ये नोट्स NCERT पुस्तक पर आधारित हैं। CBSE के 2026-27 पाठ्यक्रम में इस
अध्याय के अंक अलग से दिए गए हैं; किसी दूसरे बोर्ड के लिए अपने बोर्ड का
वर्तमान पाठ्यक्रम और प्रश्नपत्र-योजना देखें।
| बोर्ड | इस अध्याय का भार | पेपर संरचना |
|---|---|---|
| CBSE (2026-27 पाठ्यक्रम) | 10 अंक | 80 सैद्धांतिक + 20 प्रोजेक्ट |
CBSE 2026-27 के प्रतिदर्श प्रश्नपत्र में 35 प्रश्न हैं: 1 अंक
के 16 MCQ, 2 अंक के 9, 4 अंक के 7 और 6 अंक के 3 प्रश्न। यह नहीं बताया गया
कि कौन-सा प्रश्न किस अध्याय से आएगा।
- कोई असमानता ‘सामाजिक’ कब कहलाती है, और पूँजी के वे तीन रूप जो तय करते हैं कि किसके पास ज़्यादा और किसके पास कम है
- पूर्वाग्रह, रूढ़िबद्ध धारणा और भेदभाव में फ़र्क़, और भेदभाव को साबित करना मुश्किल क्यों है
- जाति व्यवस्था एक भेदभावपूर्ण व्यवस्था के रूप में कैसे काम करती है, अस्पृश्यता का असली मतलब क्या है, और इसके खिलाफ़ बने कानून व आरक्षण
- अन्य पिछड़े वर्ग कौन हैं, और काका कालेलकर व मंडल आयोग की कहानी
- औपनिवेशिक काल से आदिवासियों की ज़मीन और जंगल क्यों छिनते गए, और उनके संघर्ष से झारखंड व छत्तीसगढ़ कैसे बने
- सती-विरोधी आंदोलन से लेकर आज के घटते लिंगानुपात तक, भारत में नारी आंदोलन की कहानी
- असक्षमता एक सामाजिक समस्या भी क्यों है, केवल शारीरिक नहीं
1सामाजिक विषमता और बहिष्कार में ‘सामाजिक’ क्या है
सड़कों पर भीखारी, स्कूल जाने की उम्र में घरेलू नौकर का काम करते बच्चे,
स्कूलों में जातीय भेदभाव, महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा, अल्पसंख्यकों और अन्यथा
सक्षम (differently abled) लोगों के प्रति बिना सोचे-समझे बनी नकारात्मक राय:
भारत में यह सब इतना आम है कि सामान्य, लगभग स्वाभाविक लगने लगता है। यह सोचना
आसान है कि गरीब और वंचित लोग वहीं हैं क्योंकि उन्होंने पूरी मेहनत नहीं की।
“यदि परिश्रम इतनी ही अच्छी चीज़ होती तो अमीर लोग हमेशा उसे अपने लिए बचा
कर रखते!”
एक दक्षिण अमेरिकी कहावत, अध्याय में उद्धृत
दुनिया भर में पत्थर तोड़ना, खुदाई करना, रिक्शा खींचना जैसा सबसे कठोर
शारीरिक काम गरीब लोग ही करते हैं, फिर भी वे शायद ही कभी गरीबी
से बाहर निकल पाते हैं। अगर मेहनत और प्रतिभा ही सब कुछ तय करती, तो मेहनती
गरीब लोग नियमित रूप से अमीर बन जाते। ऐसा नहीं होता, क्योंकि बाक़ी सब
चीज़ें बराबर नहीं होतीं। इसका मतलब है कि व्यक्ति की अपनी मेहनत से परे भी
कोई चीज़, यानी उसके पूरे समूह (जाति, लिंग, समुदाय) के स्तर की कोई वजह,
उसे पीछे रोके रखती है। यही अध्याय का असली विषय है।
1.1 विषमता और बहिष्कार को ‘सामाजिक’ कहने के तीन कारण
व्यक्ति की नहीं, समूह की बात
सामाजिक विषमता किसी एक अभागे व्यक्ति की बात नहीं; यह एक ऐसा पैटर्न है
जो पूरी की पूरी जाति, लिंग या समुदाय में दोहराया जाता है।
सिर्फ़ आर्थिक नहीं
पैसे से जुड़ाव अक्सर होता है, पर बहिष्कार लिंग, धर्म, नृजातीयता (यानी
किसी की सामुदायिक/वांशिक पहचान), भाषा, जाति या विकलांगता के आधार पर भी
हो सकता है, सिर्फ़ आर्थिक संसाधनों के कारण नहीं।
व्यवस्थित और सुसंरचित
यह एक निश्चित पैटर्न का पालन करता है; यह समाज के काम करने के तरीके में
ही बना हुआ है, हर किसी के साथ बराबर होने वाली दुर्घटना नहीं।
सामाजिक विषमता विभिन्न समूहों की धन, संपत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य
और सत्ता जैसे मूल्यवान सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच का पैटर्न है।
1.2 पूँजी के तीन रूप (बोर्द्यू, 1986)
समाजशास्त्री बोर्द्यू ने दिखाया कि ‘ज़्यादा होना’ सिर्फ़ पैसे की बात नहीं
है। उन्होंने सामाजिक संसाधनों को पूँजी के तीन रूपों में बाँटा, और दिखाया कि
ये एक-दूसरे में बदल सकते हैं।
| पूँजी का रूप | इसका मतलब | उदाहरण |
|---|---|---|
| आर्थिक पूँजी | भौतिक संपत्ति और आय | एक संपन्न परिवार की दौलत |
| सांस्कृतिक पूँजी | शैक्षणिक योग्यताएँ और प्रतिष्ठा | महँगी उच्च शिक्षा से मिली डिग्री |
| सामाजिक पूँजी | संपर्कों और सामाजिक संगतियों का जाल | प्रभावशाली रिश्तेदार जो नौकरी दिलवा दें |
संपन्न परिवार का बच्चा (आर्थिक पूँजी) महँगी उच्च शिक्षा पाकर डिग्री
(सांस्कृतिक पूँजी) हासिल कर सकता है। प्रभावशाली रिश्तेदारों वाला व्यक्ति
(सामाजिक पूँजी) अच्छी सलाह, सिफ़ारिश या जानकारी के ज़रिए अच्छी आय वाली
नौकरी पा सकता है।
1.3 सामाजिक स्तरीकरण
सामाजिक स्तरीकरण वह व्यवस्था है जिसके ज़रिए समाज में लोगों की
श्रेणियों को एक अधिक्रम (श्रेणीक्रम) में रखा जाता है, जो फिर उनकी पहचान,
दूसरों से संबंध और संसाधनों तथा अवसरों तक उनकी पहुँच को तय करता है।
1.4 पूर्वाग्रह, रूढ़िबद्ध धारणा और भेदभाव
इन तीन शब्दों को अक्सर एक ही मतलब में इस्तेमाल कर लिया जाता है। इस
अध्याय में हर एक का अपना, परीक्षा में पूछा जाने वाला मतलब है।
पूर्वाग्रह एक समूह के सदस्यों द्वारा दूसरे समूह के बारे में बनाई
गई पूर्वकल्पित विचार या व्यवहार है, यानी बिना विषय को जाने और बिना
तथ्यों को परखे पहले से बनी हुई धारणा। ऐसे विचार ज़्यादातर सबूत की बजाय
सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होते हैं। यह ज़्यादातर नकारात्मक होता है, पर सकारात्मक भी हो सकता है, जैसे
कोई व्यक्ति बिना किसी सबूत के अपनी जाति या समूह को श्रेष्ठ मान ले। नई
जानकारी मिलने पर भी पूर्वाग्रह बदलने से इनकार करता है।
रूढ़िबद्ध धारणाएँ पूरे समूह पर लगाई गई स्थिर, कठोर छवियाँ हैं, जो
पूरे समुदाय को मानो एक ही व्यक्ति और एक ही गुण वाला मान लेती हैं।
पूर्वाग्रह ज़्यादातर इन्हीं रूढ़िबद्ध धारणाओं पर आधारित होते हैं। रूढ़िबद्ध
धारणाएँ ज़्यादातर नृजातीय और प्रजातीय समूहों और महिलाओं के बारे में प्रयोग
की जाती हैं, और भारत में कई रूढ़िबद्ध विचार औपनिवेशिक देन हैं: कुछ
समुदायों को ‘वीर प्रजाति’ कहा गया, कुछ को ‘कायर’ या ‘पौरुषहीन’ और कुछ को
‘दगाबाज़’। अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं की कथाओं में भी पूरे-पूरे समुदाय को
‘आलसी’ या ‘चालाक’ कहा जाता है। असल में कोई व्यक्ति कभी आलसी और कभी मेहनती हो सकता है, लेकिन
रूढ़िबद्ध धारणा व्यक्तियों, समय और परिस्थिति के हिसाब से आने वाले इस अंतर
को मानने से इनकार करती है।
भेदभाव सिर्फ़ सोच नहीं, बल्कि असली व्यवहार है, जो एक समूह
को दूसरों जैसे अवसरों से वंचित कर देता है, जैसे किसी को उसके लिंग या
धर्म के कारण नौकरी न देना। इसे प्रमाणित करना बहुत कठिन है क्योंकि
हो सकता है कि यह न तो खुले तौर पर हो और न ही स्पष्टतया घोषित हो। इसे ऐसे भी
दिखाया जा सकता है जैसे वह दूसरे, ज़्यादा न्यायसंगत कारणों से प्रेरित हो: जाति के
आधार पर नौकरी से मना किए गए व्यक्ति से कहा जा सकता है कि ‘उसकी योग्यता
दूसरों से कम है’ और ‘चयन पूर्ण रूप से योग्यता के आधार पर’ किया गया।
पूर्वाग्रह
- एक सोच या राय
- सबूत से पहले बनती है
- सकारात्मक या नकारात्मक दोनों हो सकती है
भेदभाव
- असली कार्रवाई
- अवसरों से वंचित करता है
- प्रमाणित करना कठिन; दूसरे कारणों से प्रेरित दिखाया जा सकता है
सामाजिक अपवर्जन (बहिष्कार) वे तौर-तरीके हैं जिनसे व्यक्ति समाज
में पूरी तरह शामिल होने से कट जाते हैं। सिर्फ़ भोजन, कपड़ा और मकान ही
नहीं, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा, बैंकिंग और यहाँ
तक कि पुलिस या न्यायपालिका तक पहुँच से भी कट जाना। यह दुर्घटना नहीं,
व्यवस्थित है: यह समाज की संरचनात्मक विशेषताओं का परिणाम है, संयोग का नहीं।
पूर्वाग्रह और भेदभाव में अंतर के लिए हर एक पर एक पंक्ति लिखें: पूर्वाग्रह
मनोवृत्ति और विचारों को दर्शाता है, भेदभाव दूसरे समूह के साथ किया गया
व्यवहार है, जिसे अक्सर दूसरे, न्यायसंगत लगने वाले कारणों से प्रेरित दिखाया
जाता है; इसलिए भेदभाव को प्रमाणित करना कठिन होता है।
भारत में, ज़्यादातर समाजों की तरह, भेदभाव और बहिष्कार की गहरी परंपरा
रही है, और इतिहास के अलग-अलग दौर में जाति, लिंग और धार्मिक भेदभाव के
खिलाफ़ आंदोलन उठे हैं। फिर भी पूर्वाग्रह बना रहता है और अक्सर नए पूर्वाग्रह
उत्पन्न हो जाते हैं, इसलिए कानून अकेले अपने बूते पर समाज को रूपांतरित करने या
स्थायी सामाजिक परिवर्तन लाने में असमर्थ है; इसके लिए परिवर्तन, जागरूकता एवं
संवेदनशीलता के साथ एक सतत सामाजिक अभियान की आवश्यकता है। उपनिवेशवाद ने
सबसे संपन्न भारतीयों को भी भेदभाव और बहिष्कार का मतलब समझाया, और यही एक
वजह है कि आज़ादी की लड़ाई के साथ-साथ इतने सामाजिक सुधार आंदोलन भी चले।
1.5 इस अध्याय के चार समूह
अध्याय के बॉक्स 5.1ए में दो और समूहों का ज़िक्र है। ट्रांसजेंडर:
शरीर विज्ञान में हुए शोधों ने अब शरीर को शल्य चिकित्सा (सर्जरी) से बदलना
संभव बना दिया है, इसलिए जेंडर पहचान जन्म से तय नहीं रहती, इसे चुना जा
सकता है। थर्ड-जेंडर: वे लोग जो न पूरी तरह पुरुष हैं, न पूरी तरह
महिला; इनकी पहचान खुद अपने बोध से भी होती है और परिवार व समाज द्वारा भी।
भारत में थर्ड-जेंडर व्यक्तियों को कानूनी मान्यता मिल चुकी है और वे चुनाव
लड़ने के लिए स्वयं को नामांकित कर सकते हैं।
2जाति और जनजाति: विषमता को कायम रखने वाली व्यवस्थाएँ
2.1 जाति व्यवस्था एक भेदभावपूर्ण व्यवस्था के रूप में
जाति व्यवस्था एक विशिष्ट भारतीय सामाजिक संस्था है जो किसी खास
जाति में जन्मे लोगों के खिलाफ़ भेदभाव को जायज़ ठहराती और लागू करती है।
पहले हर जाति एक तय व्यवसाय से जुड़ी होती थी: किसी जाति में जन्म लेने का
मतलब था उसी व्यवसाय में जन्म लेना, कोई चुनाव नहीं, और हर जाति का सामाजिक
अधिक्रम में एक तय स्थान भी होता था।
धर्मशास्त्र (पुराने धार्मिक ग्रंथ) क्या कहते हैं
- सामाजिक और आर्थिक स्थिति अलग-अलग रहनी चाहिए
- सबसे ‘शुद्ध’ ब्राह्मणों को धन इकट्ठा नहीं करना चाहिए
- राजा (क्षत्रीय) के पास सत्ता थी पर धार्मिक दृष्टि से वे ब्राह्मण से नीचे थे
असल में क्या हुआ
- सामाजिक (जाति) स्थिति और आर्थिक स्थिति अक्सर साथ-साथ चलीं
- ‘उच्च’ जातियाँ प्रायः उच्च आर्थिक स्थिति की और ‘निम्न’ जातियाँ प्रायः निम्न आर्थिक स्थिति की रहीं
- सौ या पचास वर्ष पहले की तुलना में जाति और आर्थिक स्थिति का सहसंबंध कमज़ोर हुआ है (आज हर जाति में अमीर और गरीब हैं), पर वृहत स्तर पर जाति-वर्ग का परस्पर संबंध अभी भी कायम है
दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद व्यवस्था वैसे ही प्रजाति के आधार पर
समाज को श्रेणीबद्ध करती थी जैसे भारत में जाति व्यवस्था करती है। हर सात
दक्षिण अफ्रीकी में से सिर्फ़ एक यूरोपीय वंश का था, फिर भी अल्पसंख्यक
श्वेतों के पास शक्ति और संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा था। रंगभेद 1948 में
कानून बना: इसने बहुसंख्यक अश्वेतों को नागरिकता और ज़मीन के मालिकाना
हक़ से वंचित किया, मिश्रित विवाह पर रोक लगाई, और लाखों अश्वेतों को
‘गृहक्षेत्रों’ में धकेल दिया जो पूरे देश की सिर्फ़ 14% ज़मीन में देश की
लगभग 80% आबादी को समेटे हुए थे। अश्वेतों की औसत आय श्वेतों की आय का सिर्फ़
एक-चौथाई थी। अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस और नेल्सन मंडेला के
नेतृत्व में अश्वेतों ने दशकों तक जेल, यातना और हत्याओं के बावजूद संघर्ष
किया, और आख़िरकार 1994 में सरकार बनाई। 20 अप्रैल 1964 को, रिवोनिया
जाँच के दौरान, मंडेला ने कहा: “मैंने श्वेतों के प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष
किया है तथा मैंने अश्वेतों के प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष किया है। मैंने
प्रजातंत्र के आदर्श तथा एक आज़ाद समाज का सपना संजोया है जहाँ सभी लोग एक
दूसरे से सामंजस्य स्थापित करते हुए एक समान अवसर का उपयोग करते हुए रहेंगे।
… परंतु यदि आवश्यकता हुई तो इस आदर्श की खातिर मैं मरने के लिए भी तैयार
हूँ।”
जाति और समुदाय के अनुसार गरीबी और संपन्नता
किताब अपनी दो सरकारी आँकड़ों वाली तालिकाएँ देती है। संख्याएँ नहीं,
पैटर्न याद रखें: अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति हर जगह राष्ट्रीय औसत से
पीछे हैं।
| समूह | ग्रामीण, गरीबी रेखा से नीचे (%) | नगरीय, गरीबी रेखा से नीचे (%) |
|---|---|---|
| अनुसूचित जनजातियाँ | 45.3 | 24.1 |
| अनुसूचित जातियाँ | 31.5 | 21.7 |
| अन्य पिछड़े वर्ग | 22.7 | 15.4 |
| अगड़ी जातियाँ | 15.5 | 8.1 |
| मुस्लिम | 26.9 | 22.7 |
| हिंदू | 25.6 | 12.1 |
| ईसाई | 22.2 | 5.5 |
| सिख | 6.2 | 5.0 |
| सभी समूह | 25.4 | 13.7 |
सारणी 1: गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या का प्रतिशत, 2011-12
(ग्रामीण रेखा: 816 रुपये या कम प्रति व्यक्ति प्रतिमाह; नगरीय: 1000 रुपये या
कम)। स्रोत: पनगड़िया एवं मोरे, 2013। पुस्तक का नोट: ‘उच्च जातियाँ’ अर्थात्
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग नहीं।
| समूह | ग्रामीण, संपन्न (%) | नगरीय, संपन्न (%) |
|---|---|---|
| अनुसूचित जनजातियाँ | 1.4 | 1.8 |
| अनुसूचित जातियाँ | 1.7 | 0.8 |
| अन्य पिछड़े वर्ग | 3.3 | 2.0 |
| मुस्लिम | 2.0 | 1.6 |
| हिंदू | 8.6 | 8.2 |
| ईसाई | 18.9 | 17.0 |
| सिख | 31.7 | 15.1 |
| अन्य उच्च जातियाँ | 17.9 | 14.4 |
| सभी समूह | 4.3 | 4.5 |
सारणी 2: समृद्ध जनसंख्या का प्रतिशत, 1999-2000 (ग्रामीण:
1000 रुपये या अधिक प्रति व्यक्ति प्रतिमाह; नगरीय: 2000 रुपये या अधिक)। पुस्तक
का नोट: ‘उच्च जातियाँ’ अर्थात् अनुसूचित जातियाँ/अनुसूचित जनजातियाँ/अन्य पिछड़ा
वर्ग नहीं।
इस अध्याय में समाचारों वाली “आज की” गरीबी दर मत लिखें। ये किताब के
अपने आँकड़े हैं, 2011-12 और 1999-2000 के। किताब के आँकड़े किताब के साल के
साथ लिखें, कोई अपडेटेड आँकड़ा नहीं।
2.2 अस्पृश्यता
अस्पृश्यता (आम बोलचाल में ‘छुआछूत’) जाति-व्यवस्था का एक अत्यंत घृणित एवं दूषित पहलू है, जो
शुद्धता-अशुद्धता के पैमाने पर सबसे नीचे मानी जाने वाली जातियों पर सख़्त
सामाजिक प्रतिबंध लगाता है। इन्हें इतना ‘अशुद्ध’ माना जाता है कि इनका
स्पर्श, और कुछ क्षेत्रों में तो केवल इनकी परछाईं भी (यानी ‘दूर से
अशुद्धता’), दूसरों को अपवित्र कर देती है।
अपवर्जन (बहिष्कार)
साझा जल स्रोतों या सामूहिक पूजा-उत्सवों में शामिल होने से रोक दिया
जाना।
अनादर एवं अधीनता
रोज़मर्रा के जीवन में लगातार निम्न समझा जाना।
शोषण
तरह-तरह का आर्थिक शोषण: आमतौर पर ‘बेगार’, जिसके लिए कोई पैसा नहीं या
बहुत कम मज़दूरी दी जाती है, और कभी-कभी संपत्ति छीन लेना।
अस्पृश्यता को समझने के लिए तीनों आयाम बराबर ज़रूरी हैं। बाक़ी ‘स्पृश्य’
(यानी ‘छुए जाने योग्य’ मानी जाने वाली) निम्न जातियाँ भी कुछ हद तक अधीनता और शोषण झेलती हैं,
पर उन्हें ‘अछूतों’ जैसा चरम बहिष्कार नहीं झेलना पड़ता। अस्पृश्यता पूरे
भारत में मिलती है, हालाँकि इसका
रूप और तीव्रता क्षेत्र के हिसाब से बदलती है।
‘दलित’ शब्द डॉ. अंबेडकर ने नहीं गढ़ा, और वे इसे बहुत इस्तेमाल भी
नहीं करते थे, भले ही यह उनके दर्शन और आंदोलन से गहराई से जुड़ा है। इसकी
रचना का श्रेय उन्हें मत दें।
2.3 जाति और जनजाति भेदभाव के खिलाफ़ राज्य व गैर-राज्य पहलें
अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष कार्यक्रम आज़ादी से पहले से चले आ
रहे हैं।
| साल | कानून / कदम | क्या हुआ |
|---|---|---|
| 1850 | जातीय निर्योग्यता निवारण अधिनियम | केवल धर्म या जाति बदलने के कारण नागरिक के अधिकार कम करने से रोका; सरकारी स्कूलों में दलितों को भर्ती करने की इजाज़त देने के लिए बनाया गया |
| 1935 | ‘अनुसूचियाँ’ (Schedules) | ब्रिटिश भारत सरकार विशेष व्यवहार के योग्य जातियों-जनजातियों की सूची बनाती है |
| 1950 | भारत का संविधान | अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और आरक्षण लागू करता है |
| 1989 | अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम | दलितों और आदिवासियों के खिलाफ़ हिंसा-अपमान की सज़ा को और सख़्त बनाता है |
| 2005 / 2006 | संविधान (93वाँ संशोधन) अधिनियम | 23 जनवरी 2006 से लागू; उच्च शिक्षा में OBC आरक्षण लाता है |
संयोगवश, सबसे पुराना कानून (1850) और सबसे नया संशोधन (2006), दोनों
शिक्षा से संबंधित थे। पुस्तक कहती है कि इस विषय पर बार-बार अनेक
कानून बनाए गए, जो इस तथ्य के प्रमाण हैं कि अकेला कानून ही किसी सामाजिक
कुप्रथा को नहीं मिटा सकता।
राज्यसभा), सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा संस्थानों की सीटों पर लागू होता है।
OBC के लिए यह अनुपात अलग तरीके से तय होता है।
कोई भी सामाजिक समूह, चाहे कितना भी कमज़ोर हो, सिर्फ़ शिकार नहीं होता:
दलितों ने राजनीतिक, आंदोलनकारी और सांस्कृतिक मोर्चों पर लगातार संगठित होकर
संघर्ष किया है।
अध्याय के बॉक्स 5.2 में प्रसिद्ध मराठी दलित कवि दया पवार की एक
छोटी कविता “शहर” दी गई है। इसमें एक दिन कोई बीसवीं सदी के एक शहर को खोदता है और
वहाँ लिखा पाता है: “यह पानी का नलका सभी जातियों और धर्मों के लिए खुला है”,
और कविता पूछती है कि तो फिर लोग इसे मशीन युग क्यों कहते हैं? यह तो बीसवीं
सदी का ‘पाषाण युग’ प्रतीत होता है।
2.4 अन्य पिछड़े वर्ग (OBC)
अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) संविधान की वह श्रेणी है जिसे “सामाजिक और
शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग” कहा गया है, जो अनुसूचित जाति-जनजाति से अलग
हैं पर सामाजिक नुकसान झेलते हैं। ‘जनजाति’ की तरह इन्हें भी नकारात्मक रूप
से परिभाषित किया जाता है: न ‘अगड़ी’ जातियाँ, न दलित। चूँकि जाति हिंदू
धर्म के अलावा दूसरे धर्मों में भी है, इसलिए OBC में दूसरे धर्मों के पिछड़े
वर्ग भी शामिल हैं, जिससे यह दलितों या आदिवासियों से कहीं ज़्यादा विविध
समूह बन जाता है।
उच्च स्तर के OBC
- ज़्यादातर भूमिधर जातियाँ
- कई क्षेत्रों में ग्रामीण समाज में दबदबा
निम्न स्तर के OBC
- बेहद ग़रीब और वंचित
- आर्थिक-सामाजिक स्थिति में अक्सर दलितों जैसे
- शहरी OBC की हालत SC/ST के क़रीब, अगड़ी जातियों से बहुत दूर
भूधारण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व (जहाँ उनके विधायकों तथा सांसदों की
संख्या काफ़ी बढ़ी है) को छोड़कर बाक़ी सभी कार्यक्षेत्रों में OBC का
प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है। दोनों अपवाद साथ में याद रखें।
2.5 आदिवासी संघर्ष
अनुसूचित जनजातियाँ भी, अनुसूचित जातियों की तरह, संविधान द्वारा मान्यता
प्राप्त हैं। ‘जन’ या जनजातियों को लंबे समय से ‘जंगल के लोग’ माना जाता रहा
है, पर इनका अलगाव कभी पूरा नहीं रहा: हिंदू समाज से लंबे और गहरे संपर्क ने
‘जनजाति’ और ‘जाति’ की सीमा को धुंधला कर दिया है। पूर्वोत्तर राज्यों को
छोड़कर आज भारत में ऐसा कोई इलाका नहीं जहाँ सिर्फ़ जनजातीय लोग रहते हों;
सिर्फ़ जनजातीय बहुलता वाले इलाके हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से
बहुत-से गैर-जनजातीय लोग मध्य भारत के जनजातीय जिलों में जा बसे हैं, और उन्हीं
जिलों के जनजातीय लोग रोज़गार की तलाश में बागानों, खानों, कारखानों आदि में
चले गए हैं। जिन इलाकों में जनजातीय आबादी घनी है, वहाँ आमतौर पर उनकी आर्थिक और
सामाजिक हालत गैर-जनजातीय लोगों की अपेक्षा कहीं बदतर है।
| बाँध परियोजना | नदी | क्षेत्र |
|---|---|---|
| सरदार सरोवर बाँध | नर्मदा | पश्चिमी भारत |
| पोलावरम बाँध | गोदावरी | आंध्र प्रदेश |
दोनों परियोजनाओं ने सैकड़ों हज़ारों आदिवासियों को उनके मूल निवास
स्थान से विस्थापित किया। (यहाँ कोई नक़्शा नहीं दिया गया है: परियोजना, नदी
और क्षेत्र याद रखने के लिए यह तालिका काफ़ी है।)
‘आदिवासी’ शब्द का मतलब है ‘मूल निवासी’। ‘दलित’ शब्द की तरह यह भी
राजनीतिक जागरूकता और अधिकारों के दावे का भाव रखता है; इसे 1930 के दशक में
औपनिवेशिक सरकार, बाहरी बसने वालों और साहूकारों की घुसपैठ के खिलाफ़ संघर्ष के
दौरान गढ़ा गया था। जनजातीय समूह
इन बाहरी लोगों को ‘डिक्कू’ कहते हैं; दोनों शब्द उत्तर में हूबहू
लिखने लायक़ हैं।
आज़ादी के बाद आदिवासी आंदोलनों की सर्वाधिक उल्लेखनीय उपलब्धियों में से
एक है दो अलग राज्यों का बनना: झारखंड (बिहार से अलग होकर) और छत्तीसगढ़ (मध्य
प्रदेश से अलग होकर)। दलितों के विपरीत, जो पूरे देश में फैले हुए हैं,
आदिवासी सटे हुए (संलग्न) इलाकों में केंद्रित थे, इसलिए वे अपने लिए अलग
राज्य की माँग कर सके।
3स्त्रियों की समानता और अधिकारों के लिए संघर्ष
पुरुष और स्त्री के बीच जैविक अंतर होने की वजह से लिंग-आधारित विषमता
‘स्वाभाविक’ लग सकती है। पर कोई जैविक कारण यह नहीं बताता कि इतनी कम
महिलाएँ सत्ता के पदों पर क्यों हैं, या ज़्यादातर समाजों में महिलाओं को
पारिवारिक संपत्ति में कम हिस्सा क्यों मिलता है। विद्वानों ने दर्शा दिया है कि ये असमानताएँ प्राकृतिक
नहीं, सामाजिक हैं, और इसका प्रबलतम तर्क उन समाजों से आता है जो ‘सामान्य’
पैटर्न से अलग थे: मातृवंशीय समाज वह
है जहाँ परिवार की वंशावली और संपत्ति माँ की तरफ़ से चलती है, पिता की तरफ़
से नहीं। केरल के नायर पहले मातृवंशीय समाज थे, और मेघालय के
खासी आज भी हैं, जहाँ महिलाएँ परिवार की मुखिया और संपत्ति की
वारिस होती हैं। इसलिए जाति की तरह, लिंग-आधारित विषमता भी सामाजिक है,
स्वाभाविक नहीं।
3.1 उन्नीसवीं सदी के सुधार आंदोलन
महिलाओं का मुद्दा आधुनिक भारत में उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्गीय सामाजिक
सुधार आंदोलनों के साथ उठा, जिनके अगुवा ज़्यादातर नए पश्चिमी-शिक्षित
भारतीय मध्यवर्ग से थे, जो आधुनिक पश्चिमी लोकतांत्रिक विचारों और अपनी
परंपराओं, दोनों से प्रेरित थे।

विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में तर्क देने के लिए रानाडे ने अंग्रेज़
पादरी बिशप जोसेफ़ बटलर की किताबों का भी सहारा लिया, जो 1860 के दशक में
मुंबई विश्वविद्यालय के नैतिक दर्शनशास्त्र पाठ्यक्रम का हिस्सा थीं, साथ ही
अपनी खुद की किताब का भी, जिसमें पुनर्विवाह का शास्त्रीय आधार बताया गया
था।
यह मत लिखें कि स्त्रियों के अधिकारों के लिए समाज सुधार की लड़ाई “पूर्णरूप
से पुरुष सुधारकों द्वारा ही लड़ी गई” थी, या यह कि स्त्रियों की समानता के विचार
“बाहर से आयातित” थे। पुस्तक स्त्रियों द्वारा लिखी दो पुस्तकों के उद्धरणों से
दिखाती है कि ये दोनों धारणाएँ ग़लत हैं।
स्त्री पुरुष तुलना (1882)
महाराष्ट्रीय गृहिणी ताराबाई शिंदे द्वारा लिखी गई, जो एक ऐसे
दोहरे मापदंड के खिलाफ़ विरोध था जिसमें एक युवा ब्राह्मण विधवा को
नाजायज़ बच्चे की हत्या के लिए मौत की सज़ा दी गई, जबकि बच्चे के पिता को
कोई सज़ा नहीं मिली।
सुल्ताना का सपना (1905)
संपन्न बंगाली मुस्लिम परिवार की बेगम रुकैया सखावत हुसैन ने
अंग्रेज़ी में लिखा; संभवतः भारत में विज्ञान कथा लेखन का प्रारंभिक नमूना, और विश्वभर में किसी महिला लेखिका द्वारा रचित प्रथम कृतियों का उदाहरण। इसमें
‘लेडीलैंड’ नाम की जगह है जहाँ लिंग भूमिकाएँ उलट जाती हैं: पुरुष पर्दे
में घर के भीतर रहते हैं, और महिलाएँ वैज्ञानिक होकर उड़ने वाली
‘एयर-कार’ जैसी चीज़ें बनाती हैं।
3.2 आज़ादी की लड़ाई से इक्कीसवीं सदी तक
प्रारंभिक नारी-अधिकारवादी दृष्टिकोण के साथ-साथ, बीसवीं सदी के प्रारंभिक
वर्षों में अखिल भारतीय एवं स्थानीय स्तरों पर अनेक नारी संगठन उभर आए, और फिर
स्त्रियों का राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेना शुरू हो गया। स्त्रियों के अधिकार
राष्ट्रवादी परिकल्पना के अभिन्न अंग थे, जैसा 1931 की कराची घोषणा दिखाती है।
2. धर्म, जाति, पंथ या लिंग के कारण किसी नागरिक को सार्वजनिक रोज़गार, शक्ति या सम्मान का पद दिए जाने अथवा कोई भी व्यापार या धंधा किए जाने के संबंध में निर्योग्य नहीं ठहराया जाएगा
3. मताधिकार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित होगा
4. महिलाओं को वोट देने, प्रतिनिधित्व करने और सार्वजनिक पद पाने का अधिकार होगा
4अन्यथा सक्षम व्यक्तियों का संघर्ष
अन्यथा सक्षम लोग केवल शारीरिक या मानसिक अक्षमता की वजह से ‘असक्षम’ नहीं
होते, बल्कि इसलिए भी क्योंकि समाज ही उनकी ज़रूरतों को ध्यान में रखकर नहीं
बनाया गया। दलित, आदिवासी या महिलाओं के संघर्ष के मुक़ाबले, अन्यथा सक्षम
व्यक्तियों के अधिकारों को बहुत हाल ही में मान्यता मिली है, जबकि असक्षम
लोग हर काल और हर समाज में रहे हैं।
“मैं एक अदृश्य व्यक्ति हूँ, समझे, केवल इसलिए कि लोग मुझे देखना ही नहीं
चाहते। आप सर्कस के तमाशों में कभी-कभी धड़हीन सिर देखा करते हैं, मेरी स्थिति
भी लगभग वैसी ही है। ऐसा लगता है मानो मैं कड़े विद्रूपकारी दर्पणों से घिरा
हूँ। जब लोग मेरे पास आते हैं तो मेरा परिवेश ही देखते हैं जो उनकी अपनी
कल्पनाओं से बना है; दरअसल, वे मुझे छोड़कर बाकी सब कुछ देख सकते हैं।”
राल्फ़ एलिसन, इनविज़िबल मैन (1952:3), जिसकी तुलना विकलांगता विद्वान अनीता घई अन्यथा सक्षम लोगों की अदृश्य स्थिति से करती हैं
4.1 समाज असक्षमता को कैसे देखता है, और यह क्यों ग़लत है
जैविक कमज़ोरी
निर्योग्यता/अक्षमता को एक जैविक कमज़ोरी माना जाता है।
हर समस्या अक्षमता की वजह से
व्यक्ति की कोई भी परेशानी सीधे उसकी अक्षमता से जोड़ दी जाती है।
व्यक्ति को ‘पीड़ित’ माना जाना
‘बेचारा’ जैसे शब्द इस पीड़ित वाली छवि को और पक्का करते हैं।
व्यक्ति की अपनी सोच से जोड़ना
यह माना जाता है कि निर्योग्यता व्यक्ति के अपने प्रत्यक्ष ज्ञान (आत्म-बोध) से जुड़ी है।
सहायता की ज़रूरत
निर्योग्यता का मूल भाव ही यह दर्शा देता है कि निर्योग्य व्यक्तियों को
सहायता की आवश्यकता है।
भारत में ‘अक्षमता’, ‘अपंग’, ‘अंधा’ और ‘बहरा’ जैसे शब्द अक्सर गाली की
तरह इस्तेमाल होते हैं, और यह सांस्कृतिक धारणा कि असक्षमता पिछले जन्म के
कर्मों का फल है, इसे व्यक्ति का स्थायी गुण मानकर उसे कोई राहत नहीं देती।
‘मानसिक रूप से चुनौतीग्रस्त’, ‘दृष्टि बाधित’ और ‘शारीरिक रूप से बाधित’
जैसे शब्दों का प्रयोग अब पुराने घिसे-पिटे नकारात्मक शब्दों, जैसे ‘मंद बुद्धि’,
‘अपंग’ अथवा ‘लंगड़ा-लूला’, के स्थान पर किया जाने लगा है।
“हमें तो उन भव्य भवनों ने ‘असक्षम’ बनाया है जो हमारे प्रवेश के लिए नहीं
बने हैं, जिनमें प्रवेश करने की हमें इजाज़त नहीं है और इसी के परिणामस्वरूप हम
शिक्षा, रोज़गार पाने के अपने अवसरों, सामाजिक जीवन आदि के संबंध में आगे
अधिकाधिक असक्षम होते जाते हैं। असक्षमता तो समाज की संरचना या विचारधारा में
ही निहित है, व्यक्ति की शारीरिक दशा में नहीं।” (ब्रिसेनडेन,
1986) विकलांग अपनी जैविक अक्षमता के कारण विकलांग नहीं होते, बल्कि
समाज ही उन्हें ऐसा बनाता है।
4.2 असक्षमता और गरीबी
4.3 सबूत क्या कहते हैं
जनगणना 2011 ने ‘घरेलू अनुसूची’ (यानी हर घर से जानकारी लेने वाला
फॉर्म) के ज़रिए सभी तरह के घरों से असक्षमता का आँकड़ा जुटाया, नागरिक समाज
से सलाह लेने और परीक्षण के बाद।
इसने आठ तरह की असक्षमताएँ दर्ज करने की कोशिश की, जबकि जनगणना 2001 में
सिर्फ़ पाँच थीं, एक फिल्टर प्रश्न जोड़ा गया, और जनगणना अनुसूची में
विकलांगता वाले प्रश्न का स्थान बदल दिया गया। प्रश्न ऐसे बनाए गए कि विकलांग
व्यक्ति अधिनियम, 1995 और नेशनल ट्रस्ट अधिनियम, 1999 में सूचीबद्ध सभी प्रकार
की विकलांगताएँ आ जाएँ।
एक वरिष्ठ न्यायविद ने उच्च न्यायपालिका की इस नीति की आलोचना की कि वह
अपंग व्यक्तियों को जज के पद के लिए विचार ही नहीं करती, और बताया कि हाई
कोर्ट की इमारतों में सीढ़ियाँ तो हैं पर रैंप नहीं, जबकि सिटी सिविल कोर्ट,
जहाँ दुर्घटना के मामलों में घायल लोग पेश होते हैं, उससे भी बदतर हालत में
है।
जिस देश में 5 से 14 साल की उम्र के आधे बच्चे स्कूल से बाहर हों, वहाँ
असक्षम बच्चों की शिक्षा के लिए मुश्किल से ही जगह बचती है। अनीता घई बताती
हैं कि ग्रामीण माता-पिता शायद कुएँ से पानी लाने का बेहतर तरीका और उन्नत कृषि
सुविधाएँ अधिक पसंद करेंगे, जबकि शहरी गंदी बस्ती के माता-पिता चाहते हैं कि
शिक्षा काम या रोज़गार की दुनिया से जुड़ी हो।
असक्षमता को अब भी मुख्यधारा की शिक्षा नीति में पूरी जगह नहीं मिली है:
स्कूल अक्सर दो अलग धाराएँ चलाते हैं, एक असक्षम बच्चों के लिए और एक बाक़ी
सबके लिए, जो समस्या सुलझाने की बजाय उसे और अलग-थलग कर देता है। फ़िल्म
‘इक़बाल’, जिसका नायक सुन-बोल नहीं सकता पर क्रिकेट का गेंदबाज़ बनता
है, यह दिखाने के लिए अच्छी मिसाल है कि ‘अन्यथा सक्षम’ होने के कितने अलग-अलग
मतलब हो सकते हैं।
समाजशास्त्र में विषमता को पहले वर्ग के ज़रिए, फिर प्रजाति
के ज़रिए, और हाल में लिंग के ज़रिए समझा गया; भारतीय संदर्भ में
जाति और जनजाति को अभी हाल में ही उतना ध्यान मिलना शुरू हुआ है जितना उन्हें
मिलना चाहिए। किताब यह भी इशारा करती है कि धर्म से जुड़ी विषमता, या दो
श्रेणियों के मेल (जैसे जाति और धर्म) पर अभी और ध्यान देने की ज़रूरत है,
और इसकी मिसाल के तौर पर मुस्लिम समुदाय पर बनी सच्चर समिति रिपोर्ट
(मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर सरकार की अध्ययन रिपोर्ट) का
ज़िक्र करती है।
- सामाजिक विषमता और बहिष्कार व्यक्ति की नहीं, समूह की बात है, और एक तय पैटर्न में चलती है
- बोर्द्यू की तीन पूँजियाँ (आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक) एक-दूसरे में बदल सकती हैं
- पूर्वाग्रह मनोवृत्ति और विचार है, भेदभाव दूसरे समूह के साथ किया गया व्यवहार है, और सामाजिक अपवर्जन दुर्घटना नहीं, व्यवस्थित है
- अस्पृश्यता के तीन समान रूप से महत्त्वपूर्ण आयाम: अपवर्जन, अनादर एवं अधीनता, शोषण
- 1850 का कानून और 2006 का संशोधन, दोनों शिक्षा से संबंधित थे; इस विषय पर बार-बार कानून बनना प्रमाण है कि अकेला कानून किसी सामाजिक कुप्रथा को नहीं मिटा सकता
- OBC संविधान की “सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग” श्रेणी है; काका कालेलकर (1953) की उपेक्षा हुई, मंडल रिपोर्ट 1990 में लागू हुई
- आदिवासी ज़मीन और जंगल का नुक़सान: पहले औपनिवेशिक नीति, फिर 1947 के बाद औद्योगीकरण (‘आंतरिक उपनिवेशवाद’); झारखंड और छत्तीसगढ़ का अलग राज्य बनना सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है
- नारी आंदोलन: उन्नीसवीं सदी में परंपरा (सती, विधवा पुनर्विवाह), 1970 में मीडिया-विकास, 1980 में कानून, इक्कीसवीं सदी में लिंगानुपात
- असक्षमता भी सामाजिक है: ब्रिसेनडेन के अनुसार असक्षमता समाज की संरचना या विचारधारा में निहित है, व्यक्ति की शारीरिक दशा में नहीं
- क्या मैं बोर्द्यू की तीनों पूँजियाँ नाम व उदाहरण सहित बता सकता हूँ?
- क्या मैं सामाजिक स्तरीकरण के तीनों सिद्धांत बता सकता हूँ?
- क्या मैं पूर्वाग्रह और भेदभाव में फ़र्क़ एक-एक पंक्ति में समझा सकता हूँ?
- क्या मैं अस्पृश्यता के तीन आयाम और एक कानून उसके साल सहित बता सकता हूँ?
- क्या मैं समझा सकता हूँ कि OBC को ‘विविध’ श्रेणी क्यों कहा जाता है?
- क्या मैं दोनों बाँध परियोजनाओं के नाम उनकी नदियों सहित बता सकता हूँ?
- क्या मैं उन्नीसवीं या बीसवीं सदी की दो महिला लेखिकाओं और उनकी किताबों के नाम बता सकता हूँ?
- क्या मैं ब्रिसेनडेन के तर्क से समझा सकता हूँ कि असक्षमता जितनी शारीरिक है उतनी ही सामाजिक भी?