| बोर्ड | इस अध्याय के अंक | आपके लिए क्या मतलब है |
|---|---|---|
| CBSE | 10 अंक | CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम की इकाई 3 (सैद्धांतिक प्रश्नपत्र 80 अंक, प्रोजेक्ट 20)। इस इकाई में तीनों संस्थाएँ आती हैं: जाति, जनजाति, और परिवार व नातेदारी। |
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अंकभार यानी परीक्षा के प्रश्नपत्र में इस अध्याय से कुल कितने अंकों के प्रश्न आते हैं।
- जाति क्या है, प्राचीन धर्मग्रंथों ने इसके कौन-से नियम निर्धारित किए, और किताब में दी गई इसकी छह विशेषताएँ
- अंग्रेज़ी शासन और भारतीय संविधान ने जाति को कैसे बदला, और यह राजनीति व विवाह में आज भी क्यों टिकी है
- ‘संस्कृतिकरण’ और ‘प्रबल जाति’ में अंतर, और जाति कुछ भारतीयों के लिए अदृश्य और कुछ के लिए अपरिहार्य क्यों है
- भारत में जनजातियों का वर्गीकरण कैसे होता है, और ‘अछूती आदिम जनजाति’ की धारणा काफ़ी लंबे समय से सच क्यों नहीं रही
- राष्ट्रीय विकास ने जनजातीय समुदायों को कितनी कीमत चुकाई, और आज जनजातीय पहचान कैसे जताई जाती है
- परिवार के अलग-अलग रूप, और मातृवंश तथा मातृतंत्र में असली अंतर
3.1 जाति एवं जाति व्यवस्था
जनसंख्या अलग-अलग, असंबंधित व्यक्तियों की भीड़ भर नहीं है। यह अलग-अलग पर आपस में जुड़े वर्गों और समुदायों से बना एक समाज है, जो सामाजिक संस्थाओं से बना और चलता है। इस अध्याय में तीन संस्थाएँ पढ़ेंगे: जाति, जनजाति और परिवार।
आप पहले से जानते हैं कि जाति एक प्राचीन संस्था है। यह भी जानते हैं कि जाति आज के भारत का भी हिस्सा है। सवाल यही है: क्या अतीत की ‘जाति’ और आज की ‘जाति’ एक ही चीज़ है?
अतीत में जाति
जाति भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ी एक अनूठी संस्था है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में मिलते-जुलते सामाजिक ढाँचे ज़रूर मिलते हैं, पर जाति जैसा सटीक रूप कहीं और नहीं मिलता। यह हिंदू समाज की संस्थात्मक विशेषता है, पर इसका प्रचलन भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य धार्मिक समुदायों में भी फैला हुआ है, खासकर मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों में।
माना जाता है कि अंग्रेज़ी शब्द कास्ट (caste) की उत्पत्ति पुर्तगाली शब्द कास्टा (casta) से हुई है, जिसका अर्थ है ‘विशुद्ध नस्ल’। भारतीय भाषाओं में इसी संस्था के लिए दो अलग शब्द इस्तेमाल होते हैं: वर्ण और जाति।
वर्ण
- शाब्दिक अर्थ है ‘रंग’
- चार भागों का, पूरे भारत में एक-जैसा विभाजन: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र
- ‘बहिष्कृत’, विदेशी, दास और युद्ध में हारे लोग इसमें शामिल नहीं, इन्हें कभी-कभी पंचम कहा जाता है
जाति
- किसी भी चीज़ के ‘प्रकार’ या ‘किस्म’ (स्पीशीज़) के लिए इस्तेमाल होने वाला व्यापक शब्द, अचेतन वस्तुओं से लेकर पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और मनुष्यों तक
- भारतीय भाषाओं में कास्ट (caste) के लिए सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द
- सबसे सामान्य व्याख्या में क्षेत्रीय या स्थानीय उप-वर्गीकरण, सैकड़ों या हज़ारों जातियों और उप-जातियों से बना
यानी चार वर्णों का विभाजन पूरे भारत में एक जैसा है, पर जाति का क्रम हर क्षेत्र में अलग-अलग होता है।
चार वर्णों का विभाजन करीब 3,000 साल पुराना है। पर विद्वान मानते हैं कि ‘जाति व्यवस्था’ इतने सालों में एक जैसी नहीं रही। अपने प्रारंभिक काल, वैदिक काल (करीब 900 से 500 ईसा पूर्व) में, यह वास्तव में वर्ण व्यवस्था ही थी: सिर्फ़ चार ढीले विभाजन थे, जन्म से तय नहीं होते थे, और लोग एक से दूसरे वर्ण में आ-जा भी सकते थे। जाति एक कठोर, जन्म-आधारित संस्था उत्तर-वैदिक काल में ही बनी, जिसे हम आज पहचानते हैं।
जाति की छह विशेषताएँ
यह किताब की अपनी सूची है, जिसमें जाति की सबसे सामान्य निर्धारित विशेषताएँ बताई गई हैं। सभी छह को अलग-अलग याद रखें, ताकि हर एक को अलग से बता सकें।
जन्म से तय
बच्चा अपने माता-पिता की जाति में ही जन्म लेता है। जाति कभी चुनाव का विषय नहीं होती, न इसे बदला जा सकता है, न छोड़ा जा सकता है। हालाँकि, ऐसे उदाहरण हैं जहाँ एक व्यक्ति को उसकी जाति से निकाला भी जा सकता है।
सजातीय विवाह
विवाह अपनी ही जाति के सदस्यों के बीच होता है। जाति की सदस्यता के साथ विवाह संबंधी कठोर नियम जुड़े होते हैं।
भोजन के नियम
क्या खाया जा सकता है, क्या नहीं, और किसके साथ खाना बाँटा जा सकता है, यह जाति तय करती है।
अधिक्रम में स्थान
हर जाति का एक तय स्थान होता है। बीच की जातियों का सही क्रम क्षेत्र-दर-क्षेत्र बदल सकता है, पर अधिक्रम हमेशा रहता है।
खंडात्मक संगठन
जातियों में हमेशा उप-जातियाँ होती हैं, और कभी-कभी उप-जातियों में भी उप-उप-जातियाँ होती हैं।
वंशानुगत व्यवसाय
एक जाति में जन्मा व्यक्ति परंपरागत रूप से सिर्फ़ अपनी जाति का व्यवसाय ही कर सकता था, और वह व्यवसाय सिर्फ़ उसी जाति के लोग कर सकते थे। व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था।
ये छह विशेषताएँ प्राचीन धर्मग्रंथों के निर्धारित नियम हैं, इसका मतलब यह नहीं कि हर गाँव में हमेशा ऐसा ही हुआ। किताब खुद कहती है कि हम नहीं जानते कि इन नियमों का असली जीवन में कितना पालन हुआ। यह मत लिखें कि ‘जाति हमेशा बिल्कुल ऐसे ही काम करती थी’, बल्कि लिखें कि ‘जाति ने ऐसे नियम तय किए थे’।
ऐतिहासिक सूत्रों से साफ़ है कि जाति एक बहुत असमान संस्था थी: कुछ जातियों को इस व्यवस्था से बहुत लाभ रहा, वहीं अन्य जातियों को अधीनता और कभी न समाप्त होने वाले श्रम का जीवन जीने का दंड भुगतना पड़ा। जब जाति जन्म से कठोरता से निर्धारित हो गई, तब किसी व्यक्ति के लिए सैद्धांतिक तौर पर अपनी जीवन स्थिति बदलना असंभव था: उच्च जाति के व्यक्ति का स्तर हमेशा उच्च और निम्न जाति के व्यक्ति का स्तर हमेशा निम्न रहता था।
जाति असमान क्यों है: दो सिद्धांत
सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था दो तरह के सिद्धांतों को मिलाती है।
शुद्धता और अशुद्धता वह मान्यता है जो जाति का क्रम तय करती है। जिन जातियों को धार्मिक रूप से ‘शुद्ध’ (पवित्र के करीब) माना जाता है, उनका स्तर ऊँचा होता है, और जिन्हें ‘अशुद्ध’ या ‘प्रदूषित’ माना जाता है, उनका स्तर नीचा होता है। जैसा हर समाज में होता है, भौतिक शक्ति (आर्थिक या सैन्य शक्ति) सामाजिक स्तर से नज़दीकी से जुड़ी होती है। इतिहासकारों का मानना है कि जो लोग युद्धों में पराजित हुए, उन्हें अक्सर निम्न जाति की स्थिति मिली।
अंत में, जातियाँ सिर्फ़ धार्मिक तौर पर ही असमान नहीं हैं, इन्हें एक-दूसरे की सहयोगी भी माना जाता है, प्रतिस्पर्धी नहीं। हर जाति का अपना तय स्थान है, जो किसी दूसरी जाति को नहीं मिल सकता। जाति व्यवसाय से जुड़ी होने की वजह से यह व्यवस्था श्रम के सामाजिक विभाजन जैसा काम करती है, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि सैद्धांतिक रूप से इसमें कोई ऊपर-नीचे की गतिशीलता नहीं है।
उपनिवेशवाद और जाति
अगर आधुनिक इतिहास की शुरुआत 19वीं सदी से मानें, तो 1947 इसे दो साफ़ हिस्सों में बाँटता है: औपनिवेशिक काल (लगभग 1800 से 1947 तक) और स्वातंत्र्योत्तर काल (1947 से आज तक)। कुछ विद्वान तो यह भी मानते हैं कि आज हम जिसे ‘जाति’ कहते हैं, वह प्राचीन परंपरा से ज़्यादा उपनिवेशवाद की देन है। ये सभी परिवर्तन जान-बूझकर या सोच-समझकर नहीं लाए गए। शुरू में ब्रिटिश प्रशासकों ने देश पर कुशलता से शासन करना सीखने के लिए जाति को समझने की कोशिश की, और जनजातियों तथा जातियों की ‘प्रथाओं और तौर-तरीकों’ के अत्यंत सुव्यवस्थित, गहन सर्वेक्षण और रिपोर्टें तैयार कीं; फिर जनगणना ने जाति को आधिकारिक रूप से दर्ज किया।
जनगणना से पहले जातीय पहचान काफ़ी लचीली और कम कठोर थी। जैसे ही अंग्रेज़ों ने जाति को गिनना और आधिकारिक रूप से दर्ज करना शुरू किया, जाति ने ‘एक नया जीवन’ पाया: अब हर जाति का दर्जा किसी सरकारी अधिकारी के सामने ऐतिहासिक या धार्मिक सबूतों के साथ माँगा जाने लगा। गिनने की इस प्रक्रिया ने खुद संस्था को बदल दिया।
किताब कहती है कि शायद यह कहना अधिक समीचीन होगा कि औपनिवेशिक काल में जाति संस्था में अनेक आधारभूत परिवर्तन आए। उस काल में पूँजीवाद और आधुनिकता के प्रसार के कारण भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व भर में तेज़ी से बदलाव आ रहा था।
अस्पृश्यता के खिलाफ़ लड़ाई राष्ट्रवादी आंदोलन से भी पहले, 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ही शुरू हो चुकी थी, जाति के दोनों छोरों से: एक तरफ़ ऊँची जाति के सुधारक, दूसरी तरफ़ निचली जाति के अपने ही सदस्य।
जोतिराव गोविन्दराव फुले (1827-1890)
जाति व्यवस्था के अन्याय और छुआछूत के नियमों की भर्त्सना की। 1873 में निम्न जाति के मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना की।
सावित्री बाई फुले (1831-1897)
पुणे में स्थापित देश के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रधान अध्यापिका। शूद्रों और अति-शूद्रों को शिक्षा देने में अपना जीवन लगाया, किसानों-मज़दूरों के लिए रात्रि विद्यालय शुरू किए। प्लेग पीड़ितों की सेवा करते हुए मृत्यु हुई।
अयन्कली (1863-1914)
केरल में जन्मे, निम्न जातियों और दलितों के नेता। इनके प्रयासों से दलितों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने और दलित बच्चों को स्कूल में दाखिले की आज़ादी मिली।
श्री नारायण गुरू (1856-1928)
केरल में जन्मे, सबके लिए भाईचारे का उपदेश दिया और जाति व्यवस्था के कुप्रभावों के खिलाफ़ लड़े। इनका नारा था: ‘सबके लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर’।
पेरियार, ई. वी. रामास्वामी नायकर (1879-1973)
दक्षिण भारत के निम्न जाति आंदोलन के नेता और बुद्धिवादी। उन्होंने कहा कि सभी मनुष्य बराबर हैं और स्वतंत्रता-समानता हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।
इनके साथ ही पश्चिमी भारत में महात्मा जोतिबा फुले (यही जोतिराव गोविन्दराव फुले हैं) और बाबासाहेब अंबेडकर, और दक्षिण में अयन्कली, श्री नारायण गुरू, इयोतीदास और पेरियार ने भी यही आंदोलन चलाया। अस्पृश्यता-विरोधी कार्यक्रमों को कांग्रेस की कार्यसूची में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया, और स्वतंत्रता के करीब आते-आते राष्ट्रवादी आंदोलन में मोटे तौर पर यह सहमति हो गई कि जातीय विभिन्नताओं का उन्मूलन कर दिया जाए। राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रबल दृष्टिकोण जाति को एक सामाजिक कुरीति और भारतीयों के बीच फूट डालने की एक औपनिवेशिक युक्ति मानता था। गांधी जी की भूमिका खास थी: उन्होंने निम्न जातियों के उत्थान और छुआछूत खत्म करने के लिए काम किया, साथ ही भूमि-स्वामी उच्च जातियों को यह भरोसा भी दिलाया कि उनके हितों का ध्यान रखा जाएगा।
जाति का समकालीन रूप
स्वातंत्र्योत्तर भारतीय राज्य को यही अंतर्विरोध विरासत में मिला। एक तरफ़ राज्य संविधान के ज़रिए जाति खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध था। दूसरी तरफ़, वह ऐसे आमूलचूल आर्थिक सुधार लाने में न सक्षम था, न इच्छुक, जो जातीय असमानता की जड़ ही खत्म कर देते। राज्य ने यह माना कि यदि वह जाति प्रथा की ओर आँखें बंद करके काम करेगा, तो जाति आधारित विशेषाधिकार अपने आप कमज़ोर पड़ जाएँगे। उदाहरण के लिए, सरकारी पदों पर नियुक्तियों में जाति का कोई ध्यान नहीं रखा जाता था, इसलिए अच्छी तरह शिक्षित उच्च जातियों और अल्प-शिक्षित अथवा अक्सर निरक्षर निम्न जातियों को ‘समान’ आधार पर प्रतियोगिता करनी पड़ती थी। इसका एकमात्र अपवाद था: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ आरक्षित पद।
विकास और उद्योग ने जाति को सिर्फ़ अप्रत्यक्ष रूप से बदला। आधुनिक उद्योग ने ऐसे नए रोज़गार बनाए जिनमें कोई जातीय नियम नहीं थे, और शहरी जीवन ने जाति-आधारित सामाजिक व्यवहार को बनाए रखना मुश्किल कर दिया। व्यक्तिवाद और ‘योग्यतातंत्र’ की उदार सोच से आकर्षित पढ़े-लिखे भारतीयों ने जाति के कठोर रीति-रिवाज़ छोड़ने शुरू किए।
यह न लिखें कि ‘आधुनिकीकरण ने भारत में जाति खत्म कर दी’। किताब का अपना सबूत इसका उल्टा दिखाता है। मुंबई (तब बॉम्बे) की कपड़ा मिलों और कोलकाता (तब कलकत्ता) की जूट मिलों में भर्ती जाति और नातेदारी के आधार पर ही होती रही, क्योंकि मज़दूर भरती करने वाले बिचौलिये अपनी ही जाति और क्षेत्र से लोग चुनते थे। अछूतों के प्रति भेदभाव शहरों में भी बना रहा, गाँवों जितना अत्यधिक नहीं तो भी काफ़ी।
जाति सबसे मज़बूत सांस्कृतिक और घरेलू क्षेत्र में साबित हुई। सजातीय विवाह (यानी अंतर्विवाह, अपनी ही जाति में शादी) आधुनिकीकरण और परिवर्तन से बड़े तौर पर अप्रभावित रहा, आज भी अधिकांश शादियाँ जाति की सीमाओं के भीतर ही होती हैं। हालाँकि, अंतर्जातीय विवाह (यानी जाति की सीमा के बाहर, दूसरी जाति में शादी) अब पहले की तुलना में अधिक हो रहे हैं।
बदलाव का सबसे घटनापूर्ण क्षेत्र रहा है राजनीति। स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक राजनीति शुरू से ही जाति से गहराई से जुड़ी रही है। 1980 के दशक से साफ़ तौर पर जाति-आधारित राजनीतिक दल भी उभरे। प्रारंभिक सामान्य चुनावों में ऐसा प्रतीत हुआ कि जातीय भाईचारा चुनाव जीतने में निर्णायक रहा, फिर हर दल एक जैसा जातीय गणित लगाने लगा और मामला उलझता चला गया।
संस्कृतिकरण (एम. एन. श्रीनिवास): वह प्रक्रिया जिसमें आमतौर पर मध्य या निम्न जाति के सदस्य किसी उच्च जाति की धार्मिक, घरेलू और सामाजिक परिपाटियाँ अपनाकर अपनी सामाजिक प्रस्थिति ऊँची करने की कोशिश करते हैं।
प्रबल जाति (एम. एन. श्रीनिवास): वह जाति जिसकी जनसंख्या बड़ी हो और जिसे स्वतंत्रता के बाद हुए आंशिक भूमि सुधारों से भूमि के अधिकार मिले हों। इन सुधारों ने पुराने ‘अनुपस्थित ज़मींदार’ उच्च जातियों से ज़मीन छीनी, जो खेती में कोई भूमिका नहीं निभाते थे, सिर्फ़ लगान वसूलते थे। ज़मीन अगले स्तर की जातियों को मिली, जो खेती का प्रबंध तो करती थीं पर खुद हल नहीं चलाती थीं, और असली जुताई के लिए निम्न जाति (जिनमें ‘अछूत’ जातियाँ भी शामिल) के मज़दूरों पर निर्भर थीं। एक बार भूमि-अधिकार मिलने के बाद इनकी बड़ी संख्या ने चुनावी लोकतंत्र में इन्हें राजनीतिक ताक़त भी दी, यही जातियाँ देहात में ‘प्रबल जाति’ बन गईं।
| प्रबल जाति | क्षेत्र |
|---|---|
| यादव | बिहार और उत्तर प्रदेश |
| वोक्कलिंग | कर्नाटक |
| रेड्डी और खम्मा | आंध्र प्रदेश |
| मराठे | महाराष्ट्र |
| जाट | पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश |
| पाटीदार | गुजरात |
संस्कृतिकरण और प्रबल जाति का अंतर एक लाइन में याद रखें: संस्कृतिकरण उच्च जाति की धार्मिक, घरेलू या सामाजिक परिपाटियाँ अपनाकर स्तर ऊँचा करने का प्रयत्न है; प्रबल जाति उन जातियों के लिए शब्द है जिनके पास भूमि-अधिकार और बड़ी संख्या से असली आर्थिक-राजनीतिक ताक़त आई। एक सांस्कृतिक है, दूसरा भौतिक और राजनीतिक।
एम. एन. श्रीनिवास (मैसूर नरसिंहाचार श्रीनिवास, 1916-1999) भारत के सबसे बड़े समाजशास्त्रियों और सामाजिक मानवविज्ञानियों में से थे, जाति व्यवस्था पर काम और ‘संस्कृतिकरण’, ‘प्रबल जाति’ शब्द गढ़ने के लिए जाने जाते हैं। इनकी किताब द रिमेम्बरड विलेज सामाजिक मानवविज्ञान के सबसे मशहूर गाँव-अध्ययनों में से एक है।
जाति किसी के लिए ‘अदृश्य’ और किसी के लिए अपरिहार्य क्यों है
समकालीन जाति व्यवस्था का सबसे विरोधाभासी बदलाव यही है कि यह उच्च जाति के शहरी मध्य और उच्च वर्गों के लिए लगभग अदृश्य हो गई है, ठीक इसलिए क्योंकि इसने इन वर्गों के लिए अपना काम बहुत अच्छे से किया। इनकी जातीय प्रस्थिति ने ही इन्हें विकास का पूरा फ़ायदा उठाने लायक आर्थिक और शैक्षिक साधन दिए, जैसे सब्सिडी वाली सार्वजनिक शिक्षा (खासकर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा और प्रबंधन की व्यावसायिक शिक्षा), और स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों का विस्तार। दूसरी-तीसरी पीढ़ी तक आते-आते इन समूहों को विश्वास होने लगा कि उनकी प्रगति का जाति से कोई ज़्यादा लेना-देना नहीं था, इनके लिए जाति अब सिर्फ़ धर्म, विवाह और नातेदारी के निजी दायरे तक सीमित लगती है। लेकिन यह वर्ग एक-जैसा नहीं है: हर उच्च जाति का व्यक्ति सुविधासंपन्न नहीं, कुछ गरीब भी हैं।
जाति अदृश्य लगती है
- उच्च जाति, शहरी, मध्य/उच्च वर्ग के भारतीय
- स्वातंत्र्योत्तर विकास नीतियों से सबसे ज़्यादा लाभान्वित
- जाति अब सिर्फ़ धर्म, विवाह, नातेदारी तक सीमित लगती है
जाति अपरिहार्य लगती है
- अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ, पिछड़ी जातियाँ
- पहले से जमी उच्च जाति से मुकाबला करने के लिए विरासत में कोई शैक्षिक-सामाजिक पूँजी नहीं
- जातीय पहचान नहीं छोड़ सकते, क्योंकि यह उनकी बहुत थोड़ी सी सामूहिक परिसंपत्तियों में से एक है
- आरक्षण और अन्य संरक्षण ही ‘जीवन रक्षक साधन’ हैं, पर इनका उपयोग करना ही जाति को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बना देता है, और अक्सर यही उनकी पहचान का वह पक्ष होता है जिसे दुनिया मान्यता देती है
3.2 जनजातीय समुदाय
‘जनजाति’ एक आधुनिक शब्द है, पर यह उन समुदायों के लिए है जो बहुत पुराने हैं, उपमहाद्वीप के सबसे पुराने निवासियों में से। भारत में जनजातियों को आमतौर पर नकारात्मक तरीके से परिभाषित किया गया है, यानी वे क्या नहीं हैं, इसके आधार पर।
जनजातियाँ परंपरागत रूप से ऐसे समुदाय मानी गईं जो: (1) किसी लिखित धर्मग्रंथ वाले धर्म का पालन नहीं करते थे, (2) जिनका ‘सामान्य’ तरह का राज्य या राजनीतिक ढाँचा नहीं था, और (3) जिनमें कठोर वर्ग-विभाजन नहीं था।
जनजातीय समाजों का वर्गीकरण
सकारात्मक विशेषताओं के आधार पर जनजातियों को दो तरह के लक्षणों से वर्गीकृत किया गया है: ‘स्थायी’ और ‘अर्जित’।
| स्थायी लक्षण | किताब क्या कहती है |
|---|---|
| क्षेत्र | व्यापक रूप से फैली हुई, पर कुछ क्षेत्रों में घनी आबादी (नीचे तालिका और चार्ट देखें) |
| भाषा | चार भाषा-श्रेणियाँ, नीचे देखें |
| शारीरिक विशिष्टताएँ | नीग्रिटो, आस्ट्रैलॉइड, मंगोलॉइड, द्रविड़ और आर्य श्रेणियाँ (आखिरी दो शेष जनसंख्या से साझा) |
| पारिस्थितिक आवास | पहाड़ियाँ, वन, ग्रामीण मैदान और नगरीय औद्योगिक इलाके |

परीक्षा में भारत के जनजातीय क्षेत्रों का नक़्शा कभी न बनाएँ, इस भूगोल को शब्दों या तालिका में लिखें, जैसे यह तालिका करती है।
| कहाँ | उस राज्य की अपनी जनसंख्या में जनजातीय हिस्सा |
|---|---|
| असम को छोड़कर सभी पूर्वोत्तर राज्य | 30% से ज़्यादा |
| अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड | 60% से ज़्यादा, 95% तक |
| देश के शेष भाग (पूर्वोत्तर के बाहर) | उड़ीसा (ओडिशा) और मध्य प्रदेश को छोड़कर शेष सभी राज्यों में 12% से कम |
भारतीय-आर्य और द्रविड़ परिवार की भाषाएँ शेष भारतीय जनसंख्या द्वारा भी बोली जाती हैं; भारतीय-आर्य भाषा बोलने वालों में जनजातियों का हिस्सा लगभग 1% और द्रविड़ भाषा बोलने वालों में लगभग 3% है। आस्ट्रिक और तिब्बती-बर्मी भाषाएँ मुख्यतः जनजातीय लोग बोलते हैं: आस्ट्रिक भाषाएँ बोलने वाले सभी लोग जनजातीय हैं, और तिब्बती-बर्मी भाषाएँ बोलने वालों में 80% से अधिक जनजातीय हैं।

आकार में सबसे बड़ी जनजातियाँ, जिनमें से हर एक की जनसंख्या कम से कम दस लाख है: गोंड, भील, संथाल, ओराँव, मीना, बोडो और मुंडा।
अर्जित लक्षण दो मुख्य कसौटियों पर जनजातियों को बाँटते हैं: (1) आजीविका का साधन, यानी मछुआ, खाद्य संग्राहक-आखेटक, झूम खेती करने वाले, कृषक, और बागान-औद्योगिक कामगार; और (2) हिंदू समाज में आत्मसात्करण की सीमा, जिसे जनजातियों के अपने नज़रिए से (वे कितना घुल-मिल गईं, हिंदुत्व के प्रति उनका रुख) या हिंदू मुख्यधारा के नज़रिए से (उन्हें दिया गया दर्जा, ऊँचे से लेकर आमतौर पर नीचे तक) देखा जा सकता है।
जनजाति : एक संकल्पना की जीवनी
1960 के दशक में विद्वानों में बहस थी कि जनजातियों को जाति-आधारित (हिंदू) कृषक समाज की ही एक कड़ी माना जाए, या इन्हें पूरी तरह अलग तरह का समुदाय माना जाए।
1970 के दशक तक आते-आते जनजाति की सभी प्रमुख परिभाषाएँ दोषपूर्ण दिखाई देने लगीं। जनजाति-कृषक भेद आकार, अलगाव, धर्म या आजीविका, किसी भी आम कसौटी पर खरा नहीं उतरा।
किताब के अपने प्रति-उदाहरण ठीक से याद करें:
- संथाल, गोंड और भील जैसी जनजातियाँ बहुत बड़ी हैं और विशाल क्षेत्र में फैली हैं, ये छोटे अलग-थलग समूह नहीं हैं।
- मुंडा और हो जैसी जनजातियाँ बहुत पहले से बसकर खेती करने लगी हैं, ये सारी शिकारी-संग्राहक नहीं हैं।
- बिहार की बिरहोर जैसी शिकारी-संग्राहक जनजातियों ने भी विशेष प्रकार के घर बसा लिए हैं, जहाँ रहकर वे टोकरियाँ बुनती हैं और तेल निकालने जैसे अन्य कार्य करती हैं।
- दूसरे विकल्प न होने पर गैर-जनजातीय ‘जातियों’ ने भी शिकार और संग्रहण अपनाया है, इसलिए आजीविका अकेले जनजाति को अलग नहीं ठहराती।
जनजातियाँ सदियों में कई तरीकों से हिंदू समाज में शामिल हुईं: संस्कृतिकरण, सवर्ण हिंदुओं द्वारा विजय के बाद शूद्रवर्णों में शामिल करना, और परसंस्कृतिग्रहण (acculturation, यानी लंबे संपर्क में रहने से किसी दूसरे समूह की संस्कृति धीरे-धीरे अपना लेना)। शुरुआती मानवविज्ञानियों ने इस समावेश के सांस्कृतिक पक्ष पर ज़ोर दिया, बाद के लेखकों ने इसके शोषणकारी और राजनीतिक पक्ष पर, जब जनजातीय ज़मीनें बस्तियों में बदलीं और जंगल कटे।
कुछ विद्वान जनजातियों को ‘आदिम‘ (मौलिक, सभ्यता से अछूता) मानने से इनकार करते हैं। इसकी जगह वे कहते हैं कि जनजातियाँ ‘द्वितीयक प्रघटना‘ (यानी एक बाद में बनी घटना) हैं, जो पहले से मौजूद राज्यों और जनजातियों जैसे राज्येतर समूहों के बीच शोषणकारी, उपनिवेशवादी संपर्क से पैदा हुईं। यह संपर्क खुद ही ‘जनजातिवाद‘ की विचारधारा को जन्म देता है, यानी जनजातीय समूह खुद को नए मिले दूसरे लोगों से अलग दिखाने के लिए ‘जनजाति’ के रूप में परिभाषित करने लगते हैं।
आदिवासी हमेशा से उतने पीड़ित नहीं थे जितने आज हैं। मध्य भारत में गोंड राज्य रहे हैं, जैसे गढ़ मांडला और चाँदा। मध्य व पश्चिमी भारत के कई तथाकथित ‘राजपूत’ राज्य असल में आदिवासी समुदायों में ही स्तरीकरण की प्रक्रिया से बने। आदिवासी अक्सर अपनी आक्रामक क्षमता और स्थानीय सैन्य दलों में अपनी सेवाओं के माध्यम से मैदानी इलाकों के लोगों पर अपने प्रभुत्व का प्रयोग करते थे, और वन उत्पाद, नमक व हाथियों के व्यापार में उनकी खास जगह थी।
राष्ट्रीय विकास बनाम जनजातीय विकास
‘विकास’ की ज़रूरतों ने जनजातियों के प्रति राज्य का रवैया और नीतियाँ तय कीं। राष्ट्रीय विकास के नाम पर, विशेष रूप से नेहरू युग में, बड़े-बड़े बांध बनाए गए, कारखाने स्थापित किए गए और खानों की खुदाई शुरू की गई। जनजातीय इलाके खनिज-संपन्न और वनाच्छादित होने की वजह से जनजातीय समुदायों को बाकी समाज के विकास की असंगत कीमत चुकानी पड़ी।
झारखंड के औद्योगिक इलाकों में जनजातीय हिस्सा घटा है। सबसे अधिक नाटकीय स्थिति संभवतः पूर्वोत्तर क्षेत्र में है: त्रिपुरा में जनजातीय आबादी का हिस्सा एक ही दशक में आधा रह गया, जिससे जनजातियाँ अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन गईं। अरुणाचल प्रदेश पर भी आज ऐसा ही दबाव है।
समकालीन जनजातीय पहचान
आज की जनजातीय पहचान मुख्यधारा के साथ चल रही अंतःक्रिया से बनती है, किसी ‘आदिम’ (मौलिक, प्राचीन) गुण से नहीं। यह अंतःक्रिया ज़्यादातर जनजातियों के प्रतिकूल शर्तों पर हुई है, इसीलिए आज कई जनजातीय पहचानें गैर-जनजातीय दुनिया की भारी ताक़त के प्रतिरोध पर केंद्रित हैं।
सकारात्मक बदलाव
- लंबे संघर्ष के बाद झारखंड और छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा मिला
- शिक्षित जनजातीय मध्य वर्ग उभर रहा है, सबसे ज़्यादा पूर्वोत्तर में
- आरक्षण नीतियों और शिक्षा से नगरीकृत, व्यावसायिक जनजातीय वर्ग बन रहा है
बनी हुई समस्याएँ
- पूर्वोत्तर के कई राज्य दशकों से ऐसे विशेष कानूनों में जी रहे हैं जो नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित करते हैं
- विकास का दबाव आप्रवास और ज़मीन की हानि लाता रहता है
जैसे-जैसे जनजातीय समाज में अपने ही वर्ग-विभाजन बढ़ते हैं, अलग-अलग समूहों के लिए जनजातीय पहचान जताने के कारण भी अलग-अलग होते जाते हैं।
जनजातीय आंदोलनों के पीछे दो तरह के मुद्दे हैं: (1) ज़मीन और खासकर जंगल जैसे अहम आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण, और (2) जातीय-सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे। ये दोनों साथ भी चल सकते हैं, पर जनजातीय समाज जितना ज़्यादा विभाजित होता है, ये उतने ही अलग भी हो सकते हैं, मध्य वर्ग के जनजातीय पहचान जताने के कारण गरीब, अशिक्षित जनजातीय लोगों के आंदोलन में शामिल होने के कारणों से अलग हो सकते हैं।
‘जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का आग्रह दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह हो सकता है कि जनजातीय समाज के भीतर भी एक मध्य वर्ग का प्रादुर्भाव हो चला है। विशेष रूप से इस वर्ग के प्रादुर्भाव के साथ ही, संस्कृति, परंपरा, आजीविका यहाँ तक कि भूमि तथा संसाधन पर नियंत्रण और आधुनिकता की परियोजनाओं के लाभ में हिस्से की माँग भी जनजातियों में अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के आग्रह का अभिन्न अंग बन गई है। इसलिए अब जनजातियों में उनके मध्य वर्ग से एक नई जागरूकता की लहर आ रही है। ये मध्य वर्ग स्वयं भी आधुनिक शिक्षा और आधुनिक व्यवसायों का परिणाम हैं, जिन्हें सरकार की आरक्षण नीतियों से बल मिला है।’
वर्जीनियस खाखा, ‘कल्चर, पॉलिटिक्स एंड आइडेंटिटी: द केस ऑफ़ द ट्राइब्स इन इंडिया’, जॉन एट अल 2006 (बॉक्स 3.1)
प्रादुर्भाव यानी उदय, किसी नई चीज़ का सामने आना।
3.3 परिवार और नातेदारी
हम सब किसी न किसी परिवार में जन्म लेते हैं और ज़्यादातर लोग जीवन के कई साल परिवार में ही बिताते हैं। परिवार जितना गहरे स्नेह और देखभाल की जगह है, उतना ही यह कटु संघर्ष, अन्याय और हिंसा की जगह भी रहा है। मादा-शिशु हत्या, संपत्ति के लिए भाइयों के बीच हिंसक झगड़े और घिनौने कानूनी विवाद, ये सब उतने ही परिवार और नातेदारी का हिस्सा हैं जितने प्यार, त्याग और देखभाल की कहानियाँ।
परिवार की संरचना को दो तरह से पढ़ा जा सकता है: एक सामाजिक संस्था के रूप में खुद अपने आप में, और समाज की दूसरी संस्थाओं से इसके रिश्ते के रूप में।
अपने आप में परिवार मूल या विस्तृत हो सकता है; इसका मुखिया पुरुष या स्त्री हो सकता है; और वंशानुक्रम की दिशा मातृवंशीय या पितृवंशीय हो सकती है।
समाज की दूसरी संरचनाओं से परिवार का रिश्ता
परिवार की भीतरी संरचना आमतौर पर समाज की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं से जुड़ी होती है।
हिमालयी गाँव
हिमालयी क्षेत्र के गाँवों से जब पुरुष काम के लिए बाहर जाते हैं, तो उस गाँव में स्त्री-मुखिया परिवारों का अनुपात असामान्य रूप से बढ़ सकता है।
भारत का सॉफ्टवेयर उद्योग
सॉफ्टवेयर उद्योग में काम करने वाले युवा माता-पिता का कार्य-समय कठिन होने पर, दादा-दादी या नाना-नानी अपने पोते-पोतियों की देखभाल के लिए साथ आकर रहने लगते हैं।
परिवार (निजी क्षेत्र) आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक (सार्वजनिक) क्षेत्रों से जुड़ा होता है। परिवार में कुछ बदलाव अचानक होते हैं, जैसे युद्ध या काम की तलाश में प्रवसन। कुछ बदलाव जान-बूझकर किए जाते हैं, जैसे बुज़ुर्गों की जगह खुद युवा अपना जीवनसाथी चुनें, या समलैंगिक प्रेम को खुलकर स्वीकार किया जाए। इतिहास और आधुनिक काल की घटनाओं से पता चलता है कि अक्सर पारिवारिक और वैवाहिक प्रतिमानों में किए जाने वाले परिवर्तनों का घोर हिंसात्मक विरोध किया जाता है।
मूल एवं विस्तृत परिवार
भारत में परिवार पर ज़्यादातर चर्चा मूल और विस्तृत परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती है।
मूल परिवार
- सिर्फ़ माता-पिता (दंपति) और उनके बच्चे
विस्तृत परिवार (‘संयुक्त परिवार’)
- एक से ज़्यादा दंपति, अक्सर दो से ज़्यादा पीढ़ियाँ साथ रहती हैं
- कई भाई अपने-अपने परिवारों के साथ, या एक बुज़ुर्ग दंपति अपने बेटों-पोतों के परिवारों के साथ
विस्तृत परिवार को अक्सर ‘भारत की पहचान’ माना जाता है, पर किताब साफ़ कहती है कि यह न आज और न पहले भारत का प्रमुख पारिवारिक रूप रहा है। यह समुदाय के कुछ अनुभागों या कतिपय क्षेत्रों तक ही सीमित था।
“अंग्रेज़ी का ‘ज्वाइंट फैमिली’ शब्द किसी भी ऐसे भारतीय शब्द का अनुवाद नहीं है। यह बात रुचिकर है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में संयुक्त परिवार के लिए प्रयुक्त शब्द अंग्रेज़ी भाषा के ‘ज्वाइंट फैमिली’ शब्द का ही अनुवादित पर्याय है।”
आई.पी. देसाई (देसाई 1964:40)
परिवार के विविध रूप
अलग-अलग समाजों में परिवार तीन अलग पहलुओं के आधार पर बदलता है: आवास का नियम, उत्तराधिकार का नियम, और सत्ता किसके पास है। इन तीनों को आपस में न मिलाएँ।
| नियम | पहला प्रकार | दूसरा प्रकार |
|---|---|---|
| निवास: दंपति कहाँ रहता है | पत्नी-स्थानिक: दंपति पत्नी के माता-पिता के साथ रहता है | पति-स्थानिक: दंपति पति के माता-पिता के साथ रहता है |
| उत्तराधिकार: संपत्ति कैसे मिलती है | मातृवंशीय: संपत्ति माँ से बेटी को मिलती है | पितृवंशीय: संपत्ति पिता से पुत्र को मिलती है |
| सत्ता: किसके हाथ में अधिकार | पितृतंत्र: पुरुषों की सत्ता और प्रभुत्व | मातृतंत्र: स्त्रियों की वैसी ही प्रभुत्वकारी भूमिका |
मातृवंश और मातृतंत्र को कभी एक न समझें। यही किताब का प्रश्न 10 है: ‘मातृवंश और मातृतंत्र में क्या अंतर है? व्याख्या कीजिए।’
- मातृतंत्र सैद्धांतिक है, अनुभाविक नहीं। किताब साफ़ कहती है कि मातृतंत्र, यानी ऐसा समाज जहाँ स्त्रियाँ पुरुषों जैसा प्रभुत्व रखती हों, इसका कोई ऐतिहासिक या मानवशास्त्रीय प्रमाण नहीं मिलता।
- मातृवंशीय समाज असल में मौजूद हैं, यानी वे समाज जहाँ स्त्रियाँ अपनी माँ से संपत्ति की उत्तराधिकारी बनती हैं। परंतु उस पर उनका अधिकार नहीं होता, और न ही सार्वजनिक क्षेत्र में उन्हें निर्णय लेने का कोई अधिकार होता है।
एक पंक्ति में: मातृवंश यह तय करता है कि संपत्ति किसे मिलती है; मातृतंत्र यह बताता है कि सत्ता किसके पास है। मातृवंशीय समाज अवश्य पाए जाते हैं। मातृतंत्र का कोई ऐतिहासिक या मानवशास्त्रीय प्रमाण नहीं है।
- जाति = वर्ण (पूरे भारत में, चार भाग) + जाति (स्थानीय, सैकड़ों उप-जातियाँ), कठोर सिर्फ़ उत्तर-वैदिक काल से
- जाति की छह विशेषताएँ: जन्म, सजातीयता, भोजन नियम, अधिक्रम, खंडात्मक संगठन, वंशानुगत व्यवसाय, ये सब ‘निर्धारित नियम’ हैं, व्यवहार का प्रमाण नहीं
- जाति-अधिक्रम शुद्धता-अशुद्धता पर टिका है, व्यवस्था एक साथ ‘पृथक्करण’ और ‘अधिक्रम’ दोनों है
- 1901 की जनगणना (रिजले) और 1935 का अधिनियम (अनुसूचित जातियाँ/जनजातियाँ) दिखाते हैं कि अंग्रेज़ी शासन ने जाति को कैसे नया रूप दिया
- संस्कृतिकरण = उच्च जाति की परिपाटियाँ अपनाकर ऊँचा उठने का प्रयत्न; प्रबल जाति = भूमि-अधिकार + बड़ी संख्या वाली जातियाँ, जिनके पास असली ताक़त आई (यादव, वोक्कलिंग, रेड्डी-खम्मा, मराठे, जाट, पाटीदार)
- जाति सुविधासंपन्न उच्च जातियों के लिए ‘अदृश्य’ है, पर SC/ST/पिछड़ी जातियों के लिए बिल्कुल उल्टा, अपरिहार्य
- जनजातियाँ नकारात्मक शब्दों में (वे क्या नहीं हैं) परिभाषित होती हैं; ‘आदिम, अछूती जनजाति’ की धारणा काफ़ी लंबे समय से सच नहीं रही (संथाल/गोंड/भील बहुत बड़ी हैं; मुंडा/हो खेती करते हैं; बिरहोर टोकरी बुनने, तेल निकालने जैसे काम भी करते हैं)
- भारत की जनजातीय जनसंख्या: 2001 में 8.2%, 2011 में 8.6%; करीब 85% ‘मध्य भारत’ में
- राष्ट्रीय विकास (बांध, खदानें, कारखाने) ने जनजातीय समुदायों को असंगत कीमत चुकवाई, त्रिपुरा में जनजातीय हिस्सा एक दशक में आधा हो गया
- मातृवंश (ऐसे समाज मौजूद हैं: स्त्रियाँ माँ से जायदाद पाती हैं, पर उस पर उनका अधिकार नहीं होता और न सार्वजनिक निर्णय का अधिकार) कभी मातृतंत्र (सैद्धांतिक, कोई प्रमाण नहीं) के बराबर नहीं है
- क्या मैं बिना देखे जाति की सभी छह विशेषताएँ बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं संस्कृतिकरण और प्रबल जाति को एक-एक उदाहरण के साथ समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं ‘आदिम, अछूती जनजाति’ की धारणा के खिलाफ़ तीन सबूत दे सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं एक पंक्ति में बता सकता/सकती हूँ कि मातृवंश और मातृतंत्र एक क्यों नहीं हैं?
- क्या मैं छह में से कम से कम चार प्रबल जातियाँ उनके राज्यों सहित बता सकता/सकती हूँ?