नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।
- समाजशास्त्री बाज़ार को अर्थशास्त्रियों से अलग तरीके से क्यों देखते हैं, और अर्थव्यवस्था के समाज में ‘रची-बसी’ होने का क्या मतलब है
- साप्ताहिक ग्रामीण बाज़ार (हाट) एक सामाजिक संस्था के रूप में कैसे काम करता है, न कि सिर्फ़ आर्थिक
- जाति और समुदाय व्यापार को कैसे आकार देते हैं: नाकरट्टार, मारवाड़ी और अन्य व्यापारिक समुदाय
- मार्क्स की पूँजीवाद की समझ, और असली भारतीय उदाहरणों से ‘पण्यीकरण’ का अर्थ
- वेबर का ‘प्रतिष्ठा के प्रतीक’ का विचार, और लोग चीज़ें उनके उपयोग से ज़्यादा कीमत पर क्यों खरीदते हैं
- उदारीकरण और भूमंडलीकरण ने भारतीय बाज़ारों में क्या बदला, और यह बदलाव अच्छा रहा या बुरा, इस पर बहस
1 ‘बाज़ार’ का मतलब क्या है
रोज़मर्रा की भाषा में ‘बाज़ार’ के कई अलग-अलग मतलब हो सकते हैं। नीचे दिए गए
चारों अर्थ किसी न किसी खास चीज़ की ओर इशारा करते हैं, कोई ऐसा बाज़ार जहाँ आप
खुद जा सकें या किसी खास तरह का व्यापार।
1.1 रोज़मर्रा के चार अर्थ
एक भौतिक स्थान
रेलवे स्टेशन के पास का बाज़ार, फलों का बाज़ार, थोक बाज़ार।
लोगों का जमावड़ा
स्थान नहीं, खरीददार और विक्रेता खुद: एक साप्ताहिक सब्ज़ी बाज़ार हफ़्ते के हर दिन अलग गाँव में लग सकता है।
व्यापार की एक श्रेणी
‘कारों का बाज़ार’ या ‘बने-बनाए कपड़ों का बाज़ार’: पूरा एक कारोबार, एक दुकान नहीं।
किसी चीज़ की माँग
‘कंप्यूटर विशेषज्ञों का बाज़ार’: किसी उत्पाद या हुनर की कितनी माँग है।
पर समाजशास्त्र ‘बाज़ार’ को एक बहुत बड़े, व्यापक अर्थ में भी लेता है: कोई
खास जगह, जमावड़ा या व्यापार दिमाग में नहीं, बल्कि इस अर्थ में ‘बाज़ार’
लगभग ‘अर्थव्यवस्था’ के बराबर है: समाज की तमाम आर्थिक क्रियाओं और
संस्थाओं का पूरा दायरा।
समाजशास्त्रीय अर्थ में बाज़ार सिर्फ़ क्रय-विक्रय की जगह नहीं है, यह
उन तमाम संस्थाओं और सामाजिक संबंधों का पूरा तंत्र है जिनके ज़रिए वस्तुएँ,
सेवाएँ और श्रम का आदान-प्रदान होता है।
हम बाज़ार को एक आर्थिक संस्था मानने के आदी हैं, पर यह एक सामाजिक
संस्था भी है, बिल्कुल जाति, जनजाति या परिवार जैसी।
इस अध्याय का मुख्य तर्क
2 बाज़ार और अर्थव्यवस्था का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य
अर्थशास्त्र यह पढ़ता है कि आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बाज़ार कैसे
काम करता है: मूल्य कैसे तय होते हैं, कोई निवेश क्या असर डालेगा, लोग खर्च
या बचत क्यों करते हैं। समाजशास्त्र एक अलग सवाल पूछता है: बाज़ार को कौन-सी
बड़ी सामाजिक ताकतें आकार देती हैं?
2.1 एडम स्मिथ और ‘खुद-ब-खुद चलने वाला’ बाज़ार
18वीं सदी के इंग्लैंड में शुरुआती अर्थशास्त्र को ‘राजनीतिक
अर्थव्यवस्था’ कहा जाता था। उस दौर के सबसे चर्चित विचारक एडम स्मिथ
(1723-90) थे, जिनकी किताब द वेल्थ ऑफ़ नेशन्स उस वक्त उभर रही
बाज़ारी अर्थव्यवस्था को समझाने की कोशिश करती है। स्मिथ का तर्क था कि बाज़ारी
अर्थव्यवस्था दरअसल लाखों-करोड़ों व्यक्तिगत सौदों की एक लंबी कड़ी है, जो
खुद-ब-खुद एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था बना देती है, भले ही इसमें शामिल कोई
भी व्यक्ति ऐसी व्यवस्था बनाने का इरादा न रखता हो।
आधुनिक अर्थशास्त्र स्मिथ के विचारों से ही विकसित हुआ और अर्थव्यवस्था को
समाज से अलग, अपने ही नियमों से चलने वाला हिस्सा मानता है। समाजशास्त्री इसका
उल्टा रास्ता अपनाते हैं।
रची-बसी अर्थव्यवस्था (embeddedness) यह समाजशास्त्रीय विचार है कि
अर्थव्यवस्थाएँ अलग, स्वयं-निर्भर व्यवस्थाएँ नहीं हैं: ये समाज में ‘रची-बसी’
हैं। बाज़ार विशेष सांस्कृतिक तरीकों से बनते हैं, अक्सर खास सामाजिक समूहों या
वर्गों द्वारा नियंत्रित होते हैं, और दूसरी संस्थाओं व सामाजिक ढाँचों से गहरे
जुड़े होते हैं।
NCERT की किताब मूल पाठ में ‘रची-बसी’ शब्द के लिए किसी एक समाजशास्त्री का
नाम नहीं लेती: बस इतना कहती है कि समाजशास्त्री अक्सर इसे इस तरह बताते हैं।
इस विचार से सबसे जुड़ा नाम, कार्ल पॉलनी, इस अध्याय की संदर्भ-ग्रंथ सूची में
ही आता है, मूल पाठ में नहीं। इसलिए ‘रची-बसी’ शब्द और विचार याद रखें, पर यह न
मानें कि किताब आपसे पॉलनी का नाम लिखवाना चाहती है।
यह अध्याय ‘रची-बसी’ अर्थव्यवस्था को दो असली उदाहरणों से समझाता है: एक
साप्ताहिक आदिवासी बाज़ार, और एक ‘पारंपरिक व्यापारिक समुदाय’ का अपना
लेन-देन तंत्र।

बड़ी अर्थव्यवस्था के भीतर बैठा है, और अर्थव्यवस्था खुद समाज की जाति, नातेदारी
और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के भीतर। बाज़ार को इस तस्वीर से अलग कर दें तो वह भारत
में जैसे असल में काम करता है, वैसे काम करना बंद कर देगा।
2.2 एक साप्ताहिक आदिवासी बाज़ार: धोराई, बस्तर
अधिकांश कृषक समाजों में आवधिक बाज़ार, यानी साप्ताहिक या उससे कम
बार लगने वाले बाज़ार, सामाजिक और आर्थिक जीवन का केंद्र होते हैं। एक साप्ताहिक
बाज़ार (हाट) आस-पास के गाँवों के लोगों को इकट्ठा करता है, जो खेती या
जंगल की उपज बेचने और अपने गाँव में न मिलने वाली बनी-बनाई चीज़ें खरीदने आते
हैं। यह बाहर से आए व्यापारियों, साहूकारों, मसखरों और ज्योतिषियों को भी
आकर्षित करता है।
हाट एक आवधिक (आमतौर पर साप्ताहिक) ग्रामीण बाज़ार है जो स्थानीय
लोगों और बाहरी व्यापारियों को एक साथ लाता है: दूर-दराज़ और जंगली इलाकों में
यह अक्सर आर्थिक आदान-प्रदान और सामाजिक जीवन, दोनों की मुख्य संस्था होती है।
पहाड़ी, जंगली और आदिवासी इलाकों में, जहाँ बस्तियाँ दूर-दूर हैं और सड़कें
कमज़ोर हैं, हाट सिर्फ़ व्यापार की जगह नहीं रहता। बहुत से लोगों के लिए हाट आने
की मुख्य वजह सामाजिक होती है: रिश्तेदारों से मिलना, शादी तय करना, गप्पें
मारना।
बस्तर जिले (गोंड आदिवासी समुदाय का घर) के एक साप्ताहिक बाज़ार का अध्ययन
ठीक यही पैटर्न दिखाता है। बाज़ार में खरीददार मुख्यतः आदिवासी होते हैं;
विक्रेता मुख्यतः जाति-प्रधान हिंदू व्यापारी। वन विभाग के लिए काम करने
वाले आदिवासियों से व्यापार करने वन अधिकारी भी आते हैं। यहाँ विनिमय होने वाली
चीज़ों में बनी-बनाई वस्तुएँ (गहने, बर्तन, चाकू), गैर-स्थानीय खाद्य पदार्थ
(नमक, हल्दी), स्थानीय खेतिहर उपज, और जंगल के उत्पाद (इमली, तिलहन) शामिल
हैं। आदिवासी जंगल और खेती की उपज तथा मज़दूरी से जो पैसा कमाते हैं, वह
ज़्यादातर हाट में मिलने वाली सस्ती पायलों, गहनों और बने-बनाए कपड़ों पर खर्च
होता है।
“जब बाज़ार नहीं लगता, उन दिनों धोराई एक उँघता हुआ गाँव है… पर बाज़ार
वाले दिन वो किसी और जगह में तब्दील हो जाता है।”
बॉक्स 4.1, उत्तरी बस्तर, छत्तीसगढ़ के बाज़ार गाँव धोराई का वर्णन (गेल 1982)
2.3 पूर्व-उपनिवेशी और उपनिवेशी भारत में जाति-आधारित व्यापार
भारतीय आर्थिक इतिहास के पुराने विवरण मानते थे कि भारत की अर्थव्यवस्था और
समाज अपरिवर्तनशील थे, और गाँव आपस में गैर-बाज़ारी विनिमय पर टिके स्व-निर्भर
समुदाय थे। हालिया ऐतिहासिक शोध ने इस मत को बदल दिया है।
पुराना मत
- भारत = प्राचीन, स्व-निर्भर ग्रामीण समुदाय
- अर्थव्यवस्थाएँ मुख्यतः गैर-बाज़ारी विनिमय पर आधारित
- आर्थिक बदलाव सिर्फ़ उपनिवेशवाद से शुरू हुआ
नया मत (हालिया शोध)
- भारत की अर्थव्यवस्था पूर्व-उपनिवेशी दौर में ही व्यापक रूप से मौद्रीकृत थी
- जजमानी जैसी गैर-बाज़ारी व्यवस्था (जाति समूहों के बीच वस्तुओं-सेवाओं का पारंपरिक आदान-प्रदान, बिना पैसों के) परिष्कृत व्यापारिक तंत्रों के साथ-साथ मौजूद थी
- उपनिवेश-पूर्व भारत में पहले से ही संगठित उत्पादन केंद्र, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था थी
भारत सदियों तक हथकरघा वस्त्रों (सूती और महँगे रेशम) और मसालों जैसी वस्तुओं
का प्रमुख निर्माता व निर्यातक रहा, जिनकी यूरोप में भारी माँग थी। व्यापारिक
समुदायों की अपनी बैंकिंग और कर्ज़ व्यवस्थाएँ थीं: इसका सबसे महत्वपूर्ण साधन
था हुंडी।
हुंडी विनिमय का एक बिल है, कर्ज़ पत्र जैसा, जिससे देश के एक कोने का
व्यापारी दूसरे कोने के व्यापारी से कर्ज़ स्वीकार करवा सकता था, क्योंकि दोनों
एक ही जाति-नातेदारी नेटवर्क का हिस्सा होते थे।
नाकरट्टारों की अपनी जाति-आधारित बैंकिंग व्यवस्था थी। कर्ज़ लेना और
पैसा जमा करना जाति-आधारित सामाजिक संबंधों पर टिका था: व्यापार क्षेत्र,
आवासीय स्थान, वंशानुक्रम, विवाह और साझा संप्रदाय-सदस्यता। आधुनिक बैंकिंग की
तरह कोई सरकार-नियंत्रित केंद्रीय बैंक नहीं था: प्रतिष्ठा, सही निर्णय और
साझा जमा-पूँजी ही पूरी जाति के प्रतिनिधि के रूप में हर नाकरट्टार पर जनता का
भरोसा बनाए रखते थे (रुडनर 1994)।
3 बाज़ारों का सामाजिक संगठन: ‘पारंपरिक व्यापारिक समुदाय’
भारत में जाति और अर्थव्यवस्था का गहरा नाता है: भूमि-स्वामित्व और पेशे में
भी, व्यापार में भी। असल में, वैश्य चार वर्णों में से एक है (परंपरागत
व्यापक जाति-श्रेणियाँ: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र), जो दिखाता है कि
प्राचीन काल से भारतीय समाज में व्यापार कितना महत्वपूर्ण रहा है। पर बाकी वर्णों
की तरह ‘वैश्य’ प्रस्थिति भी अक्सर स्थिर पहचान की तुलना में अधिकार या आकांक्षा से प्राप्त की हुई होती है।
उत्तर भारत के बनियों जैसे कुछ समूहों का लंबा व्यापारिक इतिहास है, तो कुछ
अन्य जाति-समूहों ने व्यापार अपनाकर ऊपर उठते हुए वैश्य प्रस्थिति का दावा किया
है।
| समुदाय | किताब उनके बारे में क्या कहती है |
|---|---|
| बनिया (उत्तर भारत) | एक वैश्य समुदाय, लंबे समय से व्यापार में |
| पारसी, सिंधी, बोहरा, जैन | अपनी अलग धार्मिक/सामुदायिक पहचान वाले अन्य व्यापारिक समुदाय, सब ‘वैश्य’ नहीं |
| नाकरट्टार (तमिलनाडु) | जाति-आधारित बैंकिंग और साहूकारी व्यवस्था चलाते थे (बॉक्स 4.2) |
| मारवाड़ी (पूरे भारत में बसे हुए) | उपनिवेशी दौर में उभरे, खासकर कलकत्ता में; आज किसी भी अन्य समुदाय से ज़्यादा उद्योग पर नियंत्रण |
| बंजारे | एक उपेक्षित ‘जनजातीय’ समूह जिसने उपनिवेशी दौर में नमक के दूर-दराज़ व्यापार पर नियंत्रण रखा: प्रमाण कि व्यापारिक समुदाय हमेशा ऊँची सामाजिक प्रस्थिति का नहीं होता |
ऊपर की तालिका ‘व्यापारिक क्षेत्रों’ के नक्शे की जगह लेती है। किसी समुदाय का नाम और उसका
व्यापार बताने के लिए तैयार रहें। तालिका याद करें, नक्शा नहीं।
व्यापार जाति के हिसाब से क्यों बँटता है? क्योंकि व्यापार और कारोबार अक्सर
जाति-नातेदारी नेटवर्क में ही चलता है: व्यापारी अपने समुदाय के लोगों पर
बाहरियों से ज़्यादा भरोसा करता है, इसलिए व्यापार उसी नेटवर्क में टिका रहता है।
समय के साथ यह किसी खास व्यापार क्षेत्र में लगभग एक जाति-एकाधिकार बना
देता है।
3.1 उपनिवेशवाद और नए बाज़ारों का आविर्भाव
उपनिवेशी शासन ने उत्पादन, व्यापार और खेती में बड़े उलटफेर किए। सबसे जाना-माना
उदाहरण है हथकरघा उद्योग का खात्मा, क्योंकि बाज़ारों में इंग्लैंड के
सस्ते मशीन-निर्मित कपड़ों की भरमार हो गई थी। उपनिवेशवाद से पहले भी भारत में
एक जटिल, मौद्रीकृत अर्थव्यवस्था थी, फिर भी अधिकांश इतिहासकार उपनिवेशी दौर
को ही असली मोड़ मानते हैं।
उपनिवेशीकरण से पहले
- भारत बने-बनाए सामान (हथकरघा वस्त्र) का विश्व बाज़ार में एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता था
उपनिवेशीकरण के बाद
- भारत मुख्यतः कच्चे माल और खेतिहर उत्पादों का स्रोत, और इंग्लैंड के बने-बनाए सामान का उपभोक्ता बन गया
नए समूह, खासकर यूरोपियन, व्यापार में आए: कभी मौजूदा व्यापारिक समुदायों के
साथ मिलकर, तो कभी उन्हें बाहर करके। पर बाज़ारी अर्थव्यवस्था के विस्तार ने कुछ
व्यापारिक समुदायों को नए अवसर भी दिए। इसका सबसे साफ़ उदाहरण हैं मारवाड़ी।
मारवाड़ी शायद भारत का सबसे व्यापक और सबसे जाना-माना व्यापारिक समुदाय है,
बिड़ला परिवार जैसे बड़े औद्योगिक घरानों से लेकर देश भर के कस्बों की
छोटी दुकानों तक। यह समुदाय ठीक उपनिवेशी दौर में ही सफल व्यापारिक
समुदाय बना, खासकर कलकत्ता जैसे उपनिवेशी शहरों में मिले नए अवसरों का फ़ायदा
उठाकर। नाकरट्टारों की तरह, इनकी सफलता भी उनके गहरे सामाजिक नेटवर्क पर टिकी
थी, जिसने उनकी अपनी बैंकिंग व्यवस्था के लिए ज़रूरी भरोसा बनाया। कई मारवाड़ी
परिवार साहूकार बने और बैंकर के रूप में काम करते हुए अंग्रेज़ों के व्यापारिक
विस्तार में भी मदद की (हार्डग्रोव 2004)। आज़ादी के बाद कुछ मारवाड़ी परिवार
आधुनिक उद्योगपति बन गए, और आज मारवाड़ियों का भारत के उद्योग पर किसी भी अन्य
समुदाय से ज़्यादा नियंत्रण है।
4 पूँजीवाद को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में समझना
आधुनिक समाजशास्त्र के संस्थापकों में से एक, कार्ल मार्क्स, आधुनिक
पूँजीवाद के बड़े आलोचक भी थे। उन्होंने पूँजीवाद को पण्य उत्पादन की
व्यवस्था के रूप में समझा: यानी बाज़ार के लिए उत्पादन, जो मज़दूरी पर आधारित
श्रम से होता है।
मार्क्स के अनुसार हर आर्थिक व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था भी है। हर
उत्पादन विधि खास उत्पादन-संबंधों से बनती है, और अंततः एक ख़ास वर्ग
संरचना को जन्म देती है। अर्थव्यवस्था चीज़ों से नहीं बनती, यह उत्पादन की
प्रक्रिया से जुड़े लोगों के आपसी संबंधों से बनती है।
4.1 पण्यीकरण और उपभोग
पण्यीकरण या वस्तुकरण (commoditisation) वह प्रक्रिया है जिससे कोई
चीज़, हुनर या सेवा, जो पहले बाज़ार में नहीं बिकती थी, अब खरीदी-बेची जाने
वाली एक वस्तु बन जाती है।
मार्क्स और पूँजीवाद के अन्य आलोचकों के अनुसार, वस्तुकरण के अक्सर नकारात्मक
सामाजिक असर होते हैं। किताब इसके कई उदाहरण देती है, हल्के से लेकर परेशान करने
वाले तक:
मानव अंग
किडनी की ज़रूरत वाले अमीर मरीज़ों को गरीब लोगों द्वारा किडनी बेचना विवादास्पद है: कई मानते हैं कि मानव अंगों का कभी पण्यीकरण नहीं होना चाहिए।
दास प्रथा बनाम वेतन-श्रम
पहले इंसानों को गुलाम के तौर पर बेचा-खरीदा जाता था, आज यह अनैतिक माना जाता है: पर मज़दूरी के बदले अपना श्रम बेचना पूँजीवादी समाज में हर जगह स्वीकार्य है, मार्क्स के अनुसार यह स्वीकृति सिर्फ़ पूँजीवाद में ही मिलती है।
विवाह
पहले विवाह सिर्फ़ परिवार तय करते थे, अब पेशेवर विवाह ब्यूरो और वेबसाइट्स फ़ीस लेकर यह काम करते हैं।
सामाजिक कौशल और शिक्षा
निजी संस्थान अब ‘व्यक्तित्व सँवारने’ और अंग्रेज़ी बोलना सिखाने के कोर्स बेचते हैं, जो कभी सिर्फ़ परिवार में सिखाए जाते थे। निजी स्कूल, कॉलेज और कोचिंग क्लासें भी शिक्षा का इसी तरह पण्यीकरण करती हैं।
किताब का अपना उदाहरण हाल में पण्यीकृत हुई चीज़ के लिए बोतलबंद
पानी है (क्रियाकलाप 4.2): किताब के अनुसार यह बहुत हाल की परिघटना है।
उदाहरण पूछे जाने पर यही लिखें, किताब से बाहर का उदाहरण न गढ़ें।
आधुनिक समाज में उपभोग सिर्फ़ आर्थिक नहीं है, इसका एक प्रतीकात्मक अर्थ भी
होता है। समाजशास्त्र के संस्थापकों में से एक, मैक्स वेबर, ने सबसे पहले
बताया कि लोग जो सामान खरीदते और इस्तेमाल करते हैं, वह उनकी सामाजिक प्रस्थिति
से गहराई से जुड़ा होता है।
प्रतिष्ठा का प्रतीक (मैक्स वेबर) वह सामान है जिसका मालिकाना किसी
व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक प्रस्थिति दिखाता है: जैसे आज भारत के मध्यम वर्ग
में मोबाइल फोन का ब्रांड या कार का मॉडल।
5 भूमंडलीकरण: स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों का गठजोड़
1980 के दशक के बाद, भारत ने अपने आर्थिक इतिहास के एक नए दौर में प्रवेश
किया: राज्य-नियंत्रित विकास से उदारीकरण की ओर बदलाव। इसी बदलाव ने
भूमंडलीकरण के युग की शुरुआत की, जिसमें दुनिया पहले से ज़्यादा
आपस में जुड़ी है, सिर्फ़ आर्थिक रूप से नहीं, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से भी।
भूमंडलीकरण कई रुझानों को साथ लेकर चलता है: वस्तुओं, पूँजी, सूचना
और लोगों का बढ़ता अंतर्राष्ट्रीय संचलन, साथ ही उस संचलन को गति देने वाली
प्रौद्योगिकी (कंप्यूटर, दूरसंचार, परिवहन) और अन्य अवसंरचना का विकास।
अमेरीकी अर्थव्यवस्था में मंदी, जैसे 9/11 के हमलों के बाद आई, भारत के
सॉफ्टवेयर उद्योग में भी नौकरियाँ और कारोबार छीन सकती है। ‘दुनिया भर के
बाज़ार आपस में जुड़ गए हैं’ का असली मतलब यही है।
भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने वाले प्रमुख उद्योग हैं सॉफ्टवेयर
सेवाएँ और BPO (Business Process outsourcing), जैसे कॉल सेंटर।
भारतीय कंपनियाँ पश्चिमी विकसित देशों के ग्राहकों को सस्ती दरों पर श्रम और
सेवाएँ मुहैया कराती हैं। भारतीय सॉफ्टवेयर श्रम का अब एक तरह से वैश्विक बाज़ार
बन चुका है।
5.1 जब संस्कृति खुद बाज़ार बन जाती है
भूमंडलीकरण के अंतर्गत सिर्फ़ पैसा और सामान ही तेज़ी से नहीं घूमते: लोग,
सांस्कृतिक उत्पाद और छवियाँ भी घूमती हैं, और जो पहले बाज़ार से बाहर था, वह
अब उसमें शामिल हो जाता है। किताब के दो उदाहरण: योग और आयुर्वेद जैसे
भारतीय अध्यात्म व ज्ञान-व्यवस्थाओं का पश्चिम में बाज़ारीकरण, और अंतर्राष्ट्रीय
पर्यटन का बढ़ता बाज़ार।
पुष्कर, राजस्थान का वार्षिक मेला स्थानीय पशुचारियों और व्यापारियों
के लिए आज भी एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक आयोजन है, जहाँ ऊँट और अन्य पशु
खरीदे-बेचे जाते हैं। पर अब यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े पर्यटन आकर्षण के
रूप में भी बाज़ारीकृत हो चुका है: यह ठीक कार्तिक पूर्णिमा से पहले
आता है, जब हिंदू श्रद्धालु पवित्र पुष्कर तालाब में स्नान करते हैं। इस तरह
हिंदू तीर्थयात्री, ऊँट व्यापारी और विदेशी पर्यटक सब एक साथ मिलते हैं, और
पशु-पैसों के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रतीक व धार्मिक पुण्य भी आदान-प्रदान होते
हैं।

पुष्कर मेले में जुटे ऊँट और व्यापारी: यह पारंपरिक पशु बाज़ार अब खुद एक
पर्यटन उत्पाद बन चुका है (बॉक्स 4.4)।
5.2 उदारवादिता पर बहस: बाज़ार बनाम राज्य
भारत का भूमंडलीकरण मुख्यतः उदारीकरण की नीति से हुआ, जो 1980 के दशक
में शुरू हुई।
उदारीकरण नीतियों का एक समूह है: सरकारी उपक्रमों का निजीकरण,
पूँजी-श्रम-व्यापार पर सरकारी नियंत्रण में कमी, आयात शुल्क घटाना, और विदेशी
कंपनियों को भारत में उद्योग लगाने की सुविधा देना। सरकारी नीति की जगह
बाज़ार-आधारित प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करने को बाज़ारीकरण भी कहते हैं।
उदारीकरण के पक्ष में तर्क
- निजी उद्योग को सरकारी उद्योग से ज़्यादा कुशल माना जाता है, इसलिए आर्थिक संवृद्धि और समृद्धि की उम्मीद
- विदेशी निवेश से संवृद्धि और रोज़गार में मदद की उम्मीद
- निजीकरण से कुशलता बढ़ने और सरकार का बोझ घटने की उम्मीद
- सॉफ्टवेयर/IT और कुछ खेती (मछली, फल) को वैश्विक बाज़ार से फ़ायदा
उदारीकरण के विपक्ष में तर्क
- कुछ मानते हैं कि भारत पर कुल असर नकारात्मक रहा है या रहेगा: फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान
- ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाज जैसे उद्योग विदेशी उत्पादकों से मुक़ाबला नहीं कर पाते
- किसानों को अब आयातित उपज से मुक़ाबला करना पड़ता है, जबकि समर्थन मूल्य और सब्सिडी घटाई गई हैं
- निजीकरण से कुछ क्षेत्रों में नौकरियाँ घटीं, असंगठित क्षेत्र में असुरक्षित रोज़गार बढ़ा
यह मत लिखें कि उदारीकरण ‘पूरी तरह अच्छा’ या ‘पूरी तरह बुरा’ रहा है।
किताब साफ़ कहती है कि इसका असर मिला-जुला रहा है: कुछ क्षेत्रों को
फ़ायदा, कुछ को नुकसान। सिर्फ़ फ़ायदे या सिर्फ़ नुकसान गिनाने वाला उत्तर पूरे
अंक नहीं दिलाएगा।
खेती इस असर का किताब का सबसे साफ़ उदाहरण है। भारतीय खेती पहले समर्थन
मूल्य (वह दाम जिस पर सरकार किसानों से उपज खरीदने को तैयार रहती है, जिससे
न्यूनतम आमदनी सुनिश्चित होती है) और सब्सिडी (खाद-डीज़ल जैसी चीज़ों की
लागत का कुछ हिस्सा सरकार द्वारा उठाना) से सुरक्षित थी। उदारीकरण सरकार की इस
तरह की दख़लअंदाज़ी के खिलाफ़ है, इसलिए समर्थन मूल्य और सब्सिडी घटाई या हटाई
गईं: जिसका नतीजा यह हुआ कि अब सस्ती आयातित उपज आने पर कई किसान ठीक से अपनी
रोज़ी-रोटी नहीं कमा पा रहे।
किताब खुद आगे का रास्ता दिखाती है: “कक्षा 12 की दूसरी पाठ्यपुस्तक भारत
में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास में कृषक परिवर्तन एवं उद्योग पर लिखे अध्याय
देखें।” यानी पुस्तक 2, भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास, के अध्याय 4 (ग्रामीण समाज) और अध्याय 5 (औद्योगिक समाज): यह अध्याय सिर्फ़
बाज़ार-बनाम-राज्य की बहस शुरू करता है, आगे की बात उन अध्यायों में है।
6 निष्कर्ष में
आज भारत में ग्रामीण हाट से लेकर अप्रत्यक्ष स्टॉक एक्सचेंज तक कई तरह के बाज़ार
मौजूद हैं। ये बाज़ार खुद सामाजिक संस्थाएँ हैं, जो जाति, वर्ग और सामाजिक ढाँचे
के दूसरे हिस्सों से जुड़ी हुई हैं। विनिमय का असर सिर्फ़ आर्थिक नहीं, सामाजिक
और प्रतीकात्मक भी होता है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण के तहत वस्तुओं, सेवाओं,
सांस्कृतिक प्रतीकों और पैसों के घूमने के तरीके लगातार बदल रहे हैं: गाँव के
स्थानीय बाज़ार से लेकर नासदक जैसे वैश्विक व्यापारिक नेटवर्क तक।
- बाज़ार एक आर्थिक संस्था भी है और सामाजिक भी, जाति, जनजाति या परिवार जैसी
- एडम स्मिथ ने बाज़ार को व्यक्तिगत सौदों की खुद-ब-खुद चलने वाली व्यवस्था माना; समाजशास्त्री कहते हैं अर्थव्यवस्था समाज में ‘रची-बसी’ है
- हाट (जैसे धोराई, बस्तर) दिखाता है कि बाज़ार सामाजिक काम भी करता है, रिश्तेदारों से मिलना, शादी तय करना, सिर्फ़ आर्थिक काम नहीं
- जाति व्यापार को आकार देती है: नाकरट्टार (तमिलनाडु बैंकिंग), मारवाड़ी (उपनिवेशी दौर में उभरे, आज सबसे ज़्यादा उद्योग नियंत्रण), बंजारे (कम प्रस्थिति फिर भी नमक व्यापार)
- मार्क्स: पूँजीवाद = पण्य उत्पादन + मज़दूरी श्रम; दो वर्ग (पूँजीपति, श्रमिक); अतिरिक्त मूल्य
- पण्यीकरण = जो पहले वस्तु नहीं थी, अब वस्तु बन जाती है: मानव अंग, विवाह ब्यूरो, व्यक्तित्व-विकास कोर्स, बोतलबंद पानी
- वेबर: सामान सामाजिक प्रस्थिति दिखाता है, ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’
- उदारीकरण (1980 के दशक से) → भूमंडलीकरण; भारत पर असर मिला-जुला रहा, कुछ क्षेत्रों को फ़ायदा, खेती जैसे क्षेत्रों को खासकर नुकसान
- क्या मैं अपने शब्दों में बता सकता हूँ कि समाजशास्त्री बाज़ार को ‘रची-बसी’ क्यों कहते हैं?
- क्या मैं जाति व्यापार को कैसे आकार देती है, इसके दो तरीके एक-एक उदाहरण सहित बता सकता हूँ?
- क्या मैं पण्यीकरण को परिभाषित कर सकता हूँ और किताब के दो उदाहरण दे सकता हूँ?
- क्या मैं उदारीकरण के पक्ष और विपक्ष में दो-दो तर्क गिना सकता हूँ?