Class 12 Sociology Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में NCERT समाधान

पाठ्यक्रम संबंधी सूचना

नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।

NCERT कक्षा 12 समाजशास्त्र, भारतीय समाज, अध्याय 4 बाज़ार एक
सामाजिक संस्था के रूप में
की प्रश्नावली के सभी दस प्रश्नों के पूर्ण हल।
प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में दिए गए हैं, और हर उत्तर उसी तरह लिखा
गया है जैसे परीक्षा में लिखा जाना चाहिए। पाठ के भीतर के तीन क्रियाकलाप और बॉक्स 4.4 का अभ्यास अंत में हल किए गए हैं।

1 प्रश्न 1

प्रश्न 1

प्र. ‘अदृश्य हाथ’ का क्या तात्पर्य है?

उत्तर: ‘अदृश्य हाथ’ एडम स्मिथ के अर्थशास्त्र से आया एक विचार है।
इसका मतलब है कि जब हर व्यक्ति खुले बाज़ार में अपने ही स्वार्थ के अनुसार
खरीद-बिक्री करता है, तो लाखों-करोड़ों अलग-अलग सौदे मिलकर खुद-ब-खुद एक
व्यवस्थित, कार्यशील आर्थिक तंत्र बना देते हैं, भले ही किसी एक व्यक्ति या
सत्ता ने ऐसी व्यवस्था बनाने की योजना न बनाई हो। स्मिथ का तर्क था कि
बाज़ारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान या सौदों का एक लंबा क्रम
है, जो अपनी क्रमबद्धता की वजह से खुद-ब-खुद एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था
की स्थापना करती है, भले ही करोड़ों लेन-देन में शामिल कोई भी व्यक्ति इसकी
स्थापना का इरादा न रखता हो। ऐसा लगता है मानो बाज़ार किसी अदृश्य हाथ के
इशारे पर खुद को संगठित कर लेता है।

2 प्रश्न 2

प्रश्न 2

प्र. बाज़ार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण से किस
तरह अलग है?

उत्तर: अर्थशास्त्र यह पढ़ता है कि आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं
में बाज़ार अपने ही तरीके से कैसे काम करता है: मूल्य किस तरह तय होते हैं,
किसी निवेश का संभावित असर क्या होगा, लोग खर्च या बचत क्यों करते हैं।
अर्थशास्त्र ज़्यादातर अर्थव्यवस्था को समाज के बड़े सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ
से अलग, अपने ही नियमों से चलने वाला हिस्सा मानता है।

समाजशास्त्र एक अलग सवाल पूछता है। समाजशास्त्री बाज़ार को सामाजिक
संस्थाओं के रूप में पढ़ते हैं, जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों से बनी हैं:
बाज़ार अक्सर खास सामाजिक समूहों या वर्गों द्वारा नियंत्रित होते हैं, और
दूसरी संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं व संरचनाओं से गहरे जुड़े होते हैं।
समाजशास्त्री इसे कहते हैं कि अर्थव्यवस्थाएँ समाज में ‘रची-बसी’ हैं। इसलिए
जहाँ अर्थशास्त्र यह समझाता है कि बाज़ार कैसे काम करता है, वहीं समाजशास्त्र
यह समझाता है कि किसी खास समाज में बाज़ार अपना खास सामाजिक रूप क्यों लेता
है।

3 प्रश्न 3

प्रश्न 3

प्र. किस तरह से एक बाज़ार जैसे कि एक साप्ताहिक ग्रामीण बाज़ार, एक
सामाजिक संस्था है?

उत्तर: एक साप्ताहिक ग्रामीण बाज़ार (हाट) सिर्फ़ वस्तुओं के
आदान-प्रदान की जगह नहीं है। यह आस-पास के गाँवों के लोगों को इकट्ठा करता है
जो खेती की उपज बेचने और बनी-बनाई वस्तुएँ खरीदने आते हैं, पर यह
साहूकारों, मसखरों, ज्योतिषियों और तमाम विशेषज्ञों को भी आकर्षित करता है,
इसलिए यह कई तरह की सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बन जाता है, सिर्फ़ आर्थिक
गतिविधि का नहीं।

किताब के अनुसार, बहुत से आने वालों के लिए बाज़ार आने की मुख्य वजह सामाजिक
होती है: रिश्तेदारों से मिलना, शादी तय करना, गप्पें मारना। खासकर पहाड़ी और
जंगली इलाकों में, साप्ताहिक बाज़ार आदान-प्रदान और सामान्य सामाजिक
मेल-मिलाप दोनों की मुख्य संस्था होती है। धोराई बाज़ार अध्ययन (बॉक्स 4.1)
इसे ठोस रूप से दिखाता है: बाज़ार के साथ-साथ अक्सर धार्मिक उत्सव भी चलता है,
और बाज़ार वाला दिन एक शांत गाँव को व्यापार, सामाजिकता और अनुष्ठान के केंद्र
में बदल देता है। यही वजह है कि किताब बाज़ार को जाति, जनजाति या परिवार जैसी
सामाजिक संस्था कहती है: यह असली सामाजिक संबंधों को संगठित करता है, सिर्फ़
आर्थिक लेन-देन को नहीं।

4 प्रश्न 4

प्रश्न 4

प्र. व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्क कैसे योगदान कर
सकते हैं?

उत्तर: भारत में व्यापार और कारोबार ऐतिहासिक रूप से जाति-नातेदारी
नेटवर्क के ज़रिए ही चलते आए हैं, क्योंकि व्यापारी अपने समुदाय या नातेदारी
समूह के लोगों पर बाहरियों से ज़्यादा भरोसा करते हैं। यह भरोसा ही पूरी तरह
जाति-रिश्तों पर टिकी कर्ज़ और बैंकिंग व्यवस्थाओं की नींव है। तमिलनाडु के
नाकरट्टारों (बॉक्स 4.2) की जाति-आधारित बैंकिंग व्यवस्था में सदस्यों के बीच
कर्ज़ और जमा-राशि व्यापार क्षेत्र, आवासीय स्थान, वंशानुक्रम, विवाह और साझा
संप्रदाय-सदस्यता के अनुसार चलती थी, बिना किसी सरकार-नियंत्रित केंद्रीय
बैंक के, सिर्फ़ समुदाय की प्रतिष्ठा और भरोसे पर।

हुंडी (विनिमय का बिल, कर्ज़ पत्र जैसा) भी इसी तरह काम करती थी: देश के एक
कोने का व्यापारी दूसरे कोने के व्यापारी से हुंडी स्वीकार करवा सकता था,
क्योंकि दोनों एक ही व्यापार-नातेदारी नेटवर्क का हिस्सा होते थे। उपनिवेशी
दौर में मारवाड़ियों का उदय भी इसी बात का उदाहरण है: उनकी सफलता उनके गहरे
सामाजिक नेटवर्क पर टिकी थी, जिसने उनकी बैंकिंग और साहूकारी व्यवस्था के लिए
ज़रूरी भरोसा बनाया। हर मामले में, बाहरियों की जगह अपने ही समुदाय में व्यापार
करना किसी खास व्यापार क्षेत्र में जाति-एकाधिकार बना देता है, और समुदाय के
भीतर का भरोसा ही कानूनी लागू करवाई के बिना कर्ज़, बैंकिंग और लंबी दूरी के
व्यापार को संभव बनाता है।

5 प्रश्न 5

प्रश्न 5

प्र. उपनिवेशवाद के आने के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था किन अर्थों
में बदली?

उत्तर: उपनिवेशी शासन से पहले भारत सदियों तक हथकरघा वस्त्रों (सूती
और महँगे रेशम, दोनों) और मसालों जैसी वस्तुओं का प्रमुख निर्माता व निर्यातक
रहा, जिनकी वैश्विक बाज़ार में, खासकर यूरोप में, भारी माँग थी। उपनिवेश-पूर्व
भारत में पहले से ही उन्नत उत्पादन केंद्र, देशज व्यापारियों का संगठित समाज,
व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था मौजूद थी, जिससे भारत आंतरिक स्तर पर और
बाकी दुनिया से भी व्यापार करने में सक्षम था।

उपनिवेशवाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे बदलाव किए, जिससे उत्पादन,
व्यापार और खेती में अभूतपूर्व विघटन हुआ। सबसे जाना-माना उदाहरण है हथकरघा के
काम का खात्मा, क्योंकि उस वक्त के बाज़ारों में इंग्लैंड से सस्ते बने-बनाए
कपड़ों की भरमार लगा दी गई थी। उपनिवेश काल के दौरान भारत विश्व की पूँजीवादी
अर्थव्यवस्था से और अधिक जुड़ गया: अंग्रेज़ी राज से पहले भारत बने-बनाए सामानों
के निर्यात का एक मुख्य केंद्र था, उपनिवेशवाद के बाद भारत कच्चे माल और कृषक
उत्पादों का स्रोत और उत्पादित सामानों का उपभोक्ता बना दिया गया, यह दोनों
काम इंग्लैंड के उद्योगों को लाभ पहुँचाने के लिए किए गए। नए समूह, खासकर
यूरोपियन, व्यापार और व्यवसाय में आने लगे, कभी पहले से जमे व्यापारिक
समुदायों से मेल-जोल करके तो कभी उन्हें व्यापार छोड़ने पर मजबूर करके। फिर भी
बाज़ार अर्थव्यवस्था के इस विस्तार ने कुछ व्यापारिक समुदायों, जैसे
मारवाड़ियों, को नए अवसर भी दिए, जिन्होंने बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद
को ढालकर आज़ादी के बाद भी अपनी आर्थिक शक्ति बनाए रखी।

6 प्रश्न 6

प्रश्न 6

प्र. उदाहरणों की सहायता से ‘पण्यीकरण’ के अर्थ की विवेचना कीजिए।

उत्तर: पण्यीकरण (या वस्तुकरण) वह प्रक्रिया है जिससे कोई चीज़, जो
पहले बाज़ार में नहीं बिकती-खरीदी जाती थी, अब बाज़ार में बिकने वाली एक वस्तु
बन जाती है। किताब का सबसे स्पष्ट उदाहरण खुद श्रम है: पूँजीवाद के अंतर्गत
मज़दूरों को अपनी श्रम शक्ति बाज़ार में बेचकर ही मज़दूरी कमानी है, जो मार्क्स
के अनुसार सिर्फ़ पूँजीवादी समाजों में ही पाई जाने वाली स्थिति है।

किताब के अन्य उदाहरण: गरीब लोगों द्वारा किडनी की ज़रूरत वाले अमीर लोगों
को किडनी बेचना, जिसे लेकर विवाद है कि मानव अंगों का पण्यीकरण होना चाहिए या
नहीं; विवाह, जो पहले परिवार के लोग तय करते थे पर अब व्यावसायिक विवाह
ब्यूरो और वेबसाइट्स फ़ीस लेकर तय कराते हैं; और सामाजिक कौशल, जो पहले
मुख्यतः परिवार में सिखाए जाते थे, अब निजी संस्थान ‘व्यक्तित्व सँवारने’ और
अंग्रेज़ी बोलना सिखाने के कोर्स के रूप में बेचते हैं। निजी विद्यालयों,
महाविद्यालयों और कोचिंग क्लासों की भरमार भी शिक्षा के पण्यीकरण को दिखाती
है। क्रियाकलाप 4.2 बोतल के पानी को एक साधारण उदाहरण के रूप में देता है: कुछ
ही साल पहले तक जो चीज़ बिकती ही नहीं थी, आज वह हर जगह बिकने वाली एक आम वस्तु
बन चुकी है।

7 प्रश्न 7

प्रश्न 7

प्र. ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ क्या है?

उत्तर: प्रतिष्ठा का प्रतीक वह सामान है जिसका मालिकाना किसी
व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक प्रस्थिति को दर्शाता है। समाजशास्त्र के
संस्थापकों में से एक, मैक्स वेबर, ने सबसे पहले बताया कि लोग जो सामान
खरीदते और उपयोग करते हैं वह समाज में उनकी प्रस्थिति से गहनता से जुड़ा होता
है, और उन्होंने इसे प्रतिष्ठा का प्रतीक कहा। किताब का अपना उदाहरण: आज भारत
में मध्यम वर्गीय परिवारों में उनके पास जो कार का मॉडल होता है या जिस कंपनी
के सेलफोन वे इस्तेमाल करते हैं, वह उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति का अनुमान
लगाने का एक प्रमुख साधन है। यानी उपभोग सिर्फ़ किसी चीज़ के व्यावहारिक
इस्तेमाल के बारे में नहीं है, इसका एक प्रतीकात्मक अर्थ भी होता है, जो
खरीदने वाले की सामाजिक स्थिति के बारे में कुछ कहता है, और यही वजह है कि
विज्ञापनदाता अपने उत्पाद को किसी वांछनीय जीवनशैली या प्रस्थिति से जोड़ने की
कोशिश करते हैं (क्रियाकलाप 4.3)।

8 प्रश्न 8

प्रश्न 8

प्र. ‘भूमंडलीकरण’ के तहत कौन-कौन सी प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं?

उत्तर: भूमंडलीकरण कई रुझानों को साथ लेकर चलता है। किताब खासकर
इनका ज़िक्र करती है: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूँजी, सूचना और लोगों
के संचलन का बढ़ना; और इस संचलन को गति देने वाली प्रौद्योगिकी (जैसे कंप्यूटर,
दूरसंचार और परिवहन के क्षेत्र में) व अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास।
भूमंडलीकरण की एक केंद्रीय विशेषता दुनिया भर में बाज़ारों का विस्तार और
एकीकरण बढ़ना है, जिससे दुनिया के एक कोने के बाज़ार में आया बदलाव दूसरे कोने
में गहरा असर डाल सकता है (किताब का उदाहरण: न्यूयॉर्क में 9/11 के हमलों के
बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में गिरावट का भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग पर असर)।
भूमंडलीकरण के अंतर्गत सिर्फ़ पैसा और वस्तुएँ ही नहीं, बल्कि लोग, सांस्कृतिक
उत्पाद और छवियाँ भी दुनिया भर में तेज़ी से घूमती हैं, विनिमय के नए दायरों में
प्रवेश करती हैं और नए बाज़ार बनाती हैं, जिससे पहले बाज़ार-व्यवस्था से बाहर
रही चीज़ें भी उसका हिस्सा बन जाती हैं, जैसे योग और आयुर्वेद जैसी भारतीय
अध्यात्म व ज्ञान-व्यवस्थाओं का पश्चिम में बाज़ारीकरण, और अंतर्राष्ट्रीय
पर्यटन का बढ़ता बाज़ार।

9 प्रश्न 9

प्रश्न 9

प्र. ‘उदारीकरण’ से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: उदारीकरण भारत ने 1980 के दशक से अपनाई गई आर्थिक नीतियों
की एक श्रेणी है, जो राज्य-नियंत्रित विकास से दूर हटने का प्रतिनिधित्व करती
है। इसमें शामिल हैं: सरकारी विभागों का निजीकरण (सरकारी संस्थानों को
प्राइवेट कंपनियों को बेचना); पूँजी, श्रम और व्यापार पर सरकारी दखल में कमी;
विदेशी वस्तुओं के आसान आयात के लिए आयात शुल्क में कमी; और विदेशी कंपनियों
को भारत में उद्योग स्थापित करने में सहूलियत देना। इन बदलावों को
बाज़ारीकरण भी कहा जाता है, यानी सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक समस्याओं के
समाधान के लिए बाज़ार या बाज़ार-आधारित प्रक्रियाओं (सरकारी नियमों की जगह)
का उपयोग, जिसमें आर्थिक नियंत्रण घटाना (विनियमन-मुक्ति), उद्योगों का
निजीकरण, और मज़दूरी-मूल्यों पर से सरकारी नियंत्रण हटाना शामिल है।

10 प्रश्न 10

प्रश्न 10

प्र. आपकी राय में, क्या उदारीकरण के दूरगामी लाभ उसकी लागत की
तुलना से अधिक हो जाएँगे? कारण सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: यह एक राय वाला प्रश्न है, इसलिए अपनी राय लिखें, पर उसे
किताब के अपने प्रमाणों से दोनों तरफ़ से समर्थित करें, सिर्फ़ राय भर से नहीं।

लाभ ज़्यादा होने का पक्ष: उदारीकरण ने आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा
दिया है और भारतीय बाज़ारों को विदेशी कंपनियों के लिए खोला है; विदेशी
पूँजी के निवेश से आर्थिक विकास और रोज़गार बढ़ने की उम्मीद है; निजीकरण से
सरकारी कंपनियों की कुशलता बढ़ने और सरकार पर बोझ घटने की उम्मीद है। सॉफ्टवेयर
और सूचना तकनीकी, और खेती के कुछ हिस्सों (जैसे मछली या फल उत्पादन) को
वैश्विक बाज़ार से फ़ायदा हुआ है।

लागत ज़्यादा होने का पक्ष: किताब साफ़ कहती है कि उदारीकरण का असर
“मिश्रित” रहा है। ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाजों जैसे उद्योग
विदेशी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे। भारतीय किसान अब अन्य देशों
के किसानों से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं क्योंकि कृषि उत्पादों का आयात संभव है,
जबकि समर्थन मूल्य और सब्सिडी, जो पहले उनकी रक्षा करते थे, घटाए या हटाए जा
चुके हैं। निजीकरण और कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के बंद होने से कुछ
क्षेत्रों में रोज़गार घटा है, और असंगठित क्षेत्र का रोज़गार बढ़ा है, जो
कामगारों के लिए ठीक नहीं क्योंकि वहाँ तनख्वाह कम और नौकरियाँ अस्थायी
होती हैं।

संतुलित उत्तर यही निष्कर्ष निकालेगा कि असर अलग-अलग क्षेत्रों में
असमान रूप से बँटा है, ठीक जैसा किताब खुद कहती है, न कि सिर्फ़ “उदारीकरण
अच्छा है” या “उदारीकरण बुरा है” जैसा एकतरफ़ा दावा।

11 पाठ के भीतर के क्रियाकलाप और बॉक्स 4.4 का अभ्यास

अध्याय के पाठ के भीतर तीन क्रियाकलाप और बॉक्स 4.4 के लिए एक अभ्यास भी छपा है। इन्हें यहाँ उसी क्रम में हल किया गया है जिसमें किताब इन्हें छापती है।

क्रियाकलाप 4.1

प्र. जिस कस्बे या शहर में आप रहते हैं उसके बाज़ार या खरीददारी करने वाले क्षेत्रों में जाएँ। यह पता करने की कोशिश करें कि महत्त्वपूर्ण व्यापारी कौन हैं। क्या कोई विशेष व्यापार के क्षेत्र हैं जो विशेष समुदायों द्वारा नियंत्रित हैं जैसे, आभूषण, किराना, लोहे, लकड़ी एवं अन्य वस्तुओं की दुकानें? इन दुकानों में से कुछ में जाएँ एवं उनके मालिकों और उनके समुदायों के बारे में पता करें। क्या यह उनका पुश्तैनी पारिवारिक व्यापार है?

उत्तर: यह एक क्षेत्र-कार्य है, इसलिए आपके निष्कर्ष आपके अपने बाज़ार से आएँगे। इसे करने और लिखने का एक अच्छा तरीका:

  • एक सरल तालिका बनाइए जिसमें चार स्तंभ हों: व्यापार का क्षेत्र (आभूषण, किराना, लोहा, लकड़ी आदि), मुख्य दुकानों के नाम, मालिकों का समुदाय, और क्या यह पुश्तैनी पारिवारिक व्यापार है (कितनी पीढ़ियों से चल रहा है)।
  • विनम्रता से पूछिए और वही लिखिए जो लोग खुद बताना चाहें। पूछिए कि दुकान कैसे शुरू हुई, माल कौन देता है, और क्या आपूर्तिकर्ता, साझेदार या कर्मचारी उसी समुदाय या परिवार से हैं।
  • अध्याय में बताया गया ढर्रा खोजिए। अक्सर आप पाएँगे कि आपके कस्बे में व्यापार का कोई एक क्षेत्र मुख्य रूप से एक ही समुदाय के हाथ में है, और कई दुकानें पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले पारिवारिक व्यापार हैं।
  • इसे अध्याय के शब्दों में समझाइए। व्यापार और वाणिज्य अक्सर जाति और नातेदारी के तंत्रों से चलते हैं। व्यापारी अपने समुदाय या नातेदारी समूह के लोगों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं, इसलिए वे बाहर वालों की बजाय इन्हीं तंत्रों के भीतर व्यापार करते हैं, और इससे व्यापार के कुछ क्षेत्रों पर किसी जाति का एकाधिकार बन जाता है। नाकरट्टार और मारवाड़ी ऐसे तंत्रों के अध्याय के अपने उदाहरण हैं।
क्रियाकलाप 4.2

प्र. क्या आप ऐसी चीज़ों के बारे में सोच सकते हैं जो हाल ही में बाज़ारों में शामिल हुई हों? याद रहे कि यह ज़रूरी नहीं कि कोई वस्तु ही एक पण्य हो, कोई सेवा भी पण्य हो सकती है। ऐसी चीज़ों के बारे में भी सोचें जो आज पण्य भले न हों पर भविष्य में हो सकती हों। आप कारण भी सोचें कि ऐसा क्यों होगा। अंत में, इस बारे में भी सोचें कि पहले ज़माने की कुछ चीज़ें अब बिकनी बंद क्यों हो गई हैं (मतलब जिनका पहले विनिमय में योगदान था पर अब नहीं है)। क्यों और कब कोई कमॉडिटी, कमॉडिटी नहीं रह जाती?

उत्तर:

  • हाल में पण्य बनी चीज़ें और सेवाएँ। बोतल के पानी के अलावा अध्याय खुद कई उदाहरण देता है: विवाह तय कराना (अब व्यावसायिक विवाह ब्यूरो और वेबसाइटें मेहनताना लेकर यह काम करती हैं), अच्छा आचरण, शिष्टाचार और अंग्रेज़ी बोलना जैसे सामाजिक कौशल (अब ‘व्यक्तित्व सँवारने’ के पाठ्यक्रमों के रूप में बिकते हैं), और शिक्षा (नए निजी विद्यालयों, महाविद्यालयों और कोचिंग क्लासों की होड़)। आप अपने आसपास से भी उदाहरण जोड़ सकते हैं, जैसे वे काम जो पहले परिवार खुद करते थे और अब पैसे देकर करवाए जाते हैं।
  • भविष्य में पण्य बन सकने वाली चीज़ें। यह आपका अपना तर्क होगा। अध्याय पण्यीकरण का कारण पूँजीवाद के विकास को बताता है, जिससे जीवन के उन क्षेत्रों में भी बाज़ार फैल जाता है जो पहले इस व्यवस्था से अछूते थे। इसलिए जो भी चीज़ दुर्लभ होने लगे, या जिसके लिए लोग समय बचाने या प्रतिष्ठा पाने के लिए पैसे देने लगें, वह पण्य बन सकती है।
  • जो चीज़ें पण्य नहीं रहीं। अध्याय का अपना उदाहरण इंसान हैं: पहले के समय में इंसानों को गुलाम के तौर पर बेचा और खरीदा जाता था, पर आज के दौर में लोगों को वस्तुओं की तरह समझना अनैतिक माना जाता है। कोई चीज़ तब पण्य नहीं रहती जब समाज नैतिक आधार पर, और आमतौर पर कानून बनाकर, तय कर देता है कि उसकी खरीद-बिक्री नहीं होनी चाहिए। इसीलिए बहुत से लोग मानते हैं कि किडनी जैसे मानव अंगों का पण्यीकरण नहीं होना चाहिए।
क्रियाकलाप 4.3: विज्ञापनों की व्याख्या

प्र. अखबारों और किताबों से विज्ञापन इकट्ठा करें। उनमें से दो या तीन विज्ञापन चुनें जो आपको रुचिकर लगे हों। इनमें से प्रत्येक विज्ञापन के लिए निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश करें:
1. किस उत्पाद का विज्ञापन किया जा रहा है और उस उत्पाद का किस तरह से चित्रण किया गया है?
2. विज्ञापनदाता ने किस तरह से एक सामाजिक प्रस्थिति और जीवनशैली को अपने उत्पाद से जोड़ने की कोशिश की है?

उत्तर: उत्तर आपके चुने हुए विज्ञापनों पर निर्भर करेगा। हर विज्ञापन के लिए:

  • प्रश्न 1. उत्पाद का नाम लिखिए और बताइए कि विज्ञापन उसकी कैसी छवि बनाता है: उसे कौन इस्तेमाल करता दिखाया गया है, कहाँ, और उससे कैसा भाव पैदा होता है (आधुनिक, शानदार, सफल, परवाह करने वाला आदि)।
  • प्रश्न 2. प्रस्थिति से जुड़ाव दिखाइए। अध्याय बताता है कि उपभोग का एक प्रतीकात्मक अर्थ होता है: उपभोक्ता कुछ विशेष वस्तुओं को खरीदकर या उनका प्रदर्शन कर अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति या सांस्कृतिक प्राथमिकताएँ दिखाता है, और कंपनियाँ प्रस्थिति या संस्कृति के प्रतीकों के सहारे अपना सामान बेचती हैं। मैक्स वेबर ने ऐसी वस्तुओं को प्रतिष्ठा का प्रतीक माना। अध्याय का अपना उदाहरण है कि आज भारत के मध्यम वर्गीय परिवारों में कार का मॉडल या सेलफोन की कंपनी उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति का अनुमान लगाने का प्रमुख साधन है। दिखाइए कि आपका विज्ञापन यही तरीका कैसे अपनाता है, जैसे उत्पाद को किसी आलीशान घर, विदेश यात्रा या ऊँचे पद वाली नौकरी के साथ दिखाकर।
बॉक्स 4.4 के लिए अभ्यास, प्रश्न 1

प्र. पुष्कर के अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन के दायरे में आ जाने से इस जगह पर कौन सी नयी वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी और लोगों के दायरे का विकास हुआ है?

उत्तर: पुष्कर मेला अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है, इसलिए ऊँटों और अन्य पशुओं को खरीदने-बेचने आने वाले व्यापारियों और पशुचारियों, और कार्तिक पूर्णिमा पर आने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों के साथ अब भारतीय और विदेशी पर्यटक भी वहाँ पहुँचते हैं। पर्यटक मेले में पैसा लाते हैं और यात्रा, ठहरने, गाइड और भोजन जैसी सेवाओं तथा पर्यटकों को बेची जाने वाली वस्तुओं पर खर्च करते हैं; बॉक्स 4.4 जैसी पर्यटन पुस्तिकाएँ विदेश में मेले का प्रचार करती हैं। इस तरह हिंदू तीर्थयात्रियों, ऊँटों, व्यापारियों और विदेशी पर्यटकों का सम्मेलन हो जाता है, जिसमें सिर्फ़ पशुओं और पैसे का विनिमय ही नहीं बल्कि धार्मिक पुण्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों की भी अदला-बदली होती है।

बॉक्स 4.4 के लिए अभ्यास, प्रश्न 2

प्र. आपके विचार में बड़ी संख्या में भारतीय एवं विदेशी पर्यटकों के आने से मेले का रूप किस तरह से बदल गया है?

उत्तर: स्थानीय लोगों के लिए पुष्कर मेला आज भी एक भव्य सामाजिक और आर्थिक उपलक्ष्य है, पर अब यह एक दूसरे बाज़ार, यानी पर्यटन बाज़ार, में बिकने वाली वस्तु भी बन गया है। इसका प्रचार बाहर के लोगों के लिए किया जाता है, और जो रंग, संगीत, सजे हुए ऊँट और धार्मिक आयोजन पहले एक पशु बाज़ार का हिस्सा थे, वे अब पर्यटकों के देखने और तस्वीरें लेने का तमाशा भी हैं। इसलिए मेले का बहुत-सा इंतज़ाम अब आने वाले पर्यटकों को ध्यान में रखकर होता है, और इससे कमाने वालों में अब सिर्फ़ पशु व्यापारी नहीं, पर्यटकों को सेवाएँ देने वाले लोग भी शामिल हैं।

बॉक्स 4.4 के लिए अभ्यास, प्रश्न 3

प्र. इस जगह का धार्मिक उन्माद किस तरह से इसकी बाज़ारी कीमत को बढ़ाता है? क्या हम कह सकते हैं कि भारत में अध्यात्म का एक बाज़ार है?

उत्तर: अध्याय कहता है कि यह मेला पर्यटकों के लिए और भी अधिक आकर्षण का कारण है क्योंकि यह कार्तिक पूर्णिमा के ठीक पहले आता है, जब हिंदू तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर तालाब में नहाने आते हैं। बॉक्स 4.4 बताता है कि ऊँटों के मेले के साथ धार्मिक आयोजन भी चरम पर होता है, अगरबत्तियों का धुआँ और मंत्रों का शोर होता है, और मेले की रात हज़ारों भक्त डुबकी लगाकर अपने पाप धोते हैं और पवित्र पानी में दिए छोड़ते हैं। यही धार्मिक माहौल पर्यटकों को बेचे जाने वाले अनुभव का हिस्सा है। हाँ, हम कह सकते हैं कि अध्यात्म का एक बाज़ार है: अध्याय खुद भारतीय अध्यात्म और ज्ञान व्यवस्थाओं (जैसे योग और आयुर्वेद) के पश्चिम में बाज़ारीकरण को संस्कृति के बाज़ार का हिस्सा बनने का उदाहरण बताता है।

बॉक्स 4.4 के लिए अभ्यास, प्रश्न 4

प्र. क्या आप ऐसे ही और उदाहरण सोच सकते हैं जिसमें धर्म, परंपराएँ, ज्ञान या यहाँ तक की छवियाँ भी (उदाहरण के लिए, पारंपरिक पोशाक में एक राजस्थानी महिला का चित्र) वैश्विक बाज़ार में वस्तु बन गयी हैं?

उत्तर: अध्याय के अपने उदाहरण हैं योग और आयुर्वेद का पश्चिम में बाज़ारीकरण, और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन, जिसमें खुद संस्कृति बाज़ार का हिस्सा बन जाती है। छवियाँ भी इसी तरह बिकती हैं: पारंपरिक पोशाक में एक राजस्थानी महिला का चित्र पोस्टकार्डों, पर्यटन पोस्टरों और पुस्तिकाओं में छुट्टियाँ बेचने के लिए इस्तेमाल हो सकता है। आप ऐसे त्योहारों और पारंपरिक शिल्पों के उदाहरण भी दे सकते हैं जिन्हें पर्यटकों के लिए सजाकर बेचा जाता है, और पारंपरिक ज्ञान को भी, जो पाठ्यक्रमों या उत्पादों के रूप में विदेशी खरीदारों को बेचा जाता है।