NCERT कक्षा 12 समाजशास्त्र, भारतीय समाज, अध्याय 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ
के अंत में छपे सभी दस प्रश्नों के पूर्ण हल। प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में दिए गए हैं, और हर
उत्तर उसी तरह लिखा गया है जैसे उसे परीक्षा में लिखा जाना चाहिए। पाठ के भीतर के तीन क्रियाकलाप अंत में हल किए गए हैं।
1 प्रश्न 1
प्र. सांस्कृतिक विविधता का क्या अर्थ है? भारत को एक अत्यंत विविधतापूर्ण देश क्यों माना जाता
है?
उत्तर: “विविधता” असमानताओं के बजाय अंतरों पर बल देती है। सांस्कृतिक विविधता का अर्थ है
कि एक ही समाज में अनेक भिन्न-भिन्न सामाजिक समूह और समुदाय रहते हैं, जो भाषा, धर्म, पंथ, प्रजाति या
जाति जैसे सांस्कृतिक चिह्नों से परिभाषित होते हैं।
भारत को अत्यंत विविधतापूर्ण मानने के ठोस कारण अध्याय स्वयं 2011 की जनगणना से देता है: लगभग 121
करोड़ की जनसंख्या, जो लगभग 1,632 भिन्न-भिन्न भाषाएँ और बोलियाँ बोलती है, जिनमें से 22 संविधान की
आठवीं अनुसूची में आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त हैं। धार्मिक दृष्टि से, लगभग 80% जनसंख्या हिंदू है
(जो स्वयं क्षेत्रीय रूप से भिन्न और जाति-भाषा से बँटी है), 14.2% मुसलमान, 2.3% ईसाई, 1.7% सिख, 0.7%
बौद्ध और 0.4% जैन। भारत की विशाल कुल जनसंख्या के कारण ये छोटे प्रतिशत भी मिलकर बहुत बड़ी संख्याएँ बना
देते हैं।
2 प्रश्न 2
प्र. सामुदायिक पहचान क्या होती है और वह कैसे बनती है?
उत्तर: सामुदायिक पहचान जन्म और “अपनेपन” पर आधारित होती है, न कि किसी अर्जित योग्यता या
“उपलब्धि” पर: यह वह है जो हम “हैं”, न कि जो हम “बन गए हैं”। ऐसी पहचानें प्रदत्त कहलाती हैं
क्योंकि ये जन्म से तय होती हैं और इनमें व्यक्ति का कोई चुनाव शामिल नहीं होता।
यह समाजीकरण से बनती है: माता-पिता, परिवार और नातेदारों जैसे प्रत्यक्ष जुड़े लोगों के साथ
संवाद, वार्तालाप और कभी-कभी संघर्ष की एक निरंतर प्रक्रिया, जिससे हमारा निकटतम समुदाय हमें समाज में रहना
सिखाता है। हमारा समुदाय हमें मातृभाषा और वे सांस्कृतिक मूल्य देता है जिनसे हम संसार को समझते हैं, और
यह हमारी स्वयं की पहचान को भी सहारा देता है। यह अपनापन आकस्मिक होते हुए भी लगभग अनिवार्य है, इसलिए
लोग अक्सर इससे गहराई से, कभी-कभी भावनात्मक रूप से, जुड़े रहते हैं, और सामुदायिक पहचान सर्वव्यापी होती
है: आमतौर पर हर व्यक्ति की एक मातृभूमि, एक मातृभाषा, एक परिवार और किसी-न-किसी प्रकार की निष्ठा
होती है (हो सकता है कि यह बात प्रत्येक व्यक्ति पर पूरी तरह लागू न होती हो, पर आमतौर पर ऐसा होता है)।
3 प्रश्न 3
प्र. राष्ट्र को परिभाषित करना क्यों कठिन है? आधुनिक समाज में राष्ट्र और राज्य कैसे संबंधित
हैं?
उत्तर: राष्ट्र का वर्णन करना आसान है, पर परिभाषित करना कठिन, क्योंकि कोई एक कसौटी (साझा
भाषा, धर्म, नृजातीयता या इतिहास) इसे भरोसेमंद ढंग से अलग नहीं करती। हर संभव कसौटी के अपवाद मिलते
हैं: कई राष्ट्रों की कोई एक साझा भाषा या धर्म नहीं है, जबकि कई भाषाएँ, धर्म या नृजातीयताएँ कई अलग-अलग
राष्ट्रों में साझा हैं, फिर भी वे राष्ट्र एक नहीं बन जाते। संकल्पनात्मक रूप से, राष्ट्र और किसी
नृजातीय समूह, धार्मिक समुदाय या क्षेत्रीय समुदाय के बीच कोई पक्की सीमा-रेखा नहीं है: इनमें से कोई भी
राष्ट्र बन सकता है, पर यह गारंटी नहीं कि बनेगा ही।
राष्ट्र को परिभाषित करने के सबसे नज़दीक जो कसौटी आती है, वह है राज्य: राष्ट्र वे समुदाय हैं
जिनका अपना राज्य होता है, इसीलिए दोनों शब्दों को जोड़कर “राष्ट्र-राज्य” बनाया जाता है। हाल में
राष्ट्र और राज्य के बीच आमतौर पर एक-एक का संबंध रहा है, पर यह हाल का विकास है, कोई ऐतिहासिक या
तार्किक अनिवार्यता नहीं: सोवियत संघ ने एक ही राज्य के भीतर सौ से भी अधिक आंतरिक “राष्ट्रीयताओं” को
मान्यता दी थी, और दोहरी-नागरिकता के कानून एक व्यक्ति को एक साथ दो राज्यों से जुड़ने देते हैं। आज एक
राष्ट्र को सबसे आसानी से उस समुदाय के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसने अपना राज्य पाने में सफलता
पाई हो; इसका उल्टा भी सच होता जा रहा है: मौजूदा राज्य भी किसी “राष्ट्र” का प्रतिनिधित्व करने का दावा
करना ज़रूरी मानने लगे हैं। आधुनिक युग में लोकतंत्र और राष्ट्रवाद राजनीतिक वैधता के प्रमुख स्रोत हैं:
आज एक राज्य के लिए “राष्ट्र” एक सर्वाधिक स्वीकृत अथवा औचित्यपूर्ण आवश्यकता है, जबकि “लोग” राष्ट्र
की वैधता के चरम स्रोत हैं।
4 प्रश्न 4
प्र. राज्य अक्सर सांस्कृतिक विविधता के बारे में शंकालु क्यों होते हैं?
उत्तर: क्योंकि सामुदायिक पहचान के अनेक आधारों में से कोई भी, भाषा, धर्म या नृजातीयता, किसी
दिन एक प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र की नींव बन सकता है, इसलिए पहले से मौजूद राज्य हर तरह की सामुदायिक पहचान
को अपने “राष्ट्र” होने के दावे के लिए एक खतरनाक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। इसलिए राज्य आमतौर
पर एक अकेली, समरूप राष्ट्रीय पहचान को पसंद करते हैं, ताकि उसे नियंत्रित और प्रबंधित किया जा सके, और
ऐतिहासिक रूप से कई राज्यों ने इसके लिए आत्मसात्करण (सभी नागरिकों को एक समान सांस्कृतिक मूल्य
अपनाने के लिए राज़ी, प्रोत्साहित या मजबूर करना, और समूहों की सांस्कृतिक विभिन्नताओं को मिटाने की
कोशिश करना) या एकीकरण (केवल सार्वजनिक संस्कृति को एक राष्ट्रीय
स्वरूप तक सीमित रखना) की नीतियाँ अपनाई हैं।
अध्याय यह भी स्पष्ट करता है कि यह शंका महँगी पड़ती है: सांस्कृतिक विविधता का दमन उन अल्पसंख्यक या
अधीनस्थ समुदायों को अलग-थलग कर देता है जिनकी संस्कृति को “गैर-राष्ट्रीय” मान लिया जाता है, और दमन
का यह कार्य स्वयं उसी सामुदायिक पहचान को और गहरा बना सकता है जिसे मिटाने की कोशिश की जा रही थी।
इसीलिए पुस्तक का अपना निष्कर्ष है कि सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना, या कम-से-कम बने रहने
देना, व्यावहारिक और सैद्धांतिक, दोनों दृष्टि से बेहतर नीति है।
5 प्रश्न 5
प्र. क्षेत्रवाद क्या होता है? आमतौर पर यह किन कारकों पर आधारित होता है?
उत्तर: भारत में क्षेत्रवाद भारत की भाषाओं, संस्कृतियों, जनजातियों और धर्मों
की विविधता में जड़ें रखती है। यह आमतौर पर इन पहचान-चिह्नकों के विशेष क्षेत्रों में भौगोलिक संकेंद्रण
पर आधारित होती है, और क्षेत्रीय वंचन के भाव से बढ़ती है। भारतीय संघवाद, अपने संवैधानिक केंद्र-राज्य
शक्ति-विभाजन के साथ, इन क्षेत्रीय भावनाओं को समायोजित करने वाला एक साधन है।
व्यवहार में, भारत में क्षेत्रवाद ने तीव्र जन-आंदोलनों के बाद ब्रिटिश-काल के प्रांतों को
नृजातीय-भाषाई राज्यों में पुनर्गठित करवाया, जिस पर राज्य पुनर्गठन आयोग की 1 नवंबर 1956 की रिपोर्ट ने
औपचारिक मुहर लगाई। पर सभी भाषाई समुदायों को राज्यत्व नहीं मिला: छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड (सन् 2000
में बने) के निर्माण में भाषा की कोई प्रमुख भूमिका नहीं थी; जनजातीय पहचान, भाषा, क्षेत्रीय वंचन और
पारिस्थितिकी पर आधारित नृजातीयता ने मिलकर इनका आधार बनाया।
6 प्रश्न 6
प्र. आपकी राय में, राज्यों के भाषाई पुनर्गठन ने भारत का हित या अहित किया है?
उत्तर: यह एक राय-आधारित प्रश्न है, पर अध्याय के अपने प्रमाण एक ही दिशा में स्पष्ट संकेत
करते हैं: भाषाई पुनर्गठन ने भारतीय एकता को मज़बूत किया है, कमज़ोर नहीं। 1950 के दशक की शुरुआत
में प्रधानमंत्री नेहरू सहित कई लोगों को डर था कि भाषा-आधारित राज्य भारत के उप-विभाजन को तेज़ कर
देंगे। इसका उल्टा हुआ: अध्याय के अपने शब्दों में “कन्नडिग और भारतीय, बंगाली और भारतीय, तमिल और
भारतीय, गुजराती और भारतीय” होना पूरी तरह संगत साबित हुआ।
अध्याय इस तर्क को तुलना से और मज़बूत करता है: भारत के 1956 के पुनर्गठन के उसी वर्ष, श्रीलंका की
संसद ने तमिल विरोध के बावजूद सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित किया, और श्रीलंका का 1983 से चला
गृहयुद्ध, पुस्तक के अनुसार, कुछ हद तक बहुसंख्यक भाषाई समूह द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों की उपेक्षा का
परिणाम है; और पाकिस्तान 1971 में इसलिए विभाजित हुआ क्योंकि पश्चिमी भाग के पंजाबी-उर्दू भाषी पूर्वी
भाग के बंगालियों की भावनाओं का आदर नहीं करना चाहते थे। रामचंद्र गुहा को उद्धृत करते हुए अध्याय का
निष्कर्ष है कि यदि भारत ने अपने भाषाई समुदायों की उपेक्षा की होती, तो शायद उसे “एक भाषा, चौदह या
पंद्रह राष्ट्र” जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता: इसलिए पुस्तक के अपने प्रमाण के अनुसार, भाषायी राज्य
एकता का स्रोत बने, विभाजन का नहीं, हालाँकि भाषा-आधारित राज्यों में आपस में कभी-कभी विवाद भी होते
हैं।
7 प्रश्न 7
प्र. ‘अल्पसंख्यक’ (वर्ग) क्या होता है? अल्पसंख्यक वर्गों को राज्य से संरक्षण की क्यों
ज़रूरत होती है?
उत्तर: समाजशास्त्र में “अल्पसंख्यक” केवल संख्यात्मक भेद से कहीं अधिक है: इसमें आमतौर पर
सापेक्ष हानि का भाव शामिल है, और यह भी माँगता है कि अल्पसंख्यक के सदस्य एक सामूहिकता बनाएँ:
समूह के प्रति एकजुटता और अपनेपन की प्रबल भावना। बाएँ हाथ से काम करने वालों जैसा कोई संख्यात्मक
अल्पसंख्यक, जिसमें ऐसी एकजुटता न हो, समाजशास्त्रीय अल्पसंख्यक नहीं है। किसी समूह का एक अर्थ में
वंचित और दूसरे में न होना भी संभव है: पारसी या सिख, उदाहरण के लिए, आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न
हो सकते हैं, फिर भी हिंदुओं की विशाल बहुसंख्या के सामने अपनी छोटी संख्या के कारण सांस्कृतिक रूप से
वंचित हो सकते हैं।
अल्पसंख्यकों को राज्य से संरक्षण की ज़रूरत बहुसंख्यक की जनसांख्यिकीय प्रधानता के कारण होती है:
राजनीतिक व्यवस्था का सामान्य कामकाज उन्हें बहुसंख्यक समुदाय की तुलना में हानि पहुँचा सकता है, इसलिए
उन्हें विशेष ध्यान की ज़रूरत होती है। इसीलिए संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान
सभा में इस बिंदु को सीधे संबोधित किया। अनुच्छेद 29 नागरिकों के किसी भी ऐसे अनुभाग को, जिसकी अपनी
विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 30 धर्म या भाषा पर
आधारित सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को अपनी शिक्षा संस्थाएँ स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार देता है।
8 प्रश्न 8
प्र. सांप्रदायवाद या सांप्रदायिकता क्या है?
उत्तर: रोज़मर्रा के दक्षिण एशियाई प्रयोग में सांप्रदायिकता का अर्थ है धार्मिक पहचान पर
आधारित आक्रामक उग्रवाद। उग्रवाद ऐसी अभिवृत्ति है जो अपने समूह को ही वैध या श्रेष्ठ समूह मानती है और
अन्य समूहों को निम्न, अवैध अथवा विरोधी समझती है; सरल शब्दों में, सांप्रदायिकता धर्म से जुड़ी एक
आक्रामक राजनीतिक विचारधारा है। यह एक अनूठा भारतीय, अथवा शायद दक्षिण एशियाई, अर्थ है, जो साधारण अंग्रेज़ी शब्द “communal” से अलग है, जिसका अर्थ केवल व्यक्ति के बजाय समुदाय या
सामूहिकता से जुड़ा होना है।
अध्याय ज़ोर देता है कि सांप्रदायिकता राजनीति से जुड़ी है, धर्म से नहीं: व्यक्तिगत आस्था
और सांप्रदायिकता में कोई ज़रूरी संबंध नहीं है: एक सांप्रदायिक व्यक्ति श्रद्धालु हो भी सकता है और
नहीं भी, और एक श्रद्धालु व्यक्ति सांप्रदायिक हो भी सकता है और नहीं भी। निर्णायक बात है व्यक्ति का
अन्य पहचानों वाले लोगों के प्रति रवैया। सांप्रदायिक लोग एक आक्रामक राजनीतिक पहचान बनाते हैं और अपनी
पहचान न साझा करने वाले किसी भी व्यक्ति की निंदा या उस पर आक्रमण करने को तैयार रहते हैं, धार्मिक
पहचान को जाति, पेशे, धन या राजनीतिक विश्वास से ऊपर मानकर बड़े-विविध समूहों को “सभी हिंदू”, “सभी
मुसलमान” जैसा एक-समान बना देते हैं।
9 प्रश्न 9
प्र. भारत में वह विभिन्न भाव (अर्थ) कौन से हैं जिनमें धर्मनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षतावाद
को समझा जाता है?
उत्तर: पश्चिमी अर्थ में, धर्मनिरपेक्षता का मतलब है चर्च और राज्य का पृथक्करण, जो
“धर्मनिरपेक्षीकरण” से जुड़ा है: धर्म का सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे पीछे हटना, अनिवार्य दायित्व से
स्वैच्छिक व्यक्तिगत व्यवहार बनना।
भारतीय अर्थों में यह पश्चिमी भाव भी शामिल है, पर एक और अर्थ जुड़ता है: रोज़मर्रा की भाषा में
“धर्मनिरपेक्ष” का सबसे आम प्रयोग “सांप्रदायिक” के विलोम के रूप में होता है। इस अर्थ में
धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति या राज्य किसी एक धर्म का दूसरों से ऊपर पक्ष नहीं लेता; यह धार्मिक उग्रवाद का
विरोधी है, पर इसका अर्थ धर्म के प्रति द्वेष नहीं। राज्य-धर्म संबंधों में यह भारतीय अर्थ सभी
धर्मों के प्रति समान सम्मान दर्शाता है, अलगाव या दूरी नहीं: उदाहरण के लिए, धर्मनिरपेक्ष भारतीय
राज्य सभी धर्मों के त्यौहारों पर सार्वजनिक छुट्टी घोषित करता है। अध्याय इस भारतीय अर्थ में एक असली
तनाव भी बताता है: धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक-संरक्षण, दोनों के प्रति राज्य की एक साथ प्रतिबद्धता
आलोचकों से “तुष्टीकरण” का आरोप बुलाती है, जबकि समर्थक कहते हैं कि ऐसे संरक्षण के बिना धर्मनिरपेक्षता
बहुसंख्यक के मूल्य अल्पसंख्यकों पर थोपने का बहाना बन सकती है।
10 प्रश्न 10
प्र. आज नागरिक समाज संगठनों की क्या प्रासंगिकता है?
उत्तर: नागरिक समाज वह व्यापक क्षेत्र है जो परिवार के निजी क्षेत्र से परे है, पर राज्य और
बाज़ार दोनों से बाहर है: यह सक्रिय नागरिकता का क्षेत्र है, जहाँ व्यक्ति स्वेच्छा से संस्थाएँ-संगठन
बनाते हैं, सामाजिक मुद्दे उठाते हैं, और राज्य को प्रभावित करने या उससे माँग करने की कोशिश करते हैं।
इसमें राजनीतिक दल, मीडिया संस्थाएँ, मज़दूर संघ, गैर-सरकारी संगठन (NGO) और धार्मिक संगठन आते हैं,
बशर्ते वे राज्य-नियंत्रित न हों और विशुद्ध वाणिज्यिक न हों।
नागरिक समाज आज इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि राज्य उस जनता से कट सकते हैं जिसका वे प्रतिनिधित्व करने
का दावा करते हैं, सत्तावादी बन सकते हैं, या भ्रष्टाचार, अकुशलता या संसाधनों की कमी के कारण अपने
नागरिकों के प्रति असफल हो सकते हैं। गैर-राजकीय कर्ता राज्य पर नज़र रखते हैं, उसके अन्यायों का विरोध
करते हैं, या उसके प्रयासों में सहयोग करते हैं। अध्याय की अपनी सूची व्यापक है: भूमि अधिकारों के लिए
जनजातीय संघर्ष, नगरीय शासन, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ अभियान, बाँध-विस्थापितों का पुनर्वास,
मछुआरों के संघर्ष, आवासीय अधिकार, प्राथमिक शिक्षा सुधार और दलितों को भूमि वितरण। इसका सबसे स्पष्ट
उदाहरण सूचनाधिकार का अभियान है, जो ग्रामीण राजस्थान में गाँव-विकास निधि की जानकारी के लिए आंदोलन के
रूप में शुरू हुआ और राष्ट्रव्यापी आंदोलन बनकर सूचनाधिकार अधिनियम, 2005 का रूप ले चुका, जो दिखाता है
कि नागरिक समाज राज्य को राष्ट्र और जनता के प्रति कैसे जवाबदेह बना सकता है।
11 पाठ के भीतर के क्रियाकलाप
अध्याय के पाठ के भीतर तीन क्रियाकलाप भी छपे हैं। इन्हें यहाँ उसी क्रम में हल किया गया है जिसमें किताब इन्हें छापती है। ये खोज और चर्चा वाले क्रियाकलाप हैं, इसलिए उत्तर में बताया गया है कि क्या करना है और अध्याय की कौन-सी बातें इस्तेमाल करनी हैं।
प्र. अपने राज्य के उद्भव के बारे में पता लगाएँ। यह कब बनाया गया था? इसे परिभाषित करने की मुख्य कसौटियाँ क्या थीं? क्या वह भाषा, नृजातीय/जनजातीय पहचान, क्षेत्रीय वंचन, पारिस्थितिक अंतर अथवा कोई अन्य कसौटी थी? भारतीय राष्ट्र-राज्य के अंतर्गत पाए जाने वाले अन्य राज्यों से इसकी तुलना कैसे की जा सकती है? भारत के सभी राज्यों का, उनके निर्माण की कसौटी के आधार पर वर्गीकरण करने का प्रयास करें। क्या आप वर्तमान में चल रहे किन्हीं सामाजिक आंदोलनों से परिचित हैं जो एक राज्य के निर्माण की माँग कर रहे हैं? इन आंदोलनों द्वारा प्रयोग की जा रही कसौटियों का पता लगाने की कोशिश करें। [संकेत: विदर्भ आंदोलन और आपके अपने क्षेत्र में चल रहे आंदोलन…]
उत्तर: अपने राज्य के बनने का वर्ष और उसका कारण पता कीजिए, फिर उसे अध्याय के ढाँचे में रखिए:
- भाषा। संविधान अपनाए जाने के कुछ ही समय बाद, ज़ोरदार जन-आंदोलनों के कारण अंग्रेज़ी दौर के बड़े प्रांतों को नृजातीय-भाषायी राज्यों में पुनर्गठित करना पड़ा। तेलुगु भाषी आंदोलन में पोट्टि श्रीरामुलु के आमरण अनशन और मृत्यु के बाद आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना हुई, और राज्य पुनर्गठन आयोग, जिसकी रिपोर्ट 1 नवंबर 1956 को कार्यान्वित हुई, ने भाषा आधारित सिद्धांत पर अंतिम मोहर लगाई। पुस्तक के अनुसार, क्षेत्रीय और जनजातीय पहचान के साथ जुड़ी भाषा ने भारत में नृजातीय-राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए एक अत्यंत सशक्त साधन का काम किया है।
- जनजातीय पहचान, क्षेत्रीय वंचन और पारिस्थितिकी। 2000 में बने छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड अध्याय के ऐसे उदाहरण हैं जिनके निर्माण में भाषा की प्रमुख भूमिका नहीं थी; जनजातीय पहचान, भाषा, क्षेत्रीय वंचन और पारिस्थितिकी पर आधारित नृजातीयता ने मिलकर इनका आधार बनाया।
- वर्गीकरण। सभी राज्यों की एक तालिका बनाइए जिसमें उनके बनने का वर्ष और मुख्य कसौटी (भाषा, जनजातीय पहचान, क्षेत्रीय वंचन, पारिस्थितिकी या इनका मेल) हो; विवरण के लिए पाठ्यपुस्तक, एटलस या पुस्तकालय की मदद लीजिए।
- वर्तमान माँगें। नए राज्य की माँग करने वाले किसी आंदोलन के लिए, जैसे किताब के संकेत में बताया गया विदर्भ आंदोलन, पता लगाइए कि वह इनमें से कौन-सी कसौटी का प्रयोग करता है, जैसे क्षेत्रीय वंचन का भाव।
प्र. अपने माता-पिता और परिवार के बुज़ुर्गों से बात करें और उनसे ऐसी कविताओं, गीतों, लघुकथाओं का संग्रह करें जिनमें धार्मिक बहुलवाद, समन्वयवाद अथवा सांप्रदायिक सौहार्द जैसे मुद्दों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है। जब आप ऐसी संपूर्ण सामग्री इकट्ठी करके कक्षा के समक्ष प्रस्तुत करेंगे तो आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि धार्मिक बहुलवाद की हमारी परंपराओं का आधार कितना व्यापक है और विभिन्न भाषाई समूहों, क्षेत्रों और धर्मों के अनुयायी कितने व्यापक रूप से उन परंपराओं को आपस में बाँटते हैं।
उत्तर: अपने परिवार से कुछ रचनाएँ इकट्ठी कीजिए, हर एक की भाषा और क्षेत्र लिखिए, और एक पंक्ति में बताइए कि वह बहुलवाद (अलग-अलग धर्मों का साथ रहना), समन्वयवाद (परंपराओं का आपस में घुलना-मिलना) या सांप्रदायिक सौहार्द को कैसे दिखाती है। अध्याय का अपना उदाहरण कबीर (बॉक्स 6.8) हैं, जिनकी कविताएँ हिंदू और मुस्लिम भक्ति को मिलाती हैं: “मोको कहाँ ढूंढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में … ना मंदिर में, न मस्जिद में, ना काबे कैलास में”। अध्याय कहता है कि यह समन्वयी विरासत भक्ति और सूफ़ी आंदोलनों के भक्ति गीतों और काव्यों में स्पष्ट दिखाई देती है, और भारत में धार्मिक बहुलवाद की एक लंबी परंपरा रही है, जिसमें शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से लेकर वास्तविक अंतर्मिश्रण शामिल है। जब पूरी कक्षा अपनी सामग्री एक साथ रखेगी तो हो सकता है कि आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य हो कि सौहार्द का यही संदेश कई भाषाओं, क्षेत्रों और धर्मों में मिलता है, और यही इस क्रियाकलाप का उद्देश्य है।
प्र. उन नागरिक समाज संगठनों अथवा गैर-सरकारी संगठनों का पता लगाएँ जो आपके आस-पड़ोस में सक्रिय हैं। वे किस प्रकार के मुद्दों को उठाते हैं? उनमें किस प्रकार के लोग काम करते हैं? यह संगठन (क) सरकारी संगठनों; (ख) वाणिज्यिक संगठनों से कैसे और कितने भिन्न हैं?
उत्तर: अपने आस-पास के दो-तीन संगठनों की सूची बनाइए, वे किन मुद्दों पर काम करते हैं, और उनमें किस तरह के लोग काम करते हैं (स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, पेशेवर)। अध्याय की परिभाषा से उनकी तुलना कीजिए: नागरिक समाज सार्वजनिक क्षेत्र का गैर-राजकीय और गैर-बाज़ारी भाग है, जिसमें लोग स्वेच्छा से जुड़कर संस्थाएँ और संगठन बनाते हैं। (क) सरकारी संगठन के विपरीत, नागरिक समाज संगठन राज्य-नियंत्रित नहीं होता; वह राज्य पर नज़र रख सकता है, उसके अन्यायपूर्ण कार्यों का विरोध कर सकता है या उसके प्रयत्नों में सहयोग कर सकता है। (ख) वाणिज्यिक संगठन के विपरीत, वह विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक मुनाफ़ा कमाने वाला संगठन नहीं होता; वह किसी उद्देश्य या सामूहिक हित के लिए काम करता है। अध्याय में ऐसे संगठनों के उठाए मुद्दों के उदाहरण हैं: भूमि अधिकारों के लिए जनजातीय संघर्ष, स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ़ अभियान, बाँधों से विस्थापित लोगों का पुनर्वास, आवास के अधिकार, प्राथमिक शिक्षा में सुधार और सूचना के अधिकार का अभियान।