NCERT की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 के अध्याय 4 “कैमरे में बंद अपाहिज” (रघुवीर सहाय) के अभ्यास (कविता के साथ, कविता के आसपास) के सभी प्रश्नों के पूरे हल। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 कविता के साथ
प्र. कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं, आपकी समझ से इसका क्या औचित्य है?
उत्तर: कोष्ठकों में रखी पंक्तियों को कार्यक्रम के पीछे की वह असली, अनकही बातचीत माना जा सकता है जो कार्यक्रम की टीम आपस में करती है, जैसे “(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा)”, “(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)”, “(कैमरा / बस करो / नहीं हुआ / रहने दो / परदे पर वक्त की कीमत है)”। ये पंक्तियाँ कोष्ठक में रखी गई हैं और दर्शकों के सामने दिखाए गए कार्यक्रम से अलग पढ़ी जा सकती हैं; “(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)” स्वयं बताती है कि सब कुछ दर्शक के सामने नहीं कहा जाएगा। कोष्ठक के बाहर की पंक्तियाँ वह “दिखावटी” चेहरा हैं जो दर्शक देखते हैं, जबकि कोष्ठक के भीतर की पंक्तियाँ असली, संवेदनहीन और व्यावसायिक सोच को उजागर करती हैं। इसी तकनीक से कवि टेलीविज़न कार्यक्रम की दोहरी सचाई (जो दिखता है और जो वास्तव में होता है) को एक साथ पाठक के सामने रख देता है, बिना कुछ सीधे कहे।
प्र. ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ करुणा के मुखौटे में छिपी क्रूरता की कविता है, विचार कीजिए।
उत्तर: यह कथन काफ़ी हद तक सही है। कार्यक्रम ऊपर से एक “सामाजिक उद्देश्य से युक्त” और संवेदनशील दिखने वाला प्रयास लगता है, जो एक शारीरिक रूप से चुनौतीग्रस्त व्यक्ति की पीड़ा को समाज के सामने लाने का दावा करता है। लेकिन असल में साक्षात्कारकर्ता की मंशा उस व्यक्ति के प्रति करुणा जगाना नहीं, बल्कि उसे बार-बार चुभने वाले सवाल पूछकर रुलाना और उसकी पीड़ा को कार्यक्रम को “रोचक” बनाने के लिए भुनाना है, “हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे”, “हमें दोनों एक संग रुलाने हैं”। यह सब करुणा के मुखौटे के पीछे छिपी हुई एक ठंडी, व्यावसायिक क्रूरता है, जो अंत में औपचारिक “धन्यवाद” कहकर स्वयं को निर्दोष भी सिद्ध कर देती है। पाठ के अनुसार अपनी व्यंजना में यह कविता हर ऐसे व्यक्ति की ओर इशारा करती है जो दुख-दर्द, यातना-वेदना को बेचना चाहता है; साथ ही इसे शारीरिक चुनौती झेलते लोगों के प्रति संवेदनशील नज़रिया अपनाने के लिए प्रेरित करते पाठ के रूप में भी देखा जा सकता है।
प्र. ‘हम समर्थ शक्तिवान’ और ‘हम एक दुर्बल को लाएँगे’ पंक्ति के माध्यम से कवि ने क्या व्यंग्य किया है?
उत्तर: इन पंक्तियों में कवि ने टेलीविज़न माध्यम (या किसी भी ताकतवर संस्था) और एक असहाय, शारीरिक रूप से चुनौतीग्रस्त व्यक्ति के बीच के सत्ता-असंतुलन को उजागर किया है। “हम समर्थ शक्तिवान” कहकर माध्यम अपनी ताकत और अधिकार का घमंडपूर्ण एहसास कराता है, जबकि “एक दुर्बल को लाएँगे” कहकर वह उस व्यक्ति को केवल एक वस्तु या साधन की तरह पेश करता है, जिसे “लाया” जाता है, जैसे उसकी अपनी कोई इच्छा या गरिमा ही न हो। कवि यहाँ व्यंग्य करता है कि किस तरह शक्तिशाली मीडिया-तंत्र कमज़ोर और असहाय लोगों का इस्तेमाल अपने कार्यक्रम की सफलता के लिए एक साधन के रूप में करता है।
प्र. यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना कर रहे व्यक्ति और दर्शक, दोनों एक साथ रोने लगेंगे, तो उससे प्रश्नकर्ता का कौन-सा उद्देश्य पूरा होगा?
उत्तर: प्रश्नकर्ता (कार्यक्रम बनाने वाली टीम) का असली उद्देश्य कार्यक्रम को अधिक-से-अधिक भावुक, नाटकीय और “रोचक” बनाना है ताकि वह अधिक दर्शकों को बाँध सके और कार्यक्रम व्यावसायिक रूप से सफल हो। यदि अपाहिज व्यक्ति और दर्शक दोनों एक साथ रो पड़ें, तो यह कार्यक्रम की भावनात्मक “सफलता” का प्रमाण बन जाएगा, दर्शकों को यह विश्वास हो जाएगा कि उन्होंने सच्ची, गहरी पीड़ा देखी और महसूस की है। इस तरह असली उद्देश्य पीड़ित व्यक्ति की सहायता या उसके प्रति संवेदनशीलता जगाना नहीं, बल्कि दर्शकों की भावनाओं से खेलकर कारोबारी लाभ और लोकप्रियता बढ़ाना है (पाठ ‘कारोबारी दबाव’ की बात करता है)।
प्र. ‘परदे पर वक्त की कीमत है’ कहकर कवि ने पूरे साक्षात्कार के प्रति अपना नज़रिया किस रूप में रखा है?
उत्तर: इस पंक्ति से कवि यह स्पष्ट करता है कि टेलीविज़न कार्यक्रम में असली भावनाओं, संवेदनशीलता या सच्चाई से कहीं ज़्यादा महत्त्व प्रसारण के समय (वक्त) और उसकी व्यावसायिक कीमत का होता है। जब रुलाने की कोशिश असफल हो जाती है, तो कोष्ठक में, कार्यक्रम की टीम की ओर से, बेपरवाही से कह दिया जाता है “रहने दो / परदे पर वक्त की कीमत है”, यानी अब और समय बर्बाद करने का कोई फ़ायदा नहीं। इससे कवि का यह नज़रिया स्पष्ट होता है कि पूरा साक्षात्कार एक सच्ची संवेदना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि समय और पैसे की तराज़ू पर तौला गया एक ठंडा व्यावसायिक सौदा मात्र है।
2 कविता के आसपास
प्र. यदि आपको शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे किसी मित्र का परिचय लोगों से करवाना हो, तो किन शब्दों में करवाएँगी?
उत्तर: (यह एक व्यक्तिगत विचार वाला खुला प्रश्न है, विद्यार्थी अपने शब्दों में उत्तर दें। एक नमूना उत्तर:) मैं अपने मित्र का परिचय सबसे पहले उसकी योग्यताओं, रुचियों और उपलब्धियों से करवाऊँगी, जैसे उसकी पढ़ाई, खेल या कला में दिलचस्पी, न कि उसकी शारीरिक चुनौती से। मैं उसे कभी “बेचारा” या दया का पात्र बनाकर पेश नहीं करूँगी, बल्कि यह बताऊँगी कि वह हर किसी की तरह ही एक सामान्य, सक्षम और आत्मनिर्भर व्यक्ति है, जिसकी शारीरिक स्थिति केवल उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा है, पूरी पहचान नहीं।
प्र. सामाजिक उद्देश्य से युक्त ऐसे कार्यक्रम को देखकर आपको कैसा लगेगा? अपने विचार संक्षेप में लिखें।
उत्तर: (यह एक व्यक्तिगत विचार वाला खुला प्रश्न है। एक नमूना उत्तर:) ऐसा कार्यक्रम देखकर मुझे बहुत दुख और गुस्सा दोनों होंगे। दुख इसलिए कि एक असहाय व्यक्ति की निजी पीड़ा को सार्वजनिक तमाशा बना दिया गया, और गुस्सा इसलिए कि यह सब “सामाजिक उद्देश्य” के झूठे नाम पर किया गया। सच्ची संवेदनशीलता किसी की पीड़ा को बार-बार कुरेदने में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा बनाए रखते हुए उसकी मदद करने में होती है। ऐसा कार्यक्रम समाज को संवेदनशील बनाने के बजाय दर्शकों को दूसरों के दुख का तमाशा देखने का आदी बना देता है, जो बेहद चिंताजनक है।
प्र. यदि आप इस कार्यक्रम के दर्शक हैं तो टी.वी. पर ऐसे सामाजिक कार्यक्रम को देखकर एक पत्र में अपनी प्रतिक्रिया दूरदर्शन निदेशक को भेजें।
उत्तर:
सेवा में,
निदेशक महोदय,
दूरदर्शन केंद्र।
विषय: “कैमरे में बंद अपाहिज” जैसे संवेदनहीन कार्यक्रम के प्रसारण पर आपत्ति।
महोदय,
मैं आपके चैनल पर हाल ही में प्रसारित एक कार्यक्रम को लेकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करना चाहता/चाहती हूँ, जिसमें एक शारीरिक रूप से चुनौतीग्रस्त व्यक्ति का साक्षात्कार बार-बार चुभते सवालों और उसे जान-बूझकर रुलाने की कोशिशों के साथ किया गया। यह “सामाजिक उद्देश्य” के नाम पर उस व्यक्ति की गरिमा और निजता का सरासर अपमान था। मेरा निवेदन है कि भविष्य में ऐसे संवेदनशील विषयों पर कार्यक्रम बनाते समय व्यक्ति की गरिमा और सहमति को सर्वोपरि रखा जाए, न कि उसकी पीड़ा को कार्यक्रम की “रोचकता” बढ़ाने का साधन बनाया जाए। आशा है आप इस सुझाव पर गंभीरता से विचार करेंगे।
सधन्यवाद,
एक जागरूक दर्शक
प्र. नीचे दिए गए खबर के अंश को पढ़िए और बिहार के इस बुधिया से एक काल्पनिक साक्षात्कार कीजिए (पाँच वर्षीय, जन्म से पूर्ण रूप से विकलांग पवन, जिसे “बिहारी बुधिया” कहा जाता है, ने पटना में पाँच किलोमीटर दौड़ लगाई थी)।
उत्तर: (यह एक रचनात्मक-लेखन प्रश्न है, विद्यार्थी अपने शब्दों में साक्षात्कार लिखें। एक नमूना साक्षात्कार, कविता की संवेदनहीन शैली के विपरीत, सम्मानजनक ढंग से लिखा गया:)
प्रश्न: पवन, सबसे पहले तो तुम्हें इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी दौड़ पूरी करने के लिए बहुत बधाई। तुम्हें यह दौड़ने का विचार कैसे आया?
पवन: मैंने उड़ीसा के बुधिया भाई के बारे में सुना था कि उन्होंने 65 किलोमीटर दौड़ लगाई थी, मुझे भी लगा कि मैं भी कुछ ऐसा कर सकता हूँ।
प्रश्न: दौड़ते समय तुम्हें सबसे ज़्यादा किस बात ने हौसला दिया?
पवन: मेरे साथ ‘उम्मीद स्कूल’ के लगभग तीन सौ बच्चे भी दौड़ रहे थे, उनका साथ देखकर मुझे कभी अकेला महसूस नहीं हुआ।
प्रश्न: आगे तुम्हारा क्या सपना है?
पवन: मैं कश्मीर से कन्याकुमारी तक की पूरी दूरी पैदल तय करना चाहता हूँ, और यह दिखाना चाहता हूँ कि हौसला हो तो शरीर की कोई भी सीमा रास्ते में नहीं आती।