भी नए अर्थ की चमक भरने का प्रयास प्रयोगधर्मी कवियों ने किया। कवि का अपना आस-पड़ोस (रोज़मर्रा का परिवेश) कविता का हिस्सा बना, और प्रकृति में होने वाला परिवर्तन मानवीय जीवन के चित्र बनकर अभिव्यक्त होने लगा।

कवि केवल दर्शक नहीं हैशमशेर भोर के आसमान का मूकद्रष्टा (चुपचाप देखने वाला) नहीं हैं। वे आसमानी गति को धरती के जीवन से जोड़ने वाले स्रष्टा (रचयिता) भी हैं।
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आकाश को धरती से जोड़नाइसीलिए वे सूर्योदय के साथ एक जीवंत परिवेश की कल्पना करते हैं जो गाँव की सुबह से जुड़ता है, जहाँ सिल है, राख से लीपा हुआ चौका है, और स्लेट पर चाक से रंग मलते अदृश्य बच्चों के हाथ हैं।
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एक नए दिन का एहसासयह एक ऐसे दिन की शुरुआत है, जहाँ रंग है, गति है, भविष्य की उजास (रोशनी) है, और है हर कालिमा (अँधेरा) को चीरकर आने का एहसास कराती उषा।
परीक्षा संकेत

पाठ के अभ्यास-प्रश्न 1 में पूछा गया है कि कविता के किन उपमानों से यह गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र लगता है; सिल, राख से लीपा चौका और स्लेट-चाक इसके उदाहरण हैं।

4 उषा: पाठ में दी गई कविता (14 पंक्तियाँ)

पाठ्यपुस्तक में यह कविता 14 पंक्तियों में छपी है। कविता छोटे-छोटे पंक्ति-समूहों में, बिना किसी शीर्षक-बाँट के, सीधे सूर्योदय तक पहुँचती है।

उषा, शमशेर बहादुर सिंह (पूरी कविता)

“प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)

बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने

नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।

और…
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।”

5 उषा: हर उपमान का सरल भावार्थ

यह कविता एक ही दृश्य, सूर्योदय से ठीक पहले बदलता आकाश, को पाँच अलग-अलग उपमानों (तुलनाओं) से दिखाती है और अंत में “जादू टूटने” पर ठहरती है। इनमें चौका, सिल और स्लेट-चाक गाँव के रोज़मर्रा जीवन से लिए गए हैं। इन्हें क्रम से समझना ज़रूरी है:

उपमान 1 · नीला शंखभोर का आकाश बहुत नीला था, ठीक शंख जैसा। यह कविता की पहली उपमा है (‘जैसे’ के साथ), जो आकाश के नीले रंग को शंख से जोड़ती है।
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उपमान 2 · राख से लीपा हुआ (गीला) चौकाकवि भोर के नभ को “राख से लीपा हुआ चौका / (अभी गीला पड़ा है)” कहता है; यहाँ ‘जैसे’ जैसा कोई तुलनावाचक शब्द नहीं है, नभ को सीधे चौका कहा गया है (रूपक)। गाँव में चौका (रसोई का स्थान) राख से लीपा जाता है, जिससे वह हल्के धूसर (स्लेटी) रंग का दिखता है। कोष्ठक में लिखे “(अभी गीला पड़ा है)” को इस तरह पढ़ा जा सकता है कि लीपाई अभी ताज़ा है, ठीक वैसे ही जैसे भोर का उजाला अभी ताज़ा-ताज़ा, अभी पूरी तरह न सूखा-सा फैल रहा है।
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उपमान 3 · काली सिल पर लाल केसर से धुली हुईआकाश की गहरी कालिमा में जो हल्की लाली (लालिमा) उभरने लगी है, उसे कवि एक बहुत काली सिल (मसाला पीसने का काला पत्थर) की तरह देखते हैं जिस पर मानो थोड़ा-सा लाल केसर घुलकर धुल गया हो। यह सूर्योदय से ठीक पहले आकाश में फैलने वाली हल्की लालिमा का पहला रंग-बिंब है।
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उपमान 4 · स्लेट पर लाल खड़िया चाकवही लाल रंग की झलक कवि को स्लेट पर किसी के मल दिए लाल खड़िया चाक जैसी भी लगती है, ठीक वैसे जैसे गाँव के बच्चे स्लेट पर चाक से लिखते-रंगते हैं। एक ही रंग-परिवर्तन को कवि यहाँ दूसरी उपमा से फिर से दिखाते हैं, ताकि पाठक के मन में रंग और गहरा उभर आए।
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उपमान 5 · नील जल में गौर झिलमिल देहअब आकाश के नीले-नील रंग में हल्की चमक और हलचल कवि को नीले जल में किसी की गोरी, झिलमिलाती देह के हिलने जैसी लगती है। यह एक कोमल और अमूर्त उपमा है (‘जैसे हिल रही हो’), प्रकाश और जल के मेल से बनने वाली चमक का चित्र।
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अंतिम पंक्ति · जादू टूटना, सूर्योदय होना“और…” के बाद कविता अचानक ठहरकर आगे बढ़ती है: अब तक जो जादू-सा दृश्य बना था, वह टूट जाता है क्योंकि सूर्योदय हो रहा है। उषा (भोर का समय) का जादू सूरज के उगते ही समाप्त हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई सुंदर सपना नींद खुलते ही टूट जाता है।
सामान्य भूल

उपमानों का क्रम कविता के अनुसार याद रखें: शंख, चौका, सिल-केसर, स्लेट-चाक, नील जल-देह, और फिर अंतिम पंक्तियों में जादू का टूटना। “जादू टूटना” अपने-आप में उपमान नहीं, कविता का अंतिम मोड़ है। यह भी याद रखें कि कविता एक ही निरंतर दृश्य है, पाठ्यपुस्तक में यह बिना किसी शीर्षक/क्रमांक के एक साथ छपी है।

6 कविता के उपमान और अंतिम मोड़: एक नज़र में

उपमान किसकी उपमा किससे अर्थ / भाव
नीला शंख भोर का आकाश ↔ शंख आकाश का गहरा नीला रंग
राख से लीपा (गीला) चौका भोर का आकाश = चौका (बिना तुलनावाचक शब्द, रूपक) आकाश का हल्का धूसर, ताज़ा-सा रंग
काली सिल पर लाल केसर आकाश की कालिमा में लाली ↔ सिल पर केसर सूर्योदय-पूर्व की हल्की लालिमा
स्लेट पर लाल खड़िया चाक वही लाली ↔ स्लेट पर चाक का निशान वही रंग-परिवर्तन, दूसरी उपमा से दोहराया गया
नील जल में गौर झिलमिल देह आकाश की चमक-हलचल ↔ जल में शरीर का हिलना प्रकाश और जल की झिलमिलाहट, कोमल-अमूर्त बिंब
जादू टूटना (अंतिम मोड़) उषा का जादू ↔ सूर्योदय सूर्योदय होते ही भोर का जादू समाप्त हो जाना

7 काव्य-सौंदर्य

प्रमुख विशेषताएँ
मुक्त छंद, बिंबधर्मिता, शब्द-चित्र (चित्रात्मकता), उपमा अलंकार की शृंखला, रूपक
Learn by heartपरिभाषा 2

उपमा अलंकार में एक वस्तु की तुलना “जैसे”, “सा/सी”, “समान” जैसे तुलनावाचक शब्दों से किसी दूसरी वस्तु से की जाती है। ‘उषा’ में उपमा अलंकार की शृंखला है, जैसे “नीला शंख जैसे”, “कि जैसे धुल गई हो”, “जैसे हिल रही हो”। “भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका” में तुलनावाचक शब्द नहीं है, वहाँ रूपक है।

Learn by heartपरिभाषा 3

शब्द-चित्र (बिंब-योजना) का अर्थ है शब्दों के ज़रिए पाठक के मन में एक स्पष्ट दृश्य/चित्र खड़ा कर देना, जैसे किसी चित्रकार ने कैनवास पर बनाया हो। शमशेर की ‘उषा’ आकाश के बदलते रंगों का ऐसा ही एक शब्द-चित्र है, पाठ इसे “सूर्योदय के ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र” कहता है।

  • कविता मुक्त छंद में है, कोई तुक-योजना या बँधी मात्रा नहीं, भाव के प्रवाह में लिखी गई।
  • कई उपमान गाँव के दैनिक जीवन से लिए गए हैं (चौका, सिल, स्लेट-चाक), जिससे कविता ग्रामीण परिवेश से गहरा जुड़ाव दिखाती है।
  • पाठ के अनुसार कवि भोर के आसमान का मूकद्रष्टा नहीं, उसकी गति को धरती के जीवन से जोड़ने वाला स्रष्टा भी है।
  • पंक्ति “और…” के बाद के ठहराव (बिंदु-चिह्न) को कविता के एक नाटकीय मोड़ के रूप में पढ़ा जा सकता है, जो जादू के टूटने और सूर्योदय के आने से पहले आता है।
याद रखने की तरकीब

शंख → चौका → सिल-केसर → स्लेट-चाक → नील जल-देह → जादू टूटना

यह क्रम याद रखने के लिए सोचें: पहले आकाश सिर्फ़ “नीला” दिखता है (शंख), फिर उसमें हल्की धूसरता आती है (चौका), फिर लाली उभरती है (सिल-केसर, स्लेट-चाक, दोनों एक ही रंग की दो उपमाएँ), फिर चमक-हलचल आती है (नील जल-देह), और अंत में सूरज निकलते ही सब “जादू” टूट जाता है।

8 आपसदारी: सूर्योदय के तीन शब्द-चित्र

पाठ कहता है: “सूर्योदय का वर्णन लगभग सभी बड़े कवियों ने किया है।” अभ्यास में प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ और अज्ञेय की ‘बावरा अहेरी’ की पंक्तियाँ दी गई हैं, और ‘उषा’ के समानांतर तीनों कविताओं का विश्लेषण इन बिंदुओं पर करने को कहा गया है: उपमान, शब्दचयन, परिवेश।

बीती विभावरी जाग री! (जयशंकर प्रसाद), पाठ में दी गई पंक्तियाँ

“बीती विभावरी जाग री!
अंबर पनघट में डुबो रही—
तारा-घट ऊषा नागरी।
खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई—
मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए—
तू अब तक सोई है आली
आँखों में भरे विहाग री।”

भोर का बावरा अहेरी (अज्ञेय), पाठ में दी गई पंक्तियाँ

“भोर का बावरा अहेरी
पहले बिछाता है आलोक की
लाल-लाल कनियाँ
पर जब खींचता है जाल को
बाँध लेता है सभी को साथ:
छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े पंखी
डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल
उड़ने जहाज़,
कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले
तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी
बेपनाह काया को:
गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी
पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रूप-रेखा को
और दूर कचरा जलानेवाली कल की उद्दंड चिमनियों को, जो
धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी।”

बिंदु उषा (शमशेर) बीती विभावरी (प्रसाद) बावरा अहेरी (अज्ञेय)
उपमान शंख, चौका, सिल-केसर, स्लेट-चाक, नील जल में देह अंबर का पनघट, तारा-घट डुबोती ऊषा नागरी भोर एक बावरा अहेरी (शिकारी), आलोक की लाल-लाल कनियाँ, जाल
शब्दचयन बोलचाल के घरेलू शब्द तत्सम, अलंकृत शब्द (विभावरी, किसलय, मलयज) आधुनिक, शहरी शब्द (तारघर, मोटरों के धुएँ, चिमनियाँ)
परिवेश गाँव की सुबह प्रकृति और सखी को जगाने का भाव शहर और प्रकृति, दोनों (चिड़ियाँ, परेवे, मंदिर-शिखर, तारघर, पार्क, चिमनियाँ)
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं शमशेर बहादुर सिंह का जन्म-वर्ष, निधन-वर्ष और उनकी छहों रचनाओं के नाम बिना देखे लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं ‘उषा’ की 14 पंक्तियाँ क्रम से लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं कविता के पाँचों उपमान और अंतिम मोड़ क्रम से बता सकता हूँ, और हर एक का अर्थ समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं बता सकता हूँ कि “(अभी गीला पड़ा है)” जैसे कोष्ठक कविता में क्या विशेष अर्थ जोड़ते हैं?
  • क्या मैं समझा सकता हूँ कि कवि को “मूकद्रष्टा नहीं, स्रष्टा” क्यों कहा गया है?
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • शमशेर बहादुर सिंह: जन्म 13 जनवरी 1911 (देहरादून), निधन 1993 (अहमदाबाद); 6 रचनाएँ, साहित्य अकादेमी व कबीर सम्मान से सम्मानित
  • बिंबधर्मी कवि, विचारों में प्रगतिशील, शिल्प में प्रयोगधर्मी; प्रयोगवादी काव्यधारा 1943 से शुरू हुई
  • ‘उषा’: 14 पंक्तियों की कविता, सूर्योदय के ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र
  • पाँच उपमान क्रम से: नीला शंख → राख-लीपा चौका → काली सिल पर लाल केसर → स्लेट पर लाल चाक → नील जल में गौर देह; फिर अंतिम मोड़: जादू टूटना/सूर्योदय
  • चौका, सिल, स्लेट-चाक जैसे उपमान गाँव के रोज़मर्रा जीवन से; कवि आकाश का मूकद्रष्टा नहीं, धरती से जोड़ने वाला स्रष्टा है
  • मुक्त छंद, उपमा अलंकार की शृंखला (और ‘भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका’ में रूपक), शब्द-चित्र/चित्रात्मकता इस कविता की मुख्य विशेषताएँ