CBSE के 2026-27 समाजशास्त्र पाठ्यक्रम में सैद्धांतिक पेपर 80 अंक का और
परियोजना कार्य 20 अंक का है। यह अध्याय, इकाई 6 (सांस्कृतिक विविधता की
चुनौतियाँ), भाग A भारतीय समाज (40 अंक) में 10 अंक का है। अन्य बोर्ड अपना
पाठ्यक्रम और अंक स्वयं तय करते हैं, इसलिए अपने बोर्ड की मौजूदा योजना देखें।
| बोर्ड | यह अध्याय | पेपर का ढाँचा |
|---|---|---|
| CBSE | 10 अंक | 80 सिद्धांत + 20 परियोजना |
CBSE के प्रश्न-पत्र डिज़ाइन में 80 सैद्धांतिक अंक योग्यता के अनुसार
बँटे हैं: ज्ञान और समझ 30 अंक, ज्ञान और संकल्पनाओं का अनुप्रयोग 32 अंक, और
रचना, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजन 18 अंक।
यह अध्याय धर्म, क्षेत्रवाद और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा है: यहाँ ठीक वही
महत्वपूर्ण है जो पाठ्यपुस्तक कहती है, कोई और राय नहीं। ये नोट्स पुस्तक की अपनी
परिभाषाओं और उदाहरणों तक सीमित हैं। जहाँ पुस्तक किसी को उद्धृत करती है (मैक्स
वेबर, टैगोर, अंबेडकर, कबीर), वहाँ उसे उद्धरण के रूप में दिखाया गया है, इस
अध्याय की अपनी राय के रूप में नहीं।
- “विविधता” और “असमानता” अलग-अलग विचार क्यों हैं, और विविधता संघर्ष में कैसे बदल सकती है
- सामुदायिक पहचान क्या है, यह “प्रदत्त” क्यों है, और लोग इसके प्रति इतने भावुक क्यों होते हैं
- राष्ट्र, राज्य और राष्ट्र-राज्य क्या हैं, और राष्ट्र को परिभाषित करना कठिन क्यों है
- राज्यों ने आत्मसात्करण या एकीकरण से विविधता को कैसे संभालने की कोशिश की, और दोनों असफल क्यों हो सकते हैं
- क्षेत्रवाद और भाषा ने 1956 के भाषाई पुनर्गठन से भारत के अपने राज्यों को कैसे आकार दिया
- समाजशास्त्र में “अल्पसंख्यक” का क्या अर्थ है, और भारत का संविधान अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा क्यों करता है
- सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता में असली फ़र्क, और धर्मनिरपेक्षता व अल्पसंख्यक संरक्षण के बीच का सच्चा तनाव
- नागरिक समाज क्या है, और यह राज्य को जनता के प्रति जवाबदेह कैसे रखता है
1 सांस्कृतिक विविधता चुनौती क्यों बन जाती है
परिवार से लेकर बाज़ार तक की विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ लोगों को साथ ला सकती हैं
और प्रबल सामूहिक पहचान बना सकती हैं। पर यही संस्थाएँ असमानता और बहिष्कार का
स्रोत भी बन सकती हैं। इस अध्याय में सांस्कृतिक विविधता से जुड़े तनावों की
बात होती है।
“विविधता” शब्द असमानताओं के बजाय अंतरों पर बल देता है। भारत में
महान सांस्कृतिक विविधता होने का अर्थ है कि यहाँ भाषा, धर्म, पंथ, प्रजाति या जाति
जैसे सांस्कृतिक चिह्नों से परिभाषित अनेक सामाजिक समूह और समुदाय रहते हैं।
कठिनाइयाँ तब उत्पन्न होती हैं जब ये विविध समुदाय किसी बड़े ढाँचे, जैसे राष्ट्र,
का भाग बनते हैं: तब उनके बीच प्रतिस्पर्धा या संघर्ष हो सकता है। सांस्कृतिक
पहचानें बहुत प्रबल होती हैं, वे तीव्र भावावेश भड़का सकती हैं और बड़ी संख्या में
लोगों को एकजुट कर सकती हैं। जब सांस्कृतिक अंतरों के साथ आर्थिक-सामाजिक
असमानताएँ भी जुड़ जाती हैं, स्थिति और जटिल हो जाती है, और नदी जल, रोज़गार या
सरकारी धनराशि जैसे दुर्लभ संसाधनों के बँटवारे का सवाल आने पर स्थिति और बिगड़
जाती है।
2 सामुदायिक पहचान का महत्त्व
हर मनुष्य को इस संसार में टिके रहने के लिए एक स्थायी पहचान चाहिए: मैं कौन हूँ,
मैं दूसरों से अलग कैसे हूँ, मेरे लक्ष्य क्या हों? इनमें से अनेक प्रश्नों का
उत्तर समाजीकरण से मिलता है: हमारा परिवार और समुदाय हमें समाज में रहना
सिखाता है। हमारा समुदाय हमें मातृभाषा और वे सांस्कृतिक मूल्य देता है जिनसे हम
संसार को समझते हैं; यह हमारी स्वयं की पहचान को भी सहारा देता है।
सामुदायिक पहचान जन्म और अपनेपन पर आधारित होती है, न कि किसी अर्जित
योग्यता पर। यह वह है जो हम “हैं”, न कि जो हम “बन गए हैं”। ऐसी पहचानें
प्रदत्त कहलाती हैं: ये जन्म से तय होती हैं, इनमें कोई चुनाव शामिल नहीं
होता।
किसी पेशे या खेल टीम के विपरीत, जहाँ सदस्यता के लिए परीक्षा पास करनी होती है
या कौशल दिखाना होता है, परिवार, धर्म या क्षेत्रीय समुदाय की सदस्यता के लिए कोई
शर्त नहीं होती, फिर भी यह सदस्यता पूर्ण होती है। अधिकांश प्रदत्त पहचानें इतनी
पक्की होती हैं कि व्यक्ति चाहे भी तो इन्हें आसानी से नहीं छोड़ सकता, क्योंकि
दूसरे लोग उन्हीं चिह्नों से उसकी पहचान करते रहते हैं।
2.1 प्रदत्त पहचान की दो विशेषताएँ
भावनात्मक रूप से प्रबल
हमारा यह अपनापन जन्म से, यानी आकस्मिक रूप से मिलता है, फिर भी इससे बच पाना लगभग नामुमकिन है, इसलिए परिवार, नातेदारी (खून या विवाह से बने रिश्ते), जाति, नृजातीयता (सामान्य भाषा या संस्कृति के अलावा एक ही वंशपरंपरा पर आधारित पहचान), भाषा, क्षेत्र और धर्म के बढ़ते-फैलते दायरे हमें एक मज़बूत पहचान देते हैं। इसीलिए सामुदायिक पहचान पर खतरा दिखते ही लोग भावुक या हिंसक भी हो सकते हैं।
सर्वव्यापी
हर व्यक्ति की एक मातृभूमि, एक मातृभाषा, एक परिवार और एक निष्ठा होती है। यह हर व्यक्ति पर पूरी तरह लागू न भी हो, पर सामान्य रूप से सच है, और हम सब अपनी-अपनी पहचानों के प्रति लगभग समान रूप से वफादार होते हैं।
प्रदत्त पहचानें सर्वव्यापी और गहरी होती हैं, इसलिए संघर्ष में हर पक्ष दूसरे को
शत्रु मानता है और अपने गुणों तथा दूसरे के दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है। पुस्तक
का अपना उदाहरण: जब दो राष्ट्रों के बीच युद्ध होता है, तो दोनों तरफ के देशभक्त
एक-दूसरे को आक्रमणकारी मानते हैं, और हर पक्ष सोचता है कि सच्चाई और ईश्वर दोनों उसी के
साथ हैं। गरमागरमी के क्षण में दोनों ही पक्षों के लोगों के लिए यह देखना बहुत कठिन
होता है कि जैसा हम दूसरों के बारे में सोचते हैं, दूसरे भी तो हमारे बारे में वैसा
ही सोच रहे हैं।
3 समुदाय, राष्ट्र एवं राष्ट्र-राज्य
सरल शब्दों में, राष्ट्र एक बड़े स्तर का समुदाय है: “समुदायों से मिलकर बना
एक समुदाय”। राष्ट्र के सदस्य एक ही राजनीतिक सामूहिकता का हिस्सा बनना चाहते हैं,
जो सामान्यतः एक राज्य बनाने की आकांक्षा के रूप में सामने आती है।
राज्य, अपने सबसे सामान्य अर्थ में, एक अमूर्त सत्व है: राजनीतिक-विधिक
संस्थाओं का ऐसा समुच्चय जो किसी भौगोलिक क्षेत्र और उसमें रहने वाले लोगों पर
नियंत्रण रखने का दावा करता है।
राज्य “एक ऐसा निकाय होता है जो एक विशेष क्षेत्र में विधिसम्मत एकाधिकार का
सफलतापूर्ण दावा करता है।”
मैक्स वेबर की सुप्रसिद्ध परिभाषा (वेबर 1970ः78)
सीधे शब्दों में (यह हमारी अपनी व्याख्या है, पुस्तक के शब्द नहीं) वेबर का
मतलब है: किसी क्षेत्र में सेना, पुलिस और अदालत जैसी वैध ताकत का इस्तेमाल करने का अधिकार
केवल राज्य के पास होता है, कोई निजी समूह (जैसे कोई गिरोह) इसका दावा नहीं कर सकता।
राष्ट्र का वर्णन करना आसान है, पर परिभाषित करना कठिन। कई राष्ट्र एक साझा धर्म,
भाषा, नृजातीयता या क्षेत्रीय संस्कृति साझा करते हैं, पर हर संभव कसौटी के अपवाद
मिलते हैं: कई राष्ट्रों की कोई एक साझा भाषा या धर्म नहीं है, और कई भाषाएँ या धर्म
कई राष्ट्रों में फैले हैं, फिर भी वे एक राष्ट्र नहीं बनते।

एक समुदाय” है जो राजनीतिक एकता चाहता है; राज्य किसी क्षेत्र पर नियंत्रण रखने
वाली संस्थाओं का समूह है। जो राष्ट्र अपना राज्य पाने में सफल हो जाता है, वह
“राष्ट्र-राज्य” कहलाता है।
3.1 जब एक राष्ट्र एक राज्य के बराबर नहीं होता
सोवियत संघ
अपने अस्तित्व-काल में सोवियत संघ ने स्पष्ट रूप से माना था कि उसके शासन में रहने वाले लोग अलग-अलग “राष्ट्रों” के थे: एक राज्य के भीतर सौ से भी अधिक आंतरिक राष्ट्रीयताओं को मान्यता दी गई थी।
प्रवासी जमैकावासी
जमैका से बाहर रहने वाले जमैकाइयों की संख्या जमैका के भीतर रहने वालों से अधिक है: यानी “अनिवासी” जमैकाई “निवासी” जमैकाइयों से ज़्यादा हैं, जो दिखाता है कि किसी राष्ट्र के सभी लोग एक ही राज्य के क्षेत्र में रहना ज़रूरी नहीं।
दोहरी नागरिकता
कुछ राज्य अपने नागरिकों को साथ-ही-साथ किसी दूसरे राज्य का नागरिक बनने की इजाज़त देते हैं। जैसे, यहूदी अमेरिकी इज़राइल और अमेरिका दोनों के नागरिक हो सकते हैं, और एक देश की सेना में दूसरे की नागरिकता खोए बिना सेवा कर सकते हैं।
आज एक राष्ट्र को परिभाषित करने का सबसे आसान तरीका यही है कि वह ऐसा समुदाय है
जिसने अपना राज्य पाने में सफलता पाई हो। इसका उल्टा भी उतना ही सच होता जा रहा है:
आकांक्षी राष्ट्रीयताएँ राज्य बनाने की कोशिश करती हैं, और मौजूदा राज्य यह दावा
करना ज़्यादा ज़रूरी मानते हैं कि वे किसी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आधुनिक युग की एक खास बात लोकतंत्र और राष्ट्रवाद का राजनीतिक वैधता के मुख्य
स्रोत बनना है: आज “राष्ट्र” राज्य के लिए सबसे स्वीकृत आधार है, जबकि “लोग”
राष्ट्र की वैधता के चरम स्रोत हैं। दूसरे शब्दों में, राज्यों को राष्ट्र की
उतनी ही, बल्कि उससे अधिक, ज़रूरत होती है जितनी राष्ट्रों को राज्यों की।
चूँकि राष्ट्र-राज्य और उसके आधार बने समुदाय के बीच कोई निश्चित या तार्किक
संबंध नहीं होता, इसलिए इस सवाल का कोई पूर्व-निर्धारित उत्तर नहीं है कि
राष्ट्र-राज्य का “राज्य” वाला हिस्सा “राष्ट्र” बनाने वाले विभिन्न समुदायों के
साथ कैसा व्यवहार करे।
3.2 राज्यों ने इस सवाल का जवाब कैसे खोजा
इतिहास में राज्यों ने अपने नागरिकों की निष्ठा और आज्ञाकारिता पाने के लिए
राष्ट्र-निर्माण की रणनीतियाँ अपनाई हैं: आत्मसात्करण या
एकीकरण की नीतियाँ, क्योंकि अधिकांश राज्यों को डर था कि विविधता को
मान्यता देने से सामाजिक विखंडन होगा। दोनों नीतियाँ एक अकेली राष्ट्रीय पहचान
मान लेती हैं।
आत्मसात्करण
- सभी नागरिकों को एक समान सांस्कृतिक मूल्य और मानक अपनाने के लिए राज़ी, प्रोत्साहित या मजबूर किया जाता है
- ये मूल्य आमतौर पर संपूर्ण रूप से या अधिकांशतः प्रभावशाली सामाजिक समूह के होते हैं
- इसमें अक्सर नृजातीय, धार्मिक या भाषाई समूहों की पहचानों को एकदम दबाकर समूहों के बीच की सांस्कृतिक विभिन्नताओं को मिटाने की कोशिश होती है (बॉक्स 6.1)
एकीकरण
- केवल सार्वजनिक संस्कृति को एक राष्ट्रीय स्वरूप तक सीमित रखा जाता है
- अन्य संस्कृतियों को निजी क्षेत्र में बने रहने दिया जाता है
पुस्तक बताती है (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की मानव विकास रिपोर्ट 2004,
अध्याय 3, फीचर 3.1 के आधार पर) कि ऐसी रणनीतियाँ किन तरीकों से एकल राष्ट्रीय पहचान थोपती हैं:
शक्ति का केंद्रीकरण
शक्ति उन मंचों पर केंद्रित की जाती है जहाँ प्रभावशाली समूह बहुसंख्यक हो, और स्थानीय/अल्पसंख्यक समूहों की स्वायत्तता मिटा दी जाती है।
एक ही कानून-व्यवस्था
प्रभावशाली समूह की परंपराओं पर आधारित एक एकीकृत कानून-न्याय व्यवस्था थोपी जाती है, और अन्य समूहों की वैकल्पिक व्यवस्थाएँ खत्म कर दी जाती हैं।
एक ही राजभाषा
प्रभावशाली समूह की भाषा को ही एकमात्र राजकीय भाषा बनाया जाता है, सभी सार्वजनिक संस्थाओं में इसका प्रयोग अनिवार्य किया जाता है।
राजकीय प्रचार
प्रभावशाली समूह की भाषा-संस्कृति को राज्य-नियंत्रित मीडिया और शिक्षा संस्थाओं से बढ़ावा दिया जाता है।
राष्ट्रीय प्रतीक
प्रभावशाली समूह के इतिहास और नायकों का सम्मान करने वाले राज्य-प्रतीक अपनाए जाते हैं: राष्ट्रीय पर्व, सड़कों के नाम आदि इसी के अनुसार तय होते हैं।
संसाधनों की ज़ब्ती
अल्पसंख्यक और देशज समूहों से ज़मीन, जंगल और मत्स्य क्षेत्र छीनकर उन्हें “राष्ट्रीय संसाधन” घोषित कर दिया जाता है।
राज्य सामुदायिक पहचान से क्यों डरते हैं? क्योंकि भाषा, धर्म या नृजातीयता जैसा
कोई भी आधार किसी दिन एक प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र की नींव बन सकता है। पर सांस्कृतिक
विविधता का दमन महँगा पड़ता है: इससे वे अल्पसंख्यक या अधीनस्थ समुदाय अलग-थलग पड़
जाते हैं जिनकी संस्कृति को “गैर-राष्ट्रीय” मान लिया जाता है, और दमन स्वयं
सामुदायिक पहचान को और गहरा बना सकता है। पुस्तक का अपना निष्कर्ष: सांस्कृतिक
विविधता को प्रोत्साहित करना, या कम-से-कम बने रहने देना, व्यावहारिक और सैद्धांतिक
दोनों दृष्टि से अच्छी नीति है।
4 सांस्कृतिक विविधता और भारत एक राष्ट्र-राज्य के रूप में
भारत सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विश्व के सबसे विविधतापूर्ण देशों में से
एक है। ये 2011 की जनगणना के पुस्तक के अपने आँकड़े हैं; इन्हें वर्ष के साथ लिखें:
| धार्मिक समुदाय | जनसंख्या का हिस्सा (2011 की जनगणना) |
|---|---|
| हिंदू | ~80% |
| मुसलमान | 14.2%, इस वजह से भारत, पुस्तक के अपने शब्दों में, “इंडोनेशिया के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मुसलमान देश” है |
| ईसाई | 2.3% |
| सिख | 1.7% |
| बौद्ध | 0.7% |
| जैन | 0.4% |
हिंदू स्वयं एक समजातीय समूह नहीं हैं: वे क्षेत्रीय रूप से
भिन्न-भिन्न विश्वासों-व्यवहारों तथा जाति और भाषा से बँटे हुए हैं। भारत की विशाल
जनसंख्या के कारण ये छोटे प्रतिशत भी मिलकर बड़ी संख्याएँ बना देते हैं।
सामुदायिक पहचानों के साथ भारत का अपना व्यवहार न तो आत्मसात्करणवादी
है न एकीकरणवादी। स्वतंत्र भारत ने शुरू से ही आत्मसात्करण को नकारा है
(हालाँकि प्रभावशाली हिंदू समुदाय के कुछ वर्गों ने इसकी माँग की है)। “राष्ट्रीय
एकीकरण” राज्य की नीति में लगातार महत्त्वपूर्ण रहा है, पर भारत बॉक्स 6.1 के अर्थ
में एकीकरणवादी कभी नहीं रहा: संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित
करता है, फिर भी धर्म और भाषा को सार्वजनिक क्षेत्र से पूरी तरह बाहर नहीं किया
गया है। राज्य इन समुदायों को स्पष्ट रूप से मान्यता देता है, और अंतरराष्ट्रीय
मानकों की तुलना में अल्पसंख्यक धर्मों को बहुत मज़बूत संवैधानिक सुरक्षा मिली है।
पुस्तक के अनुसार आमतौर पर भारत में समस्या यह रही है कि यहाँ कानूनों या
सिद्धांतों की तो कोई कमी नहीं रही, बल्कि उनके पालन या व्यवहार में थोड़ी
कसर रही है। कुल मिलाकर भारत को “राज्य-राष्ट्र” का एक अच्छा उदाहरण माना जा
सकता है, यद्यपि यह राष्ट्र-राज्यों की समस्याओं से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं है।
राष्ट्र-राज्य का एक विकल्प है “राज्य-राष्ट्र”: जहाँ नृजातीय, धार्मिक,
भाषाई या देशज पहचानों पर आधारित विभिन्न “राष्ट्र” एक ही राज्य-व्यवस्था में
शांतिपूर्वक साथ रह सकते हैं। इसके लिए सांस्कृतिक बहिष्कार खत्म करने और बहुविध,
पूरक पहचानें बनाने के स्पष्ट प्रयत्न चाहिए। ऐसी प्रतिसंवेदी नीतियाँ
विविधता में एकता का निर्माण करने के लिए, “हम” भाव जागृत करने के लिए प्रोत्साहन
देती हैं। भारत का संविधान इस विचार को अपनाता है, और लंबे समय से चल रहे
लोकतंत्रों का तुलनात्मक सर्वेक्षण दर्शाता है कि अपनी विविधताओं के बावजूद भारत एक
अत्यंत सशक्त लोकतंत्र है। बॉक्स एक वास्तविक चुनौती भी बताता है: एक अकेली
हिंदू पहचान थोपने की कोशिश करने वाले समूहों का उभार, जो समावेश और अल्पसंख्यक
अधिकारों को नुकसान पहुँचाता है, और हाल की सांप्रदायिक हिंसा सामाजिक मेल-मिलाप
के लिए चिंता पैदा करती है। फिर भी बॉक्स भारत के संवैधानिक ढाँचे को बड़ी
क्षेत्रीय, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद देश को जोड़े रखने का श्रेय
देता है। तदात्मीकरण (पहचान), विश्वास और समर्थन के सूचकों (चार्ट 1) पर भारत का
कार्य-निष्पादन, लंबे समय से स्थापित और अधिक संपन्न लोकतंत्रों की तुलना में,
“विशेष रूप से प्रभावोत्पादक” नज़र आता है। बॉक्स यह भी कहता है कि राष्ट्रीय एकता के लिए एक ही पहचान थोपना और विविधता की
निंदा करना ज़रूरी नहीं है; सफल रणनीतियाँ सांस्कृतिक मान्यता की प्रतिसंवेदी
नीतियाँ बनाकर विविधता को समायोजित करती हैं।
5 भारतीय संदर्भ में क्षेत्रवाद
क्षेत्रवाद भारत की भाषाओं, संस्कृतियों, जनजातियों और धर्मों की
विविधता में जड़ें रखता है। जब किसी एक भाषा, संस्कृति या धर्म के लोग किसी एक
क्षेत्र में बड़ी संख्या में इकट्ठे बसे हों, और उस क्षेत्र को लगे कि उसके साथ
भेदभाव या उपेक्षा हो रही है, तो यह भावना और मज़बूत हो जाती है। भारतीय
संघवाद (केंद्र और राज्यों के बीच बँटी हुई सत्ता) इन क्षेत्रीय भावनाओं
को समायोजित करने वाला एक साधन है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने शुरू में ब्रिटिश-काल के बड़े बहुभाषी-बहुनृजातीय
प्रांतों (“प्रेसीडेंसी”: मद्रास, बंबई और कलकत्ता प्रमुख थीं; इन तीनों
शहरों के नाम अब बदल चुके हैं) को ही बनाए रखा। ये बहुनृजातीय और बहुभाषी प्रांत
भारत संघ कहे जाने वाले अर्द्धसंघीय राज्य की बड़ी राजनीतिक-प्रशासनिक इकाइयाँ
थे। संविधान अपनाने के तुरंत बाद, तीव्र
जन-आंदोलनों के कारण इन्हें नृजातीय-भाषाई राज्यों में पुनर्गठित करना
पड़ा।
1920 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वयं भाषाई आधार पर पुनर्गठित हो
चुकी थी, और गांधीजी सहित अन्य नेताओं ने वचन दिया था कि स्वतंत्रता के बाद नए
राज्य भाषा के आधार पर बनेंगे। पर 1947 की स्वतंत्रता विभाजन के साथ आई, और
शीर्ष कांग्रेसी नेताओं, नेहरू, पटेल और राजाजी, ने इस वचन को पूरा करने
में हिचकिचाहट दिखाई, क्योंकि उन्हें डर था कि धर्म ने एक विभाजन कराया, तो भाषा
न जाने कितने और करवा दे।
नेहरू सहित कई नेताओं को डर था कि भाषा-आधारित राज्य भारत के उप-विभाजन को तेज़
कर देंगे। इसका उल्टा हुआ: भाषायी राज्यों ने भारतीय एकता को मज़बूत किया,
कमज़ोर नहीं: पुस्तक के अपने शब्दों में “कन्नडिग और भारतीय, बंगाली और भारतीय,
तमिल और भारतीय, गुजराती और भारतीय” होना पूरी तरह संगत साबित हुआ।
5.1 दो पड़ोसी, दो अलग रास्ते
श्रीलंका (सीलोन), 1956
- भारत के राज्य पुनर्गठन के उसी वर्ष, सीलोन की संसद ने तमिल विरोध के बावजूद सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित किया
- एक वामपंथी सिंहली सांसद की चेतावनी: “एक भाषा, दो राष्ट्र” … “दो भाषाएँ, एक राष्ट्र”
- 1983 से श्रीलंका में जो गृहयुद्ध चला, वह कुछ हद तक बहुसंख्यक भाषाई समूह द्वारा अल्पसंख्यक भाषा-अधिकारों की उपेक्षा का परिणाम है
पाकिस्तान, 1971
- पाकिस्तान का 1971 में विभाजन इसलिए हुआ क्योंकि पश्चिमी भाग के पंजाबी-उर्दू भाषी लोग पूर्वी भाग के बंगालियों की भावनाओं का आदर नहीं करना चाहते थे
यदि भारतीय भाषाई समुदायों की भावनाओं की उपेक्षा की जाती, तो शायद यहाँ भी यह
स्थिति बनती: “एक भाषा, चौदह या पंद्रह राष्ट्र।”
रामचंद्र गुहा के लेख से यथोचित परिवर्तनों के साथ उद्धृत, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 1 नवंबर 2006 (बॉक्स 6.3)
भाषा ने, क्षेत्रीय और जनजातीय पहचान के साथ मिलकर, धर्म ने नहीं, भारत
में नृजातीय-राष्ट्रीय पहचान बनाने का सबसे सशक्त साधन बनकर काम किया है। पर सभी
भाषाई समुदायों को राज्यत्व नहीं मिला: 2000 में बने छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और
झारखंड में भाषा की कोई प्रमुख भूमिका नहीं थी: यहाँ जनजातीय पहचान, भाषा,
क्षेत्रीय वंचन और पारिस्थितिकी पर आधारित नृजातीयता ने मिलकर आधार बनाया।
पुस्तक स्वयं यह टिप्पणी देती है: जहाँ ‘राज्य’ शब्द मोटे अक्षरों में
लिखा गया है, वहाँ वह भारतीय राष्ट्र-राज्य के अंतर्गत आने वाली एक संघीय इकाई का
द्योतक है; जहाँ वह सामान्य अक्षरों में लिखा गया है, वहाँ वह व्यापक संकल्पना
श्रेणी (जैसे “राष्ट्र-राज्य” में) के लिए प्रयुक्त हुआ है। अपने उत्तर में यह भेद
बनाए रखें।
क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान केवल राज्य बनाने से नहीं होता: इसके लिए एक ऐसा
संस्थागत ढाँचा भी चाहिए जो बड़े संघीय ढाँचे के भीतर उनकी स्वायत्तता सुनिश्चित
करे। भारत में यह संवैधानिक उपबंधों से होता है: राज्य-सूची, केंद्र-सूची, और दोनों
के लिए साझा समवर्ती सूची; राज्यसभा की संरचना राज्य विधानमंडल तय
करते हैं; और केंद्र-राज्य संबंधों के लिए आवधिक समितियाँ बनती हैं: जैसे
वित्त आयोग, जो हर पाँच वर्ष में केंद्र-राज्य कर-राजस्व बँटवारे के लिए
गठित होता है; हर पंचवर्षीय योजना में भी राज्यों की अपनी विस्तृत योजनाएँ शामिल होती हैं, जो हर
राज्य के अपने राज्य योजना आयोग द्वारा तैयार की जाती हैं।
6 धर्म से संबंधित मुद्दे और पहचानें
सांस्कृतिक विविधता के सभी पक्षों में शायद धार्मिक मुद्दे सबसे अधिक
विवादास्पद हैं। पुस्तक इन्हें दो संबंधित समूहों में बाँटती है:
6.1 दो संबंधित समूह
धर्मनिरपेक्षता-सांप्रदायिकता
राज्य के धर्म से संबंध और उन राजनीतिक समूहों से संबंधित, जो धर्म को अपनी प्राथमिक पहचान मानते हैं।
अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक
राज्य संख्या और/या शक्ति (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक) में असमान धार्मिक, नृजातीय या अन्य समुदायों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
6.2 अल्पसंख्यक अधिकार और राष्ट्र-निर्माण
भारतीय राष्ट्रवाद की प्रभावशाली प्रवृत्ति समावेशात्मक और लोकतांत्रिक रही:
समावेशात्मक क्योंकि इसमें विविधता को मान्यता मिली, और लोकतांत्रिक क्योंकि इसने
भेदभाव-बहिष्कार को नकारा। “लोग” शब्द को धर्म, नृजातीयता, प्रजाति या जाति द्वारा
परिभाषित किसी विशेष समूह के प्रसंग से नहीं देखा गया। मानवतावादी विचारों ने भारतीय राष्ट्रवादियों
को प्रभावित किया, और अपवर्जनात्मक राष्ट्रवाद की बुराई पर महात्मा गांधी और
रवींद्रनाथ टैगोर ने खुलकर टिप्पणी की।
“…जहाँ पाश्चात्य राष्ट्रवाद की भावना का बोलबाला हो, तो सभी लोगों को
बचपन से ही घृणा करना और महत्त्वाकांक्षाओं का पोषण करना तमाम तरीकों से सिखाया
जाता है जैसे, इतिहास में अर्धसत्यों और असत्यों को गढ़कर, अन्य प्रजातियों के
बारे में लगातार मिथ्यानिरूपण करके…”
रवींद्रनाथ टैगोर, ऑन नेशनलिज़्म, 1917, पुनःमुद्रण 1930, मैकमिलन, मद्रास (बॉक्स 6.4)
समावेशात्मक राष्ट्रवाद को असरदार बनाने के लिए इसे संविधान में जगह देनी पड़ी,
क्योंकि जैसा पहले देखा, प्रभावशाली समूह में यह मान लेने की प्रबल प्रवृत्ति होती
है कि उसकी संस्कृति ही राष्ट्र-राज्य की संस्कृति है। एक मज़बूत, लोकतांत्रिक
राष्ट्र के लिए सभी समूहों, खासकर अल्पसंख्यकों, के अधिकार सुनिश्चित करने वाले
संवैधानिक प्रावधान ज़रूरी हैं।
समाजशास्त्र में “अल्पसंख्यक” केवल संख्यात्मक अवधारणा नहीं है: इसमें
आमतौर पर असुविधा या हानि का कुछ भाव निहित है, और इसके सदस्य एक
सामूहिकता बनाते हैं, यानी उनमें समूह के प्रति एकजुटता और अपनेपन की प्रबल
भावना होती है। बाएँ हाथ से काम करने वालों जैसा कोई सांख्यिकीय
अल्पसंख्यक, जिसमें कोई सामूहिकता न हो, समाजशास्त्रीय अर्थ में अल्पसंख्यक नहीं
है।
अत्यंत धनवान लोगों जैसे विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यकों को आमतौर पर
अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता; और यदि कहना ही हो तो उनके साथ कोई विशेषक जोड़
दिया जाता है, जैसे “विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक”। एक समूह किसी एक अर्थ में सुविधासंपन्न और दूसरे में
वंचित भी हो सकता है: पारसी या सिख आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न हो
सकते हैं, फिर भी हिंदुओं की विशाल जनसंख्या के सामने अपनी छोटी संख्या के कारण
सांस्कृतिक रूप से वंचित हो सकते हैं। बहुसंख्यक की जनसांख्यिकीय प्रधानता के
कारण धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण चाहिए।
हिंदुओं की संख्या लगभग 96.6 करोड़ (80%) है, और वे एक समजातीय समूह नहीं हैं।
वे भी, अन्य प्रमुख धर्मों की तरह, जातियों में बँटे हैं। पुस्तक दो अनुपात
बताती है: हिंदुओं की जनसंख्या सभी अन्य अल्पसंख्यक धर्मावलंबियों की
सम्मिलित जनसंख्या से लगभग चार गुना बड़ी है, और सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह यानी
मुसलमानों से लगभग छह गुना बड़ी है।
| समुदाय | जनसंख्या हिस्सा | कहाँ केंद्रित |
|---|---|---|
| मुसलमान | 13.8 करोड़, 14.2% (सबसे बड़ा अल्पसंख्यक) | जम्मू-कश्मीर में बहुसंख्यक; पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान में बड़ी संख्या |
| ईसाई | 2.78 करोड़, 2.3% | तीन पूर्वोत्तर राज्यों में बहुसंख्यक: नागालैंड (88%), मिज़ोरम (87%), मेघालय (74.5%); गोवा (25%), केरल (18.4%) में भी बड़ी संख्या |
| सिख | 2.1 करोड़, 1.7% | पंजाब में बहुसंख्यक (58%) |
| बौद्ध | 80 लाख, 0.7% | सिक्किम (27%) और अरुणाचल प्रदेश (12%) में सर्वाधिक अनुपात; बड़े राज्यों में महाराष्ट्र सबसे आगे (6%) |
| जैन | 45 लाख, 0.4% | महाराष्ट्र (1.3%), दिल्ली और गुजरात (~1% प्रत्येक) में सर्वाधिक |
| अन्य धर्म एवं संप्रदाय | 80 लाख, 0.7% | पुस्तक इसके लिए कोई राज्य-वार विवरण नहीं देती |
ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध लंबे संघर्ष में भारतीय राष्ट्रवादियों ने भारत
की विविधता को मान्यता और आदर देने की आवश्यकता समझी: पुस्तक के शब्दों में, “विविधता में अनेकता” का मुहावरा
भारतीय समाज के बहुल एवं विविध स्वरूप को समझने का एक सूत्र बन गया। अल्पसंख्यक और सांस्कृतिक अधिकारों पर भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस के अनेक सत्रों में चर्चा हुई, और अंततः इन्हें संविधान में अभिव्यक्ति
मिली (ज़ैदी 1984)।
डॉ. भीमराव अंबेडकर (1891-1956), संविधान के प्रमुख शिल्पकार, बौद्ध
धर्म के पुनः प्रवर्तक, विधिवेत्ता, विद्वान और राजनीतिक नेता, जिनका जन्म एक
गरीब अस्पृश्य समुदाय में हुआ, इन्होंने अपना जीवन अस्पृश्यता और जाति व्यवस्था
के विरुद्ध संघर्ष करने में लगा दिया, और संविधान सभा में यह बिंदु स्पष्ट
किया:
नीचे का उद्धरण आयरलैंड का विभाजन रोकने के लिए चली बातचीत का एक प्रसंग देता है,
जिसे अंबेडकर एक विपरीत उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं: वहाँ प्रोटेस्टेंट अल्पसंख्यक के नेता
सर एडवर्ड कारसन ने बहुसंख्यक कैथोलिकों के नेता जॉन रेडमंड की संयुक्त आयरलैंड के लिए दी जा रही
अल्पसंख्यक-सुरक्षा ठुकरा दी। अंबेडकर का बिंदु यह है कि भारत में अल्पसंख्यकों के किसी भी वर्ग ने
यह रुख नहीं अपनाया।
“अल्पसंख्यक वर्ग एक ऐसी विस्फोटक शक्ति है जो यदि भड़क उठे तो राज्य की संपूर्ण
रचना को तार-तार कर देगी… दूसरी बात यह है कि भारत के अल्पसंख्यक अपने
अस्तित्व को बहुसंख्यकों के हाथों में सौंपने के लिए सहमत हुए हैं। आयरलैंड के
विभाजन को रोकने के लिए चली बातचीत के इतिहास में, रेडमंड ने कारसन से कहा,
‘आप प्रोटेस्टैंट अल्पसंख्यक के लिए चाहे जो सुरक्षा माँग लें, हमें आयरलैंड को
संयुक्त, अविभाजित रखना है।’ कारसन का उत्तर था: ‘लानत है तुम्हारी सुरक्षा पर,
हम तुम्हारे द्वारा शासित होना ही नहीं चाहते।’ भारत में अल्पसंख्यकों के किसी भी
वर्ग ने यह रुख नहीं अपनाया।”
डॉ. भीमराव अंबेडकर, संविधान सभा के वाद-विवाद 1950ः310-311, नारंग 2002ः63 से उद्धृत (बॉक्स 6.6)
किसी समूह के अधिकारों को मान्यता न देने के परिणाम पुस्तक दो उदाहरणों से
बताती है:
बांग्लादेश
- बांग्लादेश के निर्माण के प्रमुख मुद्दों में से एक था पाकिस्तानी राज्य की बांग्लादेश के लोगों के सांस्कृतिक-भाषाई अधिकारों को मान्यता न देने की अनिच्छा
श्रीलंका
- श्रीलंका के नृजातीय संघर्ष के विवादास्पद मुद्दों में से एक था सिंहली भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में थोपा जाना
पुस्तक का सामान्य सिद्धांत: भारत में किसी भी समूह पर भाषा या धर्म ज़बरदस्ती
थोपना राष्ट्रीय एकता को कमज़ोर करता है, जो विविधताओं की मान्यता पर टिकी है।
भारतीय राष्ट्रवाद इसे मानता है, और संविधान इसकी पुष्टि करता है। पुस्तक यह भी
नोट करती है कि अल्पसंख्यक अकेले भारत में नहीं, हर जगह पाए जाते हैं: दुनिया में
कहीं भी कोई राष्ट्र-राज्य एक ही समरूप सांस्कृतिक समूह से नहीं बना। यहाँ तक कि
जहाँ यह लगभग सच था, जैसे आइसलैंड, स्वीडन या दक्षिण कोरिया, वहाँ भी
आधुनिक पूँजीवाद, उपनिवेशवाद और बड़े पैमाने के प्रवसन ने समूहों की बहुविधता ला
दी है।
अनुच्छेद 29(1): भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग में रहने वाले
नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे
बनाए रखने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 29(2): राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता पाने
वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश,
जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 30(1): धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को
अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 30(2): शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी संस्था
के विरुद्ध इस आधार पर भेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी
अल्पसंख्यक-वर्ग के प्रबंध में है।
6.3 सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र-राज्य
रोज़मर्रा के दक्षिण एशियाई प्रयोग में सांप्रदायिकता का अर्थ है धर्म से
जुड़ी एक आक्रामक राजनीतिक विचारधारा: अपने समूह को ही वैध या श्रेष्ठ समूह मानना
और अन्य समूहों को निम्न, अवैध अथवा विरोधी समझना। यह एक अनूठा भारतीय अथवा शायद
दक्षिण एशियाई अर्थ है:
साधारण अंग्रेज़ी शब्द “communal” तटस्थ है, इसका अर्थ केवल व्यक्ति के बजाय
समुदाय से जुड़ा होना है।
सांप्रदायिकता राजनीति से जुड़ी है, धर्म से नहीं: व्यक्तिगत आस्था और
सांप्रदायिकता में कोई ज़रूरी संबंध नहीं: एक सांप्रदायिक व्यक्ति श्रद्धालु हो
भी सकता है और नहीं भी, और एक श्रद्धालु व्यक्ति सांप्रदायिक हो भी सकता है और
नहीं भी। असली बात है अन्य पहचानों वाले लोगों के प्रति रवैया। सांप्रदायिक लोग
एक आक्रामक राजनीतिक पहचान बनाते हैं और अपनी पहचान न साझा करने वाले किसी भी
व्यक्ति की निंदा या उस पर आक्रमण करने को तैयार रहते हैं: वे धार्मिक पहचान को
जाति, पेशे या राजनीतिक विश्वास से ऊपर मानकर बड़े-विविध समूहों को “सभी हिंदू”,
“सभी मुसलमान” जैसा एक-समान बना देते हैं।
भारत में सांप्रदायिकता तनाव और हिंसा का बार-बार आने वाला स्रोत रही है, जिसमें
स्वतंत्रता-पूर्व के दंगे भी शामिल हैं, जो अक्सर (पर हमेशा नहीं) औपनिवेशिक
फूट-डालो-राज-करो नीति का परिणाम थे। पर पुस्तक स्पष्ट कहती है कि उपनिवेशवाद ने
अंतर-सामुदायिक झगड़ों को जन्म नहीं दिया: उपनिवेश काल से पहले भी ऐसे झगड़ों का
लंबा इतिहास रहा है, और स्वतंत्रता के बाद के दंगों का दोष उपनिवेशवाद पर नहीं डाला
जा सकता। पर भारत में धार्मिक बहुलवाद की
भी एक लंबी परंपरा है, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व से लेकर वास्तविक समन्वयवाद तक, जो
भक्ति और सूफ़ी आंदोलनों के भक्ति-गीतों में स्पष्ट दिखती है। पुस्तक के शब्दों में,
संक्षेप में, इतिहास हमारे समक्ष अच्छे और बुरे दोनों तरह के उदाहरण प्रस्तुत करता
है; इससे हम क्या सीखना चाहते हैं, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है।
“मोको कहाँ ढूंढ़े रे बंदे / मैं तो तेरे पास में… / ना मंदिर में, न मस्जिद
में / ना काबे कैलास में”: “तू मुझे कहाँ ढूँढता है, मैं तो तेरे पास हूँ…
न मंदिर में, न मस्जिद में, न काबे में, न कैलाश में।”
कबीरदास, समन्वयी परंपराओं का चिर, शाश्वत प्रतीक (बॉक्स 6.8)
पश्चिमी अर्थ में धर्मनिरपेक्षता का मतलब है चर्च और राज्य का
पृथक्करण, जो धर्मनिरपेक्षीकरण से जुड़ा है: धर्म का सार्वजनिक जीवन से
धीरे-धीरे पीछे हटना, अनिवार्य दायित्व से स्वैच्छिक व्यक्तिगत व्यवहार बनना।
भारतीय अर्थ में धर्मनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्षता में यह पश्चिमी भाव भी शामिल है,
पर इसमें कुछ और भी जुड़ा है: रोज़मर्रा की भाषा में “धर्मनिरपेक्ष” का सबसे आम
प्रयोग “सांप्रदायिक” के विलोम के रूप में होता है। इस अर्थ में धर्मनिरपेक्ष
व्यक्ति या राज्य वह है जो किसी एक धर्म का दूसरों से ऊपर पक्ष नहीं लेता: यह
धार्मिक उग्रवाद का विरोधी है, इसका अर्थ धर्म के प्रति द्वेष नहीं। राज्य-धर्म
संबंधों में यह भारतीय अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान दर्शाता है,
अलगाव नहीं, उदाहरण के लिए, धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य सभी धर्मों के त्यौहारों
पर सार्वजनिक छुट्टी घोषित करता है।
भारतीय राज्य एक साथ धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक-संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध
है, और इसमें एक असली तनाव है। अल्पसंख्यक संरक्षण का अर्थ है उन्हें विशेष ध्यान
देना जहाँ राजनीति का सामान्य कामकाज उन्हें नुकसान पहुँचाता है, पर ऐसा संरक्षण
तुरंत “तुष्टीकरण” के आरोप को जन्म देता है। विरोधी कहते हैं यह अल्पसंख्यक वोट
पाने का बहाना है; समर्थक कहते हैं ऐसे संरक्षण के बिना धर्मनिरपेक्षता
बहुसंख्यक के मूल्य थोपने का बहाना बन सकती है। पुस्तक दोनों पक्ष रखती है: इसे
अपने उत्तर में एकतरफ़ा मत बनाएँ।
7 राज्य और नागरिक समाज
सांस्कृतिक विविधता प्रबंधित करने में राज्य एक बेहद निर्णायक संस्था है, पर यह
उस राष्ट्र और जनता से भी स्वतंत्र हो सकता है जिसका यह प्रतिनिधित्व करने का दावा
करता है। जब विधानमंडल, अधिकारीतंत्र, न्यायपालिका, सशस्त्र सेनाएँ और पुलिस जैसी
राज्य-संरचनाएँ जनता से कट जाती हैं, तब राज्य सत्तावादी बनने का खतरा
मोल लेता है।
सत्तावादी राज्य लोकतांत्रिक राज्य के विपरीत है: लोगों की आवाज़
नहीं सुनी जाती, और सत्ताधारी किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होते। ऐसे राज्य अक्सर
भाषण, प्रेस और राजनीतिक गतिविधि की स्वतंत्रता, सत्ता के दुरुपयोग से सुरक्षा,
और विधि की उचित प्रक्रिया जैसी नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित या समाप्त कर देते
हैं।
सत्तावाद के अलावा, भ्रष्टाचार, अकुशलता या संसाधनों की कमी के कारण राज्य की
संस्थाएँ जनता की ज़रूरतें सुनने में अक्षम या अनिच्छुक हो सकती हैं। यहीं
गैर-राजकीय कर्ता महत्वपूर्ण हो जाते हैं: वे राज्य पर नज़र रख सकते हैं,
उसके अन्यायों का विरोध कर सकते हैं, या उसके प्रयासों में सहयोग कर सकते हैं।
नागरिक समाज वह व्यापक क्षेत्र है जो परिवार के निजी क्षेत्र से परे है,
पर राज्य और बाज़ार दोनों से बाहर है। यह सक्रिय नागरिकता का क्षेत्र है, जहाँ
व्यक्ति स्वेच्छा से संस्थाएँ बनाते हैं, सामाजिक मुद्दे उठाते हैं, और राज्य को
प्रभावित करने या उससे माँग करने की कोशिश करते हैं।
नागरिक समाज में राजनीतिक दल, मीडिया संस्थाएँ, मज़दूर संघ, गैर-सरकारी संगठन
(NGO) और धार्मिक संगठन आते हैं, बशर्ते वे राज्य-नियंत्रित न हों और विशुद्ध
वाणिज्यिक-मुनाफ़ा कमाने वाले न हों।
आज नागरिक समाज संगठनों के क्रियाकलाप और भी व्यापक हो चुके हैं: इनमें राष्ट्रीय
तथा अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणों के साथ पक्ष-समर्थन और प्रचार संबंधी गतिविधियाँ, और
विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी शामिल है।
7.1 नागरिक समाज संगठन किन मुद्दों पर काम करते हैं
भूमि और आजीविका
भूमि अधिकारों के लिए जनजातीय संघर्ष; मशीनीकृत मछली पकड़ने के विरुद्ध मछुआरों का संघर्ष; बाँध-विस्थापितों का पुनर्वास; दलितों को भूमि वितरण।
शहरी जीवन
नगरीय शासन का हस्तांतरण; फेरीवालों-पटरी निवासियों का पुनर्वास; गंदी बस्तियों को हटाने के विरुद्ध और आवासीय अधिकारों के लिए अभियान।
अधिकार और सुधार
महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और बलात्कार के खिलाफ अभियान; प्राथमिक शिक्षा सुधार; नागरिक स्वतंत्रता संगठनों द्वारा राज्य पर निगरानी।
मीडिया, विशेषकर इसके दृश्य और इलेक्ट्रॉनिक खंडों ने भी उत्तरोत्तर बढ़ती
सक्रिय भूमिका निभाई है।
सूचनाधिकार अधिनियम, 2005 (अधिनियम सं. 22/2005) की शुरुआत ग्रामीण
राजस्थान में गाँव-विकास पर खर्च हुई सरकारी धनराशि की जानकारी के लिए चले
आंदोलन से हुई, जो आगे चलकर राष्ट्रव्यापी अभियान बन गया। नौकरशाही के विरोध के
बावजूद, सरकार को इस अभियान की सुनवाई करनी पड़ी और नागरिकों के सूचना-अधिकार को
मान्यता देने वाला नया कानून बनाना पड़ा।
| विवरण | पुस्तक क्या कहती है |
|---|---|
| संसद द्वारा पारित | 15 जून 2005 |
| लागू हुआ | 13 अक्तूबर 2005 |
| निरस्त करता है | सरकारी गुप्त अधिनियम, 1923, और अन्य विशेष कानून |
| सार्वजनिक प्राधिकरण से अपेक्षित उत्तर | शीघ्रता से, यानी 30 दिन के भीतर (पुस्तक के शब्दों में, “यह आशा की जाती है”) |
| अधिनियम के तहत नागरिक अधिकार | कोई भी सूचना माँगना; दस्तावेज़ों की प्रतिलिपि लेना; दस्तावेज़-कार्यों-अभिलेखों का निरीक्षण; कार्य-सामग्री के प्रमाणित नमूने; प्रिंटआउट, डिस्केट, फ्लॉपी, टेप, वीडियो कैसेट आदि में सूचना |
पुस्तक के अनुसार इस प्रकार के उदाहरण दिखाते हैं कि नागरिक समाज यह सुनिश्चित
करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि राज्य राष्ट्र और उसकी जनता के प्रति जवाबदेह
रहे।
- क्रियाकलाप 6.1: अपने राज्य के उद्भव का पता लगाएँ: यह कब बना, और इसे परिभाषित करने की मुख्य कसौटी भाषा, नृजातीय/जनजातीय पहचान, क्षेत्रीय वंचन, पारिस्थितिक अंतर या कोई अन्य थी; सभी राज्यों का इन कसौटियों पर वर्गीकरण करें, और नए राज्य की माँग करने वाले आंदोलनों की कसौटियाँ खोजें (पुस्तक का संकेत: विदर्भ आंदोलन)।
- क्रियाकलाप 6.2: अपने बुज़ुर्गों से धार्मिक बहुलवाद, समन्वयवाद या सांप्रदायिक सौहार्द वाली कविताएँ, गीत और लघुकथाएँ इकट्ठी करके कक्षा में प्रस्तुत करें।
- क्रियाकलाप 6.3: अपने आस-पड़ोस के नागरिक समाज संगठनों या गैर-सरकारी संगठनों का पता लगाएँ: वे कौन-से मुद्दे उठाते हैं, उनमें कौन लोग काम करते हैं, और वे सरकारी तथा वाणिज्यिक संगठनों से कैसे भिन्न हैं।
तीनों के हल इस अध्याय की NCERT समाधान पोस्ट में दिए गए हैं।
8 निष्कर्ष
सांस्कृतिक पहचानें बहुत प्रबल होती हैं, इसी कारण सांस्कृतिक विविधता कठोर
चुनौतियाँ प्रस्तुत कर सकती है, और इस प्रश्न का कोई पूर्व-निर्धारित उत्तर नहीं है कि
राष्ट्र-राज्य का “राज्य” भाग “राष्ट्र” भाग बनाने वाले समुदायों के साथ कैसा बर्ताव
करे। भारत की स्थिति न तो आत्मसात्करणवादी है, न एकीकरणवादी: राज्य धर्मनिरपेक्ष
है, फिर भी धर्म, भाषा और ऐसे अन्य कारकों को सार्वजनिक क्षेत्र से पूरी तरह
निष्कासित नहीं किया गया है। भाषायी राज्यों ने भारतीय एकता को कमज़ोर नहीं, मज़बूत
किया। संविधान अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है, और नागरिक समाज यह
सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि राज्य राष्ट्र और उसकी जनता के प्रति
जवाबदेह रहे।
- विविधता ≠ असमानता; विविधता तब चुनौती बनती है जब यह प्रतिस्पर्धा, असमानता या दुर्लभ संसाधनों से जुड़ जाए
- सामुदायिक पहचान प्रदत्त है: जन्म से मिलती है, अर्जित नहीं, फिर भी पूर्ण
- राज्य = विशेष क्षेत्र में विधिसम्मत एकाधिकार का सफल दावा करने वाला निकाय (वेबर); राष्ट्र-राज्य = अपना राज्य पाने वाला राष्ट्र, यह एक-एक का जोड़ा हाल का विकास है, सार्वभौमिक नहीं
- राज्य विविधता को आत्मसात्करण या एकीकरण से संभालने की कोशिश करते हैं: दोनों में प्रभावशाली संस्कृति ही “राष्ट्रीय” बनने का खतरा रहता है
- भाषायी राज्यों (SRC 1956, पोट्टि श्रीरामुलु: अक्टूबर 1952 में आमरण अनशन, दिसंबर 1952 में मृत्यु → आंध्र प्रदेश) ने भारतीय एकता मज़बूत की, श्रीलंका (1956) और पाकिस्तान (1971) के विपरीत
- अल्पसंख्यक = (आमतौर पर) हानि + सामूहिकता, केवल छोटी संख्या नहीं; अंबेडकर और अनुच्छेद 29-30 अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करते हैं
- सांप्रदायिकता = धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल; धर्मनिरपेक्षता (भारतीय अर्थ) = सभी धर्मों का समान सम्मान, यह अल्पसंख्यक संरक्षण से असली तनाव में है (“तुष्टीकरण” की बहस)
- नागरिक समाज राज्य को जवाबदेह रखता है: सूचनाधिकार अधिनियम, 2005 इसका पुस्तक का अपना उदाहरण है
- क्या मैं पुस्तक के अपने शब्दों में “विविधता” और “असमानता” का फ़र्क बता सकता हूँ?
- क्या मैं वेबर की राज्य की परिभाषा बता सकता हूँ, और समझा सकता हूँ कि राष्ट्र को परिभाषित करना क्यों कठिन है?
- क्या मैं आत्मसात्करण और एकीकरण को समझा सकता हूँ, और हर एक का एक-एक उदाहरण दे सकता हूँ?
- क्या मैं भाषायी राज्यों की कहानी (पोट्टि श्रीरामुलु → आंध्र प्रदेश → SRC 1956) क्रम से सुना सकता हूँ?
- क्या मैं “अल्पसंख्यक” को केवल संख्या के बजाय समाजशास्त्रीय ढंग से परिभाषित कर सकता हूँ?
- क्या मैं समझा सकता हूँ कि सांप्रदायिकता राजनीति से क्यों जुड़ी है, और भारतीय अर्थ में “धर्मनिरपेक्षता” क्या है?
- क्या मैं नागरिक समाज को परिभाषित कर सकता हूँ और सूचनाधिकार अधिनियम सहित तीन मुद्दे गिना सकता हूँ?
- क्या मुझे अपने बोर्ड के इस अध्याय के अंक पता हैं?