इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. शमशेर बहादुर सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म 13 जनवरी, सन् 1911 को देहरादून (उत्तर प्रदेश, अब उत्तराखंड) में हुआ था।
प्र. शमशेर बहादुर सिंह का निधन कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: उनका निधन सन् 1993 में अहमदाबाद में हुआ।
प्र. शमशेर बहादुर सिंह ने किस कोश का संपादन किया?
उत्तर: उन्होंने ‘उर्दू-हिंदी कोश’ का संपादन किया।
प्र. शमशेर बहादुर सिंह को कौन-कौन से सम्मान मिले?
उत्तर: उन्हें ‘साहित्य अकादेमी’ पुरस्कार तथा ‘कबीर सम्मान’ सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
प्र. ‘उषा’ कविता में कुल कितनी पंक्तियाँ हैं?
उत्तर: ‘उषा’ कविता पाठ में 14 पंक्तियों में छपी है।
प्र. ‘उषा’ कविता किस छंद में रचित है?
उत्तर: यह कविता मुक्त छंद में रचित है, बिना तुक-योजना और बँधी मात्रा के।
प्र. प्रयोगवादी काव्यधारा किस वर्ष से मानी जाती है?
उत्तर: प्रयोगवादी काव्यधारा सन् 1943 से प्रारंभ मानी जाती है।
प्र. कविता के अनुसार भोर के आकाश की तुलना सबसे पहले किससे की गई है?
उत्तर: भोर के आकाश की तुलना सबसे पहले नीले शंख से की गई है: ‘प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे’।
प्र. कविता की अंतिम पंक्ति क्या है?
उत्तर: कविता की अंतिम पंक्ति है: ‘सूर्योदय हो रहा है।’ (उसके ठीक पहले की पंक्ति है: ‘जादू टूटता है इस उषा का अब’)।
प्र. शमशेर बहादुर सिंह की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर: कुछ कविताएँ और कुछ और कविताएँ (अथवा: चुका भी हूँ नहीं मैं, इतने पास अपने, बात बोलेगी, काल तुझसे होड़ है मेरी में से कोई दो)।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. शमशेर बहादुर सिंह को ‘दोआब’ और ‘संधिस्थल’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: शमशेर खुद को उर्दू और हिंदी का ‘दोआब’ मानते थे, यानी वे दोनों भाषाओं के संगम पर खड़े थे। उनकी कविता एक ‘संधिस्थल’ पर भी खड़ी है, यह संधि एक ओर साहित्य, चित्रकला और संगीत की है, तो दूसरी ओर मूर्तता-अमूर्तता तथा ऐंद्रिय-ऐंद्रियेतर अनुभवों की है। इसीलिए उन्हें दोआब और संधिस्थल दोनों कहा गया है।
प्र. शमशेर बहादुर सिंह को ‘बिंबधर्मी कवि’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: बिंबधर्मी कवि वह होता है जो अपनी बात सीधे कहने के बजाय शब्दों से ऐसा चित्र (बिंब) रचता है कि पाठक के मन में दृश्य स्वतः उभर आए। शमशेर की यह बिंबधर्मिता शब्दों से रंग, रेखा, स्वर और कूची की अद्भुत कशीदाकारी करने की क्षमता रखती है, इसीलिए उन्हें बिंबधर्मी कवि कहा जाता है।
प्र. ‘ओ माध्यम! क्षमा करना कि मैं तुम्हारे पार जाना चाहता हूँ’ पंक्ति का क्या अर्थ है?
उत्तर: यह पंक्ति शमशेर के चित्रकार-मन को दर्शाती है। पाठ के अनुसार उनकी मूल चिंता माध्यम का उपयोग करते हुए भी बंधन से परे जाने की है, और उनका चित्रकार मन भाषातीत हो जाना चाहता है। यहाँ ‘माध्यम’ को भाषा का संकेत माना जा सकता है।
प्र. ‘उषा’ कविता को गाँव की सुबह का शब्दचित्र क्यों कहा जाता है?
उत्तर: कविता में आकाश के बदलते रंगों को दिखाने के लिए कवि ने गाँव के रोज़मर्रा जीवन की वस्तुओं का सहारा लिया है, जैसे राख से लीपा हुआ चौका, काली सिल और स्लेट पर खड़िया चाक। ये सभी गाँव के घरों में मिलने वाली परिचित चीज़ें हैं, इसीलिए यह कविता गाँव की सुबह का जीवंत शब्दचित्र कहलाती है।
प्र. कवि को ‘मूकद्रष्टा नहीं, स्रष्टा’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: मूकद्रष्टा का अर्थ है चुपचाप देखने वाला, जबकि स्रष्टा का अर्थ है रचना करने वाला। शमशेर केवल भोर के आकाश को देखकर चुप नहीं रहते, बल्कि आसमानी गति को धरती के जीवन भरे हलचल से जोड़कर एक नया, जीवंत परिवेश रचते हैं। इसीलिए उन्हें मूकद्रष्टा नहीं, स्रष्टा कहा गया है।
प्र. ‘भोर का नभ राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है)’ पंक्तियों में कोष्ठक का क्या महत्व है?
उत्तर: कोष्ठक में दी गई पंक्ति ‘(अभी गीला पड़ा है)’ मुख्य पंक्ति में एक अतिरिक्त, कोमल टिप्पणी जोड़ती है। माना जा सकता है कि यह आकाश के रंग-परिवर्तन के अभी-अभी होने, ताज़ा और अस्थायी होने की ओर संकेत करती है, ठीक वैसे ही जैसे अभी-अभी लीपे गए चौके की सतह गीली और ताज़ा होती है।
प्र. प्रयोगवादी काव्यधारा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: (1) इस धारा में नए बिंब, नए प्रतीक और नए उपमान कविता के उपकरण बने, पुराने उपमानों में भी नए अर्थ भरने का प्रयास हुआ। (2) कवि का अपना आस-पड़ोस (रोज़मर्रा का परिवेश) कविता का हिस्सा बना, और प्रकृति में होने वाला परिवर्तन मानवीय जीवन-चित्र बनकर अभिव्यक्त हुआ।
प्र. उर्दू शायरी के प्रभाव से शमशेर की भाषा में क्या विशेषता आई?
उत्तर: उर्दू शायरी के प्रभाव से शमशेर ने अपनी कविता में संज्ञा और विशेषण से अधिक बल सर्वनामों, क्रियाओं, अव्ययों और मुहावरों को दिया है। उन्होंने खुद भी कुछ अच्छे शेर कहे हैं।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. ‘उषा’ कविता में आए किन्हीं चार उपमानों को उनके अर्थ सहित समझाइए।
उत्तर: (1) नीला शंख: भोर के आकाश का गहरा नीला रंग शंख जैसा दिखता है। (2) राख से लीपा (गीला) चौका: भोर के नभ को सीधे राख से लीपा हुआ चौका कहा गया है, जिससे उसकी हल्की धूसरता उभरती है। (3) काली सिल पर लाल केसर: आकाश की कालिमा में उभरती हल्की लालिमा को काली सिल पर लाल केसर से धुल जाने जैसी लालिमा से दिखाया गया है। (4) स्लेट पर लाल खड़िया चाक: वही लालिमा स्लेट पर मले गए लाल चाक के निशान जैसी भी लगती है। इन चार में से तीन उपमान (चौका, सिल, स्लेट-चाक) गाँव के घर-आँगन की चीज़ें हैं।
प्र. शमशेर बहादुर सिंह के काव्य-व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: शमशेर विचारों के स्तर पर प्रगतिशील और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मी कवि थे, जिनकी पहचान एक बिंबधर्मी कवि के रूप में हुई। वे खुद को उर्दू-हिंदी का दोआब मानते थे और उनकी कविता साहित्य, चित्रकला और संगीत के संधिस्थल पर खड़ी थी। उनका चित्रकार मन कलाओं के बीच की दूरी को पाटता है और भाषातीत हो जाना चाहता है; उनकी मूल चिंता माध्यम का उपयोग करते हुए भी बंधन से परे जाने की है। उर्दू शायरी के प्रभाव से उन्होंने सर्वनाम, क्रिया, अव्यय और मुहावरों को विशेष महत्व दिया, और वे सचेत इंद्रियों के कवि माने जाते हैं जिनकी कविता पाठक को पढ़ने के साथ-साथ सुनने और देखने के लिए भी आमंत्रित करती है।
प्र. ‘उषा’ कविता की भूमिका (पाठ की अपनी प्रस्तावना) में इसे किस तरह प्रस्तुत किया गया है?
उत्तर: पाठ की भूमिका के अनुसार प्रयोगवादी काव्यधारा (1943 से) ने कविता में नए बिंब, प्रतीक और उपमान लाए, और कवि का अपना आस-पड़ोस भी कविता का विषय बना। ‘उषा’ इसी परंपरा का उदाहरण है, यह सूर्योदय से ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र है। कवि भोर के आसमान का मूकद्रष्टा नहीं, बल्कि आसमानी गति को धरती के जीवन से जोड़ने वाला स्रष्टा है, इसीलिए वे सूर्योदय के साथ गाँव की सुबह जैसा एक जीवंत परिवेश रचते हैं, जहाँ रंग है, गति है और भविष्य की उजास है।
प्र. ‘उषा’ कविता के उपमानों को क्रम से समझाते हुए लिखिए कि कविता किस तरह आकाश के बदलाव को दिखाती है।
उत्तर: कविता उपमानों की एक शृंखला से आकाश के क्रमिक बदलाव को दिखाती है: (1) पहले आकाश गहरा नीला, शंख जैसा है; (2) फिर उसमें हल्की धूसरता आती है, राख से लीपे चौके जैसी; (3) फिर काली सिल पर लाल केसर जैसी हल्की लालिमा उभरती है; (4) यही लालिमा स्लेट पर लाल खड़िया चाक जैसी भी दिखती है; (5) फिर नील जल में गौर झिलमिल देह जैसी चमक-हलचल दिखती है; (6) और अंत में यह सारा ‘जादू’ टूट जाता है क्योंकि सूर्योदय हो जाता है। इस तरह कविता एक ही दृश्य को पाँच अलग-अलग, बढ़ते हुए उजाले के उपमानों से दिखाकर सूर्योदय के क्षण पर समाप्त होती है।
प्र. ‘उषा’ कविता में प्रयुक्त बिंब-योजना (शब्द-चित्र) के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: बिंब-योजना का अर्थ है शब्दों के ज़रिए पाठक के मन में स्पष्ट दृश्य खड़ा करना। शमशेर की ‘उषा’ में हर उपमान (शंख, चौका, सिल-केसर, स्लेट-चाक, नील जल-देह) मिलकर आकाश के बदलते रंगों का ऐसा जीवंत चित्र बनाते हैं मानो पाठक स्वयं वह दृश्य देख रहा हो। पाठ इस कविता को ‘सूर्योदय के ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र’ कहता है, और पाठ के अनुसार शमशेर की पहचान एक बिंबधर्मी कवि के रूप में है।
प्र. शमशेर बहादुर सिंह की कविता को ‘सचेत इंद्रियों की कविता’ क्यों कहा गया है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पाठ के अनुसार सचेत इंद्रियों का यह कवि जब प्रेम, पीड़ा, संघर्ष और सृजन को गूँथकर कविता का महल बनाता है, तो वह ठोस भी होता है और अनुगूँजों से भी भरा होता है। ‘उषा’ कविता में भी यही दिखता है, यहाँ रंग (नीला, लाल), गीलेपन का स्पर्श-बोध (गीला चौका) और हलचल (झिलमिल देह), कई इंद्रियों का अनुभव एक साथ जगाया गया है। इसीलिए कविता पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सुनने और देखने के लिए भी आमंत्रित करती है।
प्र. आपसदारी गतिविधि के अनुसार ‘उषा’ की तुलना प्रसाद और अज्ञेय की सूर्योदय-कविताओं से करने का क्या उद्देश्य है?
उत्तर: पाठ्यपुस्तक की ‘आपसदारी’ गतिविधि विद्यार्थियों को जयशंकर प्रसाद की ‘बीती विभावरी जाग री’ और अज्ञेय की ‘बावरा अहेरी’ की पंक्तियाँ ‘उषा’ के समानांतर पढ़ने के लिए कहती है, ताकि वे उपमान, शब्दचयन और परिवेश की दृष्टि से तीनों कविताओं की तुलना कर सकें। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में तुलनात्मक विश्लेषण की क्षमता विकसित करना और यह समझना है कि अलग-अलग कवि एक ही विषय (सूर्योदय) को कितने भिन्न ढंग से, अपने-अपने युग और शैली के अनुसार, चित्रित करते हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. शमशेर बहादुर सिंह के जीवन-परिचय और उनके काव्य-व्यक्तित्व का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर: शमशेर बहादुर सिंह का जन्म 13 जनवरी, सन् 1911 को देहरादून (उत्तर प्रदेश, अब उत्तराखंड) में हुआ था, और उनका निधन सन् 1993 में अहमदाबाद में हुआ। उनकी छह प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ हैं: कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, चुका भी हूँ नहीं मैं, इतने पास अपने, बात बोलेगी और काल तुझसे होड़ है मेरी। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘उर्दू-हिंदी कोश’ का संपादन भी किया। उन्हें ‘साहित्य अकादेमी’ पुरस्कार तथा ‘कबीर सम्मान’ सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। काव्य-व्यक्तित्व की दृष्टि से शमशेर खुद को उर्दू और हिंदी का दोआब मानते थे, और उनकी कविता साहित्य, चित्रकला और संगीत के संधिस्थल पर, तथा मूर्तता-अमूर्तता और ऐंद्रिय-ऐंद्रियेतर के संधिस्थल पर खड़ी है। विचारों के स्तर पर प्रगतिशील और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मी इस कवि की पहचान एक बिंबधर्मी कवि के रूप में हुई, जिनका चित्रकार मन भाषातीत हो जाना चाहता है; पाठ के अनुसार उनकी मूल चिंता माध्यम का उपयोग करते हुए भी बंधन से परे जाने की है।
प्र. ‘उषा’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखते हुए बताइए कि इसमें प्रकृति-चित्रण किस तरह किया गया है।
उत्तर: ‘उषा’ शमशेर बहादुर सिंह की एक छोटी कविता है (पाठ में 14 पंक्तियाँ), जो सूर्योदय के ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र है। कविता की शुरुआत में भोर का आकाश बहुत नीला, शंख जैसा दिखता है। फिर भोर के नभ को राख से लीपा हुआ, अभी गीला चौका कहा गया है। इसके बाद आकाश में हल्की लालिमा उभरती है, जिसे कवि काली सिल पर धुले लाल केसर और स्लेट पर मले गए लाल खड़िया चाक, दो उपमाओं से दिखाते हैं। फिर आकाश की चमक-हलचल को नीले जल में किसी गोरी, झिलमिलाती देह के हिलने जैसा बताया गया है। अंत में “और…” के बाद कविता अचानक ठहरकर कहती है कि अब उषा का यह सारा जादू टूट रहा है, क्योंकि सूर्योदय हो रहा है। इस तरह कवि ने प्रकृति के इस बदलाव को गाँव के रोज़मर्रा जीवन की परिचित वस्तुओं (चौका, सिल, स्लेट-चाक) से जोड़कर एक जीवंत, घरेलू शब्द-चित्र बनाया है।
प्र. ‘उषा’ कविता की काव्यगत विशेषताओं (छंद, अलंकार, बिंब-योजना) का विस्तृत विवेचन कीजिए।
उत्तर: ‘उषा’ मुक्त छंद में रचित कविता है, अर्थात इसमें कोई बँधी हुई मात्रा या तुक-योजना नहीं है, यह भाव के स्वाभाविक प्रवाह में लिखी गई है। अलंकार की दृष्टि से कविता में मुख्यतः उपमा है (‘प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे’, ‘कि जैसे धुल गई हो’, ‘नील जल में या किसी की … जैसे हिल रही हो’), जबकि ‘भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका’ में बिना तुलनावाचक शब्द के रूपक है। इन उपमानों में शंख, चौका, काली सिल पर लाल केसर, स्लेट पर लाल खड़िया चाक और नील जल में गौर झिलमिल देह आते हैं। बिंब-योजना की दृष्टि से यह कविता शमशेर की बिंबधर्मिता का अच्छा उदाहरण है: शब्दों से ऐसा चित्र बनता है कि पाठक के मन में आकाश के बदलते रंग उभर आते हैं। पाठ इस कविता को सूर्योदय के ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र कहता है।
5 केस स्टडी
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने
(क) 1 अंक इस पद्यांश में किस रंग-परिवर्तन को दिखाया गया है?
उत्तर: सही उत्तर है काले से लाल में। आकाश की कालिमा में उभरती हल्की लालिमा को यहाँ दो उपमाओं (सिल-केसर, स्लेट-चाक) से दिखाया गया है।
(ख) 1 अंक ‘सिल’ शब्द से पाठक को किस दृश्य की याद आती है?
उत्तर: उत्तर: मसाला पीसने का पत्थर (सामान्य अर्थ; पाठ में परिभाषा नहीं दी गई)। सिल घरों में मसाला पीसने का पत्थर होता है, जो इस कविता का एक घरेलू उपमान है।
(ग) 2 अंक इस पद्यांश में एक ही रंग-परिवर्तन को दो अलग उपमाओं (सिल-केसर, स्लेट-चाक) से क्यों दिखाया गया है?
उत्तर: माना जा सकता है कि कवि एक ही दृश्य, आकाश में उभरती लालिमा, को दो अलग-अलग परिचित वस्तुओं से दिखाकर उस रंग-परिवर्तन को पाठक के मन में और गहरा और स्पष्ट बनाना चाहते हैं। यह दोहराव कविता की बिंबधर्मिता को और सघन करता है।
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।
(क) 1 अंक पंक्ति “और…” में प्रयुक्त बिंदु-चिह्न (…) किसका संकेत देते हैं?
उत्तर: सही उत्तर है एक ठहराव का। ये बिंदु कविता में एक ठहराव लाते हैं, जिसके बाद ‘जादू टूटता है इस उषा का अब’ आता है।
(ख) 1 अंक ‘उषा का जादू टूटना’ का अर्थ क्या है?
उत्तर: सही उत्तर है भोर के दृश्य का सूर्योदय में बदल जाना। जैसे ही सूर्योदय होता है, भोर (उषा) का जादुई, बदलता दृश्य समाप्त हो जाता है।
(ग) 2 अंक इस अंतिम पद्यांश का कविता के समापन में क्या महत्व है?
उत्तर: यह पद्यांश कविता को एक निश्चित अंत देता है, अब तक जो बदलते रंगों का जादू-सा दृश्य बनता आ रहा था, वह सूर्योदय होते ही टूट जाता है। यह पंक्ति कविता के विषय, सूर्योदय से ठीक पहले पल-पल बदलती प्रकृति, को समेटती है और कविता को एक सटीक, समयबद्ध क्षण पर समाप्त करती है।