NCERT की पाठ्यपुस्तक समकालीन विश्व राजनीति के अध्याय 6 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन की प्रश्नावली के सभी 9 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों और कक्षा-गतिविधि के उत्तर अंत में दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
इस अध्याय की प्रश्नावली हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों में एक जैसी है: दोनों में नौ प्रश्न हैं, उसी क्रम में, और प्रश्न 1 के चारों विकल्प भी दोनों में एक जैसे हैं। एक शब्द ज़रूर अलग है: प्रश्नावली में जिसे ‘विश्व की साझी विरासत’ कहा गया है, उसी को अध्याय के भीतर ‘वैश्विक संपदा’ या ‘मानवता की साझी विरासत’ कहा गया है। नीचे के सभी उत्तर हिंदी संस्करण की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं।
1 बहुविकल्पीय प्रश्न
प्र. पर्यावरण के प्रति बढ़ते सरोकारों का क्या कारण है? निम्नलिखित में सबसे बेहतर विकल्प चुनें।
(क) विकसित देश प्रकृति की रक्षा को लेकर चिंतित हैं।
(ख) पर्यावरण की सुरक्षा मूलवासी लोगों और प्राकृतिक पर्यावासों के लिए ज़रूरी है।
(ग) मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ है और यह नुकसान ख़तरे की हद तक पहुँच गया है।
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (ग) मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ है और यह नुकसान ख़तरे की हद तक पहुँच गया है।
क्यों: अध्याय की शुरुआत ही इस नुकसान की सूची से होती है। कृषि-योग्य भूमि में बढ़ोत्तरी रुक गई है और मौजूदा उपजाऊ जमीन के बड़े हिस्से की उर्वरता कम हो रही है; चारागाहों के चारे ख़त्म होने को हैं और मत्स्य-भंडार घट रहा है; जलाशयों की जलराशि तेजी से कम हुई है और उनमें प्रदूषण बढ़ा है; प्राकृतिक वनों की कटाई से लोग विस्थापित हो रहे हैं और जैव-विविधता की हानि जारी है; ओज़ोन परत में छेद और समुद्रतटीय प्रदूषण बढ़ रहा है। यही व्यापक और ख़तरनाक हद तक पहुँचा नुकसान बढ़ते सरोकारों का कारण है।
बाकी विकल्प क्यों नहीं: (क) और (ख) अपने-आप में ग़लत नहीं हैं, पर ये कारण के छोटे-छोटे हिस्से भर हैं, पूरा कारण नहीं; प्रश्न ‘सबसे बेहतर विकल्प’ माँगता है। (घ) तब सही होता जब ऊपर का कोई भी विकल्प कारण न बताता।
2 सही या ग़लत
प्र. “निम्नलिखित कथनों में प्रत्येक के आगे सही या ग़लत का चिह्न लगायें। ये कथन पृथ्वी-सम्मेलन के बारे में हैं —”
(क) इसमें 170 देश, हजारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भाग लिया।
(ख) यह सम्मेलन संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्त्वावधान में हुआ।
(ग) वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दों ने पहली बार राजनीतिक धरातल पर ठोस आकार ग्रहण किया।
(घ) यह महासम्मेलनी बैठक थी।
उत्तर:
(क) सही। किताब के अपने शब्दों में, इस सम्मेलन में 170 देश, हज़ारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय निगमों ने भाग लिया।
(ख) सही। यह 1992 में संयुक्त राष्ट्रसंघ का पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर केंद्रित सम्मेलन था, जो ब्राजील के रियो डी जनेरियो में हुआ।
(ग) सही। किताब कहती है कि वैश्विक राजनीति के दायरे में पर्यावरण को लेकर बढ़ते सरोकारों को इसी सम्मेलन में एक ठोस रूप मिला।
(घ) सही। यह शिखर स्तर की महासम्मेलनी बैठक थी, जिसमें 170 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसीलिए इसे ‘पृथ्वी सम्मेलन’ (Earth Summit) कहा जाता है।
3 ‘विश्व की साझी विरासत’
प्र. ‘विश्व की साझी विरासत’ के बारे में निम्नलिखित में कौन-से कथन सही हैं?
(क) धरती का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष को ‘विश्व की साझी विरासत’ माना जाता है।
(ख) ‘विश्व की साझी विरासत’ किसी राज्य के संप्रभु क्षेत्राधिकार में नहीं आते।
(ग) ‘विश्व की साझी विरासत’ के प्रबंधन के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच मतभेद है।
(घ) उत्तरी गोलार्द्ध के देश ‘विश्व की साझी विरासत’ को बचाने के लिए दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से कहीं ज़्यादा चिंतित हैं।
उत्तर: सही कथन हैं (क), (ख) और (ग)।
(क) सही। किताब इन्हें ही ‘वैश्विक संपदा’ या ‘मानवता की साझी विरासत’ बताती है और इसमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष गिनाती है।
(ख) सही। विश्व के ये हिस्से किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं, इसीलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है।
(ग) सही। बाहरी अंतरिक्ष के इतिहास से पता चलता है कि इस क्षेत्र के प्रबंधन पर उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों के बीच मौजूद असमानता का असर पड़ा है।
(घ) ग़लत। दोनों की चिंता का विषय अलग-अलग है, कम-ज़्यादा नहीं। उत्तरी देशों की मुख्य चिंता ओज़ोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि थी, जबकि दक्षिणी देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को लेकर ज़्यादा चिंतित थे।
4 रियो सम्मेलन के परिणाम
प्र. रियो सम्मेलन के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
1. पर्यावरण विश्व-राजनीति के केंद्र में आ गया। वैश्विक राजनीति के दायरे में पर्यावरण को लेकर बढ़ते सरोकारों को इस सम्मेलन में एक ठोस रूप मिला। इसमें 170 देश, हज़ारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय निगमों ने भाग लिया।
2. तीन विषयों पर नियमाचार बने। रियो-सम्मेलन में जलवायु-परिवर्तन, जैव-विविधता और वानिकी के संबंध में कुछ नियमाचार निर्धारित हुए।
3. ‘अजेंडा-21’। इसमें विकास के कुछ तौर-तरीके भी सुझाए गए, जिन्हें ‘अजेंडा-21’ कहा गया।
4. ‘टिकाऊ विकास’ पर सहमति। सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि आर्थिक वृद्धि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। इसे ‘टिकाऊ विकास’ का तरीका कहा गया।
5. उत्तर और दक्षिण का फ़र्क़ खुलकर सामने आया। यह साफ़ हुआ कि धनी और विकसित देश यानी उत्तरी गोलार्द्ध तथा गरीब और विकासशील देश यानी दक्षिणी गोलार्द्ध पर्यावरण के अलग-अलग अजेंडे के पैरोकार हैं।
6. ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत माना गया। रियो-घोषणापत्र में विकासशील देशों का यह तर्क स्वीकार कर लिया गया कि पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है।
7. समस्याएँ फिर भी बनी रहीं। इसके बाद भी आपसी अंतर और कठिनाइयाँ बनी रहीं, और सबसे बड़ी समस्या यह थी कि ‘टिकाऊ विकास’ पर अमल कैसे किया जाएगा। कुछ आलोचकों का कहना है कि ‘अजेंडा-21’ का झुकाव पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के बजाय आर्थिक वृद्धि की ओर है।
5 ‘विश्व की साझी विरासत’ का अर्थ और उसका दोहन
प्र. ‘विश्व की साझी विरासत’ का क्या अर्थ है? इसका दोहन और प्रदूषण कैसे होता है?
उत्तर:
अर्थ: साझी संपदा उन संसाधनों को कहते हैं जिन पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है। इसी तरह विश्व के कुछ हिस्से और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं, इसीलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है। इन्हें ही ‘वैश्विक संपदा’ या ‘मानवता की साझी विरासत’ कहा जाता है। इसमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं।
दोहन और प्रदूषण कैसे होता है:
1. वायुमंडल: धरती के ऊपरी वायुमंडल में ओज़ोन गैस की मात्रा में लगातार कमी हो रही है, जिसे ओज़ोन परत में छेद होना भी कहते हैं। 1980 के दशक के मध्य में अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन परत में छेद की खोज हुई। इससे पारिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के स्वास्थ्य पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
2. समुद्री सतह और तट: पूरे विश्व में समुद्रतटीय क्षेत्रों का प्रदूषण बढ़ रहा है। समुद्र का मध्यवर्ती भाग अब भी अपेक्षाकृत स्वच्छ है, लेकिन इसका तटवर्ती जल जमीनी क्रियाकलापों से प्रदूषित हो रहा है। समुद्रतटीय इलाकों में मनुष्यों की सघन बसाहट जारी है और इस प्रवृत्ति पर अंकुश न लगा तो समुद्री पर्यावरण की गुणवत्ता में भारी गिरावट आएगी।
3. अंटार्कटिका: 1959 के बाद यहाँ गतिविधियाँ वैज्ञानिक अनुसंधान, मत्स्य आखेट और पर्यटन तक सीमित रही हैं, फिर भी इस क्षेत्र के कुछ हिस्से अवशिष्ट पदार्थ जैसे तेल के रिसाव के दबाव में अपनी गुणवत्ता खो रहे हैं।
4. बाहरी अंतरिक्ष: यहाँ भी महत्त्वपूर्ण मसला प्रौद्योगिकी और औद्योगिक विकास का है। बाहरी अंतरिक्ष में जो दोहन-कार्य हो रहे हैं, उनके फायदे न तो मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं और न आगे की पीढ़ियों के लिए।
5. सहयोग की कठिनाई: ‘वैश्विक संपदा’ की सुरक्षा के सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कायम करना टेढ़ी खीर है, क्योंकि अपुष्ट वैज्ञानिक साक्ष्यों और समय-सीमा को लेकर मतभेद पैदा होते हैं। फिर भी अंटार्कटिका संधि (1959), मॉन्ट्रियल न्यायाचार (1987) और अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार (1991) जैसे महत्त्वपूर्ण समझौते हुए हैं।
6 ‘साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ’
प्र. ‘साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ’ से क्या अभिप्राय है? हम इस विचार को कैसे लागू कर सकते हैं?
उत्तर:
अभिप्राय: पर्यावरण को बचाने की ज़िम्मेदारी सब देशों की साझी है, लेकिन सबका हिस्सा बराबर नहीं है। दक्षिण के विकासशील देशों का तर्क है कि विश्व में पारिस्थितिकी को नुकसान अधिकांशतया विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुँचा है; यदि विकसित देशों ने पर्यावरण को ज़्यादा नुकसान पहुँचाया है तो उन्हें इस नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी भी ज़्यादा उठानी चाहिए। इसके अलावा, विकासशील देश अभी औद्योगीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, इसलिए उन पर वे प्रतिबंध न लगें जो विकसित देशों पर लगाये जाने हैं। यह तर्क सन् 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में मान लिया गया और इसे ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत कहा गया।
रियो-घोषणापत्र का कहना है कि ‘धरती के पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता और गुणवत्ता की बहाली, सुरक्षा तथा संरक्षण के लिए विभिन्न देश विश्व-बंधुत्व की भावना से आपस में सहयोग करेंगे। पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए विभिन्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ होगी। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज़्यादा है और इन देशों के पास विपुल प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं। इसे देखते हुए टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास में विकसित देश अपनी ख़ास जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।’
इसे लागू कैसे किया जा सकता है:
1. क्षमता के अनुरूप ज़िम्मेदारी: UNFCCC (1992) में कहा गया है कि इस संधि को स्वीकार करने वाले देश अपनी क्षमता के अनुरूप, पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए पर्यावरण की सुरक्षा के प्रयास करेंगे।
2. विकासशील देशों को छूट: चूँकि ऐतिहासिक रूप से और आज भी उत्सर्जन में सबसे ज़्यादा हिस्सा विकसित देशों का है और विकासशील देशों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन कम है, इसलिए चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो-प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है।
3. औद्योगिक देशों के लिए लक्ष्य: क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
4. कानून बनाते समय ध्यान: अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण कानून के निर्माण, प्रयोग और व्याख्या में विकासशील देशों की विशिष्ट ज़रूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
5. वित्त और तकनीक का हस्तांतरण: भारत इस बात को ज़रूरी मानता है कि विकसित देश विकासशील देशों को वित्तीय संसाधन तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकी मुहैया कराने के लिए तुरंत उपाय करें, ताकि विकासशील देश UNFCCC की मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकें।
7 1990 के दशक से पर्यावरण प्राथमिक सरोकार क्यों
प्र. वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे 1990 के दशक से विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार क्यों बन गए हैं?
उत्तर:
1. नुकसान ख़तरे की हद तक पहुँच गया। कृषि-योग्य भूमि की उर्वरता घट रही है, चारागाहों के चारे ख़त्म होने को हैं, मत्स्य-भंडार घट रहा है और जलाशयों की जलराशि तेजी से कम होकर प्रदूषित हो रही है। इससे खाद्य-उत्पादन में कमी आ रही है।
2. मानवीय जीवन पर सीधा असर। संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानव विकास रिपोर्ट (2016) के अनुसार विकासशील देशों की 66.3 करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होता और दो अरब चालीस करोड़ आबादी साफ़-सफ़ाई की सुविधा से वंचित है, जिस वजह से 30 लाख से ज़्यादा बच्चे हर साल मौत के शिकार होते हैं।
3. वन और जैव-विविधता की हानि। प्राकृतिक वन जलवायु और जलचक्र को संतुलित रखते हैं और इन्हीं में धरती की जैव-विविधता का भंडार है, पर इनकी कटाई हो रही है और लोग विस्थापित हो रहे हैं।
4. ओज़ोन परत में छेद। 1980 के दशक के मध्य में अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन छेद की खोज एक आँख खोल देने वाली घटना थी, जिसने पारिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के स्वास्थ्य पर मँडराते ख़तरे को सामने ला दिया।
5. कोई देश अकेले हल नहीं कर सकता। इन मसलों में अधिकांश ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले दम पर नहीं कर सकती, इसलिए ये विश्व-राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।
6. सम्मेलनों और संधियों की कड़ी। 1972 की ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ और 1987 की बर्टलैंड रिपोर्ट की चेतावनियों के बाद 1992 के पृथ्वी सम्मेलन ने पर्यावरण को विश्व राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल करा दिया। इसी दशक में UNFCCC पर हस्ताक्षर हुए, जिनके आधार पर आगे चलकर 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल पर सहमति बनी।
7. संसाधनों की होड़। तेल और साफ़ पानी जैसे संसाधनों को लेकर देशों के बीच तनाव और हिंसक झड़पें हुई हैं, और यह आशंका है कि साझे जल-संसाधन को लेकर मतभेद 21वीं सदी में फसाद की जड़ साबित हों।
8 सुलह और सहकार की नीति
प्र. पृथ्वी को बचाने के लिए ज़रूरी है कि विभिन्न देश सुलह और सहकार की नीति अपनाएँ। पर्यावरण के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच जारी वार्ताओं की रोशनी में इस कथन की पुष्टि करें।
उत्तर: यह कथन सही है, और अध्याय की पूरी कहानी इसी की पुष्टि करती है।
1. दोनों पक्षों की माँग अलग है। उत्तर के विकसित देश पर्यावरण के मसले पर उसी रूप में चर्चा करना चाहते हैं जिस दशा में पर्यावरण आज मौजूद है, और चाहते हैं कि पर्यावरण के संरक्षण में हर देश की जिम्मेदारी बराबर हो। दक्षिण के विकासशील देशों का तर्क है कि नुकसान अधिकांशतया विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुँचा है, इसलिए भरपाई की ज़िम्मेदारी भी ज़्यादा उन्हीं की है।
2. सुलह का पहला उदाहरण: रियो-घोषणापत्र। 1992 के पृथ्वी सम्मेलन में दक्षिण का यह तर्क मान लिया गया और ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत स्वीकार हुआ। यह किसी एक पक्ष की जीत नहीं, दोनों के बीच बनी सुलह थी।
3. सहकार का उदाहरण: संधियाँ। अंटार्कटिका संधि (1959), मॉन्ट्रियल न्यायाचार (1987) और अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार (1991) दिखाते हैं कि अंटार्कटिका पर दावों के मतभेद के रहते भी पर्यावरण की सुरक्षा के कल्पनाशील और दूरगामी प्रभाव वाले नियम बने और अपनाये गए।
4. UNFCCC और क्योटो। UNFCCC में यह माना गया कि उत्सर्जन में सबसे बड़ा ऐतिहासिक और मौजूदा हिस्सा विकसित देशों का है और विकासशील देशों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन कम है। इसी सहमति पर क्योटो प्रोटोकॉल में औद्योगिक देशों के लिए लक्ष्य तय हुए और भारत, चीन तथा अन्य विकासशील देशों को छूट मिली।
5. जहाँ सहकार अधूरा रहा। भारत ने 1997 में रियो के समझौतों के क्रियान्वयन का जो पुनरावलोकन किया, उसका मुख्य निष्कर्ष यह था कि विकासशील देशों को रियायती शर्तों पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा बेहतर प्रौद्योगिकी देने में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है। यही वह जगह है जहाँ आगे सुलह और सहकार की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
6. क्षेत्रीय सहकार। भारत का यह भी मानना है कि ‘दक्षेस’ में शामिल देश पर्यावरण के प्रमुख वैश्विक मसलों पर एक समान राय बनायें, ताकि इस क्षेत्र की आवाज़ वज़नी हो सके।
निष्कर्ष: पर्यावरण के मसले किसी एक देश की सीमा में नहीं रुकते और किसी एक सरकार के बूते हल नहीं होते। इसलिए पृथ्वी को बचाने का रास्ता टकराव नहीं, सुलह और सहकार ही है।
9 पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना आर्थिक विकास
प्र. विभिन्न देशों के सामने सबसे गंभीर चुनौती वैश्विक पर्यावरण को आगे कोई नुकसान पहुँचाए बगैर आर्थिक विकास करने की है। यह कैसे हो सकता है? कुछ उदाहरणों के साथ समझाएँ।
उत्तर: इसी रास्ते को अध्याय ‘टिकाऊ विकास’ कहता है, यानी आर्थिक वृद्धि का ऐसा तरीका जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। इस पर सहमति 1992 के रियो-सम्मेलन में बनी और विकास के तौर-तरीके ‘अजेंडा-21’ के रूप में सुझाए गए।
1. स्वच्छतर ईंधन। भारत ने अपनी ‘नेशनल ऑटो-फ़्यूल पॉलिसी’ के अंतर्गत वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंधन अनिवार्य कर दिया है।
2. ऊर्जा का कारगर इस्तेमाल। 2001 में ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम पारित हुआ, जिसमें ऊर्जा के ज़्यादा कारगर इस्तेमाल की पहलकदमी की गई।
3. नवीकरणीय ऊर्जा। 2003 के बिजली अधिनियम में नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया, और पुनर्नवीकृत होने वाली ऊर्जा के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक भारत में चल रहा है।
4. स्वच्छ प्रौद्योगिकी। प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले के उपयोग पर आधारित प्रौद्योगिकी को अपनाने की तरफ रुझान बढ़ा है। भारत बायोडीजल से संबंधित एक राष्ट्रीय मिशन चलाने के लिए भी तत्पर है, जिसमें 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल होगा।
5. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता। भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल का और 2 अक्तूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन किया।
6. समुदाय की परंपरागत समझ। भारत के ‘पावन वन-प्रांतर’ या ‘देवस्थान’ ऐसी व्यवस्था हैं जिनके अंतर्गत पुराने समाज प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे। यह समुदाय आधारित संसाधन-प्रबंधन का उदाहरण है।
7. विकसित देशों की ज़िम्मेदारी। विकसित देशों को विकासशील देशों को रियायती शर्तों पर वित्तीय संसाधन और पर्यावरण के लिहाज से बेहतर प्रौद्योगिकी मुहैया करानी चाहिए, ताकि वे बिना नुकसान पहुँचाए विकास कर सकें। दूसरी ओर विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास ही रहेगी।
निष्कर्ष: रास्ता यही है कि विकास रुके नहीं, पर उसका तरीका बदले: स्वच्छ ईंधन, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा की बचत, समुदाय आधारित संसाधन-प्रबंधन और उत्तर से दक्षिण की ओर वित्त तथा प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण।
10 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
किताब अध्याय के हाशिये पर, कार्टूनों के नीचे और बॉक्सों में भी कुछ प्रश्न पूछती है और एक कक्षा-गतिविधि देती है। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए किताब के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।
प्र. जंगल के सवाल पर राजनीति, पानी के सवाल पर राजनीति और वायुमंडल के मसले पर राजनीति! फिर, किस बात में राजनीति नहीं है!
उत्तर: हाशिये की यह टिप्पणी अध्याय की ही बात कहती है। कोई मसला तब राजनीतिक बनता है जब उसमें सत्ता के सवाल जुड़ जाएँ: पर्यावरण को नुकसान कौन पहुँचाता है, उस पर रोक लगाने के उपाय करने की ज़िम्मेदारी किसकी है, और धरती के प्राकृतिक संसाधनों पर किसको कितना इस्तेमाल का हक है। जंगल, पानी और वायुमंडल सब इन्हीं सवालों को जन्म देते हैं, और इनमें से अधिकांश मसले ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले नहीं कर सकती, इसलिए वे विश्व-राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं। जिस भी बात में लोगों या देशों के बीच संसाधनों, लागत और फ़ैसलों का बँटवारा हो, वह राजनीतिक हो सकती है; राजनीति से बाहर वही रहता है जिस पर कोई विवाद न हो।
प्र. (कार्टून ‘वैश्विक तापवृद्धि’) यहाँ अंगुलियों को चिमनी और विश्व को एक लाईटर के रूप में दिखाया गया है। ऐसा क्यों?
उत्तर: कार्टून में एक हाथ है जिसकी अंगुलियाँ कारख़ानों की ईंटों वाली चिमनियों जैसी बनी हैं, और यह हाथ एक लाईटर थामे है जिस पर विश्व का नक्शा बना है और ऊपर लौ जल रही है। चिमनियाँ उद्योगों और उनसे निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाऊस गैसों का प्रतीक हैं; लाईटर का अर्थ है कि धरती को सुलगाया जा रहा है, यानी गर्म किया जा रहा है। दोनों मिलकर कहते हैं कि औद्योगिक गतिविधियाँ दुनिया को अपनी मुट्ठी में लेकर धीरे-धीरे जला रही हैं। यही वैश्विक तापवृद्धि है, जिसमें इन गैसों की कोई-न-कोई भूमिका मानी जाती है और जिसके परिणाम धरती पर जीवन के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।
प्र. अपने पास-पड़ोस की ऐसी ख़बरों की कतरनें जुटाएँ जिनमें पर्यावरण और राजनीति के बीच संबंध दिखाई देता हो।
उत्तर: यह परियोजना-कार्य है। स्थानीय अख़बारों में पानी की कमी या किसी नदी-तालाब पर विवाद, किसी कारख़ाने से होने वाला प्रदूषण, सड़क या इमारत के लिए पेड़ों की कटाई, कूड़े के ढेर, या निवासियों के विरोध-प्रदर्शन की ख़बरें ढूँढ़िए। हर कतरन के साथ लिखिए कि नुकसान किसने पहुँचाया, उसकी क़ीमत कौन चुका रहा है और उपाय की ज़िम्मेदारी किसकी है; यही वे सवाल हैं जिनसे अध्याय दिखाता है कि पर्यावरण के मसले राजनीतिक हैं।
प्र. (कार्टून) क्या पृथ्वी की सुरक्षा को लेकर धनी और गरीब देशों के नज़रिए में अंतर है?
उत्तर: हाँ। कार्टून में कोई पूछता है कि जो धरती को बचाना चाहता है वह हाथ उठाए; ऊँचा टोप पहने एक धनी व्यक्ति उँगलियाँ मोड़कर (यानी मन में झूठ रखकर) हाथ उठाता है, और पास बैठा एक ग़रीब व्यक्ति भी हाथ उठाता है। धनी देश शब्दों में तो सहमत है पर मन से नहीं। अध्याय दोनों नज़रिए समझाता है: उत्तरी देशों की मुख्य चिंता ओज़ोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि है और वे चाहते हैं कि पर्यावरण के संरक्षण में हर देश की ज़िम्मेदारी बराबर हो, जबकि दक्षिणी देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को लेकर चिंतित हैं और मानते हैं कि जिसने ज़्यादा नुकसान पहुँचाया उसकी ज़िम्मेदारी भी ज़्यादा है। इसी कारण ‘साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत बना।
प्र. जल्दी ही चंद्रमा का पर्यावरण भी बिगड़ जाएगा!
उत्तर: हाशिये की यह टिप्पणी बाहरी अंतरिक्ष की ओर इशारा करती है, जिसे किताब ‘विश्व की साझी विरासत’ में गिनती है। किताब बताती है कि बाहरी अंतरिक्ष के प्रबंधन पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच की असमानता का असर पड़ा है, और वहाँ जो दोहन-कार्य हो रहे हैं उनके फ़ायदे न मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं, न आगे की पीढ़ियों के लिए। अगर अंतरिक्ष के दोहन पर भी साझा नियम न बने तो धरती की तरह चंद्रमा और अंतरिक्ष का पर्यावरण भी बिगड़ सकता है।
प्र. क्योटो प्रोटोकॉल के बारे में और अधिक जानकारी एकत्र करें। किन बड़े देशों ने इस पर दस्तख़त नहीं किए हैं और क्यों?
उत्तर: किताब के अनुसार क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जिस पर 1997 में जापान के क्योटो में सहमति बनी और जिसके अंतर्गत औद्योगिक देशों के लिए ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य तय किए गए। सबसे चर्चित उदाहरण अमरीका का है, जिसने इस पर हस्ताक्षर तो किए पर इसका कभी अनुमोदन नहीं किया; उसका तर्क था कि इससे अमरीकी अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा और यह अन्यायपूर्ण है क्योंकि चीन और भारत जैसे विकासशील देशों को इसकी बाध्यताओं से छूट दी गई है। ऑस्ट्रेलिया ने इसका अनुमोदन 2007 में जाकर किया और कनाडा बाद में इससे अलग हो गया। भारत ने 2002 में इस पर हस्ताक्षर और इसका अनुमोदन किया।
प्र. यह ज़ायज सिद्धांत है! हमारे देश में जारी आरक्षण की नीति की तरह! है न?
उत्तर: यह तुलना ठीक है। दोनों इस विचार पर टिके हैं कि असमान पक्षों के साथ बराबर का बर्ताव न्याय नहीं है। आरक्षण ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को विशेष प्रावधान देता है; ‘साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ’ का सिद्धांत कहता है कि धरती के पारिस्थितिकी तंत्र की ज़िम्मेदारी सबकी साझी है, पर विकसित देशों को, जिन्होंने ज़्यादा नुकसान पहुँचाया और जिनके पास विपुल प्रौद्योगिक तथा वित्तीय संसाधन हैं, ज़्यादा बोझ उठाना चाहिए, और विकासशील देशों की विशिष्ट ज़रूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
प्र. लोग कहते हैं कि लातिनी अमरीका में एक नदी बेच दी गई। साझी संपदा कैसे बेची जा सकती है?
उत्तर: यह तब होता है जब राज्य किसी समुदाय द्वारा सँभाली जाने वाली चीज़ को अपने हाथ में लेकर उसका निजीकरण कर दे। किताब बताती है कि साझी संपदा पर समूह के हर सदस्य के अधिकार और कर्तव्य दोनों होते हैं, पर निजीकरण समेत कई कारणों से पूरी दुनिया में साझी संपदा का आकार घट रहा है और गरीबों को उसकी उपलब्धता कम हो रही है। जब सरकार किसी नदी के पानी का अधिकार किसी निजी कंपनी को सौंप दे तो समुदाय का साझा नियंत्रण ख़त्म हो जाता है। किताब का ‘देवस्थान’ वाला उदाहरण भी यही समस्या दिखाता है कि कठिनाई तब आती है जब वैधानिक स्वामित्व और वास्तविक नियंत्रण अलग-अलग हाथों में हों।
प्र. मैं समझ गया! पहले उन लोगों ने धरती को बर्बाद किया और अब धरती को चौपट करने की हमारी बारी है। क्या यही है हमारा पक्ष?
उत्तर: नहीं, यह भारत के पक्ष का मज़ाक भरा रूप है। भारत का कहना है कि उत्सर्जन-दर में कमी करने की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी विकसित देशों की है क्योंकि उन्होंने लंबी अवधि तक बहुत ज़्यादा उत्सर्जन किया है, और विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास है। पर भारत प्रदूषण फैलाने का अधिकार नहीं माँगता: उसने नेशनल ऑटो-फ़्यूल पॉलिसी, 2001 का ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम, 2003 का बिजली अधिनियम, बायोडीजल का प्रस्तावित राष्ट्रीय मिशन, 2 अक्तूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन और नवीकरणीय ऊर्जा का एक बड़ा कार्यक्रम अपनाया है। उसकी बात बोझ के न्यायपूर्ण बँटवारे की है, धरती को चौपट करने की छूट की नहीं।
प्र. चिपको आंदोलन के बारे में और जानकारी जुटाएँ।
उत्तर: चिपको आंदोलन 1970 के दशक की शुरुआत में उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के पहाड़ी इलाकों में शुरू हुआ, जब गाँववालों ने, जिनमें बहुत-सी महिलाएँ थीं, पेड़ों से चिपककर ठेकेदारों को उन्हें काटने से रोका। यह भारत के सबसे प्रसिद्ध पर्यावरण आंदोलनों में से एक बना, जिसकी माँग थी कि जिन जंगलों पर स्थानीय समुदाय निर्भर हैं उन पर उनका नियंत्रण हो। किताब में बताए भारत के दूसरे पर्यावरण आंदोलनों की तरह यह भी अहिंसा पर आधारित था।
प्र. (कार्टून, बॉक्स ‘क्या वन निर्जन होते हैं?’) क्या आप पर्यावरणविदों के प्रयास से सहमत हैं? पर्यावरणविदों को यहाँ जिस रूप में चित्रित किया गया है क्या आपको वह सही लगता है?
उत्तर: कार्टून में सूट पहने कुछ लोग बिजली के खंभे के पास खड़े होकर उसमें उगी एक छोटी-सी टहनी को बड़े ध्यान से पानी दे रहे हैं, मानो इसी से प्रकृति बच जाएगी। यह उस पर्यावरणवाद का मज़ाक है जो छोटे, दिखावटी प्रयास करता है जबकि असली विनाश जारी रहता है; किताब ख़ुद कहती है कि तीन दशकों की पर्यावरण-सक्रियता के बावजूद तीसरी दुनिया में वनों की कटाई ख़तरनाक गति से जारी है। यह चित्रण उन बहुत-से पर्यावरणविदों और आंदोलनों के साथ न्याय नहीं करता जो वन, बाँध-विरोधी और विजनपन के अभियानों में सचमुच काम कर रहे हैं, पर दिखावटी कदमों के ख़िलाफ़ यह एक ठीक चेतावनी है।
प्र. हमारे देश में भी पानी को लेकर बड़े झगड़े-टंटे चल रहे हैं। ये संघर्ष उनसे किस तरह अलग हैं?
उत्तर: किताब के उदाहरण संप्रभु देशों के बीच के हैं: 1950 और 1960 के दशक में इज़रायल, सीरिया तथा जॉर्डन के बीच जॉर्डन और यारमुक नदी को लेकर, और तुर्की, सीरिया तथा इराक के बीच फरात नदी पर बाँध को लेकर। इन देशों के ऊपर कोई सत्ता नहीं है, इसलिए विवाद हिंसक झड़पों तक पहुँच सकते हैं। भारत के भीतर पानी के झगड़े, जैसे किसी नदी के पानी के बँटवारे पर राज्यों के बीच विवाद, एक ही देश के भीतर होते हैं जहाँ केंद्र सरकार, न्यायाधिकरण और अदालतें इन्हें सुलझाने के लिए मौजूद हैं, इसलिए ये कड़वे होने पर भी क़ानून और बातचीत से निपटाए जाते हैं, युद्ध से नहीं।
प्र. (कार्टून) पृथ्वी पर पानी का विस्तार ज़्यादा और भूमि का विस्तार कम है। फिर भी, कार्टूनिस्ट ने ज़मीन को पानी की अपेक्षा ज़्यादा बड़े हिस्से में दिखाने का फ़ैसला किया है। यह कार्टून किस तरह पानी की कमी को चित्रित करता है?
उत्तर: कार्टून में दुनिया को पानी की एक बोतल के रूप में दिखाया गया है, जिस पर महाद्वीप छपे हैं और तली में बहुत थोड़ा पानी बचा है। ज़मीन को बड़ा और पानी को छोटा दिखाकर कार्टूनिस्ट याद दिलाता है कि धरती का अधिकांश भाग पानी होने के बावजूद उसमें इस्तेमाल लायक स्वच्छ पानी बहुत कम है और वह ख़त्म हो रहा है। यही किताब की बात है कि विश्व के कुछ हिस्सों में स्वच्छ जल की बढ़ती कमी के कारण साझे जल-संसाधन को लेकर मतभेद 21वीं सदी में फ़साद की जड़ साबित हो सकते हैं।
प्र. आदिवासी जनता और उनके आंदोलनों के बारे में कुछ ज़्यादा बातें क्यों नहीं सुनायी पड़तीं? क्या मीडिया का उनसे कोई मनमुटाव है?
उत्तर: किताब बताती है कि मूलवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े मसले देश की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय तक उपेक्षित रहे हैं। मूलवासी अक्सर संख्या में कम होते हैं, दूर-दराज़ इलाकों में रहते हैं और उनके पास आर्थिक या राजनीतिक ताक़त कम होती है, इसलिए दर्शकों और विज्ञापनों के पीछे चलने वाले मीडिया में उनकी बातों को कम जगह मिलती है। भारत में अनुसूचित जनजातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संवैधानिक सुरक्षा मिली है, फिर भी विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में सबसे बड़ा समूह वही हैं, और यह बात शायद ही कभी पहले पन्ने की ख़बर बनती है। मीडिया जान-बूझकर पक्षपात करे या नहीं, नतीजा यही है कि उनकी आवाज़ कम सुनी जाती है।
प्र. (कार्टून ‘एक चम्मच पर्यावरण भी!’) क्या आपको यह नज़रिया जँचता है जिसमें एक शहरी इलाके के आदमी को प्रकृतिखोर और लालची दिखाया गया है?
उत्तर: कार्टून में शहर की इमारतों की पृष्ठभूमि में खड़े एक आदमी को चम्मच से पेड़, इंद्रधनुष और तितली खिलाए जा रहे हैं, यानी शहरी, विकसित दुनिया प्रकृति को भोजन की तरह निगल रही है। इस नज़रिए में सच्चाई है, क्योंकि शहरों और उद्योगों की संसाधनों और ज़मीन की माँग ही जंगलों और मूलवासियों की ज़मीन पर दबाव बनाती है, और विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में सबसे बड़ा समूह मूलवासी हैं। पर यह पूरी तस्वीर नहीं है: शहरों के लोग भी पर्यावरण आंदोलनों का साथ देते हैं, और किताब दिखाती है कि ज़िम्मेदारी बाँटनी होगी, जो ‘साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ’ का विचार है।
प्र. हर छात्र अपने रोज़मर्रा के इस्तेमाल की दस वस्तुओं (कलम, कागज़, इरेजर, कंप्यूटर, पानी आदि) की सूची बनाए और उनके निर्माण में लगे प्राकृतिक संसाधनों की मात्रा का आकलन करे।
कैसे करें: यह गणना का अभ्यास है, इसलिए इसका कोई एक उत्तर नहीं है। बनी-बनायी चीज़ों में लगे कच्चे माल और ऊर्जा का अंदाज़ा लगाइए; पानी के लिए इस्तेमाल हुए पानी की मात्रा और उसकी पंपिंग तथा परिशोधन में लगी बिजली का हिसाब कीजिए। पूरी कक्षा का जोड़ निकालिए, फिर उसे पूरे विद्यालय और देशभर के विद्यालयों तक बढ़ाइए, और किसी विकसित तथा किसी विकासशील देश के छात्रों के उपभोग से तुलना कीजिए। निष्कर्ष वही है जो अध्याय का है: संसाधनों का उपभोग, और इसलिए उनके ख़त्म होने की ज़िम्मेदारी, बराबर नहीं है।