नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।
इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. व्यापक समाजशास्त्रीय अर्थ में ‘बाज़ार’ को परिभाषित कीजिए, रोज़मर्रा के अर्थ में नहीं।
उत्तर: व्यापक अर्थ में ‘बाज़ार’ लगभग ‘अर्थव्यवस्था’ के बराबर है: समाज की तमाम आर्थिक क्रियाओं और संस्थाओं का पूरा दायरा।
प्र. एडम स्मिथ ने ‘द वेल्थ ऑफ़ नेशन्स’ में बाज़ारी अर्थव्यवस्था के बारे में क्या तर्क दिया?
उत्तर: स्मिथ का तर्क था कि बाज़ारी अर्थव्यवस्था व्यक्तिगत सौदों की एक लंबी कड़ी है, जो खुद-ब-खुद एक कार्यशील व्यवस्था बना देती है, भले ही किसी ने ऐसी व्यवस्था बनाने का इरादा न रखा हो।
प्र. अर्थव्यवस्थाओं के समाज में ‘रची-बसी’ होने का क्या मतलब है?
उत्तर: इसका मतलब है कि बाज़ार अलग, स्वयं-निर्भर व्यवस्थाएँ नहीं हैं। ये विशेष सांस्कृतिक तरीकों से बनते हैं, अक्सर खास सामाजिक समूहों द्वारा नियंत्रित होते हैं, और दूसरी संस्थाओं व सामाजिक ढाँचों से गहरे जुड़े होते हैं।
प्र. ‘हुंडी’ क्या है?
उत्तर: हुंडी विनिमय का एक बिल है, कर्ज़ पत्र जैसा, जिससे एक व्यापारी दूसरे कोने के व्यापारी से जाति-नातेदारी नेटवर्क के भरोसे पर लंबी दूरी का व्यापार कर पाता था।
प्र. बॉक्स 4.2 में वर्णित जाति-आधारित बैंकिंग व्यवस्था वाले समुदाय का नाम बताइए।
उत्तर: तमिलनाडु के नाकरट्टार।
प्र. ‘पण्यीकरण’ (वस्तुकरण) क्या है?
उत्तर: पण्यीकरण वह प्रक्रिया है जिससे कोई चीज़, हुनर या सेवा, जो पहले बाज़ार में नहीं बिकती थी, अब खरीदी-बेची जाने वाली एक वस्तु बन जाती है।
प्र. ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ शब्द किसने गढ़ा, और इसका क्या मतलब है?
उत्तर: मैक्स वेबर ने यह शब्द गढ़ा। प्रतिष्ठा का प्रतीक वह सामान है जिसका मालिकाना किसी व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक प्रस्थिति दिखाता है, जैसे कार का मॉडल या फोन का ब्रांड।
प्र. ‘बाज़ारीकरण’ क्या है?
उत्तर: बाज़ारीकरण सरकारी नीतियों की जगह बाज़ार या बाज़ार-आधारित प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करके सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक समस्याएँ सुलझाना है।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. बाज़ार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण से किस तरह अलग है?
उत्तर: अर्थशास्त्र यह पढ़ता है कि बाज़ार अपने ही नियमों से कैसे काम करता है: मूल्य, निवेश, खर्च-बचत, और अर्थव्यवस्था को समाज से अलग मानता है। समाजशास्त्र बाज़ार को एक सामाजिक संस्था मानता है, विशेष सांस्कृतिक तरीकों से बना, खास सामाजिक समूहों द्वारा नियंत्रित, और जाति-नातेदारी व अन्य सामाजिक ढाँचों से जुड़ा हुआ।
प्र. किस तरह से एक बाज़ार जैसे कि एक साप्ताहिक ग्रामीण बाज़ार, एक सामाजिक संस्था है?
उत्तर: हाट लोगों को व्यापार के लिए इकट्ठा करता है, पर कई आने वालों के लिए इसका मुख्य कारण सामाजिक होता है: रिश्तेदारों से मिलना, शादी तय करना, गप्पें मारना। दूर-दराज़ और जंगली इलाकों में यह आर्थिक आदान-प्रदान और सामाजिक जीवन, दोनों की मुख्य संस्था होती है।
प्र. उपनिवेशी शासन का जनजातीय बाज़ारों पर क्या असर हुआ, अध्याय के अनुसार बताइए।
उत्तर: जनजातीय इलाकों में सड़कें बनीं और स्थानीय प्रतिरोध (‘जनजातीय विद्रोह’) दबा दिया गया ताकि जंगल और खनिज संसाधनों का दोहन हो सके। बाहर से व्यापारी और साहूकार आए, और जनजातीय श्रम का एक बाज़ार भी विकसित हुआ। स्थानीय लोगों पर असर ज़्यादातर नकारात्मक रहा: दरिद्रता और ज़मीन का नुकसान।
प्र. बोतलबंद पानी के अलावा, समकालीन भारत से पण्यीकरण के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर: (i) विवाह: पहले सिर्फ़ परिवार तय करते थे, अब पेशेवर विवाह ब्यूरो और वेबसाइट्स फ़ीस लेकर यह काम करते हैं। (ii) व्यक्तिगत कौशल: निजी संस्थान अब ‘व्यक्तित्व सँवारने’ और अंग्रेज़ी बोलना सिखाने के कोर्स बेचते हैं, जो पहले सिर्फ़ परिवार में सिखाए जाते थे।
प्र. भारतीय खेती में ‘समर्थन मूल्य’ और ‘सब्सिडी’ का क्या मतलब है, और उदारीकरण इनके खिलाफ़ क्यों है?
उत्तर: समर्थन मूल्य वह दाम है जिस पर सरकार किसानों से उपज खरीदने को तैयार रहती है, जिससे उन्हें न्यूनतम आमदनी मिलती है; सब्सिडी में सरकार खाद-डीज़ल जैसी चीज़ों की लागत का कुछ हिस्सा उठाती है। उदारीकरण सरकार की इस तरह की दख़लअंदाज़ी के खिलाफ़ है, इसलिए इन्हें घटाया या हटाया गया।
प्र. भारत में व्यापार जाति के हिसाब से क्यों बँटता है?
उत्तर: व्यापारी अपने समुदाय या नातेदारी समूह के लोगों पर अजनबियों से कहीं ज़्यादा भरोसा करते हैं, इसलिए व्यापार और कारोबार अक्सर जाति-नातेदारी नेटवर्क के भीतर ही सिमट जाता है। इसी वजह से कुछ पीढ़ियों में किसी एक व्यापार क्षेत्र पर एक ही जाति का लगभग एकतरफ़ा कब्ज़ा बन जाता है।
प्र. किताब जब कहती है कि भारत पर उदारीकरण का असर ‘मिला-जुला’ रहा, तो इसका क्या मतलब है?
उत्तर: सॉफ्टवेयर/IT और खेती के कुछ हिस्से (मछली, फल) जैसे क्षेत्रों को वैश्विक बाज़ार से फ़ायदा हुआ हो सकता है। पर ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाज जैसे क्षेत्रों को नुकसान हुआ, क्योंकि वे विदेशी उत्पादकों से मुक़ाबला नहीं कर सके। यानी कुल असर न पूरी तरह सकारात्मक है, न पूरी तरह नकारात्मक।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. बस्तर के धोराई साप्ताहिक बाज़ार को समाज में रची-बसी अर्थव्यवस्था के उदाहरण के रूप में वर्णित कीजिए।
उत्तर: धोराई उत्तरी बस्तर ज़िले, छत्तीसगढ़ का एक बाज़ार गाँव है। गैर-बाज़ार दिनों में यह एक शांत, सुस्त गाँव होता है; बाज़ार वाले दिन यह पूरी तरह बदल जाता है: ट्रक सड़कों पर जाम लगाते हैं, वन अधिकारी काम-काज संभालते हैं, और आदिवासी श्रमिकों को उनका भत्ता मिलता है। हर दिशा से आदिवासी जंगल की उपज, खेती की फसल और हाथ से बनाई चीज़ें लेकर आते हैं, और उनके साथ हिंदू सब्ज़ी विक्रेता व विशेषज्ञ कारीगर (कुम्हार, जुलाहे, लोहार) भी शामिल होते हैं। अक्सर बाज़ार के साथ-साथ एक धार्मिक उत्सव भी चलता है। बाज़ार एक बरगद के पेड़ के चारों ओर संकेंद्रित रूप में बसा है, छप्पर की दुकानें संकरी गलियों से बँटी हैं। यह दिखाता है कि बाज़ार सिर्फ़ आर्थिक जगह नहीं, बल्कि वह जगह है जहाँ सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन एक साथ चलता है (बॉक्स 4.1, गेल 1982)।
प्र. नाकरट्टारों के उदाहरण से बताइए कि जाति किस तरह व्यापार और बैंकिंग व्यवस्था को आकार देती है।
उत्तर: तमिलनाडु के नाकरट्टारों की अपनी जाति-आधारित बैंकिंग व्यवस्था थी: सदस्यों के बीच कर्ज़ और जमा-राशि व्यापार क्षेत्र, आवासीय स्थान, वंशानुक्रम, विवाह और साझा संप्रदाय-सदस्यता जैसे जाति-आधारित संबंधों पर टिकी थी। आधुनिक बैंक की तरह कोई सरकार-नियंत्रित केंद्रीय सत्ता नहीं थी: प्रतिष्ठा, सही निर्णय और साझा जमा-पूँजी ही पूरी जाति के प्रतिनिधि के रूप में हर नाकरट्टार पर जनता का भरोसा बनाए रखते थे। यह दिखाता है कि बैंकिंग जैसी आर्थिक संस्था पूरी तरह जाति-संबंधों से संगठित थी, कानूनी नियमों से नहीं (बॉक्स 4.2, रुडनर 1994)।
प्र. उपनिवेशवाद के आने के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था किन अर्थों में बदली?
उत्तर: उपनिवेशी शासन से पहले भारत सदियों तक हथकरघा वस्त्रों (सूती और रेशम) और मसालों जैसी वस्तुओं का प्रमुख निर्माता व निर्यातक रहा था, जिनकी यूरोप में भारी माँग थी। उपनिवेश-पूर्व भारत में पहले से ही संगठित उत्पादन केंद्र, देशज व्यापारी समुदाय, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था मौजूद थी। उपनिवेशवाद ने उत्पादन, व्यापार और खेती में बड़ी उथल-पुथल मचाई: सबसे जाना-माना उदाहरण है हथकरघा उद्योग का खात्मा, क्योंकि इंग्लैंड के सस्ते बने-बनाए कपड़ों ने बाज़ार भर दिए। भारत की भूमिका उलट गई: यह मुख्यतः कच्चे माल और खेतिहर उत्पादों का स्रोत, और इंग्लैंड के बने-बनाए सामान का उपभोक्ता बन गया। नए समूह, खासकर यूरोपियन, व्यापार में आए, कभी मौजूदा व्यापारिक समुदायों के साथ मिलकर तो कभी उन्हें बाहर करके।
प्र. मारवाड़ी भारत के अग्रणी व्यापारिक समुदायों में से एक कैसे बने?
उत्तर: मारवाड़ी ठीक उपनिवेशी दौर में ही सफल व्यापारिक समुदाय बने, खासकर कलकत्ता जैसे उपनिवेशी शहरों में मिले नए अवसरों का फ़ायदा उठाकर, और फिर देश भर में बसकर। नाकरट्टारों की तरह, उनकी सफलता भी उनके गहरे सामाजिक नेटवर्क पर टिकी थी, जिसने उनकी अपनी बैंकिंग व्यवस्था के लिए ज़रूरी भरोसा बनाया। कई मारवाड़ी परिवार साहूकार बने और बैंकर के रूप में काम करते हुए अंग्रेज़ों के व्यापारिक विस्तार में भी मदद की। आज़ादी के बाद कुछ मारवाड़ी परिवार (जैसे बिड़ला) आधुनिक उद्योगपति बन गए, और आज मारवाड़ियों का भारत के उद्योग पर किसी भी अन्य समुदाय से ज़्यादा नियंत्रण है।
प्र. पूँजीवाद को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में मार्क्स की समझ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: मार्क्स ने पूँजीवाद को पण्य उत्पादन की व्यवस्था के रूप में समझा, यानी बाज़ार के लिए उत्पादन, जो मज़दूरी पर आधारित श्रम से होता है। उनके अनुसार हर आर्थिक व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था भी है: हर उत्पादन विधि खास उत्पादन-संबंधों से बनती है, और अंततः एक ख़ास वर्ग संरचना को जन्म देती है। पूँजीवाद के तहत मज़दूरी कमाने के लिए श्रमिकों को अपनी श्रम-शक्ति बाज़ार में बेचनी पड़ती है, इसलिए श्रम खुद एक बिकाऊ सामान बन जाता है। इससे दो वर्ग बनते हैं: पूँजीपति, जो उत्पादन के साधनों (जैसे कारखानों) के मालिक हैं, और श्रमिक, जो अपना श्रम पूँजीपतियों को बेचते हैं। पूँजीपति श्रमिकों को उनके उत्पादन से कम मज़दूरी देकर मुनाफ़ा कमाते हैं, यानी उनके श्रम से अतिरिक्त मूल्य निकालते हैं।
प्र. उदारीकरण के पक्ष में कौन-से तर्क दिए जाते हैं, और विपक्ष में कौन-से?
उत्तर: पक्ष में: निजी उद्योग को सरकारी उद्योग से ज़्यादा कुशल माना जाता है, इसलिए उदारीकरण से आर्थिक संवृद्धि और समृद्धि की उम्मीद है; विदेशी निवेश से संवृद्धि और रोज़गार में मदद की उम्मीद; निजीकरण से कुशलता बढ़ने और सरकार का बोझ घटने की उम्मीद है। विपक्ष में: कुछ मानते हैं कि भारत पर कुल असर नकारात्मक रहा है या रहेगा; ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाज जैसे उद्योग विदेशी उत्पादकों से मुक़ाबला नहीं कर पाते; किसानों को आयात से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है जबकि समर्थन मूल्य-सब्सिडी घटाई गई हैं; निजीकरण से कुछ क्षेत्रों में नौकरियाँ घटीं और असंगठित क्षेत्र में असुरक्षित रोज़गार बढ़ा।
प्र. पुष्कर मेला किस तरह दिखाता है कि एक बाज़ार खुद एक वस्तु बन सकता है?
उत्तर: राजस्थान का पुष्कर मेला परंपरागत रूप से स्थानीय पशुचारियों और व्यापारियों के लिए एक बड़ा सामाजिक-आर्थिक आयोजन है, जहाँ ऊँट और अन्य पशु बेचे-खरीदे जाते हैं। भूमंडलीकरण के तहत यह अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े पर्यटन आकर्षण के रूप में भी बाज़ारीकृत हो चुका है, और इसे कार्तिक पूर्णिमा से ठीक पहले रखा जाता है, जब हिंदू तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर तालाब में स्नान करते हैं। हिंदू तीर्थयात्री, ऊँट व्यापारी और विदेशी पर्यटक सब मेले में मिलते हैं, और पशु-पैसों के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रतीक व धार्मिक पुण्य का भी आदान-प्रदान करते हैं। इस तरह परंपरागत बाज़ार खुद एक दूसरे बाज़ार, यानी अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन बाज़ार, में बिकने वाला उत्पाद बन जाता है (बॉक्स 4.4)।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. अध्याय के कम से कम दो उदाहरणों की मदद से बताइए कि जाति और नातेदारी नेटवर्क ने भारत में व्यापार को कैसे संगठित किया है।
उत्तर: भारत में व्यापार लंबे समय से जाति-नातेदारी नेटवर्क में ही चलता आया है, क्योंकि व्यापारी अपने समुदाय के लोगों पर बाहरियों से ज़्यादा भरोसा करते हैं, इससे किसी खास व्यापार क्षेत्र में लगभग एक जाति-एकाधिकार बन जाता है। तमिलनाडु के नाकरट्टारों ने एक पूरी जाति-आधारित बैंकिंग व्यवस्था बनाई: कर्ज़ और जमा-राशि जाति-आधारित संबंधों (व्यापार क्षेत्र, वंशानुक्रम, विवाह, साझा संप्रदाय-सदस्यता) पर टिकी थी, और जनता का भरोसा किसी केंद्रीय बैंक की बजाय समुदाय की प्रतिष्ठा पर टिका था (बॉक्स 4.2)। मारवाड़ी उपनिवेशी दौर में इसी तरह के गहरे सामाजिक नेटवर्क के भरोसे बैंकिंग और साहूकारी में सफल हुए; आज उनका किसी भी अन्य समुदाय से ज़्यादा उद्योग पर नियंत्रण है। वैश्य खुद चार वर्णों में से एक है, जो दिखाता है कि जाति और व्यापार का यह नाता कितना पुराना है, हालाँकि ‘वैश्य’ प्रस्थिति अक्सर स्थिर पहचान न होकर दावा की जाने वाली या आकांक्षित प्रस्थिति होती है: उत्तर भारत के बनिया लंबे समय से व्यापार करते आए हैं, जबकि व्यापार में आए कुछ दूसरे जाति समूह ऊपर बढ़ने की प्रक्रिया में ‘वैश्य’ प्रस्थिति का दावा करते हैं। हर व्यापारिक समुदाय की सामाजिक प्रस्थिति ऊँची नहीं थी: बंजारे, एक उपेक्षित जनजातीय समूह, उपनिवेशी दौर में नमक के दूर-दराज़ व्यापार पर नियंत्रण रखते थे, जो दिखाता है कि जाति-आधारित व्यापार का मतलब हमेशा ऊँची सामाजिक प्रस्थिति नहीं होता।
प्र. समकालीन भारतीय समाज के उदाहरणों के साथ मार्क्स की पण्यीकरण की अवधारणा पर चर्चा कीजिए।
उत्तर: मार्क्स और पूँजीवाद के अन्य आलोचकों के अनुसार पण्यीकरण, यानी जो चीज़ पहले बाज़ार में नहीं बिकती थी उसका बाज़ार में बिकने वाली वस्तु बन जाना, के नकारात्मक सामाजिक असर होते हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है खुद श्रम: पूँजीवाद में मज़दूरी कमाने के लिए श्रमिकों को अपनी श्रम-शक्ति बेचनी पड़ती है, जो मार्क्स के अनुसार सिर्फ़ पूँजीवादी समाजों में ही होता है: इसके उलट, पहले इंसानों को गुलाम के तौर पर बेचा-खरीदा जाता था, जिसे आज अनैतिक माना जाता है, पर मज़दूरी के बदले श्रम बेचना पूरी तरह स्वीकार्य है। समकालीन भारतीय उदाहरण दिखाते हैं कि यही प्रक्रिया जीवन के नए क्षेत्रों में पहुँच रही है: विवाह, जो पहले सिर्फ़ परिवार तय करता था, अब पेशेवर विवाह ब्यूरो और वेबसाइट्स फ़ीस लेकर तय करते हैं; व्यक्तिगत और सामाजिक कौशल, जो पहले घर में सिखाए जाते थे, अब निजी संस्थान ‘व्यक्तित्व सँवारने’ और अंग्रेज़ी बोलना सिखाने के कोर्स के रूप में बेचते हैं; और निजी स्कूल, कॉलेज व कोचिंग क्लासों के बढ़ने से शिक्षा खुद पण्यीकृत हो रही है। किताब का एक और परेशान करने वाला उदाहरण गरीब लोगों द्वारा अमीर मरीज़ों को किडनी बेचना है, जो विवादास्पद है क्योंकि कई मानते हैं कि मानव अंगों का पण्यीकरण नहीं होना चाहिए। हर उदाहरण एक ही प्रक्रिया दिखाता है: जो पहले बाज़ार से बाहर था, वह अब उसके भीतर खींचा जा रहा है।
प्र. ‘उदारीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर मिला-जुला असर रहा है।’ खेती और उद्योग के संदर्भ में इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 1980 के दशक में शुरू हुए उदारीकरण ने राज्य-नियंत्रित विकास की जगह निजीकरण, सरकारी नियंत्रण में कमी, कम आयात शुल्क और विदेशी कंपनियों के आसान प्रवेश को अपनाया, जिसे बाज़ारीकरण भी कहा जाता है। समर्थकों का तर्क है कि इससे आर्थिक संवृद्धि आई: भारतीय बाज़ार विदेशी सामान और निवेश के लिए खुले, और सॉफ्टवेयर/IT जैसे क्षेत्रों को वैश्विक बाज़ार से फ़ायदा हुआ। पर असर एक-जैसा नहीं रहा। खेती में, भारतीय किसान अब अन्य देशों के किसानों से सीधे मुक़ाबला कर रहे हैं क्योंकि कृषि-आयात की अनुमति है, जबकि समर्थन मूल्य और सब्सिडी, जो पहले न्यूनतम आमदनी सुनिश्चित करते थे और इनपुट लागत घटाते थे, घटाए या हटाए जा चुके हैं, जिससे कई किसान ठीक से जीविका नहीं कमा पा रहे। उद्योग में, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाज जैसे क्षेत्रों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से नुकसान हुआ है, जबकि निजीकरण और कुछ सार्वजनिक उपक्रमों के बंद होने से संगठित क्षेत्र की नौकरियाँ घटी हैं और कम सुरक्षित, कम वेतन वाला असंगठित रोज़गार बढ़ा है। किताब का अपना निष्कर्ष यही है कि उदारीकरण के फ़ायदे और नुकसान अलग-अलग क्षेत्रों में असमान रूप से बँटे हैं: यह न पूरी तरह सफलता है, न पूरी तरह असफलता।
5 केस स्टडी
(क) 2 अंक यह हाट सिर्फ़ आर्थिक संस्था न होकर एक ‘सामाजिक संस्था’ के रूप में कैसे काम करता है, इसके दो तरीके बताइए।
उत्तर: हाट आस-पास के गाँवों के रिश्तेदारों और पड़ोसियों को इकट्ठा करता है, इसलिए व्यापार के अलावा यहाँ शादियाँ भी तय होती हैं, रिश्तेदारों से मुलाकात होती है, और खबरें भी आदान-प्रदान होती हैं: यह व्यापार के साथ-साथ एक सामाजिक काम भी है।
(ख) 2 अंक उपनिवेशी जनजातीय बाज़ारों के अध्याय के विवरण के आधार पर बताइए कि बाहरी साहूकारों का आना स्थानीय आदिवासी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर क्यों डाल सकता है।
उत्तर: अध्याय का उपनिवेशी जनजातीय बाज़ारों का विवरण दिखाता है कि जब बाहरी व्यापारी और साहूकार किसी स्थानीय जनजातीय अर्थव्यवस्था में प्रवेश करते हैं, तो असर आमतौर पर नकारात्मक होता है: आदिवासी कर्ज़ में डूब जाते हैं, ज़मीन बाहरी लोगों को खो देते हैं, और उनकी स्थानीय अर्थव्यवस्था बड़े बाज़ारों पर निर्भर व शोषित हो जाती है, बिल्कुल वैसे जैसे ऐतिहासिक रूप से बस्तर में हुआ था।
(क) 2 अंक अध्याय के अर्थ में ‘समर्थन मूल्य’ और ‘सब्सिडी’ का क्या मतलब है, यह समझाइए।
उत्तर: समर्थन मूल्य वह दाम है जिस पर सरकार किसानों से उपज खरीदने को तैयार रहती है, जिससे न्यूनतम आमदनी सुनिश्चित होती है; सब्सिडी में सरकार खाद जैसी चीज़ों की लागत का कुछ हिस्सा उठाती है।
(ख) 2 अंक सरकार का यह फ़ैसला बाज़ार-बनाम-राज्य की बहस के किस पक्ष को दर्शाता है? समझाइए।
उत्तर: यह बाज़ार-समर्थक, उदारीकरण-समर्थक पक्ष को दर्शाता है: सरकारी दखल की बजाय बाज़ार की ताक़तों (बाज़ारीकरण) पर भरोसा करना।
(ग) 2 अंक उदारीकरण के तहत भारतीय खेती के अध्याय के अपने विवरण का इस्तेमाल करते हुए, किसानों के लिए इस नीति का एक संभावित असर बताइए।
उत्तर: अध्याय के अनुसार, सरकारी सुरक्षा हटने और सस्ती आयातित उपज से सीधा मुक़ाबला होने पर, कई किसानों के लिए ठीक से जीविका कमाना मुश्किल हो जाने की संभावना है, ठीक वैसा ही असर जो अध्याय उदारीकरण के बाद भारतीय खेती पर बताता है।