Class 12 Sociology Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. सामाजिक विषमता को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: सामाजिक विषमता विभिन्न समूहों की धन, संपत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य और सत्ता जैसे मूल्यवान सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच का पैटर्न है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. सामाजिक स्तरीकरण क्या है?

उत्तर: सामाजिक स्तरीकरण वह व्यवस्था है जिसके ज़रिए समाज में लोगों की श्रेणियों को एक अधिक्रम (श्रेणीक्रम) में रखा जाता है, जो उनकी पहचान, दूसरों से संबंध और संसाधनों तथा अवसरों तक उनकी पहुँच को तय करता है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. पूर्वाग्रह को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: पूर्वाग्रह एक समूह के सदस्यों द्वारा दूसरे समूह के बारे में बनाई गई पूर्वकल्पित विचार या व्यवहार है, जो विषय को जाने और तथ्यों को परखे बिना बनता है और नई जानकारी मिलने पर भी बदलने से इनकार करती है।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. ‘दूर से अशुद्धता’ (distance pollution) से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: ‘दूर से अशुद्धता’ यह मान्यता है, जो भारत के कई क्षेत्रों (विशेषकर दक्षिण भारत) में मिलती है, कि किसी ‘अछूत’ व्यक्ति की मात्र मौजूदगी या उसकी परछाईं भी दूसरों को अपवित्र कर देती है, यानी सिर्फ़ छूने से भी आगे की बात।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. ‘हरिजन’ शब्द किसने प्रचलित किया, और इसका शाब्दिक अर्थ क्या है?

उत्तर: महात्मा गांधी ने 1930 के दशक में ‘हरिजन’ शब्द प्रचलित किया; इसका शाब्दिक अर्थ है ‘परमात्मा के बच्चे’।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ शब्द का संवैधानिक आधार क्या है?

उत्तर: संविधान SC/ST से अलग उन समूहों को मान्यता देता है जो सामाजिक नुक़सान झेलते हैं, और उन्हें “सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग” कहता है; लोकप्रिय शब्द OBC का यही संवैधानिक आधार है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. ‘आदिवासी’ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है, और यह कब गढ़ा गया?

उत्तर: ‘आदिवासी’ का शाब्दिक अर्थ है ‘मूल निवासी’। इसे 1930 के दशक में औपनिवेशिक सरकार, बाहरी बसने वालों और साहूकारों की घुसपैठ के खिलाफ़ संघर्ष के दौरान गढ़ा गया।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. ब्रिसेनडेन (1986) के अनुसार, ‘असक्षमता’ असल में कहाँ निहित है?

उत्तर: ब्रिसेनडेन (1986) के अनुसार, असक्षमता समाज की संरचना या विचारधारा में निहित है, व्यक्ति की शारीरिक दशा में नहीं; वे उन भव्य भवनों को दोष देते हैं जो अन्यथा सक्षम लोगों के प्रवेश के लिए नहीं बने हैं।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. बोर्द्यू की पूँजी के तीन रूपों के नाम बताइए और एक के दूसरे में बदलने का एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: बोर्द्यू आर्थिक पूँजी (भौतिक संपत्ति/आय), सांस्कृतिक पूँजी (शैक्षणिक योग्यताएँ/प्रतिष्ठा) और सामाजिक पूँजी (संपर्कों का जाल) बताते हैं। उदाहरण: संपन्न परिवार का बच्चा (आर्थिक पूँजी) महँगी शिक्षा पाकर उसे सांस्कृतिक पूँजी में बदल सकता है।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. पूर्वाग्रह और भेदभाव में अंतर बताइए।

उत्तर: पूर्वाग्रह किसी समूह के बारे में पहले से बनी एक सोच या राय है, जो सबूत देखने से पहले बनती है; यह मन में होती है। भेदभाव असली व्यवहार है जो किसी समूह को वास्तविक अवसरों से वंचित करता है, जैसे किसी को जाति या लिंग के कारण नौकरी न देना। भेदभाव साबित करना मुश्किल है क्योंकि हो सकता है कि यह न खुले तौर पर हो न घोषित, और उसे ‘योग्यता’ जैसे दूसरे कारणों से प्रेरित दिखाया जा सकता है।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. रूढ़िबद्ध धारणा क्या है? अध्याय से एक औपनिवेशिक-काल का उदाहरण दीजिए।

उत्तर: रूढ़िबद्ध धारणा पूरे समूह पर लगाई गई एक स्थिर, कठोर छवि है, जो व्यक्तियों और परिस्थितियों के हिसाब से आने वाले अंतर को नज़रअंदाज़ करती है। उदाहरण: औपनिवेशिक भारत में कुछ समुदायों को ‘वीर प्रजाति’ कहा गया तो कुछ को ‘कायर’ या ‘पौरुषहीन’ और कुछ को ‘दगाबाज़’।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. अस्पृश्यता के तीन आयामों के नाम बताइए और किसी एक की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: तीन आयाम हैं अपवर्जन, अनादर एवं अधीनता, और शोषण। जैसे अपवर्जन का मतलब है दलितों को साझा जल स्रोतों या सामूहिक पूजा-उत्सवों में शामिल होने से रोक देना, ऐसा अपवर्जन जो ‘स्पृश्य’ (छुआछूत के दायरे से बाहर) मानी जाने वाली बाक़ी नीची जातियों को उतने चरम रूप में नहीं झेलना पड़ता।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. आरक्षण व्यवस्था SC/ST के लिए सीटों का अनुपात कैसे तय करती है, समझाइए।

उत्तर: विधानमंडलों, सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का अनुपात उनकी कुल जनसंख्या में हिस्सेदारी के बराबर तय किया जाता है। OBC का अनुपात इससे अलग तरीके से तय होता है।

3 3 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (3 अंक)

प्र. दो पिछड़ा वर्ग आयोगों की कहानी संक्षेप में बताइए।

उत्तर: काका कालेलकर की अध्यक्षता में बना पहला पिछड़ा वर्ग आयोग नेहरू सरकार द्वारा नियुक्त हुआ और 1953 में अपनी रिपोर्ट देता है, पर राजनीतिक माहौल के कारण इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग 1970 के दशक के अंत में जनता पार्टी के अधीन नियुक्त होता है। इसकी रिपोर्ट 1990 में, जब वह दस वर्ष पुरानी हो चुकी थी, लागू होती है, और यही वह समय है जब OBC मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा विषय बनता है।

प्रश्न 2 (3 अंक)

प्र. अध्याय खनन और बाँधों के लिए आदिवासी ज़मीन छीने जाने को ‘आंतरिक उपनिवेशवाद’ क्यों कहता है?

उत्तर: जैसे औपनिवेशिक सरकार ने जंगल अपने उपयोग के लिए आरक्षित कर आदिवासियों को उनकी पारंपरिक आजीविका से वंचित किया, वैसे ही आज़ाद भारत की पूँजी-गहन औद्योगीकरण नीति को आदिवासी इलाकों में केंद्रित खनिज और बिजली संसाधन चाहिए, इसलिए आदिवासी ज़मीनें खनन और बाँध परियोजनाओं के लिए छीनी जाती हैं और लाखों लोग बिना उचित मुआवज़े के विस्थापित होते हैं, इसे ‘राष्ट्रीय विकास’ का नाम दिया जाता है। चूँकि इन नीतियों के अंतर्गत आदिवासियों को अपने अधीन करके उनके संसाधनों को, जिन पर वे निर्भर थे, छीन लिया गया, भले ही यह आज़ाद भारत के भीतर ही हो रहा था, अध्याय इन्हें एक तरह का आंतरिक उपनिवेशवाद कहता है।

प्रश्न 3 (3 अंक)

प्र. मातृवंशीय समाज इस विचार को कैसे ग़लत साबित करते हैं कि लिंग-आधारित विषमता ‘स्वाभाविक’ है?

उत्तर: अगर महिलाएँ जैविक रूप से परिवार की वारिस और मुखिया बनने के लायक़ न होतीं, तो केरल के नायर (पहले) और मेघालय के खासी (आज भी) जैसे मातृवंशीय समाज सदियों तक महिलाओं को इन भूमिकाओं में रखकर काम नहीं कर पाते। इनका होना ही दिखाता है कि लिंग-आधारित विषमता सामाजिक है, कोई जैविक मजबूरी नहीं।

4 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. अध्याय में बताए अनुसार भारत की जाति व्यवस्था की तुलना दक्षिण अफ़्रीका के रंगभेद से कीजिए।

उत्तर: दोनों व्यवस्थाएँ समाज को एक अधिक्रम में बाँटती हैं: भारत में जन्म और व्यवसाय के आधार पर जाति, दक्षिण अफ़्रीका में प्रजाति के आधार पर। दक्षिण अफ़्रीका में श्वेत अल्पसंख्यक (लगभग हर सात में से एक) के पास बहुसंख्यक अश्वेतों की तुलना में शक्ति और संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा था। ठीक वैसे ही भारत में ‘ऊँची’ जातियों के पास ऐतिहासिक रूप से ‘नीची’ जातियों और दलितों पर असंगत शक्ति रही है। रंगभेद 1948 में कानून बना, जिसने अश्वेतों को औपचारिक रूप से नागरिकता, ज़मीन के मालिकाना हक़ और राजनीतिक आवाज़ से वंचित किया। ठीक वैसे ही अस्पृश्यता ने दलितों को साझा संसाधनों और धार्मिक जीवन से औपचारिक रूप से वंचित किया। दोनों व्यवस्थाओं को आख़िरकार संगठित आंदोलनों ने चुनौती दी। दक्षिण अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस ने संघर्ष किया, और 1994 में सरकार बनाई। भारत में अंबेडकर जैसे नेताओं और बहुजन समाज पार्टी जैसे संगठनों के नेतृत्व में दलित आंदोलन चला। दोनों ही मामलों में, व्यवस्था का कानूनी अंत अपने आप आर्थिक असमानता ख़त्म नहीं करता, चाहे वह रंगभेद का ख़ात्मा हो या अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता की संवैधानिक समाप्ति। अध्याय बताता है कि दक्षिण अफ़्रीका में आर्थिक पूँजी आज भी ज़्यादातर श्वेतों के हाथ में है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. जातीय भेदभाव को दूर करने वाली प्रमुख राजकीय पहलों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: सबसे महत्वपूर्ण पहल है आरक्षण: विधानमंडलों (राज्य विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा), सरकारी नौकरियों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और शिक्षा संस्थानों में SC/ST के लिए उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी के अनुपात में सीटें आरक्षित करना; OBC आरक्षण अलग तरीके से तय होता है। इसके साथ-साथ कई कानून जातीय भेदभाव को खत्म करने, रोकने या दंडित करने के लिए बने: जातीय निर्योग्यता निवारण अधिनियम (1850), जिसने केवल धर्म या जाति बदलने के कारण नागरिक अधिकार कम करने से रोका और सरकारी स्कूलों में दलितों की भर्ती की इजाज़त दी, भारत का संविधान (1950, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता समाप्त करता है), SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम (1989), और संविधान का 93वाँ संशोधन अधिनियम (2005/2006) जो उच्च शिक्षा में OBC आरक्षण लाता है। अध्याय बताता है कि इस विषय पर बार-बार अनेक कानून बनाए गए, जो इस तथ्य के प्रमाण हैं कि अकेला कानून ही किसी सामाजिक कुप्रथा को नहीं मिटा सकता।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. अध्याय के अनुसार OBC की इस राजनीतिक श्रेणी की समस्याओं से निपटना बहुत कठिन क्यों है?

उत्तर: OBC के भीतर बहुत असमानता है: उच्च स्तर के OBC अधिकतर भूमिधर जातियाँ हैं और कई क्षेत्रों में ग्रामीण समाज पर उनका दबदबा है, जबकि निम्न स्तर के OBC बेहद ग़रीब और वंचित हैं, अक्सर आर्थिक-सामाजिक रूप से दलितों जैसे। इस भीतरी अंतर के बावजूद OBC को एक ही राजनीतिक श्रेणी माना जाता है। भूधारण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व (जहाँ उनके विधायकों तथा सांसदों की संख्या काफ़ी बढ़ी है) को छोड़कर बाक़ी सभी कार्यक्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है, और शहरी OBC की हालत ग्रामीण अगड़े OBC से कहीं ज़्यादा ख़राब है, SC/ST के क़रीब है। भीतरी असमानता और एक साझा लेबल का यह मेल OBC को किसी एक समान नीति से संबोधित करना मुश्किल बना देता है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. अध्याय में बताए किन्हीं दो उन्नीसवीं सदी के महिला अधिकार सुधार आंदोलनों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: राजा राममोहन राय ने बंगाल में सती-विरोधी आंदोलन चलाया, जो सार्वजनिक ध्यान पाने वाला पहला महिला-मुद्दा बना, और ब्रह्म समाज (1828) की स्थापना से एक दशक पहले शुरू हुआ; उन्होंने सती प्रथा के खिलाफ़ मानवीय तर्क और हिंदू शास्त्रों दोनों का सहारा लिया। बाम्बे प्रेसिडेंसी में एम.जी. रानाडे ने विधवा पुनर्विवाह आंदोलन चलाया, और अपनी किताब में हिंदू शास्त्रों से यह दिखाया कि वे असल में विधवा पुनर्विवाह की इजाज़त देते हैं। सामाजिक रूप से बहिष्कृत जाति से आने वाले जोतिबा फुले ने जाति और लिंग भेदभाव दोनों पर एक साथ हमला किया और सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिनके शुरुआती सुधार पारंपरिक ब्राह्मण संस्कृति में सबसे निचले माने गए दो समूहों, महिलाओं और अछूतों, के लिए थे।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. अध्याय में बताए गए असक्षमता और गरीबी के दोतरफ़ा रिश्ते को समझाइए।

उत्तर: गरीबी असक्षमता की संभावना बढ़ाती है: कुपोषण, बार-बार प्रसव से कमज़ोर हुई माँएँ, अपर्याप्त टीकाकरण कार्यक्रम और भीड़भाड़ वाले घरों में दुर्घटनाएँ, ये सब आसान परिस्थितियों में रहने वालों की तुलना में ग़रीब लोगों में असक्षमता की दर बढ़ाते हैं। दूसरी तरफ़, असक्षमता गरीबी को गहरा करती है: यह सिर्फ़ असक्षम व्यक्ति ही नहीं, पूरे परिवार के लिए अलगाव और आर्थिक दबाव बढ़ाती है, अध्याय कहता है कि इस बात में कोई संदेह नहीं कि असक्षम लोग गरीब देशों में सबसे गरीब होते हैं।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. अध्याय में बताई गई असक्षमता की सार्वजनिक धारणा की सामान्य विशेषताओं की सूची बनाकर संक्षेप में समझाइए।

उत्तर: अध्याय दुनिया भर में मिलने वाली पाँच विशेषताएँ बताता है: निर्योग्यता/अक्षमता को एक जैविक कमज़ोरी माना जाता है; व्यक्ति की कोई भी परेशानी सीधे उसकी अक्षमता से जोड़ दी जाती है; व्यक्ति को ‘पीड़ित’ माना जाता है; यह माना जाता है कि निर्योग्यता व्यक्ति के अपने प्रत्यक्ष ज्ञान से जुड़ी है; और निर्योग्यता का मूल भाव ही यह दर्शा देता है कि निर्योग्य व्यक्तियों को सहायता की आवश्यकता है। भारत में ‘अपंग’, ‘अंधा’ और ‘बहरा’ जैसे शब्द अक्सर गाली की तरह इस्तेमाल होते हैं, और असक्षमता को अक्सर पिछले जन्म के कर्मों का फल माना जाता है; इस प्रकार प्रचलित सांस्कृतिक विचारधारा असक्षमता को व्यक्ति की विशेष स्थिति मानती है, न कि समाज की संरचना या विचारधारा में निहित समस्या।

5 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. उदाहरण सहित समझाइए कि पूर्वाग्रह, रूढ़िबद्ध धारणा, भेदभाव और सामाजिक अपवर्जन जुड़े हुए पर अलग-अलग अवधारणाएँ कैसे हैं।

उत्तर: पूर्वाग्रह किसी समूह के बारे में पहले से बनी एक राय या सोच है, जो सबूत देखने से पहले बनती है। यह सकारात्मक या नकारात्मक हो सकती है, और नई जानकारी के बावजूद बदलने से इनकार करती है। पूर्वाग्रह ज़्यादातर रूढ़िबद्ध धारणाओं पर आधारित होते हैं: पूरे समूह पर लगाई गई अपरिवर्तनीय, कठोर छवियाँ, जैसे औपनिवेशिक भारत में ‘वीर प्रजाति’ या ‘कायर’ और ‘पौरुषहीन’ समुदाय जैसे लेबल। ये लेबल यह मानने से इनकार करते हैं कि व्यक्ति असल में अलग-अलग होते हैं। भेदभाव पूर्वाग्रह का व्यावहारिक नतीजा है, यानी असली कार्रवाई, जैसे किसी को जाति या लिंग के कारण नौकरी न देना, जो वास्तविक अवसरों से वंचित करती है। इसे साबित करना मुश्किल है क्योंकि हो सकता है कि यह न खुले तौर पर हो न घोषित, और इसे ‘योग्यता’ जैसे दूसरे कारणों से प्रेरित दिखाया जा सकता है। सामाजिक अपवर्जन तब पैदा होता है जब ऐसा पूर्वाग्रह और भेदभाव समय के साथ व्यवस्थित रूप से दोहराया जाता है। यह एक व्यापक, संरचनात्मक नतीजा है, जो किसी समूह को सिर्फ़ एक अवसर से नहीं बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और यहाँ तक कि पुलिस व न्यायपालिका तक पूरी भागीदारी से काट देता है। संक्षेप में, पूर्वाग्रह मनोवृत्ति और विचार है, भेदभाव उसका व्यावहारिक रूप है, और सामाजिक अपवर्जन व्यवस्थित तथा संरचनात्मक होता है। चूँकि पूर्वाग्रह बना रहता है और नए पूर्वाग्रह उत्पन्न होते रहते हैं, कानून अकेले इसे नहीं मिटा सकता; इसके लिए परिवर्तन, जागरूकता और संवेदनशीलता के साथ एक सतत सामाजिक अभियान चाहिए।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. जाति व्यवस्था को एक भेदभावपूर्ण व्यवस्था के रूप में बताइए, और समझाइए कि भारतीय राज्य ने इसे दूर करने की कोशिश कैसे की है।

उत्तर: जाति व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से व्यवसाय और स्थिति को जन्म से जोड़ती थी: किसी जाति में जन्मा व्यक्ति बिना किसी चुनाव के उसी जाति के व्यवसाय में ‘जन्म लेता’ था, और हर जाति का अधिक्रम में एक तय स्थान होता था। कड़े शास्त्रीय अर्थ में, सामाजिक स्थिति (धार्मिक दर्जा) और आर्थिक स्थिति (सांसारिक सत्ता) अलग-अलग रहनी थीं, जैसे ब्राह्मण धार्मिक रूप से सबसे ऊँचे थे पर उन्हें धन या सांसारिक सत्ता नहीं रखनी थी। असल में, हालाँकि, दोनों अक्सर साथ-साथ चलीं, और भले ही सौ या पचास वर्ष पहले की तुलना में जाति और आर्थिक स्थिति का सहसंबंध कमज़ोर हुआ हो, वृहत स्तर पर जाति-वर्ग का परस्पर संबंध अभी भी कायम है। अस्पृश्यता इस भेदभाव का सबसे चरम रूप है, जिसमें शुद्धता-अशुद्धता के पैमाने पर सबसे नीचे मानी जाने वाली जातियों का अपवर्जन, अनादर एवं अधीनता और शोषण शामिल है। भारतीय राज्य ने आरक्षण के ज़रिए जवाब दिया, यानी विधानमंडलों, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में SC/ST के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित कीं, और कई कानूनों के ज़रिए: जातीय निर्योग्यता निवारण अधिनियम (1850), संविधान का अनुच्छेद 17 (1950) जो अस्पृश्यता समाप्त करता है, और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम (1989)। फिर भी अध्याय स्पष्ट कहता है कि इस विषय पर बार-बार अनेक कानून बनाए गए, जो इस तथ्य के प्रमाण हैं कि अकेला कानून ही किसी सामाजिक कुप्रथा को नहीं मिटा सकता; इसके लिए जागरूकता का लगातार सामाजिक अभियान भी ज़रूरी है, साथ ही नेताओं, पार्टियों और साहित्य के ज़रिए दलितों का अपना राजनीतिक व सांस्कृतिक दावा भी।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. अध्याय में बताए अनुसार OBC और आदिवासियों के संघर्षों की तुलना कीजिए।

उत्तर: OBC और आदिवासी दोनों संवैधानिक रूप से मान्यता-प्राप्त श्रेणियाँ हैं, जो आंशिक रूप से नकारात्मक शब्दों में परिभाषित हैं। दोनों को राजनीतिक ध्यान पाने के लिए संगठित होना पड़ा है, पर उनकी स्थितियाँ काफ़ी अलग हैं। OBC कई धर्मों में फैला एक बेहद विविध समूह है, जो भीतर से संपन्न ‘अगड़े’ OBC (अधिकतर भूमिधर, ग्रामीण समाज में प्रभुत्वशाली) और बेहद ग़रीब ‘पिछड़े’ OBC (दलितों जैसी स्थिति के क़रीब) में बँटा है। इनकी राजनीतिकरण की प्रक्रिया, यानी अपनी लगभग 41% जनसंख्या हिस्सेदारी को ताक़त में बदलना, 1990 में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद ही एक बड़ी राष्ट्रीय ताक़त बनी। यह कालेलकर आयोग की 1953 की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाले जाने के दशकों बाद हुआ। इसके उलट आदिवासी भौगोलिक रूप से सटे हुए इलाकों में केंद्रित हैं। इसी वजह से उनके आंदोलन पूरे नए राज्य की माँग कर पाए, और उनकी सर्वाधिक उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक झारखंड व छत्तीसगढ़ को राज्य का दर्जा मिलना है, जो दलितों के लिए संभव नहीं था, क्योंकि वे सटे हुए इलाकों में केंद्रित नहीं थे। आदिवासी संघर्ष जंगल और ज़मीन के नुक़सान पर केंद्रित हैं, पहले औपनिवेशिक जंगल-आरक्षण नीति के तहत, और फिर आज़ादी के बाद औद्योगीकरण व सरदार सरोवर और पोलावरम जैसी बाँध परियोजनाओं के तहत, जिसे अध्याय आंतरिक उपनिवेशवाद का एक रूप कहता है। फिर भी दोनों समूहों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर दबाव बनाना पड़ा है, और अध्याय दिखाता है कि उनकी उपलब्धियाँ इसी संघर्ष से आईं।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. अध्याय में बताए अनुसार उन्नीसवीं सदी से लेकर आज तक भारत में महिला समानता और अधिकारों के संघर्ष का वर्णन कीजिए।

उत्तर: महिलाओं का मुद्दा सबसे पहले उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्गीय सुधार आंदोलनों के ज़रिए सार्वजनिक जीवन में आया: बंगाल में राजा राममोहन राय का सती-विरोधी आंदोलन (ब्रह्म समाज की 1828 में स्थापना से पहले), बाम्बे प्रेसिडेंसी में एम.जी. रानाडे का विधवा पुनर्विवाह आंदोलन, जोतिबा फुले का सत्यशोधक समाज के ज़रिए जाति और लिंग उत्पीड़न पर संयुक्त हमला, और सर सैयद अहमद खान का महिला शिक्षा को घर तक सीमित समर्थन, जिससे आर्य समाज के दयानंद सरस्वती की सोच भी मिलती-जुलती थी। दो महिलाओं द्वारा लिखी गई किताबें, ताराबाई शिंदे की ‘स्त्री पुरुष तुलना’ (1882) और बेगम रुकैया सखावत हुसैन का ‘सुल्ताना का सपना’ (1905), साबित करती हैं कि ये विचार सिर्फ़ पुरुष सुधारकों के नहीं, बल्कि महिलाओं के अपने भी थे। बीसवीं सदी की शुरुआत में महिला संगठन राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर बढ़े, और महिलाओं ने आज़ादी की लड़ाई में सीधे हिस्सा लिया; स्त्रियों के अधिकार राष्ट्रवादी परिकल्पना के अभिन्न अंग थे, और 1931 के कराची अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने महिला समानता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और महिलाओं के वोट व पद पाने के अधिकार का वचन दिया। आज़ादी के बाद, 1970 के दशक में ध्यान ‘आधुनिक’ मुद्दों जैसे मीडिया में महिलाओं की छवि और विकास के लिंग-आधारित असर की तरफ़ गया; 1980 के दशक में कानून सुधार का मुख्य क्षेत्र बना, जब पता चला कि महिलाओं से जुड़े कई कानून उन्नीसवीं सदी से नहीं बदले; और इक्कीसवीं सदी में बाल लिंगानुपात में तेज़ गिरावट और बालिकाओं के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया लैंगिक असमानता की नई चुनौतियाँ पेश करते हैं, जो दिखाता है कि लैंगिक समानता का संघर्ष अभी ख़त्म नहीं, जारी है।

6 केस स्टडी

केस स्टडी
अभ्यास केस (पुस्तक से नहीं): मध्य भारत के एक गाँव में, अनुसूचित जनजाति का एक परिवार तीन पीढ़ियों से जंगल के किनारे की एक ही ज़मीन पर खेती करता आ रहा है। पास में एक नई खनन परियोजना मंज़ूर हुई है, और परिवार को बताया गया है कि उन्हें विस्थापित किया जाएगा, नक़द मुआवज़े का वादा तो है, पर न तो भुगतान की और न ही वादा की गई नई ज़मीन मिलने की कोई तय तारीख़ है।

(क) 2 अंक अध्याय के आदिवासी विस्थापन के विवरण का इस्तेमाल करते हुए समझाइए कि इस परिवार की स्थिति एक अलग-थलग मामला क्यों नहीं, बल्कि एक आम पैटर्न है।
उत्तर: अध्याय बताता है कि आज़ादी के बाद पूँजी-गहन औद्योगीकरण को आदिवासी इलाकों में केंद्रित खनिज और बिजली संसाधन चाहिए, इसलिए आदिवासी ज़मीनें तेज़ी से खनन और बाँध परियोजनाओं के लिए छीनी जाती हैं और लाखों लोग बिना उचित मुआवज़े या पुनर्वास के विस्थापित होते हैं, इसे ‘राष्ट्रीय विकास’ का नाम दिया जाता है। इस परिवार का अनिश्चित मुआवज़ा और विस्थापन बिल्कुल वही पैटर्न है जो अध्याय बताता है, कोई अकेली विफलता नहीं।

(ख) 2 अंक अध्याय इस पैटर्न के लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल करता है, और इसे सिर्फ़ ‘विकास’ न कहकर यह शब्द क्यों इस्तेमाल करता है?
उत्तर: अध्याय इस पैटर्न को ‘आंतरिक उपनिवेशवाद’ का एक रूप कहता है, क्योंकि जैसे औपनिवेशिक शासन में होता था, वैसे ही यहाँ एक समूह (राज्य और कॉर्पोरेट हित) दूसरे समूह (आदिवासी) को अधीन बनाकर उनके संसाधन ले लेता है, भले ही यह आज़ाद भारत के भीतर हो रहा हो और इसे विजय की बजाय विकास के रूप में पेश किया जाता हो।

केस स्टडी
अभ्यास केस (पुस्तक से नहीं): चलने-फिरने में अक्षमता वाली एक युवा महिला एक प्रतियोगी परीक्षा में बैठना चाहती है। उसे जो परीक्षा केंद्र दिया गया है वह एक ऐसी इमारत की तीसरी मंज़िल पर है जहाँ लिफ़्ट नहीं है, और जब वह ग्राउंड-फ्लोर केंद्र की माँग करती है, तो उसे बताया जाता है कि इतने समय में यह अनुरोध संभव नहीं है।

(क) 2 अंक अध्याय में दिए ब्रिसेनडेन (1986) के तर्क का इस्तेमाल करते हुए समझाइए कि इस उम्मीदवार को असल में असक्षम कौन बना रहा है।
उत्तर: ब्रिसेनडेन के इस तर्क के अनुसार कि “हमें तो उन भव्य भवनों ने ‘असक्षम’ बनाया है जो हमारे प्रवेश के लिए नहीं बने हैं” और असक्षमता समाज की संरचना या विचारधारा में निहित है, व्यक्ति की शारीरिक दशा में नहीं, यहाँ इमारत में लिफ़्ट या ग्राउंड-फ्लोर पहुँच न होना, और परीक्षा व्यवस्था का इसके लिए योजना न बनाना ही इस उम्मीदवार को असक्षम बना रहा है, उसकी चलने-फिरने की अक्षमता नहीं।

(ख) 2 अंक परीक्षा प्राधिकरण की प्रतिक्रिया अध्याय में बताई ‘असक्षमता की सार्वजनिक धारणा की सामान्य विशेषताओं’ में से किसे दिखाती है, और क्यों?
उत्तर: यह उस विशेषता को दिखाती है जिसमें किसी अक्षम व्यक्ति के समक्ष आई समस्याओं को उसकी बाधा या कमज़ोरी के कारण ही उत्पन्न मान लिया जाता है (अध्याय की दूसरी विशेषता)। चूँकि परीक्षा प्राधिकरण इस मुश्किल को उम्मीदवार की अपनी समस्या मानता है जिसे उसे ख़ुद ढालना है, न कि इमारत या परीक्षा व्यवस्था की खामी, इसलिए वह असक्षमता को समाज की बनाई या हटाई जा सकने वाली चीज़ नहीं मानता।