इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. ‘पृथ्वी सम्मेलन’ कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: 1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में। यह संयुक्त राष्ट्रसंघ का पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर केंद्रित सम्मेलन था।
प्र. ‘टिकाऊ विकास’ से क्या आशय है?
उत्तर: आर्थिक वृद्धि का ऐसा तरीका, जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। रियो-सम्मेलन में इसी पर सहमति बनी थी।
प्र. ‘साझी संपदा’ किसे कहते हैं?
उत्तर: उन संसाधनों को, जिन पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है। संयुक्त परिवार का चूल्हा, चारागाह, मैदान, कुआँ या नदी इसके उदाहरण हैं।
प्र. ‘विश्व की साझी विरासत’ यानी वैश्विक संपदा में कौन-कौन से क्षेत्र आते हैं?
उत्तर: पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष।
प्र. ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ किसने और कब प्रकाशित की?
उत्तर: वैश्विक मामलों से सरोकार रखने वाले विद्वत् समूह ‘क्लब ऑव रोम’ ने 1972 में। यह पुस्तक बढ़ती जनसंख्या के आलोक में प्राकृतिक संसाधनों के विनाश का अंदेशा बताती है।
प्र. ‘पर्यावरणीय शरणार्थी’ शब्द किस घटना के बाद प्रचलित हुआ?
उत्तर: 1970 के दशक में अफ़्रीका की अनावृष्टि के बाद, जिसके कारण पाँच देशों की उपजाऊ जमीन बंजर हो गई और खेती असंभव होने से अनेक लोगों को घर-बार छोड़ना पड़ा।
प्र. भारत ने पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन कब किया?
उत्तर: 2 अक्तूबर 2016 को।
प्र. विश्व-राजनीति के कुछ विद्वानों ने ‘जलयुद्ध’ शब्द क्यों गढ़ा?
उत्तर: साफ़ पानी की कमी और उसके असमान वितरण के कारण साझे जल-संसाधन को लेकर हिंसक संघर्ष होने की जो संभावना है, उसी को इंगित करने के लिए।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. बर्टलैंड रिपोर्ट क्या थी और उसने क्या चेतावनी दी?
उत्तर: पृथ्वी सम्मेलन से पाँच साल पहले, 1987 में, ‘अवर कॉमन फ़्यूचर’ शीर्षक से छपी रिपोर्ट को बर्टलैंड रिपोर्ट कहा जाता है।
इसमें चेताया गया था कि आर्थिक विकास के चालू तौर-तरीके आगे चलकर टिकाऊ साबित नहीं होंगे। यह चेतावनी ख़ास तौर पर इस हवाले से दी गई थी कि विश्व के दक्षिणी हिस्से में औद्योगिक विकास की माँग ज़्यादा प्रबल है।
प्र. अंटार्कटिका के स्वामित्व को लेकर कौन-से दो दावे किए जाते हैं?
उत्तर: पहला दावा: ब्रिटेन, अर्जेन्टीना, चिले, नार्वे, फ़्रांस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे कुछ देशों ने अंटार्कटिक क्षेत्र पर अपने संप्रभु अधिकार का वैधानिक दावा किया।
दूसरा दावा: अन्य अधिकांश देशों ने इससे उलटा रुख अपनाया कि अंटार्कटिक प्रदेश विश्व की साझी संपदा है और यह किसी भी देश के क्षेत्राधिकार में शामिल नहीं है।
प्र. क्योटो प्रोटोकॉल क्या है? इसमें किन गैसों की चर्चा है?
उत्तर: क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जिसके अंतर्गत औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इस पर जापान के क्योटो में 1997 में सहमति बनी, 1992 में तय सिद्धांतों (UNFCCC) के आलोक में।
जिन गैसों की चर्चा है: कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और हाइड्रो-फ़्लोरो कार्बन। माना जाता है कि वैश्विक तापवृद्धि में इनकी कोई-न-कोई भूमिका ज़रूर है।
प्र. ‘साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत कब और कहाँ स्वीकार किया गया, और इसका मूल तर्क क्या है?
उत्तर: यह तर्क सन् 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में मान लिया गया और इसे ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत कहा गया; इसी बात को रियो-घोषणापत्र में दर्ज किया गया।
मूल तर्क यह है कि पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। विकसित देशों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज़्यादा है और उनके पास विपुल प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं, इसलिए टिकाऊ विकास के प्रयास में उनकी ख़ास जिम्मेदारी बनती है।
प्र. पृथ्वी सम्मेलन के समय उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों के पर्यावरण-अजेंडे में क्या अंतर था?
उत्तर: रियो-सम्मेलन में यह खुलकर सामने आया कि विश्व के धनी और विकसित देश यानी उत्तरी गोलार्द्ध, तथा गरीब और विकासशील देश यानी दक्षिणी गोलार्द्ध, पर्यावरण के अलग-अलग अजेंडे के पैरोकार हैं।
उत्तरी देशों की मुख्य चिंता ओज़ोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि को लेकर थी, जबकि दक्षिणी देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने के लिए ज़्यादा चिंतित थे।
प्र. ‘पावन वन-प्रांतर’ क्या हैं? भारत के अलग-अलग राज्यों में इन्हें किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर: बहुत से पुराने समाजों में धार्मिक कारणों से प्रकृति की रक्षा का चलन है। इस प्रथा में वनों के कुछ हिस्सों को काटा नहीं जाता, क्योंकि वहाँ देवता अथवा किसी पुण्यात्मा का वास माना जाता है। इन्हें ही ‘पावन वन-प्रांतर’ या ‘देवस्थान’ कहा जाता है।
देशभर की भाषाओं में इनके अलग-अलग नाम हैं: राजस्थान में वानी, केंकड़ी और ओरान; झारखंड में जहेरा थान और सरना; मेघालय में लिंगदोह; केरल में काव; उत्तराखंड में थान या देवभूमि और महाराष्ट्र में देव रहतिस।
प्र. भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से क्यों अलग रखा गया?
उत्तर: क्योंकि औद्योगीकरण के दौर में ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में इन देशों का कुछ ख़ास योगदान नहीं था, और औद्योगीकरण के उसी दौर को मौजूदा वैश्विक तापवृद्धि और जलवायु-परिवर्तन का जिम्मेदार माना जाता है।
UNFCCC के पक्षकार देशों ने यह भी माना कि ऐतिहासिक रूप से और मौजूदा समय में भी उत्सर्जन में सबसे ज़्यादा हिस्सा विकसित देशों का है और विकासशील देशों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है।
प्र. मूलवासी (Indigenous People) कौन हैं? संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इनकी परिभाषा कब दी?
उत्तर: संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1982 में इनकी एक शुरुआती परिभाषा दी। इसमें इन्हें ऐसे लोगों का वंशज बताया गया जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे; फिर किसी दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के दूसरे हिस्से से उस देश में आए और इन लोगों को अधीन बना लिया।
किसी देश के मूलवासी आज भी उस देश की संस्थाओं के अनुरूप आचरण करने से ज़्यादा अपनी परंपरा, सांस्कृतिक रिवाज़ तथा अपने ख़ास सामाजिक और आर्थिक ढर्रे पर जीवन-यापन करना पसंद करते हैं।
प्र. अराल सागर के आसपास बसे लोगों को अपना घर-बार क्यों छोड़ना पड़ा?
उत्तर: पानी के विषाक्त हो जाने से वहाँ का मत्स्य-उद्योग नष्ट हो गया और जहाजरानी उद्योग तथा इससे जुड़े तमाम कामकाज खत्म हो गए। पानी में नमक की सांद्रता बहुत बढ़ जाने से पैदावार भी कम हो गई।
इस समस्या पर अनेक अनुसंधान हुए, लेकिन इसका समाधान नहीं हो सका। इसी कारण हज़ारों लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के मसले विश्व-राजनीति का हिस्सा क्यों बन जाते हैं?
उत्तर: 1. अकेली सरकार इन्हें हल नहीं कर सकती: पर्यावरण के नुकसान पर अंकुश रखने के लिए अगर विभिन्न देशों की सरकारें कदम उठाती हैं तो इन मसलों की परिणति राजनीतिक होती है। इनमें अधिकांश ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले दम पर नहीं कर सकती, इसलिए ये विश्व-राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।
2. ये गहरे अर्थों में राजनीतिक सवाल हैं: कौन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है? इस पर रोक लगाने के उपाय करने की जिम्मेदारी किसकी है? धरती के प्राकृतिक संसाधनों पर किसको कितने इस्तेमाल का हक है?
3. जवाब ताकत से तय होते हैं: किताब कहती है कि इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है। इसी अर्थ में ये मसले गहरे राजनीतिक हैं।
4. समस्या का पैमाना वैश्विक है: कृषि-योग्य भूमि की उर्वरता घटना, मत्स्य-भंडार का घटना, जैव-विविधता की हानि, ओज़ोन परत में छेद और समुद्रतटीय प्रदूषण, ये सब किसी एक देश की सीमा में नहीं रुकते।
प्र. अंटार्कटिका को ‘विश्व की साझी विरासत’ क्यों माना जाता है? इसका महत्त्व बताइए और यह भी बताइए कि वैश्विक संपदा पर सहयोग कायम करना क्यों मुश्किल है।
उत्तर: साझी विरासत क्यों: विश्व के कुछ हिस्से और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं, इसलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय करता है। अंटार्कटिका ऐसा ही क्षेत्र है, इसीलिए वह पृथ्वी के वायुमंडल, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष के साथ ‘वैश्विक संपदा’ या ‘मानवता की साझी विरासत’ में गिना जाता है।
महत्त्व: यह महादेश 1 करोड़ 40 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है, विश्व के निर्जन क्षेत्र का 26 प्रतिशत, स्थलीय हिम का 90 प्रतिशत और धरती के स्वच्छ जल का 70 प्रतिशत हिस्सा यहीं है। इसका समुद्री पारिस्थितिकी-तंत्र बहुत उर्वर है, जिसमें क्रिल मछली समुद्री आहार शृंखला की धुरी है। यह विश्व की जलवायु को संतुलित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसकी अंदरूनी हिमानी परत ग्रीन हाऊस गैस के जमाव तथा लाखों बरस पहले के वायुमंडलीय तापमान का महत्त्वपूर्ण सूचना-स्रोत है।
सहयोग की मुश्किल: ‘वैश्विक संपदा’ की सुरक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कायम करना टेढ़ी खीर है। पारिस्थितिकी के हर मसले के साथ बड़ी समस्या यह है कि अपुष्ट वैज्ञानिक साक्ष्यों और समय-सीमा को लेकर मतभेद पैदा होते हैं, इसलिए एक सर्व-सामान्य पर्यावरणीय अजेंडा पर सहमति कायम करना मुश्किल होता है। फिर भी अंटार्कटिका संधि (1959), मॉन्ट्रियल न्यायाचार (1987) और अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार (1991) जैसे समझौते हुए हैं।
प्र. पर्यावरण के अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत क्या पक्ष रखता है?
उत्तर: 1. ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का तर्क: भारत की अंतर्राष्ट्रीय मोलतोल की स्थिति UNFCCC में दर्ज ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के तर्क पर टिकी है। इसके अनुसार ग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज़्यादातर विकसित देशों की है, इसलिए उत्सर्जन-दर में कमी करने की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेवारी उन्हीं की है।
2. विकास पहली प्राथमिकता: भारत जोर देकर कहता है कि ‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास की है।’
3. बाध्यता का विरोध: UNFCCC के अंतर्गत यह चर्चा चली कि तेजी से औद्योगिक होते देश (जैसे ब्राजील, चीन और भारत) ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन कम करें। भारत इसके खिलाफ है, उसका मानना है कि यह बात नियमाचार की मूल भावना के विरुद्ध है और भारत पर ऐसी बाध्यता आयद करना अनुचित भी है, क्योंकि 2030 तक भी भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विश्व के सन् 2000 के औसत (3.8 टन) के आधे से कम रहेगा।
4. वित्त और तकनीक की माँग: 1997 के पुनरावलोकन का मुख्य निष्कर्ष यह था कि विकासशील देशों को रियायती शर्तों पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा बेहतर प्रौद्योगिकी देने में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है। भारत चाहता है कि विकसित देश इसके लिए तुरंत उपाय करें।
5. क्षेत्रीय आवाज़: भारत का मानना है कि ‘दक्षेस’ में शामिल देश पर्यावरण के प्रमुख वैश्विक मसलों पर एक समान राय बनायें, ताकि इस क्षेत्र की आवाज़ वज़नी हो सके।
प्र. पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भारत सरकार ने कौन-कौन से ठोस कदम उठाए हैं?
उत्तर: 1. नेशनल ऑटो-फ़्यूल पॉलिसी: इसके अंतर्गत वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंधन अनिवार्य कर दिया गया है।
2. ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम, 2001: इसमें ऊर्जा के ज़्यादा कारगर इस्तेमाल की पहलकदमी की गई है।
3. बिजली अधिनियम, 2003: इसमें नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया है।
4. स्वच्छ ईंधन की ओर रुझान: हाल में प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले के उपयोग पर आधारित प्रौद्योगिकी को अपनाने की तरफ रुझान बढ़ा है।
5. बायोडीजल मिशन: भारत बायोडीजल से संबंधित एक राष्ट्रीय मिशन चलाने के लिए तत्पर है, जिसके अंतर्गत 2011-12 तक बायोडीजल तैयार होने लगेगा और इसमें 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल होगा।
6. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता: भारत ने 2 अक्तूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते को अनुमोदित किया, और पुनर्नवीकृत होने वाली ऊर्जा के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक भारत में चल रहा है।
प्र. समकालीन पर्यावरण आंदोलनों की विविधता को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: किताब कहती है कि आज पूरे विश्व में पर्यावरण आंदोलन सबसे ज़्यादा जीवंत, विविधतापूर्ण तथा ताकतवर सामाजिक आंदोलनों में शुमार किए जाते हैं, और उनकी एक मुख्य विशेषता उनकी विविधता है।
1. वन-आंदोलन: मैक्सिको, चिले, ब्राज़ील, मलेशिया, इंडोनेशिया, महादेशीय अफ़्रीका और भारत के वन-आंदोलनों पर बहुत दबाव है। तीन दशकों की सक्रियता के बावजूद तीसरी दुनिया में वनों की कटाई खतरनाक गति से जारी है।
2. खनिज-उद्योग के विरुद्ध आंदोलन: खनिज उद्योग रसायनों का भरपूर उपयोग करता है, भूमि और जलमार्गों को प्रदूषित करता है, स्थानीय वनस्पतियों का विनाश करता है और जन-समुदायों को विस्थापित करता है। इसका अच्छा उदाहरण फिलीपिन्स है, जहाँ कई समूहों ने ऑस्ट्रेलियाई बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘वेस्टर्न माइनिंग कारपोरेशन’ के खिलाफ अभियान चलाया। खुद ऑस्ट्रेलिया में भी इसका विरोध हुआ, परमाण्विक शक्ति की मुख़ालफत और ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों की पैरोकारी के कारण।
3. बाँध-विरोधी आंदोलन: अब इन्हें नदियों को बचाने के आंदोलन के रूप में देखा जाता है, क्योंकि इनमें नदियों और नदी-घाटियों के ज़्यादा टिकाऊ तथा न्यायसंगत प्रबंधन की बात उठायी जाती है। विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन 1980 के दशक के शुरुआती और मध्यवर्ती वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में चला, जो फ़्रैंकलिन नदी तथा इसके परिवर्ती वन को बचाने का आंदोलन था। भारत में नर्मदा आंदोलन सबसे प्रसिद्ध है और भारत के ये आंदोलन इस अर्थ में समानधर्मी हैं कि ये अहिंसा पर आधारित हैं।
प्र. ‘क्या वन निर्जन होते हैं?’ उत्तरी और दक्षिणी देशों के वन-आंदोलनों में क्या बुनियादी फ़र्क़ है?
उत्तर: बुनियादी फ़र्क़: दक्षिणी देशों के वन निर्जन नहीं हैं, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध के देशों के वन जनविहीन हैं या कम-से-कम उन्हें निर्जन प्रांत के रूप में देखा जाता है।
उत्तर का नज़रिया: इसी वजह से उत्तरी देशों में वनभूमि को निर्जन भूमि का दर्जा दिया गया है, यानी ऐसी जगह जहाँ लोग नहीं रहते-बसते। यह दृष्टिकोण मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा नहीं मानता और पर्यावरण को मनुष्य से दूर की ऐसी चीज मानता है जिसे बाग-बगीचे या अभयारण्य में तब्दील कर मनुष्यों से बचाया जाना चाहिए। यह ‘विजनपन’ का नज़रिया ऑस्ट्रेलिया, स्केंडिनेविया, उत्तरी अमरीका और न्यूजीलैंड में हावी है, जहाँ अधिकांश यूरोपीय देशों के विपरीत ‘अविकसित निर्जन वन-क्षेत्र’ अपेक्षाकृत ज़्यादा हैं।
दक्षिण का नज़रिया: दक्षिणी देशों में पर्यावरण के अधिकांश मसले इस मान्यता पर आधारित हैं कि लोग वनों में भी रहते हैं।
फिर भी दक्षिण में विजनपन के अभियान: फिलीपिन्स में ‘हरित-संगठनों’ ने गरुड़ तथा अन्य शिकारी पक्षियों को बचाने की मुहिम चलायी, भारत में ‘बंगाल-टाइगर’ को बचाने की मुहिम चली, अफ़्रीका में हाथीदाँत के व्यापार के विरुद्ध लंबा अभियान चला, और ब्राजील तथा इंडोनेशिया के जंगलों में प्रसिद्ध संघर्ष छिड़े। हाल में विजनपन के अनेक मसलों को जैव-विविधता के मसलों का रूप दिया गया है, और इनमें से अनेक अभियानों की शुरुआत तथा वित्तीय मदद वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF) जैसे संगठनों ने की।
प्र. संसाधनों की भू-राजनीति में तेल की केंद्रीय भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 1. अपरिहार्य ईंधन: बीसवीं सदी के अधिकांश समय में विश्व की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर रही और यह एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाए जा सकने वाले ईंधन के रूप में अपरिहार्य बना रहा। परिवहन के लिए दुनिया को जितनी ऊर्जा चाहिए उसका 95 फीसदी पेट्रोलियम से ही पूरा होता है।
2. संपदा और संघर्ष: तेल के साथ विपुल संपदा जुड़ी है और इसी कारण इस पर कब्ज़ा जमाने के लिए राजनीतिक संघर्ष छिड़ता है। किताब कहती है कि पेट्रोलियम का इतिहास युद्ध और संघर्षों का भी इतिहास है, और यह बात पश्चिम एशिया तथा मध्य एशिया में सबसे स्पष्ट दिखती है।
3. खाड़ी की केंद्रीयता: पश्चिम एशिया, ख़ासकर खाड़ी-क्षेत्र विश्व के कुल तेल-उत्पादन का 30 प्रतिशत मुहैया कराता है और यहाँ विश्व के ज्ञात तेल-भंडार का 64 प्रतिशत हिस्सा है। इसी कारण यही एकलौता क्षेत्र है जो तेल की माँग में ख़ास बढ़ोत्तरी होने पर उसकी पूर्ति कर सकता है।
4. सऊदी अरब और इराक: सऊदी अरब के पास विश्व के कुल तेल-भंडार का एक चौथाई हिस्सा है और वह सबसे बड़ा तेल-उत्पादक देश है। इराक का ज्ञात तेल-भंडार सऊदी अरब के बाद दूसरे नंबर पर है, और चूँकि इसके बड़े हिस्से की खोज-बीन अभी नहीं हुई है, संभावना है कि इराक का तेल-भंडार 112 अरब बैरल से कहीं ज़्यादा हो।
5. दूरी की राजनीति: इस तेल की खपत संयुक्त राज्य अमरीका, यूरोप, जापान तथा चीन और भारत में होती है, लेकिन ये देश इस इलाके से बहुत दूर हैं। इसीलिए वैश्विक रणनीति में तेल लगातार सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना हुआ है।
प्र. पानी को लेकर होने वाले संघर्षों की प्रकृति क्या है? किताब के उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर: 1. कमी और असमान वितरण: विश्व के कुछ भागों में साफ पानी की कमी हो रही है और विश्व के हर हिस्से में स्वच्छ जल समान मात्रा में मौजूद नहीं है। इसलिए संभावना है कि साझे जल-संसाधन को लेकर पैदा मतभेद 21वीं सदी में फसाद की जड़ साबित हों। इसी को इंगित करने के लिए कुछ विद्वानों ने ‘जलयुद्ध’ शब्द गढ़ा है।
2. प्रारूपी विवाद: जलधारा के उद्गम से दूर बसा हुआ देश उद्गम के नजदीक बसे हुए देश द्वारा उस पर बाँध बनाने, अत्यधिक सिंचाई करने या उसे प्रदूषित करने पर आपत्ति जताता है, क्योंकि ऐसे कामों से दूर बसे देश को मिलने वाले पानी की मात्रा कम होगी या उसकी गुणवत्ता घटेगी।
3. हिंसा के उदाहरण: 1950 और 1960 के दशक में इज़रायल, सीरिया तथा जार्डन के बीच हुआ संघर्ष, जिसमें इनमें से प्रत्येक देश ने जॉर्डन और यारमुक नदी से पानी का बहाव मोड़ने की कोशिश की थी। फिलहाल तुर्की, सीरिया और इराक के बीच फरात नदी पर बाँध के निर्माण को लेकर ठनी हुई है।
4. साझी नदियाँ: बहुत से देशों के बीच नदियों का साझा है और उनके बीच सैन्य-संघर्ष होते रहते हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. साझी संपदा (Common Property Resources) क्या है? भारत के पावन वन-प्रांतर इसका उदाहरण कैसे हैं, और इनके प्रबंधन में क्या कठिनाई आती है?
उत्तर: 1. अर्थ: साझी संपदा का अर्थ होता है ऐसी संपदा जिस पर किसी समूह के प्रत्येक सदस्य का स्वामित्व हो। इसके पीछे मूल तर्क यह है कि ऐसे संसाधन की प्रकृति, उपयोग के स्तर और रख-रखाव के संदर्भ में समूह के हर सदस्य को समान अधिकार प्राप्त होंगे और समान उत्तरदायित्व निभाने होंगे।
2. भारत का उदाहरण: सदियों के चलन और आपसी समझदारी से भारत के ग्रामीण समुदायों ने साझी संपदा के संदर्भ में अपने सदस्यों के अधिकार और दायित्व तय किए हैं।
3. घटती साझी संपदा: निजीकरण, गहनतर खेती, आबादी की वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र की गिरावट समेत कई कारणों से पूरी दुनिया में साझी संपदा का आकार घट रहा है, उसकी गुणवत्ता और गरीबों को उसकी उपलब्धता कम हो रही है।
4. पावन वन-प्रांतर क्यों उदाहरण हैं: राजकीय स्वामित्व वाली वन्यभूमि में पावन माने जाने वाले वन-प्रांतर के वास्तविक प्रबंधन की पुरानी व्यवस्था साझी संपदा के रख-रखाव और उपभोग का ठीक-ठीक उदाहरण है। दक्षिण भारत के वन-प्रदेशों में इनका प्रबंधन परंपरानुसार ग्रामीण समुदाय करता आ रहा है। इस व्यवस्था के अंतर्गत पुराने समाज प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे।
5. इनका आधार और महत्त्व: इनका परंपरागत आधार ऐसे क्षेत्र की आध्यात्मिक अथवा सांस्कृतिक विशेषताएँ हैं। संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी जिसने इतने युगों से वनों को बचाए रखा। कुछ अनुसंधानकर्ताओं का विश्वास है कि ‘देवस्थान’ की मान्यता से जैव-विविधता और पारिस्थितिकी-संरक्षण में ही नहीं, सांस्कृतिक वैविध्य को भी कायम रखने में मदद मिल सकती है।
6. प्रबंधन की कठिनाई: हाल के सालों में मनुष्यों की बसाहट के विस्तार ने ऐसे देवस्थानों पर कब्ज़ा कर लिया है और नयी राष्ट्रीय वन-नीतियों के आने के साथ कई जगहों पर इन परंपरागत वनों की पहचान मंद पड़ने लगी है। सबसे कठिन समस्या तब आती है जब ऐसे स्थान का कानूनी स्वामित्व राज्य के पास हो और व्यावहारिक नियंत्रण समुदाय के हाथ में, क्योंकि इन दोनों के नीतिगत मानक अलग-अलग हैं और देवस्थान के उपयोग के उद्देश्यों में भी इनके बीच कोई मेल नहीं।
प्र. मूलवासी कौन हैं? विश्व-राजनीति में उनकी आवाज़ और भारत में उनकी स्थिति पर विस्तार से लिखिए।
उत्तर: 1. परिभाषा: संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1982 में मूलवासियों की एक शुरुआती परिभाषा दी। इन्हें ऐसे लोगों का वंशज बताया गया जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे, फिर दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के दूसरे हिस्से से आये और इन्हें अधीन बना लिया।
2. संख्या और फैलाव: भारत सहित विश्व में लगभग 30 करोड़ मूलवासी हैं। फिलीपिन्स के कोरडिलेरा क्षेत्र में 20 लाख, चिले में मापुशे 10 लाख, बांग्लादेश के चटगांव पर्वतीय क्षेत्र में 6 लाख आदिवासी, उत्तर अमरीकी मूलवासी 35 लाख, पनामा नहर के पूरब कुना 50 हज़ार और उत्तरी सोवियत में 10 लाख। ये मध्य और दक्षिण अमरीका, अफ़्रीका, दक्षिणपूर्व एशिया तथा भारत में हैं, और ओसियाना क्षेत्र के द्वीपीय देशों में हजारों सालों से पॉलिनेशिया, मैलनेशिया और माइक्रोनेशिया वंश के मूलवासी रहते हैं।
3. साझा विश्वदृष्टिकोण: मूलवासी अलग-अलग जगहों पर कायम हैं, लेकिन जमीन और उस पर आधारित जीवन-प्रणालियों के बारे में इनकी विश्वदृष्टि आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी है। भूमि की हानि का अर्थ है आर्थिक-संसाधनों के एक आधार की हानि, और यह इनके जीवन के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। किताब सवाल उठाती है कि उस राजनीतिक आज़ादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साधन ही न मुहैया कराये।
4. विश्व-राजनीति में आवाज़: इनकी आवाज़ विश्व-बिरादरी में बराबरी का दर्ज़ा पाने के लिए उठी है। सरकारों से इनकी माँग है कि इन्हें मूलवासी कौम के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला समुदाय माना जाए। अपने मूल वासस्थान पर हक की दावेदारी में विश्वभर के मूलनिवासी यह जुमला इस्तेमाल करते हैं कि हम यहाँ ‘अनंत काल से रहते चले आ रहे हैं’।
5. संगठन: 1970 के दशक में मूलवासी नेताओं के बीच संपर्क बढ़ा और 1975 में ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन हुआ। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सबसे पहले इसी परिषद् को परामर्शदायी परिषद् का दर्ज़ा दिया गया, और आदिवासियों के सरोकारों से संबद्ध 10 अन्य स्वयंसेवी संगठनों को भी यह दर्ज़ा मिला है।
6. भारत में स्थिति: भारत में इनके लिए अनुसूचित जनजाति या आदिवासी शब्द प्रयोग होता है और ये कुल जनसंख्या का आठ प्रतिशत हैं। कुछेक घुमन्तू जनजातियों को छोड़ दें तो अधिकांश आदिवासी जनता जीवन-यापन के लिए खेती पर निर्भर है। सदियों तक ये जितनी बन पड़े उतनी जमीन पर बेधड़क खेती करते आ रहे थे, लेकिन ब्रितानी औपनिवेशिक शासन कायम होने के बाद से जनजातीय समुदायों का सामना बाहरी लोगों से हुआ। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से इनको संवैधानिक सुरक्षा हासिल है, पर देश के विकास का इन्हें ज़्यादा लाभ नहीं मिल सका। आजादी के बाद की विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में यह समुदाय सबसे बड़ा है; इन लोगों ने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।
प्र. शीतयुद्ध के दौरान और उसके बाद संसाधनों की भू-राजनीति कैसे रही? विस्तार से समझाइए।
उत्तर: 1. भू-राजनीति का सवाल: ‘‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’’, संसाधनों की भू-राजनीति इन्हीं सवालों से जूझती है।
2. उपनिवेशवाद की जड़: यूरोपीय ताकतों के विश्वव्यापी प्रसार का एक मुख्य साधन और मकसद संसाधन रहे हैं, और संसाधनों को लेकर राज्यों के बीच तनातनी हुई है। पश्चिमी दुनिया ने इस भू-राजनीति को ज़्यादातर व्यापारिक संबंध, युद्ध तथा ताकत के संदर्भ में सोचा, जिसके मूल में था विदेश में संसाधनों की मौजूदगी तथा समुद्री नौवहन में दक्षता।
3. इमारती लकड़ी: समुद्री नौवहन स्वयं इमारती लकड़ियों पर आधारित था, इसलिए जहाज की शहतीरों के लिए इमारती लकड़ियों की आपूर्ति 17वीं सदी से बाद के समय में प्रमुख यूरोपीय शक्तियों की प्राथमिकताओं में रही।
4. दोनों विश्वयुद्ध: पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सामरिक संसाधनों, खासकर तेल की निर्बाध आपूर्ति का महत्त्व बहुत अच्छी तरह उजागर हो गया।
5. शीतयुद्ध के चार कदम: पूरे शीतयुद्ध के दौरान उत्तरी गोलार्द्ध के विकसित देशों ने सतत् आपूर्ति के लिए संसाधन-दोहन के इलाकों तथा समुद्री परिवहन-मार्गों के इर्द-गिर्द सेना की तैनाती की, महत्त्वपूर्ण संसाधनों का भंडारण किया, उत्पादक देशों में मनपसंद सरकारों की बहाली की, और बहुराष्ट्रीय निगमों तथा अपने हितसाधक अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को समर्थन दिया। पश्चिमी चिंतन का केंद्रीय सरोकार यह था कि संसाधनों तक पहुँच अबाध बनी रहे, क्योंकि सोवियत संघ इसे खतरे में डाल सकता था; और यह भी कि खाड़ी के देशों के तेल तथा दक्षिणी और पश्चिमी एशिया के देशों में मौजूद खनिज पर विकसित देशों का नियंत्रण बरकरार रहे।
6. शीतयुद्ध के बाद: शीतयुद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के बाद सरकारों की मौजूदा चिंता सुरक्षित आपूर्ति बनाए रखने की है। अनेक खनिज़, ख़ासकर रेडियोधर्मी खनिज़ों से जुड़े व्यावसायिक फ़ैसलों को लेकर भी सरकारों को चिंता सताती है। बहरहाल, वैश्विक रणनीति में तेल लगातार सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना हुआ है, और पानी भी विश्व-राजनीति का एक और महत्त्वपूर्ण संसाधन बनकर उभरा है।
प्र. ‘पर्यावरण आंदोलन एक हैं या अनेक?’ तीनों प्रकार के आंदोलनों के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर: 1. आंदोलन सरकारों से नहीं आए: पर्यावरण हानि की चुनौतियों से निबटने के लिए सरकारों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो पेशकदमी की, उसके अलावा कुछ महत्त्वपूर्ण पेशकदमियाँ सरकारों की तरफ से नहीं, बल्कि विश्व के विभिन्न भागों में सक्रिय पर्यावरण के प्रति सचेत कार्यकर्ताओं ने की हैं। इनमें कुछ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और बाकी स्थानीय स्तर पर सक्रिय हैं।
2. इनका महत्त्व: आज पूरे विश्व में पर्यावरण आंदोलन सबसे ज़्यादा जीवंत, विविधतापूर्ण तथा ताकतवर सामाजिक आंदोलनों में शुमार किए जाते हैं। सामाजिक चेतना के दायरे में ही राजनीतिक कार्रवाई के नये रूप जन्म लेते हैं, और इन आंदोलनों ने हमें दृष्टि दी है कि वैयक्तिक और सामूहिक जीवन के लिए आगे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
3. वन-आंदोलन: मैक्सिको, चिले, ब्राज़ील, मलेशिया, इंडोनेशिया, महादेशीय अफ़्रीका और भारत के वन-आंदोलनों पर बहुत दबाव है। तीन दशकों से पर्यावरण को लेकर सक्रियता के बावजूद तीसरी दुनिया के देशों में वनों की कटाई खतरनाक गति से जारी है और पिछले दशक में विश्व के विशालतम वनों का विनाश बढ़ा है।
4. खनिज-उद्योग के विरुद्ध आंदोलन: खनिज-उद्योग पृथ्वी के सबसे ताकतवर उद्योगों में एक है। उदारीकरण के कारण दक्षिणी गोलार्द्ध की अनेक अर्थव्यवस्थाएँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुल चुकी हैं। यह उद्योग रसायनों का भरपूर उपयोग करता है, भूमि और जलमार्गों को प्रदूषित करता है, स्थानीय वनस्पतियों का विनाश करता है और जन-समुदायों को विस्थापित करता है। फिलीपिन्स में ‘वेस्टर्न माइनिंग कारपोरेशन’ के खिलाफ चला अभियान इसका अच्छा उदाहरण है। किताब एक और उदाहरण चित्र के साथ देती है: बांग्लादेश के जिले दिनाजपुर के शहर फुलवाड़ी में एक पूरा-का-पूरा समुदाय कोयला खनन परियोजना के विरोध में उठ खड़ा हुआ।
5. बाँध-विरोधी आंदोलन: इन्हें अब नदियों को बचाने के आंदोलन के रूप में देखा जाता है। विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन 1980 के दशक के शुरुआती और मध्यवर्ती वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में फ़्रैंकलिन नदी तथा इसके परिवर्ती वन को बचाने के लिए चला; यह वन और विजनपन की पैरोकारी करने वाला आंदोलन भी था। फिलहाल तुर्की से लेकर थाईलैंड और दक्षिण अफ़्रीका तक तथा इंडोनेशिया से लेकर चीन तक बड़े बाँधों की होड़ लगी है। भारत में नर्मदा आंदोलन सबसे प्रसिद्ध है।
6. निष्कर्ष: आंदोलन अनेक हैं, क्योंकि उनके मुद्दे, इलाके और तरीके अलग-अलग हैं। फिर भी भारत के संदर्भ में किताब एक साझी बात बताती है: बाँध विरोधी तथा पर्यावरण-बचाव के अन्य आंदोलन एक अर्थ में समानधर्मी हैं, क्योंकि ये अहिंसा पर आधारित हैं।
प्र. पर्यावरण की वैश्विक राजनीति में 1959 से 2016 तक की प्रमुख घटनाओं और समझौतों का क्रमवार विवरण दीजिए।
उत्तर: 1959: अंटार्कटिका संधि। इसके बाद इस इलाके में गतिविधियाँ वैज्ञानिक अनुसंधान, मत्स्य आखेट और पर्यटन तक सीमित रहीं।
1960 का दशक: आर्थिक विकास के कारण पर्यावरण पर होने वाले असर की चिंता ने राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया।
1972: ‘क्लब ऑव रोम’ ने ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ प्रकाशित की, जो बढ़ती जनसंख्या के आलोक में संसाधनों के विनाश का अंदेशा बताती है।
1970 का दशक: अफ़्रीका की अनावृष्टि, जिसके बाद ‘पर्यावरणीय शरणार्थी’ शब्द प्रचलित हुआ। इसी दशक में मूलवासी नेताओं के बीच अंतर्राष्ट्रीय संपर्क बढ़ा, और 1975 में ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ बना।
1982: संयुक्त राष्ट्रसंघ ने मूलवासियों की शुरुआती परिभाषा दी।
1980 के दशक के मध्य: अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन परत में छेद की खोज, जिसे किताब आँख खोल देने वाली घटना कहती है। इसी दशक के शुरुआती और मध्यवर्ती वर्षों में विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन ऑस्ट्रेलिया में फ़्रैंकलिन नदी को बचाने के लिए चला।
1987: मॉन्ट्रियल न्यायाचार, और ‘अवर कॉमन फ़्यूचर’ शीर्षक बर्टलैंड रिपोर्ट, जिसमें चेताया गया कि आर्थिक विकास के चालू तौर-तरीके टिकाऊ साबित नहीं होंगे।
1991: अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार।
1992: रियो डी जनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन, जिसमें 170 देशों ने भाग लिया; जलवायु-परिवर्तन, जैव-विविधता और वानिकी के नियमाचार; ‘अजेंडा-21’; ‘टिकाऊ विकास’ पर सहमति; रियो-घोषणापत्र में ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत; और UNFCCC पर हस्ताक्षर।
1997: जापान के क्योटो में क्योटो प्रोटोकॉल पर सहमति। इसी वर्ष भारत ने रियो के समझौतों के क्रियान्वयन का पुनरावलोकन किया।
2001 और 2003: भारत में ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम और बिजली अधिनियम।
2002: भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और उसका अनुमोदन किया।
जून 2005: ग्रुप-8 की बैठक में भारत ने प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का मुद्दा उठाया।
2 अक्तूबर 2016: भारत ने पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन किया।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक गद्यांश में दिए गए आँकड़े किस रिपोर्ट से लिए गए हैं?
उत्तर: संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानव विकास रिपोर्ट (2016) से।
(ख) 2 अंक स्वच्छ जल और साफ़-सफ़ाई से जुड़े दोनों आँकड़े बताइए और उनका नतीजा क्या होता है?
उत्तर: विकासशील देशों की 66.3 करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होता और दो अरब चालीस करोड़ आबादी साफ़-सफ़ाई की सुविधा से वंचित है। इसी वजह से 30 लाख से ज़्यादा बच्चे हर साल मौत के शिकार होते हैं।
(ग) 3 अंक समुद्रतटीय प्रदूषण की समस्या क्या है, और यह पर्यावरण के मसले को राजनीतिक कैसे बनाती है?
उत्तर: समुद्र का मध्यवर्ती भाग अब भी अपेक्षाकृत स्वच्छ है, लेकिन तटवर्ती जल जमीनी क्रियाकलापों से प्रदूषित हो रहा है। पूरी दुनिया में समुद्रतटीय इलाकों में मनुष्यों की सघन बसाहट जारी है और इस प्रवृत्ति पर अंकुश न लगा तो समुद्री पर्यावरण की गुणवत्ता में भारी गिरावट आएगी।
यह मसला राजनीतिक इसलिए बन जाता है कि इस पर अंकुश रखने के लिए विभिन्न देशों की सरकारों को कदम उठाने पड़ते हैं, और इनमें से अधिकांश मसले ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले दम पर नहीं कर सकती। इसी वजह से ये मसले विश्व-राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।
(क) 1 अंक ग्रुप-8 की बैठक कब हुई थी?
उत्तर: 2005 के जून में।
(ख) 2 अंक भारत के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के तीनों आँकड़े बताइए।
उत्तर: 2000 तक भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 0.9 टन था और अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 1.6 टन प्रतिव्यक्ति हो जाएगा। यह तब भी विश्व के सन् 2000 के औसत 3.8 टन प्रति व्यक्ति के आधे से भी कम रहेगा।
(ग) 3 अंक ‘साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियों’ के सिद्धांत के आधार पर भारत अपना पक्ष कैसे रखता है?
उत्तर: भारत का विचार है कि उत्सर्जन-दर में कमी करने की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेवारी विकसित देशों की है, क्योंकि इन देशों ने एक लंबी अवधि तक बहुत ज़्यादा उत्सर्जन किया है।
भारत का अंतर्राष्ट्रीय पक्ष UNFCCC में दर्ज ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के तर्क पर टिका है, जिसके अनुसार ग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज़्यादातर विकसित देशों की है, और जिसमें जोर देकर कहा गया है कि ‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास की है।’
इसी आधार पर भारत तेजी से औद्योगिक होते देशों पर बाध्यता आयद करने के खिलाफ है और मानता है कि यह नियमाचार की मूल भावना के विरुद्ध तथा अनुचित है।