कक्षा 12 हिंदी अध्याय 5 उषा शॉर्ट नोट्स

परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: कवि परिचय, पूरी कविता, प्रमुख उपमान/बिंब और परिभाषाएँ एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

1 कवि परिचय एक नज़र में

बिंदु विवरण
जन्म 13 जनवरी, सन् 1911, देहरादून (उत्तर प्रदेश, अब उत्तराखंड में)
निधन सन् 1993, अहमदाबाद में
प्रकाशित रचनाएँ (6) कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, चुका भी हूँ नहीं मैं, इतने पास अपने, बात बोलेगी, काल तुझसे होड़ है मेरी
संपादन ‘उर्दू-हिंदी कोश’ का संपादन
सम्मान साहित्य अकादेमी पुरस्कार, कबीर सम्मान (और अन्य कई पुरस्कार)
पहचान बिंबधर्मी कवि; विचारों में प्रगतिशील, शिल्प में प्रयोगधर्मी (प्रयोगवादी काव्यधारा 1943 से शुरू हुई)
अपनी पहचान खुद को उर्दू-हिंदी का दोआब मानते थे; कविता एक संधिस्थल, साहित्य, चित्रकला और संगीत का

2 उषा: सार-रूप में

‘उषा’ पाठ में 14 पंक्तियों में छपी कविता है: सूर्योदय के ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र। कवि आसमान का मूकद्रष्टा नहीं, धरती के जीवन से उसे जोड़ने वाला स्रष्टा है। आपसदारी में प्रसाद (‘बीती विभावरी जाग री!’) और अज्ञेय (‘भोर का बावरा अहेरी’) के सूर्योदय-वर्णन से उपमान, शब्दचयन और परिवेश के आधार पर तुलना करने को कहा गया है।

कविता (पाठ के अनुसार)
प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)
बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने
नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।
और…
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।

3 उपमान और अंतिम मोड़ क्रम से

उपमान अर्थ
नीला शंख प्रभात के आकाश का गहरा नीला रंग
राख से लीपा (गीला) चौका आकाश का हल्का धूसर, ताज़ा-सा रंग (नभ को सीधे चौका कहा, रूपक)
काली सिल पर लाल केसर सूर्योदय-पूर्व की हल्की लालिमा
स्लेट पर लाल खड़िया चाक वही रंग-परिवर्तन, दूसरी उपमा से दोहराया गया
नील जल में गौर झिलमिल देह प्रकाश-जल की झिलमिलाहट, कोमल-अमूर्त बिंब
जादू टूटना सूर्योदय होते ही भोर का जादू समाप्त होना

इनमें चौका, सिल और स्लेट-चाक जैसे उपमान गाँव के रोज़मर्रा जीवन से लिए गए हैं, जिससे कविता ग्रामीण परिवेश से गहरा जुड़ाव दिखाती है।

Learn by heartपरिभाषा 1

उपमा अलंकार: “जैसे”, “सा/सी”, “समान” जैसे तुलनावाचक शब्दों से एक वस्तु की तुलना दूसरी वस्तु से करना। ‘उषा’ में उपमा अलंकार की कई शृंखलाएँ हैं, जैसे ‘नीला शंख जैसे’, ‘कि जैसे धुल गई हो’, ‘जैसे हिल रही हो’। ‘भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका’ में तुलनावाचक शब्द नहीं, रूपक है।

Learn by heartपरिभाषा 2

शब्द-चित्र (बिंब-योजना): शब्दों के ज़रिए पाठक के मन में स्पष्ट दृश्य खड़ा करना, जैसे चित्रकार ने कैनवास पर बनाया हो।

4 काव्य-सौंदर्य

कविता मुक्त छंद में है, कोई तुक-योजना या बँधी मात्रा नहीं। कवि की बिंबधर्मिता शब्दों से रंग, रेखा, स्वर और कूची की कशीदाकारी करती है। उपमाओं की एक शृंखला (“जैसे”, “कि जैसे”) से एक ही दृश्य (बदलता आकाश) को बार-बार नए ढंग से दिखाया गया है। यह शिल्प-प्रयोग का उदाहरण है; पाठ के अनुसार प्रयोगवाद ने नए बिंब, नए प्रतीक और नए उपमान कविता के उपकरण बनाए।

परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • शमशेर बहादुर सिंह: जन्म 1911 (देहरादून), निधन 1993 (अहमदाबाद); 6 रचनाएँ, साहित्य अकादेमी व कबीर सम्मान
  • ‘उषा’: 14 पंक्तियों की कविता, सूर्योदय के ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र
  • पाँच उपमान क्रम से: नीला शंख → राख-लीपा चौका → काली सिल पर लाल केसर → स्लेट पर लाल चाक → नील जल में गौर देह; फिर अंतिम मोड़: जादू टूटना
  • कवि मूकद्रष्टा नहीं, स्रष्टा है, आकाश की गति को धरती के जीवन से जोड़ता है
  • मुक्त छंद, उपमा अलंकार की शृंखला (चौका वाली पंक्तियों में रूपक), शब्द-चित्र/चित्रात्मकता इस कविता की मुख्य विशेषताएँ