नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।
- समाजशास्त्रीय कल्पनाशक्ति व्यक्ति और समाज, सूक्ष्म और स्थूल, स्थानीय और भूमंडलीय को कैसे जोड़ती है
- क्या भूमंडलीय अंतःसंबंध नए हैं: रेशम मार्ग, पाणिनी, यी जिंग और कूपमंडूक दृष्टांत
- भूमंडलीकरण के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयाम: उदारीकरण, पारराष्ट्रीय निगम, इलेक्ट्रॉनिक व ज्ञानात्मक अर्थव्यवस्था, ई.यू./एशियान/सार्क, अंतःसरकारी व गैर-सरकारी संगठन
- सजातीयकरण बनाम भूस्थानीकरण, पुस्तक के अपने उदाहरणों सहित (स्टार, एमटीवी, मैक्डॉनाल्डस)
- भूमंडलीकरण श्रम को कैसे प्रभावित करता है (नाइके उदाहरण, फोर्डवाद बनाम फोर्डवादोत्तर) और स्वदेशी शिल्प व ज्ञान व्यवस्थाओं को कैसे खतरे में डालता है
1 समाजशास्त्र भूमंडलीकरण का अध्ययन क्यों करता है
इक्कीसवीं सदी में सामाजिक परिवर्तन पर कोई भी चर्चा भूमंडलीकरण के बिना अधूरी है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण शब्द इस किताब में पहले भी आ चुके हैं: अध्याय 4 में भूमंडलीकरण, उदारीकरण और ग्रामीण समाज को याद करें, और अध्याय 5 में उदारीकरण का भारतीय उद्योगों पर प्रभाव।
समाजशास्त्रीय कल्पनाशक्ति वह उपकरण है जिससे समाजशास्त्र व्यक्ति और समाज को जोड़ता है: सूक्ष्म और स्थूल, स्थानीय और भूमंडलीय। यह पूछती है कि एक दूरदराज़ गाँव का किसान, एक मध्यवर्गीय नौकरी खोजने वाला, या पड़ोस का पंसारी दूर लगने वाली ताकतों से कैसे प्रभावित होता है।

अब कोई भी समाजशास्त्री किसी समाज को अलग-थलग रूप में नहीं पढ़ सकता, क्योंकि स्थान और समय की दूरियाँ सिकुड़ गई हैं। गाँव, परिवार, आंदोलन, काम और जातियों के अध्ययन में अब भूमंडलीय अंतःसंबंधों का ध्यान रखना ज़रूरी है, जैसे विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के नियमों का किसान पर पड़ने वाला प्रभाव।
1.1 एक ही परिवर्तन अलग-अलग लोगों को अलग तरह से प्रभावित करता है
भूमंडलीकरण का प्रभाव व्यापक है पर एक-सा नहीं: जो एक समूह के लिए नया अवसर है, वह दूसरे के लिए आजीविका की हानि बन सकता है।
| प्रभावित समूह | पुस्तक के अनुसार क्या हुआ |
|---|---|
| बिहार की रेशम कातने और धागा बनाने वाली औरतें | सस्ते और चमकदार चीनी-कोरियाई रेशम धागे के बाज़ार में आते ही उनका धंधा चौपट हो गया |
| मछली छाँटने, सुखाने, बेचने और जाल बुनने वाली औरतें | भारतीय समुद्र में बड़े जहाज़ों ने वे मछलियाँ बटोर लीं जो पहले भारतीय नौकाएँ इकट्ठी करती थीं |
| गुजरात की गोंद इकट्ठा करने वाली औरतें | बावल के पेड़ों (जुलिफेरा) से गोंद जमा करती थीं; सूडान से सस्ते गोंद के आयात से रोज़गार खो बैठीं |
| भारत के लगभग सभी शहरों के रद्दी बीनने वाले | विकसित देशों से रद्दी कागज़ के आयात से अपना कुछ रोज़गार खो बैठे |
| परंपरागत मनोरंजनकर्ता | आगे इसी अध्याय में देखें, डोमबारी समुदाय का अपना बयान |
भूमंडलीकरण के प्रभाव पर राय एक जैसी नहीं है: कुछ इसे बेहतर विश्व का अग्रदूत मानते हैं, कुछ कहते हैं कि सुविधासंपन्न वर्ग को लाभ होता है जबकि पहले से वंचित आबादी की हालत और बिगड़ती है, और कुछ का कहना है कि भूमंडलीकरण कोई नई प्रक्रिया ही नहीं है।
2 क्या भूमंडलीय अंतःसंबंध भारत के लिए नए हैं?
2.1 प्रारंभिक वर्ष
भारत आज से दो हज़ार वर्ष पहले भी विश्व से अलग-थलग नहीं था। प्रसिद्ध रेशम मार्ग सदियों पहले भारत को चीन, फारस, मिस्र और रोम की महान सभ्यताओं से जोड़ता था। भारत के लंबे इतिहास में लोग व्यापारी, विजेता और प्रवासी के रूप में यहाँ आए और यहीं बस गए।
पाणिनी, संस्कृत के सबसे महान व्याकरणाचार्य, जिन्होंने ईसापूर्व चौथी शताब्दी के आसपास संस्कृत व्याकरण और स्वरविज्ञान को सुव्यवस्थित किया, अफगान मूल के थे। सातवीं शताब्दी के चीनी विद्वान यी जिंग ने चीन से भारत आते हुए, मार्ग में जावा (श्रीविजय शहर) में संस्कृत सीखी। इन अंतःक्रियाओं का प्रभाव थाईलैंड से मलाया, इंडो-चाइना, इंडोनेशिया, फिलिपिंस, कोरिया और जापान तक की भाषाओं में दिखता है।
कूपमंडूक (कुएँ में रहने वाला मेंढ़क) प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में बार-बार आने वाला एक दृष्टांत है, जो एकाकीकरणवाद के विरुद्ध चेतावनी देता है: एक मेंढ़क जो जीवनभर कुएँ में रहता है, बाहर की दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानता, किसी से बात नहीं करता, और बाहरी दुनिया पर केवल संदेह करता है। पुस्तक का तर्क: अगर हम भी कूपमंडूक की तरह जीते तो विश्व का वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास बहुत सीमित होता।
2.2 उपनिवेशवाद और भूमंडलीय संयोजन
आधुनिक पूँजीवाद का अपनी शुरुआत से ही एक भूमंडलीय आयाम रहा है (अध्याय 1 याद करें)। उपनिवेशवाद उस व्यवस्था का हिस्सा था जिसे पूँजी, कच्ची सामग्री, ऊर्जा, नए बाज़ार और एक संजाल (नेटवर्क) चाहिए था। आज भूमंडलीकरण की पहचान बड़े पैमाने पर प्रवसन मानी जाती है, पर पुस्तक बताती है कि लोगों का सबसे बड़ा प्रवसन यूरोपीय लोगों का अमेरिका और आस्ट्रेलिया में जा बसना था।
भूमंडलीकरण के प्रवसन को पूरी तरह नया मत मानिए। पुस्तक एक ही साँस में तीन पुराने बड़े प्रवसन गिनाती है: यूरोपीय लोगों का अमेरिका-आस्ट्रेलिया में बसना, भारत से गिरमिटिया मज़दूरों का एशिया-अफ्रीका-अमेरिका भेजा जाना, और दास-व्यापार जिसमें हज़ारों अफ्रीकियों को दूरस्थ तटों तक ले जाया गया।
2.3 स्वतंत्र भारत और विश्व
स्वतंत्र भारत ने भी भूमंडलीय दृष्टिकोण बनाए रखा, जो राष्ट्रीय आंदोलन से विरासत में मिला था: विश्वभर के मुक्ति संघर्षों के प्रति प्रतिबद्धता और एकता। शिक्षा-कार्य के लिए विदेश यात्राएँ, कच्चे माल-प्रौद्योगिकी का आयात-निर्यात, और विदेशी कंपनियों की भारत में मौजूदगी, स्वतंत्रता के बाद से लगातार चलती रही। पुस्तक का सवाल: क्या आज का परिवर्तन अतीत से आमूल रूप से अलग है?
3 भूमंडलीकरण की समझ
भूमंडलीकरण का अर्थ है विश्व में विभिन्न लोगों, क्षेत्रों और देशों के बीच अंतःनिर्भरता की वृद्धि, क्योंकि सामाजिक और आर्थिक संबंध पूरी दुनिया में फैल रहे हैं। आर्थिक शक्तियाँ इसका अभिन्न अंग हैं, पर अकेला कारण नहीं। इसे सबसे आगे सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों के विकास ने बढ़ाया है, साथ ही एक राजनीतिक संदर्भ में भी।
उदारीकरण और भूमंडलीकरण जुड़े ज़रूर हैं पर एक जैसे नहीं। उदारीकरण भारत की अपनी 1991 की आर्थिक नीति है; भूमंडलीकरण एक व्यापक, विश्वव्यापी प्रक्रिया है।
4 भूमंडलीकरण का आर्थिक आयाम
4.1 उदारीकरण की आर्थिक नीति
उदारीकरण उन नीतिगत निर्णयों को कहते हैं जो भारत राज्य ने 1991 से भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व-बाज़ार के लिए खोलने हेतु लिए: यह स्वतंत्रता के बाद की उस नीति से अलग था जो भारतीय व्यवसाय को विश्व की प्रतियोगिता से बचाती थी (यह मानते हुए कि एक पूर्व उपनिवेश देश खुले बाज़ार में नुकसान में रहेगा)।
जुलाई 1991 से भारतीय अर्थव्यवस्था ने कृषि, उद्योग, व्यापार, विदेशी निवेश-प्रौद्योगिकी, सार्वजनिक क्षेत्र और वित्तीय संस्थाओं में सुधारों की एक शृंखला देखी, इस विश्वास के साथ कि भूमंडलीय बाज़ार से अधिक जुड़ाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी होगा। उदारीकरण में अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (आई.एम.एफ.) जैसी संस्थाओं से ऋण लेना भी शामिल था, जो संरचनात्मक समायोजन की शर्त पर मिलते थे: आमतौर पर स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर सरकारी खर्च में कटौती, और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) जैसी संस्थाओं की अधिक भूमिका।
4.2 आर्थिक भूमंडलीकरण के विभिन्न आयाम
| आयाम | पुस्तक के अनुसार अर्थ |
|---|---|
| पारराष्ट्रीय निगम (टी.एन.सी./एम.एन.सी.) | ऐसी कंपनियाँ जो एक से अधिक देशों में माल का उत्पादन या सेवाएँ प्रदान करती हैं, छोटी फर्मों से लेकर विशाल अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठानों तक। नामित उदाहरण: कोकाकोला, जनरल मोटर्स, कॉलगेट-पामोलिव, कोडैक, मित्सुबिशी। कुछ भारतीय निगम भी पारराष्ट्रीय बन रहे हैं |
| इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था | बैंक, निगम, निधि प्रबंधक और निवेशकर्ता कंप्यूटर के माउस को दबाने मात्र से अपनी निधि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भेज सकते हैं; इसमें बड़ा जोखिम भी है, जैसे स्टॉक बाज़ार में उतार-चढ़ाव |
| भाररहित अर्थव्यवस्था | भूमंडलीय अर्थव्यवस्था अब मुख्यतः कृषि या उद्योग पर आधारित नहीं है; भाररहित अर्थव्यवस्था के उत्पाद सूचना पर आधारित होते हैं, जैसे कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर, मीडिया और इंटरनेट-आधारित सेवाएँ |
| ज्ञानात्मक अर्थव्यवस्था | अधिकांश कार्य-बल वस्तुओं के भौतिक उत्पादन में नहीं, बल्कि उनके प्रारूप, विकास, प्रौद्योगिकी, विपणन और सर्विस में लगा रहता है; इसी से कार्यक्रम प्रबंधक जैसे बिल्कुल नए व्यवसाय बने |
| वित्त का भूमंडलीकरण | पहली बार, मुख्यतः सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के कारण, वित्तीय बाज़ार भूमंडलीय स्तर पर एकीकृत हुए हैं: कुछ ही सेकंड में अरबों डॉलर का लेन-देन, चौबीसों घंटे व्यापार। न्यूयॉर्क, टोकियो और लंदन प्रमुख केंद्र हैं; मुंबई भारत की अपनी वित्तीय राजधानी है |
ऐसी वस्तुओं की सूची बनाएँ जो आप उपयोग करते हैं या जिनके विज्ञापन देखे हैं, और जो पारराष्ट्रीय निगमों द्वारा बनाई जाती हैं: जूते, कैमरे, कंप्यूटर, टेलीविजन, कारें, संगीत उपकरण, साबुन-शैंपू, कपड़े, प्रसंस्करित खाद्य, चाय, कॉफी, दूध पाउडर।
5 भूमंडलीय संचार
प्रौद्योगिकी और दूरसंचार के आधारभूत ढाँचे में हुई उन्नति ने भूमंडलीय संचार में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है: टेलीफ़ोन (लैंडलाइन और मोबाइल), फ़ैक्स, डिजिटल-केबल टेलीविजन, ईमेल और इंटरनेट। सबको समान पहुँच नहीं है, इसी असमानता को डिजिटल विभाजन कहा जाता है। इसके बावजूद, यह प्रौद्योगिकी समय और दूरी को “संकुचित” करती है: बंगलूरु और न्यूयॉर्क में बैठे दो व्यक्ति उपग्रह प्रौद्योगिकी की मदद से तुरंत बातचीत और दस्तावेज़-आदान-प्रदान कर सकते हैं। भारत सरकार का डिजिटल इंडिया कार्यक्रम भारत को “डिजिटली सशक्त समाज” और “ज्ञान अर्थव्यवस्था” बनाना चाहता है।
| वर्ष | आँकड़ा |
|---|---|
| 1998 | विश्व भर में 7 करोड़ इंटरनेट प्रयोगकर्ता: संयुक्त राज्य अमेरिका-कनाडा 62%, एशिया 12% |
| 2000 | विश्व भर में 32.5 करोड़ प्रयोगकर्ता; भारत में 30 लाख ग्राहक, 1.5 करोड़ प्रयोगकर्ता |
| अभी | भारत के इंटरनेट प्रयोगकर्ता बढ़कर 70 करोड़ हो गए |
| 2017-18 का अध्ययन | हर 10 में से 1 घर में कंप्यूटर है; लगभग एक-चौथाई घरों में मोबाइल फ़ोन से इंटरनेट है |
डिजिटल विभाजन अब भी बना हुआ है: साइबर कनेक्टिविटी मुख्यतः नगरीय है (साइबर कैफे से सुलभ), जबकि ग्रामीण इलाके अनिश्चित बिजली आपूर्ति, निरक्षरता और अधिसंरचना की कमी से बड़े पैमाने पर वंचित हैं।

पी.सी.ओ. और टेलीफ़ोन ने परिवार से जुड़े रहने की भारतीय लोगों की प्रबल सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरत पूरी की, ठीक वैसे ही जैसे शादी-रिश्तेदारों-अंत्येष्टि के लिए रेल यात्रा करती है। अधिकतर दूरभाष विज्ञापनों में माँ बेटे-बेटियों से, और दादा-दादी पोते-पोतियों से बात करते दिखते हैं।
1980 के दशक के आखिर में: सेलफोन को अविश्वास से देखा जाता था (आपराधिक तत्वों द्वारा दुरुपयोग)। 1998 तक: विलास की वस्तु माना जाता था (केवल धनवान लोग ही इसे रख सकते हैं, इसलिए इसके मालिकों पर कर लगाया जाना चाहिए)। 2006 तक: भारत सेलफोन प्रयोग में विश्व का चौथा सबसे बड़ा देश बन गया, छात्र कॉलेज में सेलफोन प्रतिबंध पर हड़ताल तक करने को तैयार हो गए। 2020-21 में कोविड-19 महामारी के कारण लाखों बच्चों ने ऑनलाइन कक्षाओं के लिए सेलफोन का उपयोग शुरू किया।
6 भूमंडलीकरण और श्रम
6.1 एक नया अंतर्राष्ट्रीय श्रम-विभाजन
तीसरी दुनिया के शहरों में अधिकाधिक नियमित निर्माण उत्पादन और रोज़गार किया जा रहा है (अध्याय 4 का बाह्यस्रोतीकरण और अध्याय 5 की संविदा खेती इसी की नींव पर बनी है)। पुस्तक इसे नाइके कंपनी से समझाती है।
नाइके के लिए कभी केवल दो अमेरिकी कारखानों ने जूते बनाए, कंपनी का मुख्यालय बेवरटन (पोर्टलैंड, ओरेगॉन के पास) में है। यह लगातार बदलाव मज़दूर वर्ग को कमज़ोर और असुरक्षित बना देता है: श्रम की यह लचीली प्रकृति आमतौर पर उत्पादकों के पक्ष में जाती है।
फोर्डवाद
- वस्तुओं का विशाल पैमाने पर उत्पादन
- एक केंद्रीकृत स्थान पर
फोर्डवादोत्तर
- लचीला उत्पादन
- अलग-अलग स्थानों पर
एक “मानो अमेरिकी” कार: इसकी 20,000 डॉलर की शोरूम कीमत में से केवल 7,600 डॉलर अमेरिकियों (डेट्रॉय के कर्मचारी-प्रबंधक, न्यूयॉर्क के वकील-बैंकर, वाशिंगटन के लॉबिस्ट, और देशभर के जनरल मोटर्स शेयरधारक) के पास जाते हैं। शेष में से:
6.2 भूमंडलीकरण और रोज़गार
यहाँ भी असमान प्रभाव है। नगरीय मध्यवर्गीय युवाओं को कंप्यूटर संस्थान, कॉल सेंटर, व्यापार प्रक्रिया बाह्योपयोजन (बी.पी.ओ.) कंपनियाँ और बिक्री भंडारों में नए रोज़गार मिल रहे हैं, बी.एससी./बी.ए./बी.कॉम की सामान्य डिग्री की जगह। पर व्यापक रोज़गार का रुझान निराशाजनक है।
“सबसे अधिक गरीब लोग दक्षिणी एशिया में रहते हैं। गरीबी की दर खासतौर पर भारत, नेपाल और बांग्लादेश में ऊँची है।” रिपोर्ट में बढ़ते हुए “रोज़गार अंतर” का विश्लेषण है: 2003 और 2004 के बीच एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रोज़गार केवल 1.6% (2.5 करोड़ नौकरियाँ) बढ़ा, कुल 1.588 अरब नौकरियों तक, जबकि आर्थिक वृद्धि दर 7% से अधिक थी।
7 भूमंडलीकरण और राजनीतिक परिवर्तन
भूतपूर्व (पुराने) समाजवादी विश्व का विघटन एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन था जिसने भूमंडलीकरण को और तेज़ कर दिया, और इसे एक विशिष्ट नव-उदारवादी आर्थिक-राजनीतिक दृष्टिकोण दिया: मुक्त उद्यम की दूरदर्शिता, जिसमें बाज़ार शक्तियों का निर्बाध शासन कुशल और न्यायसंगत माना जाता है, और जो राज्य के नियमन तथा सब्सिडी दोनों की आलोचना करता है। इसके विपरीत, पुस्तक समावेशात्मक भूमंडलीकरण की भी बात करती है: एक ऐसा भूमंडलीकरण जिसमें समाज के सभी वर्ग शामिल हों।
| राजनीतिक आयाम | पुस्तक के नामित उदाहरण |
|---|---|
| अंतर्राष्ट्रीय-क्षेत्रीय राजनीतिक तंत्र | यूरोपीय संघ (ई.यू.), दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (एशियान), दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग सम्मेलन (सार्क) |
| अंतःसरकारी संगठन: सहभागी सरकारों द्वारा स्थापित निकाय, जिसे किसी पारराष्ट्रीय क्षेत्र पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है | विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.): व्यापार नियमों पर बढ़ती भूमिका |
| अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन: सरकार से स्वतंत्र, अपने नीतिगत निर्णय स्वयं लेता है | ग्रीनपीस (अध्याय 8 देखें), दि रेडक्रॉस, एम्नेस्टी इंटरनेशनल, मेडीसिंस सैन्स फ्रंटियरिस (डाक्टर्स विदाउट बोर्डस) |
8 भूमंडलीकरण और संस्कृति
भारत का सांस्कृतिक प्रभावों के प्रति ऐतिहासिक रूप से खुला दृष्टिकोण रहा है (कूपमंडूक की चेतावनी याद करें)। पिछले दशक में बड़े सांस्कृतिक बदलाव हुए और डर पैदा हुआ कि स्थानीय संस्कृतियाँ पीछे न रह जाएँ; 19वीं सदी के सुधारक और प्रारंभिक राष्ट्रवादी (अध्याय 1-2) भी संस्कृति-परंपरा पर बहस करते थे। आज जो अलग है वह है परिवर्तन की व्यापकता और गहनता।
8.1 सजातीयकरण बनाम भूस्थानीकरण
सजातीयकरण
- दावा: सभी संस्कृतियाँ एक समान हो जाएँगी
- एक ही, विश्वव्यापी संस्कृति
भूस्थानीकरण
- बढ़ती प्रवृत्ति: भूमंडलीय का स्थानीय से मिश्रण
- पूर्णतः स्वतः नहीं, वाणिज्यिक हितों से जुड़ा, विदेशी फर्मों की बाज़ार-रणनीति
विदेशी टेलीविजन चैनल स्टार, एमटीवी, चैनल वी और कार्टून नेटवर्क भारतीय भाषाओं का प्रयोग करते हैं। मैक्डॉनाल्डस भारत में केवल शाकाहारी और चिकन उत्पाद बेचता है, विदेशों में लोकप्रिय गोमांस उत्पाद नहीं, और नवरात्रि पर्व पर पूर्ण शाकाहारी हो जाता है। संगीत में: भाँगड़ा पॉप, इंडि पॉप, फ्यूज़न म्यूज़िक और रीमिक्स की बढ़ती लोकप्रियता।
संस्कृति कोई स्थिर, अपरिवर्तनशील वस्तु नहीं है जो सामाजिक परिवर्तन से या तो ढह जाए या ज्यों-की-त्यों बनी रहे। भूमंडलीकरण से नई स्थानीय परंपराओं के साथ-साथ नई भूमंडलीय परंपराएँ भी बन सकती हैं।
8.2 जेंडर और संस्कृति
परंपरागत सांस्कृतिक पहचान के समर्थक अक्सर महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण और अलोकतांत्रिक प्रथाओं का बचाव “सांस्कृतिक पहचान” के नाम पर करते हैं, सती प्रथा से लेकर महिलाओं को शिक्षा और सार्वजनिक जीवन से दूर रखने तक। भूमंडलीकरण को गलत तरीके से एक हौवा (झूठा डर) बनाकर इन अन्यायपूर्ण प्रथाओं का बचाव किया जा सकता है। भारत एक लोकतांत्रिक परंपरा बनाए रखने और विकसित करने में सफल रहा है, जिससे संस्कृति की एक अधिक समावेशात्मक परिभाषा संभव हुई है।
8.3 उपभोग की संस्कृति
संस्कृति केवल पहनावा, संगीत, नृत्य और खाद्य नहीं है: यह पूरी जीवन-शैली है, और पुस्तक दो रूपों का उल्लेख करती है जो भूमंडलीकरण के किसी भी अध्याय में होने चाहिए: उपभोग की संस्कृति और निगम संस्कृति। 1970 के दशक तक उत्पादन उद्योग नगरों की वृद्धि में मुख्य भूमिका निभाता था; अब सांस्कृतिक उपभोग (कला, खाद्य, फैशन, पर्यटन) यह भूमिका निभाता है, जो शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों, मनोरंजन उद्यानों और “वाटर वर्ल्ड” पार्कों की वृद्धि में दिखता है। विज्ञापन और मीडिया अब खर्च करने को महत्वपूर्ण मानने वाली संस्कृति को बढ़ावा देते हैं, न कि बचत को; खरीददारी को समय बिताने की गतिविधि के रूप में सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया जाता है।
ब्रह्मांड सुंदरी (मिस यूनिवर्स) और विश्वसुंदरी (मिस वर्ल्ड) प्रतियोगिताओं की लगातार सफलता से फैशन, सौंदर्य प्रसाधन और स्वास्थ्य उद्योगों में भारी वृद्धि हुई, नौजवान लड़कियाँ ऐश्वर्या राय या सुष्मिता सेन बनने का सपना देखने लगीं। कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों ने यह महसूस कराया कि कुछ ही खेलों में भाग्य बदल सकता है।
निगम संस्कृति प्रबंधन सिद्धांत की वह शाखा है जो किसी फर्म के सभी सदस्यों को साथ लेकर एक विशिष्ट संगठनात्मक संस्कृति बनाकर उत्पादकता और प्रतियोगितात्मकता बढ़ाना चाहती है: कंपनी के कार्यक्रम, रीतियाँ और परंपराएँ कर्मचारियों में वफ़ादारी और समूह एकता बढ़ाती हैं। यह उत्पादों को बढ़ावा देने और पैक करने के तरीके को भी तय करती है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रसार और सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने भारत के महानगरों में एक उर्ध्वगामी व्यावसायिक वर्ग बनाया है: सॉफ़्टवेयर कंपनियाँ, बहुराष्ट्रीय बैंक, चार्टर लेखाकार फर्में, स्टॉक बाज़ार, यात्रा, फैशन डिज़ाइन, मनोरंजन और मीडिया। इनकी कार्य अनुसूची तनावपूर्ण होती है, वेतन-भत्ते ज़्यादा होते हैं, और ये उपभोक्ता उद्योग के मुख्य ग्राहक हैं।
8.4 स्वदेशी शिल्प, साहित्यिक परंपराओं और ज्ञान व्यवस्थाओं को खतरा
आधुनिक विकास ने भूमंडलीकरण से पहले भी परंपरागत सांस्कृतिक रूपों में घुसपैठ की थी, पर आज परिवर्तन का अनुपात और गहनता कहीं अधिक तीव्र है।
| नामित उदाहरण | क्या हुआ |
|---|---|
| मुंबई के परेल और गिरगाँव के थिएटर समूह | कपड़ा मिलों के इलाके में सक्रिय लगभग 30 थिएटर समूह निष्क्रिय हो गए, क्योंकि अधिकांश मिल मज़दूरों की नौकरी खत्म हो गई |
| सरसिला गाँव (करीमनगर जिला) और डुबक्का गाँव (मेढ़क जिला), आंध्र प्रदेश के बुनकर | बड़ी संख्या में आत्महत्या की खबरें मिलीं: इन बुनकरों के पास विद्युतकर्घों से मुकाबला करने और बदलती उपभोक्ता रुचियों के अनुरूप ढलने के लिए तकनीक में निवेश करने के साधन नहीं थे |
| चिकित्सा और कृषि की परंपरागत ज्ञान व्यवस्थाएँ | पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहीं, अब कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तुलसी, हल्दी, रूद्राक्ष और बासमती चावल के प्रयोग को पेटेंट कराने के प्रयासों से खतरे में हैं |
“हमारे डोमबारी समुदाय की हालत बहुत खराब है। टेलीविजन और रेडियो ने हमारी रोजी-रोटी छीन ली है… लोग हमारा खेल-तमाशा देखते तो हैं पर केवल मनोरंजन के लिए, वे हमें उसके बदले में कोई पैसा नहीं देते… हमारा धंधा चौपट हो रहा है।”
बॉक्स 6.6, डोमबारी समुदाय का एक सदस्य (मोरे, 1970)
9 निष्कर्ष
पुस्तक जानबूझकर भूमंडलीकरण के विविध प्रभावों को संक्षेप में समेटने का काम विद्यार्थी पर छोड़ देती है। यहाँ उद्योग और कृषि पर भूमंडलीकरण के प्रभाव पर विस्तार से चर्चा नहीं की गई, क्योंकि वह अध्याय 4 और 5 में पहले ही बन चुकी है। पूरे अध्याय में काम यही है: समाजशास्त्रीय कल्पनाशक्ति का प्रयोग करते हुए व्यक्तिगत और भूमंडलीय को जोड़ना।
- समाजशास्त्रीय कल्पनाशक्ति सूक्ष्म-स्थूल, स्थानीय-भूमंडलीय को जोड़ती है; स्थान-समय सिकुड़ने से समाज को अलग-थलग रूप में नहीं पढ़ा जा सकता
- रोज़गार-हानि के उदाहरण: बिहार की रेशम कातने वाली औरतें, मछुआरिनें, गुजरात की गोंद बीनने वाली औरतें, रद्दी बीनने वाले, परंपरागत मनोरंजनकर्ता
- भूमंडलीय संबंध नए नहीं: रेशम मार्ग, पाणिनी (अफगान मूल, चौथी शताब्दी ईसापूर्व), यी जिंग (सातवीं शताब्दी), कूपमंडूक दृष्टांत (सेन)
- उपनिवेशवाद का अपना भूमंडलीय आयाम: पूँजी, बाज़ार, गिरमिटिया मज़दूर, दास-व्यापार
- भूमंडलीकरण = बढ़ती अंतःनिर्भरता, सूचना-संचार प्रौद्योगिकी से प्रेरित, राजनीतिक संदर्भ सहित; उदारीकरण (भारत की 1991 नीति) से अलग
- आर्थिक आयाम: उदारीकरण सुधार + आई.एम.एफ./डब्ल्यू.टी.ओ., पारराष्ट्रीय निगम (कोकाकोला, जीएम, कॉलगेट-पामोलिव, कोडैक, मित्सुबिशी), इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था, भाररहित/ज्ञानात्मक अर्थव्यवस्था, वित्त का भूमंडलीकरण (न्यूयॉर्क/टोकियो/लंदन; मुंबई)
- इंटरनेट: 1998 में 7 करोड़ → 2000 में 32.5 करोड़ → अब भारत में 70 करोड़; दूरसंचार: 1947 में 84,000 लाइनें → 1999 तक नौवाँ सबसे बड़ा नेटवर्क
- नाइके: जापान (1960 के दशक) → दक्षिण कोरिया (1970 के मध्य) → थाईलैंड-इंडोनेशिया (1980 के दशक) → भारत (1990 के दशक); फोर्डवाद बनाम फोर्डवादोत्तर
- जनरल मोटर्स की पोंटियाक ली मैन्स: 20,000 डॉलर में से सिर्फ़ 7,600 डॉलर अमेरिका में रहते हैं; आई.एल.ओ. 2005: एशिया-प्रशांत रोज़गार +1.6% बनाम 7%+ आर्थिक वृद्धि
- राजनीतिक आयाम: नव-उदारवाद, समावेशात्मक भूमंडलीकरण, ई.यू./एशियान/सार्क, अंतःसरकारी (डब्ल्यू.टी.ओ.) बनाम गैर-सरकारी (ग्रीनपीस, रेडक्रॉस, एम्नेस्टी, मेडीसिंस सैन्स फ्रंटियरिस) संगठन
- सजातीयकरण बनाम भूस्थानीकरण: स्टार/एमटीवी/चैनल वी/कार्टून नेटवर्क भारतीय भाषाओं में, मैक्डॉनाल्डस केवल शाकाहारी-चिकन
- जेंडर और संस्कृति: भूमंडलीकरण को सती जैसी अन्यायपूर्ण प्रथाओं के बचाव में हौवा बनाया जा सकता है
- उपभोग की संस्कृति: मॉल, मल्टीप्लेक्स, मिस वर्ल्ड/यूनिवर्स, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, कौन बनेगा करोड़पति; निगम संस्कृति प्रबंधन सिद्धांत के रूप में
- परंपरा को खतरा: परेल-गिरगाँव थिएटर समूह, सरसिला-डुबक्का बुनकर आत्महत्याएँ, तुलसी/हल्दी/रूद्राक्ष/बासमती पेटेंट प्रयास, डोमबारी समुदाय का बयान
- क्या मैं एक पंक्ति में बता सकता हूँ कि भूमंडलीकरण और उदारीकरण एक जैसे क्यों नहीं हैं?
- क्या मैं बिना देखे सभी पाँच नामित पारराष्ट्रीय निगम और सभी चार नामित गैर-सरकारी संगठन बता सकता हूँ?
- क्या मैं नाइके के उत्पादन-स्थानांतरण को चारों देशों में सही क्रम में बता सकता हूँ?
- क्या मैं भूस्थानीकरण को पुस्तक के अपने मैक्डॉनाल्डस उदाहरण से समझा सकता हूँ, किसी बनावटी उदाहरण से नहीं?