NCERT की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 के अध्याय 5 “उषा” (शमशेर बहादुर सिंह) के अभ्यास (कविता के साथ, अपनी रचना, आपसदारी) के सभी प्रश्नों के पूरे हल। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 कविता के साथ
प्र. कविता के किन उपमानों को देखकर यह कहा जा सकता है कि उषा कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र है?
उत्तर: कविता के कई उपमान सीधे गाँव के रोज़मर्रा जीवन से लिए गए हैं, जिससे यह गाँव की सुबह का जीवंत शब्दचित्र बन जाती है। भोर के आकाश को “राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है)” कहा गया है, चौका वह रसोई-स्थान है जिसे गाँव में राख से लीपा जाता है (पाठ में ‘राख से लीपा हुआ चौका’ है)। फिर आकाश की लालिमा को “बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से … धुल गई हो” कहा गया है, सिल मसाला पीसने का गाँव का पत्थर है। इसी लालिमा की एक और उपमा “स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो” है, स्लेट और चाक गाँव के बच्चों की पढ़ाई की चीज़ें हैं। ये तीनों उपमान (चौका, सिल, स्लेट-चाक) आकाश जैसी विराट, दूर की चीज़ को आँगन, रसोई और स्कूली बच्चों जैसे बिलकुल पास के, परिचित गाँव-जीवन से जोड़ देते हैं, और आकाश का रंग पल-पल कैसे बदलता है यह दिखाकर कविता को गतिशील बना देते हैं। इसीलिए यह कविता गाँव की सुबह का एक गतिशील शब्दचित्र कही जा सकती है।
प्र. भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका / (अभी गीला पड़ा है)
नयी कविता में कोष्ठक, विराम चिह्नों और पंक्तियों के बीच का स्थान भी कविता को अर्थ देता है। उपर्युक्त पंक्तियों में कोष्ठक से कविता में क्या विशेष अर्थ पैदा हुआ है? समझाइए।
उत्तर: “(अभी गीला पड़ा है)” को कोष्ठक में रखकर कवि ने इसे एक अलग, धीमी टिप्पणी जैसा बना दिया है। गाँव में चौका राख से लीपा जाता है, और लीपने के बाद वह कुछ देर गीला और हल्की चमक लिए रहता है। कोष्ठक से ताज़े, अभी-अभी बने क्षण की ओर ध्यान दिलाया गया लगता है (यह व्याख्या है): माना जा सकता है कि भोर का आकाश भी उस ताज़े लीपे हुए चौके जैसा नया-नया, अभी-अभी बना हुआ और हल्का धूसर-गीला-सा है, पूरी तरह उजला-चमकीला नहीं हुआ है। इस तरह कोष्ठक एक छोटी-सी बात के ज़रिए समय की सूक्ष्मता (यह अभी का, ताज़ा क्षण है) और आकाश की बनावट दोनों को एक साथ पकड़ लेता है, जो कोष्ठक के बाहर सीधे कहने पर उतना असरदार नहीं होता।
2 अपनी रचना
प्र. अपने परिवेश के उपमानों का प्रयोग करते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त का शब्दचित्र खींचिए।
उत्तर: (यह एक रचनात्मक-लेखन गतिविधि है, जिसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं होता, विद्यार्थी अपने आस-पास के परिवेश से अपने उपमान चुनकर लिखें, ठीक वैसे ही जैसे शमशेर ने चौका, सिल और स्लेट-चाक जैसे गाँव के उपमान चुने। एक नमूना शब्दचित्र:)
सूर्योदय: पूरब का आकाश जैसे किसी ने संतरे का रस बिखेर दिया हो,
बादल जैसे रुई के फाहे जिन पर हल्की गुलाबी लाली छिड़क दी गई हो।
सूर्यास्त: डूबता सूरज जैसे लाल टमाटर पानी में घुल रहा हो,
आकाश जैसे शाम की चाय में कोई केसर घोल गया हो।
नमूने में देखें कि हर उपमा अपने घर-आँगन, रसोई या बाज़ार की परिचित चीज़ (संतरे का रस, रुई, टमाटर, चाय-केसर) से ली गई है, यही तरीका शमशेर ने अपनाया है, विद्यार्थी अपने खुद के परिवेश (शहर, गाँव, स्कूल) की चीज़ों से वैसे ही उपमान गढ़ें।
3 आपसदारी
प्र. सूर्योदय का वर्णन लगभग सभी बड़े कवियों ने किया है। प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ और अज्ञेय की ‘बावरा अहेरी’ की पंक्तियाँ आगे बॉक्स में दी जा रही हैं। ‘उषा’ कविता के समानांतर इन कविताओं को पढ़ते हुए नीचे दिए गए बिंदुओं पर तीनों कविताओं का विश्लेषण कीजिए और यह भी बताइए कि कौन-सी कविता आपको ज़्यादा अच्छी लगी और क्यों?
• उपमान • शब्दचयन • परिवेश
बीती विभावरी जाग री! (जयशंकर प्रसाद)
बीती विभावरी जाग री!
अंबर पनघट में डुबो रही—
तारा-घट ऊषा नागरी।
खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई—
मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए—
तू अब तक सोई है आली
आँखों में भरे विहाग री।
भोर का बावरा अहेरी (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’)
भोर का बावरा अहेरी
पहले बिछाता है आलोक की
लाल-लाल कनियाँ
पर जब खींचता है जाल को
बाँध लेता है सभी को साथ:
छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े पंखी
डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल
उड़ने जहाज़,
कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले
तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी
बेपनाह काया को:
गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी
पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रूप-रेखा को
और दूर कचरा जलानेवाली कल की उद्दंड चिमनियों को, जो
धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी।
उत्तर:
| बिंदु | उषा (शमशेर) | बीती विभावरी जाग री (प्रसाद) | भोर का बावरा अहेरी (अज्ञेय) |
|---|---|---|---|
| उपमान | नीला शंख, राख-लीपा चौका, काली सिल पर लाल केसर, स्लेट-चाक, नील जल में देह, गाँव-जीवन की सीधी, ठोस चीज़ें | ऊषा को आकाश (अंबर) के पनघट में तारा-घट डुबोने वाली “नागरी” (नायिका) कहा गया, शृंगार-प्रधान मानवीकरण | भोर को शिकार खेलने वाला “बावरा अहेरी” (पागल शिकारी) कहा गया, जो जाल में सबको बाँध लेता है, गतिशील, नाटकीय बिंब |
| शब्दचयन | सरल, बोलचाल के, छोटे-छोटे वाक्यांश (“जैसे”, “कि जैसे”) | तत्सम, संगीतात्मक, तुकांत शब्दावली (विभावरी, अंबर, किसलय, विहाग) | आधुनिक, मिश्रित शब्दावली, परंपरा (कलस-तिसूल, मंदिर-शिखर) और आधुनिकता (मोटरों के धुएँ, तारघर, उद्दंड चिमनियाँ) दोनों साथ |
| परिवेश | गाँव, आँगन-चौका-सिल-स्कूली स्लेट | प्रकृति/शृंगार, पनघट-लता-पक्षी-कुल-मलयज (मलय हवा) | शहर और प्रकृति दोनों मिश्रित, मंदिर-शिखर से लेकर तारघर, मोटरें, पार्क, चिमनियाँ तक |
तीनों कवि एक ही दृश्य (सूर्योदय) को अपने-अपने युग और शैली के अनुसार अलग ढंग से देखते हैं: प्रसाद छायावादी शृंगार-बिंब रचते हैं, अज्ञेय भोर को एक विशाल, आधुनिक शहरी दृश्य समेटने वाले शिकारी के रूप में देखते हैं, जबकि शमशेर बिलकुल पास के, छोटे और गाँव के रोज़मर्रा उपमानों से आकाश के बदलते रंगों को पकड़ते हैं। (यह अंतिम भाग विद्यार्थी की अपनी राय का है, एक नमूना राय:) ‘उषा’ सबसे ज़्यादा अच्छी लगती है, क्योंकि इसके उपमान बेहद सरल और अपने आस-पास के जीवन से जुड़े होने पर भी आकाश के बदलाव को बहुत बारीकी और ताज़गी से दिखाते हैं, बिना किसी भारी-भरकम शब्दावली के।