इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. वर्ण क्या है?
उत्तर: वर्ण समाज का चार-भाग का, पूरे भारत में एक-जैसा विभाजन है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
प्र. जाति क्या है?
उत्तर: जाति किसी भी चीज़ के ‘प्रकार’ या ‘किस्म’ के लिए इस्तेमाल होने वाला व्यापक शब्द है, और भारतीय भाषाओं में जाति संस्था के लिए सामान्यतः यही शब्द प्रयुक्त होता है। सबसे सामान्य व्याख्या में जाति एक क्षेत्रीय या स्थानीय उप-वर्गीकरण है, जिसमें सैकड़ों या हज़ारों जातियों और उप-जातियों से बनी व्यवस्था शामिल होती है।
प्र. सजातीयता (endogamy) क्या है?
उत्तर: सजातीयता वह नियम है जिसके अनुसार विवाह सिर्फ़ अपनी ही जाति समूह के सदस्यों तक सीमित रहता है।
प्र. ‘संस्कृतिकरण’ और ‘प्रबल जाति’ शब्द किसने गढ़े?
उत्तर: दोनों शब्द समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास ने गढ़े थे।
प्र. किस अधिनियम ने ‘अनुसूचित जातियाँ’ और ‘अनुसूचित जनजातियाँ’ शब्द बनाए?
उत्तर: भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने।
प्र. मूल परिवार क्या है?
उत्तर: मूल परिवार में सिर्फ़ एक जोड़ा माता-पिता और उनके बच्चे शामिल होते हैं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. वर्ण और जाति में अंतर बताएँ।
उत्तर: वर्ण पूरे भारत का, चार-भाग का एक-जैसा वर्गीकरण है (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)। जाति एक क्षेत्रीय या स्थानीय उप-वर्गीकरण है, जिसमें सैकड़ों-हज़ारों जातियाँ और उप-जातियाँ शामिल हैं, जो क्षेत्र-दर-क्षेत्र बदलती रहती हैं।
प्र. जाति के ‘खंडात्मक संगठन’ का क्या मतलब है?
उत्तर: इसका मतलब है कि जातियों में हमेशा उप-जातियाँ होती हैं, और कभी-कभी उन उप-जातियों में भी आगे अपनी उप-जातियाँ होती हैं, यानी जाति व्यवस्था विभाजनों के भीतर विभाजन की तरह संगठित है।
प्र. अध्याय में नामित किन्हीं दो प्रबल जातियों को उनके राज्यों सहित बताएँ।
उत्तर: कोई भी दो, जैसे: बिहार और उत्तर प्रदेश के यादव, और कर्नाटक के वोक्कलिंग। (अन्य सही उत्तर: आंध्र प्रदेश के रेड्डी/खम्मा, महाराष्ट्र के मराठे, पंजाब/हरियाणा/पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट, गुजरात के पाटीदार।)
प्र. जनजाति के ‘स्थायी’ और ‘अर्जित’ लक्षणों से क्या मतलब है?
उत्तर: स्थायी लक्षणों में क्षेत्र, भाषा, शारीरिक विशिष्टताएँ और पारिस्थितिक आवास शामिल हैं। अर्जित लक्षण आजीविका के साधन और हिंदू समाज में आत्मसात्करण की सीमा पर आधारित होते हैं।
प्र. जनजातियों को सभ्यता से अछूता आदिम समुदाय मानने की धारणा के खिलाफ़ कोई दो सबूत दें।
उत्तर: कोई भी दो: (1) संथाल, गोंड और भील जैसी जनजातियाँ बहुत बड़ी हैं और विशाल क्षेत्र में फैली हैं, छोटे अलग-थलग समूह नहीं हैं। (2) मुंडा और हो जैसी जनजातियाँ बहुत पहले से बसकर खेती करने लगी हैं। (3) शिकारी-संग्राहक बिहार के बिरहोर भी विशेष शिल्प-घर चलाते हैं। (4) गढ़ मांडला और चाँदा जैसे ऐतिहासिक गोंड राज्य रहे हैं।
प्र. पत्नी-स्थानिक और पति-स्थानिक निवास में अंतर बताएँ।
उत्तर: पत्नी-स्थानिक विवाह प्रथा में नवविवाहित दंपति पत्नी के माता-पिता के साथ रहता है। पति-स्थानिक प्रथा में दंपति पति के माता-पिता के साथ रहता है।
प्र. जाति के इतिहास में 1901 की जनगणना को महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
उत्तर: हरबर्ट रिजले के निर्देशन में हुई 1901 की जनगणना ने खासतौर पर जातियों को सामाजिक अधिक्रम में रैंक करने की कोशिश की। इससे विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों ने ऊँचे स्थान की माँग करते हुए जनगणना आयुक्त के पास सैकड़ों याचिकाएँ भेजीं, और विद्वानों का मानना है कि जाति को गिनने और दर्ज करने की इस सीधी कोशिश ने ख़ुद संस्था को बदल दिया, जिससे जातीय पहचानें पहले से ज़्यादा कठोर हो गईं।
प्र. सत्यशोधक समाज क्या था?
उत्तर: सत्यशोधक समाज (सत्य खोजने वालों की सभा) की स्थापना जोतिराव गोविन्दराव फुले ने 1873 में की थी, जो निम्न जाति के लोगों के मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित थी।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. जाति को परिभाषित करने वाली अध्याय की छह विशेषताओं में से किन्हीं चार को समझाएँ।
उत्तर: किन्हीं चार को: (1) जाति जन्म से तय होती है; यह कभी चुनाव का विषय नहीं होती, हालाँकि ऐसे उदाहरण हैं जहाँ व्यक्ति को उसकी जाति से निकाला भी जा सकता है। (2) जाति समूह सजातीय होते हैं; विवाह सिर्फ़ अपने ही समूह के सदस्यों तक सीमित रहता है। (3) जाति में भोजन और भोजन-साझेदारी के नियम शामिल हैं: क्या खाया जा सकता है, और किसके साथ। (4) जाति व्यवस्था में कई जातियाँ रैंक और स्तर के अधिक्रम में सजी होती हैं। (5) जातियों का खंडात्मक संगठन होता है, यानी जातियों के भीतर उप-जातियाँ। (6) जातियाँ पारंपरिक रूप से वंशानुगत व्यवसाय से जुड़ी थीं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था।
प्र. इस सिद्धांत को समझाएँ कि जाति दो संगठनात्मक सिद्धांतों को जोड़ती है।
उत्तर: जाति व्यवस्था भिन्नता और पृथक्करण को संपूर्णता और अधिक्रम के साथ जोड़ती है। भिन्नता और पृथक्करण के तहत, हर जाति को हर दूसरी जाति से कड़ाई से अलग रखा जाना है, और जाति के अधिकांश धर्मग्रंथसम्मत नियमों की रूपरेखा, शादी, खान-पान और सामाजिक अंतःक्रिया से लेकर व्यवसाय तक, जातियों को मिश्रित होने से बचाने के अनुसार बनाई गई है। संपूर्णता और अधिक्रम के तहत, कोई भी जाति अकेले नहीं रह सकती; हर जाति सिर्फ़ सभी जातियों की कुल व्यवस्था के हिस्से के रूप में मौजूद है, और वह कुल व्यवस्था बराबरी की नहीं, बल्कि एक तय, ऊँचे से नीचे तक क्रम वाली अधिक्रम की व्यवस्था है।
प्र. संस्कृतिकरण और प्रबल जाति में अंतर बताएँ, हर एक का एक उदाहरण देते हुए।
उत्तर: संस्कृतिकरण एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है: मध्यम या निम्न जाति के सदस्य किसी ऊँची जाति के अनुष्ठानिक, घरेलू और सामाजिक व्यवहार अपनाकर अपना सामाजिक स्तर ऊँचा उठाते हैं। ‘प्रबल जाति’ शब्द उन जातियों के लिए प्रयुक्त होता है जिनकी जनसंख्या बड़ी थी और जिन्हें स्वतंत्रता के बाद के आंशिक भूमि सुधारों से भूमि के अधिकार मिले; इससे उन्हें देहात में असली आर्थिक-राजनीतिक ताक़त मिली। संस्कृतिकरण का उदाहरण (पुस्तक से बाहर, केवल समझाने के लिए): किसी निम्न जाति का ऊँची जाति के धार्मिक अनुष्ठान और घरेलू परिपाटियाँ, जैसे शाकाहार, अपनाकर स्तर ऊँचा करने का प्रयत्न। प्रबल जाति का उदाहरण: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट।
प्र. शहरी उच्च जाति के मध्यम और उच्च वर्गों के लिए जाति ‘अदृश्य’ क्यों हो गई है, यह समझाएँ।
उत्तर: इस वर्ग को उत्तर-औपनिवेशिक विकास से सबसे ज़्यादा फ़ायदा मिला: सब्सिडी वाली सार्वजनिक शिक्षा, जिसमें विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा और प्रबंधन की व्यावसायिक शिक्षा शामिल है, और आज़ादी के शुरुआती दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों का विस्तार। शिक्षा में इनकी शुरुआती बढ़त का मतलब था कि इन्हें किसी गंभीर प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ा। दूसरी और तीसरी पीढ़ियों में जब इनकी विशेषाधिकार प्राप्त प्रस्थिति और सुदृढ़ हो गई, तब इन समूहों को विश्वास होने लगा कि उनकी प्रगति का जाति से कोई ज़्यादा लेना-देना नहीं था; तीसरी पीढ़ी के लिए अकेले आर्थिक और शैक्षिक पूँजी ही सर्वोत्तम अवसरों के लिए पूर्णतः पर्याप्त है। इनके लिए अब जाति सिर्फ़ धर्म, विवाह और नातेदारी के निजी दायरे तक सीमित लगती है। हालाँकि, हर उच्च जाति का व्यक्ति सुविधासंपन्न नहीं है; कुछ गरीब भी हैं।
प्र. स्थायी लक्षणों के आधार पर जनजातियों के वर्गीकरण को समझाएँ।
उत्तर: स्थायी लक्षणों में क्षेत्र, भाषा, शारीरिक विशिष्टताएँ और पारिस्थितिक आवास शामिल हैं। क्षेत्र के आधार पर, करीब 85% जनजातीय लोग ‘मध्य भारत’ (गुजरात/राजस्थान से पश्चिम बंगाल/ओडिशा तक) में रहते हैं, 11% से ज़्यादा पूर्वोत्तर में, और 3% से थोड़े-से अधिक शेष भारत में। भाषा के आधार पर, जनजातियाँ चार समूहों में बँटी हैं: भारतीय-आर्य और द्रविड़ (बाकी जनसंख्या से भी साझा) और आस्ट्रिक व तिब्बती-बर्मी (मुख्यतः जनजातीय लोग ही बोलते हैं)। शारीरिक विशिष्टताओं के आधार पर, जनजातियों को नीग्रिटो, आस्ट्रैलॉइड, मंगोलॉइड, द्रविड़ या आर्य में वर्गीकृत किया जाता है। पारिस्थितिक आवास पहाड़ों-जंगलों से लेकर ग्रामीण मैदानों और शहरी औद्योगिक इलाकों तक फैले हैं।
प्र. राष्ट्रीय विकास ने जनजातीय समुदायों को असंगत रूप से किस तरह कीमत चुकवाई, समझाएँ।
उत्तर: जनजातीय इलाके देश के खनिज-संपन्न और वनाच्छादित भागों में स्थित थे, इसलिए राष्ट्रीय विकास (नेहरू युग के बड़े बांध, कारखाने और खदानें) की जनजातियों को अनुपात से बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ी। खनिज दोहन और जल-विद्युत संयंत्रों के लिए चुने गए स्थलों में से अनेक जनजातीय इलाकों में थे, जिससे जनजातियों की ज़मीनें छिनीं। अंग्रेज़ी शासन में शुरू हुआ और आज़ादी के बाद भी जारी रहा जंगलों का व्यवस्थित दोहन, उन जनजातीय समुदायों को नुकसान पहुँचाता है जो अपनी आजीविका के लिए जंगल पर निर्भर थे। ज़मीन पर निजी स्वामित्व लागू होने से उन जनजातीय समुदायों को नुकसान हुआ, जिनका पारंपरिक स्वामित्व सामुदायिक था। विकास के दबाव ने गैर-जनजातीय लोगों का भारी आप्रवास भी लाया, जैसे झारखंड में जनजातीय हिस्सा घटना, और त्रिपुरा (सबसे नाटकीय स्थिति संभवतः पूर्वोत्तर में) में जनजातीय हिस्सा एक ही दशक में आधा हो जाना।
प्र. मातृवंश और मातृतंत्र में अंतर बताएँ।
उत्तर: मातृवंश उत्तराधिकार का एक नियम है, और मातृवंशीय समाज अवश्य पाए जाते हैं: इनमें संपत्ति माँ से बेटी को मिलती है। पर इन समाजों में स्त्रियों का उस संपत्ति पर अधिकार नहीं होता, और न ही सार्वजनिक क्षेत्र में उन्हें निर्णय लेने का कोई अधिकार होता है। मातृतंत्र का मतलब होता कि स्त्रियों के पास वैसा ही प्रभुत्व हो जैसा पितृतंत्र में पुरुषों के पास है, पर अध्याय साफ़ कहता है कि मातृतंत्र सिर्फ़ एक सैद्धांतिक धारणा है; ऐसे किसी समाज का कोई ऐतिहासिक या मानवशास्त्रीय प्रमाण नहीं है जहाँ स्त्रियाँ वाकई ऐसा प्रभुत्व रखती हों।
प्र. परिवार जो अलग-अलग रूप ले सकता है, समझाएँ।
उत्तर: परिवार मूल (एक जोड़ा माता-पिता और उनके बच्चे) या विस्तृत/संयुक्त (एक से ज़्यादा दंपति, अक्सर दो से ज़्यादा पीढ़ियाँ साथ) हो सकता है। इसका मुखिया पुरुष या स्त्री हो सकता है। इसका निवास नियम पत्नी-स्थानिक (दंपति पत्नी के माता-पिता के साथ) या पति-स्थानिक (पति के माता-पिता के साथ) हो सकता है। इसका उत्तराधिकार नियम मातृवंशीय (संपत्ति बेटियों को) या पितृवंशीय (संपत्ति बेटों को) हो सकता है। इसकी सत्ता-संरचना पितृतंत्रात्मक (पुरुष प्रभुत्व) या, सैद्धांतिक रूप से, मातृतंत्रात्मक हो सकती है, हालाँकि किताब बताती है कि मातृतंत्र का कोई ऐतिहासिक या मानवशास्त्रीय प्रमाण नहीं है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. ‘जाति एक बहुत असमान संस्था थी।’ इस कथन की चर्चा इसकी ऐतिहासिक विशेषताओं और औपनिवेशिक व समकालीन बदलावों के संदर्भ में करें।
उत्तर: ऐतिहासिक विशेषताएँ: जाति की छह परिभाषित विशेषताओं (जन्म, सजातीयता, भोजन नियम, अधिक्रम, खंडात्मक संगठन, वंशानुगत व्यवसाय) का मतलब था कि व्यक्ति के जीवन की संभावनाएँ जन्म से ही तय हो जाती थीं, जाति के जन्म से कठोरता से निर्धारित होने के बाद सैद्धांतिक तौर पर जीवन स्थिति बदलने की कोई गुंजाइश नहीं थी; अधिक्रम शुद्धता-अशुद्धता पर आधारित था, इसलिए कुछ जातियों का स्तर हमेशा ऊँचा और कुछ का हमेशा नीचा रहता, चाहे योग्यता कुछ भी हो। औपनिवेशिक बदलाव: अंग्रेज़ों के सर्वेक्षणों और दस-वर्षीय जनगणना ने (खासकर हरबर्ट रिजले के अधीन 1901 की जनगणना ने) पहले से ज़्यादा लचीली जातीय पहचानों को कठोर बना दिया, क्योंकि जातियाँ ऊँची रैंक के लिए याचिका देने लगीं। इन्हीं प्रयत्नों के अंतर्गत भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित हुआ, जिसने विशेष व्यवहार के लिए निर्धारित जातियों और जनजातियों की सूचियों (‘अनुसूचियों’) को वैध मान्यता दी; इसी से ‘अनुसूचित जातियाँ’ और ‘अनुसूचित जनजातियाँ’ शब्द अस्तित्व में आए। समकालीन बदलाव: आज़ादी के बाद के राज्य ने संवैधानिक रूप से जाति ख़त्म करने का संकल्प लिया और SC/ST के लिए आरक्षण शुरू किया, पर जाति की असमानता सांस्कृतिक और घरेलू क्षेत्र में मज़बूती से बनी हुई है (सजातीयता बड़े तौर पर अप्रभावित है, हालाँकि अंतर्जातीय विवाह अब पहले से अधिक हो रहे हैं) और यह जाति-आधारित दलों के ज़रिए चुनावी राजनीति को भी आकार देती है। निष्कर्ष: कुछ संस्कृतिकरण और प्रबल जाति की गतिशीलता ज़रूर हुई है, पर जाति की मूल असमानता, खासकर उच्च जातियों के लिए इसकी अदृश्य सुविधा बनाम SC/ST/पिछड़ी जातियों के लिए इसकी अपरिहार्य दृश्यता, आज भी जारी है।
प्र. इस बहस की चर्चा करें कि जनजातियाँ जाति समाज के साथ एक सातत्य (continuum) का हिस्सा हैं या पूरी तरह अलग तरह का समुदाय। 1970 के दशक की आलोचना ने क्या स्थापित किया?
उत्तर: 1960 के दशक में एक समूह का तर्क था कि जनजातियाँ जाति-आधारित (हिंदू) कृषक समाज के साथ एक सातत्य का ही एक छोर हैं, बुनियादी रूप से अलग नहीं, बस कम स्तरीकृत (अधिक्रम के कम स्तर) और संसाधन-स्वामित्व में व्यक्ति की बजाय समुदाय-आधारित। दूसरा पक्ष मानता था कि जनजातियाँ जातियों से पूरी तरह अलग हैं क्योंकि इनमें जाति समाज के केंद्रीय शुद्धता-अशुद्धता की धारणा नहीं है, और इन्हें ज़्यादा समतावादी, नातेदारी-आधारित (‘जीववादी’) माना जाता था। पर 1970 के दशक तक आते-आते, जनजाति की सभी प्रमुख परिभाषाएँ दोषपूर्ण दिखाई देने लगीं: जनजाति-कृषक भेद हर आम कसौटी पर विफल रहा, आकार, अलगाव, धर्म और आजीविका। किताब के अपने प्रति-प्रमाण: संथाल, गोंड और भील बड़ी और व्यापक रूप से फैली हैं (छोटी, अलग-थलग नहीं); मुंडा और हो बसकर खेती करते हैं (सिर्फ़ ‘जनजातीय’ आजीविका नहीं); शिकारी-संग्राहक बिहार के बिरहोर भी विशेष शिल्प-घर चलाते हैं; और दूसरे विकल्प न होने पर गैर-जनजातीय ‘जातियों’ ने भी ख़ुद शिकार-संग्रहण अपनाया है। संक्षेप में, जनजाति और जाति के बीच अंतर दर्शाने वाला तर्क पवित्रता-अपवित्रता और अधिक्रमिक एकीकरण में विश्वास रखने वाली हिंदू जातियों और अपेक्षाकृत समतावादी, नातेदारी-आधारित जीववादी जनजातियों के बीच माने गए सांस्कृतिक अंतर पर आधारित था, और 1970 के दशक तक आम कसौटियाँ इस तर्क का समर्थन नहीं करती थीं।
प्र. उदाहरण सहित भारत में जनजातीय समुदायों पर राष्ट्रीय विकास नीतियों के असर की चर्चा करें।
उत्तर: राष्ट्रीय विकास के नाम पर, विशेष रूप से नेहरू युग में, बड़े-बड़े बांध बनाए गए, कारखाने स्थापित किए गए और खानों की खुदाई शुरू की गई। क्योंकि जनजातीय इलाके देश के खनिज-संपन्न और वनाच्छादित भागों में स्थित थे, इसलिए जनजातीय लोगों को शेष भारतीय समाज के विकास के लिए अनुपात से बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ी। खनिज दोहन और जल-विद्युत संयंत्रों के लिए उपयुक्त स्थलों के उपयोग (जिनमें से अनेक स्थल जनजातीय इलाकों में थे) के आवश्यक उप-उत्पाद के रूप में जनजातियों की ज़मीनें छिनीं, और बाकी समाज को जनजातियों की कीमत पर फ़ायदा हुआ। अंग्रेज़ी शासन में शुरू हुआ और आज़ादी के बाद भी जारी जंगलों का व्यवस्थित दोहन, ज़्यादातर जनजातीय समुदायों को उस संसाधन से वंचित करता है जिस पर वे निर्भर थे। ज़मीन पर निजी स्वामित्व की शुरुआत ने उन जनजातीय समुदायों को नुकसान पहुँचाया जिनका स्वामित्व पारंपरिक रूप से सामुदायिक और सामूहिक था। विकास के दबाव ने जनजातीय-बहुल इलाकों में गैर-जनजातीय लोगों का भारी आप्रवास भी लाया: झारखंड के औद्योगिक इलाकों में जनजातीय हिस्सा घटा, सबसे नाटकीय स्थिति संभवतः पूर्वोत्तर में है, जहाँ त्रिपुरा का जनजातीय हिस्सा एक ही दशक में आधा हो गया (जिससे वे अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन गए), और आज अरुणाचल प्रदेश पर भी ऐसा ही दबाव है। निष्कर्ष: राष्ट्रीय विकास ने लगातार जनजातीय समुदायों पर उस फ़ायदे के मुकाबले असंगत कीमत डाली है जो बाकी समाज को मिला।
प्र. ‘जाति कुछ के लिए अदृश्य है और कुछ के लिए अपरिहार्य।’ इस कथन को समझाएँ।
उत्तर: उच्च जाति के शहरी मध्यम और उच्च वर्गों के लिए जाति लगभग अदृश्य हो गई है, ठीक इसलिए क्योंकि यह उनके लिए इतनी अच्छी तरह काम कर चुकी है: उनकी जाति की स्थिति ने उन्हें सब्सिडी वाली व्यावसायिक शिक्षा और आज़ादी के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों के शुरुआती विस्तार तक पहुँच दी। दूसरी और तीसरी पीढ़ी तक, इन समूहों को विश्वास होने लगा कि उनकी प्रगति का जाति से कोई ज़्यादा लेना-देना नहीं था, और अब जाति उन्हें धर्म, विवाह और नातेदारी के निजी दायरे तक सीमित लगती है। पर यह समूह एक-जैसा नहीं है, हर उच्च जाति का व्यक्ति सुविधासंपन्न नहीं है, कुछ गरीब भी हैं। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लिए इसका उल्टा सच है: जाति और ज़्यादा दृश्य हो गई है, अक्सर उनकी पहचान के हर दूसरे पहलू को ढक देती है। पारिवारिक शैक्षिक और सामाजिक पूँजी न होने के कारण, और पहले से जमी हुई उच्च जाति से प्रतिस्पर्धा करते हुए, वे अपनी जातीय पहचान छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते, क्योंकि यह उनकी बहुत थोड़ी सी सामूहिक परिसंपत्तियों में से एक है। आरक्षण की नीतियाँ और राज्य द्वारा दिए गए अन्य संरक्षण उनके जीवन रक्षक उपाय हैं, परंतु इन जीवन रक्षक साधनों का उपयोग करना ही उनकी जाति को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बना देता है, और अक्सर यही उनकी पहचान का वह पक्ष होता है जिसे दुनिया मान्यता देती है।
प्र. परिवार जो अलग-अलग रूप ले सकता है, उनकी चर्चा करें, और समझाएँ कि पारिवारिक संरचना व्यापक समाज में हो रहे बदलावों से क्यों जुड़ी होती है।
उत्तर: परिवार मूल या विस्तृत/संयुक्त हो सकता है; पुरुष-मुखिया या स्त्री-मुखिया; निवास में पत्नी-स्थानिक या पति-स्थानिक; उत्तराधिकार में मातृवंशीय या पितृवंशीय; और पितृतंत्रात्मक (हालाँकि मातृतंत्र सिर्फ़ एक सैद्धांतिक, अदर्ज धारणा बनी हुई है)। भारत में परिवार पर ज़्यादातर चर्चा मूल-बनाम-विस्तृत भेद के इर्द-गिर्द ही घूमती है, हालाँकि लोकप्रिय धारणा के उलट, विस्तृत (‘संयुक्त’) परिवार कभी भारत का प्रमुख पारिवारिक रूप नहीं रहा; यह समुदाय के कुछ अनुभागों या कतिपय क्षेत्रों तक ही सीमित था, और ‘संयुक्त परिवार’ शब्द ख़ुद ही अंग्रेज़ी से अनूदित है, किसी मूल भारतीय अवधारणा का अनुवाद नहीं (आई.पी. देसाई)। पारिवारिक संरचना व्यापक समाज से इसलिए जुड़ी है क्योंकि परिवार निजी क्षेत्र है, जो सार्वजनिक क्षेत्रों, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक से जुड़ा है। उदाहरण के लिए, हिमालयी क्षेत्र के गाँवों से पुरुषों के काम के लिए प्रवसन से स्त्री-मुखिया परिवारों का अनुपात असामान्य रूप से बढ़ सकता है, और भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग के कठिन कार्य-समय से दादा-दादी या नाना-नानी देखभाल के लिए साथ आकर रहने लगते हैं। पारिवारिक संरचना में बदलाव अचानक (युद्ध, प्रवसन) या जान-बूझकर (युवाओं का अपना जीवनसाथी ख़ुद चुनना, या समलैंगिक प्रेम को खुलकर स्वीकार करना) हो सकता है, और अक्सर ऐसे बदलावों का घोर हिंसात्मक विरोध किया जाता है, जो दिखाता है कि पारिवारिक मानक बाकी समाज के मूल्यों से कितने गहरे जुड़े हैं।
प्र. उपनिवेशवाद और आज़ादी ने जाति संस्था में जो बदलाव लाए, उनका विवरण दें।
उत्तर: औपनिवेशिक बदलाव: अंग्रेज़ प्रशासकों ने पहले प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए जाति के रीति-रिवाज़ों का सर्वेक्षण किया। 1881 से नियमित दस-वर्षीय जनगणना, और खासकर हरबर्ट रिजले के अधीन 1901 की जनगणना ने जातियों को आधिकारिक रूप से रैंक करने की कोशिश की, जिससे सैकड़ों याचिकाएँ ऊँची रैंक के लिए आईं और जातीय पहचान पहले से ज़्यादा कठोर हो गई। भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की कानूनी श्रेणियाँ बनाईं। ये सभी परिवर्तन जान-बूझकर नहीं लाए गए, और उस काल में पूँजीवाद और आधुनिकता के प्रसार के कारण विश्व भर में तेज़ी से बदलाव आ रहा था। स्वतंत्रता से पहले के सुधार: ‘दलित वर्गों’ और अस्पृश्य जातियों को संगठित करने के प्रयत्न 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही शुरू हो चुके थे, उच्च जातियों के प्रगतिशील सुधारकों और जोतिबा फुले, अयन्कली, श्री नारायण गुरू, पेरियार जैसे निम्न जातियों के सदस्यों द्वारा; 1920 के दशक से गांधी और अंबेडकर ने अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलन शुरू किए। अस्पृश्यता-विरोधी कार्यक्रमों को कांग्रेस की कार्यसूची में महत्त्वपूर्ण स्थान मिला, और स्वतंत्रता क्षितिज पर दिखने तक राष्ट्रवादी आंदोलन में मोटे तौर पर यह सहमति हो गई कि जातीय विभिन्नताओं का उन्मूलन कर दिया जाए। आज़ादी के बाद के बदलाव: संविधान ने राज्य को जाति ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध किया और SC/ST के लिए आरक्षण शुरू हुआ, पर राज्य ने वे मूलगामी आर्थिक सुधार नहीं किए जो जाति की असमानता को जड़ से कमज़ोर करते। आधुनिक उद्योग और नगरीकरण ने कुछ जातीय प्रथाओं को कमज़ोर किया, पर औद्योगिक भर्ती, सांस्कृतिक/घरेलू जीवन (सजातीयता) और खासकर लोकतांत्रिक राजनीति में जाति मज़बूती से टिकी रही, जहाँ 1980 के दशक से जाति-आधारित राजनीतिक दल मौजूद रहे हैं। निष्कर्ष: उपनिवेशवाद और आज़ादी ने मिलकर जाति को एक क्षेत्र-दर-क्षेत्र बदलती, कुछ हद तक लचीली व्यवस्था से बदलकर एक ज़्यादा कठोर, आधिकारिक रूप से दर्ज और राजनीतिक रूप से सक्रिय संस्था बना दिया, इसे ख़त्म करने की बजाय।
5 केस स्टडी
समकालीन दौर में जाति व्यवस्था में हुए सबसे महत्वपूर्ण, फिर भी विरोधाभासी बदलावों में से एक यह है कि यह उच्च जाति के शहरी मध्यम और उच्च वर्गों के लिए ‘अदृश्य’ होती गई है। इन समूहों को, जिन्हें उत्तर-औपनिवेशिक दौर की विकास-नीतियों से सबसे ज़्यादा फ़ायदा मिला, जाति का महत्व ठीक इसलिए घटता दिखा क्योंकि उसने अपना काम बहुत अच्छी तरह कर दिया। इनकी जाति-स्थिति ने यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई कि इन समूहों के पास तेज़ विकास से मिले अवसरों का पूरा फ़ायदा उठाने के लिए ज़रूरी आर्थिक और शैक्षिक संसाधन हों। अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लिए इसका उल्टा हुआ है। उनके लिए जाति बहुत ज़्यादा दृश्य हो गई है, और उनकी जाति उनकी पहचान के दूसरे आयामों को अक्सर ढक लेती है।
(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार, जाति किस समूह के लिए ‘अदृश्य’ हो गई है?
उत्तर: उच्च जाति के शहरी मध्यम और उच्च वर्गों के लिए।
(ख) 2 अंक गद्यांश यह क्यों कहता है कि इस समूह के लिए जाति ‘ठीक इसलिए अदृश्य हुई क्योंकि उसने अपना काम बहुत अच्छी तरह कर दिया’?
उत्तर: क्योंकि उनकी जाति-स्थिति ने पहले ही उन्हें वे आर्थिक और शैक्षिक संसाधन दिला दिए थे जिनकी उन्हें उत्तर-औपनिवेशिक विकास से पूरा फ़ायदा उठाने के लिए ज़रूरत थी, इसलिए अब जाति को उनके पक्ष में दिखाई देकर काम करने की ज़रूरत नहीं रही, उसका फ़ायदा पहले ही जमा हो चुका है।
(ग) 3 अंक गद्यांश और पूरे अध्याय के अनुसार, इसकी तुलना अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों के साथ हुए के साथ करें।
उत्तर: इन समूहों के लिए उल्टा हुआ है: जाति और ज़्यादा दृश्य हो गई है, अक्सर उनकी पहचान के हर दूसरे हिस्से को ढक देती है। विरासत में मिली शैक्षिक और सामाजिक पूँजी न होने के कारण, और पहले से जमी हुई उच्च जाति से प्रतिस्पर्धा करते हुए, वे अपनी जातीय पहचान नहीं छोड़ सकते, क्योंकि यह उनकी बहुत थोड़ी सी सामूहिक परिसंपत्तियों में से एक है। आरक्षण और राज्य के अन्य संरक्षण उनके जीवन रक्षक उपाय हैं, परंतु इनका उपयोग करना ही उनकी जाति को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बना देता है, और अक्सर यही उनकी पहचान का वह पक्ष होता है जिसे दुनिया मान्यता देती है।
1970 के दशक तक आते-आते जनजाति की सभी प्रमुख परिभाषाएँ दोषपूर्ण दिखाई देने लगीं। यह दिखाया गया कि जनजाति-कृषक भेद आमतौर पर बताई जाने वाली किसी भी कसौटी पर खरा नहीं उतरता: आकार, अलगाव, धर्म और आजीविका का साधन। संथाल, गोंड और भील जैसी कुछ भारतीय ‘जनजातियाँ’ बहुत बड़ी हैं और विशाल क्षेत्र में फैली हैं। मुंडा और हो जैसी कुछ जनजातियाँ बहुत पहले से बसकर खेती करने लगी हैं, और शिकारी-संग्राहक बिरहोर जैसी जनजातियाँ भी टोकरी बनाने और तेल निकालने जैसे विशेष काम करने वाले घर चलाती हैं। यह भी देखा गया है कि दूसरा कोई विकल्प न होने पर गैर-जनजातीय ‘जातियों’ ने भी शिकार और संग्रहण अपनाया है।
(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार, 1970 के दशक तक किसकी सभी प्रमुख परिभाषाएँ दोषपूर्ण दिखाई देने लगीं?
उत्तर: जनजाति की परिभाषाएँ।
(ख) 2 अंक गद्यांश जनजाति-कृषक भेद को ग़लत साबित करने के लिए संथाल, गोंड और भील का उदाहरण क्यों देता है?
उत्तर: क्योंकि ये जनजातियाँ बहुत बड़ी हैं और विशाल क्षेत्र में फैली हैं, इसलिए ‘छोटी, अलग-थलग जनजाति’ वाली परिभाषा इन पर लागू नहीं होती, यह दिखाता है कि आकार और अलगाव जनजाति को जाति-कृषक समाज से अलग करने वाली भरोसेमंद कसौटी नहीं हैं।
(ग) 3 अंक गद्यांश में मुंडा, हो और बिरहोर के उदाहरण किस व्यापक तर्क को साबित करते हैं, और यह अध्याय के बाकी हिस्से से कैसे जुड़ता है?
उत्तर: ये उदाहरण साबित करते हैं कि आजीविका का साधन (सिर्फ़ शिकार-संग्रहण) भी जनजाति को जाति-कृषक समाज से भरोसे के साथ अलग नहीं करता, क्योंकि मुंडा और हो बसकर खेती करते हैं और बिरहोर विशेष शिल्प-घर भी चलाते हैं। यह अध्याय के इस बड़े तर्क से जुड़ता है कि जनजातीय समुदायों को समय से अछूते आखेटक-संग्राहक समाज मानने की आम धारणा काफ़ी लंबे समय से सच नहीं रही। साथ ही, गैर-जनजातीय ‘जातियों’ ने भी विकल्प न होने पर शिकार-संग्रहण अपनाया है, जिससे संकेत मिलता है कि शिकार-संग्रहण किसी एक समूह की विशेषता नहीं है।