Class 12 Sociology Chapter 2 भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना Important Questions with Answers

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. जनांकिकी (जनसांख्यिकी) क्या है?

उत्तर: जनसांख्यिकी जनसंख्या का सुव्यवस्थित अध्ययन है, जिसमें जनसंख्या के आकार में बदलाव, जन्म-मृत्यु और प्रवसन के प्रतिमान, तथा जनसंख्या की संरचना शामिल है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. भारत में जनगणना कितने वर्ष में एक बार होती है, और भारत की सबसे हालिया जनगणना कब हुई?

उत्तर: भारत में जनगणना दसवर्षीय है (हर दस साल में); सबसे हालिया जनगणना 2011 में हुई।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. माल्थस ने अपना सिद्धांत किस पुस्तक में और कब प्रस्तुत किया?

उत्तर: माल्थस ने अपना सिद्धांत ‘एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पॉपुलेशन’ नामक पुस्तक में 1798 में प्रस्तुत किया।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. ‘प्रतिस्थापन स्तर’ से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: प्रतिस्थापन स्तर वह स्थिति है जब जन्म दर और मृत्यु दर के बीच का अंतर शून्य या बहुत कम हो जाता है, यानी नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की जगह लेने भर बढ़ती है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. शिशु मृत्यु दर की परिभाषा दीजिए।

उत्तर: शिशु मृत्यु दर एक वर्ष की आयु से पहले मरने वाले शिशुओं की संख्या है, प्रति 1000 जीवित जन्मों पर।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ पद का क्या अर्थ है?

उत्तर: जनसांख्यिकीय लाभांश बदलती आयु संरचना से मिलने वाला वह लाभ है जब कार्यशील आयु वर्ग का अनुपात अनर्जकों की तुलना में बढ़ जाता है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. सोनोग्राम क्या है?

उत्तर: सोनोग्राम अल्ट्रासाउंड प्रौद्योगिकी पर आधारित एक निदान यंत्र है, जो मूलतः भ्रूण के आनुवंशिक विकारों की पहचान के लिए बना था।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. ‘जनसंख्या की गति’ (population momentum) क्या है?

उत्तर: यह वह स्थिति है जिसमें प्रजनन-योग्य आयु की स्त्रियों का बड़ा समूह अगली पीढ़ी में भी जनसंख्या वृद्धि को गति देता रहता है, भले ही हर स्त्री कम बच्चे पैदा करे।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. आकारिक जनसांख्यिकी और सामाजिक जनसांख्यिकी में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: आकारिक जनसांख्यिकी मुख्यतः मात्रात्मक है और जनसंख्या परिवर्तन के घटकों के मापन-विश्लेषण पर केंद्रित है, यह पूछती है ‘कितना, कितनी तेज़ी से’। सामाजिक जनसांख्यिकी जनसंख्या के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक पहलुओं की व्यापक पड़ताल करती है और मानती है कि सामाजिक प्रक्रियाएँ जनांकिकीय प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती हैं, यह पूछती है ‘क्यों’।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. माल्थस के ‘कृत्रिम निरोध’ और ‘प्राकृतिक निरोध’ में अंतर बताइए।

उत्तर: कृत्रिम निरोध स्वैच्छिक हैं जैसे विवाह टालना, यौन संयम, ब्रह्मचर्य, जिन्हें अपनाने की मानवता की सीमित क्षमता है। प्राकृतिक निरोध अकाल और महामारी हैं, जिन्हें माल्थस अनिवार्य और प्रकृति का असंतुलन दूर करने का तरीका मानते थे। बॉक्स 2.1 में उनके अनुसार पहले मनुष्यों के दुर्गुण जनसंख्या घटाने के सक्रिय और सक्षम कारक होते हैं, फिर बीमारियाँ, महामारियाँ और प्लेग, और अंत में अकाल।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. भारत में मृत्यु दर घटने के मुख्य कारण क्या थे?

उत्तर: मुख्य कारण थे अकाल और महामारी रोगों पर बढ़ता नियंत्रण। महामारियाँ चिकित्सा उपचार, टीकाकरण और स्वच्छता में सुधार से नियंत्रित हुईं; अकाल कृषि उत्पादकता में सुधार, विशेषकर सिंचाई विस्तार, और राज्य के राहत-निवारक उपायों से नियंत्रित हुए।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. आयु संरचना की परिभाषा दीजिए और यह क्यों बदलती है।

उत्तर: आयु संरचना कुल जनसंख्या के सापेक्ष विभिन्न आयु वर्गों में लोगों का अनुपात है। यह विकास के स्तर और आयु संभाविता के साथ बदलती है: विकास के साथ जीवन-अवधि बढ़ने पर छोटे आयु वर्गों का हिस्सा घटता है और बड़े आयु वर्गों का हिस्सा बढ़ता है (जनसंख्या का बूढ़ा होना)।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. बढ़ता और घटता पराश्रितता अनुपात किस तरह अलग प्रभाव डालते हैं?

उत्तर: बढ़ता पराश्रितता अनुपात चिंता का विषय है जहाँ जनसंख्या बूढ़ी हो रही है, क्योंकि कार्यशील लोगों का छोटा हिस्सा बड़े हिस्से पराश्रितों का बोझ उठाता है। घटता अनुपात आर्थिक वृद्धि और समृद्धि का स्रोत बन सकता है क्योंकि अनर्जकों की तुलना में अर्जक अधिक होते हैं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. बाल स्त्री-पुरुष अनुपात घटने के कोई दो कारण बताइए।

उत्तर: (1) बालिकाओं की शैशवावस्था में उपेक्षा, जिससे उनकी मृत्यु दर ऊँची होती है। (2) लिंग-विशिष्ट गर्भपात, जो बालिकाओं को जन्म लेने से ही रोक देते हैं। (तीसरा कारण, बालिका शिशुओं की हत्या, भी स्वीकार्य है।)

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन कार्यक्रम का क्या हुआ?

उत्तर: आपातकाल (1975-76) में सरकार ने बलात् सामूहिक नसबंदी कार्यक्रम चलाया, जिसमें ग़रीब-शक्तिहीन लोगों को ज़बरदस्ती नसबंदी करवाई गई। व्यापक जन-विरोध के बाद नई सरकार ने इस बलात् अभियान को त्याग दिया, पर कार्यक्रम स्वयं राष्ट्रीय परिवार कल्याण कार्यक्रम के रूप में जारी रहा।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. जनसांख्यिकीय लाभांश भुनाने में रोज़गार की क्या भूमिका है?

उत्तर: जनसांख्यिकीय लाभांश तभी वास्तविक वृद्धि में बदलता है जब कार्यशील आयु वर्ग की वृद्धि के साथ शिक्षा और रोज़गार के स्तर भी बढ़ें। 15-30 आयु वर्ग के पुरुषों में रोज़गार वृद्धि दर 1987-94 में लगभग 2.4% प्रति वर्ष से घटकर 1994-2004 में ग्रामीण पुरुषों के लिए 0.7% और नगरीय पुरुषों के लिए 0.3% रह गई, जिससे युवा श्रम बल का लाभ नहीं भुनाया जा सका।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत की तीन अवस्थाओं की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: अवस्था 1: अल्पविकसित, तकनीकी रूप से पिछड़ा समाज, जन्म दर और मृत्यु दर दोनों बहुत ऊँची, इसलिए शुद्ध वृद्धि दर कम। अवस्था 2 (संक्रमणकालीन): पिछड़े से उन्नत समाज की ओर गति, बहुत ऊँची वृद्धि दर, यही जनसंख्या विस्फोट है, क्योंकि मृत्यु दर तेज़ी से गिरती है (रोग-नियंत्रण, लोक स्वास्थ्य, बेहतर पोषण से) पर जन्म दर धीरे-धीरे गिरती है (सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार बदलने में समय लगने से)। अवस्था 3: विकसित समाज, दोनों दरें काफ़ी घट चुकी हैं, अंतर फिर से छोटा।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. माल्थस का सिद्धांत ग़लत क्यों सिद्ध हुआ?

उत्तर: पहला, ऐतिहासिक खंडन: यूरोपीय देशों का अनुभव दिखाता है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से जन्म दरें घटीं और महामारियाँ नियंत्रित हुईं, इसलिए तीव्र जनसंख्या वृद्धि के बावजूद खाद्य उत्पादन और जीवन-स्तर दोनों बढ़ते रहे। इसका एक कारण कृषि उत्पादकता में भारी वृद्धि थी (भारत में विशेषकर सिंचाई के विस्तार से)। दूसरा, उदारवादी और मार्क्सवादी आलोचना: ग़रीबी जनसंख्या वृद्धि से नहीं बल्कि आर्थिक संसाधनों के असमान बँटवारे से होती है: एक अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था धनी अल्पसंख्यक को विलासिता में जीने देती है जबकि बहुसंख्यक ग़रीबी में रहता है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. जनसंख्या पिरामिड क्या दिखाता है, और भारत के पिरामिड में समय के साथ क्या बदलाव आया है?

उत्तर: जनसंख्या पिरामिड में पुरुष बाईं ओर, स्त्रियाँ दाईं ओर, नीचे 0-4 वर्ष से ऊपर 80+ वर्ष तक पाँच-पाँच साल के आयु वर्ग होते हैं। भारत के पिरामिड जन्म दर में क्रमिक गिरावट और आयु संभाविता में वृद्धि दिखाते हैं: शीर्ष चौड़ा होता जाता है (लंबी आयु), जन्म दर धीरे गिरने से 1961-1981 के बीच आधार में ज़्यादा बदलाव नहीं आता, और मध्य आयु वर्गों में एक उभार बनता है जो 2026 के पिरामिड में स्पष्ट दिखेगा, यही जनसांख्यिकीय लाभांश है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. भारत में साक्षरता किन तीन आधारों पर भिन्न है?

उत्तर: पहला, लिंग के आधार पर: 2011 में स्त्री साक्षरता पुरुषों से 16.3 प्रतिशत अंक कम है (80.9% बनाम 64.6%), पर तेज़ी से बढ़ रही है क्योंकि यह निचले स्तर से शुरू हुई थी (सारणी 4: 1991-2001 में स्त्री साक्षरता 39.3% से 54.2% और पुरुष 64.1% से 75.9% हुई)। दूसरा, सामाजिक समूहों के आधार पर: अनुसूचित जाति-जनजाति में साक्षरता दर कम है और इनमें स्त्री साक्षरता और भी कम है। तीसरा, क्षेत्रों के आधार पर: केरल पूर्ण साक्षरता के क़रीब है जबकि बिहार बहुत पीछे है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहर की ओर क्यों जाते हैं?

उत्तर: पहला, काम: शहर एक चुंबक की तरह काम करता है, जिन्हें गाँव में काम नहीं मिलता वे शहर जाते हैं। दूसरा, साझी संपत्ति के संसाधनों (तालाब, वन प्रदेश, गोचर भूमि) में कमी: ये अब निजी संपत्ति बन गए हैं या समाप्त हो गए हैं, इसलिए लोगों को बाज़ार से वह ख़रीदना पड़ता है जो पहले मुफ़्त मिलता था, जबकि गाँव में नक़द आय के अवसर सीमित हैं। तीसरा, शहर की गुमनामी: अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए यह रोज़ाना के अपमान से आंशिक सुरक्षा देती है और प्रभावशाली समूहों के ग़रीब वर्गों को निम्न दर्जे का काम करने देती है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. बाल स्त्री-पुरुष अनुपात सुधारने के लिए क्या क़दम उठाए गए, और पुस्तक इनकी सीमा के बारे में क्या कहती है?

उत्तर: 1996 से प्रसवपूर्व नैदानिक प्रविधियाँ (दुरुपयोग का विनियमन और निवारण) अधिनियम लागू है, भारी जुर्माने और कारावास की सज़ा के साथ, जिसे 2003 में और सख्त बनाया गया। हाल ही में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम शुरू हुआ। परंतु पुस्तक स्पष्ट करती है कि दीर्घकाल में इस समस्या का समाधान इस पर निर्भर करता है कि सामाजिक दृष्टिकोण कैसे बदलते हैं, हालाँकि नियम एवं क़ानून भी इसमें मदद कर सकते हैं।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. भारत की जनसंख्या नीति के इतिहास को संक्षेप में बताइए।

उत्तर: 1952 में राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम के रूप में भारत ने संभवतः विश्व की पहली आधिकारिक जनसंख्या नीति घोषित की। आपातकाल (1975-76) में इसे बलात् सामूहिक नसबंदी कार्यक्रम में बदल दिया गया, जिसका व्यापक विरोध हुआ और आपातकाल के बाद इसे त्याग दिया गया। कार्यक्रम को राष्ट्रीय परिवार कल्याण कार्यक्रम नाम दिया गया, जिसमें व्यापक सामाजिक-जनांकिकीय उद्देश्य जोड़े गए। 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति और 2017 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने इन लक्ष्यों को नए सिरे से परिभाषित किया।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. भारत में युवा श्रम बल का लाभ क्यों नहीं भुनाया जा पा रहा है?

उत्तर: भारत सरकार के आँकड़े ग्रामीण-नगरीय दोनों क्षेत्रों में रोज़गार सृजन दर में तीव्र गिरावट दिखाते हैं। 15-30 आयु वर्ग में रोज़गार वृद्धि 1987-94 के बीच लगभग 2.4% प्रति वर्ष थी, जो 1994-2004 के बीच घटकर ग्रामीण पुरुषों के लिए 0.7% और नगरीय पुरुषों के लिए 0.3% रह गई। असली समस्या यह भी है कि पराश्रितता अनुपात को अनर्जक-कार्यशील आयु के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है, न कि वास्तविक अनर्जकों-अर्जकों के अनुपात के रूप में। यह अंतर बेरोजगारी व अपूर्णरोजगारी की स्थिति पर निर्भर है। साथ ही, भारत का हालिया अनुभव बताता है कि बाज़ार शक्तियाँ अपने आप ऐसी रणनीतियों को लागू नहीं करवातीं, इसलिए सचेत नीति चाहिए।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. जनसांख्यिकीय लाभांश क्या है? यह भारत के लिए स्वतः लाभ क्यों नहीं है? इसे भुनाने के लिए क्या ज़रूरी है?

उत्तर: जनसांख्यिकीय लाभांश बदलती आयु संरचना से मिलने वाला वह लाभ है, जब घटता पराश्रितता अनुपात समाज को अनर्जकों की तुलना में अधिक अर्जक देता है। भारत 2011 में एक-तिहाई जनसंख्या 15 वर्ष से कम आयु के साथ, और 2020 में औसत आयु केवल 29 वर्ष (चीन-अमेरिका 37, पश्चिमी यूरोप 45, जापान 48 के मुक़ाबले) के साथ विश्व के सबसे युवा देशों में है। परंतु पुस्तक स्पष्ट कहती है कि यह लाभ अपने आप मिलने वाला नहीं है, यह तभी वास्तविक वृद्धि में बदलता है जब कार्यशील आयु वर्ग की वृद्धि के साथ शिक्षा और रोज़गार के स्तर भी बढ़ें, क्योंकि अशिक्षित नए प्रवेशी कम उत्पादक रहते हैं और बेरोज़गार अर्जक की जगह पराश्रित बन जाते हैं। असली समस्या यह भी है कि पराश्रितता अनुपात अनर्जक-कार्यशील आयु के आधार पर परिभाषित होता है, वास्तविक अनर्जकों-अर्जकों के आधार पर नहीं। यह अंतर बेरोजगारी व अपूर्णरोजगारी की स्थिति पर निर्भर है। भारत का कुल पराश्रितता अनुपात 1970 के 79 से 2005 में 64 हो गया; आयु आधारित पराश्रितता अनुपात 2025 में 48 तक गिर सकता है और फिर 2050 तक लगभग 50 हो सकता है, यानी एक अवसर की खिड़की खुली है, पर 1994-2004 में 15-30 आयु वर्ग के पुरुषों की रोज़गार वृद्धि दर के 0.7% (ग्रामीण) और 0.3% (नगरीय) तक गिर जाने से यह अवसर भुनाया नहीं जा रहा। बाज़ार शक्तियाँ अपने आप ऐसी रणनीतियों को लागू नहीं करवातीं, इसके लिए सचेत नीति चाहिए।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. भारत में घटते स्त्री-पुरुष अनुपात, विशेषकर बाल स्त्री-पुरुष अनुपात, के कारणों और राज्यवार पैटर्न की विवेचना कीजिए।

उत्तर: भारत का स्त्री-पुरुष अनुपात एक सदी से घट रहा है: 1901 के 972 से 1991 में न्यूनतम स्तर 927 तक, फिर 2011 में हल्का सुधार 943 तक। पर बाल स्त्री-पुरुष अनुपात (0-6 वर्ष) कहीं अधिक तेज़ी से गिरा है: 1961 के 976 से 2011 में 919 तक, और 2001 में पहली बार यह समग्र अनुपात से भी नीचे चला गया। कम-से-कम नौ राज्य और संघ राज्य क्षेत्र 900 से नीचे हैं; हरियाणा सबसे ख़राब (793, 800 से नीचे इकलौता राज्य), जबकि अरुणाचल प्रदेश सबसे अच्छा (972)। मातृ-मृत्यु दर इसका कारण होना कठिन दिखाई देता है, क्योंकि वह विकास के साथ घट रही है। इसलिए कारण बालिकाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार में खोजना होगा: शैशवावस्था में उपेक्षा, लिंग-विशिष्ट गर्भपात (सोनोग्राम के दुरुपयोग से) और बालिका शिशुओं की हत्या। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निम्नतम बाल स्त्री-पुरुष अनुपात भारत के सबसे अधिक समृद्ध क्षेत्रों में पाए जाते हैं: पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय बहुत उच्च है पर बाल अनुपात बहुत निम्न है। इसलिए चयनात्मक गर्भपात की समस्या ग़रीबी या अज्ञान अथवा संसाधनों के अभाव के कारण नहीं है; कभी-कभी समृद्ध परिवार कम बच्चे चाहते हैं और अपनी पसंद का लिंग चुनना चाहते हैं। सरकार ने 1996 से पीएनडीटी अधिनियम (2003 में सख्त) और हाल में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम चलाया है, पर पुस्तक के अनुसार दीर्घकालिक समाधान मुख्यतः सामाजिक दृष्टिकोण बदलने पर निर्भर करता है, हालाँकि क़ानून भी मदद कर सकते हैं।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. भारत की जनसंख्या नीति के विकास को आपातकाल के अनुभव सहित विस्तार से समझाइए।

उत्तर: भारत ने 1952 में राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम के रूप में संभवतः विश्व की पहली आधिकारिक जनसंख्या नीति घोषित की, जिसका उद्देश्य था जन्म नियंत्रण के तरीक़ों से वृद्धि धीमी करना, लोक स्वास्थ्य मानक सुधारना और जन-जागरूकता बढ़ाना। आपातकाल (1975-76) में सामान्य संसदीय-विधिक प्रक्रियाएँ स्थगित कर, सरकार ने बलात् सामूहिक नसबंदी (वंध्यकरण, यानी पुरुषों की नसबंदी और स्त्रियों की नलिकाबंदी) कार्यक्रम चलाया। इसमें अधिकांशतः ग़रीब-शक्तिहीन लोगों को ज़बरदस्ती नसबंदी करवाई गई और स्कूल शिक्षकों-दफ़्तर कर्मचारियों पर लोगों को लाने का भारी दबाव डाला गया। इसका व्यापक जन-विरोध हुआ और आपातकाल के बाद चुनी गई नई सरकार ने इस बलात् अभियान को त्याग दिया, पूरा कार्यक्रम नहीं, केवल ज़बरदस्ती। कार्यक्रम राष्ट्रीय परिवार कल्याण कार्यक्रम के नाम से जारी रहा, अब व्यापक सामाजिक-जनांकिकीय उद्देश्यों के साथ। 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति ने नए दिशानिर्देश दिए और 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने इन सभी लक्ष्यों को नए लक्ष्यों (जैसे 2025 तक TFR 2.1, आयु संभाविता 70) के साथ शामिल किया। अध्याय की समापन सीख यही है कि राज्य परिस्थितियाँ बना सकता है, पर अधिकांश जनसांख्यिकीय परिवर्तनशील दरों में (विशेषकर प्रजनन दर में) अंततः आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. 1901 से 2011 तक भारत की जनसंख्या वृद्धि के प्रतिमान का वर्णन कीजिए, और 1921 के महत्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, 2011 में 121 करोड़ के साथ। वृद्धि हमेशा ऊँची नहीं थी: 1901-1951 के बीच औसत वार्षिक दर 1.33% से अधिक नहीं गई, और 1911-1921 में यह ऋणात्मक (-0.03%) रही, मुख्यतः 1918-19 के इन्फ्लुएंज़ा महामारी (स्पैनिश फ़्लू) के कारण, जिसमें भारत में अनुमानतः 125 लाख से 1.7 करोड़ लोग मारे गए। 1921 से 1931 का दशक निर्णायक मोड़ है: इसके बाद जन्म-मृत्यु दर की रेखाएँ अलग होने लगीं: मृत्यु दर तेज़ी से गिरी (अकाल-महामारी नियंत्रण से, यानी चिकित्सा सुधार, टीकाकरण, सिंचाई विस्तार, राज्य के राहत उपाय) पर जन्म दर थोड़ी-सी ही गिरी क्योंकि यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रघटना है। जन्म-मृत्यु दर की रेखाओं का यह अलग होना जनसांख्यिकीय संक्रमण की प्रक्रिया का संकेत है; वृद्धि दर 1961-1981 में चरम 2.2% तक पहुँच गई। स्वतंत्रता के बाद से दर घटी है, पर अब भी विकासशील विश्व में सबसे ऊँची दरों में से एक है। भारत का संक्रमण अभी पूरा नहीं हुआ, मृत्यु दर कम कर दी गई है पर जन्म दर उसी अनुपात में नहीं घटाई जा सकी है। राज्यों में भी बड़ा अंतर है: आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल प्रतिस्थापन स्तर पर या उससे नीचे पहुँच चुके हैं, जबकि बिहार (3.3), उत्तर प्रदेश (3.1), मध्य प्रदेश (2.8) और राजस्थान (2.7) अब भी ऊँची प्रजनन दर रखते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश मिलकर 2041 तक भारत की वृद्धि का लगभग आधा (50%) भाग बढ़ा सकते हैं।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
निम्नलिखित गद्यांश पढ़िए और आगे दिए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

समस्या रोज़गार की है। भारत सरकार के आँकड़े ग्रामीण और नगरीय दोनों क्षेत्रों में नए रोज़गार सृजन की दर में तीव्र गिरावट दिखाते हैं, जो युवाओं के लिए भी सच है। 15-30 आयु वर्ग में रोज़गार वृद्धि दर, जो 1987 से 1994 के बीच ग्रामीण और नगरीय दोनों पुरुषों के लिए लगभग 2.4% प्रति वर्ष थी, 1994 से 2004 के बीच घटकर ग्रामीण पुरुषों के लिए 0.7% और नगरीय पुरुषों के लिए 0.3% रह गई। इससे यह संकेत मिलता है कि युवा श्रम बल का लाभ भुनाया नहीं जा रहा है। भारत के सामने आज जनसांख्यिकीय अवसर की खिड़की मौजूद है और इसे भुनाने की रणनीतियाँ भी हैं। पर भारत का हालिया अनुभव बताता है कि बाज़ार शक्तियाँ अपने आप ऐसी रणनीतियों को लागू नहीं करवातीं।

(क) 1 अंक 1987 से 1994 के बीच 15-30 आयु वर्ग में रोज़गार वृद्धि दर क्या थी?
उत्तर: ग्रामीण और नगरीय दोनों पुरुषों के लिए लगभग 2.4% प्रति वर्ष।

(ख) 2 अंक 1994 से 2004 के बीच इस दर का क्या हुआ, और गद्यांश इससे क्या निष्कर्ष निकालता है?
उत्तर: यह घटकर ग्रामीण पुरुषों के लिए 0.7% और नगरीय पुरुषों के लिए 0.3% रह गई। गद्यांश निष्कर्ष निकालता है कि युवा श्रम बल का लाभ भुनाया नहीं जा रहा है।

(ग) 3 अंक गद्यांश के अनुसार बाज़ार शक्तियाँ अकेले जनसांख्यिकीय लाभ क्यों नहीं दिला सकतीं?
उत्तर: क्योंकि गद्यांश के अनुसार भारत का हालिया अनुभव बताता है कि बाज़ार शक्तियाँ अपने आप ऐसी रणनीतियों को लागू नहीं करवातीं। 15-30 आयु वर्ग के पुरुषों में रोज़गार वृद्धि दर 1987-94 के लगभग 2.4% से घटकर 1994-2004 में ग्रामीण पुरुषों के लिए 0.7% और नगरीय पुरुषों के लिए 0.3% रह गई, जिससे युवा श्रम बल का लाभ भुनाया नहीं जा रहा। इसलिए इन रणनीतियों को सचेत नीति से लागू करना होगा। (अध्याय यह भी कहता है कि लाभांश केवल एक संभावना है, जो वास्तविक वृद्धि में तभी बदलती है जब शिक्षा और रोज़गार के स्तर भी बढ़ें।)

केस स्टडी
निम्नलिखित गद्यांश पढ़िए और आगे दिए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

राज्यवार बाल स्त्री-पुरुष अनुपात के आँकड़े और भी अधिक चिंता का कारण हैं। कम-से-कम नौ राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में बाल स्त्री-पुरुष अनुपात 900 से कम है। हरियाणा सबसे ख़राब स्थिति में है, जहाँ यह अनुपात केवल 793 है, यह 800 से नीचे इकलौता राज्य है। बेहतर समग्र स्त्री-पुरुष अनुपात वाले केरल में भी यह अनुपात 964 के साथ बहुत अच्छा नहीं है, जबकि सबसे अधिक बाल स्त्री-पुरुष अनुपात 972 के साथ अरुणाचल प्रदेश में है। यह भी उल्लेखनीय है कि सबसे कम बाल स्त्री-पुरुष अनुपात भारत के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में पाए जाते हैं, आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय बहुत उच्च है, लेकिन इन्हीं राज्यों में बाल स्त्री-पुरुष अनुपात बहुत निम्न है।

(क) 1 अंक 2011 में हरियाणा का बाल स्त्री-पुरुष अनुपात कितना था?
उत्तर: 793, जो 800 से नीचे इकलौता राज्य था।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार कौन-सा राज्य सबसे अच्छा बाल स्त्री-पुरुष अनुपात रखता है, और केरल की स्थिति क्या है?
उत्तर: अरुणाचल प्रदेश सबसे अच्छा (972) रखता है। केरल का समग्र स्त्री-पुरुष अनुपात सबसे अच्छा होने के बावजूद इसका बाल अनुपात (964) बहुत अच्छा नहीं है।

(ग) 3 अंक गद्यांश जिस ‘विरोधाभास’ की ओर इशारा करता है उसे स्पष्ट कीजिए, और यह क्यों महत्वपूर्ण है।
उत्तर: विरोधाभास यह है कि निम्नतम बाल स्त्री-पुरुष अनुपात भारत के सबसे अधिक समृद्ध क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली) में मिलते हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस तर्क का समर्थन करता प्रतीत होता है कि चयनात्मक गर्भपात की समस्या ग़रीबी या अज्ञान अथवा संसाधनों के अभाव के कारण नहीं है। पुस्तक के अनुसार कभी-कभी समृद्ध परिवार कम (अक्सर एक या दो) बच्चे चाहते हैं और अपनी पसंद के अनुसार लड़का या लड़की पैदा करना चाहते हैं, और इसका दीर्घकालीन समाधान समाज की अभिवृत्तियों पर अत्यधिक निर्भर करता है, हालाँकि नियम एवं क़ानून भी मदद कर सकते हैं।