इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा किस अनुच्छेद के अंतर्गत मिला था और वह कब समाप्त हुआ?
उत्तर: अनुच्छेद 370 के अंतर्गत। 5 अगस्त, 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा यह अनुच्छेद समाप्त कर दिया गया।
प्र. ‘कश्मीरियत’ से क्या आशय है?
उत्तर: रियासत के लोगों ने सोचा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। क्षेत्रीय अभिलाषा का यही मुद्दा कश्मीरियत कहलाता है।
प्र. ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ क्या था?
उत्तर: जून 1984 में अमृतसर के स्वर्णमंदिर में भारत सरकार द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई का कूट नाम।
प्र. पंजाब समझौता किन दो नेताओं के बीच और कब हुआ?
उत्तर: प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच, 1985 के जुलाई में।
प्र. सिक्किम भारत का कौन-सा राज्य बना और किस वर्ष?
उत्तर: सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना। सिक्किम विधानसभा ने अप्रैल 1975 में पूर्ण विलय का प्रस्ताव पारित किया और जनमत-संग्रह ने उस पर मुहर लगाई।
प्र. 1986 का मिजोरम शांति समझौता किनके बीच हुआ और उससे मिजोरम को क्या मिला?
उत्तर: राजीव गाँधी और लालडेंगा के बीच। समझौते के अंतर्गत मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और उसे कुछ विशेष अधिकार दिए गए।
प्र. ‘आसू’ क्या था?
उत्तर: ऑल असम स्टूडेंट्स् यूनियन, एक छात्र-संगठन, जिसका जुड़ाव किसी भी राजनीतिक दल से नहीं था। इसने 1979 में विदेशियों के विरोध में आंदोलन चलाया।
प्र. पूर्वोत्तर को शेष भारत से क्या जोड़ता है?
उत्तर: 22 किलोमीटर लंबी एक पतली-सी राहदारी। इसके अलावा इस क्षेत्र की सीमाएँ चीन, म्यांमार और बांग्लादेश से लगती हैं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. विविधता के सवाल पर भारत का नज़रिया यूरोप के कई देशों से किस तरह अलग रहा?
उत्तर: यूरोप के कई देशों में सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र की एकता के लिए खतरे के रूप में देखा गया। भारत ने इसके उलट विविधता के सवाल पर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें विभिन्न क्षेत्र और भाषायी समूहों को अपनी संस्कृति बनाए रखने का अधिकार मिला और राष्ट्र का मतलब क्षेत्र को नकारना नहीं था।
प्र. लोकतांत्रिक राजनीति क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ किस तरह पेश आती है?
उत्तर: लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है और लोकतंत्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र-विरोधी नहीं मानता। दल और समूह क्षेत्रीय पहचान या किसी खास क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों की नुमाइंदगी कर सकते हैं, और क्षेत्रीय मुद्दों को नीति-निर्माण में समुचित ध्यान तथा भागीदारी मिलती है।
प्र. जम्मू और कश्मीर किन तीन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों से बना था?
उत्तर: जम्मू, कश्मीर और लद्दाख से। जम्मू क्षेत्र में छोटी पहाड़ियाँ और मैदानी भाग हैं और यहाँ मुख्य रूप से हिन्दू रहते हैं, साथ ही मुसलमान, सिख और अन्य मतों के लोग भी। कश्मीर क्षेत्र में मुख्य रूप से कश्मीर घाटी है, जहाँ अधिकांश कश्मीरी मुसलमान हैं और शेष हिन्दू, सिख, बौद्ध तथा अन्य। लद्दाख मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्र है, जिसकी जनसंख्या बहुत कम है और जिसमें लगभग बराबर संख्या में बौद्ध और मुसलमान हैं।
प्र. 21 अप्रैल, 1948 के संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव में कौन-सी तीन चरणों वाली प्रक्रिया सुझाई गई थी?
उत्तर: पहला, पाकिस्तान को अपने वे सारे नागरिक वापस बुलाने थे जो कश्मीर में घुस गए थे। दूसरा, भारत को धीरे-धीरे अपनी फौज कम करनी थी ताकि कानून व्यवस्था बनी रहे। तीसरा, एक स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से जनमत संग्रह कराया जाना था। अध्याय यह भी कहता है कि इस प्रस्ताव के अंतर्गत कोई प्रगति न हो सकी।
प्र. पंजाबी सूबे के गठन के बाद भी अकाली दल की राजनीतिक स्थिति डावांडोल क्यों रही?
उत्तर: तीन वजहों से। पहली, उनकी सरकार को केंद्र ने कार्यकाल पूरा करने से पहले बर्खास्त कर दिया था। दूसरी, अकाली दल को पंजाब के हिंदुओं के बीच कुछ खास समर्थन हासिल नहीं था। तीसरी, सिख समुदाय भी दूसरे धार्मिक समुदायों की तरह जाति और वर्ग के धरातल पर बँटा हुआ था, और कांग्रेस को दलितों के बीच अकालियों से कहीं ज्यादा समर्थन प्राप्त था।
प्र. द्रविड़ आंदोलन ने अपनी माँगें आगे बढ़ाने के लिए कौन-सा रास्ता चुना?
उत्तर: हालाँकि आंदोलन के नेतृवर्ग के एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी। नेतृत्व ने अपनी माँग आगे बढ़ाने के लिए सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया।
प्र. नगालैंड का अलगाववादी आंदोलन मिजोरम से किस तरह अलग रहा?
उत्तर: नगालैंड का अलगाववादी आंदोलन ज्यादा पुराना है। अंगमी जापू फिजो के नेतृत्व में नगा लोगों के एक तबके ने 1951 में अपने को भारत से आज़ाद घोषित कर दिया था और फिजो ने बातचीत के कई प्रस्ताव ठुकराए। नगा लोगों के एक तबके ने बाद में समझौते पर दस्तखत किए, पर अन्य विद्रोहियों ने उसे नहीं माना, इसलिए नगालैंड की समस्या का मिजोरम जैसा खुशगवार हल अब तक नहीं निकल पाया है।
प्र. जनवरी 1967 में गोवा में जनमत सर्वेक्षण क्यों कराया गया और उसका नतीजा क्या रहा?
उत्तर: महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेतृत्व में एक तबका चाहता था कि मराठी-भाषी क्षेत्र होने के नाते गोवा को महाराष्ट्र में मिला दिया जाए, जबकि यूनाइटेड गोअन पार्टी के नेतृत्व में बहुत-से गोवावासी गोवानी पहचान, संस्कृति और कोंकणी भाषा की अलग अहमियत बनाए रखना चाहते थे। केंद्र सरकार ने इसी पर जनता की इच्छा जानने के लिए जनमत सर्वेक्षण कराया। अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला, इसलिए गोवा संघशासित प्रदेश बना रहा और 1987 में राज्य बना।
प्र. अध्याय की शुरुआत में दिए गए पोस्टर से लेखक कौन-सी बात साबित करना चाहता है?
उत्तर: पोस्टर में सात भाषाओं का इस्तेमाल किया गया है, जिसका उद्देश्य तमाम भारतीय नागरिकों तक अपनी बात पहुँचाना है। अध्याय कहता है कि पोस्टर से यह बात साफ ज़ाहिर है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय भावनाओं से कोई बुनियादी टकराव नहीं है। पोस्टर का साभार उत्तराखंड सांस्कृतिक मोर्चा को दिया गया है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव क्या था? उसकी मुख्य बातें लिखिए।
उत्तर: 1970 के दशक में अकालियों के एक तबके ने पंजाब के लिए स्वायत्तता की माँग उठायी और 1973 में आनंदपुर साहिब में हुए एक सम्मेलन में इस आशय का प्रस्ताव पारित हुआ। इसकी मुख्य बातें ये थीं:
• प्रस्ताव में क्षेत्रीय स्वायत्तता की बात उठायी गई थी।
• माँगों में केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की बात भी शामिल थी।
• इसमें सिख ‘कौम’ (नेशन या समुदाय) की आकांक्षाओं पर ज़ोर देते हुए सिखों के ‘बोलबाला’ (प्रभुत्व या वर्चस्व) का ऐलान किया गया।
• प्रस्ताव भारत में संघवाद को मजबूत करने की अपील करता है।
अध्याय यह भी दर्ज करता है कि इस प्रस्ताव का सिख जन-समुदाय पर बड़ा कम असर पड़ा।
प्र. पंजाब समझौते के मुख्य प्रावधान क्या थे?
उत्तर: 1984 के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने नरमपंथी अकाली नेताओं से बातचीत शुरू की और जुलाई 1985 में हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ समझौता हुआ। इसके प्रावधान ये थे:
• चंडीगढ़ पंजाब को दे दिया जाएगा।
• पंजाब तथा हरियाणा के बीच सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए एक अलग आयोग की नियुक्ति होगी।
• पंजाब-हरियाणा-राजस्थान के बीच रावी-व्यास के पानी के बँटवारे के बारे में फ़ैसला करने के लिए एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) बैठाया जाएगा।
• सरकार पंजाब में उग्रवाद से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने और उनके साथ बेहतर सलूक करने पर राजी हुई।
• पंजाब से विशेष सुरक्षा बल अधिनियम को वापस लेने पर भी सहमति हुई।
प्र. अनुच्छेद 370 द्वारा दिए गए विशेष दर्जे पर कौन-सी दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ सामने आईं?
उत्तर: पहला पक्ष: जम्मू और कश्मीर के बाहर लोगों का एक वर्ग विश्वास करता था कि अनुच्छेद 370 द्वारा प्रदत्त विशेष दर्जा राज्य को भारत से पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं होने देता। इस वर्ग को लगा कि अनुच्छेद 370 को रद्द कर देना चाहिए और जम्मू और कश्मीर को भारत के किसी भी अन्य राज्य की तरह माना जाना चाहिए।
दूसरा पक्ष: अधिकांश कश्मीरियों का मानना था कि यह स्वायत्तता पर्याप्त नहीं है। उनकी कम से कम तीन मुख्य शिकायतें थीं:
• कबायली हमले से उत्पन्न परिस्थिति के सामान्य होने पर विलय का मामला राज्य के लोगों को विचार के लिए देने का वायदा पूरा नहीं हुआ, जिससे ‘जनमत-संग्रह’ की माँग उठी।
• अनुच्छेद 370 द्वारा दिया गया विशेष संघीय दर्जा व्यवहारिक रूप से कम कर दिया गया, जिससे ‘अधिक राज्य स्वायत्तता’ की माँग उठी।
• जिस प्रकार का लोकतंत्र शेष भारत में है, वैसा जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं किया गया।
प्र. पूर्वोत्तर की राजनीति पर हावी तीन मुद्दे कौन-से हैं? हर एक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर: अध्याय कहता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में राजनीति पर तीन मुद्दे हावी हैं:
• स्वायत्तता की माँग: असम में बोडो, करबी और दिमसा जैसे समुदायों ने अपने लिए अलग राज्य की माँग की; करबी और दिमसा को जिला-परिषद् के अंतर्गत तथा बोडो को स्वायत्त परिषद् का दर्जा देकर इसे संतुष्ट करने की कोशिश की गई।
• अलगाव के आंदोलन: मिजो नेशनल फ्रंट ने 1966 में आज़ादी की माँग करते हुए सशस्त्र अभियान शुरू किया; नगालैंड में फिजो के नेतृत्व में 1951 में आज़ादी की घोषणा हुई।
• ‘बाहरी’ लोगों का विरोध: 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
पहले मुद्दे पर 1970 के दशक में कुछ शुरुआती पहल हुई, जबकि शेष दो मुद्दों ने 1980 के दशक में नाटकीय मोड़ लिया।
प्र. मिजोरम का उदाहरण अलगाववाद से निपटने के बारे में क्या सिखाता है?
उत्तर: आज़ादी के बाद मिजो पर्वतीय क्षेत्र को असम के भीतर एक स्वायत्त जिला बनाया गया था। 1959 के अकाल में असम सरकार की नाकामी के बाद अलगाववादी आंदोलन को जनसमर्थन मिला और मिजो लोगों ने लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट बनाया। 1966 में मिजो नेशनल फ्रंट ने आज़ादी की माँग करते हुए सशस्त्र अभियान शुरू किया, जिसके बाद दो दशक तक लड़ाई चली, जिसमें आम जनता को भी कष्ट उठाने पड़े और एक दफ़े वायुसेना तक का इस्तेमाल हुआ। दोनों पक्षों की हानि को भाँपकर लालडेंगा भारत आए और बातचीत शुरू हुई। 1986 में राजीव गाँधी और लालडेंगा के बीच शांति समझौता हुआ, मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा और कुछ विशेष अधिकार मिले, मिजो नेशनल फ्रंट ने अलगाववादी संघर्ष छोड़ा और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। आज मिजोरम पूर्वोत्तर का सबसे शांतिपूर्ण राज्य है। अध्याय का सबक यह है कि राजनीतिक सुलह के जरिए अलगाववाद की समस्या से बड़े कारगर तरीके से निपटा जा सकता है।
प्र. असम समझौता क्या था और उसका क्या असर हुआ?
उत्तर: छह साल की सतत अस्थिरता के बाद राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली सरकार ने ‘आसू’ के नेताओं से बातचीत शुरू की और इसके परिणामस्वरूप 1985 में एक समझौता हुआ। समझौते के अंतर्गत तय किया गया कि जो लोग बांग्लादेश-युद्ध के दौरान अथवा उसके बाद के सालों में असम आए हैं, उनकी पहचान की जाएगी और उन्हें वापस भेजा जाएगा। आंदोलन की कामयाबी के बाद ‘आसू’ और असम गण संग्राम परिषद् ने साथ मिलकर ‘असम गण परिषद्’ नाम की क्षेत्रीय पार्टी बनाई, जो 1985 में विदेशी लोगों की समस्या सुलझाने और ‘स्वर्णिम असम’ बनाने के वायदे के साथ सत्ता में आई। समझौते से शांति कायम हुई और प्रदेश की राजनीति का चेहरा भी बदला, लेकिन ‘आप्रवास’ की समस्या का समाधान नहीं हो पाया और ‘बाहरी’ का मसला आज भी असम तथा पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की राजनीति में जीवंत है।
प्र. 31 अक्तूबर 1984 के बाद क्या हुआ, और सरकार की भूमिका पर अध्याय क्या दर्ज करता है?
उत्तर: प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की 31 अक्तूबर 1984 के दिन उनके आवास के बाहर उन्हीं के अंगरक्षकों ने हत्या कर दी; ये अंगरक्षक सिख थे और ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेना चाहते थे। इसके बाद दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में सिख समुदाय के विरुद्ध हिंसा भड़क उठी, जो कई हफ़्तों तक जारी रही। दो हज़ार से ज्यादा की तादाद में सिख दिल्ली में मारे गए, और कानपुर, बोकारो तथा चास जैसे कई जगहों पर सैकड़ों सिख मारे गए। कई सिख-परिवारों में कोई भी पुरुष न बचा और उन्हें गहरा भावनात्मक आघात तथा आर्थिक हानि उठानी पड़ी। अध्याय दर्ज करता है कि सिखों को सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि सरकार ने स्थिति को सामान्य बनाने के लिए बड़ी देर से कदम उठाए और हिंसा करने वाले लोगों को कारगर तरीके से दंड भी नहीं दिया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में संसद में इस रक्तपात पर अफसोस जताया और सिख-विरोधी हिंसा के लिए देश से माफी माँगी।
प्र. द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत, माँगें और आगे का सफ़र संक्षेप में बताइए।
उत्तर: द्रविड़ आंदोलन भारतीय राजनीति में क्षेत्रीयतावादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति था। इसकी बागडोर तमिल समाज सुधारक ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ के हाथों में थी और इससे ‘द्रविड़ कड़गम’ नाम के राजनीतिक संगठन का सूत्रपात हुआ, जो ब्राह्मणों के वर्चस्व का विरोध करता था और उत्तरी भारत के राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रभुत्व को नकारते हुए क्षेत्रीय गौरव पर जोर देता था। शुरू में यह समग्र दक्षिण भारतीय संदर्भ में बोलता था, पर अन्य दक्षिणी राज्यों से समर्थन न मिलने के कारण तमिलनाडु तक सिमट गया। बाद में द्रविड़ कड़गम दो धड़ों में बँटा और आंदोलन की समूची राजनीतिक विरासत द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के पाले में केंद्रित हो गई। 1953-54 में डीएमके ने तीन-सूत्री आंदोलन के साथ राजनीति में कदम रखा: कल्लाकुडी रेलवे स्टेशन का नया नाम डालमियापुरम निरस्त कर मूल नाम बहाल हो; स्कूली पाठ्यक्रम में तमिल संस्कृति के इतिहास को ज़्यादा महत्त्व मिले; और राज्य सरकार का शिल्पकर्म शिक्षा कार्यक्रम बदले, जो संगठन के अनुसार ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देता था। डीएमके हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा देने के भी खिलाफ़ थी और 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन की सफलता ने उसे और लोकप्रिय बनाया। 1967 के विधानसभा चुनावों में उसे बड़ी सफलता मिली और तब से तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ दलों का वर्चस्व कायम है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. 1948 से लेकर अब तक जम्मू और कश्मीर की राजनीति की मुख्य घटनाओं का क्रम बताइए।
उत्तर: शुरुआती दौर: मार्च 1948 में शेख अब्दुल्ला जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री बने और भारत अनुच्छेद 370 के अंतर्गत अस्थाई स्वायत्तता देने पर सहमत हुआ। उन्होंने भूमि सुधार और अन्य नीतियाँ शुरू कीं जिनसे सामान्य जन को लाभ पहुँचा, लेकिन कश्मीर के दर्जे पर उनके और केंद्र सरकार के बीच मतभेद बढ़ते गए। उन्हें 1953 में पदच्युत कर दिया गया और कई वर्षों तक कैद रखा गया।
कांग्रेस का प्रभाव: 1953 और 1974 के बीच कांग्रेस पार्टी ने राज्य की नीतियों पर प्रभाव डाला। 1965 में राज्य के प्रधानमंत्री का पदनाम बदलकर मुख्यमंत्री कर दिया गया और गुलाम मोहम्मद सादिक राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।
वापसी और अस्थिरता: 1974 में इंदिरा गाँधी का शेख अब्दुल्ला के साथ समझौता हुआ और वे मुख्यमंत्री बने; नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 1977 का चुनाव बहुमत से जीता। 1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन के बाद नेतृत्व फारूक अब्दुल्ला के पास गया, पर जल्द ही उन्हें राज्यपाल ने पदच्युत कर दिया। 1986 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के कांग्रेस से चुनावी गठबंधन ने यह भावना पुष्ट की कि केंद्र राज्य की राजनीति में हस्तक्षेप कर रहा है।
उग्रवाद का दौर: 1987 के चुनाव के परिणामों पर व्यापक संदेह हुआ। 1989 तक राज्य एक पृथक कश्मीरी राष्ट्र बनाने को लेकर उग्रवादी आंदोलन के कब्जे में आ गया, जिसे पाकिस्तान से नैतिक, आर्थिक और फौजी समर्थन मिला। 1990 से राज्य ने असाधारण हिंसा झेली और 1996 में जाकर चुनाव हुए, जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग के साथ सत्ता में आई।
2002 और उसके बाद: 2002 में पीडीपी और कांग्रेस की मिली-जुली सरकार बनी; मुफ़्ती मोहम्मद पहले तीन वर्ष मुखिया रहे, फिर गुलाम नबी आज़ाद, जो जुलाई 2008 के राष्ट्रपति शासन के कारण कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। 2009 में उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार आई। 2014 के चुनाव में 25 वर्षों में सबसे अधिक मतदान हुआ और पीडीपी-भाजपा की सरकार बनी। अप्रैल 2016 में महबूबा मुफ़्ती राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। जून 2018 में भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हुआ, और 5 अगस्त, 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 समाप्त कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख, में पुनर्गठित कर दिया गया।
प्र. असम आंदोलन सांस्कृतिक अभिमान और आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था। व्याख्या कीजिए।
उत्तर: सांस्कृतिक पक्ष: असमी लोगों को संदेह था कि बांग्लादेश से आकर बहुत-सी मुस्लिम आबादी असम में बस गई है। लोगों के मन में यह भावना घर कर गई थी कि इन विदेशी लोगों को पहचानकर उन्हें अपने देश नहीं भेजा गया तो स्थानीय असमी जनता अल्पसंख्यक हो जाएगी। यह अपनी भाषा, पहचान और संख्या-बल को बचाने की चिंता थी। ‘आसू’ का आंदोलन अवैध आप्रवासी, बंगाली और अन्य लोगों के दबदबे तथा मतदाता सूची में लाखों आप्रवासियों के नाम दर्ज कर लेने के खिलाफ़ था, और उसकी माँग थी कि 1951 के बाद असम में आकर बसे लोगों को बाहर भेजा जाए।
आर्थिक पक्ष: असम में तेल, चाय और कोयले जैसे प्राकृतिक संसाधनों की मौजूदगी के बावजूद व्यापक गरीबी थी। यहाँ की जनता ने माना कि असम के प्राकृतिक संसाधन बाहर भेजे जा रहे हैं और असमी लोगों को कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है। स्थानीय लोग बाहर से आए लोगों को रोजगार के अवसरों और राजनीतिक सत्ता के एतबार से एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते थे और मानते थे कि ये लोग यहाँ की जमीन हथिया रहे हैं।
दोनों का मेल: इसीलिए आंदोलन के तरीके भी दोनों पक्षों को छूते थे। 1979 में ‘आसू’ ने आंदोलन चलाया, जिसने कई नए तरीके आजमाए और असमी जनता के हर तबके का समर्थन हासिल किया। आंदोलन के दौरान हिंसक और त्रासद घटनाएँ भी हुईं, बहुत-से लोगों को जान गंवानी पड़ी और धन-संपत्ति का नुकसान हुआ। रेलगाड़ियों की आवाजाही तथा बिहार स्थित बरौनी तेलशोधक कारखाने को तेल-आपूर्ति रोकने की भी कोशिश की गई, जो सीधे आर्थिक शिकायत से जुड़ा कदम था। छह साल बाद 1985 के असम समझौते से आंदोलन का पटाक्षेप हुआ।
प्र. हर क्षेत्रीय आंदोलन अलगाववादी माँग की तरफ अग्रसर नहीं होता। इस अध्याय से उदाहरण देकर व्याख्या कीजिए।
उत्तर: द्रविड़ आंदोलन: यह भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में सबसे ताकतवर था और नेतृत्व के एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, फिर भी आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी। उसने सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया, 1967 में सत्ता में आया, और आज तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता की भावना का अच्छा उदाहरण पेश करती है। द्रविड़ दलों में से एक न एक 1996 से केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा रहा है।
भाषायी राज्यों के आंदोलन: मौजूदा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात भाषा के आधार पर राज्य बनाने की माँग करते जन आंदोलनों वाले राज्य हैं, और पंजाबी-भाषी सूबे की माँग 1966 में पंजाब तथा हरियाणा के गठन से पूरी हुई। ये सब संघ के भीतर रहकर हुए।
स्वायत्तता की माँगें: असम में बोडो, करबी और दिमसा समुदायों की माँगों को अलग देश की माँग नहीं बनने दिया गया; संघीय राजव्यवस्था के प्रावधानों का उपयोग करके करबी और दिमसा को जिला-परिषद् तथा बोडो को स्वायत्त परिषद् का दर्जा दिया गया।
सिक्किम और गोवा: सिक्किम में चोग्याल के खिलाफ़ चला लोकतांत्रिक आंदोलन भारत से अलगाव की नहीं, भारत के साथ विलय की माँग तक पहुँचा। गोवा में भी सवाल महाराष्ट्र में विलय बनाम अलग गोवानी पहचान का था, और जनमत सर्वेक्षण से उसका फ़ैसला हुआ।
निष्कर्ष: अध्याय का पहला सबक यही है कि क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं और क्षेत्रीय मुद्दे की अभिव्यक्ति कोई असामान्य घटना नहीं है।
प्र. क्षेत्रीय आकांक्षाओं के इन मामलों से अध्याय कौन-से सबक निकालता है?
उत्तर: पहला: क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं। ग्रेट ब्रिटेन जैसे छोटे देश में भी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ उभरी हैं; स्पेन में बास्क लोगों और श्रीलंका में तमिलों ने अलगाववादी माँग की। भारत एक बड़ा लोकतंत्र है और यहाँ विभिन्नताएँ भी बड़े पैमाने पर हैं, इसलिए उसे इनसे निपटने की तैयारी लगातार रखनी होगी।
दूसरा: क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतांत्रिक बातचीत का तरीका अपनाना सबसे अच्छा होता है। बातचीत के जरिए सरकार ने क्षेत्रीय आंदोलनों के साथ समझौता किया, जिससे सौहार्द का माहौल बना और कई क्षेत्रों में तनाव कम हुआ। मिजोरम का उदाहरण दिखाता है कि राजनीतिक सुलह के जरिए अलगाववाद की समस्या से कारगर तरीके से निपटा जा सकता है।
तीसरा: सत्ता की साझेदारी का महत्त्व। सिर्फ़ लोकतांत्रिक ढाँचा खड़ा कर लेना काफ़ी नहीं है; विभिन्न क्षेत्रों के दलों और समूहों को केंद्रीय राजव्यवस्था में हिस्सेदार बनाना भी जरूरी है। यदि राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों में क्षेत्रों को वजन नहीं दिया गया तो उनमें अन्याय और अलगाव का बोध पनपेगा।
चौथा: आर्थिक विकास के एतबार से इलाकों के बीच असमानता हुई तो पिछड़े क्षेत्रों को लगेगा कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। अगर कुछ राज्य गरीब रहें और बाकी तेजी से प्रगति करें तो क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा और अंतर्प्रान्तीय अथवा अंतर्क्षेत्रीय आप्रवास में भी बढ़ोत्तरी होगी।
पाँचवाँ: इन मामलों से संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि का पता चलता है। भारत की संघीय प्रणाली बहुत लचीली है: अधिकतर राज्यों के अधिकार समान हैं, पर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए (हालाँकि जम्मू-कश्मीर वाला अनुच्छेद 370 अगस्त 2019 में निरस्त कर दिया गया)। संविधान की छठी अनुसूची जनजातियों को अपने आचार-व्यवहार और पारंपरिक नियम संरक्षित रखने की पूर्ण स्वायत्तता देती है, और ये प्रावधान पूर्वोत्तर की जटिल समस्याओं को सुलझाने में निर्णायक साबित हुए।
प्र. 1966 से 1997 तक पंजाब की राजनीति का घटनाक्रम लिखिए।
उत्तर: पुनर्गठन: विभाजन के समय पंजाब की सामाजिक बुनावट पहली बार बदली और बाद में इसके कुछ हिस्सों से हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश बने। देश के शेष हिस्से का भाषायी पुनर्गठन 1950 के दशक में हुआ, पर पंजाब को 1966 तक इंतज़ार करना पड़ा, जब पंजाबी-भाषी प्रांत बना और उसमें सिख बहुसंख्यक हो गए। यह माँग 1920 के दशक में बने अकाली दल ने ‘पंजाबी सूबा’ आंदोलन के जरिए उठाई थी।
राजनीतिक संदर्भ: अकाली दल ने 1967 और 1977 में गठबंधन सरकारें बनाईं, पर उनकी स्थिति डावांडोल रही: सरकार केंद्र ने कार्यकाल पूरा होने से पहले बर्खास्त कर दी, हिंदुओं में समर्थन कम था, और सिख समुदाय भी जाति तथा वर्ग में बँटा था। इसी पृष्ठभूमि में 1973 का आनंदपुर साहिब प्रस्ताव आया। 1980 में अकाली सरकार की बर्खास्तगी के बाद दल ने पड़ोसी राज्यों के साथ पानी के बँटवारे पर आंदोलन चलाया और धार्मिक नेताओं के एक तबके ने स्वायत्त सिख पहचान की बात उठाई।
हिंसा का चक्र: नेतृत्व नरमपंथी अकालियों के हाथ से निकलकर चरमपंथी तत्त्वों के हाथ में चला गया और आंदोलन ने सशस्त्र विद्रोह का रूप ले लिया। उग्रवादियों ने स्वर्णमंदिर को अपना मुख्यालय बनाया और वह एक हथियारबंद किले में तब्दील हो गया। जून 1984 में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया गया; उग्रवादी तो मार भगाए गए, पर स्वर्णमंदिर को क्षति पहुँची और सिखों की भावनाओं को गहरी चोट लगी। 31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गाँधी की उन्हीं के सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी, जिसके बाद दिल्ली सहित उत्तर भारत में सिख-विरोधी हिंसा भड़की; दो हज़ार से ज्यादा सिख दिल्ली में मारे गए।
शांति की ओर: 1984 के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने नरमपंथी अकाली नेताओं से बातचीत शुरू की और जुलाई 1985 में हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ पंजाब समझौता हुआ, जिसमें चंडीगढ़, सीमा-विवाद आयोग, रावी-व्यास ट्रिब्यूनल, मुआवजा और विशेष सुरक्षा बल अधिनियम की वापसी तय हुई।
उसके बाद: अमन न आसानी से आया, न तुरंत। हिंसा का चक्र लगभग एक दशक चला, मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन हुआ, पुलिस की ओर से भी ज्यादती हुई, अकाली दल बिखर गया और राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। 1992 के चुनाव में महज 24 फीसदी मतदाता वोट डालने आए। 1990 के दशक के मध्यवर्ती वर्षों में शांति बहाल हुई और 1997 में अकाली दल (बादल) तथा भाजपा के गठबंधन को बड़ी विजय मिली, जो उग्रवाद के खात्मे के बाद का पहला चुनाव था। इसके बाद आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन के सवाल फिर प्रमुख हो उठे।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक यह अंश किस रिपोर्ट से लिया गया है और किस वर्ष की है?
उत्तर: न्यायमूर्ति नानावती जाँच आयोग की रिपोर्ट, खंड-I से, जो 2005 की है।
(ख) 1 अंक अंश में जिस तारीख का ज़िक्र है, उस दिन क्या हुआ था?
उत्तर: 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की उनके आवास के बाहर उन्हीं के अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी।
(ग) 2 अंक आयोग के अनुसार हमले किस तरह हुए?
उत्तर: आयोग की रिपोर्ट कहती है कि बड़े व्यवस्थित तरीके से हमले हुए और हमलावरों को पुलिस का भी ज्यादा भय नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार इससे ऐसा जान पड़ता है मानो हमलावरों को आश्वासन दिया गया हो कि इन कामों को अंजाम देते समय या उसके बाद भी उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा।
(घ) 2 अंक इस हिंसा के बारे में सिख समुदाय की सबसे बड़ी शिकायत क्या रही, और आगे चलकर सरकार की ओर से क्या कहा गया?
उत्तर: अध्याय कहता है कि सिखों को सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि सरकार ने स्थिति को सामान्य बनाने के लिए बड़ी देर से कदम उठाए और हिंसा करने वाले लोगों को कारगर तरीके से दंड भी नहीं दिया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में संसद में अपने भाषण के दौरान इस रक्तपात पर अफसोस जताया और सिख-विरोधी हिंसा के लिए देश से माफी माँगी। बॉक्स में उनका भाषण 11 अगस्त, 2005 को राज्यसभा की बहस में दिया गया बताया गया है।
(क) 1 अंक गोवा, दमन और दीव कब से औपनिवेशिक शासन में थे?
उत्तर: सोलहवीं सदी से ही।
(ख) 1 अंक गोवा के आज़ादी के जन आंदोलन को किसने बल प्रदान किया?
उत्तर: महाराष्ट्र के समाजवादी सत्याग्रहियों ने।
(ग) 2 अंक गोवा आखिरकार कैसे मुक्त हुआ?
उत्तर: धैर्यपूर्वक की गई कोशिशें नाकाम रहने पर दिसंबर 1961 में भारत सरकार ने गोवा में अपनी सेना भेजी। दो दिन की कार्रवाई में भारतीय सेना ने गोवा को मुक्त करा लिया और गोवा, दमन तथा दीव संघशासित प्रदेश बना।
(घ) 2 अंक मुक्ति के बाद गोवा में कौन-सी नई समस्या उठी और उसका समाधान कैसे हुआ?
उत्तर: महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेतृत्व में एक तबके ने माँग रखी कि मराठी-भाषी क्षेत्र होने के नाते गोवा को महाराष्ट्र में मिला दिया जाए, जबकि यूनाइटेड गोअन पार्टी के नेतृत्व में बहुत-से गोवावासी गोवानी पहचान, संस्कृति और कोंकणी भाषा की अलग अहमियत बनाए रखना चाहते थे। जनवरी 1967 में केंद्र सरकार ने गोवा में एक विशेष जनमत सर्वेक्षण कराया, जिसमें अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला। गोवा संघशासित प्रदेश बना रहा और अंततः 1987 में भारत संघ का एक राज्य बना।