इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. गांधीजी ने भारत में अपना पहला बड़ा सार्वजनिक भाषण किस वर्ष और नगर में दिया?
उत्तर: गांधीजी ने फ़रवरी 1916 में बनारस (वाराणसी) में, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में अपना पहला बड़ा सार्वजनिक भाषण दिया।
प्र. किस घटना ने गांधीजी को असहयोग आंदोलन वापस लेने पर मजबूर किया?
उत्तर: फ़रवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में किसानों द्वारा एक पुलिस थाने पर हमला करने और कई कांस्टेबलों की हत्या करने की घटना ने गांधीजी को असहयोग आंदोलन वापस लेने पर मजबूर किया।
प्र. ख़िलाफ़त आंदोलन क्या था?
उत्तर: ख़िलाफ़त आंदोलन (1919-1920), मुहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में, माँग करता था कि तुर्की सुल्तान (ख़लीफ़ा) के पास प्रथम विश्व युद्ध के बाद इस्लाम की रक्षा के लिए पर्याप्त भू-भाग बचा रहे; गांधीजी ने इसे असहयोग आंदोलन से जोड़ा।
प्र. गांधी-इरविन समझौता क्या था?
उत्तर: मार्च 1931 में गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुआ यह समझौता सविनय अवज्ञा आंदोलन की वापसी, क़ैदियों की रिहाई और तटीय क्षेत्रों में नमक-निर्माण की अनुमति पर आधारित था, बदले में गांधीजी को केवल भविष्य की वार्ता का आश्वासन मिला, स्वतंत्रता का नहीं।
प्र. दूसरे गोल मेज सम्मेलन में गांधीजी के पूरे भारत के प्रतिनिधित्व के दावे को किन तीन पक्षों ने चुनौती दी?
उत्तर: मुस्लिम लीग (मुस्लिम अल्पसंख्यकों के हित का दावा), राजे-रजवाड़े (उनके भूभाग पर कांग्रेस का अधिकार नहीं) और बी.आर. अम्बेडकर (कांग्रेस निचली जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती)।
प्र. जलियाँवाला बाग नरसंहार कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: जलियाँवाला बाग नरसंहार अप्रैल 1919 में अमृतसर (पंजाब) में हुआ, जब एक ब्रिटिश ब्रिगेडियर के आदेश पर सैनिकों ने एक निहत्थी राष्ट्रवादी सभा पर गोली चलाई।
प्र. महात्मा गांधी की हत्या किसने, और किस तिथि को की?
उत्तर: 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में अपनी दैनिक प्रार्थना-सभा में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. गांधीजी ने अपने 1930 के सत्याग्रह के केंद्र के रूप में नमक क्यों चुना?
उत्तर: नमक हर भारतीय परिवार की, अमीर-ग़रीब सभी की, रोज़मर्रा की आवश्यकता था, इसलिए नमक-एकाधिकार तोड़ना राजनीतिक रूप से सक्रिय दायरों से कहीं आगे व्यापक जन-असंतोष जुटा सकता था। साथ ही यह एक सरल, स्पष्ट क़ानून-भंग था, जिसे कोई भी व्यक्ति समुद्र-तट पर एक मुट्ठी नमक बनाकर तुरंत कर सकता था, इसलिए यह व्यापक भागीदारी के लिए आदर्श था।
प्र. पृथक निर्वाचिकाओं के प्रति गांधीजी के विरोध पर अम्बेडकर की क्या आपत्ति थी?
उत्तर: अम्बेडकर का तर्क था कि दमित वर्ग सामाजिक व आर्थिक रूप से इतना बहिष्कृत था कि उसे संगठित निरंकुशता के विरुद्ध स्वयं की रक्षा के लिए स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति चाहिए; उनके अनुसार, गांधीजी का ‘अस्पृश्यता विनाश’ का आह्वान दमित वर्गों को तत्काल राजनीतिक सुरक्षा से वंचित रखता था।
प्र. सतारा की प्रति सरकार क्या थी?
उत्तर: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सतारा (महाराष्ट्र) में स्थापित प्रति सरकार एक समानांतर सरकार थी, जिसे स्वयंसेवी दलों (सेवा दल) और ग्राम-इकाइयों (तूफ़ान दल) ने चलाया; यह लोक-अदालतें व रचनात्मक कार्य करते हुए 1946 के चुनावों तक कार्यरत रही, दशकों पुराने ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन पर निर्मित।
प्र. समाचार-पत्र रिपोर्टों को निष्पक्ष स्रोत मानकर क्यों नहीं पढ़ना चाहिए?
उत्तर: समाचार-पत्र, अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं दोनों में, अपने प्रकाशकों के राजनीतिक विचारों और विश्व-दृष्टिकोण से आकारित होते थे, इसलिए लंदन के अख़बार और भारतीय राष्ट्रवादी अख़बार की एक ही घटना की रिपोर्टिंग बहुत भिन्न होती थी; इसलिए हर रिपोर्ट को यह पूछते हुए पढ़ना चाहिए कि वह किसके हित को दर्शाती है।
प्र. 1942 में क्रिप्स मिशन की वार्ता क्यों टूट गई?
उत्तर: 1942 के वसंत में चर्चिल ने सर स्टेफ़र्ड क्रिप्स को गांधीजी और कांग्रेस से समझौते के लिए भारत भेजा। कांग्रेस ने ज़ोर दिया कि अगर धुरी शक्तियों से भारत की रक्षा के लिए अंग्रेज़ कांग्रेस का समर्थन चाहते हैं तो वायसराय पहले अपनी कार्यकारी परिषद में किसी भारतीय को रक्षा सदस्य नियुक्त करे; इसी बात पर वार्ता टूट गई।
प्र. 1919 के रौलट सत्याग्रह ने गांधीजी की स्थिति को कैसे बदला?
उत्तर: रौलट अधिनियम के विरुद्ध देशव्यापी विरोध और उसके बाद के जलियाँवाला बाग नरसंहार ने गांधीजी को वास्तव में एक राष्ट्रीय नेता बना दिया, जिसके बाद उन्होंने असहयोग आंदोलन शुरू करने का साहस और जन-समर्थन दोनों पाया।
3 3 अंक के प्रश्न
प्र. महात्मा गांधी ने आम लोगों से पहचान बनाने का प्रयास कैसे किया?
उत्तर: गांधीजी ने सादी धोती पहनी और चरखे पर दैनिक घंटे बिताए, जिससे वे उन किसानों-श्रमिकों जैसे दिखते और रहते जिनका वे प्रतिनिधित्व करना चाहते थे, अन्य अभिजात नेताओं के विपरीत। कताई ने प्रतीकात्मक रूप से मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच पारंपरिक जाति-सीमा भी तोड़ी। उन्होंने चंपारन, खेड़ा और अहमदाबाद जैसे स्थानीय, ग़रीबों से जुड़े मुद्दों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया और स्थानीय भाषाओं में संदेश पहुँचाने पर बल दिया, अंग्रेज़ी के बजाय। इन सबने उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जो सचमुच ग़रीबों की भाषा बोलता और उनके जैसा जीता था।
प्र. शाहिद अमीन के अध्ययन के अनुसार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा महात्मा गांधी को कैसे देखा गया?
उत्तर: शाहिद अमीन के अध्ययन के अनुसार फ़रवरी 1921 के गांधी-दौरे के समय किसानों ने उन्हें लगभग चमत्कारी शक्तियों वाला मान लिया था: छोटे स्टेशनों पर 10,000-20,000 की भीड़ जुटती, लोग उन पर नोट-सिक्के बरसाते, और अफ़वाहें फैलतीं कि उनकी आलोचना करने वालों की फ़सल नष्ट हो जाएगी या घर ढह जाएगा, और एक किसान के कहने पर उसके कारख़ाने का गन्ने के रस से भरा कड़ाह बीच से दो टुकड़े हो गया। ये अफ़वाहें यह प्रमाण नहीं देतीं कि गांधीजी वास्तव में क्या कर सकते थे, बल्कि यह दिखाती हैं कि उस क्षण किसान क्या मानना और आशा करना चाहते थे।
प्र. चरखे को राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में क्यों चुना गया?
उत्तर: चरखा साधारण था, किसी भी घर में मौजूद हो सकता था, और ग़रीबों के दैनिक जीवन से सीधे जुड़ा था, इसलिए यह गांधीजी की ग़रीबों से पहचान का सबसे सुलभ प्रतीक बना। इसने मशीनीकरण के विरुद्ध नहीं बल्कि उसके नियंत्रित, मानवीय प्रयोग के पक्ष में गांधीजी के रुख़ को भी व्यक्त किया, स्वयं ‘मशीनरी का एक उत्कृष्ट टुकड़ा’ होते हुए भी। साथ ही कताई मानसिक व शारीरिक श्रम के बीच जाति-सीमा तोड़ती थी और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार व स्वदेशी खादी को बढ़ावा देकर आर्थिक स्वावलंबन का व्यावहारिक साधन भी थी।
प्र. गोलमेज़ सम्मेलनों में संवाद अनिर्णायक क्यों रहे?
उत्तर: पहला गोलमेज़ सम्मेलन (नवंबर 1930) गांधीजी की अनुपस्थिति में हुआ, इसलिए यह लगभग निरर्थक साबित हुआ। दूसरे सम्मेलन (1931 के अंत) में गांधीजी उपस्थित थे, पर उनका पूरे भारत के प्रतिनिधित्व का दावा मुस्लिम लीग, रियासतों और बी.आर. अम्बेडकर, तीनों ने अलग-अलग आधारों पर चुनौती दिया, जिससे कोई एकमत समाधान नहीं निकल सका। सम्मेलन अनिर्णायक रहा और गांधीजी ने लौटकर सविनय अवज्ञा फिर शुरू की; नया वायसराय लॉर्ड विलिंग्डन गांधीजी के प्रति गहरी असहानुभूति रखता था, जैसा उसके निजी पत्र से पता चलता है।
प्र. निजी पत्र और आत्मकथाएँ किसी व्यक्ति के बारे में क्या बताते हैं, और ये स्रोत आधिकारिक वृत्तांतों से कैसे भिन्न हैं?
उत्तर: निजी पत्र लेखक के तात्कालिक, अक्सर अधिक स्पष्ट विचार दिखाते हैं, जैसे 1936 में नेहरू-प्रसाद-पटेल-गांधी के बीच के पत्र कांग्रेस के आंतरिक वैचारिक तनाव उजागर करते हैं, यद्यपि प्रकाशन की संभावना इन्हें भी पूर्णतः निष्पक्ष नहीं रहने देती। आत्मकथाएँ स्मृति से, पूर्वदर्शी ढंग से लिखी जाती हैं, इस बात से आकारित कि लेखक क्या याद रखा जाना चाहता है। ये दोनों औपनिवेशिक पुलिस रिपोर्टों या सरकारी वृत्तांतों से भिन्न हैं, जो सत्ता बनाए रखने के दृष्टिकोण से लिखे जाते और अक्सर वही दर्ज करते हैं जो अधिकारी मानना चाहते थे, वास्तविक ज़मीनी सच्चाई नहीं।
प्र. गृह विभाग की पाक्षिक रिपोर्टों ने नमक मार्च को कैसे प्रस्तुत किया, और क्यों?
उत्तर: पाक्षिक रिपोर्टों ने लगातार नमक मार्च के प्रभाव को कम आँका, इसे एक वास्तविक जन-आंदोलन के बजाय एक ‘नाटक’ मानते हुए, जैसे मद्रास की रिपोर्ट ने इसे ‘नाटकीय’ और ‘अव्यावहारिक’ कहा। यह प्रवृत्ति इसलिए थी क्योंकि रिपोर्टें उन औपनिवेशिक अधिकारियों ने लिखीं जो अपने शासन के आधार पर सवाल उठाने वाले किसी बड़े जन-असंतोष को स्वीकार करने में अनिच्छुक थे; फिर भी उन्हीं रिपोर्टों में अप्रैल तक नमक अधिनियम के खुले उल्लंघन का उल्लेख आ जाना दिखाता है कि आधिकारिक आश्वासन और ज़मीनी वास्तविकता में बड़ा अंतर था।
4 4 अंक के प्रश्न
प्र. चंपारन, खेड़ा और अहमदाबाद के आंदोलनों में समानता और अंतर बताइए।
उत्तर: समानता: तीनों 1917-18 में गांधीजी के भारत लौटने के बाद के शुरुआती हस्तक्षेप थे, जिन्होंने उन्हें ग़रीबों के प्रति वास्तविक सहानुभूति रखने वाले नेता के रूप में स्थापित किया, और तीनों स्थानीय, विशिष्ट शिकायतों (नील-खेती, फ़सल-कर, मज़दूरी) पर केंद्रित थे। अंतर: चंपारन किसानों की काश्तकारी-सुरक्षा से जुड़ा था, खेड़ा असफल-फ़सल के बाद कर-माफ़ी से, और अहमदाबाद वस्त्र-मिल मज़दूरों की वेतन-माँग से, यानी अलग-अलग सामाजिक वर्गों (किसान, किसान-कर, औद्योगिक मज़दूर) और अलग-अलग औपनिवेशिक/निजी विरोधियों (बाग़ान-मालिक, सरकार, मिल-मालिक) से जुड़े थे। ये तीनों राष्ट्रीय स्तर पर नहीं बल्कि स्थानीय ही बने रहे, राष्ट्रव्यापी आंदोलन असहयोग के साथ ही आया।
प्र. गांधी-इरविन समझौते की आलोचना रैडिकल राष्ट्रवादियों ने क्यों की?
उत्तर: समझौते में सविनय अवज्ञा वापसी, क़ैदी-रिहाई और तटीय नमक-निर्माण की अनुमति तो मिली, पर गांधीजी वायसराय से भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई ठोस आश्वासन प्राप्त नहीं कर सके, केवल भविष्य की वार्ताओं का वादा मिला। रैडिकल राष्ट्रवादियों की दृष्टि में यह एक बड़े जन-आंदोलन को बिना ठोस राजनीतिक लाभ के समाप्त करना था, विशेषतः जब हज़ारों लोग जेल में थे और आंदोलन ने वास्तविक गति पकड़ ली थी; उनका मानना था कि गांधीजी ने बहुत जल्दी और बहुत कम पर समझौता कर लिया।
प्र. 1937 के प्रांतीय चुनावों से 1939 के इस्तीफ़ों तक की घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भारत सरकार अधिनियम 1935 ने सीमित प्रतिनिधि सरकार का वादा किया; 1937 के सीमित मताधिकार वाले चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रांतों में सरकार बनाई, जो ब्रिटिश गवर्नर की देखरेख में काम करती थी। सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने पर गांधीजी और नेहरू, दोनों कट्टर फ़ासीवाद-विरोधी, ने युद्धोत्तर स्वतंत्रता के वादे के बदले युद्ध-समर्थन की पेशकश की; यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया, जिसके विरोध में कांग्रेस मंत्रालयों ने अक्टूबर 1939 में इस्तीफ़ा दे दिया, यह दिखाते हुए कि सीमित स्वशासन भी अब पर्याप्त नहीं था।
5 5 अंक के प्रश्न
प्र. असहयोग विरोध का एक रूप कैसे था? विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी के विविध तरीकों की चर्चा कीजिए।
उत्तर: असहयोग सरकार के साथ ‘हर स्वैच्छिक जुड़ाव के त्याग’ पर आधारित था: भारतीयों से सरकारी स्कूल, कॉलेज, अदालतें छोड़ने और कर चुकाना बंद करने को कहा गया, जो हिंसा के बिना ब्रिटिश शासन को असहनीय बनाने की रणनीति थी। इसने अभूतपूर्व लोकप्रिय कार्रवाई छोड़ी: विद्यार्थियों ने स्कूल छोड़े, वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया, 1921 में 396 हड़तालों ने 6,00,000 श्रमिकों को शामिल किया और 70 लाख कार्य-दिवसों की लागत आई। देहात में भागीदारी अपने ही ढंग की थी: उत्तरी आंध्र की पहाड़ी जनजातियों ने वन-क़ानून तोड़े, अवध के किसानों ने कर देने से इनकार किया, और कुमाऊँ के किसानों ने बलात श्रम से इनकार किया, अक्सर स्थानीय राष्ट्रवादी नेतृत्व की अवहेलना करते हुए और ‘असहयोग’ की व्याख्या अपने ही हितों के अनुसार करते हुए। ख़िलाफ़त आंदोलन से जुड़ाव ने मुस्लिम भागीदारी भी बड़े पैमाने पर जुटाई। यह विविधता दिखाती है कि असहयोग एक ही नारे के नीचे कई अलग-अलग स्थानीय संघर्षों का समुच्चय बन गया था।
प्र. स्रोत 5 और 6 का सहारा लेते हुए, पीड़ित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिकाओं के मुद्दे पर अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच एक काल्पनिक संवाद लिखिए।
उत्तर: गांधीजी: ‘अस्पृश्यों के लिए पृथक निर्वाचिका उन्हें सदा के लिए बंधन में डाल देगी। जो चाहिए वह है अस्पृश्यता का विनाश; जब आप कलंक-चिह्न ही मिटा देंगे तो पृथक निर्वाचिका किसे देंगे?’ अम्बेडकर: ‘वह धर्म, जिससे हम बँधे हैं, हमें कोढ़ी क़रार देता है, सामान्य मेलजोल के अयोग्य; हमारे पूरे हिंदू समाज में हर संभव द्वार बंद करने का प्रयास चल रहा है। जब तक यह भेदभाव बना है, हमें स्वयं की रक्षा के लिए स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति चाहिए, आपकी सद्भावना की प्रतीक्षा नहीं।’ गांधीजी: ‘पर पृथक निर्वाचिका आपको सवर्ण हिंदू समाज से सदा के लिए काट देगी, एकीकरण असंभव बना देगी।’ अम्बेडकर: ‘एकीकरण की बात तभी सार्थक है जब भेदभाव पहले समाप्त हो; अभी राजनीतिक सुरक्षा के बिना दमित वर्ग की स्थिति और कमज़ोर होगी।’
प्र. गांधीजी के जीवन-वृत्त के पुनर्निर्माण के लिए इतिहासकार किन विभिन्न प्रकार के स्रोतों का प्रयोग करते हैं, और प्रत्येक की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर: पहला, निजी पत्र, जो निजी विचार दिखाते हैं पर अक्सर यह जानते हुए लिखे जाते हैं कि वे बाद में प्रकाशित हो सकते हैं (गांधीजी स्वयं पत्र हरिजन में छापते थे), इसलिए लेखक की वास्तविक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। दूसरा, आत्मकथाएँ, जो पूर्वदर्शी होती हैं, स्मृति से लिखी जातीं, और इस बात से आकारित कि लेखक क्या याद रखा जाना चाहता है, इसलिए क्या छोड़ा गया यह पूछना ज़रूरी है। तीसरा, औपनिवेशिक पुलिस रिपोर्टें, जो अब अभिलेखीय प्रमाण हैं पर तब गुप्त थीं, और यह दिखाती हैं कि अधिकारी क्या मानना चाहते थे, ज़मीनी सत्य ज़रूरी नहीं। चौथा, समाचार-पत्र, जो सामान्य राय दर्शाते हैं पर प्रकाशक के राजनीतिक दृष्टिकोण से रंगे होते हैं। हर स्रोत को इसलिए यह पूछते हुए पढ़ना चाहिए कि वह किसके हित को दर्शाता है, किसी को तटस्थ तथ्य मानकर स्वीकार नहीं करना चाहिए।
6 6 अंक के प्रश्न
प्र. राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास के लिए नमक मार्च के महत्व की विस्तृत चर्चा कीजिए।
उत्तर: नमक मार्च (मार्च-अप्रैल 1930) कम से कम चार दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। पहला, इसने भारी यूरोपीय-अमेरिकी प्रेस-कवरेज (जैसे टाइम पत्रिका) के माध्यम से गांधीजी को पहली बार सच्चे विश्व-ध्यान में ला दिया, टाइम की शुरुआती उपहासपूर्ण टिप्पणियों से लेकर उन्हें ‘संत’ कहने तक के बदलाव में यह स्पष्ट है। दूसरा, यह बड़े पैमाने पर स्त्री-भागीदारी वाला पहला जन-आंदोलन था, आंशिक रूप से कमलादेवी चट्टोपाध्याय के प्रयासों से, जिन्होंने स्वयं भी गिरफ़्तारी दी। तीसरा, नमक की सार्वभौमिक ज़रूरत ने इसे राजनीतिक रूप से सक्रिय दायरों से कहीं आगे व्यापक असंतोष जुटाने में सक्षम बनाया, जिससे लगभग 60,000 गिरफ़्तारियाँ हुईं और वन-क़ानून उल्लंघन, हड़तालें, अदालत-बहिष्कार जैसे समानांतर विरोध देशभर में फैले। चौथा, और शायद सबसे महत्वपूर्ण, इसने अंग्रेज़ों को यह स्वीकार करने पर मजबूर किया कि उनका राज हमेशा नहीं टिकेगा और भारतीयों को सत्ता में कुछ हिस्सा देना ही होगा, जिसके परिणामस्वरूप गोलमेज़ सम्मेलनों की शृंखला शुरू हुई और अंततः गांधी-इरविन समझौता हुआ। इस प्रकार एक स्थानीय, सरल क़ानून-भंग की कार्रवाई ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की दिशा को स्थायी रूप से बदल दिया।
प्र. विभाजन तक ले जाने वाली घटनाओं और उस पर गांधीजी की प्रतिक्रिया की विस्तृत चर्चा कीजिए।
उत्तर: मार्च 1940 में मुस्लिम लीग ने मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए स्वायत्तता की माँग की, संघर्ष को कांग्रेस-लीग-ब्रिटेन के तीन-तरफ़ा टकराव में बदल दिया। 1942 का क्रिप्स मिशन विफल हुआ, और भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त 1942) के दौरान कांग्रेस नेतृत्व के क़ैद होने का लाभ उठाकर मुस्लिम लीग ने पंजाब-सिंध में अपना आधार मज़बूत किया। 1946 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस और लीग की अलग-अलग पूर्ण जीत ने राजनीतिक ध्रुवीकरण कठोर बना दिया; कैबिनेट मिशन (1946) संघीय समझौता सुरक्षित करने में विफल रहा, और जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे (16 अगस्त 1946) ने कलकत्ता से शुरू होकर बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब तक फैले ख़ूनी दंगे भड़काए। लॉर्ड माउंटबेटन ने फ़रवरी 1947 में वेवेल की जगह ली और, वार्ता अनिर्णायक रहने पर, विभाजन के साथ 15 अगस्त 1947 को सत्ता-हस्तांतरण की घोषणा की। गांधीजी की प्रतिक्रिया स्वीकृति नहीं बल्कि गहरा दुख था: वे 15 अगस्त को दिल्ली के उत्सवों में शामिल न होकर कलकत्ता में उपवास से इस दिन को चिह्नित करते रहे, विभाजन को एक अस्वीकार्य क़ीमत मानते हुए। उनकी और नेहरू की पहल पर कांग्रेस ने द्विराष्ट्र सिद्धांत को अस्वीकार करने वाला अल्पसंख्यक-अधिकार प्रस्ताव पारित किया, और गांधीजी ने अपने अंतिम महीने साम्प्रदायिक हिंसा रोकने और शरणार्थियों को सांत्वना देने में बिताए, अंततः 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा उनकी हत्या कर दी गई।
7 केस स्टडी
— महात्मा गाँधी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, फ़रवरी 1916
(क) 2 अंक यह भाषण किस अवसर पर दिया गया, और श्रोता-वर्ग कौन था?
उत्तर: यह भाषण फ़रवरी 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में दिया गया, जिसके श्रोता-वर्ग में राजा और परोपकारी शामिल थे, यानी भारत का धनी व अभिजात वर्ग।
(ख) 3 अंक गांधीजी ने इस भाषण में अनुपस्थित किस वर्ग की ओर इशारा किया, और इसका क्या महत्व है?
उत्तर: गांधीजी ने अनुपस्थित ‘लाखों गरीब’ भारतीयों (किसानों-मज़दूरों) की ओर इशारा किया। इसका महत्व दोहरा है: यह तथ्य का कथन था कि भारतीय राष्ट्रवाद अभी भी एक अभिजात घटना थी, और साथ ही इरादे का कथन भी, गांधीजी का पहला सार्वजनिक संकेत कि वे राष्ट्रवाद को किसानों और ग़रीबों तक विस्तृत करना चाहते थे।
(ग) 3 अंक अगले वर्षों (1917-18) में गांधीजी ने इस इरादे पर व्यवहारिक रूप से किस तरह कार्य किया?
उत्तर: गांधीजी ने चंपारन (नील-किसानों की काश्तकारी-सुरक्षा), खेड़ा (असफल-फ़सल के बाद कर-माफ़ी की माँग) और अहमदाबाद (वस्त्र-मिल श्रमिक-विवाद) में सीधे हस्तक्षेप किया, तीनों वास्तविक ग़रीब-किसान-मज़दूर मुद्दों पर केंद्रित, जिससे उन्होंने BHU भाषण के इरादे को व्यवहार में बदलना शुरू किया, यद्यपि ये तीनों तब स्थानीय ही बने रहे।
“हमारे सामने एक ऐसा वर्ग है जो निश्चय ही अस्तित्व के संघर्ष में खुद को कायम नहीं रख सकता। … आर्थिक रूप से यह ऐसा वर्ग है जो दो वक्त की रोटी के लिए सवर्ण हिंदुओं पर पूरी तरह आश्रित है; जिसके पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है। न केवल हिंदुओं के सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण उनके सारे रास्ते बंद हैं बल्कि समग्र इतिहास में हिंदू समाज ने उनके सामने खुलने वाली हर संभावना को बंद कर दिया है जिससे दमित वर्गों को जीवन में ऊपर उठने का कोई अवसर न मिल सके। इन परिस्थितियों में सभी निष्पक्ष सोच वाले व्यक्ति इस बात पर सहमत होंगे कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि ऐसे अपंग समुदाय के पास संगठित निरंकुशता के विरुद्ध जीवन के संघर्ष का एकमात्र रास्ता यही है कि उसे राजनीतिक सत्ता में हिस्सा मिले जिससे वह अपनी रक्षा कर सके।” — बी.आर. अम्बेडकर, स्रोत 6
(क) 2 अंक गांधीजी ने यह तर्क किस मंच पर और किस वर्ष दिया, और अम्बेडकर का उत्तर कहाँ से लिया गया है?
उत्तर: गांधीजी ने यह तर्क नवंबर 1931 में लंदन में हुए दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में दिया, जहाँ दमित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका का प्रस्ताव विचाराधीन था। अम्बेडकर का उत्तर उनकी बाद की रचना ‘व्हाट कांग्रेस एंड गाँधी हैव डन टू दि अनटचेबल्स’ (राइटिंग्स एंड स्पीचेस, खंड 9) से लिया गया है, जो गांधीजी की इन दलीलों के जवाब में लिखी गई थी।
(ख) 3 अंक गांधीजी और अम्बेडकर के तर्कों में मूल अंतर क्या था?
उत्तर: गांधीजी का मानना था कि पृथक निर्वाचिका दमित वर्गों को सवर्ण हिंदू समाज से स्थायी रूप से अलग कर देगी और अस्पृश्यता के कलंक को और मज़बूत करेगी, इसलिए असली समाधान अस्पृश्यता का पूर्ण विनाश है। अम्बेडकर का मानना था कि जब तक यह सामाजिक भेदभाव बना है, दमित वर्गों को स्वयं की सुरक्षा के लिए तत्काल, स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति चाहिए, अन्यथा वे सवर्ण-नियंत्रित प्रक्रिया की दया पर निर्भर रह जाएँगे।
(ग) 3 अंक अम्बेडकर दमित वर्गों की आर्थिक स्थिति के बारे में क्या कहते हैं, और उनका उपाय गांधीजी के उपाय से कैसे भिन्न है?
उत्तर: अम्बेडकर के अनुसार आर्थिक रूप से यह ऐसा वर्ग है जो दो वक्त की रोटी के लिए सवर्ण हिंदुओं पर पूरी तरह आश्रित है और जिसके पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है; हिंदू समाज ने उनके सामने खुलने वाली हर संभावना को बंद कर दिया है। इसलिए उनका उपाय है राजनीतिक सत्ता में हिस्सा (पृथक निर्वाचिका), जिससे यह समुदाय अपनी रक्षा कर सके। गांधीजी का उपाय भिन्न है: उनके अनुसार पृथक निर्वाचिका से कलंक का भाव और मज़बूत होगा, इसलिए ज़रूरत अस्पृश्यता के विनाश की है, जिसके बाद पृथक निर्वाचिका की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।